प्लूटार्क (Plutarch)

प्लूटार्क (Plutarch)
प्लूटार्क (लगभग 46 ई. पू.–120 ई. के पश्चात्) मुख्य लेख : रोमन सभ्यता प्लूटार्क प्राचीन […]

प्लूटार्क (लगभग 46 ई. पू.–120 ई. के पश्चात्)

मुख्य लेख : रोमन सभ्यता

प्लूटार्क प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक, इतिहासकार, जीवनीकार, निबंधकार तथा डेल्फी स्थित अपोलो मंदिर के पुजारी थे। वे मध्य प्लेटोनिक दार्शनिक परंपरा के प्रमुख प्रतिनिधियों में गिने जाते हैं। उनकी ख्याति मुख्यतः ‘पैरेलल लाइव्स’ और ‘मोरालिया’ जैसी कालजयी कृतियों के कारण है। रोमन नागरिकता प्राप्त करने के पश्चात् उनका नाम संभवतः लूसियस मेस्ट्रियस प्लूटार्कस हो गया था, जो उनके रोमन संरक्षक के सम्मान में अपनाया गया था। प्लूटार्क का जन्म यूनान के बोयोटिया क्षेत्र के चैरोनिया नगर में एक प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में हुआ था, जिसका इस नगर से कई पीढ़ियों से गहरा संबंध था। उनके पिता का नाम ऑटोबुलस तथा पितामह का नाम लैम्प्रियास था। उनके दो भाई- टिमोन और लैम्प्रियास  का उल्लेख उनकी अनेक रचनाओं में मिलता है, विशेष रूप से टिमोन के प्रति उनके आत्मीय भाव उनके संवादों और निबंधों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् प्लूटार्क ने लगभग 66–67 ईस्वी में एथेंस जाकर प्रसिद्ध दार्शनिक अम्मोनियस के निर्देशन में गणित, दर्शन तथा साहित्य का अध्ययन किया। एथेंस उस समय यूनानी बौद्धिक परंपरा का प्रमुख केंद्र था और वहीं से उनके चिंतन को नई दिशा मिली। उन्होंने विभिन्न दार्शनिक मतों का अध्ययन किया, किंतु प्लेटो की परंपरा से विशेष रूप से प्रभावित हुए और आगे चलकर मध्य प्लेटोनिक विचारधारा के प्रमुख प्रवक्ता बन गए।

सार्वजनिक जीवन और रोमन संबंध

एथेंस में शिक्षा के दौरान ही प्लूटार्क ने डेल्फी में आयोजित पायथियन खेलों में भाग लिया, जहाँ सम्राट नीरो भी उपस्थित था। इसी काल में उनका परिचय अनेक प्रभावशाली रोमन अधिकारियों और राजनेताओं से हुआ। परवर्ती काल में उन्हें रोमन नागरिकता प्राप्त हुई, जिसके पीछे रोमन अधिकारी लूसियस मेस्ट्रियस फ्लोरस का संरक्षण था। इसी कारण उन्होंने अपने नाम के साथ ‘मेस्ट्रियस’ जोड़ा। इसके बाद वे संभवतः रोमन समाज के प्रतिष्ठित इक्वेस्ट्रियन वर्ग से भी संबद्ध हो गए।

लगभग 70 ईस्वी में वे फ्लोरस के साथ रोम गए। इस यात्रा ने उन्हें रोमन राजनीति, प्रशासन और अभिजात वर्ग के निकट आने का अवसर दिया। फ्लोरस उनकी प्रसिद्ध जीवनी ‘ओथो का जीवन’ की ऐतिहासिक सामग्री का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत भी थे। उनके घनिष्ठ संबंध कई प्रतिष्ठित रोमन राजनेताओं से थे, जिनमें क्विंटस सोसियस सेनेसियो, टाइटस एविडियस क्विएटस तथा अरुलेनस रस्टिकस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

डेल्फी में धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान

यद्यपि प्लूटार्क ने समय-समय पर रोम और अन्य स्थानों की यात्राएँ कीं, तथापि उन्होंने अपना अधिकांश जीवन जन्मस्थान चैरोनिया में व्यतीत किया। वे यूनानी धर्म और परंपराओं के प्रति अत्यंत श्रद्धालु थे तथा अपोलो के धार्मिक अनुष्ठानों में दीक्षित थे; यह भी माना जाता है कि उन्होंने प्रसिद्ध एल्यूसिनियन रहस्य-अनुष्ठानों में भी भाग लिया, जिन्हें प्राचीन यूनान के सर्वाधिक प्रतिष्ठित धार्मिक संस्कारों में गिना जाता था।

