क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (1922–1931 ई.) असहयोग आंदोलन के बाद क्रांतिकारी चेतना का जन्म 1922 […]

Table of Contents

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (1922–1931 ई.)

असहयोग आंदोलन के बाद क्रांतिकारी चेतना का जन्म

1922 ई. में चौरी-चौरा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के युवा और जुझारू वर्ग को गहरी निराशा और मानसिक संकट में डाल दिया। 4 फरवरी 1922 ई. को गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में एक भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी थी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए थे। इस हिंसक घटना को अपने अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन मानते हुए गांधीजी ने 12 फरवरी 1922 ई. को आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी। यह निर्णय लाखों उन युवाओं के लिए असह्य था जो इस आंदोलन को अपना सर्वस्व समझकर उसमें कूद पड़े थे।

काकोरी ट्रेन एक्शन के नायक रामप्रसाद बिस्मिल और सेंट्रल असेंबली बम कांड के नायक भगत सिंह सहित योगेशचंद्र चटर्जी, सूर्यसेन, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, शिववर्मा, भगवतीचरण वोहरा, जयदेव कपूर और जतिन दास लगभग सभी प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं ने गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की थी। असहयोग आंदोलन के दौरान 16 वर्षीय किशोर चंद्रशेखर जब पहली और अंतिम बार गिरफ्तार हुए थे, तब वे बार-बार ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगा रहे थे। आंदोलन की इस अचानक वापसी ने उन्हें एक नया रास्ता खोजने के लिए विवश किया।

स्वराजवादियों का संसदीय संघर्ष और अपरिवर्तनवादियों का रचनात्मक कार्यक्रम भी इन जुझारू नवयुवकों को आकृष्ट नहीं कर सका। अहिंसक आंदोलन की विचारधारा से उनका विश्वास उठ गया और उन्हें लगने लगा कि देश को केवल क्रांतिकारी मार्ग से ही मुक्त कराया जा सकता है। फलतः बंगाल, संयुक्त प्रांत और पंजाब में शिक्षित नवयुवक क्रांतिकारी तरीकों की ओर तेजी से आकृष्ट होने लगे। बंगाल में पुरानी अनुशीलन और युगांतर समितियाँ पुनः जाग उठीं और उत्तरी भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों में क्रांतिकारी संगठन बनने लगे।

इस पुनरोदय के पीछे केवल आंतरिक निराशा ही नहीं थी- अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं ने भी भारतीय युवाओं को गहरी प्रेरणा दी। 1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति, आयरलैंड के ईस्टर राइजिंग (1916 ई.) और सिन फीन आंदोलन तथा तुर्की के मुस्तफा कमाल पाशा के राष्ट्रीय संघर्ष ने यह सिद्ध कर दिया था कि सशस्त्र क्रांति के माध्यम से साम्राज्यवादी शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। समाजवादी और मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव भी इस चरण की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषता बन गई। क्रांतिकारी अब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं चाहते थे, वे पूँजीवाद, सामंतवाद और शोषण की समूची व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते थे।

साहित्यिक और वैचारिक मोर्चे पर भी इस आंदोलन की जड़ें गहरी हो रही थीं। 1922 ई. से ही ‘आत्मशक्ति’, ‘सारथी’ और ‘बिजली’ जैसी बांग्ला पत्रिकाओं में, जिनके संपादक प्रायः भूतपूर्व राजनीतिक कैदी होते थे, पुराने क्रांतिकारियों का गौरवगान करने वाले लेख और संस्मरण प्रकाशित होते थे। सचिन सान्याल की पुस्तक ‘बंदी जीवन’, जो हिंदी और गुरुमुखी में भी छपी थी, युवा पीढ़ी पर असाधारण प्रभाव डाल रही थी। बंगाल के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1926 में ‘पथेर दाबी’ प्रकाशित किया, जिसमें शहरी मध्यवर्गीय क्रांति की स्तुति की गई थी। इस उपन्यास को सरकार ने तत्काल प्रतिबंधित कर दिया, जिससे उसकी लोकप्रियता और भी बढ़ गई।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना और कार्यक्रम (1924 ई.)

