सरदार वल्लभभाई पटेल और देशी रियासतें
भारत आज जिस रूप में एक अखंड देश दिखाई देता है, वह सदा से ऐसा नहीं था। 1947 ईस्वी में जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए, तब देश दो हिस्सों में बँट रहा था और इसके भीतर सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतें भी थीं। उनके शासक अपने-अपने राज्य के भविष्य का फैसला करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिए गए थे। ऐसे समय में सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी सूझबूझ, दृढ़ता और कूटनीति से इन रियासतों को भारतीय संघ में जोड़ा। इसी कारण उन्हें ‘लौह पुरुष’ और ‘अखंड भारत का शिल्पकार’ कहा जाता है।
ब्रिटिश शासन में देशी रियासतों की स्थिति
अंग्रेजी राज में भारत दो हिस्सों में बँटा हुआ था। एक हिस्सा ब्रिटिश भारत कहलाता था, जिस पर सीधे अंग्रेजों का शासन था। दूसरा हिस्सा देशी रियासतों का था, जहाँ भारतीय राजा, महाराजा और नवाब शासन करते थे। कानूनी रूप से ये रियासतें ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन वे पूरी तरह ब्रिटिश ताज के अधीन थीं। उनकी विदेश नीति, रक्षा और संचार अंग्रेजों के हाथ में थे। हर बड़ी रियासत में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रहता था, जो उस पर नजर रखता था।
स्वतंत्रता के समय इन रियासतों की संख्या लगभग 565 थी। वे देश के लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र में फैली थीं और उनमें देश की लगभग एक चौथाई आबादी रहती थी। इनमें मैसूर, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर जैसी बहुत बड़ी रियासतें थीं। लगभग 45 रियासतें मध्यम आकार की थीं और 300 से अधिक रियासतें बहुत छोटी थीं। काठियावाड़ में तो कुछ रियासतें केवल 20-20 गाँवों की थीं।
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों को समझ आ गया कि भारतीय राजाओं का विरोध करने से अच्छा उनका सहयोग लेना है। इसलिए 1858 ईस्वी के बाद उन्होंने अधीनस्थ सहयोग की नीति अपनाई, जो 1947 ईस्वी तक चलती रही। इस नीति के अनुसार रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (पैरामाउंटसी) का सिद्धांत लागू किया गया। अंग्रेज इस सिद्धांत को अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करते थे। यह सैन्य शक्ति, संधियों और व्यवहार पर टिका हुआ था, इसलिए रियासतों के शासकों को कभी यह भ्रम नहीं रहा कि वे अंग्रेजों के बराबर हैं। अंग्रेज इन रियासतों का उपयोग राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को रोकने में भी करते थे। इस तरह रियासतें अंग्रेजी सत्ता के लिए एक सहायक ढाल का काम करती थीं।
1946-47 ई. : सत्ता हस्तांतरण और रियासतों की समस्या
1946-47 ईस्वी में रियासतों के भीतर भी जन-आंदोलन उठ खड़े हुए। लोग अधिक राजनीतिक अधिकार माँग रहे थे और संविधान सभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व चाहते थे। इसी दौरान 1945 ईस्वी में उदयपुर में और 1947 ईस्वी में ग्वालियर में अखिल भारतीय राज्य जन-सम्मेलन हुए, जिनकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। नेहरू ने साफ कहा कि जो रियासतें संविधान सभा में शामिल होने से मना करेंगी, उनके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया जाएगा।
20 फरवरी 1947 ईस्वी को ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि सर्वोच्चता के अधिकार किसी दूसरी सरकार को सौंपने का अंग्रेजों का इरादा नहीं है। कुछ बड़ी रियासतों ने इसका अर्थ यह निकाला कि 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद वे स्वतंत्र हो जाएँगी। त्रावनकोर के दीवान ने खुलकर यह दावा भी कर दिया और कई और शासक भी स्वतंत्र होने के सपने देखने लगे। यहाँ तक कि केंद्रीय राजनीतिक विभाग के कुछ बड़े ब्रिटिश अधिकारियों ने भी रियासतों की इस महत्त्वाकांक्षा को हवा दी।
नेहरू ने वायसराय माउंटबेटन को बताया कि राजनीतिक विभाग की कार्रवाइयाँ भारत की एकता को तोड़ने का प्रयास हैं। उन्होंने कहा कि सर्वोच्चता समाप्त होने का अर्थ यह भी है कि रियासतों को मिला ब्रिटिश संरक्षण भी समाप्त हो जाएगा। कांग्रेस ने साफ शब्दों में कहा कि वह ऐसी नीतियों को कभी स्वीकार नहीं करेगी। माउंटबेटन ने स्थिति की गंभीरता को समझा और राजनीतिक विभाग का पूरा ढाँचा बदल दिया। 27 जून 1947 ईस्वी को भारत सरकार के अधीन एक नया राज्य विभाग बनाया गया। इसका प्रभार सरदार वल्लभभाई पटेल को मिला और रियासतों के भारत में विलय की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। वरिष्ठ आई.सी.एस. अधिकारी वी.पी. मेनन को उनका सचिव और मुख्य सहयोगी बनाया गया।
जुलाई 1947 ईस्वी में पारित भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने रियासतों को तीन रास्ते दिए। वे भारत में शामिल हो सकती थीं, पाकिस्तान में शामिल हो सकती थीं, या स्वयं को स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में स्थापित कर सकती थीं। व्यवहार में यह निर्णय शासक को ही करना था, जनता से पूछने का कोई प्रावधान नहीं था। इसी वजह से पटेल के सामने एक बहुत कठिन चुनौती खड़ी थी।
सरदार वल्लभभाई पटेल का प्रारंभिक जीवन
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 ईस्वी को गुजरात के खेड़ा जिले के नडियाद में हुआ था। उनके पिता झवेरभाई पटेल करमसद गाँव (आणंद जिला) के एक साधारण किसान थे। माता लाडबा देवी धार्मिक और आध्यात्मिक स्वभाव की महिला थीं। वल्लभभाई अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके तीन बड़े भाई सोमाभाई, नरसीभाई और विट्ठलभाई थे और एक बहन दहीबा थीं।
उनका पालन-पोषण करमसद के ग्रामीण वातावरण में हुआ। उन्होंने स्वयं खेती नहीं की, परंतु परिवार की आजीविका खेती और पशुपालन पर ही टिकी थी। ग्रामीण जीवन की अनिश्चितताओं और छोटे राजस्व अधिकारियों द्वारा किसानों को सताए जाने को उन्होंने बचपन से देखा। इसी कारण बाद में वे किसानों और मजदूरों की पीड़ा को गहराई से समझ सके। वे कहा करते थे कि दुनिया का आधार किसान और मजदूर हैं, फिर भी सबसे अधिक अत्याचार वही सहते हैं, क्योंकि वे चुपचाप सहन कर लेते हैं। उनका संकल्प था कि किसान को डरा हुआ और कमजोर नहीं रहने देना है, उसे सिर ऊँचा करके चलने वाला बनाना है।
उस समय की बाल विवाह की प्रथा के अनुसार 1891 ईस्वी में केवल 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह झवेरबा से हुआ। उनकी दो संतानें हुईं, पुत्र दहयाभाई और पुत्री मणिबेन पटेल। 1909 ईस्वी में झवेरबा का कैंसर से निधन हो गया। कहा जाता है कि पत्नी की मृत्यु का तार जब उनके पास पहुँचा, तब वे अदालत में एक मुकदमे की बहस कर रहे थे। उन्होंने बहस पूरी की, मुकदमा जीता और उसके बाद सबको यह समाचार बताया। इसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया और जीवन भर अपने बच्चों के साथ विधुर के रूप में रहे।
वल्लभभाई की प्रारंभिक शिक्षा गुजराती माध्यम के विद्यालय में हुई। बाद में उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में प्रवेश लिया। विद्यालयी शिक्षा पूरी करने में उन्हें काफी समय लगा और उनकी पढ़ाई काफी हद तक स्वाध्याय से हुई। उन्होंने 1897 ईस्वी में 22 वर्ष की आयु में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने वकालत की परीक्षा पास की और गोधरा में वकालत शुरू की। उनकी वकालत चल निकली और उन्होंने पैसे जोड़े। 1910 ईस्वी में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। उनके पास कॉलेज जाने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, फिर भी वे बहुत तेज बुद्धि के थे। उन्होंने 36 महीने का कानून का पाठ्यक्रम लगभग 30 महीने में पूरा कर लिया और 1913 ईस्वी में परीक्षा में सर्वाधिक अंक पाकर अपने कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
इंग्लैंड से लौटकर वे अहमदाबाद में एक सफल बैरिस्टर के रूप में काम करने लगे और गुजरात क्लब के सदस्य बने। ब्रिटिश सरकार ने उनकी कानूनी योग्यता देखकर उन्हें कई ऊँचे पदों का प्रस्ताव दिया, पर उन्होंने ठुकरा दिया, क्योंकि वे ब्रिटिश कानूनों को पसंद नहीं करते थे। इसी दौरान उन्होंने महात्मा गांधी का एक व्याख्यान सुना। गांधीजी के विचारों ने उन पर गहरा असर डाला और वे उनके पक्के अनुयायी बन गए। धीरे-धीरे वे भारतीय राजनीति का हिस्सा बन गए। गांधीजी से प्रेरित होकर उन्होंने छुआछूत, जातिवाद और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध भी आवाज उठाई।

स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल की भूमिका