लगभग 95 ईस्वी में प्लूटार्क को डेल्फी स्थित अपोलो मंदिर के दो प्रमुख पुजारियों में से एक नियुक्त किया गया। उस समय डेल्फी का धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व पूर्व की अपेक्षा कम हो चुका था, किंतु प्लूटार्क ने मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक केंद्रों के पुनरुत्थान में सक्रिय भूमिका निभाई। सम्राटों तथा स्थानीय संरक्षकों के सहयोग से वहाँ व्यापक निर्माण-कार्य हुए, जिनमें उनका उल्लेखनीय योगदान था।

इस योगदान के सम्मान में डेल्फी में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई थी- एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि डेल्फी और चैरोनिया के नागरिकों ने संयुक्त रूप से एम्फिक्टियोनिक परिषद् के निर्णय के अनुसार यह सम्मान प्रदान किया। डेल्फी के पुरातात्त्विक संग्रहालय में सुरक्षित एक दार्शनिक की संगमरमर की मूर्ति को कभी प्लूटार्क की प्रतिमा माना जाता था, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इस पहचान को निश्चित रूप से स्वीकार नहीं करते।

प्रशासनिक दायित्व

डेल्फी के पुजारी होने के साथ-साथ प्लूटार्क ने चैरोनिया के सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। युवावस्था में उन्होंने कई अवसरों पर अपने नगर का प्रतिनिधित्व राजनयिक और प्रशासनिक कार्यों में किया, और चैरोनिया के आर्कन (प्रमुख नगर-अधिकारी) भी रहे। यह पद सामान्यतः एक वर्ष के लिए होता था, किंतु प्रतीत होता है कि उन्होंने यह दायित्व एक से अधिक बार निभाया।

लगभग 107 से 127 ईस्वी के बीच वे कई बार एम्फिक्टियोनिक लीग के एपिमेलेट्स (प्रबंधक) नियुक्त किए गए, जिस पद पर वे डेल्फी में आयोजित प्रसिद्ध पायथियन खेलों के संगठन के लिए उत्तरदायी थे। इसका उल्लेख उन्होंने स्वयं अपनी रचना ‘क्या किसी वृद्ध व्यक्ति को सार्वजनिक कार्यों में भाग लेना चाहिए?’ में किया है।

आठवीं–नौवीं शताब्दी के इतिहासकार जॉर्ज सिन्सेलस के अनुसार जीवन के अंतिम वर्षों में सम्राट हैड्रियन ने प्लूटार्क को अकाया का मानद प्रोक्यूरेटर नियुक्त किया था, जिसके साथ उन्हें कौंसल के औपचारिक वस्त्र और राजचिह्न धारण करने का विशेष अधिकार भी प्राप्त हुआ। यद्यपि इस विवरण की पूर्ण ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हो सकी, इससे उनके समकालीन सम्मान का अनुमान लगाया जा सकता है।

पारिवारिक जीवन

प्लूटार्क का पारिवारिक जीवन अत्यंत स्नेहपूर्ण था। उनकी पत्नी टिमॉक्सेना से उन्हें कम से कम चार पुत्र और एक पुत्री हुई; दुर्भाग्यवश दो बच्चों का निधन बाल्यावस्था में ही हो गया। अपनी माता के नाम पर रखी गई दो वर्षीया पुत्री टिमॉक्सेना की मृत्यु पर उन्होंने पत्नी को एक प्रसिद्ध सांत्वना-पत्र लिखा, जिसमें धैर्य और संयम बनाए रखने की प्रेरणा दी गई है तथा जिसमें उन्होंने अपने छोटे पुत्र चैरोन के असामयिक निधन का भी उल्लेख किया है।

उनकी अनेक रचनाओं में पुत्रों ऑटोबुलोस और प्लूटार्क का उल्लेख मिलता है, प्लेटो के ग्रंथ ‘टिमायस’ पर लिखी उनकी व्याख्या इन्हीं दोनों को समर्पित थी। उनका एक अन्य पुत्र सोक्लारोस भी माना जाता है, जिसका नाम उनके घनिष्ठ मित्र टिथोरा के सोक्लारोस के सम्मान में रखा गया था। बोयोटिया से प्राप्त एक अभिलेख में लूसियस मेस्ट्रियस सोक्लारोस नामक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है, जिसे कुछ विद्वान प्लूटार्क के परिवार से संबंधित मानते हैं।