उत्तर भारत में क्रांतिकारियों के संगठन की प्रक्रिया सबसे पहले आरंभ हुई। अक्टूबर 1924 ई. में कानपुर में एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) की स्थापना की गई। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में संयुक्त प्रांत में रहने वाले बांग्ला क्रांतिकारी सचिन सान्याल और योगेश चटर्जी के अलावा अशफाकउल्ला खाँ, रोशन सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनुभवी नेताओं के साथ भगत सिंह, शिव वर्मा, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा और चंद्रशेखर आजाद जैसे नए और प्रतिभाशाली नेता भी सम्मिलित हुए थे।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का मुख्य उद्देश्य था सशस्त्र क्रांति के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकना और भारत में एक संघीय गणतंत्र ‘संयुक्त राज्य भारत’ की स्थापना करना। 1925 ई. में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया था कि इसका उद्देश्य उन तमाम व्यवस्थाओं का उन्मूलन करना है जिनके अंतर्गत एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का शोषण करता है। संगठन ने रेलवे, परिवहन, इस्पात और जहाज निर्माण जैसे बड़े उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रखा, किसानों और मजदूरों के संगठन बनाने तथा संगठित हथियारबंद क्रांति के लिए काम करने का संकल्प लिया।

ब्रिटिश सरकार ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन पर तुरंत कड़ा प्रहार किया। संगठन के इश्तहारों और संविधान को लेकर बंगाल पहुँचे सचिन सान्याल को बाँकुड़ा में गिरफ्तार कर लिया गया। योगेश चटर्जी को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संविधान की ढेर सारी प्रतियों के साथ कानपुर में पकड़ा गया और हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। दोनों प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण रामप्रसाद बिस्मिल के कंधों पर उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का भी समूचा उत्तरदायित्व आ गया।

क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने के लिए धन की बड़ी आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से क्रांतिकारियों ने 7 मार्च 1925 ई. को बिचपुरी और 24 मई 1925 ई. को द्वारकापुर में दो राजनीतिक डकैतियाँ डालीं, किंतु दोनों से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ और दोनों में एक-एक व्यक्ति की जान भी गई। अंततः रामप्रसाद बिस्मिल ने 8 अगस्त 1925 ई. को शाहजहाँपुर में एक बैठक आयोजित कर ट्रेन से आने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई, जो इतिहास में ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के नाम से अमर हो गई।

काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925 ई.)

मुख्य लेख : काकोरी ट्रेन एक्शन

काकोरी ट्रेन एक्शन भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। 9 अगस्त 1925 ई. को शाहजहाँपुर के रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, मुरारी शर्मा और बनवारीलाल, बंगाल के राजेंद्र लाहिड़ी, सचिन सान्याल और केशव चक्रवर्ती (छद्मनाम), बनारस के चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त और औरैया के मुकुंदीलाल- कुल दस क्रांतिकारियों ने मिलकर इस एक्शन को अंजाम दिया।

योजनानुसार 9 अगस्त 1925 ई. को लखनऊ-सहारनपुर पैसेंजर रेलगाड़ी काकोरी रेलवे स्टेशन से आगे बढ़ी ही थी कि राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने जंजीर खींचकर गाड़ी रोक दी। बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाकउल्ला खाँ, चंद्रशेखर आजाद और उनके छह साथियों ने रेलगाड़ी पर धावा बोल दिया। जर्मनी के बने चार माउजर पिस्तौल इस एक्शन में काम में लाए गए। सरकारी खजाने का चमड़े का थैला जब्त कर लिया गया। इसी दौरान एक गोली लगने से अहमद अली नामक एक यात्री की मृत्यु हो गई, जो क्रांतिकारियों के लिए एक अनपेक्षित और दुखद घटना थी। जल्दबाजी में एक चादर घटनास्थल पर छूट गई, जो पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण सुराग बनी।

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और ठाकुर रोशनसिंह

ब्रिटिश सरकार ने इस एक्शन को बड़ी गंभीरता से लिया। गिरफ्तारी के लिए 5,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया और इश्तहार सभी रेलवे स्टेशनों और पुलिस थानों पर चिपकाए गए। तीन महीने के भीतर 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि वास्तव में इस एक्शन में केवल दस क्रांतिकारी शामिल थे। ब्रिटिश पुलिस अपनी समस्त कोशिशों के बावजूद चंद्रशेखर आजाद को कभी गिरफ्तार नहीं कर सकी।

