बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
बंगाल में क्रांतिकारी चेतना की पृष्ठभूमि
बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों का विकास किसी एकल घटना का परिणाम नहीं था- यह दशकों की राजनीतिक निराशा, औपनिवेशिक शोषण और नरमपंथी तरीकों की सीमाओं के विरुद्ध उभरे असंतोष की स्वाभाविक परिणति थी। इस आंदोलन की जड़ें 1905 ई. के बंगाल विभाजन में थीं, जिसने बंगाली जनमानस को गहरे आघात से भर दिया। लॉर्ड कर्जन द्वारा 16 अक्टूबर 1905 ई. को लागू किए गए इस विभाजन ने एक समृद्ध, एकजुट और राष्ट्रवादी प्रदेश को दो टुकड़ों में बाँट दिया। बंगाल विभाजन के विरोध में उठे स्वदेशी आंदोलन ने जहाँ एक ओर नरमपंथी राजनीति की सीमाओं को उजागर किया, वहीं दूसरी ओर युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को सशस्त्र क्रांतिकारी संघर्ष की राह पर धकेल दिया।
बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का एक विशिष्ट सांस्कृतिक आयाम भी था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ और उसमें प्रतिपादित ‘वंदे मातरम्’ की भावना, स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी राष्ट्रवादी विचार, बाल गंगाधर तिलक की गरमपंथी राजनीति और रूसी अराजकतावादी-क्रांतिकारी साहित्य ने बंगाल के युवाओं को गहराई से प्रभावित किया था। इन सभी तत्वों के संयोग से एक ऐसी क्रांतिकारी चेतना का उदय हुआ जो भारत के किसी भी अन्य प्रांत से अधिक संगठित, विचारशील और दीर्घकालीन सिद्ध हुई।
अनुशीलन समिति और युगांतर: क्रांतिकारी संगठन का आधार
बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों की संगठनात्मक नींव दो प्रमुख गुप्त संस्थाओं- अनुशीलन समिति और युगांतर ने रखी। अनुशीलन समिति की स्थापना 1902 में प्रमथनाथ मित्र के नेतृत्व में कलकत्ता में हुई। आरंभ में यह एक अखाड़ा था जो युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण देता था, परंतु शीघ्र ही इसने एक राजनीतिक-क्रांतिकारी स्वरूप धारण कर लिया। इसकी ढाका शाखा 1906 ई. में पुलिन बिहारी दास के नेतृत्व में गठित हुई, जो शीघ्र ही बंगाल की सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी इकाई बन गई। अनुशीलन समिति से जुड़े क्रांतिकारियों ने बम निर्माण, हथियारों की व्यवस्था और गुप्त छापामार कार्रवाइयों को संगठित रूप दिया।
युगांतर इसी क्रांतिकारी धारा का दूसरा प्रमुख संगठन था, जिसके विकास में बरिंद्र कुमार घोष, जो अरविंद घोष के छोटे भाई थे और भूपेंद्रनाथ दत्त, जो स्वामी विवेकानंद के भाई थे, की केंद्रीय भूमिका रही। 1906 ई. में आरंभ हुई ‘युगांतर’ पत्रिका ने क्रांतिकारी विचारों का व्यापक प्रसार किया और बंगाल के युवाओं में सशस्त्र प्रतिरोध की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाया। इस पत्रिका के माध्यम से सर्वप्रथम ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या के औचित्य का खुलकर प्रचार किया गया। इन दोनों संगठनों ने मिलकर बंगाल में एक विशाल भूमिगत क्रांतिकारी नेटवर्क का निर्माण किया, जो स्वदेशी आंदोलन के उत्साह से पोषित होकर निरंतर विस्तृत होता गया।
मुजफ्फरपुर बम कांड और खुदीराम बोस (1908 ई.)
बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन की पहली बड़ी और ऐतिहासिक कार्रवाई 30 अप्रैल 1908 ई. को मुजफ्फरपुर में हुई। बंगाल के कुख्यात और दमनकारी ब्रिटिश न्यायाधीश डगलस किंग्सफोर्ड को मारने के उद्देश्य से खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने एक बम फेंका। किंग्सफोर्ड उस दिन अपनी बग्घी में नहीं था- उसकी बग्घी के समान दिखने वाली एक दूसरी गाड़ी में बम गिरा, जिसमें दो अंग्रेज महिलाएँ- श्रीमती कैनेडी और उनकी बेटी सवार थीं, जिनकी इस बम विस्फोट में मृत्यु हो गई। यह एक दुखद और अनपेक्षित परिणाम था।
प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के हाथों पकड़े जाने से बचने के लिए स्वयं को गोली मार ली, जबकि खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे में उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई और 11 अगस्त 1908 ई. को मात्र 18 वर्ष की अल्प आयु में खुदीराम बोस को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में फाँसी पाने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में से एक थे। उनकी शहादत ने बंगाल और समूचे भारत के युवाओं के मन में एक ऐसी अग्नि प्रज्वलित की जो दशकों तक बुझी नहीं।
मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद अलीपुर बम षड्यंत्र केस (1908-09 ई. ) में बरिंद्र कुमार घोष सहित अनेक प्रमुख क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। इस मुकदमे में बाल गंगाधर तिलक को भी जेल हुई। इस दमन ने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को क्षणिक रूप से कमजोर किया, परंतु उसकी आंतरिक ऊर्जा बुझी नहीं।
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में बंगाल की क्रांतिकारी राजनीति
बीसवीं सदी के तीसरे दशक में बंगाल में राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत जटिल हो गया। कांग्रेसी नेतृत्व दो परस्पर प्रतिस्पर्धी गुटों में बँट गया था- एक गुट का नेतृत्व सुभाषचंद्र बोस कर रहे थे और दूसरे गुट की बागडोर जे.एम. सेनगुप्त के हाथ में थी। इस राजनीतिक विभाजन का प्रभाव क्रांतिकारी समूहों पर भी पड़ा। ‘युगांतर’ समूह ने सुभाषचंद्र बोस का पक्ष लिया, जबकि ‘अनुशीलन’ समूह जे.एम. सेनगुप्त के साथ रहा।
1923-24 ई. में बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों का एक नया उभार हुआ। इसकी सबसे नाटकीय अभिव्यक्ति जनवरी 1924 ई. में उस समय सामने आई जब गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के एक अंग्रेज नागरिक अर्नेस्ट डे की हत्या कर दी। साहा का वास्तविक लक्ष्य बंगाल का कुख्यात और क्रूर पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट था, जिसके दमनकारी तरीकों ने बंगाल में भीषण आतंक फैला रखा था, किंतु पहचान में गलती हो गई। इस हत्या ने ब्रिटिश सरकार को बौखला दिया।
अक्टूबर 1924 ई. के बंगाल अध्यादेश के अंतर्गत सभी संदिग्ध व्यक्तियों को बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी की सूची में सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रमुख कांग्रेसी नेता भी शामिल थे। गोपीनाथ साहा को फाँसी की सजा दी गई। उनके बलिदान के बाद कुछ समय के लिए बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ मंद पड़ गईं। सरकार को यह भ्रम हो गया कि वह क्रांतिकारी आंदोलन को पूरी तरह दबाने में सफल हो गई है और इसी कारण 1928 ई. में सभी नजरबंद राष्ट्रवादियों को रिहा कर दिया गया तथा 1925 ई. के दमनकारी अध्यादेश की अवधि 1930 ई. में आगे नहीं बढ़ाई गई।