परंपरा के अनुसार प्लूटार्क की रचनाओं की सूची का संकलन उनके पुत्र लैम्प्रियास ने किया था, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इसे पूर्णतः प्रमाणित नहीं मानते। यह स्पष्ट है कि उनका परिवार कई पीढ़ियों तक यूनान में प्रतिष्ठित बना रहा। रोमन लेखक एपुलियस ने अपने उपन्यास ‘द गोल्डन ऐस’ में नायक को प्लूटार्क का वंशज बताकर उनकी प्रतिष्ठा का संकेत दिया है।

प्लूटार्क की मृत्यु

प्लूटार्क की मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उनका निधन लगभग 120 ईस्वी के पश्चात्, संभवतः 125 ईस्वी के आसपास हुआ था। यह निर्विवाद है कि उन्होंने प्रथम और द्वितीय शताब्दी ईस्वी के संधिकाल में इतिहास, दर्शन, जीवनी-लेखन और नैतिक चिंतन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया।

प्लूटार्क की रचनाएँ
पैरेलल लाइव्स

प्लूटार्क की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘पैरेलल लाइव्स’ है, जिसमें यूनान और रोम के महान व्यक्तियों की तुलनात्मक जीवनियाँ प्रस्तुत की गई हैं। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि विभिन्न व्यक्तित्वों के चरित्र, नैतिक गुणों, नेतृत्व-क्षमता तथा जीवन-दृष्टि की तुलना करके पाठकों को नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा देना था। अधिकांश जीवनियाँ एक यूनानी और एक रोमन व्यक्तित्व के युग्म के रूप में व्यवस्थित हैं, जिससे उनके समान गुणों, दुर्बलताओं और उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।

प्लूटार्क ने अपनी भूमिका में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य इतिहास-लेखन नहीं, बल्कि चरित्र-चित्रण था। उनके अनुसार किसी व्यक्ति के जीवन की छोटी-छोटी घटनाएँ, व्यवहार और निर्णय उसके व्यक्तित्व को समझने में बड़ी राजनीतिक या सैन्य उपलब्धियों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने स्वयं को एक इतिहासकार से अधिक एक चित्रकार के समान माना, जो बाह्य व्यक्तित्व, आचरण, नैतिकता, नेतृत्व और मानसिक प्रवृत्तियों के माध्यम से प्रत्येक चरित्र का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। यद्यपि आधुनिक इतिहासकार उनकी कुछ व्याख्याओं और नैतिक निष्कर्षों से पूर्णतः सहमत नहीं हैं, उनका चरित्र-विश्लेषण प्राचीन जीवनी-साहित्य की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है।

वर्तमान में ‘पैरेलल लाइव्स’ की 23 युग्मित जीवनियाँ तथा चार स्वतंत्र जीवनियाँ उपलब्ध हैं। कुछ मूल जीवनियाँ कालक्रम में नष्ट हो गई हैं, जिनमें हेराक्लेस, मकदूनिया के फिलिप द्वितीय, एपामिनोंदास, स्किपियो अफ्रीकानुस, स्किपियो एमिलियानुस तथा संभवतः क्विंटस कैसिलियस मेटेलस न्यूमिडिकस की जीवनियाँ प्रमुख हैं। उपलब्ध जीवनियों में भी कुछ स्थानों पर पाठ अपूर्ण है अथवा परवर्ती प्रतिलिपिकारों द्वारा संशोधित किया गया है।

उपलब्ध जीवनियों में सोलोन, थेमिस्टोक्लीज़, एरिस्टाइड्स, एजेसिलाउस द्वितीय, पेरिक्लीज़, एल्सीबियाड्स, निकियास, डेमोस्थनीज़, पेलोपिडास, फिलोपोमेन, टिमोलियोन, सिराक्यूज़ के डियोन, यूमेनेस, सिकंदर महान, एपिरस के पाइरस, रोमुलस, नूमा पोम्पिलियस, कोरियोलानुस, थीसियस, एमिलियस पॉलुस, टाइबेरियस ग्रैकस, गायस ग्रैकस, गायस मारियस, सुल्ला, सर्टोरियस, ल्यूकुल्लुस, पोम्पेय, जूलियस सीज़र, सिसरो, कैटो द एल्डर, कैटो द यंगर, मार्क एंटनी तथा मार्कस जूनियस ब्रूटस जैसी ऐतिहासिक विभूतियों के जीवन-वृत्त सम्मिलित हैं। इनके माध्यम से प्लूटार्क ने न केवल यूनानी और रोमन इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को संरक्षित किया, बल्कि प्राचीन विश्व की नैतिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परंपराओं का भी अमूल्य चित्र प्रस्तुत किया।