‘काकोरी षड्यंत्र केस’ का अंतिम निर्णय 22 अगस्त 1927 ई. को सुनाया गया। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खाँ, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी की सजा दी गई। शचींद्रनाथ सान्याल, योगेशचंद्र चटर्जी, मुकुंदीलाल और गोविंदचरण को आजीवन कारावास मिला। मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष, सुरेश भट्टाचार्य, विष्णुशरण दुब्लिश और रामकृष्ण खत्री को 10 वर्ष की सजा दी गई। एक दिलचस्प प्रसंग यह है कि प्रणवेश चटर्जी की 5 वर्ष की सजा उनके सुंदर हस्तलेख के कारण घटाकर 4 वर्ष कर दी गई।

मदन मोहन मालवीय, ठाकुर मनजीत सिंह राठौर और बैरिस्टर मोहनलाल सक्सेना ने मृत्युदंड-प्राप्त कैदियों की सजा उम्रकैद में बदलवाने के भरसक प्रयास किए, परंतु वे सफल नहीं हो सके। अंततः 17 दिसंबर 1927 ई. को राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को गोंडा जेल में फाँसी दी गई। 19 दिसंबर 1927 ई. को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में, ठाकुर रोशन सिंह को प्रयागराज की नैनी जेल में और अशफाकउल्ला खाँ को फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका दिया गया। फाँसी के फंदे को चूमते हुए बिस्मिल के होठों पर शब्द थे : “मैं अंग्रेजी राज्य के पतन की कामना करता हूँ।” रोशन सिंह वंदे मातरम गाते हुए शहीद हो गए। अशफाकउल्ला खाँ ने अपने अंतिम क्षणों में कहा: “आप सब एक होकर नौकरशाही का सामना कीजिए। मैं हत्यारा नहीं हूँ जैसा कि मुझे साबित किया गया।” रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खाँ की यह जोड़ी हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अमर और प्रेरणादायी प्रतीक बन गई।

नौजवान भारत सभा की स्थापना और कार्यक्रम (1926 ई.)

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में पंजाब के नवयुवकों द्वारा स्थापित ‘नौजवान भारत सभा’ की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक भूमिका रही है। इस सभा की स्थापना मार्च 1926 ई. में लाहौर में भगत सिंह ने भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव, यशपाल, छबीलदास और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर की थी। भगत सिंह सभा के सचिव और भगवतीचरण वोहरा प्रचार मंत्री बने। भगवतीचरण वोहरा ने सभा का ऐतिहासिक घोषणापत्र अंग्रेजी में तैयार किया था, जो उनकी वैचारिक परिपक्वता, दूरदर्शिता और सशक्त लेखन शैली का प्रमाण था। उनकी लघु पुस्तिका ‘मैसेज ऑफ इंडिया’ पंजाब के नवयुवकों में काफी लोकप्रिय थी। सभा के अन्य प्रमुख सदस्यों में केदारनाथ सहगल, सोढ़ी पिंडीदास, आनंदकिशोर मेहता, अब्दुल मजीद, मुहम्मद तुफैल, एहसान इलाही, गोपाल सिंह कौमी और कपिलदेव शर्मा शामिल थे।

नौजवान भारत सभा का मुख्य उद्देश्य पंजाब के युवा छात्रों और कार्यकर्ताओं में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रसार करना था। सभा एक स्वतंत्र मजदूर-किसान राज्य की स्थापना के लिए संघर्षरत थी। भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में दलित, शोषित और गरीब तबके के व्यापक जन-आंदोलन का विकास करना चाहते थे। इसीलिए इस सभा ने पहली बार स्वतंत्रता के बाद समाजवादी समाज की स्थापना की सुनिश्चित योजना प्रस्तुत की। भगत सिंह कहा करते थे: “गाँव और कारखाने ही वास्तविक क्रांतिकारी सेनाएँ हैं।”

सभा ने अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए नैतिक, साहित्यिक और सामाजिक विषयों पर बहसें आयोजित कीं और देशभक्ति, एकता, स्वदेशी वस्तुओं तथा भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान आयोजित किए। सभा की बैठकों में पंडित जवाहरलाल नेहरू, भूपेंद्रनाथ दत्त और श्रीपाद अमृत डांगे जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने भी भाषण दिए। भगत सिंह ने स्वयं सचिन सान्याल की पुस्तक ‘बंदी जीवन’ का पंजाबी में अनुवाद किया।