स्वतंत्रता आंदोलन में पटेल का पहला और बड़ा योगदान 1918 ईस्वी के खेड़ा सत्याग्रह में रहा। उस समय गुजरात का खेड़ा क्षेत्र भयंकर सूखे की चपेट में था। फसलें नष्ट हो गई थीं और किसान लगान देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने अंग्रेज सरकार से कर में छूट माँगी, पर सरकार ने मना कर दिया। तब पटेल ने गांधीजी और अन्य साथियों के साथ किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और उस वर्ष करों में राहत दी गई। यह पटेल की पहली बड़ी सफलता थी।
1920 ईस्वी में गांधीजी के असहयोग आंदोलन में पटेल ने अपनी चलती हुई वकालत छोड़ दी। उन्होंने स्वदेशी खादी अपनाई और विदेशी कपड़ों की होली जलाई। बाद में स्वराज आंदोलन, दांडी यात्रा और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे गांधीजी के सभी शांतिपूर्ण आंदोलनों में उनकी भूमिका अहम रही। इस दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। इसी बीच उन्होंने अहमदाबाद नगरपालिका के चुनावों में लगातार सफलता पाई और 1920 ईस्वी के दशक में वे नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। इस दौरान उन्होंने शहर की सफाई, पानी और शिक्षा जैसी सुविधाओं पर काम किया।
1928 ईस्वी का बारदोली सत्याग्रह गुजरात का एक बड़ा किसान आंदोलन था, जिसका नेतृत्व पटेल ने किया। प्रांतीय सरकार ने किसानों का लगान लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था। पटेल ने इसका जोरदार विरोध किया और किसानों को संगठित किया। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए, पर अंत में उसे झुकना पड़ा। ब्लूमफील्ड नाम के न्यायिक अधिकारी और मैक्सवेल नाम के राजस्व अधिकारी ने पूरे मामले की जाँच की। उन्होंने लगान की वृद्धि को अनुचित माना और उसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। इस सफलता के बाद बारदोली की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि दी और तभी से यह शब्द उनके नाम का हिस्सा बन गया। गांधीजी ने भी कहा कि इस तरह के किसान संघर्ष स्वराज की मंजिल तक पहुँचने में बहुत सहायक हैं।
29 मार्च 1931 ईस्वी को कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की। इस अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते (दिल्ली समझौते) को स्वीकृति दी गई और पूर्ण स्वराज के लक्ष्य को दोहराया गया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की वीरता और बलिदान की प्रशंसा की गई। साथ ही कांग्रेस ने कहा कि वह किसी भी प्रकार की राजनीतिक हिंसा का समर्थन नहीं करती।
इस अधिवेशन में दो मुख्य प्रस्ताव पारित हुए। पहला प्रस्ताव मूलभूत राजनीतिक अधिकारों से संबंधित था। इसमें अभिव्यक्ति और प्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता, सभा और सम्मेलन आयोजित करने की स्वतंत्रता तथा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव का अधिकार माँगा गया। कांग्रेस ने यह भी कहा कि जाति, धर्म और लिंग से परे सभी को कानून के सामने समानता मिले और राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रहे। इसी प्रस्ताव में निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की गारंटी दी गई और अल्पसंख्यकों तथा भाषाई क्षेत्रों की संस्कृति, भाषा और लिपि की सुरक्षा का वचन दिया गया।
दूसरा प्रस्ताव राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम का था। इसमें किसानों को कर्ज से राहत देने और सूदखोरों पर नियंत्रण रखने की बात कही गई। मजदूरों के लिए बेहतर सेवा शर्तें, महिला मजदूरों की सुरक्षा और काम के नियमित घंटे तय करने का वादा किया गया। मजदूरों और किसानों को अपने संगठन बनाने की स्वतंत्रता देने, लगान और मालगुजारी में उचित कटौती करने और अलाभकारी जोतों को लगान से मुक्त करने की बात भी इसमें थी। साथ ही प्रमुख उद्योगों, परिवहन और खदानों को सरकारी स्वामित्व और नियंत्रण में रखने का वादा किया गया। कांग्रेस ने यह भी घोषणा की कि जनता के शोषण को समाप्त करने के लिए राजनीतिक आजादी के साथ आर्थिक आजादी भी जरूरी है। इसी कारण कराची अधिवेशन को कांग्रेस की मूलभूत राजनीतिक और आर्थिक नीतियों का दस्तावेज माना जाता है।
पटेल गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति के पहले अध्यक्ष बने और 1945 ईस्वी तक इस पद पर रहे। इस बीच वे कई बार जेल गए। भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्हें भी अन्य बड़े नेताओं के साथ लंबे समय तक कैद में रखा गया।
स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री
1946 ईस्वी में जब प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने का प्रश्न आया, तब अधिकांश प्रांतीय कांग्रेस समितियाँ पटेल के पक्ष में थीं। फिर भी गांधीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए पटेल ने स्वयं को इस दौड़ से अलग रखा और नेहरू का समर्थन किया। स्वतंत्रता के बाद उन्हें उप-प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके साथ ही वे देश के पहले गृह मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री और राज्य विभाग के मंत्री भी बने।
रियासतों के एकीकरण की रणनीति
पटेल ने आजादी से पहले ही, संक्रमण काल में, वी.पी. मेनन के साथ मिलकर रियासतों को भारत में मिलाने का काम शुरू कर दिया था। वे जानते थे कि यदि इन रियासतों को स्वतंत्र छोड़ दिया गया तो देश में अराजकता फैल जाएगी और भारत टुकड़ों में बँट जाएगा। उन्होंने राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें पूर्ण स्वायत्तता देना संभव नहीं होगा।
रियासतों को दो प्रकार के दस्तावेज दिए गए। पहला विलय-पत्र था, जिस पर हस्ताक्षर करके शासक अपनी रियासत को भारत में शामिल कर देता था। दूसरा यथास्थिति समझौता (स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट) था, जिससे पहले जैसी व्यवस्था बनी रहती थी। विलय-पत्र में शासक केवल तीन विषय भारत सरकार को सौंपता था- रक्षा, विदेशी मामले और संचार। रियासत का आंतरिक प्रशासन उसी के हाथ में रहता था। 25 जुलाई 1947 ईस्वी को माउंटबेटन ने नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ प्रिंसेज) में राजाओं को समझाया कि भारत के साथ मिलना उनके अपने हित में है। पटेल ने उसी समय बहुत व्यवहारिक तरीके से काम किया। उन्होंने चालीस दिनों तक अधिक से अधिक राजाओं से संपर्क किया और उन्हें भरोसा दिलाया।
पटेल ने तीन तरीकों का सहारा लिया, जिन्हें साम, दाम और दंड की नीति कहा जाता है। पहला तरीका समझाना और आश्वासन देना था। उन्होंने राजाओं को व्यक्तिगत भरोसा दिलाया कि उनका सम्मान और उनकी संपत्ति सुरक्षित रहेगी। दूसरा तरीका सुविधाएँ देना था। राजाओं को प्रिवी पर्स दिया गया, जो एक निश्चित वार्षिक भत्ता था और विलय के बदले शाही परिवारों को मिलना था। कई राजाओं को विशेषाधिकार दिए गए और कुछ को राज्यपाल या राजप्रमुख जैसे पद भी मिले। तीसरा तरीका जनता का दबाव और चेतावनी था। पटेल ने राजाओं को साफ बता दिया कि 15 अगस्त के बाद परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। यदि उसने कोई और रास्ता चुना और उसकी प्रजा उठ खड़ी हुई तो उसे नई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इन तीनों उपायों के कारण अधिकांश राजाओं ने विलय-पत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए।
इस काम से जुड़ी कई कथाएँ प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि एक बार पटेल ने सुना कि बस्तर की रियासत में कच्चे सोने का बड़ा क्षेत्र है और हैदराबाद का निजाम उसे लंबे पट्टे पर लेना चाहता है। वे उसी दिन वी.पी. मेनन को साथ लेकर निकल पड़े। ओडिशा पहुँचकर उन्होंने वहाँ के 23 राजाओं से कहा कि कुएँ के मेंढक मत बनो, महासागर में आ जाओ। इसके बाद वे नागपुर क्षेत्र की रियासतों से मिले, जहाँ के 38 राजाओं को तोपों की सलामी का सम्मान मिलता था, इसलिए उन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था। इसके बाद काठियावाड़ की लगभग 250 रियासतों का एकीकरण हुआ, जिनमें कुछ केवल 20 गाँव की थीं। पंजाब में पटियाला का खजाना खाली मिला। कहा जाता है कि फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की तो पटेल ने उसके राज्य के नक्शे पर लाल पेंसिल घुमाकर बस इतना पूछा कि क्या मर्जी है। महात्मा गांधी ने भी पटेल को लिखा था कि रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी कि उसे केवल वही हल कर सकते थे।
15 अगस्त 1947 ईस्वी तक केवल तीन रियासतों को छोड़कर सभी रियासतें भारत में शामिल हो चुकी थीं। ये तीन रियासतें जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर थीं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य रियासतों का मामला भी उलझा हुआ था।
प्रमुख रियासतों का विलय: घटनाएँ क्रमानुसार
त्रावनकोर (जुलाई 1947 ई.)
दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित त्रावनकोर उन पहली रियासतों में था जिसने भारत के साथ विलय से मना कर दिया। उसके दीवान सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने कांग्रेस नेतृत्व की खुली आलोचना की। यह भी कहा जाता है कि उसने ब्रिटिश सरकार से गुप्त संपर्क रखा था। ब्रिटेन को स्वतंत्र त्रावनकोर में रुचि इसलिए थी कि वहाँ मोनाजाइट नाम का खनिज बहुत मिलता है, जिसमें से थोरियम निकलता है और जो परमाणु ऊर्जा और हथियारों के काम आ सकता है। जुलाई 1947 ईस्वी में केरल समाजवादी पार्टी के एक सदस्य ने सी.पी. अय्यर पर जानलेवा हमला किया। वे बच गए, पर इसके बाद उनका रुख बदल गया। उन्होंने भारत से जुड़ने का निर्णय लिया और 30 जुलाई 1947 ईस्वी को त्रावनकोर भारत में शामिल हो गया।
जोधपुर (11 अगस्त 1947 ई.)
जोधपुर राजपूतों की रियासत थी। वहाँ का राजा हिंदू था और अधिकांश प्रजा भी हिंदू थी, फिर भी वह पाकिस्तान की ओर झुका हुआ था। युवा और अनुभवहीन महाराजा हनवंत सिंह ने सोचा कि उसकी सीमा पाकिस्तान से लगती है, इसलिए वह पाकिस्तान से अच्छा सौदा कर सकता है। कहा जाता है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने उसे एक हस्ताक्षर किया हुआ खाली कागज दे दिया था, ताकि वह अपनी सारी शर्तें उस पर लिख ले। जिन्ना ने कराची बंदरगाह तक मुफ्त पहुँच, हथियारों के निर्माण और आयात की सुविधा तथा अनाज की सहायता का भी प्रस्ताव रखा था। जब पटेल को इसका पता चला तो उन्होंने तुरंत राजा से संपर्क किया और उसे भारत की ओर से कई लाभों का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि हथियारों के आयात की अनुमति रहेगी, जोधपुर को काठियावाड़ से रेल द्वारा जोड़ा जाएगा और अकाल के समय अनाज की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसके बाद 11 अगस्त 1947 ईस्वी को महाराजा हनवंत सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और जोधपुर भारत में शामिल हो गया।
जूनागढ़ (1947-48 ई.)
जूनागढ़ गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की एक रियासत थी। वह चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी थी और पाकिस्तान से उसका सीधा भौगोलिक संबंध नहीं था। वहाँ की लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदू थी, जबकि शासक नवाब मुहम्मद महाबत खान मुसलमान था। नवाब ने 15 अगस्त 1947 ईस्वी को पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय घोषित किया। उसका तर्क था कि जूनागढ़ समुद्र के रास्ते पाकिस्तान से जुड़ा है। पाकिस्तान ने 15 सितंबर 1947 ईस्वी को यह स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ के अधीन दो छोटे राज्यों, मंगरोल और बाबरियावाड़, के शासकों ने इसके विरोध में जूनागढ़ से स्वतंत्रता और भारत में शामिल होने की घोषणा कर दी। नवाब ने सेना भेजकर इन दोनों पर कब्जा कर लिया और पड़ोसी राज्यों के राजाओं ने भारत सरकार से मदद की अपील की।
भारत सरकार का मत था कि यदि जूनागढ़ को पाकिस्तान में जाने दिया गया तो सांप्रदायिक दंगे बढ़ेंगे और 80 प्रतिशत हिंदू प्रजा इस निर्णय को स्वीकार नहीं करेगी। सरकार ने विलय के प्रश्न को जनमत संग्रह से सुलझाने का प्रस्ताव रखा। इसी बीच भारत ने जूनागढ़ को ईंधन और कोयले की आपूर्ति रोक दी और भारतीय सेना ने मंगरोल और बाबरियावाड़ पर अधिकार कर लिया। पाकिस्तान इस शर्त पर जनमत संग्रह के लिए राजी हुआ कि पहले भारतीय सेना हटे, किंतु भारत ने यह शर्त नहीं मानी। जूनागढ़ की जनता ने भी नवाब के निर्णय के विरुद्ध आंदोलन चलाया और बंबई में आरजी हुकूमत (अस्थायी सरकार) बनाई। जनविद्रोह से भयभीत होकर नवाब अक्टूबर 1947 ईस्वी के अंत में पाकिस्तान भाग गया। रियासत के दीवान सर शाहनवाज भुट्टो (पाकिस्तान के बाद के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) ने भारत सरकार को प्रशासन संभालने के लिए आमंत्रित किया। 9 नवंबर 1947 ईस्वी को भारतीय सेना ने जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। फरवरी 1948 ईस्वी में जनमत संग्रह हुआ, जिसमें लगभग सर्वसम्मति से लोगों ने भारत में विलय के पक्ष में मत दिया। इस तरह जूनागढ़ भारत का अभिन्न अंग बना।
जम्मू-कश्मीर (अक्टूबर 1947 ई. और उसके बाद)
जम्मू-कश्मीर की अधिकांश आबादी मुस्लिम थी, जबकि शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू था। रियासत की सीमाएँ भारत और पाकिस्तान दोनों से लगती थीं, इसलिए वह दोनों में से किसी के साथ जा सकती थी। हरि सिंह कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहता था और उसने निर्णय टाले रखा। माउंटबेटन और गांधीजी ने उससे शीघ्र निर्णय लेने को कहा, पर उसने कोई पक्का उत्तर नहीं दिया। दूसरी ओर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और उसकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व में लोकतांत्रिक शासन की माँग को लेकर आंदोलन चल रहा था। महाराजा ने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था।
अक्टूबर 1947 ईस्वी में पाकिस्तान की ओर से पठान कबायलियों और हथियारबंद लोगों ने कश्मीर पर हमला कर दिया और हमलावर श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे। संकट में महाराजा ने भारत से सैन्य सहायता माँगी। भारत ने कहा कि वैधानिक रूप से सेना भेजने के लिए विलय आवश्यक है। 26 अक्टूबर 1947 ईस्वी को महाराजा हरि सिंह ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके अनुसार रक्षा, विदेशी मामले और संचार भारत सरकार के अधिकार में आ गए। अगले दिन भारतीय सेना कश्मीर पहुँची और हमलावरों को पीछे धकेलने लगी।
आगे की घटनाएँ इस प्रकार रहीं। जनवरी 1948 ईस्वी में भारत यह मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गया और इस विषय को पं. नेहरू ने स्वयं संभाला था। 5 मार्च 1948 ईस्वी को महाराजा ने अंतरिम लोकप्रिय सरकार की घोषणा की, जिसके प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला बने। 1951 ईस्वी में राज्य की संविधान सभा का चुनाव हुआ और 31 अक्टूबर 1951 ईस्वी को उसकी पहली बैठक हुई। 1952 ईस्वी में दिल्ली समझौता हुआ, जिसके अनुसार भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिला। 6 फरवरी 1954 ईस्वी को जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने भारत के साथ विलय का अनुमोदन किया। जम्मू-कश्मीर के अपने संविधान की धारा 3 में लिखा है कि यह राज्य भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत राज्य को विशेष दर्जा मिला हुआ था। 5 अगस्त 2019 ईस्वी को भारत सरकार ने राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेश के द्वारा इस विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया और अनुच्छेद 35-ए भी समाप्त हुआ। 31 अक्टूबर 2019 ईस्वी को, जो सरदार पटेल की जयंती भी है, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में अस्तित्व में आए। भारत सरकार और उसके समर्थकों ने इसे पटेल के अखंड भारत के स्वप्न की पूर्ति बताया है।
हैदराबाद (सितंबर 1948 ई.)
हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी और सबसे समृद्ध रियासत थी। वह दक्कन पठार के बहुत बड़े भाग में फैली थी और चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी हुई थी। उसकी अधिकांश जनसंख्या हिंदू थी, जबकि शासक निजाम मीर उस्मान अली खान मुसलमान था। निजाम ने भारत में शामिल होने से मना कर दिया और स्वतंत्र राज्य की माँग की। कहा जाता है कि उसे जिन्ना से सहायता का भरोसा मिला था। उसने ब्रिटेन के सम्राट से भी अपने पुराने संबंधों की दुहाई देकर स्वतंत्र देश का दर्जा माँगा, पर ब्रिटेन ने इसे अस्वीकार कर दिया। माउंटबेटन ने भी उसे भारत में विलय की सलाह दी, पर उसने साफ इनकार कर दिया।
नवंबर 1947 ईस्वी में भारत और निजाम के बीच एक वर्ष का यथास्थिति समझौता हुआ, ताकि बातचीत चलती रहे। पर निजाम यूरोप से लगातार हथियार मँगाता रहा और अपनी सेना बढ़ाता रहा। पटेल, मेनन और अन्य मध्यस्थों की बातचीत और चेतावनियों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। निजाम की सेना के साथ-साथ रजाकार नाम का एक कट्टरपंथी अर्धसैनिक संगठन भी सक्रिय था, जिसका नेता कासिम रिजवी था। इसने हिंदू प्रजा पर हिंसा शुरू कर दी। दूसरी ओर तेलंगाना के किसान भी निजाम और जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह कर चुके थे। इन कारणों से निजाम की शक्ति कमजोर हो चुकी थी।
उस समय टाइम पत्रिका ने आशंका जताई थी कि यदि भारत ने कार्रवाई की तो रजाकार हिंदुओं का नरसंहार कर सकते हैं और उसकी प्रतिक्रिया में देश में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा भड़क सकती है। नेहरू बातचीत के पक्ष में थे और सैन्य कार्रवाई को अंतिम उपाय मानते थे, जबकि पटेल का रुख कठोर था। सितंबर 1948 ईस्वी की शुरुआत में भारत सरकार ने निजाम को चेतावनी दी कि रजाकारों पर प्रतिबंध लगाया जाए और सिकंदराबाद में भारतीय सैनिकों को लौटने दिया जाए। जब यह माँग नहीं मानी गई तो 13 सितंबर 1948 ईस्वी को भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। इस सैन्य कार्रवाई को ‘ऑपरेशन पोलो’ कहा जाता है और इसे आधिकारिक रूप से ‘पुलिस कार्रवाई’ नाम दिया गया। लगभग पाँच दिन की कार्रवाई के बाद 17 सितंबर 1948 ईस्वी को निजाम ने युद्धविराम की घोषणा की। हैदराबाद की सेना के सेनापति मेजर जनरल सैयद अहमद अल इद्रूस ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद निजाम ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए और हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन गया। निजाम को बाद में हैदराबाद राज्य का राजप्रमुख बनाया गया, यानी उसे सम्मानजनक पद देकर आत्मसमर्पण का पुरस्कार दिया गया। यह पद उसके पास 1956 ईस्वी तक रहा, जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ।

भोपाल (1949 ई.)
भोपाल भी उन रियासतों में था जिसने स्वतंत्र रहने का इरादा जताया। वहाँ के नवाब हमीदुल्ला खान मुसलमान थे और अधिकांश प्रजा हिंदू थी। वह मुस्लिम लीग के निकट था और कांग्रेस का कड़ा विरोधी था। उस समय वह नरेंद्र मंडल का चांसलर भी था। उसने माउंटबेटन को लिखा कि वह स्वतंत्र रियासत चाहता है। माउंटबेटन ने उसे उत्तर दिया कि कोई भी शासक अपने निकट के अधिराज्य से भागकर नहीं बच सकता। जब अधिकांश राजा भारत में शामिल हो चुके तो नवाब अकेला पड़ गया। अंत में उसने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए और भोपाल 1 जून 1949 ईस्वी को भारतीय संघ का हिस्सा बन गया।
रियासतों के विलय के विभिन्न रूप
15 अगस्त 1947 ईस्वी तक अधिकांश रियासतों ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे, पर इन हस्ताक्षरों से एकीकरण का काम केवल शुरू हुआ था। विलय-पत्र में शासक केवल रक्षा, विदेशी मामले और संचार भारत को सौंपता था। बाकी सारा शासन, जैसे कर, न्याय, पुलिस, शिक्षा और राजस्व, उसी के हाथ में रहता था। इससे देश में एक अजीब स्थिति बन गई। एक ही देश में कहीं सीधे भारत सरकार का शासन था और कहीं सैकड़ों छोटे राजाओं के अलग-अलग कानून, अलग सिक्के, अलग कर और अलग प्रशासन चल रहे थे।
पटेल और वी.पी. मेनन जानते थे कि इस स्थिति को लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता। कई रियासतें इतनी छोटी थीं कि वे अपने बल पर एक आधुनिक शासन चला ही नहीं सकती थीं। उनका खजाना खाली था और उनके पास न सड़कें थीं, न स्कूल और न अस्पताल। इसलिए रियासतों को पूरी तरह भारतीय शासन-व्यवस्था में मिलाने का दूसरा चरण शुरू हुआ। यह काम एक साथ, एक ही तरीके से नहीं हुआ। रियासत के आकार, स्थान, आर्थिक स्थिति और वहाँ की जनता की भावना को देखकर अलग-अलग पद्धतियाँ अपनाई गईं। मुख्य रूप से चार पद्धतियाँ थीं।
पहली पद्धति
पड़ोसी प्रांतों में विलय
बहुत-सी रियासतें छोटी थीं और चारों ओर से किसी न किसी ब्रिटिश-कालीन प्रांत से घिरी थीं। उनकी अपनी कोई अलग पहचान बनाए रखना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए इन्हें उसी प्रांत में मिला दिया गया जिससे वे भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ी थीं। इस श्रेणी में लगभग 216 रियासतें आईं। दिसंबर 1947 ईस्वी में पटेल स्वयं ओडिशा पहुँचे और वहाँ की रियासतों के राजाओं से बातचीत की। इसी बातचीत के बाद छत्तीसगढ़ और ओडिशा की 39 रियासतें या तो मध्य प्रांत (सेंट्रल प्रोविंसेज) में या ओडिशा प्रांत में मिला दी गईं। इनमें छत्तीसगढ़ की सरगुजा, कोरिया, जशपुर, रायगढ़ और बस्तर जैसी रियासतें, तथा ओडिशा की मयूरभंज, कालाहांडी और बोलांगीर जैसी रियासतें थीं। यह विलय 1 जनवरी 1948 ईस्वी के आसपास लागू हुआ। कहा जाता है कि इस विलय से ओडिशा के लोगों की सदियों पुरानी इच्छा कुछ ही समय में पूरी हो गई, क्योंकि उड़िया भाषी क्षेत्र एक प्रशासन में आ गए।
गुजरात की अनेक रियासतें बंबई प्रांत में मिला दी गईं। इनमें बड़ौदा जैसी बड़ी रियासत भी थी, जो 1949 ईस्वी में बंबई राज्य में शामिल हुई। महाराष्ट्र की दक्कनी रियासतें, जैसे कोल्हापुर, सांगली और मिरज भी 1948-49 ईस्वी में बंबई प्रांत में विलीन कर दी गईं। इस पद्धति में रियासत का अलग अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया और उसके क्षेत्र पर वही कानून और वही प्रशासन लागू हुआ जो उस प्रांत में था। इसलिए यह सबसे पूर्ण और सबसे तेज एकीकरण था। इन रियासतों के राजाओं को बदले में प्रिवी पर्स दिया गया।
दूसरी पद्धति
केंद्र-शासित इकाइयों का गठन
कुछ रियासतें ऐसी थीं जो सीमावर्ती क्षेत्रों में थीं या जिनका सामरिक महत्त्व बहुत अधिक था। कुछ रियासतें इतनी छोटी और कमजोर थीं कि उन्हें किसी प्रांत में मिलाना भी कठिन था, या फिर वे किसी प्रांत से जुड़ी हुई नहीं थीं। ऐसी रियासतों को अलग इकाई के रूप में गठित किया गया और उनका प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के हाथ में रखा गया। इनकी संख्या लगभग 61 थी। इनका शासन केंद्र की ओर से नियुक्त मुख्य आयुक्त (चीफ कमिश्नर) के जिम्मे था। बाद में संविधान लागू होने पर इन्हें भाग-ग (पार्ट सी) राज्य कहा गया।
इस श्रेणी के प्रमुख उदाहरणों में सबसे पहले हिमाचल प्रदेश आता है। पंजाब की पहाड़ी क्षेत्र की लगभग 30 छोटी रियासतों को मिलाकर 15 अप्रैल 1948 ईस्वी को हिमाचल प्रदेश बनाया गया। बाद में 1954 ईस्वी में बिलासपुर रियासत भी इसमें जुड़ गई। यह पहले केंद्र-शासित प्रदेश रहा और 1971 ईस्वी में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इसी प्रकार बघेलखंड और बुंदेलखंड की रियासतों को मिलाकर अप्रैल 1948 ईस्वी में विंध्य प्रदेश बना, जिसकी राजधानी रीवा थी। बाद में 1956 ईस्वी में यह मध्य प्रदेश में मिल गया। पूर्वोत्तर की मणिपुर और त्रिपुरा रियासतों का विलय 15 अक्टूबर 1949 ईस्वी को हुआ। दोनों को केंद्र के अधीन रखा गया, क्योंकि ये सीमावर्ती क्षेत्र थे। गुजरात का सीमावर्ती कच्छ रियासत क्षेत्र 1 जून 1948 ईस्वी को केंद्र-शासित इकाई बना। भोपाल के नवाब ने काफी विरोध के बाद विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे और 1 जून 1949 ईस्वी को भोपाल रियासत भी केंद्र के अधीन आ गई और वहाँ मुख्य आयुक्त की नियुक्ति हुई। बिलासपुर (कहलूर) भी 1948 ईस्वी में केंद्र-शासित इकाई के रूप में गठित हुई। इन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक व्यवस्था तुरंत लागू करना संभव नहीं था, इसलिए केंद्र ने सीधा नियंत्रण रखा गया।
तीसरी पद्धति
राज्य-संघों का गठन
कुछ रियासतें अकेले तो बहुत छोटी थीं, पर मिलकर एक बड़ी और व्यावहारिक इकाई बन सकती थीं। इसलिए पास-पास की रियासतों को जोड़कर संघ बनाए गए। इन संघों का प्रधान एक राजप्रमुख होता था, जो प्रायः किसी बड़ी रियासत का शासक होता था। साथ में एक जनता द्वारा चुनी मंत्रिपरिषद भी होती थी। इस तरह पुराने शासकों को सम्मानजनक पद भी मिला और लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत भी हुई। ऐसे पाँच प्रमुख संघ बने।
पहला संघ 15 फरवरी 1948 ईस्वी को बना, जो काठियावाड़ की संयुक्त रियासतों का संघ था। काठियावाड़ में लगभग 222 रियासतें थीं, जिनमें से कुछ केवल 20-20 गाँव की थीं। इन सबको मिलाकर संयुक्त काठियावाड़ राज्य बनाया गया और जामनगर (नवानगर) के जाम साहब को राजप्रमुख बनाया गया। इसका उद्घाटन स्वयं सरदार पटेल ने किया। पटेल ने इसे बड़े गर्व से देखा, क्योंकि यह उनके अपने गुजरात क्षेत्र में हुआ था।
दूसरा संघ राजस्थान संघ था, जिसका एकीकरण 1948-49 ईस्वी में कई चरणों में हुआ। 17 मार्च 1948 ईस्वी को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर मत्स्य संघ बना। 25 मार्च 1948 ईस्वी को कोटा, बूँदी, झालावाड़ आदि रियासतों का राजस्थान संघ बना। 18 अप्रैल 1948 ईस्वी को उदयपुर (मेवाड़) इसमें शामिल हुआ और उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह को राजप्रमुख बनाया गया। 30 मार्च 1949 ईस्वी को जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर भी शामिल हुए और वृहत्तर राजस्थान बना, जिसमें जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय राजप्रमुख बने। बाद में मत्स्य संघ भी इसमें मिल गया और 1956 ईस्वी में अजमेर के जुड़ने से वर्तमान राजस्थान बना।
तीसरा संघ 28 मई 1948 ईस्वी को बना मध्य भारत संघ था। ग्वालियर, इंदौर और मालवा क्षेत्र की लगभग 25 रियासतों को मिलाकर यह संघ बना और ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया इसके राजप्रमुख बने। यह 1956 ईस्वी में मध्य प्रदेश का हिस्सा बन गया। चौथा संघ 15 जुलाई 1948 ईस्वी को बना पटियाला और पूर्वी पंजाब रियासती संघ (पेप्सू) था। पंजाब की आठ रियासतों, जैसे पटियाला, जींद, नाभा, कपूरथला, फरीदकोट और कलसिया को मिलाकर यह संघ बना और पटियाला के महाराजा यादवेंद्र सिंह इसके राजप्रमुख थे। 1956 ईस्वी में इसे पंजाब में मिला दिया गया। पाँचवाँ संघ 1 जुलाई 1949 ईस्वी को बना त्रावणकोर-कोचीन संघ था। केरल की दो रियासतों, त्रावणकोर और कोचीन, को मिलाकर यह संघ बना और त्रावणकोर के महाराजा को राजप्रमुख बनाया गया। 1956 ईस्वी में मालाबार के साथ जुड़कर यह केरल राज्य बना।
इस पद्धति में राजाओं ने अपनी सत्ता स्वेच्छा से छोड़ी और बदले में उन्हें प्रिवी पर्स और राजप्रमुख जैसे सम्मान मिले। पटेल और मेनन ने इसी कारण इन समझौतों को ‘वचनपत्र’ या कोवेनेंट कहा। यह सहमति से हुआ विलय था।
चौथी पद्धति
मैसूर
मैसूर दक्षिण भारत की एक बड़ी, विकसित और अपेक्षाकृत आधुनिक रियासत थी। वहाँ की अपनी शासन-व्यवस्था, उद्योग और शिक्षण संस्थाएँ बहुत अच्छी थीं। महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार ने भारत में शामिल होने में देर नहीं की और 1947 ईस्वी में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। मैसूर के लोगों ने भी जिम्मेदार सरकार की माँग पहले ही शुरू कर दी थी और 1947 ईस्वी में वहाँ लोकप्रिय मंत्रिमंडल बन गया था। इसलिए मैसूर को किसी संघ में मिलाने की जगह अलग राज्य के रूप में ही रखा गया और महाराजा को राजप्रमुख बनाया गया। 1956 ईस्वी में राज्यों के पुनर्गठन में कन्नड़ भाषी क्षेत्र इसमें जुड़े और वही मैसूर बाद में 1973 ईस्वी में कर्नाटक कहलाया।
पूर्ण एकीकरण, संविधान और राज्यों की श्रेणियाँ
शुरू में विलय केवल रक्षा, संचार और विदेशी मामलों तक सीमित था। कुछ समय बाद यह अनुभव किया गया कि इससे काम नहीं चलेगा। रियासतें और प्रांत एक ही देश के हिस्से थे, पर उनके कानून, कर और न्याय-व्यवस्था अलग-अलग थे। इससे व्यापार, यातायात और प्रशासन में बहुत कठिनाइयाँ आ रही थीं। इसलिए 1949 ईस्वी में एक नई व्यवस्था बनाई गई। पाँचों राज्य-संघों और मैसूर ने भारतीय संविधान और न्याय क्षेत्र को स्वीकार कर लिया, जिसमें उच्चतम न्यायालय का अधिकार भी शामिल था। उन्होंने तीन बातें मानीं। पहली बात यह थी कि शिक्षा, विवाह और वन जैसे समवर्ती सूची के विषयों पर, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, उन्होंने केंद्र के कानूनों को मान लिया। केवल ‘कर’ का विषय इससे अलग रखा गया। दूसरी बात यह थी कि अनुच्छेद 238 के अंतर्गत आने वाले विषय भी केंद्र के अधीन हुए, जो उस समय भाग-ख राज्यों पर केंद्र की विशेष शक्ति से जुड़ा था। तीसरी बात यह थी कि राज्य सरकारें कुछ मामलों में केंद्र के निर्देशों का पालन करेंगी। यह सब दस वर्षों की अवधि के लिए मान्य किया गया, यानी दस साल तक इसकी समीक्षा होनी थी। इस तरह अंत में सभी रियासतें पूर्ण रूप से भारत में मिला ली गईं और देश की एकीकृत राजनीतिक व्यवस्था का अंग बन गईं।
भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 ईस्वी को संविधान पारित किया और 26 जनवरी 1950 ईस्वी को यह लागू हो गया। इसमें भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया और संघात्मक शासन की व्यवस्था की गई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने और पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। संविधान लागू होने पर भारत के राज्य तीन श्रेणियों में बाँटे गए। भाग-क (पार्ट ए) में ब्रिटिश भारत के पुराने प्रांत आए, जैसे बंबई, मद्रास और उत्तर प्रदेश। भाग-ख (पार्ट बी) में पुरानी बड़ी रियासतें और रियासती संघ आए, जैसे हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मैसूर, मध्य भारत, पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावणकोर-कोचीन, जिनका शासन राजप्रमुख के अधीन रहता था। भाग-ग (पार्ट सी) में केंद्र-शासित इकाइयाँ आईं, जैसे हिमाचल प्रदेश, विंध्य प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, कच्छ, भोपाल और अजमेर।
राजाओं को दी गई रियायतें और प्रिवी पर्स की व्यवस्था
रियासतों के शासक सदियों से अपनी प्रजा पर राज करते आए थे। उनके पास महल, खजाने, सेना और सम्मान के अपने प्रतीक थे। उनसे अचानक यह कहना कि वे अपनी सत्ता छोड़ दें, आसान नहीं था। पटेल और मेनन यह जानते थे कि केवल दबाव से यह काम नहीं होगा और इससे रियासतों में विद्रोह भी भड़क सकता था। इसलिए उन्होंने एक संतुलित रास्ता चुना। राजाओं से राजनीतिक सत्ता ली गई, किंतु बदले में उनको आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सम्मान का भरोसा दिया गया। पटेल इसे एक सौदे की तरह नहीं, बल्कि देश की एकता की कीमत के रूप में देखते थे। उनका कहना था कि यह राशि उस अराजकता की तुलना में बहुत छोटी है जो रियासतों के बिखर जाने से देश को झेलनी पड़ती।
सबसे बड़ी रियायत प्रिवी पर्स थी। यह एक निश्चित वार्षिक राशि थी, जो विलय के बदले रियासत के शासक और उसके परिवार को दी जाती थी। यह राशि राजा को उसकी निजी जरूरतों, महल की देखभाल और परिवार के खर्च के लिए मिलती थी और उसके निधन के बाद उसके उत्तराधिकारी को मिलती रहती थी। इसका सीधा उद्देश्य राजाओं को सम्मानजनक जीवन देना था, ताकि सत्ता छोड़ने के बाद उसे आर्थिक कठिनाई न झेलनी पड़े। राशि हर रियासत के लिए अलग थी और रियासत की आमदनी, उसके आकार और उसके पिछले महत्त्व को देखकर तय की गई। सामान्य नियम यह बना कि रियासत की आमदनी का एक निश्चित प्रतिशत राजा को मिलेगा और जैसे-जैसे आमदनी बढ़ेगी, यह प्रतिशत घटता जाएगा। इस कारण सबसे बड़ी रियासतों के शासकों को भी उनकी कुल आमदनी का एक छोटा हिस्सा ही मिला।
यह राशि कुछ हजार रुपये से लेकर कई लाख रुपये तक थी। हैदराबाद के निजाम को सबसे बड़ी राशि, लगभग 42 लाख रुपये वार्षिक, दी गई। मैसूर, बड़ौदा, जयपुर और त्रावणकोर-कोचीन जैसी बड़ी रियासतों के राजाओं को भी कई लाख रुपये मिले। दूसरी ओर बहुत छोटी रियासतों के शासकों को केवल कुछ हजार रुपये मिले, और कुछ को तो इससे भी कम। सभी रियासतों के प्रिवी पर्स की कुल राशि लगभग साढ़े पाँच से छह करोड़ रुपये वार्षिक बैठती थी। यह व्यवस्था केवल एक सरकारी वादा बनकर नहीं रही। जब 1950 ईस्वी में संविधान लागू हुआ तो इस राशि को उसमें कानूनी गारंटी दी गई। संविधान के अनुच्छेद 291 में प्रिवी पर्स का प्रावधान किया गया और यह भी तय हुआ कि उस पर आयकर नहीं लगेगा।
दूसरी बड़ी रियायत निजी संपत्ति के रूप में मिली। विलय-पत्र और उसके बाद हुए समझौतों में यह साफ किया गया कि राजा की निजी संपत्ति उसी की रहेगी। इसमें उसके महल, गहने, हीरे-जवाहरात, निजी जमीनें, बाग-बगीचे और अन्य निजी जायदाद शामिल थी। इसके लिए संपत्ति को दो हिस्सों में बाँटा गया। एक हिस्सा राज्य की संपत्ति था, जैसे किले, सरकारी इमारतें और राजकोष, जो सरकार के अधीन चली गई। दूसरा हिस्सा राजा की निजी संपत्ति था, जिस पर उसका अधिकार बना रहा। इस बँटवारे की सूचियाँ विलय के समय बनाई गईं। इसी कारण आज भी देश के कई पुराने महल राजपरिवारों के पास हैं और कई महलों को होटलों और संग्रहालयों में बदल दिया गया है।
तीसरी रियायत विशेषाधिकारों और राजकीय सम्मान की थी। राजाओं को अपने पुराने राजकीय सम्मान के चिह्न रखने की अनुमति मिली। इनमें उसकी उपाधियाँ, राजचिह्न और झंडे, कुछ अवसरों पर सम्मान-सूचक व्यवहार और अपने राज्य में सरकारी समारोहों में विशेष स्थान शामिल थे। अंग्रेजों के समय कुछ बड़े राजाओं को तोपों की सलामी का सम्मान मिलता था और यह परंपरा कुछ समय तक जारी रही। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि राजा की गद्दी के उत्तराधिकार को सरकार की ओर से मान्यता दी गई। जब राजा का निधन होता तो उसके उत्तराधिकारी को भी राजा के रूप में मान्यता, प्रिवी पर्स और अन्य सम्मान मिलते थे। इससे पुराने राजवंशों को यह भरोसा हुआ कि उनकी परंपरा और प्रतिष्ठा बनी रहेगी।
चौथी रियायत यह थी कि अनेक राजाओं को शासन में सम्मानजनक पद दिए गए। राज्य-संघों के गठन के समय एक बड़ी रियासत के शासक को उस संघ का राजप्रमुख बनाया जाता था, जो राज्यपाल जैसा संवैधानिक प्रमुख होता था। हैदराबाद के निजाम को हैदराबाद राज्य का राजप्रमुख बनाया गया। मैसूर के महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार मैसूर के राजप्रमुख बने और बाद में मद्रास (तमिलनाडु) के राज्यपाल भी रहे। पटियाला के महाराजा यादवेंद्र सिंह पेप्सू के राजप्रमुख बने और बाद में इटली में भारत के राजदूत भी नियुक्त हुए। जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय राजस्थान के राजप्रमुख बने और आगे चलकर स्पेन में भारत के राजदूत रहे। काठियावाड़ में नवानगर के जाम साहब सौराष्ट्र के राजप्रमुख बने और ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया मध्य भारत के राजप्रमुख बने। इस तरह पुराने शासकों को नई व्यवस्था में भी सम्मान का स्थान मिला और वे नए लोकतांत्रिक ढाँचे से जुड़े रहे।
इन रियायतों को लेकर शुरू से ही मतभेद रहे। कुछ लोगों का कहना था कि एक ओर देश गरीबी से जूझ रहा है और दूसरी ओर पुराने राजाओं को हर साल भारी रकम दी जा रही है, जो लोकतंत्र और समानता की भावना के विरुद्ध है। खुद संविधान सभा में भी इस पर चर्चा हुई थी। पटेल का उत्तर यह था कि यह रकम एक प्रकार से देश की एकता का मूल्य है और इसके बिना रियासतों का शांतिपूर्ण विलय संभव नहीं था। समय बीतने के साथ, जब भारत में समानता और समाजवाद की बातें अधिक जोर पकड़ने लगीं, तो यह आलोचना और तेज हो गई कि राजाओं को विशेष दर्जा और धन नहीं मिलना चाहिए।
गृह मंत्री के रूप में अन्य योगदान
रियासतों के एकीकरण के अलावा पटेल ने गृह मंत्री के रूप में कई और महत्त्वपूर्ण काम किए। वे पहले गृह मंत्री थे जिन्होंने अंग्रेजों की भारतीय नागरिक सेवा (आई.सी.एस.) को भारतीय रूप दिया और उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) के रूप में ढाला। उन्होंने पुराने अधिकारियों में यह विश्वास जगाया कि वे अब अंग्रेजों की नहीं, देश की सेवा कर रहे हैं। इस प्रकार उन्होंने राजभक्ति को देशभक्ति की ओर मोड़ा। इसी कारण उन्हें ‘भारतीय सिविल सेवाओं का संरक्षक संत’ भी कहा जाता है।
विदेश विभाग नेहरू के पास था, पर उप-प्रधानमंत्री होने के नाते पटेल कई बार विदेश संबंधी बैठकों में शामिल होते थे। 1950 ईस्वी में उन्होंने नेहरू को एक पत्र लिखकर चीन और तिब्बत के प्रति उसकी नीति के बारे में सावधान किया। उन्होंने चीन के व्यवहार को कपटपूर्ण बताया और चेताया कि तिब्बत पर चीन का कब्जा भारत के लिए नई समस्याएँ खड़ी करेगा। नेपाल के बारे में भी उनके विचार नेहरू से अलग थे। कहा जाता है कि 1950 ईस्वी में गोवा को लेकर हुई एक कैबिनेट बैठक में पटेल ने कहा था कि क्या हम गोवा चलें, केवल दो घंटे की बात है। यदि यह बात मान ली जाती तो गोवा की स्वतंत्रता के लिए 1961 ईस्वी तक इंतजार न करना पड़ता।
गुजरात के सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी ने ग्यारहवीं सदी में लूटा था। स्वतंत्रता के बाद पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। नवंबर 1947 ईस्वी में वे सोमनाथ गए और वहाँ पुनर्निर्माण की घोषणा की। मंदिर का निर्माण उनके प्रयासों से हुआ, किंतु यह कार्य उनके जीवनकाल के बाद 1951 ईस्वी में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों पूरा हुआ।
सरदार पटेल का व्यक्तित्व और साहित्य
सरदार पटेल कम बोलने वाले, अनुशासनप्रिय और कर्मठ व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व की तुलना बिस्मार्क की संगठन कुशलता, कौटिल्य की राजनीतिक समझ और अब्राहम लिंकन की राष्ट्रीय एकता के प्रति निष्ठा से की जाती है। वे जाति और वर्ग के भेदभाव के कट्टर विरोधी थे और निर्भीक थे। तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और संगठन शक्ति उनके चरित्र के विशेष गुण थे। उनके लिए कर्म ही जीवन का साधन था। पटेल पाकिस्तान की चालबाजियों से भी सावधान थे और देश को बाँटने वाली शक्तियों से भी। इसी कारण अनेक विद्वान उन्हें भारत का बिस्मार्क कहते हैं। कहा जाता है कि लंदन टाइम्स ने लिखा था कि पटेल की सफलताओं के आगे बिस्मार्क की सफलताएँ छोटी दिखाई देती हैं। पटेल की एक बड़ी उपलब्धि यह भी थी कि उन्होंने इतने बड़े परिवर्तन को बिना बड़े रक्तपात के पूरा किया, इसलिए इसे भारत की ‘रक्तहीन क्रांति’ भी कहा जाता है।
निरंतर संघर्षपूर्ण जीवन के कारण पटेल को अलग से पुस्तकें लिखने का समय नहीं मिला। फिर भी उनके पत्रों, टिप्पणियों और भाषणों के रूप में बहुत बड़ा साहित्य मौजूद है। इसमें भारत विभाजन, गांधी, नेहरू और सुभाष, आर्थिक और विदेश नीति, मुसलमान और शरणार्थी, कश्मीर और हैदराबाद जैसे विषय आते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण उनके पत्र हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। 1945 से 1950 ईस्वी के बीच के इन पत्रों का संकलन दुर्गादास के संपादन में अंग्रेजी में नवजीवन प्रकाशन मंदिर से 10 खंडों में प्रकाशित हुआ। इनमें से चुने हुए पत्रों का वी. शंकर के संपादन में दो खंडों में भी प्रकाशन हुआ, जिनका हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। इन संग्रहों में पटेल के पत्रों के साथ उन्हें लिखे गए दूसरे लोगों के महत्त्वपूर्ण पत्र भी शामिल हैं।
निधन
देश की एकता के लिए अथक परिश्रम करते हुए पटेल ने अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। उनका शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता गया और 15 दिसंबर 1950 ईस्वी को हृदयाघात से उनका निधन हो गया।
एकीकरण के बाद की घटनाएँ
पटेल के निधन के बाद भी एकीकरण की प्रक्रिया पूरी होती रही। भाषा के आधार पर राज्यों की माँग बढ़ने लगी और तीन श्रेणियों की व्यवस्था स्थायी नहीं रह सकी। इसलिए 1953 ईस्वी में फजल अली आयोग बना और उसकी सिफारिशों पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित हुआ। इसके अनुसार 1 नवंबर 1956 ईस्वी से पुरानी तीन श्रेणियाँ समाप्त कर दी गईं और देश को 14 राज्यों और 6 केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया। राजप्रमुख का पद भी समाप्त हो गया और उसकी जगह राज्यपाल की व्यवस्था लागू हुई। इस तरह रियासतों का अंतिम रूप से भारत की एकीकृत राजनीतिक व्यवस्था में विलय पूरा हुआ।
इसी बीच देश की विदेशी बस्तियों का भी विलय हुआ। नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण फ्रांस ने 1951 ईस्वी में चंद्रनगर शांतिपूर्ण तरीके से भारत को सौंप दिया। 1954-56 ईस्वी के बीच उसने पांडिचेरी, कारीकल, माहे और यानम को भी भारत को सौंप दिया। पुर्तगाल ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बस्तियाँ (गोवा, दमन और दीव) छोड़ने से इनकार कर दिया। तब 1961 ईस्वी में भारत ने सैन्य कार्रवाई करके इन पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार भारत का एकीकरण पूर्ण हुआ।
राजाओं की विशेष स्थिति का अंतिम अध्याय 1971 ईस्वी में लिखा गया। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1969-70 ईस्वी में प्रिवी पर्स और राजाओं के विशेषाधिकार समाप्त करने की कोशिश शुरू की। 1970 ईस्वी में इसके लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाया गया। लोकसभा में यह विधेयक पारित हो गया, पर राज्यसभा में एक वोट की कमी से गिर गया। इसके बाद सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश से राजाओं की मान्यता समाप्त कर दी, लेकिन 1970 ईस्वी में सर्वोच्च न्यायालय ने माधवराव सिंधिया बनाम भारत संघ मामले में इस आदेश को असंवैधानिक ठहरा दिया। इसके बाद 1971 ईस्वी के आम चुनाव हुए, जिनमें इंदिरा गांधी की सरकार को बड़ा बहुमत मिला। नई सरकार ने संविधान में 26वाँ संशोधन किया, जो दिसंबर 1971 ईस्वी में लागू हुआ। इस संशोधन से अनुच्छेद 291 और 362 हटा दिए गए और नया अनुच्छेद 363-क जोड़ा गया। इसके द्वारा भारत सरकार ने पुराने शासकों की राजकीय मान्यता समाप्त कर दी और प्रिवी पर्स तथा उनके विशेषाधिकार भी समाप्त हो गए। अब पुराने राजा और उनके परिवार कानून के सामने आम नागरिकों की तरह हो गए।
इसे समानता के सिद्धांत के अनुसार एक ऐतिहासिक कदम माना गया, क्योंकि इससे जन्म के आधार पर मिलने वाले विशेष दर्जे का अंत हुआ। दूसरी ओर कुछ लोगों ने इस पर यह आपत्ति भी की कि यह उस वादे को तोड़ना था जो विलय के समय किया गया था। फिर भी इस निर्णय के बाद भारत में राजशाही का अंतिम कानूनी अवशेष भी समाप्त हो गया। बहुत से पुराने राजपरिवारों ने बाद में अपने महलों को होटल और संग्रहालय बनाकर, या राजनीति और व्यापार में आकर अपनी नई भूमिका बनाई।
सम्मान और स्मृतियाँ
सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन 1950 ईस्वी में हुआ, पर देश ने उन्हें कभी भुलाया नहीं। उनके योगदान को सम्मान देने के लिए समय-समय पर अनेक कदम उठाए गए। कुछ सम्मान उन्हें मरणोपरांत मिले और कुछ स्मारक और संस्थान उनकी याद में बनाए गए।
भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न है, जो 1954 ईस्वी में शुरू हुआ था। पटेल के निधन के लगभग चालीस वर्ष बाद, 1991 ईस्वी में उन्हें यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया। इसे देश के एकीकरण में उनके अद्वितीय योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति माना जाता है। इसी वर्ष राजीव गांधी को भी मरणोपरांत भारत रत्न मिला था। इससे पहले 31 अक्टूबर 1965 ईस्वी को भारत सरकार के डाक विभाग ने उनकी स्मृति में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था। यह तारीख उनकी जन्मतिथि से जुड़ी थी और सरकार ने इस प्रकार पहली बार उनकी जयंती पर उनके सम्मान में राष्ट्रीय स्तर का प्रतीक जारी किया।
उनकी जयंती 31 अक्टूबर को हर वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी घोषणा भारत सरकार ने 2014 ईस्वी में की और पहला राष्ट्रीय एकता दिवस उसी वर्ष 31 अक्टूबर को मनाया गया। इस दिन देश भर में एकता की शपथ दिलाई जाती है और ‘रन फॉर यूनिटी’ नाम की दौड़ का आयोजन होता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को देश की एकता और अखंडता बनाए रखने की प्रेरणा देना है। पटेल ने रियासतों को जोड़कर जो एकता बनाई थी, यह दिन उसी की याद दिलाता है।
सरदार पटेल की स्मृति में बना सबसे बड़ा स्मारक स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है। यह गुजरात के नर्मदा जिले में केवडिया के पास नर्मदा नदी के किनारे बना है। यह जगह सरदार सरोवर बाँध के निकट है और स्मारक साधु बेट नामक टापू पर बनाया गया। इसकी आधारशिला 31 अक्टूबर 2013 ईस्वी को रखी गई थी, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। प्रतिमा का निर्माण देश भर के किसानों से खेती के पुराने औजार और लोहा इकट्ठा करने के अभियान से जुड़ा था, क्योंकि पटेल स्वयं किसान परिवार से थे। प्रतिमा के प्रसिद्ध मूर्तिकार राम वी. सुतार हैं और निर्माण का कार्य लार्सन एंड टुब्रो कंपनी ने किया। इसकी लागत लगभग 3,000 करोड़ रुपये आँकी गई। प्रतिमा का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2018 ईस्वी को, पटेल की 143वीं जयंती पर किया।
प्रतिमा की ऊँचाई 182 मीटर है और आधार व चबूतरे सहित यह लगभग 240 मीटर ऊँची मानी जाती है। यह विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है। इसके बाद चीन के हेनान प्रांत की स्प्रिंग टेम्पल बुद्ध प्रतिमा आती है। बुद्ध की मूर्ति लगभग 128 मीटर की है और चबूतरे सहित उसकी ऊँचाई लगभग 208 मीटर बताई जाती है। इस तरह स्टैच्यू ऑफ यूनिटी अपनी मूल ऊँचाई में भी उससे बहुत आगे है। इसके भीतर से दर्शकों को लगभग 150 मीटर की ऊँचाई पर बनी दीर्घा तक ले जाया जाता है, जहाँ से नर्मदा और सतपुड़ा की पहाड़ियों का दृश्य दिखता है। यह स्थान अब देश-विदेश के पर्यटकों का बड़ा आकर्षण बन चुका है।
पटेल की स्मृति देश के अनेक संस्थानों में भी जीवित है। अहमदाबाद का हवाई अड्डा सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कहलाता है, और अहमदाबाद वही शहर है जहाँ पटेल ने वकालत की और नगरपालिका में सेवा की। गुजरात के आणंद जिले में वल्लभ विद्यानगर नाम की जगह पर सरदार पटेल विश्वविद्यालय स्थापित है, जिसकी स्थापना 1955 ईस्वी में हुई थी। हैदराबाद में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाली अकादमी उनके नाम पर सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी है, जो उनकी उस भूमिका की याद दिलाती है जो उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं की नींव रखने में निभाई थी। सूरत का सरदार वल्लभभाई राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान भी उनके नाम पर है। इनके अलावा कई कॉलेज, स्कूल, अस्पताल, बाँध और सड़कों के नाम भी उनके नाम पर रखे गए हैं।
सरदार पटेल को ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है। यह उपाधि उनके दृढ़ निश्चय, अटल इरादों और कठिन परिस्थितियों में भी न झुकने वाले स्वभाव के कारण उन्हें मिली। कहा जाता है कि यह उपाधि महात्मा गांधी ने उन्हें दी थी। रियासतों के एकीकरण में उन्होंने जिस दृढ़ता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया, उसके बाद यह नाम पूरे देश में उनकी पहचान बन गया। लोग उन्हें भारत का बिस्मार्क भी कहते हैं, क्योंकि जिस प्रकार बिस्मार्क ने जर्मनी के बिखरे राज्यों को जोड़ा, उसी प्रकार पटेल ने भारत को जोड़ा। भारत रत्न, डाक टिकट, राष्ट्रीय एकता दिवस, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी और उनके नाम पर बने संस्थान, ये सब मिलकर उस विरासत को दर्शाते हैं जो देश के हर कोने में मौजूद है।
किसी भी देश का आधार उसकी एकता और अखंडता होती है। सरदार पटेल ने 562 से अधिक छोटी-बड़ी रियासतों को भारतीय संघ में जोड़कर इसी एकता की नींव रखी। उनके पास न कोई बड़ी सेना थी और न बहुत समय, फिर भी उन्होंने समझाने, आश्वासन देने और जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने की नीति से इस असंभव लगने वाले काम को पूरा किया।
रियासतों का विलय एक ही दिन में या एक ही तरीके से पूरा नहीं हुआ। कुछ रियासतें पड़ोसी प्रांतों में सीधे मिला दी गईं, कुछ को केंद्र के सीधे नियंत्रण में रखा गया, कुछ को मिलाकर संघ बनाए गए और मैसूर जैसी बड़ी और विकसित रियासत को अलग इकाई रखा गया। इन चारों पद्धतियों के पीछे पटेल और मेनन की एक ही सोच थी कि हर रियासत की परिस्थिति के अनुसार ऐसा रास्ता चुना जाए जिससे देश में एकता भी बनी रहे और रक्तपात भी न हो। प्रिवी पर्स, निजी संपत्ति, राजकीय सम्मान और राजप्रमुख जैसे पदों ने राजाओं को यह भरोसा दिया कि वे अपने पद और प्रतिष्ठा को खोए बिना नए भारत का हिस्सा बन सकते हैं। इसी कारण इतने बड़े परिवर्तन के बावजूद बड़े रक्तपात के बिना 500 से अधिक रियासतें दो-तीन वर्षों में भारत का अभिन्न हिस्सा बन गईं। लगभग दो दशक बाद, जब लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो गईं, तब 1971 ईस्वी में विशेष दर्जे की यह व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई। इस पूरे घटनाक्रम से पता चलता है कि एकीकरण का काम पहले समझौते और सम्मान से, और बाद में संवैधानिक बदलाव से पूरा हुआ। आज का एकीकृत भारत पटेल की इसी दूरदर्शिता की देन है और राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण सदैव याद किया जाएगा।