सिकंदर और जूलियस सीज़र के जीवन-वृत्तांत

‘पैरेलल लाइव्स’ में सिकंदर महान और जूलियस सीज़र की जीवनियाँ एक-दूसरे के समानांतर प्रस्तुत की गई हैं, जिनका उद्देश्य केवल सैन्य अभियानों का वर्णन नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, नेतृत्व और चरित्र की गहन व्याख्या करना है। स्वयं प्लूटार्क लिखते हैं: “मैं इतिहास नहीं, बल्कि जीवन-वृत्तांत लिख रहा हूँ; क्योंकि किसी व्यक्ति का चरित्र प्रायः छोटी-छोटी घटनाओं, कथनों और व्यवहार से अधिक स्पष्ट होता है, न कि केवल महान युद्धों और विजयों से।” यह कथन उनकी संपूर्ण जीवनी-लेखन शैली का आधार है।

सिकंदर का जीवन प्राचीन काल में उपलब्ध सिकंदर महान के प्रमुख स्रोतों में से एक है, जिसमें अनेक ऐसे प्रसंग सुरक्षित हैं जो अन्य प्राचीन स्रोतों में नहीं मिलते। प्लूटार्क ने सिकंदर की महत्त्वाकांक्षा, आत्मसंयम और गौरव-लालसा पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार सिकंदर धन या भौतिक सुखों का इच्छुक नहीं था, बल्कि उसका लक्ष्य उत्कृष्टता और अमर यश प्राप्त करना था। सिकंदर के शारीरिक स्वरूप के वर्णन के लिए उन्होंने उसके प्रिय मूर्तिकार लिसिप्पस की प्रतिमाओं का सहारा लिया है। जीवनी के आरंभिक भाग में लेखक सिकंदर के गुणों से प्रभावित दिखाई देते हैं, किंतु आगे चलकर उसकी बढ़ती कठोरता और आवेगपूर्ण निर्णयों की आलोचना भी करते हैं, विशेष रूप से घनिष्ठ मित्र क्लीटस द ब्लैक की हत्या के प्रसंग में, जिसके बाद सिकंदर गहरे पश्चात्ताप से भर गया था, जो उसके व्यक्तित्व के मानवीय पक्ष का परिचय देता है।

जूलियस सीज़र का जीवन प्राचीन रोम के महान सेनानायक और राजनेता के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। स्यूटोनियस की ‘दे वीटा कैसारुम’ तथा स्वयं सीज़र की ‘दे बेल्लो गैलिको’ और ‘दे बेल्लो सिविली’ के साथ यह ग्रंथ सीज़र को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्लूटार्क ने सीज़र के जीवन का आरंभ सुल्ला के दबाव के बावजूद अपनी पत्नी कॉर्नेलिया को त्यागने से इनकार करने की घटना से किया है, जिससे उनके साहस और दृढ़ निश्चय का परिचय मिलता है। इसके बाद उन्होंने सीज़र के सैन्य अभियानों, युद्ध-कौशल, राजनीतिक प्रतिभा तथा सैनिकों को प्रेरित करने की क्षमता का विस्तृत वर्णन किया है, कई स्थानों पर ‘दे बेल्लो गैलिको’ का प्रत्यक्ष या परोक्ष उपयोग करते हुए। जीवनी के अंतिम भाग में सीज़र की हत्या तथा उसके पश्चात् की घटनाओं का मार्मिक वर्णन है, विशेष रूप से ब्रूटस को हत्या के पश्चात् दिखाई देने वाले रहस्यमय प्रेत का उल्लेख इसे साहित्यिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावशाली बना देता है।

पिरस का जीवन

प्लूटार्क की ‘पिरस का जीवन’ में एपिरस के राजा पिरस (लगभग 319–272 ई. पू.) के जीवन, सैन्य अभियानों और रोमन गणराज्य के साथ उसके संघर्षों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह जीवनी विशेष रूप से 293 से 264 ईसा पूर्व के रोमन इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत मूल्यवान है, क्योंकि इस काल से संबंधित डायोनिसियस ऑफ हैलिकार्नासस और लिवी की अनेक मूल रचनाएँ अब उपलब्ध नहीं हैं, परिणामस्वरूप इस अवधि की घटनाओं के पुनर्निर्माण में प्लूटार्क का विवरण प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत का कार्य करता है। इसमें पिरस के सैन्य कौशल, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा तथा इटली और सिसिली में उसके अभियानों का संतुलित एवं विश्लेषणात्मक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