भगत सिंह और सुखदेव ने सभा के तत्त्वावधान में खुले तौर पर काम करने के लिए ‘लाहौर छात्र संघ’ का गठन किया, जो नौजवान भारत सभा की सहयोगी संस्था थी। अप्रैल 1928 ई. में अमृतसर में एक सम्मेलन में नौजवान सभा ने ‘किर्ती किसान पार्टी’ के साथ मिलकर पंजाब के प्रत्येक गाँव में शाखाएँ खोलने का निर्णय किया। सभा ने साइमन कमीशन (1928 ई.) का विरोध किया, जून 1928 ई. में बारदोली सत्याग्रह का समर्थन किया, रूस के साथ ‘मित्रता सप्ताह’ मनाया और काकोरी कांड की याद में ‘काकोरी दिवस’ मनाने की परंपरा शुरू की। सभा का दूसरा अधिवेशन फरवरी 1929 ई. में लाहौर में हुआ। सभा ने 13 अप्रैल 1929 ई. को जलियांवाला बाग हत्याकांड की दसवीं बरसी पर अमृतसर में अपना प्रथम प्रांतीय सम्मेलन आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता केदारनाथ सहगल ने की। लाहौर षड्यंत्र केस के बाद 3 मई 1930 को इस सभा को राजद्रोहात्मक सभा कानून के अंतर्गत अवैध घोषित कर दिया गया।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना (1928 ई.)

काकोरी ट्रेन एक्शन उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के लिए एक गहरा आघात था, किंतु यह उनकी ऊर्जा को कुचल नहीं सका। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को पुनः संगठित करने की दिशा में अथक परिश्रम किया। उन्होंने पंजाब, संयुक्त प्रांत, राजपूताना, बिहार और उड़ीसा के जुझारू नवयुवकों को संगठन से जोड़ा और भगत सिंह के नेतृत्व में उभर रहे युवा समूह के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए। इसी क्रम में 8-9 सितंबर 1928 ई. को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के मैदान में उत्तर भारत के प्रमुख क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में विजयकुमार सिन्हा, भगत सिंह, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, सुखदेव, कुंदनलाल, फणींद्रनाथ घोष, मनमोहन बनर्जी, सुरेंद्र पांडेय और ब्रह्मदत्त मिश्र शामिल हुए। सुरक्षा कारणों से चंद्रशेखर आजाद इस बैठक में सम्मिलित नहीं हुए थे।

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

इस बैठक में भगत सिंह ने अपनी नौजवान भारत सभा का हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में विलय कर दिया और व्यापक विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) रख दिया गया। ‘सोशलिस्ट’ शब्द का जोड़ा जाना इस बात का प्रतीक था कि क्रांतिकारी अब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट नहीं थे- वे एक ऐसे समाज की स्थापना चाहते थे जहाँ किसी भी प्रकार का शोषण संभव न हो। ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का अंतिम उद्देश्य था- भारत को स्वाधीन कराना और यहाँ एक समाजवादी गणतंत्र की स्थापना करना।

‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने अपने संचालन के लिए तीन विभागों का गठन किया। संगठन का दायित्व विजयकुमार सिन्हा को, प्रचार का दायित्व भगत सिंह को और सामरिक विभाग का दायित्व चंद्रशेखर आजाद को सौंपा गया। ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने जनता को अपनी विचारधारा से अवगत कराने के लिए ‘द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब’ (बम का दर्शन) नामक एक विचारोत्तेजक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसे चंद्रशेखर आजाद के अनुरोध पर भगवतीचरण वोहरा ने तैयार किया था। ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने घोषणा की थी : “आतंकवाद पूर्ण क्रांति नहीं है और क्रांति आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं होती। आतंकवाद शोषणकर्ताओं के दिल में भय बैठा देता है, शोषित जनता के मन में मुक्ति की आशा जगा देता है और शासक वर्ग की श्रेष्ठता के जादू को तोड़ डालता है।” ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का नारा था: “हम दया की भीख नहीं माँगते। हमारी लड़ाई आखिरी फैसले तक चलेगी — यह फैसला है जीत या मौत।”

सॉण्डर्स हत्याकांड और लाला लाजपत राय का बदला (17 दिसंबर 1928 ई.)

