हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया
परिचय
हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया चिश्ती घराने के चौथे प्रमुख सूफ़ी संत थे। उन्हें “महबूब-ए-इलाही” (ईश्वर के प्रिय) की उपाधि मिली थी। उन्होंने वैराग्य, सहनशीलता और प्रेम की ऐसी मिसाल पेश की कि वे सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय हो गए। उनका जीवनकाल 1238 से 1325 ई. माना जाता है। उनका निधन 3 अप्रैल 1325 को दिल्ली में हुआ था।
निज़ामुद्दीन औलिया के बाद चिश्ती परंपरा के उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी बने। उनके पूर्ववर्ती गुरु बाबा फ़रीद (फ़रीदुद्दीन गंजशकर) थे। निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह दक्षिणी दिल्ली में है, जो सूफ़ी काल की एक पवित्र दरगाह है।
जन्म और बचपन
निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म 1238 ई. में उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ। उनके पिता का नाम अहमद बदायनी और माता का नाम बीबी ज़ुलेखा था। पाँच वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो गया। इसके बाद वे अपनी माता के साथ दिल्ली आ गए। उनकी जीवनी का उल्लेख सोलहवीं शताब्दी की पुस्तक “आइन-ए-अकबरी” में मिलता है, जिसे मुग़ल बादशाह अकबर के एक नवरत्न मंत्री ने लिखा था।
बाबा फ़रीद से संबंध
कहा जाता है कि निज़ामुद्दीन औलिया केवल सोलह-सत्रह वर्ष के थे, जब उन्होंने पहली बार बाबा फ़रीद का नाम सुना। उसी क्षण उनके मन में प्रेम और सम्मान जाग उठा। वे अपने शिष्यों को बताते थे कि किसी और सूफ़ी के बारे में सुनकर या उससे मिलकर उन्हें कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ। यह प्रेम जलती आग की तरह बढ़ता गया। उनके सहपाठी जब उनसे कोई काम करवाना चाहते, तो बाबा फ़रीद का नाम ले लेते थे, और उस नाम पर माँगी गई कोई चीज़ वे कभी मना नहीं करते थे।
लगभग बीस वर्ष की आयु में पढ़ाई पूरी करने के बाद 1269 ई. में निज़ामुद्दीन औलिया अजोधन (पाकपट्टन शरीफ़, पाकिस्तान) पहुँचे और बाबा फ़रीद के शिष्य बन गए। उन्होंने अजोधन को अपना स्थायी निवास नहीं बनाया। वे दिल्ली में सूफ़ी साधना करते रहे और हर वर्ष रमज़ान के महीने में बाबा फ़रीद के साथ अजोधन में रहते थे। अपने जीवन में वे तीन बार उनसे मिले। तीसरी यात्रा में बाबा फ़रीद ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। लौटते समय रास्ते में ही उन्हें बाबा फ़रीद के देहांत की ख़बर मिली।
दिल्ली में ख़ानक़ाह
निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में रहे और अंत में ग़यासपुर में बस गए। यह स्थान शहर के शोर-शराबे और भीड़ से दूर था। यहाँ उन्होंने अपनी ख़ानक़ाह (सूफ़ी आश्रम) बनाई, जहाँ अलग-अलग समुदायों के लोगों को भोजन कराया जाता था। यह ख़ानक़ाह ऐसी जगह बन गई जहाँ अमीर-ग़रीब सभी तरह के लोगों की भीड़ लगी रहती थी।
वे शिष्य बनाने में भी बहुत उदार थे। जो भी आकर कहता कि वह शिष्य बनना चाहता है, उसे यह कृपा दे दी जाती थी। इसी कारण वे हमेशा समाज के हर वर्ग के लोगों से घिरे रहते थे।
प्रमुख शिष्य
निज़ामुद्दीन औलिया के कई शिष्यों ने आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त की। इनमें दो नाम सबसे प्रसिद्ध हैं:
- शेख़ नसीरुद्दीन मोहम्मद चिराग़-ए-दिल्ली, जो उनके उत्तराधिकारी बने।