मोरालिया

प्लूटार्क की जीवनीपरक रचनाओं के अतिरिक्त उनकी अन्य रचनाओं का संकलन ‘मोरालिया’ के नाम से प्रसिद्ध है, लगभग 78 निबंधों, संवादों और भाषणों का व्यापक संग्रह, जिसमें दर्शन, धर्म, नैतिकता, राजनीति, शिक्षा, विज्ञान तथा सामाजिक जीवन से संबंधित विविध विषयों पर विचार व्यक्त किए गए हैं। इसके उल्लेखनीय निबंधों में ‘चंद्रमा के गोले पर दिखाई देने वाले मुख के विषय में’, ‘भाई-बहनों के प्रेम पर’, ‘सिकंदर के भाग्य अथवा गुणों पर’ तथा ‘आइसिस और ओसिरिस की पूजा के विषय में’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त ‘ओरेकलों के पतन पर’, ‘दैवी प्रतिशोध में विलंब के विषय में’ और ‘मन की शांति पर’ जैसे दार्शनिक निबंध भी इस संग्रह के अंग हैं। ‘ओडिसियस और ग्रिलस’ नामक संवाद अपनी विनोदी शैली और साहित्यिक कल्पना के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है।

स्यूडो-एपिग्राफा

‘मोरालिया’ की कुछ पांडुलिपियों में ऐसी रचनाएँ भी सम्मिलित हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से प्लूटार्क की कृतियाँ माना जाता था, किंतु आधुनिक शोधों के अनुसार वे किसी अन्य अज्ञात लेखक की हैं, जैसे ‘दस वक्ताओं का जीवन’, ‘दार्शनिकों के मतों पर’, ‘भाग्य पर’ तथा ‘संगीत पर’। इनके वास्तविक लेखक को आधुनिक विद्वान ‘स्यूडो-प्लूटार्क’ कहते हैं, जो संभवतः तीसरी या चौथी शताब्दी ईस्वी में हुए थे। यद्यपि ये रचनाएँ प्लूटार्क द्वारा लिखित नहीं हैं, प्राचीन यूनानी दर्शन, वक्तृत्व-कला और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में इनका महत्त्व निर्विवाद है।

रोमन सम्राटों का जीवन

प्लूटार्क की प्रारंभिक जीवनीपरक रचनाओं में ऑगस्टस से विटेलियस तक के रोमन सम्राटों के जीवन-वृत्त सम्मिलित थे, जिनकी रचना संभवतः फ्लेवियन राजवंश के शासनकाल अथवा सम्राट नर्वा (96–98 ई.) के समय के आसपास हुई थी। इनमें से वर्तमान समय में केवल गैल्बा और ओथो की जीवनियाँ पूर्ण रूप से उपलब्ध हैं; टाइबेरियस और नीरो की जीवनियाँ केवल कुछ अंशों के रूप में प्राप्त हैं, जिनकी जानकारी परवर्ती लेखकों, विशेष रूप से डमासियस और स्वयं प्लूटार्क के उद्धरणों से मिलती है।

विद्वानों का मत है कि ‘गैल्बा’ और ‘ओथो’ को पृथक् जीवनियों के बजाय एक ही संयुक्त रचना के रूप में देखा जाना चाहिए, इसी कारण इन्हें प्लूटार्क की स्वतंत्र जीवनियों की मूल सूची में सम्मिलित नहीं किया जाता, जैसे सिस्योन के एराटस और फारस के आर्टाक्सर्सेस द्वितीय की जीवनियों को भी नहीं। ये जीवनियाँ परवर्ती काल में ‘पैरेलल लाइव्स’ के परिशिष्ट तथा ‘मोरालिया’ की कुछ पांडुलिपियों में सुरक्षित रहीं, विशेष रूप से मैक्सिमस प्लैनुडेस के संस्करण में ये ‘ओपेरा XXV’ और ‘ओपेरा XXVI’ के रूप में मिलती हैं। इन्हें प्रारंभ से ही केवल ऐतिहासिक विवरण के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक शिक्षाओं के उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा है।

खोई हुई रचनाएँ

प्लूटार्क की अनेक रचनाएँ कालक्रम में नष्ट हो गईं। उनकी खोई हुई कृतियों के विषय में जानकारी उनकी अन्य रचनाओं में दिए गए संदर्भों तथा परवर्ती लेखकों के उल्लेखों से प्राप्त होती है। ‘लैम्प्रियास की सूची’ नामक प्राचीन ग्रंथ में प्लूटार्क की 227 रचनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें से केवल लगभग 78 रचनाएँ ही वर्तमान समय तक सुरक्षित रह सकी हैं। ‘लाइव्स’ प्राचीन रोम में अत्यंत लोकप्रिय थीं और उनकी अनेक प्रतियाँ तैयार की गईं, जिसके कारण अधिकांश जीवनियाँ सुरक्षित रहीं। तथापि कुछ महत्त्वपूर्ण जीवनियाँ पूर्णतः नष्ट हो चुकी हैं, जिनमें हरक्यूलिस, ‘पैरेलल लाइव्स’ की प्रारंभिक जोड़ी, स्किपियो अफ्रीकानस और एपामिनोंदास तथा ऑगस्टस, क्लॉडियस और नीरो जैसे प्रमुख रोमन सम्राटों के जीवन-वृत्त सम्मिलित हैं।

प्लूटार्क की जीवनी-लेखन पद्धति में सामान्यतः पहले किसी महान यूनानी व्यक्ति का जीवन प्रस्तुत किया जाता था, तत्पश्चात् उसके समान गुणों वाले रोमन व्यक्तित्व की जीवनी लिखी जाती थी और अंत में दोनों की संक्षिप्त तुलना की जाती थी। वर्तमान में केवल 19 जीवनियों के अंत में यह तुलनात्मक भाग सुरक्षित है, जबकि संभवतः प्रारंभ में सभी जीवनियाँ इसी शैली में समाप्त होती थीं। ‘मोरालिया’ की भी कई रचनाएँ अब उपलब्ध नहीं हैं, जिनमें ‘क्या वह व्यक्ति जो हर विषय पर निर्णय देने से बचता है, निष्क्रियता के लिए बाध्य हो जाता है’, ‘पाइर्रो के दस तरीकों पर’ तथा ‘पाइर्रोवादियों और एकेडेमिक्स के बीच अंतर पर’ जैसी दार्शनिक रचनाएँ सम्मिलित थीं।

दर्शन

प्लूटार्क मूल रूप से प्लेटोवादी दार्शनिक थे, किंतु उनका चिंतन अन्य परंपराओं से भी प्रभावित था। वे पेरिपेटेटिक विचारधारा के प्रति उन्मुक्त भाव रखते थे और कुछ विषयों में स्टोइकवाद से भी प्रभावित दिखाई देते हैं, यद्यपि उन्होंने स्टोइक सिद्धांतों की अनेक अवसरों पर आलोचना भी की; एपिक्यूरियनवाद को उन्होंने लगभग पूर्णतः अस्वीकार कर दिया। उनकी रुचि मुख्य रूप से नैतिक और धार्मिक प्रश्नों में थी, वे केवल सैद्धांतिक और अमूर्त समस्याओं की अपेक्षा मानव जीवन, आत्मा, ईश्वर और आचरण से संबंधित विषयों को अधिक महत्त्व देते थे।

उनका विश्वास था कि आत्मा शरीर से स्वतंत्र और शाश्वत है। मृत्यु के पश्चात् आत्मा शरीर रूपी बंधन से मुक्त होकर उच्चतर अवस्था की ओर बढ़ सकती है। उनके अनुसार जो आत्मा दीर्घकाल तक सांसारिक इच्छाओं से जुड़ी रहती है, वह पुनः सांसारिक बंधनों में फँस सकती है, जबकि जो आत्मा सांसारिक मोह से शीघ्र मुक्त हो जाती है, वह अपनी मूल शक्ति को पुनः प्राप्त कर उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था की ओर अग्रसर होती है। प्लूटार्क ने वृद्धावस्था को केवल शारीरिक दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मा और सांसारिक इच्छाओं के बीच संघर्ष का काल बताया। ये विचार उनके निबंध ‘द कंसोलेशन’ में स्पष्ट होते हैं।

ईश्वर और ब्रह्मांड संबंधी विचार

प्लूटार्क ने स्टोइक भौतिकवाद और एपिक्यूरियन नास्तिकता के विरोध में ईश्वर की एक शुद्ध और आध्यात्मिक अवधारणा को स्वीकार किया, जो प्लेटो के विचारों के अधिक निकट थी। उनके अनुसार ईश्वर भौतिक संसार से ऊपर स्थित एक सर्वोच्च सत्ता है। संसार की उत्पत्ति और व्यवस्था समझाने के लिए उन्होंने प्लेटो के ‘डायड’ सिद्धांत को अपनाया, किंतु इसे किसी निर्जीव पदार्थ के रूप में नहीं माना। उनके अनुसार प्रारंभिक अवस्था में एक अव्यवस्थित विश्व-आत्मा थी, जिसमें सृष्टि के समय दिव्य बुद्धि का संचार हुआ और वह व्यवस्थित होकर ब्रह्मांडीय आत्मा में परिवर्तित हो गई; तथापि उसमें विद्यमान अव्यवस्थित तत्त्वों के कारण संसार में बुराई की संभावना बनी रही। प्लूटार्क ने ईश्वर को सीमित भौतिक संसार से परे माना और देवताओं या ‘डेमन्स’ को ईश्वर तथा मानव संसार के बीच मध्यस्थ शक्तियों के रूप में स्वीकार किया। वे मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के भी प्रबल समर्थक थे।

नैतिक और धार्मिक विचार

प्लूटार्क ने स्टोइक और एपिक्यूरियन नैतिक सिद्धांतों के स्थान पर प्लेटोनिक-पेरिपेटेटिक नैतिकता का समर्थन किया। उनकी नैतिक विचारधारा की विशेषता धर्म के साथ उसका गहरा संबंध था। वे ईश्वर को सर्वोच्च नैतिक सत्ता मानते थे और अंधविश्वास तथा धार्मिक भ्रष्टाचार की आलोचना करते थे। तथापि मानव ज्ञान की सीमाओं के प्रति उनकी गहरी आस्था के कारण वे यह भी मानते थे कि ईश्वर मनुष्यों का मार्गदर्शन विशेष आध्यात्मिक अनुभवों और दिव्य संकेतों के माध्यम से करते हैं। उन्होंने ‘उत्साह’ की उस अवस्था को महत्त्व दिया जिसमें मनुष्य सामान्य मानसिक सीमाओं से ऊपर उठकर दिव्य प्रेरणा का अनुभव करता है। इसी आधार पर उन्होंने भविष्यवाणी और दैवी संकेतों में विश्वास को उचित ठहराया, जो यूनानी और स्टोइक धार्मिक परंपराओं में चिरकाल से प्रचलित था।

प्लूटार्क का सामान्य धर्म के प्रति दृष्टिकोण समन्वयवादी था। उनके अनुसार विभिन्न समाजों में पूजे जाने वाले देवता वास्तव में एक ही दिव्य सत्ता के अलग-अलग नाम और रूप हैं। वे मानते थे कि मिथकीय कथाओं में दार्शनिक सत्य अंतर्निहित होते हैं, जिनकी व्याख्या प्रतीकात्मक और रूपकात्मक ढंग से की जानी चाहिए। इस प्रकार उन्होंने दर्शन और धर्म के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया तथा प्राचीन धार्मिक परंपराओं को दार्शनिक दृष्टि से समझने का मार्ग प्रशस्त किया। प्लूटार्क प्रसिद्ध दार्शनिक फेवोरिनस के शिक्षक भी थे। व्यक्तिगत जीवन में वे शाकाहारी थे, यद्यपि यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है कि उन्होंने कितने समय तक और कितनी कठोरता से इस आहार का पालन किया। उन्होंने ‘मोरालिया’ में मांसाहार की नैतिकता पर दो स्वतंत्र निबंध लिखे, जिनमें जीवों के प्रति मनुष्य के व्यवहार और नैतिक उत्तरदायित्व पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

प्रभाव

प्लूटार्क की रचनाओं, विशेषकर ‘पैरेलल लाइव्स’ का यूरोपीय साहित्य और बौद्धिक परंपरा पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी जीवनियों के अनेक लैटिन अनुवाद हुए- 1470 ईस्वी में उलरिच हान ने ‘पैरेलल लाइव्स’ का लैटिन अनुवाद प्रकाशित किया, और 1519 ईस्वी में हिरोनिमस एमसर ने ‘डे कैपिएंडा एक्स इनिमिकिस यूटिलिटेट’ का अनुवाद किया, जो लाइपज़िग में प्रकाशित हुआ। परवर्ती काल में गॉटलोब बेनेडिक्ट वॉन शिराच ने उनकी जीवनियों का अनुवाद किया, जिसे वियना के फ्रांज़ हास ने 1776–1780 के बीच प्रकाशित किया। ‘लाइव्स’ और ‘मोरालिया’ का जर्मन अनुवाद जोहान फ्रेडरिक सैलोमन काल्टवासर द्वारा किया गया, जिसने जर्मन विद्वानों के बीच उनके अध्ययन को व्यापक बनाया।

फ्रांस और इंग्लैंड में प्रभाव

प्लूटार्क की रचनाओं ने फ्रांसीसी और अंग्रेजी साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। फ्रांसीसी निबंधकार मिशेल द मॉन्तेन के निबंधों पर ‘मोरालिया’ का विशेष प्रभाव दिखाई देता है- मॉन्तेन ने प्लूटार्क की शैली का अनुसरण करते हुए विज्ञान, सामाजिक व्यवहार, रीति-रिवाजों और मानवीय विश्वासों जैसे विविध विषयों पर स्वतंत्र विचार प्रस्तुत किए; उनके निबंधों में प्लूटार्क का चार सौ से अधिक बार उल्लेख मिलता है, जो उनके प्रभाव की व्यापकता को रेखांकित करता है।

फ्रांसीसी विद्वान जाक एमीओ ने प्लूटार्क की रचनाओं को फ्रांसीसी पाठकों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने इटली जाकर वेटिकन में सुरक्षित प्लूटार्क के यूनानी ग्रंथों का अध्ययन किया और उनके आधार पर 1559 ईस्वी में ‘लाइव्स’ तथा 1572 ईस्वी में ‘मोरालिया’ का फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित किया, जिन्हें शिक्षित यूरोपीय समाज में अत्यधिक लोकप्रियता मिली। एमीओ के कार्य का प्रभाव इंग्लैंड में भी पड़ा, जहाँ सर थॉमस नॉर्थ ने 1579 ईस्वी में ‘लाइव्स’ का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया, जो मूल यूनानी ग्रंथ के बजाय एमीओ के फ्रेंच अनुवाद पर आधारित था।

अंग्रेजी साहित्य के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर ने नॉर्थ के अनुवाद से अत्यधिक प्रेरणा प्राप्त की। उनके अनेक ऐतिहासिक नाटकों, विशेषकर ‘जूलियस सीज़र’, ‘एंटनी एंड क्लियोपेट्रा’ और ‘कोरियोलानस’ में प्लूटार्क की जीवनियों की घटनाओं और पात्रों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। शेक्सपियर ने नॉर्थ के अनुवाद के कई अंशों को अपने नाटकों में रूपांतरित किया और कुछ स्थानों पर सीधे उद्धरणों का भी प्रयोग किया।

फ्रांसीसी दार्शनिक जाँ-जाक रूसो ने अपनी कृति ‘एमिल’ (शिक्षा पर) में प्लूटार्क का उल्लेख किया। नागरिक जीवन के लिए व्यक्ति के नैतिक विकास की चर्चा करते हुए उन्होंने प्लूटार्क के विचारों से प्रेरणा ली, विशेष रूप से मांसाहार के विरोध में उनके कथनों का उपयोग किया। जेम्स बॉस्वेल ने अपनी कृति ‘लाइफ़ ऑफ़ सैमुअल जॉनसन’ की प्रस्तावना में व्यक्तियों के जीवन और चरित्र के अध्ययन की प्लूटार्कीय परंपरा का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया।

अमेरिका में प्रभाव

प्लूटार्क का प्रभाव अमेरिकी बौद्धिक परंपरा में भी स्पष्ट दिखाई देता है। ‘फेडरलिस्ट पेपर्स’ में प्राचीन इतिहासकारों के विचारों का उल्लेख मिलता है, जो उस काल के राजनीतिक चिंतन में शास्त्रीय परंपरा के महत्त्व को दर्शाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में राल्फ वाल्डो इमर्सन और ट्रांसेंडेंटलिस्ट विचारक ‘मोरालिया’ से अत्यधिक प्रभावित थे। इमर्सन ने ‘लाइव्स’ को ‘नायकों के लिए बाइबिल’ कहा और इसे मानव चरित्र, नैतिकता तथा नेतृत्व के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत बताया।

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