1928 ई. का वर्ष क्रांतिकारी आंदोलन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। साइमन कमीशन के लाहौर आगमन (30 अक्टूबर 1928 ई.) के विरोध में प्रदर्शन कर रहे पंजाब के अनुभवी नेता लाला लाजपत राय पर ब्रिटिश पुलिस के सहायक अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर क्रूर लाठीचार्ज किया गया। गंभीर रूप से घायल लाला जी कुछ ही दिन जीवित रहे और 17 नवंबर 1928 ई. को उनका निधन हो गया। यह घटना भगत सिंह और उनके साथियों की दृष्टि में ‘राष्ट्र का अपमान’ थी, जिसका उत्तर ‘खून का बदला खून’ था।

‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के तीन सदस्यों- भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु ने जेम्स ए. स्कॉट को मारने की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 ई. को जब वे इस योजना को अंजाम देने गए, तो पहचान में धोखा हो गया और स्कॉट के बजाय सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सॉण्डर्स और उसके पीछे भागे रीडर चरण सिंह को गोलियों से भून दिया गया। अगले दिन लाहौर की दीवारों पर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का एक इश्तहार चिपका हुआ मिला, जिसमें लिखा था : “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध ले लिया है।” क्रांतिकारियों ने इस हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए कहा: “हमें सॉण्डर्स की हत्या का अफसोस है, किंतु वह उस अमानवीय व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं।”

हत्या के बाद भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद वीरांगना दुर्गा भाभी (भगवतीचरण वोहरा की पत्नी, जिन्होंने भगत सिंह को अपने पति के रूप में प्रस्तुत कर उनकी मदद की) के साथ लाहौर से कलकत्ता मेल में सवार होकर सुरक्षित निकल गए। यह घटना भारतीय इतिहास में एक स्त्री के साहस और बुद्धिमत्ता का अनुपम उदाहरण है।

सेंट्रल असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929 ई.)

सॉण्डर्स हत्याकांड के बाद HSRA के नेताओं ने एक बड़े और राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण कदम की योजना बनाई। ब्रिटिश सरकार दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ (जन सुरक्षा विधेयक) और ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ (औद्योगिक विवाद विधेयक) पारित कराने की तैयारी कर रही थी। ये विधेयक देश में उठते युवा आंदोलन को कुचलने और मजदूरों को हड़ताल के अधिकार से वंचित रखने के लिए बनाए जा रहे थे। असेंबली के अनेक सदस्य इन दमनकारी विधेयकों के विरुद्ध थे, परंतु वायसरॉय इन्हें अपने विशेषाधिकार से पारित करा लेना चाहता था।

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
सेंट्रल असेंबली बमकांड

‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने निर्णय किया कि इन दमनकारी कानूनों के विरुद्ध एक ऐसा नाटकीय विरोध किया जाए जो पूरे देश और विश्व का ध्यान आकृष्ट करे। इस कार्य के लिए पहले बटुकेश्वर दत्त और विजयकुमार सिन्हा को चुना गया था, किंतु भगत सिंह ने स्वयं यह दायित्व लेने का निर्णय किया।

8 अप्रैल 1929 ई. को जब वायसरॉय दमनकारी विधेयकों को कानूनी रूप देने की घोषणा करने के लिए उठा, उसी क्षण भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त खड़े हो गए। भगत सिंह ने पहला बम और दत्त ने दूसरा बम सदन के खाली हिस्से में फेंका। पर्चे हवा में उड़ाते हुए दोनों ने “इंकलाब जिंदाबाद”, “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” और “दुनिया भर के मजदूरो एक हो” के नारे लगाए। धमाके से असेंबली में अफरा-तफरी मच गई। जॉर्ज शुस्टर अपनी मेज के नीचे छिप गए। सार्जेंट टेरी भय से इतना काँप उठा कि वह उन्हें गिरफ्तार तक नहीं कर सका।

बमों को जानबूझकर इस प्रकार बनाया गया था कि किसी को चोट न आए। उन्हें सदन के खाली हिस्से में फेंका गया था। इस घटना का एकमात्र उद्देश्य था- क्रांतिकारियों के पर्चे के शब्दों में : “बहरों को सुनाना।” भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, किंतु उन्होंने जानबूझकर अपने आप को गिरफ्तार करा लिया, क्योंकि वे क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए अदालत को एक मंच के रूप में उपयोग करना चाहते थे। जवाहरलाल नेहरू ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए लिखा: “यह बम देशवासियों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए एक बहुत बड़ा धमाका था।”