परंतु ब्रिटिश सरकार का यह अनुमान निराधार सिद्ध हुआ। 1928-29 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी और उससे उत्पन्न बेरोजगारी ने शिक्षित बंगाली युवाओं में गहरी बेचैनी भर दी। काकोरी ट्रेन एक्शन (1925 ई. ), लाहौर षड्यंत्र केस और जतिन दास की 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद शहादत (13 सितंबर 1929 ई. ) ने बंगाल के युवाओं को नई ऊर्जा और प्रेरणा दी। 1929 ई. में अनेक नए विद्यार्थी संगठन और गुप्त समितियाँ स्थापित हुईं। नए क्रांतिकारियों ने अपने-अपने गुट बनाए, परंतु पुरानी ‘अनुशीलन’ और ‘युगांतर’ जैसी संस्थाओं से भी वे अच्छे संबंध बनाए रखकर उनसे दिशा-निर्देश लेते रहे। इस प्रकार बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन का एक नया और अधिक साहसी अध्याय आरंभ होने को था।
मास्टर सूर्यसेन और चटगाँव क्रांतिकारी समूह
पुनर्गठित और नवगठित क्रांतिकारी समूहों में पूर्वी बंगाल के चटगाँव का मास्टर सूर्यसेन का गुट सर्वाधिक सक्रिय, संगठित और अदम्य साहसी था। सूर्यसेन चटगाँव के एक राष्ट्रीय विद्यालय में शिक्षक थे। विद्यार्थियों और सहकर्मियों में वे अत्यंत लोकप्रिय थे और उन्हें स्नेह तथा आदर से ‘मास्टर दा’ कहा जाता था।
सूर्यसेन का क्रांतिकारी जीवन बहुत कम उम्र में ही प्रारंभ हो गया था। विद्यार्थी काल में एक राष्ट्रप्रेमी शिक्षक की प्रेरणा से वे ‘अनुशीलन समिति’ के सदस्य बन गए थे। 1918 ई. में उन्होंने स्थानीय स्तर पर क्रांतिकारी युवाओं को संगठित करने के लिए ‘युगांतर पार्टी’ की स्थापना की। गांधीजी के असहयोग आंदोलन (1920-22) में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की और यह सिद्ध किया कि वे केवल सशस्त्र क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रवादी दृष्टि रखने वाले नेता हैं। दिसंबर 1923 में उन्होंने एक साहसिक कार्रवाई करते हुए दिन-दहाड़े चटगाँव में आसाम-बंगाल रेलवे के कोषागार को लूट लिया और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।

क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में सूर्यसेन को 1926 से 1928 ई. तक दो वर्ष जेल में बिताने पड़े। जेल से छूटने के बाद भी उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपना संबंध बनाए रखा और 1929 ई. में चटगाँव जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव चुने गए, जबकि उनके पाँच प्रमुख सहयोगी भी इसके सदस्य थे। यह उनकी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय था- वे एक वैध, अहिंसक राजनीतिक दल की छत्रछाया में रहते हुए भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल रहे।
सूर्यसेन के क्रांतिकारी दल में विविध पृष्ठभूमि के युवा शामिल थे। अनंत सिंह, अंबिका चक्रवर्ती, गणेश घोष, लोकनाथ बाउल, आनंद गुप्त जैसे अनुभवी क्रांतिकारियों के साथ-साथ कल्पना दत्त और प्रीतिलता वाडेदार जैसी साहसी नवयुवतियाँ भी इस दल में थीं, जो आगे चलकर बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का अभूतपूर्व उदाहरण बनीं।
सूर्यसेन के गुट ने एक महत्वाकांक्षी किंतु सुनियोजित योजना तैयार की। उनका मानना था कि एक ऐसी सशस्त्र कार्रवाई आवश्यक है जो देश की जनता को यह विश्वास दिला सके कि संगठित और साहसी क्रांतिकारी प्रयास से ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देना संभव है। इस दृष्टि से उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना की वर्दी में 65 क्रांतिकारियों के चार दलों को चटगाँव और बारीसाल के सरकारी शस्त्रागारों पर कब्जा करने, टेलीफोन एक्सचेंज और तारघर को नष्ट करने तथा चटगाँव और शेष बंगाल के बीच रेल-संपर्क को भंग करने की विस्तृत योजना बनाई।
चटगाँव आर्मरी रेड (18 अप्रैल 1930 ई.)
18 अप्रैल 1930 ई. की रात दस बजे सूर्यसेन के निर्देशन में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा पृष्ठ लिखा गया जो इतिहास में सदा के लिए अमर हो गया। इस ऐतिहासिक कार्रवाई को ‘चटगाँव आर्मरी रेड’ के नाम से जाना जाता है। योजनानुसार गणेश घोष के नेतृत्व में छह क्रांतिकारियों ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ बाउल के नेतृत्व में दस युवा क्रांतिकारियों ने सैनिक शस्त्रागार पर एक साथ धावा बोलकर उन पर अधिकार कर लिया। इस कार्रवाई में ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा’ के 65 क्रांतिकारी सम्मिलित थे।
क्रांतिकारियों को शस्त्रागार पर अधिकार तो मिल गया और हथियार भी हाथ लगे, परंतु गोला-बारूद नहीं मिल सका क्योंकि वह एक अलग स्थान पर रखा था। यह उनकी योजना के लिए एक गंभीर झटका था। इसके बावजूद टेलीफोन और टेलीग्राफ संचार व्यवस्था को भंग करने और रेलमार्गों को अवरुद्ध करने में क्रांतिकारियों को पूर्ण सफलता मिली, जिससे चटगाँव कई घंटों के लिए पूरी तरह ब्रिटिश नियंत्रण से बाहर हो गया।
शस्त्रागार पर अधिकार के बाद सभी क्रांतिकारी पुलिस शस्त्रागार के बाहर एकत्र हुए। मास्टर सूर्यसेन ने अपनी भारतीय प्रजातांत्रिक सेना से विधिवत् सैनिक सलामी ली। “वंदे मातरम्” और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारों की गूँज के बीच सूर्यसेन ने तिरंगा झंडा फहराया और एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार के गठन की घोषणा की। यह घोषणा कितनी भी अल्पकालिक क्यों न रही हो, इसका प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक महत्व अत्यंत गहरा था- इसने पहली बार यह संदेश दिया कि भारतीय क्रांतिकारी केवल तोड़फोड़ नहीं करते, वे एक विकल्प की भी कल्पना करते हैं।

जलालाबाद की लड़ाई और गुरिल्ला संघर्ष
चटगाँव आर्मरी रेड की खबर फैलते ही ब्रिटिश सेना ने विशाल सैन्य बल के साथ क्रांतिकारियों को घेरने का अभियान आरंभ कर दिया। शाम होते-होते सूर्यसेन के नेतृत्व में समस्त क्रांतिकारी चटगाँव शहर छोड़कर सुरक्षित ठिकाने की खोज में पहाड़ियों की ओर निकल पड़े। 22 अप्रैल 1930 ई. की दोपहर को जलालाबाद पहाड़ियों में 57 क्रांतिकारियों को ब्रिटिश सेना के कई हजार जवानों ने चारों ओर से घेर लिया। दोनों पक्षों के बीच भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें ब्रिटिश सेना के लगभग 64 सैनिक और 12 क्रांतिकारी मारे गए। शेष क्रांतिकारी बंदी बना लिए गए। सूर्यसेन और उनके कुछ विश्वस्त साथी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी घेरे को तोड़कर निकल भागे और अगले तीन वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध जारी रखा।
ब्रिटिश सरकार का क्रूर दमन
चटगाँव कांड से घबराई ब्रिटिश सरकार ने बर्बर दमन पर उतरकर क्रांतिकारी आंदोलन को समूल नष्ट करने का प्रयास किया। चटगाँव क्षेत्र में पुलिस ने कई गाँवों को जला दिया और ग्रामीणों पर सामूहिक जुर्माने लगाए। अनेक दमनकारी कानून लागू किए गए। 1933 ई. में जवाहरलाल नेहरू को इस आधार पर देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर दो वर्ष की सजा दी गई कि उन्होंने साम्राज्यवाद और पुलिस दमन की निंदा करने तथा क्रांतिकारी युवकों के साहस और वीरता की प्रशंसा करने का दुस्साहस किया था। नेहरू की गिरफ्तारी से स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार न केवल क्रांतिकारियों, बल्कि उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दबाने पर आमादा थी।
बंगाल में महिलाओं की ऐतिहासिक भागीदारी
बंगाल के इस नए क्रांतिकारी आंदोलन की एक अत्यंत विशिष्ट और प्रेरणादायी विशेषता थी- महिला क्रांतिकारियों की बड़ी और सक्रिय भागीदारी। यह उस युग की सामाजिक संरचना को देखते हुए एक क्रांतिकारी कदम था।
प्रीतिलता वाडेदार बंगाल की पहली महिला शहीद क्रांतिकारी थीं। उन्होंने चटगाँव के पहाड़तली में रेलवे इंस्टीट्यूट पर एक साहसिक छापे का नेतृत्व किया। जब ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया तो उन्होंने जीवित पकड़े जाने के बजाय स्वयं को गोली मार ली और वीरगति प्राप्त की। उनका बलिदान बंगाल के युवाओं के लिए एक अमर प्रेरणा बन गया।
कल्पना दत्त (बाद में कल्पना जोशी) को सूर्यसेन के साथ गिरफ्तार किया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वे अदम्य साहस और अटूट संकल्प की प्रतिमूर्ति थीं। बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पूरन चंद्र जोशी से उनका विवाह हुआ और वे एक सक्रिय राजनेता और लेखिका बनीं।
दिसंबर 1931 ई. में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं- शांति घोष और सुनीति चौधरी ने एक जिलाधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना इसलिए और भी चौंकाने वाली थी क्योंकि ये केवल किशोरवय लड़कियाँ थीं। फरवरी 1932 ई. में बीना दास ने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पुरस्कार ग्रहण करने के क्षण का उपयोग कर बंगाल के गवर्नर पर बहुत निकट से गोली चलाई, हालाँकि गवर्नर बच गए। इन सभी महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि भारतीय महिलाएँ केवल पुरुषों की छाया नहीं थीं, वे स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्र योद्धाओं की भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम थीं।
क्रांतिकारी आंदोलन की धर्मनिरपेक्ष चेतना
बंगाल के नए क्रांतिकारी आंदोलन में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा था- क्रांतिकारियों की हिंदू धर्मपरायणता में कमी आ रही थी और उनमें धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो रही थी। सूर्यसेन की ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा’ में सत्तार, फकीर अहमद मियाँ, मीर अहमद और तूनू मियाँ जैसे अनेक मुस्लिम क्रांतिकारी थे। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य था जो यह सिद्ध करता था कि बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन संकीर्ण धार्मिक पहचान से ऊपर उठ रहा था और भारत की समग्र जनता की मुक्ति को अपना लक्ष्य मान रहा था।
चटगाँव आर्मरी रेड का ऐतिहासिक महत्व
‘चटगाँव आर्मरी रेड’ भारत के क्रांतिकारी आंदोलनों के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखती है। इसका महत्व केवल एक सशस्त्र कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक और प्रतीकात्मक घटना के रूप में भी है। एक सरकारी प्रकाशन ने स्वीकार किया कि इस कांड से क्रांतिकारी सोच रखने वाले युवकों का उत्साह असाधारण रूप से बढ़ा और वे भारी संख्या में क्रांतिकारी समूहों में शामिल होने लगे। 1930 ई. में क्रांतिकारी गतिविधियों ने जबरदस्त गति पकड़ी और यह क्रम 1932 ई. तक जारी रहा। इस काल में मिदनापुर जिले में तीन ब्रिटिश मजिस्ट्रेट मारे गए, दो गवर्नरों की हत्या के प्रयास किए गए और दो पुलिस महानिरीक्षक मारे गए। 1930 से 1932 ई. के बीच 22 ब्रिटिश अधिकारियों और 20 गैर-अधिकारी लोगों की हत्या हुई। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि चटगाँव विद्रोह ने एक नई क्रांतिकारी लहर का सूत्रपात किया था।
चटगाँव विद्रोह को पुराने राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों तथा भगत सिंह के समकालीन उत्तर भारतीय क्रांतिकारियों से अधिक प्रभावशाली इसलिए माना जाता है क्योंकि यहाँ क्रांतिकारियों ने व्यक्तिगत लक्ष्यों के बजाय ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के महत्वपूर्ण संस्थागत अंगों- शस्त्रागार, संचार व्यवस्था, रेल-तंत्र पर संगठित और समन्वित प्रहार किया। उनका उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को मारना नहीं था, वे एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे जो युवाओं को प्रेरणा दे और ब्रिटिश नौकरशाही के मनोबल को तोड़ दे।
मास्टर सूर्यसेन की गिरफ्तारी और शहादत (12 जनवरी 1934 ई. )
चटगाँव विद्रोह के बाद तीन वर्षों तक सूर्यसेन ने पहाड़ियों और गाँवों में गुरिल्ला संघर्ष जारी रखा। ब्रिटिश पुलिस उनकी तलाश में सैकड़ों छापे मारती रही, परंतु जनता के गहरे सहयोग और समर्थन के कारण वे बार-बार बचते रहे। अंततः उनके एक साथी नेत्रसेन के विश्वासघात के कारण 16 फरवरी 1933 ई. को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके ऊपर मुकदमा चला और 12 जनवरी 1934 ई. को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। उनकी शहादत के साथ बंगाल में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का एक दीर्घकालीन और अत्यंत गौरवपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

अन्य क्रांतिकारी घटनाएँ : उधम सिंह का बलिदान (1940 ई. )
बंगाल के बाहर भी भारतीय क्रांतिकारी संघर्ष जारी रहा। 22 जुलाई 1933 ई. को बंबई के कार्यवाहक गवर्नर होस्टन की फर्ग्युसन कॉलेज, पूना में एक छात्र द्वारा गोली मारकर हत्या करने का प्रयास किया गया। 13 मार्च 1940 ई. को लंदन के कैक्सटन हॉल में रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की एक बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें माइकल ओ’ड्वायर एक वक्ता के रूप में उपस्थित थे। ओ’ड्वायर ने जनरल रेजिनाल्ड डायर की गोलीकांड की कार्रवाई का पूर्ण समर्थन किया था और पंजाब में मार्शल लॉ लागू करने में भी उनकी प्रमुख भूमिका थी। इसी कारण भारतीय क्रांतिकारियों की दृष्टि में ओ’ड्वायर इस नरसंहार के लिए जनरल डायर जितने ही उत्तरदायी माने गए। इसी सभा में ऊधम सिंह ने अपनी बंदूक से गोली चलाकर माइकल ओ’ड्वायर की हत्या कर दी। इस कार्रवाई में लॉर्ड ज़ेटलैंड (भारत सचिव) सहित कुछ अन्य उपस्थित अधिकारी भी घायल हुए।
ऊधम सिंह ने इस घटना को जलियाँवाला बाग हत्याकांड का प्रतिशोध बताया और गिरफ्तारी के समय कोई प्रतिरोध नहीं किया। ब्रिटिश अदालत में मुकदमा चलाकर उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई और 31 जुलाई 1940 ई. को लंदन के पेंटनविले जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई।
उधम सिंह ने यह साहसिक कार्य उस दिन को याद करते हुए किया जब 13 अप्रैल 1919 ई. को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलाई गई थीं और सैकड़ों निर्दोष भारतीय मारे गए थे। 21 साल बाद उधम सिंह ने वह बदला लिया जिसकी तड़प हर भारतीय के मन में थी। उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 ई. को लंदन में फाँसी दे दी गई।
बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का मूल्यांकन
बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन- चाहे वह 1908 ई. के मुजफ्फरपुर बम कांड की पीढ़ी हो या 1930 ई. के चटगाँव विद्रोह की, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी अध्याय है। यह सत्य है कि इन जुझारू नवयुवकों की राजनीति जन-आंदोलन की राजनीति नहीं थी और वे जनता को व्यापक पैमाने पर संगठित और उद्वेलित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके। उनकी असफलता के कारण केवल ब्रिटिश दमन में नहीं, बल्कि इस तथ्य में भी थे कि वे व्यक्तिगत वीरता और गुरिल्ला संघर्ष से आगे बढ़कर जन-राजनीति की एक व्यापक रणनीति विकसित नहीं कर सके।
परंतु उनकी सीमाओं के बावजूद उनका योगदान अमूल्य और अविस्मरणीय है। उन्होंने समूचे देश में राष्ट्रवादी चेतना का संचार किया, ब्रिटिश सत्ता को यह अहसास दिलाया कि उनका साम्राज्य अजेय नहीं है, और भावी पीढ़ियों के लिए त्याग, साहस और बलिदान का एक अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा, जो बाद में गांधीवादी आंदोलन का भी हिस्सा बन गया, पहली बार इन्हीं जुझारू क्रांतिकारियों ने लगाया था। यही उनकी सबसे स्थायी और कालजयी विरासत है।


