गौतमीपुत्र शातकर्णि : जीवन, शासन, विजय, प्रशासन और उपलब्धियाँ
परिचय : सातवाहन साम्राज्य का पुनरुत्थानकर्ता
गौतमीपुत्र शातकर्णि (गोतमिपुत सिरि सातकणि) सातवाहन वंश का सबसे शक्तिशाली और ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण शासक था, जिसे पुराणों में ‘आंध्र’ या ‘आंध्रभृत्य’ वंश का कहा गया है। उसकी माता गौतमी बालश्री थीं, जिनके नाम पर वह ‘गौतमीपुत्र’ कहलाया। पुराणों की कुछ सूचियों में उसके पिता का नाम शिवस्वाति मिलता है, किंतु अभिलेखों से इसकी पुष्टि सीमित है। उसके शासन की सबसे प्रचलित तिथि लगभग 106 से 130 ईस्वी मानी जाती है, यानी लगभग 24 वर्ष, क्योंकि अभिलेखों में उसके 24वें वर्ष तक की तिथियाँ मिलती हैं, यद्यपि इतिहासकारों में काल-निर्धारण पर मतभेद है। उसे सातवाहन साम्राज्य का पुनरुत्थानकर्ता कहा जाता है, क्योंकि उसके उदय से पहले पश्चिमी दक्कन में सातवाहनों की शक्ति कमज़ोर पड़ चुकी थी और नासिक तथा जुन्नर जैसे उनके पुराने केंद्र हाथ से निकल गए थे। उसके शासन में सातवाहनों ने पश्चिमी दक्कन, महाराष्ट्र, विदर्भ और मध्य भारत के कुछ भागों में फिर प्रभाव जमाया। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि पश्चिमी क्षत्रपों की क्षहरात शाखा के शासक नहपान की पराजय, क्षहरात सत्ता का अंत और पश्चिमी दक्कन पर पुनः अधिकार थी। इसकी जानकारी का मुख्य स्रोत नासिक की गुफा संख्या 3 में उत्कीर्ण नासिक प्रशस्ति है, जिसे उसकी माता ने उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी के शासनकाल (19वें वर्ष) में खुदवाया था। इसमें उसे शकों, यवनों और पहलवों का दमनकर्ता, क्षहरात वंश का उन्मूलनकर्ता और सातवाहन कुल की प्रतिष्ठा फिर से स्थापित करने वाला बताया गया है तथा उसकी तुलना राम, केशव (कृष्ण), अर्जुन, भीमसेन, नाभाग, नहुष, जनमेजय, सगर, ययाति और अंबरीष जैसे पौराणिक नायकों से की गई है। नहपान की पराजय के दो प्रमाण हैं : जोगलथंबी (नासिक) के भंडार में नहपान के चाँदी के सिक्कों पर गौतमीपुत्र का पुनर्मुद्रण और उसके शासन के 18वें वर्ष का नासिक अभिलेख, जिसमें नहपान के दामाद उषवदात की पुरानी भूमि बौद्ध भिक्षुओं को दिए जाने का उल्लेख है। इससे माना जाता है कि यह संघर्ष लगभग 17वें-18वें वर्ष तक निर्णायक हो चुका था। अन्य स्रोतों में कार्ले का अभिलेख भी शामिल है। प्रशस्ति में असिक, अश्मक (गोदावरी क्षेत्र), मूलक (प्रतिष्ठान या पैठण के आसपास), विदर्भ, अपरांत, अनूप, सुराष्ट्र, कुकुर, आकर और अवंति जैसे प्रदेशों का उल्लेख है, जो उसके प्रभाव-क्षेत्र का संकेत देते हैं और मोटे तौर पर उत्तर में मालवा व काठियावाड़ से दक्षिण में कृष्णा नदी तक तथा पूर्व में बरार से पश्चिम में कोंकण तक फैले थे, यानी उत्तरी कोंकण और नर्मदा घाटी भी इसमें आती थीं। उसकी उपाधियों में ‘त्रिसमुद्रतोयपीतवाहन’ (जिसके घोड़ों ने तीन समुद्रों का जल पिया) और ‘बेनाकटकस्वामी’ प्रमुख हैं, जिनमें उसकी शक्ति का काव्यात्मक संकेत है, साम्राज्य की सीमाओं का शाब्दिक वर्णन नहीं। उसकी धार्मिक नीति में ब्राह्मणीय राजकीय आदर्शों के साथ बौद्ध संस्थाओं को संरक्षण भी शामिल था। उसकी विजयें अधिक समय तक नहीं टिक सकीं, क्योंकि उसके बाद शक मूल की कार्दमक शाखा के चष्टन और रुद्रदामन का उदय हुआ। टॉलेमी के भूगोल और रुद्रदामन के लगभग 150 ईस्वी के जूनागढ़ अभिलेख से संकेत मिलता है कि इनमें से अनेक क्षेत्र फिर पश्चिमी क्षत्रपों के अधीन चले गए।
सातवाहन वंश का उदय और आरंभिक इतिहास
सातवाहन दक्कन के सबसे महत्त्वपूर्ण प्राचीन राजवंशों में से एक थे। मौर्य साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद दक्कन में उनका उदय हुआ। पुराणों में इन्हें ‘आंध्र’ या ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है। पुराणों के अनुसार इस वंश का संस्थापक सिमुक था, जिसने कण्व और शुंग सत्ता के कमजोर होने के बाद अपनी शक्ति का विस्तार किया। सातवाहन सत्ता की अवधि मोटे तौर पर ईसा पूर्व पहली सदी से ईस्वी की तीसरी सदी तक मानी जाती है, यद्यपि इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। इस वंश का मूल निवास पश्चिमी दक्कन अर्थात महाराष्ट्र में था या आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र में, इस पर विद्वान एकमत नहीं हैं। पुराणों में ‘आंध्र’ नाम मिलने के कारण इन्हें आंध्र क्षेत्र से जोड़ा जाता है, किंतु इनके आरंभिक अभिलेख और सिक्के पश्चिमी दक्कन में अधिक संख्या में मिले हैं। हाल के वर्षों में तेलंगाना के कोटिलिंगाला जैसे स्थलों से सातवाहनों से पहले के स्थानीय शासकों और आरंभिक सातवाहन सिक्कों के संबंध में जो जानकारी मिली है, उससे आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र के साथ उनके संबंध का भी संकेत मिलता है।