भगत सिंह के मुकदमे, जतिन दास की शहादत और लाहौर षड्यंत्र केस

सेंट्रल असेंबली बम कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन पर तीखा प्रहार किया। राजगुरु, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के अनेक सदस्यों को गिरफ्तार किया गया। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को केवल असेंबली बम कांड के आधार पर फाँसी नहीं दी जा सकती थी, इसलिए सॉण्डर्स हत्याकांड को भी इस मुकदमे से जोड़ दिया गया।

इन क्रांतिकारियों ने अदालत में दिए गए अपने निर्भीक बयानों और अवज्ञापूर्ण व्यवहार से जनता का हृदय जीत लिया। जेलों की अमानवीय परिस्थितियों और राजनीतिक कैदियों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। इस दौरान 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद बांग्ला क्रांतिकारी जतिन दास 13 सितंबर 1929 ई. को लाहौर जेल में शहीद हो गए। जतिन दास की शहादत का देश के युवा वर्ग पर असाधारण प्रभाव पड़ा। युवक और विद्यार्थी संगठनों की सदस्यता में तीव्र वृद्धि हुई।

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
सरदार भगतसिंह

लाहौर षड्यंत्र केस ने समूचे देश का ध्यान आकृष्ट किया। नौ महीने तक अदालत में फैसला नहीं हो सका तो गवर्नर जनरल ने अध्यादेश द्वारा एक विशेष अदालत का गठन किया, जिसके फैसले के विरुद्ध किसी अन्य न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती थी। 26 अगस्त 1930 ई. को अदालत ने अपना फैसला सुनाया और 7 अक्टूबर 1930 ई. को यह फैसला जेल में पहुँचा। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड तथा कमलनाथ तिवारी, विजयकुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गयाप्रसाद कटियार, किशोरलाल और महावीर सिंह को आजीवन कारावास की सजा दी गई।

मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई, जिससे पूरे देश में उत्तेजना फैल गई। प्रिवी परिषद में अपील की गई, जो 10 जनवरी 1931 ई. को रद्द कर दी गई। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने 14 फरवरी 1931 ई. को वायसरॉय से मानवता के आधार पर सजा माफी की अपील की। 17 फरवरी 1931 ई. को गांधीजी ने भी सजा माफ कराने का प्रयास किया, परंतु ब्रिटिश सरकार पर इन अपीलों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मृत्युदंड के लिए 24 मार्च 1931 ई. की सुबह निर्धारित थी, किंतु जनाक्रोश से भयभीत सरकार ने एक दिन पहले ही 23 मार्च 1931 ई. की शाम को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया और रात के अंधेरे में सतलज नदी के किनारे फिरोजपुर में उनका अंतिम संस्कार कर दिया। फाँसी के लिए जाते समय तीनों के होठों पर गीत था :

“दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत,

मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।”

भगत सिंह की शहादत पर देशभर में शोक और आक्रोश की लहर फैल गई। लाहौर के दैनिक ‘ट्रिब्यून’ और न्यूयॉर्क के ‘डेली वर्कर’ ने इस खबर को मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किया। लाहौर के उर्दू समाचारपत्र ‘पयाम’ ने लिखा : “हिंदुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रिटेन से ऊँचा समझता है। ओ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव! तुम जिंदा हो और हमेशा जिंदा रहोगे।” सुभाषचंद्र बोस ने कहा : “भगत सिंह जिंदाबाद और इंकलाब जिंदाबाद का एक ही अर्थ है।” गांधीजी ने भी स्वीकार किया : “हमारे मस्तक भगत सिंह की देशभक्ति, साहस और बलिदान के आगे झुक जाते हैं।” दक्षिण भारत में रामास्वामी पेरियार नायकर ने अपने साप्ताहिक पत्र ‘कुडई आरसू’ में भगत सिंह के लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ पर संपादकीय लिखकर उनकी शहादत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर विजय के रूप में रेखांकित किया।