- अमीर ख़ुसरो, जो प्रसिद्ध कवि और संगीतकार थे और दिल्ली सल्तनत के शाही कवि के रूप में जाने जाते थे।
मुख्य शिक्षाएँ
निज़ामुद्दीन औलिया परंपरागत सूफ़ी विचार में विश्वास रखते थे कि अहंकार को मिटाकर और आत्मा को शुद्ध करके इसी जीवन में ईश्वर को पाया जा सकता है। इसके साथ उन्होंने भारत में चिश्ती संतों की शुरू की हुई कुछ ख़ास बातों को आगे बढ़ाया। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ ये थीं:
- त्याग और ईश्वर पर पूरा भरोसा रखना।
- मानव जाति की एकता में विश्वास और सामाजिक या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का त्याग।
- ज़रूरतमंदों की मदद, भूखों को भोजन और पीड़ितों के प्रति सहानुभूति।
- ग़रीबों और वंचितों से निकट संपर्क रखना।
- सुल्तानों, राजकुमारों और अमीरों से घुलने-मिलने से सख़्त परहेज़।
- हर तरह के राजनीतिक और सामाजिक अत्याचार के प्रति समझौता न करने वाला रुख़।
उन्होंने “समा” (भक्ति-संगीत सभा) को जायज़ माना, पर इस शर्त के साथ कि उसमें संगीत वाद्ययंत्र और नृत्य न हों। इस तरह वे रूढ़िवादी सुन्नी मान्यता पर भी क़ायम रहे, जिसमें वाद्ययंत्र वर्जित हैं।
वे सूफ़ीवाद के सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक चिंता नहीं करते थे। उनका मानना था कि व्यावहारिक पक्ष ही असली महत्व रखता है, क्योंकि साधक जिन आध्यात्मिक अवस्थाओं से गुज़रता है, उनका शब्दों में वर्णन संभव ही नहीं। उन्होंने करामात (चमत्कार) के प्रदर्शन को हतोत्साहित किया और कहा कि संत को यह क्षमता आम लोगों से छिपाकर रखनी चाहिए।
प्रेम और मानवता का संदेश
अपने पूर्ववर्तियों की तरह उन्होंने ईश्वर को पाने का साधन प्रेम को बताया। उनके लिए ईश्वर से प्रेम का अर्थ मानवता से प्रेम था। उनका दृष्टिकोण धार्मिक बहुलवाद और गहरी दयालुता की भावना से भरा था।
चौदहवीं शताब्दी के इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी के अनुसार दिल्ली के मुसलमानों पर उनका इतना गहरा प्रभाव था कि लोगों का दृष्टिकोण सांसारिक मामलों के प्रति बदल गया। लोग रहस्यवाद और प्रार्थना की ओर झुकने लगे और दुनियावी चीज़ों से अलग रहने लगे।
शासकों से संबंध
माना जाता है कि तुग़लक़ वंश के संस्थापक ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की उनसे बातचीत हुई थी। आरंभ में दोनों के संबंध अच्छे थे, पर जल्द ही उनमें कड़वाहट आ गई। मतभेद के कारण संबंध फिर कभी नहीं सुधरे और उस दौर में दोनों के बीच नियमित टकराव होते रहे। (इस कथन के लिए मूल लेख में स्रोत की माँग है।)
निधन और मक़बरा
निज़ामुद्दीन औलिया का निधन 3 अप्रैल 1325 को 92 वर्ष की आयु में हुआ। उसी वर्ष उनके मक़बरे का निर्माण शुरू हो गया, लेकिन इसका नवीनीकरण 1562 तक चलता रहा। उन्होंने विवाह नहीं किया था।
दरगाह
दरगाह में संगमरमर का बना एक छोटा वर्गाकार कक्ष है। इसके संगमरमरी गुंबद पर काली लकीरें हैं। मक़बरा चारों ओर से मदर-ऑफ़-पर्ल की छतरी और मेहराबों से घिरा है, जो झिलमिलाती चादरों से ढके रहते हैं। यह इस्लामी वास्तुकला का एक शुद्ध उदाहरण है। इसी परिसर में जमात ख़ाना मस्जिद और मुग़ल राजकुमारी जहाँआरा बेगम का मक़बरा भी हैं।
दरगाह में प्रवेश करते समय सिर और कंधे ढके रखना अनिवार्य है। धार्मिक गायन और संगीत यहाँ की सूफ़ी इबादत का अटूट हिस्सा हैं। दरगाह जाने का सबसे अच्छा समय शाम 5 से 7 बजे के बीच है। रविवार, मुस्लिम अवकाशों और त्योहारों पर यहाँ भारी भीड़ रहती है, जब क़व्वाल अपने गायन से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक उन्माद से भर देते हैं। दरगाह निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास, मथुरा रोड से थोड़ी दूरी पर है। यहाँ की दुकानों पर फूल, लोबान, टोपियाँ आदि मिलते हैं।
उर्स
निज़ामुद्दीन औलिया का उर्स (पुण्यतिथि का वार्षिक आयोजन) हिजरी कैलेंडर के अनुसार रबी-उल-आख़िर की सत्रहवीं तारीख़ को मनाया जाता है। अमीर ख़ुसरो का उर्स शव्वाल की अठारहवीं तारीख़ को होता है। ये दरगाह के दो सबसे महत्वपूर्ण उर्स हैं।
अमीर ख़ुसरो
अमीर ख़ुसरो निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे। उन्हें पहला उर्दू शायर और उत्तर भारत की शास्त्रीय संगीत विधा “ख़याल” का जनक माना जाता है। ख़ुसरो का लाल पत्थर का मक़बरा उनके गुरु के मक़बरे के सामने ही है।
उपाधियाँ
निज़ामुद्दीन औलिया को कई उपाधियाँ मिली थीं, जैसे महबूब-ए-इलाही, सुल्तान-उल-मशायख़, दस्तगीर-ए-दो-जहाँ, जग उजियारे और क़ुतुब-ए-देहली आदि।
परिवार और वंशज
निज़ामुद्दीन औलिया के एक भाई जमालुद्दीन थे। निज़ामुद्दीन औलिया ने उनसे कहा था, “तुम्हारे वंशज मेरे वंशज होंगे।” जमालुद्दीन के पुत्र इब्राहीम का पालन-पोषण पिता की मृत्यु के बाद निज़ामुद्दीन औलिया ने ही किया। उन्होंने अपने भतीजे को अपने ख़लीफ़ा अख़ी सिराज आइना-ए-हिंद के साथ पूर्वी भारत में बंगाल भेजा।
वहाँ अलाउल हक़ पांडवी उनके शिष्य और ख़लीफ़ा बने। इब्राहीम का विवाह अलाउल हक़ पांडवी की भाभी (सैयद बदरुद्दीन बद्र-ए-आलम ज़ाहिदी की बहन) से हुआ। उनके पुत्र फ़रीदुद्दीन तवेला बख़्श बिहार के प्रसिद्ध चिश्ती सूफ़ी बने। उनका विवाह अलाउल हक़ पांडवी की पुत्री से हुआ और वे नूर क़ुतुब-ए-आलम पांडवी के ख़लीफ़ा बने। उनकी दरगाह चाँदपुरा, बिहारशरीफ़ में है।
निज़ामुद्दीन औलिया के वंशजों में मोइनुद्दीन सानी, नसीरुद्दीन सानी, सुल्तान चिश्ती निज़ामी, बहाउद्दीन चिश्ती निज़ामी, दीवान सैयद शाह अब्दुल वहाब (दरगाह छोटी तकिया, बिहारशरीफ़) और अमजद हुसैन चिश्ती निज़ामी जैसे कई प्रसिद्ध सूफ़ी हुए। उन्होंने चिश्ती निज़ामी सिलसिले को पूरे उत्तर भारत में फैलाया। उनके सिलसिले की इजाज़त बिहार की सभी मौजूदा ख़ानक़ाहों में मिलती है। उनके वंशज आज भी बिहारशरीफ़ में रहते हैं और दुनिया के कई हिस्सों में पाए जाते हैं। उस्मान हारूनी के चिल्ले के वर्तमान सज्जादानशीन भी उनके प्रत्यक्ष वंशज हैं। फ़रीदुद्दीन तवेला बख़्श ने बेलची, बिहारशरीफ़ में अपने चिल्ले पर उस्मान हारूनी के उर्स की शुरुआत की।
निज़ामुद्दीन औलिया की एक बहन बीबी रुक़ैया भी थीं, जिन्हें दिल्ली के अधचिनी गाँव में उनकी माता बीबी ज़ुलेखा के पास दफ़नाया गया है।
निज़ामुद्दीन औलिया अपने पीर बाबा फ़रीद के नाती ख़्वाजा मुहम्मद इमाम को अपने पास ले आए थे। वे बीबी फ़ातिमा (बाबा फ़रीद और बदरुद्दीन इसहाक़ की पुत्री) के पुत्र थे। कहा जाता है कि ख़्वाजा मुहम्मद इमाम के वंशज आज भी दरगाह शरीफ़ के देखभालकर्ता हैं।
वंशावली
पारिवारिक वंशावली
परंपरा के अनुसार निज़ामुद्दीन औलिया का वंश हज़रत मुहम्मद से हज़रत अली और इमाम हुसैन के माध्यम से चलता है। आगे इमामों की शृंखला के बाद यह बुख़ारी सैयदों की पीढ़ियों-जाफ़र बुख़ारी से अली उर्फ़ दानियल तक से होकर अहमद बदायनी और फिर निज़ामुद्दीन औलिया तक पहुँचती है।
आध्यात्मिक वंशावली
निज़ामुद्दीन औलिया की आध्यात्मिक परंपरा पैग़ंबर मुहम्मद से हज़रत अली और हसन अल-बसरी तक जाती है। आगे चिश्ती क्रम में मौदूद चिश्ती, उस्मान हारूनी, मोइनुद्दीन चिश्ती, क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी और फ़रीदुद्दीन मसूद (बाबा फ़रीद) से होकर निज़ामुद्दीन औलिया तक जाती है।
चिश्ती निज़ामी सिलसिला
निज़ामुद्दीन औलिया चिश्ती निज़ामी सिलसिले के संस्थापक थे। उनके सैकड़ों ख़लीफ़ा थे, जिन्हें सिलसिले के प्रसार की इजाज़त उनसे मिली थी। चिश्ती निज़ामी परंपरा के उल्लेखनीय सूफ़ियों में ये नाम शामिल हैं:
- नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी और अमीर ख़ुसरो
- ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज़
- अलाउल हक़ पांडवी और नूर क़ुतुब आलम (पांडुआ, पश्चिम बंगाल)
- अशरफ़ जहाँगीर सेमनानी (किछौछा, उत्तर प्रदेश)
- हुसामुद्दीन मानिकपुरी (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश)
- फ़ख़रुद्दीन फ़ख़्र देहलवी (महरौली, नई दिल्ली)
- शाह नियाज़ अहमद बरेलवी (बरेली, उत्तर प्रदेश)
- ज़ैनुद्दीन शीराज़ी (बुरहानपुर, मध्य प्रदेश)
- कलीमुल्लाह देहलवी चिश्ती (दिल्ली) और निज़ामुद्दीन औरंगाबादी
- मुहम्मद सुलमान तौंसवी, मियाँ अली मोहम्मद ख़ान (पाकपट्टन) और अन्य सूफ़ी, जिनमें पाकिस्तान और पंजाब के संत भी हैं।
सिलसिले की शाखाएँ
चिश्ती सिलसिला निज़ामुद्दीन औलिया के साथ मिलकर चिश्ती निज़ामी सिलसिला कहलाया। बाबा फ़रीद के एक अन्य शिष्य अलाउद्दीन साबिर कलियरी से एक समानांतर शाखा, चिश्ती साबिरी, शुरू हुई। लोग गर्व से अपने नाम के पीछे “निज़ामी” जोड़ने लगे। चिश्ती निज़ामी सिलसिले की प्रमुख शाखाएँ निम्नलिखित हैं:
- नसीरिया: उनके शिष्य नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी ने निज़ामिया नसीरिया शाखा शुरू की।
- हुसैनिया: यह सैयद मुहम्मद कमालुद्दीन हुसैनी गेसूदराज़ बंदा नवाज़ के नाम पर है, जो चिराग़ देहलवी के सबसे प्रिय शिष्य थे। कर्नाटक के गुलबर्गा में उनकी स्थापित ख़ानक़ाह आज भी मौजूद है।
- फ़ख़री: इसका नाम मुहिब्बुन नबी मौलाना फ़ख़रुद्दीन फ़ख़्र-ए-जहाँ देहलवी के नाम पर है, जो शाह नियाज़ बे-नियाज़ के पीर-ओ-मुर्शिद थे।
- नियाज़िया: उन्नीसवीं शताब्दी में शाह नियाज़ अहमद बरेलवी ने इसकी शुरुआत की।
- सेराजिया: इसकी शुरुआत सिराजुद्दीन अख़ी सिराज ने की। इसे चिश्तिया सेराजिया भी कहते हैं।
- अशरफ़िया: इसकी शुरुआत अशरफ़ जहाँगीर सेमनानी ने की, जिनकी ख़ानक़ाह किछौछा शरीफ़, उत्तर प्रदेश में आज भी है।
- फ़रीदिया: इसे निज़ामुद्दीन औलिया के वंशज फ़रीदुद्दीन तवेला बख़्श ने शुरू किया। इसे निज़ामिया सेराजिया फ़रीदिया भी कहते हैं।
- इश्क़-नूरी: इसकी स्थापना 1960 के दशक में शेख़ ख़्वाजा ख़ालिद महमूद चिश्ती ने लाहौर, पाकिस्तान में की। यह इस परंपरा की सबसे आधुनिक शाखा है और मुख्यतः भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मिलती है, कुछ अनुयायी पश्चिमी देशों में भी हैं।
- लुत्फ़िया: इस सिलसिले को मौलाना लुत्फ़ुल्लाह शाह दनकौरी ने आगे बढ़ाया। इसके अनुयायी पाकिस्तान, भारत, इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में हैं।