सातवाहनों के आरंभिक केंद्र पश्चिमी दक्कन में थे। नानेघाट के अभिलेख और नासिक-जुन्नर क्षेत्र से उनका पुराना संबंध था। उनकी एक प्रमुख राजधानी प्रतिष्ठान अर्थात पैठण वर्तमान छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र में थी। आगे चलकर सातवाहन सत्ता का प्रभाव पूर्वी दक्कन अर्थात आंध्र क्षेत्र तक भी फैल गया, जहाँ अमरावती, जिसे धान्यकटक भी कहा जाता है, बौद्ध कला का एक बड़ा केंद्र बना। सातवाहन अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं। कर्नाटक के सन्नति अर्थात कनगनहल्ली स्तूप से मिली मूर्तियों में एक सातवाहन राजा को ‘रञो सातकणि’ लिखे हुए चित्र के साथ दिखाया गया है। यह सातवाहन राजसत्ता के दक्षिण तक फैलाव का एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
इस वंश के राजा ‘सातकर्णि’ या ‘शातकर्णि’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं। आरंभिक सातवाहन शासकों में सातकर्णि प्रथम का नाम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। उसने अश्वमेध जैसे वैदिक यज्ञ किए और अपनी शक्ति का विस्तार पश्चिम तथा मालवा की ओर किया। नानेघाट की गुफा में उसकी रानी नायनिका या नागनिका का अभिलेख मिला है। वह महारठी त्रणकयिर की पुत्री थी और उसने अपने पति की मृत्यु के बाद अनेक यज्ञों का विवरण अभिलेख में करवाया, जिनमें दो अश्वमेध और राजसूय यज्ञ भी शामिल थे। इस अभिलेख से उस समय के राजकीय यज्ञों, भारी दक्षिणाओं और दान की परंपरा के बारे में जानकारी मिलती है। सातवाहन काल की एक और बड़ी पहचान प्राकृत साहित्य का संरक्षण है। प्राकृत का प्रसिद्ध काव्य-संग्रह ‘गाहा सत्तसई’ (गाथा सप्तशती) का संकलन परंपरानुसार सातवाहन राजा हाल से संबंधित माना जाता है।
पहली शताब्दी ईस्वी में क्षहरातों का उदय
सातकर्णि प्रथम के बाद सातवाहन शक्ति कमजोर हो गई। पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास उन्हें पश्चिम से गंभीर चुनौती मिली। उत्तर-पश्चिम से आए शक शासकों की कुछ शाखाएँ पश्चिमी भारत में बस चुकी थीं और उन्हें इतिहास में पश्चिमी क्षत्रप कहा जाता है। इनमें सबसे पहले शक्तिशाली होने वाली शाखा क्षहरात थी। इस शाखा का आरंभिक शासक भूमक था, जिसके सिक्के गुजरात और मालवा की ओर मिले हैं। उसके उत्तराधिकारी नहपान के समय यह शक्ति अपने चरम पर पहुँच गई। नहपान के विस्तार के कारण सातवाहनों को पश्चिमी दक्कन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे नासिक और पुणे के आसपास के इलाकों से हाथ धोना पड़ा। इसी राजनीतिक संकट के बाद गौतमीपुत्र शातकर्णि का उदय हुआ।
यूनानी ग्रंथ ‘पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी’ भी इस संकट की ओर संकेत करता है। उसके अनुसार कल्याण अर्थात कल्लिएना जैसे बंदरगाह पर पहले सारगनीस नामक शासक का अधिकार था, किंतु बाद में सांदनीस नामक शासक के समय वहाँ यूनानी जहाजों के आने पर रोक लगा दी गई और बंदरगाह पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। विद्वान इन नामों को सातवाहन राजाओं से जोड़ते हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर नियंत्रण के लिए इस क्षेत्र में लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा।
पश्चिमी क्षत्रप और नहपान की चुनौती
नहपान क्षहरात (प्राकृत में खखरात) वंश का शासक था। उसके अभिलेख और सिक्के गुजरात, महाराष्ट्र के उत्तरी भाग, कोंकण तथा मालवा-राजस्थान की ओर तक उसके प्रभाव के सूचक हैं। अभिलेखों में उसे ‘क्षत्रप’ और ‘महाक्षत्रप’ कहा गया है, जबकि उसके सिक्कों पर ‘राजा’ की उपाधि मिलती है। उसके प्रशासनिक केंद्र गुजरात के भड़ौच, जिसे भरुकच्छ या प्राचीन बैरीगाज़ा भी कहा जाता है, तथा आसपास के क्षेत्रों में माने जाते हैं।
नहपान के दामाद उषवदात अर्थात ऋषभदत्त के अभिलेख नासिक और कार्ले में मिले हैं। उषवदात शक परिवार से था, किंतु उसका नाम और धार्मिक आचरण काफी हद तक भारतीय परंपराओं से जुड़ चुके थे। उसने ब्राह्मणों, मंदिरों और बौद्ध भिक्षुओं, सभी को बड़े-बड़े दान दिए। अभिलेख के अनुसार उसने तीन लाख गायों का दान किया, कई गाँव देवताओं और ब्राह्मणों को दिए, प्रभास तीर्थ में ब्राह्मणों के विवाह का खर्च उठाया और इबा, पारदा, दमन, तापी, करबेना तथा दाहनुका जैसी नदियों पर नावों के घाट और यात्रियों के लिए विश्रामगृह बनवाए। नासिक की गुफा संख्या 10, जिसे उषवदात या नहपान विहार कहा जाता है, उसी की बनवाई हुई मानी जाती है। उषवदात की पत्नी दक्षमित्रा नहपान की पुत्री थी। उषवदात ने अपने अभिलेखों में मालवों अर्थात उत्तमभद्रों के विरुद्ध नहपान के लिए अभियान करने और पुष्कर में स्नान तथा दान करने का भी उल्लेख किया है।
जुन्नर की मन्मोदी गुफाओं के अभिलेख में नहपान के अमात्य अयम (अर्यमन) द्वारा गुफा-दान का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि जुन्नर क्षेत्र भी नहपान के नियंत्रण में था। इसके अलावा उषवदात के अभिलेख बताते हैं कि उसने गोवर्धन, अर्थात नासिक क्षेत्र के बुनकरों जैसे शिल्पी संघों या निगमों के पास धन जमा कराया था। इस धन के ब्याज से भिक्षुओं के वस्त्र आदि की व्यवस्था की जाती थी। इससे उस समय के व्यापारिक और आर्थिक जीवन तथा शिल्पी संघों की बैंकिंग जैसी भूमिका का पता चलता है। पहली शताब्दी ईस्वी में लिखे गए विदेशी विवरण ‘पेरिप्लस’ में बैरीगाज़ा और उसके आसपास के क्षेत्र पर ‘नंबनस’ नामक शासक का उल्लेख है, जिसकी पहचान अनेक विद्वान नहपान से करते हैं।
यह क्षेत्र प्राचीन भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों का केंद्र था। अरब सागर के बंदरगाह, पश्चिमी घाट के दर्रे, नासिक-जुन्नर के आंतरिक बाजार और पैठण-तगर जैसे नगर आपस में जुड़े हुए थे। इसलिए नहपान और सातवाहन, दोनों के लिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। यही संघर्ष गौतमीपुत्र के शासन का सबसे बड़ा सैन्य और राजनीतिक विषय बना।
गौतमीपुत्र शातकर्णि और मातृनाम की परंपरा
‘गौतमीपुत्र’ का अर्थ है ‘गौतमी का पुत्र’। उसकी माता का नाम गौतमी बालश्री था। सातवाहन राजाओं के नामों में माता के नाम के प्रयोग की एक विशेष परंपरा थी। गौतमीपुत्र के उत्तराधिकारी का नाम वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी भी इसी परंपरा का उदाहरण है, जिसमें माता का नाम ‘वशिष्ठी’ उसकी पहचान के साथ जुड़ा हुआ है। पुराणों की कुछ सूचियों में गौतमीपुत्र से ठीक पहले शिवस्वाति का नाम आता है और कई विद्वान उसे गौतमीपुत्र का पिता मानते हैं, किंतु अभिलेखों में पिता का नाम नहीं मिलता। इसलिए इसकी अभिलेखीय पुष्टि नहीं होती है।
मातृनाम के प्रयोग का अर्थ यह नहीं है कि सातवाहन समाज मातृसत्तात्मक या मातृवंशीय था। सातवाहन राजाओं का उत्तराधिकार पुत्र को ही मिलता था, अर्थात वंश पिता की ओर से चलता था। संभवतः राजपरिवार में अलग-अलग कुलों और राजनीतिक घरानों से विवाह-संबंध होते थे। इसलिए राजकुमार की पहचान स्पष्ट करने के लिए माता का नाम भी जोड़ा जाता था। इस दृष्टि से ‘गौतमीपुत्र’ नाम केवल माता से उसके संबंध को बताता है, यह मातृवंशीय उत्तराधिकार का प्रमाण नहीं है।
गौतमीपुत्र शातकर्णि की तिथि और काल-निर्धारण
गौतमीपुत्र के शासनकाल की निश्चित तिथि निर्धारित करना कठिन है। सामान्यतः उसके शासन को लगभग 106 से 130 ईस्वी तक माना जाता है, जबकि कुछ विद्वान 103 से 127 ईस्वी का काल भी बताते हैं। कुछ पुराण-पाठों में उसकी शासन-अवधि लगभग 21 वर्ष दी गई है, जबकि अभिलेखों में उसके शासन के 24वें वर्ष तक की तिथियाँ मिलती हैं।
दूसरी ओर, कुछ विद्वान उसके शासन को लगभग 60 से 84/85 ईस्वी के आसपास भी रखते हैं। एक लोकप्रिय धारणा यह भी रही है कि गौतमीपुत्र की नहपान पर विजय के साथ ही 78 ईस्वी का शक संवत् आरंभ हुआ। इसलिए गौतमीपुत्र के शासनकाल की किसी एक तिथि को अंतिम और निश्चित सत्य के रूप में बताना उचित नहीं है।
इस विवाद के मुख्यतः तीन कारण हैं। पहला, पुराणों की सातवाहन वंशावली है, जिसमें राजाओं के नाम और शासन-अवधि को लेकर अंतर मिलता है। दूसरा, सातवाहन अभिलेख हैं, जिनमें राजाओं के शासन-वर्ष तो मिलते हैं, किंतु किसी ज्ञात संवत् के साथ उनका स्पष्ट संबंध नहीं मिलता। तीसरा, पश्चिमी क्षत्रपों का कालक्रम है, जिसमें नहपान और उसके बाद के कार्दमक शासकों की तिथियाँ आती हैं।
प्रश्न यह है कि नहपान के अभिलेखों में लिखे वर्ष 41 से 46 किस संवत् के हैं। यदि इन वर्षों को शक संवत्, जो 78 ईस्वी से आरंभ माना जाता है, के अनुसार गिना जाए, तो नहपान का काल लगभग 119 से 124 ईस्वी के बीच बैठता है। तब गौतमीपुत्र के 18वें वर्ष के आसपास, यानी 106 ईस्वी में उसके गद्दी पर बैठने की स्थिति में लगभग 124 ईस्वी, नहपान की पराजय का समय उचित बैठता है। इसके अलावा कार्दमक शासक चष्टन का अंधौ, कच्छ, अभिलेख शक वर्ष 52 अर्थात लगभग 130 ईस्वी का है, जिसमें चष्टन और उसके पौत्र रुद्रदामन के नाम मिलते हैं। यह गौतमीपुत्र के शासन के अंत के आसपास मालवा-काठियावाड़ क्षेत्र में नई शक्ति के उदय का संकेत देता है। इन दोनों बातों से 106–130 ईस्वी वाला कालक्रम काफी सुसंगत लगता है।
जो विद्वान गौतमीपुत्र को इससे पहले का मानते हैं, उनका तर्क है कि यदि ‘पेरिप्लस’ के नंबनस को नहपान माना जाए और उस ग्रंथ को पहली शताब्दी ईस्वी के मध्य का माना जाए, तो नहपान को पहले का मानना पड़ेगा और उसके अनुसार गौतमीपुत्र को भी पहले रखना होगा। किंतु शक संवत् का आरंभकर्ता कौन था, इस विषय में भी मतभेद है। परंपरा इसे शालिवाहन से जोड़ती है, कुछ लोग कुषाण शासक कनिष्क से और कुछ पश्चिमी क्षत्रपों से जोड़ते हैं। नवीन शोध में कनिष्क के राज्यारोहण को लगभग 127 ईस्वी में रखने का मत भी सामने आया है। निष्कर्षतः, गौतमीपुत्र ने ईस्वी की दूसरी शताब्दी के आरंभिक वर्षों से लेकर लगभग 130 ईस्वी तक शासन किया माना जाता है।
इस प्रकार लगभग 106 ईस्वी में गौतमीपुत्र का राज्यारोहण हुआ माना जाता है। नहपान के अभिलेखों के वर्ष, यदि शक संवत् के अनुसार माने जाएँ, तो 119 से 124 ईस्वी के बीच आते हैं। लगभग 124 ईस्वी में उसके शासन का 18वाँ वर्ष था, जब नासिक का वह भूमि-अनुदान दिया गया जिसमें नहपान के दामाद की पुरानी भूमि का उल्लेख मिलता है। लगभग 130 ईस्वी में गौतमीपुत्र का शासन समाप्त हुआ और पुलुमावी का उदय हुआ। इसी समय के आसपास कार्दमक शासक चष्टन का अंधौ अभिलेख लिखा गया। लगभग 149 ईस्वी में पुलुमावी के 19वें वर्ष में गौतमी बालश्री की नासिक प्रशस्ति खुदवाई गई और लगभग 150 ईस्वी में रुद्रदामन का जूनागढ़, अर्थात गिरनार, अभिलेख लिखा गया।
गौतमीपुत्र शातकर्णि के इतिहास के प्रमुख स्रोत
गौतमीपुत्र का इतिहास मुख्यतः चार प्रकार के स्रोतों से सहायता मिलती है- अभिलेख, सिक्के, पुराण और विदेशी विवरण। इनमें अभिलेख सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
नासिक प्रशस्ति
गौतमीपुत्र के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत नासिक प्रशस्ति है। यह नासिक की पांडवलेणी (त्रिरश्मि) गुफाओं की गुफा संख्या 3 में खुदी हुई है, जिसे ‘गौतमीपुत्र विहार’ भी कहा जाता है। इसे उसकी माता गौतमी बालश्री ने अपने पौत्र वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी के शासन के 19वें वर्ष में उत्कीर्ण कराया था। यह अभिलेख प्राकृत भाषा में है, किंतु इसकी शैली अलंकृत काव्यात्मक गद्य जैसी है और इसमें लंबे-लंबे समास वाले वाक्य मिलते हैं।
यह अभिलेख से केवल गौतमीपुत्र की उपलब्धियाँ ज्ञात नहीं होती हैं, बल्कि सातवाहन राजपरिवार की राजनीतिक विचारधारा और आदर्श राजत्व की धारणा पर भी प्रकाश पड़ता है। इसमें गौतमीपुत्र को शकों, यवनों और पहलवों का दमनकर्ता, क्षहरात वंश का उन्मूलन करने वाला तथा सातवाहन कुल की प्रतिष्ठा फिर से स्थापित करने वाला बताया गया है। यह अभिलेख राजकीय प्रशस्ति की शैली में है, जिसमें अतिशयोक्ति की संभावना है। इसी गुफा में गौतमी बालश्री ने इसका एक भाग भद्रायणीय या भद्रयानीय नामक बौद्ध संप्रदाय के भिक्षुओं को दान भी किया था।
नासिक का 18वें वर्ष का अभिलेख
गौतमीपुत्र के शासन के 18वें वर्ष का एक अभिलेख भी नासिक से मिला है। इसमें त्रिरश्मि पर्वत, जिसे तिरण्हु भी कहा गया है, के बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान देने का उल्लेख है। अभिलेखों से पता चलता है कि यह भूमि, जिसका क्षेत्रफल लगभग दो सौ निवर्तन था, पहले उषवदात अर्थात ऋषभदत्त से संबंधित थी, जो नहपान का दामाद था। इसका अर्थ है कि उसके शासन के 18वें वर्ष तक नासिक क्षेत्र में नहपान के परिवार की जगह सातवाहन सत्ता स्थापित हो चुकी थी। यह अभिलेख एक राजकीय आदेश के रूप में गोवर्धन आहार के अधिकारी को संबोधित है। संभवतः यह आदेश राजा के विजय-अभियान के दौरान उसके शिविर अर्थात स्कंधावार से जारी किया गया था।
कार्ले का अभिलेख
कार्ले की प्रसिद्ध बौद्ध गुफाओं, जिन्हें प्राचीन काल में वलूरक कहा जाता था, से भी एक अभिलेख मिला है, जिसमें करजक या करजिका नामक ग्राम के दान का उल्लेख है। यह सातवाहन शासकों द्वारा बौद्ध संस्थाओं को दिए जाने वाले राजकीय संरक्षण का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। इससे यह भी पता चलता है कि गौतमीपुत्र के समय एक ओर ब्राह्मणीय राजकीय विचारधारा मौजूद थी, तो दूसरी ओर बौद्ध संस्थाओं को भी दान और संरक्षण दिया जाता था।
नहपान और उसके परिवार के अभिलेख
नासिक, कार्ले और जुन्नर में नहपान, उषवदात, दक्षमित्रा और अमात्य अयम के अभिलेख मिलते हैं, जिनसे पता चलता है कि गौतमीपुत्र के उदय से पहले इन क्षेत्रों पर किसका नियंत्रण था।
सिक्के : जोगलथंबी का भंडार
गौतमीपुत्र और नहपान के सिक्के उनके संघर्ष के प्रत्यक्ष भौतिक प्रमाण हैं। नासिक जिले के जोगलथंबी गाँव से 1906 ईस्वी में नहपान के चाँदी के सिक्कों का एक विशाल भंडार मिला। इसमें तेरह हजार से अधिक सिक्के थे और उनमें से बहुत बड़ी संख्या पर गौतमीपुत्र ने अपना पुनर्मुद्रण कराया था।
पुराण और विदेशी विवरण
मत्स्य, वायु, ब्रह्मांड और विष्णु आदि पुराणों में सातवाहन राजाओं की सूचियाँ मिलती हैं, जिनमें गौतमीपुत्र का नाम भी है। इनमें नामों और शासन-वर्षों में अंतर मिलता है।
विदेशी लेखकों में रोमन लेखक प्लिनी ने ‘आंध्र’ लोगों की शक्तिशाली सेना का उल्लेख किया है। उसके अनुसार उनके पास तीस दीवारों वाले नगर और एक लाख पैदल सैनिक, दो हजार घुड़सवार तथा एक हजार हाथी थे। यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी ने बाद के सातवाहन राजा पुलुमावी को ‘सिरो पोलेमियोस’ नाम से और पैठण (बैठान) को उसकी राजधानी बताया है। ‘पेरिप्लस’ ग्रंथ से पश्चिमी तट के बंदरगाहों और वहाँ के शासकों के बारे में जानकारी मिलती है।
पश्चिमी क्षत्रपों के अभिलेख
पश्चिमी क्षत्रपों के अभिलेखों में रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो लगभग 150 ईस्वी का है। इससे पता चलता है कि गौतमीपुत्र द्वारा जीते गए अनेक प्रदेश बाद में कार्दमक क्षत्रपों के अधीन फिर चले गए।
गौतमी बालश्री
गौतमी बालश्री सातवाहन इतिहास की बहुत महत्त्वपूर्ण महिला थी। वह गौतमीपुत्र की माता और वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी की दादी थी। इसलिए नासिक प्रशस्ति तीन पीढ़ियों को एक साथ जोड़ती है। उसने अपने पुत्र की उपलब्धियों को अभिलेख में सुरक्षित करवाया और उसके नाम पर गुफा का दान भी किया। अभिलेख में उसे राजमाता अर्थात महाराज-माता और राजपितामही अर्थात महाराज-पितामही की गरिमा के साथ याद किया गया है। अभिलेख में उसे संयम, नियम और उपवास का पालन करने वाली धर्मनिष्ठ उपासिका के रूप में भी दिखाया गया है। इससे संकेत मिलता है कि सातवाहन राजपरिवार में राजमाता की प्रतिष्ठा बहुत ऊँची थी।
नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र
नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह युद्ध में विजयी है, प्रजा के सुख-दुख से जुड़ा हुआ है, सामाजिक मर्यादा का रक्षक है और धार्मिक संस्थाओं का संरक्षक भी है। अभिलेख में यह भी कहा गया है कि वह अपराधी शत्रुओं के प्रति भी अनावश्यक हिंसा में रुचि नहीं रखता था। अभिलेख में उसकी तुलना राम, केशव अर्थात कृष्ण, अर्जुन, भीमसेन, नाभाग, नहुष, जनमेजय, सगर, ययाति और अंबरीष जैसे पौराणिक नायकों से की गई है।
इन तुलनाओं का उद्देश्य राजा की वैधता और गौरव को बढ़ाना था। ऐसी तुलना प्राचीन भारत की प्रशस्ति-परंपरा की सामान्य शैली का हिस्सा थीं। इनके माध्यम से राजा की छवि और उस समय की राजकीय विचारधारा के बारे में जानकारी मिलती है।
गौतमीपुत्र शातकर्णि की सैन्य विजयें
पश्चिमी क्षत्रपों के विरुद्ध संघर्ष
गौतमीपुत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि पश्चिमी भारत में सातवाहन शक्ति की पुनर्स्थापना थी। उसके शासन से पहले पश्चिमी दक्कन के अनेक क्षेत्र शक क्षत्रपों, विशेषकर नहपान के प्रभाव में चले गए थे। नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र को शक, यवन और पहलव शत्रुओं का नाश करने वाला कहा गया है।
शक, यवन और पहलव
प्राचीन भारतीय अभिलेखों में ‘शक’ शब्द उत्तर-पश्चिम से आए मध्य एशियाई मूल के शासकों के लिए, ‘यवन’ शब्द यूनानी या इंडो-ग्रीक शासकों तथा बाद में सामान्य रूप से पश्चिम से आए विदेशियों के लिए और ‘पहलव’ शब्द पार्थियन अर्थात ईरानी मूल के शासकों के लिए प्रयुक्त होता था। नासिक प्रशस्ति में ये तीनों नाम एक साथ ‘विदेशी या उत्तर-पश्चिमी शक्तियों’ के प्रतीक के रूप में आए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य गौतमीपुत्र की सैन्य श्रेष्ठता को दिखाना था। इसका यह अर्थ आवश्यक नहीं है कि उसने इन सभी शक्तियों से अलग-अलग सीधे युद्ध किए थे। नहपान का परिवार, जैसे उषवदात, भारतीय नाम और भारतीय धार्मिक परंपराओं को अपना चुका था। इससे पता चलता है कि इन शक शासकों और स्थानीय समाज के बीच काफी मेल-जोल हो चुका था।
नहपान के साथ संघर्ष
गौतमीपुत्र के शासन की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना नहपान के साथ हुआ संघर्ष था। नहपान क्षहरात वंश का शक्तिशाली शासक था और उसने सातवाहन प्रभाव को गंभीर चुनौती दी थी। उसके सिक्के और अभिलेख गुजरात, महाराष्ट्र के उत्तरी भाग और पश्चिमी दक्कन के व्यापारिक क्षेत्रों में उसकी राजनीतिक तथा आर्थिक शक्ति का संकेत देते हैं।
गौतमीपुत्र ने नहपान की शक्ति को पराजित किया और उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों, विशेषकर नासिक-जुन्नर तथा आसपास के इलाकों पर फिर से सातवाहन अधिकार स्थापित किया। इसकी पुष्टि दो स्वतंत्र प्रमाणों से होती है। नासिक के अभिलेख और नहपान के सिक्कों पर किया गया पुनर्मुद्रण। 1906 ईस्वी में नासिक जिले के जोगलथंबी गाँव में नहपान के चाँदी के सिक्कों का भंडार मिला, जिसमें तेरह हजार से अधिक सिक्के थे। इनमें से लगभग दो-तिहाई से अधिक सिक्कों पर गौतमीपुत्र ने अपनी मुहर दोबारा लगवाई थी। इन सिक्कों की बनावट ऐसी थी कि मूल सिक्के पर नहपान की आकृति, यूनानी लिपि का लेख तथा ब्राह्मी और खरोष्ठी में ‘राजा क्षहरात नहपान’ का लेख था। उसके ऊपर किए गए पुनर्मुद्रण में सातवाहन प्रतीक, जैसे चैत्य अर्थात पहाड़ी का चिह्न और उज्जैन-चिह्न तथा ब्राह्मी में ‘राजा गौतमीपुत्र सिरि सातकर्णि’ का लेख उकेरा गया। ब्रिटिश म्यूज़ियम और भारत के अन्य संग्रहालयों में ऐसे पुनर्मुद्रित सिक्के सुरक्षित हैं। इनमें नहपान की पुरानी आकृति के निशान दिखाई देते हैं और उनके ऊपर गौतमीपुत्र के चिह्न बने हुए हैं।

इस पुनर्मुद्रण के दो प्रमुख अर्थ हैं। पहला, पहले से मौजूद चाँदी के सिक्कों को नए सिरे से ढालने के बजाय उन पर नई मुहर लगाने से समय और खर्च दोनों की बचत होती थी। दूसरा, पराजित शासक की मुद्रा को अपने नाम से दोबारा जारी करना विजेता की सत्ता और अधिकार का सार्वजनिक प्रदर्शन था। प्राचीन भारत में सिक्के केवल लेन-देन का साधन नहीं थे, बल्कि वे राजसत्ता की घोषणा का माध्यम भी थे। इसके अलावा, गौतमीपुत्र के समय सातवाहन मुद्राओं में चाँदी के सिक्कों और राजा की आकृति वाले सिक्कों का चलन बढ़ा, जो पश्चिमी क्षत्रपों की सिक्का-परंपरा से प्रभावित था।
क्षहरात वंश का उन्मूलन
नासिक प्रशस्ति में गौतमीपुत्र को ‘क्षहरात-कुल का उन्मूलन करने वाला’ कहा गया है। इसे सामान्यतः नहपान के नेतृत्व वाली क्षहरात राजनीतिक सत्ता के अंत से जोड़ा जाता है। इस विजय के बाद पश्चिमी दक्कन और महाराष्ट्र के महत्त्वपूर्ण भागों में सातवाहन सत्ता का फिर से विस्तार हुआ। यह सातवाहन इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इसी कारण गौतमीपुत्र को सातवाहन वंश के महान शासकों में गिना जाता है।
गौतमीपुत्र के साम्राज्य का विस्तार
नासिक प्रशस्ति और अन्य अभिलेखीय प्रमाणों से उसके प्रभाव-क्षेत्र का अनुमान लगाया जाता है। प्रशस्ति में उसे असिक, अश्मक अर्थात असक, मूलक, सुरठ अर्थात सुराष्ट्र, कुकुर, अपरांत, अनूप, विदर्भ, आकर और अवंति जैसे प्रदेशों का स्वामी बताया गया है। इनमें अश्मक गोदावरी घाटी का क्षेत्र था, मूलक पैठण अर्थात प्रतिष्ठान के आसपास का इलाका था, सुरठ आज के सौराष्ट्र या काठियावाड़ का क्षेत्र था, अपरांत उत्तरी कोंकण और पश्चिमी तट का इलाका था, अनूप नर्मदा घाटी में माहिष्मती के आसपास का क्षेत्र था, विदर्भ पूर्वी महाराष्ट्र में था, आकर पूर्वी मालवा अर्थात विदिशा क्षेत्र और अवंति पश्चिमी मालवा अर्थात उज्जैन क्षेत्र था। कुकुर को सामान्यतः काठियावाड़ या राजस्थान की ओर माना जाता है, जबकि असिक की पहचान को लेकर मतभेद हैं। इन प्राचीन नामों की आधुनिक पहचान में भी विद्वानों के बीच मतभेद हैं और इन्हें आज के राज्यों की सीमाओं के समान नहीं माना जाना चाहिए।
प्रशस्ति में उसे अनेक पर्वतों का स्वामी भी बताया गया है, जैसे विंध्य, ऋक्षवत, पारियात्र, सह्य अर्थात पश्चिमी घाट, कृष्णगिरि, मच या मंच, श्रीपर्वत, मलय, महेंद्र, सेतगिरि और चकोर। इन नामों से संकेत मिलता है कि लेखक उसके प्रभाव-क्षेत्र को पश्चिमी घाट से लेकर पूर्वी घाट तक और विंध्य से लेकर दक्षिण की पर्वत-श्रेणियों तक फैला हुआ दिखाना चाहता था। इसी वर्णन में उसके घोड़ों को ‘तीन समुद्रों का जल पीने वाले’ बताया गया है, जो उसकी व्यापक शक्ति का काव्यात्मक वर्णन है। इसके अलावा अभिलेख में उसे ‘बेनाकटक का स्वामी’ भी कहा गया है।
गौतमीपुत्र की उपाधियाँ
नासिक प्रशस्ति में उसके लिए अनेक गौरवपूर्ण विशेषणों का प्रयोग किया गया है। इनमें सबसे चर्चित ‘एकबम्हण’ अर्थात एकब्रह्मण है, जिसकी व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। इसे केवल ‘एकमात्र ब्राह्मण’ के अर्थ में लेना उचित नहीं है। कुछ विद्वान इसे ‘अद्वितीय ब्राह्मण’ या ‘ब्राह्मणों का अद्वितीय रक्षक’ के अर्थ में समझते हैं, जबकि कुछ इसे भाषाशास्त्रीय संदर्भ में दूसरे अर्थों में पढ़ते हैं। उसे ‘खतिय-दप-मान-मद्दन’ अर्थात ‘क्षत्रियों के गर्व और अभिमान को नष्ट करने वाला’ भी कहा गया है। इसे प्रशस्ति-परंपरा और राजनीतिक वैधता के संदर्भ में समझना चाहिए। संभवतः इसका संकेत अहंकारी शत्रु शासकों के दमन की ओर है। इसी तरह ‘सक-पहलव-यवन-निसूदन’ विदेशी या उत्तर-पश्चिमी शक्तियों के दमन का सूचक है और ‘खखरात-वस-निरवसेसकर’ नहपान के वंश का अंत करने वाले के अर्थ में है। ‘सातवाहन-कुल-यस-पतिट्ठापन-कर’ का अर्थ है- सातवाहन कुल का यश फिर से स्थापित करने वाला।
इसके अतिरिक्त उसे ‘राजराज’ अर्थात राजाओं का राजा और महान राजा कहा गया है। उसे ‘द्विजवर-कुटुंब-विवधन’ अर्थात श्रेष्ठ द्विजों, जैसे ब्राह्मणों आदि के परिवारों की वृद्धि करने वाला और चारों वर्णों के संकर अर्थात मिश्रण को रोकने वाला भी बताया गया है। इसके साथ-साथ उसे ‘अपराजित-विजय-पताक’ अर्थात जिसकी विजय-पताका कभी पराजित न हुई हो, कहा गया है।
धार्मिक नीति
नासिक प्रशस्ति गौतमीपुत्र को ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है। उसे वर्ण-व्यवस्था की मर्यादा को फिर से स्थापित करने वाला कहा गया है। इससे पता चलता है कि सातवाहन राजसत्ता स्वयं को ब्राह्मणीय सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था से जोड़कर अपनी वैधता मजबूत करती थी। यह परंपरा सातवाहनों के पुराने शासकों से भी चली आ रही थी, जैसे सातकर्णि प्रथम द्वारा किए गए अश्वमेध और राजसूय जैसे वैदिक यज्ञ।
फिर भी उसकी धार्मिक नीति को केवल ‘बौद्ध-विरोधी’ या केवल ‘ब्राह्मण-समर्थक’ कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। गौतमीपुत्र के अपने अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि बौद्ध भिक्षुओं और संस्थाओं को भूमि तथा ग्राम दान दिए गए। नासिक के 18वें वर्ष के अभिलेख में त्रिरश्मि पर्वत के भिक्षुओं को भूमि देने का उल्लेख है और कार्ले के अभिलेख में भी बौद्ध संस्था को ग्राम-दान मिलने की जानकारी मिलती है। उसकी माता ने भी भद्रायणीय संप्रदाय के भिक्षुओं के लिए गुफा दान की थी।
इस प्रकार सातवाहन शासन में ब्राह्मणीय राजकीय विचारधारा और बौद्ध संस्थाओं के संरक्षण का सह-अस्तित्व दिखाई देता है। प्राचीन भारतीय राजसत्ता में धार्मिक संरक्षण को आधुनिक अर्थों में ‘धर्म का बहिष्कार’ या ‘एकाधिकार’ की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। राजा प्रायः सभी प्रमुख संप्रदायों को संरक्षण देकर राजनीतिक और सामाजिक समर्थन प्राप्त करता था। बौद्ध मठ व्यापारियों, शिल्पियों और स्थानीय अभिजात वर्ग से मिलने वाले दान के भी केंद्र थे। इसलिए राज्य के लिए उनका संरक्षण व्यावहारिक रूप से भी उपयोगी था।
गौतमीपुत्र शातकर्णि का प्रशासन
गौतमीपुत्र के अभिलेखों से सातवाहन प्रशासन की संरचना पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। राज्य को ‘आहार’ नामक इकाइयों में बाँटा गया था, जो आज के जिले जैसी प्रशासनिक इकाई मानी जा सकती है। नासिक क्षेत्र में ‘गोवर्धन आहार’ का उल्लेख मिलता है। आहार के अंतर्गत नगर, निगम अर्थात व्यापारिक और शिल्पी संघों वाली बस्तियाँ तथा ग्राम आते थे। इससे पता चलता है कि प्रशासन ग्रामीण और नगरीय दोनों स्तरों पर संगठित था और व्यापारिक नगर राजस्व की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे।
अभिलेखों में अमात्य जैसे अधिकारियों की भूमिका दिखाई देती है। गौतमीपुत्र के 18वें वर्ष के अभिलेख में राजा द्वारा अमात्य को भूमि संबंधी आदेश दिए जाने का प्रमाण मिलता है। सातवाहन काल के अन्य अभिलेखों में महासेनापति, भंडारिक अर्थात कोषाध्यक्ष, लेखक और गौल्मिक अर्थात दूरस्थ चौकी के अधिकारी जैसे पदों के नाम भी मिलते हैं।
सातवाहन भूमि-अनुदानों में अक्सर कुछ विशेष छूटें, जिन्हें परिहार कहा जाता था, दी जाती थीं। इनमें दान की गई भूमि में राजकीय सैनिकों या अधिकारियों का प्रवेश न होना, उसमें हस्तक्षेप न किया जाना और कुछ करों से मुक्ति जैसी व्यवस्थाएँ शामिल थीं। इससे संकेत मिलता है कि राजा अपने अधिकारों का एक हिस्सा धार्मिक संस्थाओं को सौंप देता था। साथ ही, यह प्रक्रिया आगे चलकर भूमि-अनुदान व्यवस्था के विकास की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वपीठिका भी बनी।
नासिक के 18वें वर्ष के अभिलेख में जिस भूमि का उल्लेख है, वह पहले नहपान के दामाद उषवदात की थी, जिसने स्वयं भी भिक्षुओं को दान दिए थे। नहपान की सत्ता समाप्त होने के बाद गौतमीपुत्र ने उसी भूमि को फिर से भिक्षुओं के पक्ष में व्यवस्थित किया। इससे पता चलता है कि सत्ता परिवर्तन के बाद धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों को राजकीय आदेश के माध्यम से पुनर्स्थापित या संशोधित किया जा सकता था।
गौतमीपुत्र की राजधानी के बारे में इतिहासकारों के बीच मतभेद है। उसके अभिलेख में बेनाकटक का उल्लेख मिलता है, जिसे कुछ विद्वान वैनगंगा क्षेत्र अर्थात विदर्भ से जोड़ते हैं, लेकिन इसे उसकी राजधानी घोषित करना उचित नहीं है। सातवाहन साम्राज्य एक विस्तृत दक्कनी साम्राज्य था, जिसमें अलग-अलग समय पर प्रतिष्ठान अर्थात पैठण, जुन्नर, नासिक और अन्य केंद्र महत्त्वपूर्ण रहे।
कृषि, भूमि और प्रजा के प्रति दृष्टिकोण
नासिक प्रशस्ति गौतमीपुत्र को प्रजा के सुख-दुख में सहभागी राजा के रूप में प्रस्तुत करती है। कृषि सुधार, किसानों के लिए विशेष योजनाओं या किसी बड़े कल्याणकारी कार्यक्रम के बारे में किए जाने वाले कई प्रचलित दावों के लिए प्रत्यक्ष समकालीन प्रमाण नहीं हैं। भूमि-दान, राजस्व व्यवस्था और ग्रामीण प्रशासन सातवाहन शासन के महत्त्वपूर्ण अंग थे और इनके प्रमाण अभिलेखों में मिलते हैं। लेकिन ‘व्यापक कृषि-सुधार कार्यक्रम’ का कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
सामाजिक व्यवस्था और वर्ण-संकर का प्रश्न
प्रशस्ति में गौतमीपुत्र को चारों वर्णों के संकर को रोकने वाला और द्विजों के परिवारों की वृद्धि करने वाला कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि राजकीय विचारधारा में सामाजिक वर्गीकरण और ब्राह्मणीय धर्मशास्त्रीय आदर्शों का महत्त्व था। यह अभिलेख मुख्यतः राजा की आदर्श छवि और राजनीतिक वैधता को व्यक्त करता है। उस समय पश्चिमी भारत में शक जैसे विदेशी समूह स्थानीय समाज में घुल-मिल रहे थे और उनके वैवाहिक संबंध भी बन रहे थे। उषवदात का परिवार इसका स्पष्ट उदाहरण है। इसलिए इतिहासकार ‘वर्ण-संकर रोकने’ की बात को कुछ हद तक इसी सामाजिक मेल-जोल के प्रति राजकीय प्रतिक्रिया और ब्राह्मणीय समर्थन प्राप्त करने के प्रयास के संदर्भ में भी देखते हैं।
व्यापार और अर्थव्यवस्था
गौतमीपुत्र ने जिस क्षेत्र में संघर्ष किया, वह प्राचीन भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्रों में से एक था। पश्चिमी दक्कन के मार्ग अरब सागर के बंदरगाहों, जैसे सोपारा, कल्याण और भड़ौच, को दक्कन के आंतरिक बाजारों से जोड़ते थे। पश्चिमी घाट के दर्रों से व्यापारिक कारवाँ ऊपर पठार तक पहुँचते थे। यह व्यापार रोमन साम्राज्य तक जुड़ा हुआ था और दक्कन के कई स्थानों से रोमन सिक्के मिले हैं। पैठण और तेर अर्थात प्राचीन तगर जैसे स्थलों की खुदाई से भी इस व्यापारिक संपर्क के प्रमाण मिले हैं।
नासिक, जुन्नर और कार्ले जैसे स्थान इन्हीं व्यापारिक मार्गों पर बसे थे। यहाँ की गुफाओं और विहारों को व्यापारियों, शिल्पियों और स्थानीय अभिजातों से दान मिलता था। इसलिए गौतमीपुत्र का पश्चिमी दक्कन पर फिर से नियंत्रण प्राप्त करना केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे सातवाहनों को बंदरगाहों और व्यापारिक करों का बड़ा हिस्सा मिलने की संभावना बनी। व्यापार के कारण सिक्कों का प्रचलन भी बढ़ा और इसी पृष्ठभूमि में नहपान के चाँदी के सिक्कों का पुनर्मुद्रण राजनीतिक विजय के साथ-साथ आर्थिक नियंत्रण का भी प्रतीक बन गया।
नासिक की पांडवलेणी गुफाएँ और गौतमीपुत्र
नासिक की पांडवलेणी (त्रिरश्मि) गुफाएँ सातवाहन और पश्चिमी क्षत्रप, दोनों के इतिहास का महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक केंद्र हैं। ये लगभग चौबीस गुफाओं का समूह हैं, जिसका नाम बाद में पांडवों से जोड़कर ‘पांडवलेणी’ पड़ा। इनका मूल संबंध बौद्ध भिक्षुओं के विहारों और चैत्यगृहों से था। इस समूह में गुफा संख्या 10 उषवदात, अर्थात नहपान के दामाद, द्वारा बनवाई गई थी, जबकि गुफा संख्या 3 गौतमी बालश्री द्वारा भद्रायणीय संप्रदाय को दी गई थी, जिसमें गौतमीपुत्र की प्रशस्ति खुदी हुई है। एक ही गुफा-समूह में नहपान के परिवार और गौतमीपुत्र के परिवार, दोनों के अभिलेख मिलना पश्चिमी दक्कन में सत्ता-परिवर्तन का एक सीधा प्रमाण है। इसी कारण इतिहासकारों के लिए नासिक की ये गुफाएँ बहुत महत्त्व रखती हैं।
गौतमीपुत्र के शासन की सीमाएँ
यद्यपि गौतमीपुत्र ने सातवाहन शक्ति का बड़ा विस्तार किया, लेकिन उसकी विजय को स्थायी राजनीतिक एकीकरण के रूप में नहीं देखना चाहिए। उसके बाद पश्चिमी क्षत्रपों की कार्दमक शाखा ने फिर से अपनी शक्ति बढ़ाई। इसके शासक चष्टन ने उज्जैन को केंद्र बनाकर अपनी शक्ति मजबूत की। टॉलेमी ने उसे ‘तियस्तेनेस’ और उज्जैन को ‘ओज़ेने’ के रूप में उल्लेखित किया है। आगे चलकर उसके पौत्र रुद्रदामन, जिसका शासन लगभग 130–150 ईस्वी के बीच माना जाता है, ने बड़े क्षेत्रों पर अधिकार किया।
रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में उसके अधीन क्षेत्रों की जो सूची मिलती है, उसमें आकर-अवंति, अनूप, सुराष्ट्र, कुकुर और अपरांत जैसे वही नाम मिलते हैं जिन्हें गौतमीपुत्र की प्रशस्ति में भी गिनाया गया है। यह संकेत देता है कि ये क्षेत्र गौतमीपुत्र के हाथ से कुछ ही समय बाद निकल गए। इसी अभिलेख में रुद्रदामन ने यह भी दावा किया है कि उसने दक्षिणापथ के स्वामी सातकर्णि को दो बार हराया, लेकिन निकट संबंध होने के कारण उसे नष्ट नहीं किया। यह सातकर्णि सामान्यतः गौतमीपुत्र नहीं, बल्कि उसके बाद का कोई सातवाहन शासक माना जाता है, क्योंकि गौतमीपुत्र के जीवित रहते रुद्रदामन का उदय नहीं हुआ था। कान्हेरी के एक अभिलेख से पता चलता है कि रुद्रदामन की पुत्री का विवाह एक वशिष्ठीपुत्र सातकर्णि से हुआ था। इसलिए सातवाहन और कार्दमक शासकों के बीच संघर्ष के साथ-साथ वैवाहिक संबंध भी बने रहे।
इस प्रकार गौतमीपुत्र की विजय अत्यंत महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद पश्चिमी भारत में सातवाहन प्रभुत्व को स्थायी नहीं बना सकी। पश्चिमी भारत और मालवा में सातवाहन तथा पश्चिमी क्षत्रपों के बीच संघर्ष उसके बाद भी चलता रहा और कार्दमक क्षत्रपों के उदय से शक्ति-संतुलन फिर बदल गया।
गौतमीपुत्र का उत्तराधिकारी : वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी
गौतमीपुत्र के बाद उसका पुत्र वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी, जिसका शासनकाल लगभग 130–158 ईस्वी माना जाता है, सातवाहन गद्दी पर बैठा। उसकी माता का नाम वशिष्ठी था, जो मातृनाम की परंपरा को स्पष्ट करता है। पुलुमावी के शासनकाल में ही गौतमी बालश्री की प्रसिद्ध नासिक प्रशस्ति खुदवाई गई। इसलिए अपने पिता की उपलब्धियों की स्मृति उसके शासनकाल में आधिकारिक रूप से सुरक्षित रही।
पुलुमावी ने सातवाहन शक्ति को आगे बढ़ाया। उसके सिक्कों और अभिलेखों का प्रसार दक्षिण और पूर्व की ओर आंध्र क्षेत्र तक दिखाई देता है, जबकि पश्चिम में कार्दमक क्षत्रपों से संघर्ष जारी रहा। टॉलेमी ने उसे ‘सिरो पोलेमियोस’ कहकर पैठण अर्थात बैठान का शासक बताया है। आगे चलकर दूसरी सदी के अंत में यज्ञश्री सातकर्णि के समय सातवाहन शक्ति का कुछ पुनरुत्थान हुआ और उसके जहाज-चिह्न वाले सिक्के समुद्री व्यापार की ओर संकेत करते हैं। लेकिन तीसरी शताब्दी ईस्वी के आरंभ तक यह वंश कमजोर होकर समाप्त हो गया।
गौतमीपुत्र शातकर्णि का मूल्यांकन
गौतमीपुत्र शातकर्णि का महत्त्व केवल उसकी सैन्य विजयों तक सीमित नहीं है। उसका शासन सातवाहन इतिहास के उस चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जब पश्चिमी दक्कन में सातवाहन राजनीतिक शक्ति ने फिर से अपना प्रभाव स्थापित किया। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि नहपान की पराजय और क्षहरात राजनीतिक सत्ता का अंत थी। इसके साथ उसने पश्चिमी दक्कन के क्षेत्रों पर फिर से अधिकार किया, जिसमें नासिक-जुन्नर के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र भी शामिल थे। इससे सातवाहन प्रतिष्ठा फिर से स्थापित हुई, जिसे प्रशस्ति में ‘कुल का यश फिर से स्थापित करना’ कहा गया है। नहपान के सिक्कों का पुनर्मुद्रण उसके आर्थिक प्रभुत्व के प्रदर्शन का प्रमाण है। उसके शासन में ब्राह्मणीय राजकीय विचारधारा के साथ बौद्ध संस्थाओं को भी संरक्षण मिला और प्रशासन में आहार, अमात्य तथा भूमि-अनुदान की स्पष्ट व्यवस्था दिखाई देती है।
माता गौतमी बालश्री की नासिक प्रशस्ति उसे एक ऐसे आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत करती है जो युद्ध में विजयी, सामाजिक व्यवस्था का रक्षक, प्रजा से जुड़ा हुआ और धार्मिक संस्थाओं का संरक्षक है। प्रशस्ति की भाषा निश्चित रूप से स्तुति-प्रधान है, फिर भी यह सातवाहन राजनीतिक विचारधारा और उनके साम्राज्यवादी दावों को समझने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
महाराष्ट्र और आंध्र-कर्नाटक की लोक-परंपराओं में सातवाहन राजाओं को ‘शालिवाहन’ नाम से याद किया जाता है। शालिवाहन शक संवत्, अर्थात 78 ईस्वी के आरंभ तथा गुड़ी पड़वा या उगादि के उत्सव को शक शत्रुओं पर किसी सातवाहन राजा की विजय से जोड़ने वाली कथाएँ प्रचलित हैं। कई लोग इसे गौतमीपुत्र की नहपान पर विजय से जोड़ते हैं।
इतिहासकार इस संबंध को निश्चित तथ्य नहीं मानते, क्योंकि समकालीन अभिलेखों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता और शक संवत् के आरंभकर्ता के बारे में अन्य मत भी प्रचलित हैं। ‘शालिवाहन’ नाम स्वयं ‘सातवाहन’ का ही बाद का लोक-रूप माना जाता है।