भगत सिंह का क्रांतिकारी दर्शन और समाजवादी विचार

भगत सिंह केवल एक साहसी क्रांतिकारी नहीं थे- वे अपने युग के एक असाधारण बुद्धिजीवी और विचारक भी थे। उन्होंने समाजवाद, मार्क्सवाद, सोवियत संघ और क्रांतिकारी आंदोलनों से संबंधित बहुत-सी पुस्तकों का गहराई से अध्ययन किया था। जेल में रहते हुए उन्होंने निरंतर पढ़ना-लिखना जारी रखा। उनके लेख और पत्र उनके विचारों के जीवंत दर्पण हैं।

भगत सिंह ने समाजवाद की एक स्पष्ट और वैज्ञानिक परिभाषा दी- इसका अर्थ पूँजीवाद और वर्ग-प्रभुत्व का सम्पूर्ण अंत है। उन्होंने लिखा: “किसानों को केवल विदेशी शासन से ही नहीं, बल्कि जमींदारों और पूँजीपतियों के शोषण से भी मुक्त कराना होगा।” 3 मार्च 1931 ई. को भेजे गए अपने अंतिम संदेश में उन्होंने घोषणा की : “भारत में संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कि मुट्ठीभर शोषक अपने स्वार्थ के लिए साधारण जनता की मेहनत का शोषण करते रहेंगे। इस बात का कोई विशेष महत्त्व नहीं है कि शोषणकर्ता अंग्रेज हैं, भारतीय-अंग्रेज गठबंधन है या पूरी तरह भारतीय।”

भगत सिंह ने लाहौर न्यायालय के समक्ष कहा था : “क्रांति की तलवार में धार वैचारिक पत्थर पर रगड़ने से ही आती है।” 4 जून 1929 ई. को सेशन जज के समक्ष बटुकेश्वर दत्त के साथ दिए बयान में उन्होंने स्पष्ट किया : “क्रांति से हमारा आशय बम और पिस्तौल नहीं है। क्रांति का अर्थ है अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था को बदलना, मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करना और राष्ट्र के लिए पूर्ण आत्म-निर्णय का अधिकार प्राप्त करना।”

भगत सिंह ने 2 फरवरी 1931 ई. को अपने नौजवान साथियों के नाम एक ऐतिहासिक पत्र में लिखा : “देखने में मैंने एक आतंकवादी की तरह काम किया है, किंतु मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं यह पूरी शक्ति से घोषित करना चाहूँगा कि मैं आतंकवादी नहीं था और मुझे विश्वास है कि इन विधियों से हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते।” 19 अक्टूबर 1929 ई. को पंजाब विद्यार्थी सम्मेलन में उन्होंने लिखा : “हम युवकों को बम और पिस्तौल उठाने की सलाह नहीं देते। उन्हें लाखों मजदूरों और गाँवों के गरीब किसानों के पास क्रांति का संदेश ले जाना चाहिए।”

भगत सिंह पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक चेतना से लैस क्रांतिकारी थे। वे अपने साथियों से कहते थे कि सांप्रदायिकता उपनिवेशवाद जितना ही बड़ा शत्रु है। नौजवान भारत सभा के प्रथम सचिव के रूप में उन्होंने सांप्रदायिक संगठनों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने और लोगों में धार्मिक सहिष्णुता की भावना जगाने का नियम बनाया था। अपनी मृत्यु से कुछ पहले जेल में उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ शीर्षक से एक ऐतिहासिक लेख लिखा, जो 27 सितंबर 1931 ई. को लाहौर के समाचारपत्र ‘दि पीपुल’ में प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने धर्म की आलोचना की और ईश्वर के अस्तित्व पर तर्कपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने घोषित किया कि प्रगति के लिए संघर्षरत प्रत्येक व्यक्ति को अंधविश्वासों की आलोचना करनी होगी और पुरातनपंथी विचारों को तर्क की कसौटी पर परखना होगा।

चंद्रशेखर आजाद और क्रांतिकारी दल का अंतिम संघर्ष

भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद चंद्रशेखर आजाद ने क्रांतिकारी दल का कार्य यशपाल और भगवतीचरण वोहरा के साथ अविराम जारी रखा। 23 दिसंबर 1929 ई. को निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप वायसरॉय लॉर्ड इरविन की विशेष ट्रेन को उड़ाने का प्रयास किया गया, किंतु वायसरॉय उस हमले में बच गया। 23 दिसंबर 1930 ई. को हरिकिशन ने पंजाब के गवर्नर को गोली मारी, जिससे वह घायल हो गया। इस कांड में हरिकिशन को मृत्युदंड की सजा दी गई।

क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय (Revival of the Revolutionary Movement)
चंद्रशेखर आजाद

27 फरवरी 1931 ई. को प्रयागराज (इलाहाबाद) के कंपनी बाग (अल्फ्रेड पार्क) में पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद को घेर लिया। घंटों चले मुठभेड़ में आजाद ने अपनी पिस्तौल की अंतिम गोली स्वयं को मार ली और जीवित नहीं पकड़े गए। उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे कभी जीवित पकड़े नहीं जाएंगे और उन्होंने उसे अंत तक निभाया। उनकी शहादत के साथ एक युग समाप्त हो गया।

आजाद की मृत्यु के बाद यशपाल ने इलाहाबाद को पुनः संगठित करने का प्रयास किया, किंतु 23 जनवरी 1932 ई. को उन्हें भी इलाहाबाद में गिरफ्तार कर लिया गया और 14 वर्ष की सजा दी गई। गोविंद वल्लभ पंत के प्रयत्नों से यशपाल 1938 ई. में रिहा हुए और बाद में हिंदी साहित्य के महान उपन्यासकार बने।

क्रांतिकारी आंदोलन के पुनरोदय का ऐतिहासिक मूल्यांकन

क्रांतिकारी आंदोलन का यह दूसरा चरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आंदोलन केवल व्यक्तिगत वीरता या आतंकवाद तक सीमित नहीं था- इसमें समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, साम्राज्यवाद-विरोध और जन-आंदोलन की व्यापक अवधारणा समाहित थी। भगत सिंह, बिस्मिल और अशफाकउल्ला खाँ जैसे नेताओं ने अपने जीवन और विचारों से यह सिद्ध किया कि धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज का निर्माण संभव है।

इस आंदोलन ने ब्रिटिश सत्ता की नींव को हिलाया, लाखों युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी के लिए प्रेरित किया और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई वैचारिक गहराई और दिशा प्रदान की। यह इन महान बलिदानियों की सबसे स्थायी और अमर विरासत है।

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के पुनरोदय से समबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. प्रश्न: भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय कब हुआ?

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का पुनरोदय मुख्यतः 1920 के दशक के मध्य में हुआ। 1922 ई. में असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद अनेक युवा राष्ट्रवादी निराश हुए और उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी मार्ग अपनाया।

2. प्रश्न: क्रांतिकारी आंदोलन के पुनरोदय के प्रमुख कारण क्या थे?

इसके प्रमुख कारणों में असहयोग आंदोलन की वापसी, औपनिवेशिक दमन, युवाओं में बढ़ता असंतोष, रूसी क्रांति का प्रभाव, समाजवादी विचारों का प्रसार तथा अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय आंदोलनों से प्रेरणा शामिल थे।

3. प्रश्न: हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) क्या था?

1924 में रामप्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेशचंद्र चटर्जी आदि ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का गठन किया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करके एक स्वतंत्र गणराज्य की स्थापना करना था।

4. प्रश्न: काकोरी कांड का क्रांतिकारी आंदोलन में क्या महत्त्व था?

9 अगस्त 1925 ई. को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के क्रांतिकारियों ने काकोरी के निकट सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर सरकारी धन पर कब्जा किया। काकोरी कांड के बाद व्यापक गिरफ्तारियाँ हुईं और रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी तथा रोशन सिंह को फाँसी दी गई।

5. प्रश्न: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का गठन क्यों किया गया?

1928 ई. में क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पुनर्गठन करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बनाया। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव और अन्य क्रांतिकारी इससे जुड़े। संगठन ने क्रांति को समाजवाद और साम्राज्यवाद-विरोध से जोड़ा।

6. प्रश्न: क्रांतिकारी आंदोलन के पुनरोदय की प्रमुख घटनाएँ कौन-सी थीं?

इस चरण की प्रमुख घटनाओं में काकोरी कांड (1925 ई.), सांडर्स की हत्या (1928 ई.), केंद्रीय विधान सभा बम कांड (1929 ई.) और चटगाँव शस्त्रागार छापा (1930 ई.) शामिल हैं। इस चरण में क्रांतिकारियों ने धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और औपनिवेशिक शासन के विरोध को विशेष महत्त्व दिया।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks