कनिष्क प्रथम : तिथि, विजय, साम्राज्य-विस्तार, कला और साहित्य
कनिष्क प्रथम का परिचय
कुषाण वंश के इतिहास में कनिष्क प्रथम का स्थान सबसे ऊँचा है। वह कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध शासक था। उसका शासनकाल दूसरी शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में रखा जा सकता है और अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि उसने लगभग 127 ई. से 150 ई. तक शासन किया था। उसकी सत्ता मध्य एशिया के बैक्ट्रिया से लेकर अफ़ग़ानिस्तान, गांधार, पंजाब, कश्मीर और उत्तर भारत के बड़े भूभाग तक फैली थी।
कनिष्क केवल विजेता या साम्राज्य-निर्माता ही नहीं था, वह धर्म, साहित्य, कला, स्थापत्य और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा संरक्षक भी था। उसके शासनकाल में गांधार और मथुरा के कला-केंद्र खूब पल्लवित और पुष्पित हुए। उसने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण दिया और भारत तथा मध्य एशिया के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों को सुदृढ़ किया। यही कारण है कि उसका काल प्राचीन भारत में राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उत्कर्ष का काल माना जाता है।
कुषाण वंश की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि
कुषाण मूल रूप से मध्य एशिया के यूएझी (यूची) नाम के घुमंतू समुदाय की एक शाखा थे। चीनी स्रोतों के अनुसार यूएझी लोग पहले चीन की पश्चिमी सीमा, यानी गांसू क्षेत्र में रहते थे। वहाँ ह्युंग-नू (शिउंग-नू) कबीलों से हारने के बाद वे पश्चिम की ओर बढ़ गए। कुछ विद्वान ह्युंग-नू को हूणों का पूर्वज मानते हैं। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूएझी लोगों ने बैक्ट्रिया (उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान) पर अधिकार कर लिया। वहाँ उनके पाँच प्रमुख समूह या रियासतें बनीं, जिनमें एक कुषाण (कुई-शुआंग) प्रमुख था। आगे चलकर कुई-शुआंग के कुजुल कडफिसेस ने इन बिखरे समूहों को एक किया और मज़बूत कुषाण सत्ता की नींव रखी।
कुजुल के बाद गद्दी विम तक्तो (विम तक्तु) को मिली और उसके बाद विम कडफिसेस राजा बना। इनके समय में कुषाण साम्राज्य का प्रभाव अफ़ग़ानिस्तान से आगे बढ़कर भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों तक पहुँच गया और वह आर्थिक तथा सैनिक रूप से भी सुदृढ़ हो गया। विम कडफिसेस ने सोने के सिक्कों का नियमित प्रचलन शुरू किया। कनिष्क प्रथम इसी कुषाण परंपरा का उत्तराधिकारी था। उसके समय तक कुषाण साम्राज्य यूरेशिया की बड़ी शक्तियों में गिना जाने लगा था और रोम, पार्थिया तथा चीन जैसी तत्कालीन शक्तियों से उसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क थे।
कल्हण ने राजतरंगिणी में कुषाणों के लिए ‘तुरुष्क’ शब्द का प्रयोग किया है, जबकि आधुनिक विद्वान उन्हें यूएझी की एक शाखा मानते हैं। कुषाणों की मूल बोलचाल की भाषा के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है। प्रशासन में उन्होंने बैक्ट्रियन भाषा अपनाई, जो मध्य-ईरानी काल की एक पूर्वी ईरानी भाषा थी और जिसे अभिलेखों में ‘आर्य’ (आरिय) भाषा कहा गया है।
कनिष्क के इतिहास के प्रमुख स्रोत
कनिष्क के इतिहास की जानकारी सिक्कों, अभिलेखों, मूर्तियों, पुरातात्त्विक अवशेषों, चीनी यात्रियों के वृत्तांतों और बौद्ध साहित्य से मिलती है। उसके सिक्कों से उसकी राजनीतिक शक्ति, धार्मिक सोच और साम्राज्य की सांस्कृतिक विविधता की सूचना मिलती है। इन पर यूनानी, ईरानी और भारतीय परंपराओं के देवताओं के चित्र मिलते हैं।
कनिष्क से संबंधित अभिलेख मथुरा, सारनाथ, माणिक्याल (रावलपिंडी के पास), सुई विहार (बहावलपुर), पेशावर क्षेत्र और उत्तर-पश्चिम के दूसरे स्थानों से मिले हैं, जिनसे उसके शासन और प्रभाव-क्षेत्र का ज्ञान होता है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण राबातक अभिलेख है। इसके अलावा फाह्यान, सुंग-युन और ह्वेनसांग जैसे चीनी बौद्ध यात्रियों के विवरण तथा बौद्ध साहित्य की परंपराएँ भी कनिष्क को बौद्ध धर्म का संरक्षक बताती हैं।
राबातक अभिलेख
यह अभिलेख अफ़ग़ानिस्तान के बग़लान प्रांत के राबातक नामक स्थान से 1993 ई. में मिला था। यह बैक्ट्रियन भाषा और यूनानी लिपि में लिखा गया है। इसका पाठ और अनुवाद निकोलस सिम्स-विलियम्स और जो क्रिब ने 1995-96 ई. में प्रकाशित किया। यह कनिष्क के शासन का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जिससे कनिष्क की वंशावली स्पष्ट हो गई। अभिलेख में कनिष्क ने अपने परदादा कुजुल कडफिसेस, दादा विम तक्तो और पिता विम कडफिसेस का उल्लेख किया है, जिससे उन पुराने मतों का खंडन हो गया जिनके अनुसार कनिष्क कडफिसेस राजाओं से पहले हुआ था। अब विद्वान मानते हैं कि वह इन तीनों शासकों के बाद गद्दी पर बैठा था।
अभिलेख के अनुसार कनिष्क ने राजकीय आदेश पहले यूनानी भाषा में जारी करवाया और फिर उसे ‘आर्य’ यानी बैक्ट्रियन भाषा में अनुवाद कराया। इस तरह यूनानी लिपि में लिखी बैक्ट्रियन भाषा को राजकीय भाषा का दर्जा मिला। यह परिवर्तन कनिष्क के आरंभिक शासनकाल में हुआ। उसके शुरुआती सिक्कों पर भी यूनानी भाषा है और बाद के सिक्कों पर बैक्ट्रियन भाषा। अभिलेख में कनिष्क ने एक नया संवत् (युग) शुरू करने का दावा किया है और स्पष्ट कहा है कि उसने ‘प्रथम वर्ष का उद्घाटन’ किया।
राबातक अभिलेख में साकेत, कौशांबी, पाटलिपुत्र और श्रीचंपा जैसे नगरों के साथ उज्जयिनी आदि कुछ और नगरों के नाम भी हैं, जिन्हें कनिष्क के अधीन बताया गया है। इस सूची को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद है, क्योंकि कुछ इतिहासकार इसे प्रत्यक्ष विजय या शासन का दावा मानते हैं, तो कुछ इसे केवल प्रभाव या अधीनता का सामान्य दावा समझते हैं।
राबातक अभिलेख में बगोलंगो नामक देवस्थान के निर्माण का उल्लेख है, जिसमें देवताओं और राजा के पूर्वजों की मूर्तियाँ रखी जाती थीं। इससे कुषाणों की देवकुल और पूर्वज-पूजा की परंपरा की झलक मिलती है। इस अभिलेख में नाना, ओएशो (शिव से संबंधित) और अन्य देवी-देवताओं के नाम मिलते हैं, जो कनिष्क की धार्मिक उदारता का प्रमाण हैं।
कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि
कनिष्क की तिथि तय करना भारतीय इतिहास की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों के बाद भी इस पर पूरी सहमति नहीं बन सकी है। कनिष्क शायद प्राचीन भारत का अकेला ऐसा शासक है जिसके समय को लेकर विद्वानों के मतों में दस-बीस या पचास नहीं, बल्कि लगभग तीन सौ वर्षों का अंतर रहा।
इसका कारण यह है कि उसके अभिलेख किसी जाने-पहचाने संवत् में नहीं, बल्कि उसी के शुरू किए संवत् के वर्षों में लिखे गए हैं। यह साफ़ नहीं था कि उस संवत् का पहला वर्ष ईसवी सन् के किस वर्ष के बराबर है। इसी वजह से चार मुख्य मत चले। पहले मत के अनुसार कनिष्क प्रथम शताब्दी ई.पू. में गद्दी पर बैठा। दूसरे के अनुसार दूसरी शताब्दी ई. में। तीसरा मत उसे तीसरी शताब्दी ई. में रखता है, और चौथे मत के अनुसार उसका राज्यारोहण पहली शताब्दी ई. में हुआ था।
प्रथम शताब्दी ई.पू. (58 ई.पू.)
फ्लीट, कनिंघम, डॉसन, फ्रैंके, केनेडी और लूडर्स जैसे विद्वान कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई.पू. में रखते थे और उसका राज्यारोहण 58 ई.पू. मानते थे। उनके अनुसार कनिष्क कैडफिसेस-वर्ग से पहले हुआ और 58 ई.पू. में उसके चलाए संवत् को ही आगे चलकर विक्रम संवत् कहा गया। उनका तर्क था कि प्रथम शताब्दी ई.पू. तक चीन और भारत के बीच स्थल-मार्ग से व्यापारिक संबंध घनिष्ठ हो चुके थे। ह्वेनसांग के अनुसार बुद्ध ने अपने महापरिनिर्वाण के चार सौ वर्ष बाद कनिष्क नाम के राजा के जन्म की भविष्यवाणी की थी। बुद्ध का महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. मानें तो कनिष्क का राज्यारोहण लगभग 83 ई.पू. ठहरता है। फ्रैंके के अनुसार दूसरी शताब्दी ई.पू. में किसी यूची शासक ने बौद्ध ग्रंथों के बारे में जो पत्राचार किया, उसमें भी कनिष्क का संकेत मिलता है।
इस मत का खंडन मार्शल, थॉमस, स्टेन कोनो, रैप्सन, हेमचंद्र रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, दिनेशचंद्र सरकार और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों ने किया। मार्शल को तक्षशिला की खुदाई में कैडफिसेस-वर्ग के सिक्के कनिष्क-परिवार के सिक्कों से नीचे के स्तर पर मिले। इससे साबित होता है कि कनिष्क ने कैडफिसेस शासकों के बाद शासन किया। रैप्सन के अनुसार कनिष्क के सिक्के विम कैडफिसेस के सिक्कों के साथ मिलते हैं, कुजुल कैडफिसेस के साथ नहीं।
रायचौधरी के अनुसार सिक्कों, अभिलेखों और ह्वेनसांग के वर्णन से गांधार पर कनिष्क का अधिकार सिद्ध होता है। चीनी स्रोत बताते हैं कि प्रथम शताब्दी ई.पू. के बीच में गांधार पर यिन-मोफ़ू (हर्मेयस) का अधिकार था। बाद के कुषाण सिक्कों पर दिखने वाला सासानी प्रभाव भी कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई.पू. में रखने के रास्ते में बाधा है। फ्रैंके का यह कहना संभव है कि दूसरी शताब्दी ई.पू. का कोई यूची शासक बौद्ध धर्म से परिचित था, पर यह पक्का नहीं कि वह कनिष्क ही था। अंत में राबातक अभिलेख ने इस सवाल को पूरी तरह निपटा दिया कि कनिष्क कैडफिसेस-वर्ग के बाद आया।
द्वितीय शताब्दी ई. (लगभग 120 से 150 ई.)
स्मिथ, मार्शल और स्टेन कोनो जैसे विद्वानों ने कनिष्क का समय लगभग 120-125 ई. माना। घिर्शमान और बी.एन. पुरी ने 144 ई. का प्रस्ताव रखा। के.सी. ओझा ने लगभग 140 ई. की तिथि सुझाई (अपने एक प्रस्ताव में उन्होंने 150 ई. तक की बात भी की) और एच. हुंबाख ने लगभग 132 ई. की तिथि स्वीकार की।
स्मिथ के अनुसार सिक्कों से पता चलता है कि कनिष्क ने कैडफिसेस प्रथम और द्वितीय के बाद शासन किया और उसका कैडफिसेस-वर्ग से निकट संबंध था। मार्शल का अनुमान था कि विम कैडफिसेस ने 78 ई. में कुजुल के बाद शासन शुरू किया और उसका अंत दूसरी शताब्दी ई. की शुरुआत में हुआ। इस हिसाब से कनिष्क लगभग 120 ई. के आसपास गद्दी पर बैठा।
अफ़ग़ानिस्तान के बेग्राम की खुदाई के आधार पर घिर्शमान ने माना कि कनिष्क ने 144 ई. में गद्दी सँभाली और 172 ई. तक शासन किया। उनके अनुसार सासानी सम्राट शापुर प्रथम ने 241 से 250 ई. के बीच बेग्राम नगर को नष्ट किया। उस समय वासुदेव का शासन था, जिसके अभिलेख कनिष्क संवत् के वर्ष 64 से 98 तक मिलते हैं। इस गणना से संवत् का आरंभ 144 ई. आता है। बी.एन. पुरी के अनुसार इस मत से कनिष्क और शक शासक रुद्रदामन के बीच समकालीनता और संघर्ष की समस्या भी नहीं उठती।
ओझा अय, खलात्से और जिहोणिक के लेखों की तिथियों (136, 187, 191) को विक्रम संवत् की मानते थे। इसी आधार पर वे कनिष्क को 78 ई. में रखने की संभावना ठुकराते थे। प्रयाग-प्रशस्ति की ‘दैवपुत्रषाहिषाहानुषाहि’ उपाधि को वे एक ही साम्राज्यिक उपाधि मानते थे और कहते थे कि समुद्रगुप्त के समय तक कनिष्क की प्रतिष्ठा बची हुई थी। चीनी स्रोतों के अनुसार तीसरी शताब्दी ई. के मध्य तक ऑक्सस से भारत तक कुषाण साम्राज्य बना हुआ था और वासुदेव इस वंश का अंतिम शासक था। यदि वासुदेव ने 250 ई. के आसपास शासन किया हो, तो कनिष्क को दूसरी शताब्दी ई. से पहले नहीं रखा जा सकता।
इस मत पर कुछ आपत्तियाँ भी हैं। सुई विहार के लेख से निचली सिंधु घाटी पर कनिष्क का अधिकार सिद्ध होता है। दूसरी ओर जूनागढ़ लेख (शक वर्ष 72, यानी 150 ई.) में सिंधु-सौवीर पर रुद्रदामन का अधिकार बताया गया है। रुद्रदामन का शासनकाल लगभग 130 से 150 ई. माना जाता है और वह किसी का अधीन नहीं था। कनिष्क को दूसरी शताब्दी के मध्य में रखने पर दोनों समकालीन हो जाते हैं और सुई विहार पर कनिष्क का अधिकार मानना कठिन हो जाता है। फिर भी यह तर्क पूरी तरह निर्णायक नहीं है, क्योंकि जूनागढ़ लेख की विजय-घोषणाओं का अर्थ और सिंध पर अधिकार का समय खुद विवादित हैं।
कनिष्क, वासिष्क, हुविष्क और वासुदेव के लेख एक ही संवत् में हैं और उसका चलाने वाला कनिष्क था। दूसरी शताब्दी ई. में शुरू हुए किसी अलग संवत् का कहीं और कोई संकेत नहीं मिलता। सुधाकर चट्टोपाध्याय का कहना है कि बेग्राम में मिले ‘वासुदेव’ नाम वाले सिक्कों को भारतीय कुषाण शासक वासुदेव प्रथम का मानना ज़रूरी नहीं है। यह भी पक्का नहीं कि बेग्राम को शापुर प्रथम ने ही नष्ट किया। चीनी स्रोतों में 229 ई. में ‘बो-तियाओ’ नाम के बड़े यूची राजा द्वारा चीन में दूत भेजने का उल्लेख है, जिसकी पहचान सामान्यतः वासुदेव प्रथम से की जाती है।
प्रयाग-प्रशस्ति के पद को एक ही साम्राज्यिक उपाधि मानना भी ज़रूरी नहीं। श्रीराम गोयल के अनुसार ‘देवपुत्र षाहि’ (किदार कुषाण) और ‘षाहानुषाहि’ (सासानी) अलग-अलग पद हैं। हुंबाख का मत वासुदेव की एक ख़ास पहचान पर टिका है। यदि वह वासुदेव द्वितीय या तृतीय हो, तो कनिष्क को पहले रखना पड़ेगा।
तृतीय शताब्दी ई. (248 या 278 ई.)
आर.सी. मजूमदार ने कनिष्क का राज्यारोहण 248 ई. में माना। उनके अनुसार कनिष्क का संवत् वही था जिसे त्रैकूटक-कलचुरि-चेदि संवत् कहा जाता है। भंडारकर जैसे विद्वान 278 ई. के पक्ष में थे।
यह मत भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। कुषाण लेखों के अनुसार वासुदेव वर्ष 98 में मथुरा क्षेत्र पर शासन कर रहा था। चेदि संवत् मानने पर यह तिथि 346 ई. आती है, जबकि चौथी शताब्दी के मध्य तक मथुरा क्षेत्र पर नाग और यौधेय जैसी शक्तियों का अधिकार था और जल्द ही समुद्रगुप्त का उदय हुआ। चीनी बौद्ध परंपरा के अनुसार कनिष्क के गुरु संघरक्षक की रचना का अनुवाद अन-शिगाओ (लगभग 148-170 ई.) ने किया। खोतान की परंपराएँ भी कनिष्क को वहाँ के राजा विजयकीर्ति का समकालीन बताती हैं। ये परंपराएँ बाद की हैं, इसलिए इन्हें अकेले पक्का प्रमाण नहीं माना जाता, पर ये भी तीसरी शताब्दी वाले मत के साथ मेल नहीं खातीं।
प्रथम शताब्दी ई. (78 ई.)
फर्ग्यूसन, ओल्डेनबर्ग, थॉमस, रैप्सन, एन.एन. घोष, रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, दिनेशचंद्र सरकार, राधाकुमुद मुकर्जी और जे.एस. नेगी जैसे विद्वानों ने कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में माना। उनके अनुसार कनिष्क का शुरू किया यही संवत् आगे चलकर पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों ने चौथी शताब्दी तक इस्तेमाल किया, इसीलिए इसे ‘शक संवत्’ कहा गया। रैप्सन के अनुसार तक्षशिला की खुदाई भी इस मत से बेमेल नहीं है। कुछ विद्वानों ने पेशावर के शैख़ान-ढेरी की खुदाई की रेडियो-कार्बन तिथियों को भी इस पक्ष में पेश किया, पर उनकी व्याख्या निर्णायक नहीं मानी जाती। भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 से शक संवत् पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग अपनाया, लेकिन यह फ़ैसला कनिष्क की तिथि का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
जूवो-डुब्रील ने आपत्ति उठाई थी कि यदि कुजुल कैडफिसेस और हर्मेयस के शासन का अंत लगभग 50 ई. में और कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में माना जाए, तो कैडफिसेस-वर्ग के शासकों के लिए केवल 28 वर्ष बचते हैं। राबातक अभिलेख के बाद यह कठिनाई और बढ़ जाती है। डुब्रील के अनुसार तक्षशिला के चिर-स्तूप लेख में 136वाँ वर्ष लिखा है, जिसे अय या विक्रम संवत् में गिनने पर 78 ई. बैठता है, और उसमें जिस शासक का नाम है वह कैडफिसेस-वर्ग का है, कनिष्क नहीं। स्टेन कोनो ने चीनी और तिब्बती स्रोतों के आधार पर कनिष्क को दूसरी शताब्दी ई. में रखा।
इस मत के समर्थकों का कहना है कि कुजुल के शासन का अंत 50 ई. में हुआ, यह पक्का नहीं है। चीनी स्रोतों के अनुसार वह अस्सी वर्ष से ज़्यादा की उम्र में मरा, इसलिए 28 वर्ष का अंतर उन्हें कम नहीं लगता। चिर-स्तूप लेख की ‘देवपुत्र’ उपाधि के बारे में उनका कहना था कि वह कैडफिसेस-वर्ग के लिए नहीं, बल्कि कनिष्क-वर्ग के राजाओं के लिए है। स्टेन कोनो जिस कनिष्क के आधार पर दूसरी शताब्दी की बात करते हैं, वह शायद कनिष्क प्रथम नहीं, बल्कि आरा लेख वाला बाद का कनिष्क है।
राबातक अभिलेख के बाद
1993 ई. में अफ़ग़ानिस्तान के राबातक में मिला अभिलेख इस विवाद में निर्णायक परिवर्तन आया। यह बैक्ट्रियन भाषा और यूनानी लिपि में लिखा मंदिर-स्थापना का लेख है। इसमें कनिष्क ने अपने परदादा कुजुल कैडफिसेस, दादा विम तक्तो और पिता विम कैडफिसेस का उल्लेख किया है। लेख में कनिष्क के शुरुआती वर्षों की घटनाओं और उत्तर भारत में उसकी सत्ता के फैलाव का वर्णन है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि कनिष्क ने ‘प्रथम वर्ष का उद्घाटन किया’, अर्थात एक नया युग चलाया। इससे यह निश्चित हो जाता है कि कनिष्क कैडफिसेस-वर्ग के बाद शासक बना। इसलिए प्रथम शताब्दी ई.पू. वाला मत मान्य नहीं है। किंतु अभिलेख से यह स्पष्ट नहीं होता है कि यह नया युग ईसवी सन् के किस वर्ष से शुरू हुआ था।
हैरी फ़ॉक का 127 ई. का प्रस्ताव
हैरी फ़ॉक ने 2001 ई. में भारतीय ज्योतिष-ग्रंथ स्फुजिध्वज के यवनजातक के नए पाठ-विश्लेषण के आधार पर कुषाण युग का संबंध शक संवत् की गणना से बिठाया, जिससे कनिष्क युग का पहला वर्ष 127 या 128 ई. निकलता है। इस हिसाब से कनिष्क इसी समय या उससे कुछ पहले गद्दी पर बैठा। फिर भी यह निश्चित नहीं होता है कि युग का पहला वर्ष और राज्यारोहण का वर्ष एक ही था।
संप्रति 127 ई. की तिथि को सर्वाधिक स्वीकार किया जाता है और गांधार-कला के कालक्रम में बड़े पैमाने पर प्रयोग होता है। फिर भी गेरार्ड फ़ुस्समान जैसे कुछ विद्वान अब भी 78 ई. के पक्ष में ही हैं।
किंतु 78 ई. में शुरू हुआ शक संवत् और कनिष्क का युग अलग-अलग हैं। शक संवत् की उत्पत्ति को प्रायः पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों की परंपरा से जोड़ा जाता है। 1957 ई. में भारत सरकार द्वारा इसे राष्ट्रीय पंचांग बनाना एक प्रशासनिक और पंचांग से जुड़ा निर्णय था, जिसका कनिष्क की तिथि से कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं है।
इस प्रकार प्रथम शताब्दी ई.पू. और तीसरी शताब्दी ई. वाले मत अभिलेखीय, सिक्कों से जुड़े और कालक्रम के प्रमाणों के आधार पर अब स्वीकार नहीं हैं। 78 ई. वाला मत एक समय बहुत प्रभावशाली था, किंतु राबातक अभिलेख और नए शोधों के बाद अधिकांश इतिहासकार उसके पक्ष में नहीं हैं। अब कनिष्क-युग का आरंभ लगभग 127-128 ई. में माना जाता है। कनिष्क का राज्यारोहण इसी समय या उससे कुछ पहले माना जना चाहिए, यद्यपि यह भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं है।
कनिष्क संवत्
कनिष्क संवत् का इस्तेमाल कुषाण शासकों के अभिलेखों में मिलता है। कनिष्क के अभिलेख पहले वर्ष से लेकर लगभग 23वें वर्ष तक के हैं। वासिष्क के अभिलेख 24वें और 28वें वर्ष के हैं। हुविष्क के अभिलेख लगभग 28वें से 60वें वर्ष तक मिलते हैं, और वासुदेव प्रथम के अभिलेख लगभग 64वें से 98वें वर्ष तक। इसी वर्ष-क्रम से कुषाण शासकों का कालक्रम तय किया जाता है। सारनाथ से मिली बोधिसत्त्व प्रतिमा पर कनिष्क के तीसरे वर्ष का अभिलेख है और माणिक्याल से 18वें वर्ष का। यह संवत् कुषाण साम्राज्य की प्रशासनिक एकता का भी प्रतीक था, क्योंकि पेशावर क्षेत्र से लेकर सारनाथ और साँची तक एक ही संवत् चलता था।
कनिष्क की राजनीतिक उपलब्धियाँ
उत्तर-पश्चिम और बैक्ट्रिया
कनिष्क की शक्ति का मूल आधार उत्तर-पश्चिम था। अफ़ग़ानिस्तान, गांधार और बैक्ट्रिया उसके साम्राज्य के हृदय-क्षेत्र थे। बैक्ट्रिया कुजुल के समय से ही कुषाणों के अधीन था। बग़लान का सुरख कोतल इसका प्रमाण है, जहाँ कनिष्क के काल का विशाल राजकीय मंदिर-परिसर मिला है। यहाँ से बैक्ट्रियन अभिलेख और कनिष्क की मूर्ति के अवशेष मिले हैं। राबातक भी इसी क्षेत्र में है। इससे सिद्ध होता है कि बैक्ट्रिया केवल जीता हुआ प्रदेश नहीं था, बल्कि कुषाण राजसत्ता और धार्मिक जीवन का केंद्र था।
गांधार, जिसमें पेशावर, तक्षशिला और स्वात घाटी आते थे, साम्राज्य का सांस्कृतिक केंद्र था। माणिक्याल से कनिष्क के 18वें वर्ष का अभिलेख मिला है। सुई विहार (बहावलपुर) का अभिलेख निचली सिंधु घाटी पर और माणिक्याल जैसे अभिलेख पंजाब के उत्तरी भाग पर कुषाण अधिकार का संकेत देते हैं। जेदा का अभिलेख गांधार क्षेत्र में कुषाण सत्ता का प्रमाण है।
कश्मीर
कश्मीर कनिष्क के साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। कल्हण की राजतरंगिणी में हुष्क (हुविष्क), जुष्क (वसुष्क) और कनिष्क का नाम आता है, जिन्होंने कश्मीर पर शासन किया और अपने नाम पर नगर बसाए। इसी परंपरा में कनिष्कपुर का उल्लेख है, जिसकी पहचान आज के कनिस्पोर (बारामुला क्षेत्र) से की जाती है। यद्यपि कल्हण की यह कालगणना और विवरण बारहवीं शताब्दी का है, फिर भी बौद्ध स्रोत और पुरातात्त्विक संकेत कुषाण काल में कश्मीर में बौद्ध धर्म के प्रसार की पुष्टि करते हैं। आगे चलकर कश्मीर बौद्ध विद्वानों और अनुवादकों का बड़ा केंद्र बन गया और यहाँ से बहुत-से भिक्षु तिब्बत, मध्य एशिया और चीन गए।
गंगा के मैदान और पूर्वी भारत
कनिष्क की पूर्वी विजयों की जानकारी राबातक अभिलेख, बौद्ध-तिब्बती परंपराओं, चीनी अनुवादों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलती है। राबातक अभिलेख में साकेत, कौशांबी, पाटलिपुत्र और श्रीचंपा का नाम गंगा के मैदान तक राजनीतिक दावे का संकेत देता है।
बौद्ध परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। चीनी अनुवाद में बचे ‘श्रीधर्मपिटक निदानसूत्र’ के अनुसार कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर हमला किया और वहाँ से कवि-दार्शनिक अश्वघोष तथा बुद्ध का भिक्षापात्र प्राप्त किया। तिब्बती परंपरा के अनुसार उसने खोतान के राजा विजयकीर्ति की मदद से साकेत (अयोध्या) पर अधिकार किया था। ये विवरण समकालीन अभिलेखों से प्रमाणित नहीं हैं। पाटलिपुत्र पर सीधे और स्थायी नियंत्रण का भी कोई साफ़ अभिलेखीय प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए इन्हें बौद्ध साहित्य की परंपरा के रूप में ही समझना चाहिए।
पुरातात्त्विक साक्ष्य कुषाण प्रभाव की पुष्टि करते हैं। कनिष्क के सिक्के और उसके समय की मूर्तियाँ मथुरा, श्रावस्ती, कौशांबी और सारनाथ से मिली हैं। कौशांबी से उसकी एक मुहर मिली है और जौनपुर, आज़मगढ़ तथा गोरखपुर से उसके सिक्के। बंगाल के तामलुक और महास्थान तथा ओडिशा के कुछ स्थानों से भी कुषाण सिक्के मिले हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई पुरास्थलों पर कुषाणकालीन बस्तियों के अवशेष मिले हैं। लेकिन सिक्के मिलना हमेशा सीधे शासन का प्रमाण नहीं होता, क्योंकि व्यापार के रास्ते भी सिक्के दूर तक पहुँच जाते थे। इन सबसे बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बंगाल तक कुषाण प्रभाव और व्यापारिक संपर्क का संकेत मिलता है। सीधे प्रशासन का दायरा मथुरा, कौशांबी और सारनाथ तक ज़्यादा पक्का माना जाता है।
मध्य भारत और मालवा
दक्षिणी सीमा पर शक क्षत्रपों और सातवाहनों की सत्ता थी। राबातक अभिलेख में उज्जयिनी का नाम आने से मालवा क्षेत्र पर प्रभाव का संकेत मिलता है। साँची से कुषाणकालीन अभिलेख और मथुरा शैली की मूर्तियाँ मिली हैं। वासिष्क के साँची अभिलेख से साफ़ होता है कि विदिशा उसके अधीन था। मध्य भारत के दूसरे स्थानों से भी कुषाण सिक्के मिले हैं। इससे पता चलता है कि कुषाण प्रभाव विंध्य क्षेत्र तक पहुँच गया था, किंतु नर्मदा के दक्षिण में कुषाणों के सीधे शासन का कोई प्रमाण नहीं मिलता। पश्चिमी भारत और दक्कन में शक क्षत्रपों और सातवाहनों की शक्ति बनी रही।
मध्य एशिया, तारिम बेसिन और चीन से संबंध
कनिष्क का प्रभाव उत्तर-पश्चिम में बैक्ट्रिया और मध्य एशिया के कुछ भागों तक फैला था, जैसे आज के उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और अमू दरिया के आसपास का इलाक़ा। तारिम बेसिन के खोतान, यारकंद और काशग़र रेशम मार्ग के अहम पड़ाव थे। इन क्षेत्रों में कुषाण प्रभाव के पुरातात्त्विक और भाषाई संकेत मिलते हैं, जैसे खरोष्ठी में लिखे प्राकृत दस्तावेज़ और कुषाण शैली के सिक्के। किंतु इन क्षेत्रों पर कनिष्क का सीधा और स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण कितना था, यह साफ़ नहीं है। इसलिए इतिहासकार इन्हें उसके स्थायी रूप से जीते हुए प्रांतों में सावधानी से ही गिनते हैं।
चीन से संघर्ष की प्रसिद्ध कथा के अनुसार चीनी सेनापति पान-चाओ (बान चाओ) ने मध्य एशिया पर अधिकार कर लिया था। कुषाण शासक ने चीनी राजकन्या से विवाह की इच्छा जताई, जिसे अपमान मानकर पान-चाओ ने ठुकरा दिया। इससे युद्ध छिड़ा और कुषाण सेना हार गई। कथा आगे कहती है कि बाद में कनिष्क ने सफल अभियान चलाया और ह्वेनसांग के अनुसार चीन के पश्चिमी राज्यों ने अपने राजकुमार बंधक के रूप में उसके दरबार में भेजे।
इस कथा में ऐतिहासिक कठिनाई है। चीनी इतिहास (हो-हान-शू) में पान-चाओ और कुषाणों के बीच संघर्ष की तिथि लगभग 90 ई. है, जो कनिष्क के समय से करीब तीन दशक पहले की है। इसलिए बहुत से इतिहासकार इसे कनिष्क से पहले के किसी कुषाण शासक, प्रायः विम कडफिसेस से जोड़ते हैं। इसलिए कनिष्क के चीन से युद्ध और जीत को निश्चित घटना नहीं माना जा सकता है। इतना कहा जा सकता है कि कुषाणों का तारिम बेसिन से राजनीतिक या सांस्कृतिक संपर्क था और रेशम मार्ग पर उनका प्रभाव था।
पार्थिया से संबंध
पश्चिम में पार्थियन साम्राज्य था, जो रोम का प्रतिद्वंद्वी था। रेशम मार्ग की मुख्य शाखाएँ बैक्ट्रिया और गांधार से होकर गुज़रती थीं। इन पर कुषाणों का नियंत्रण पार्थिया के व्यापारिक हितों के लिए चुनौती था। रोमन साम्राज्य भी चीन के रेशम के लिए ऐसे रास्ते चाहता था जो पार्थिया से होकर न जाएँ, इसलिए कुषाणों से मित्रता उसके लिए लाभदायक थी। परंपरागत विवरणों में कुषाण-पार्थियन संघर्ष का उल्लेख मिलता है, किंतु समकालीन प्रमाणों से पूरी तरह पुष्ट नहीं है। इतना निश्चित है कि कुषाण शासन में तक्षशिला, पुरुषपुर और कपिशा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र थे।
कनिष्क का साम्राज्य विस्तार
कनिष्क को विरासत में अफ़ग़ानिस्तान, बैक्ट्रिया, गांधार, सिंधु घाटी के कुछ हिस्से और पंजाब का बड़ा इलाक़ा मिला था। उसके शासनकाल में गांधार, सिंधु घाटी, पंजाब और कश्मीर का बड़ा हिस्सा उसके अधीन था। गंगा-यमुना के मैदान में मथुरा, श्रावस्ती, कौशांबी और सारनाथ तक कुषाण सत्ता स्थापित थी और पाटलिपुत्र तथा पूर्वी क्षेत्रों तक उसका प्रभाव या दावा था। मध्य भारत में मालवा और विदिशा क्षेत्र तक विस्तार माना जाता है। तारिम बेसिन के कुछ हिस्सों में भी उसका प्रभाव रहा। यह साम्राज्य गंगा, सिंधु और ऑक्सस (अमू दरिया) की घाटियों को जोड़ने वाला मौर्य काल के बाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन था।

प्रशासन और क्षत्रप प्रणाली
कनिष्क ने साम्राज्य में राजनीतिक एकता बनाए रखने के लिए अपने प्रशासनिक केंद्रों को मज़बूत किया। इतने बड़े और विविध साम्राज्य को एक ही केंद्रीय व्यवस्था से चलाना संभव नहीं था। इसलिए कनिष्क ने प्रांतीय प्रशासन की व्यवस्था अपनाई, जिसमें क्षत्रप और महाक्षत्रप नियुक्त किए जाते थे। सारनाथ के अभिलेख में महाक्षत्रप खरपल्लान और क्षत्रप वनस्पर के नाम मिलते हैं। मध्य एशिया, गांधार, पंजाब, कश्मीर, मथुरा और गंगा के मैदान की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं। इसलिए स्थानीय अधिकारियों और प्रांतीय शक्तियों को काफ़ी अधिकार देकर एक संतुलित ढाँचा बनाया गया। इस तरह कुषाण प्रशासन पूरी तरह एक जैसी केंद्रीकृत व्यवस्था नहीं था। वह केंद्रीय सत्ता और स्थानीय प्रशासन के व्यावहारिक तालमेल पर आधारित था।
कनिष्क की राजधानियाँ : पुरुषपुर और मथुरा
कनिष्क का साम्राज्य किसी एक राजधानी पर निर्भर नहीं था। उसकी प्रमुख राजधानी पुरुषपुर (आज का पेशावर, पाकिस्तान) थी। यह गांधार का मुख्य नगर था और भारत, अफ़ग़ानिस्तान तथा मध्य एशिया को जोड़ने वाले मार्गों के संगम पर होने के कारण रणनीतिक रूप से बहुत अहम था। कपिशा (अफ़ग़ानिस्तान का बेग्राम क्षेत्र) भी कुषाणों का एक महत्त्वपूर्ण राजकीय नगर था। बैक्ट्रिया के नगर उत्तरी भाग के प्रशासन का आधार थे।
मथुरा भारतीय उपमहाद्वीप में कुषाणों की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। पूर्वी और दक्षिणी भागों पर नियंत्रण के लिए यह दूसरा बड़ा केंद्र था। यहाँ से कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों के बहुत से अभिलेख, मूर्तियाँ और सिक्के मिले हैं। इस तरह पुरुषपुर उत्तर-पश्चिम और मध्य एशिया से संपर्क का केंद्र था, जबकि मथुरा उत्तर भारत में कुषाण सत्ता का। दोनों नगरों ने मिलकर साम्राज्य के दो भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों को जोड़े रखा।
व्यापार, अर्थव्यवस्था और रेशम मार्ग
कनिष्क के शासनकाल में कुषाण साम्राज्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र था। भारत, मध्य एशिया, ईरान, पश्चिमी एशिया और चीन को जोड़ने वाले रेशम मार्ग की कई शाखाएँ कुषाणों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों से होकर जाती थीं। इन रास्तों से रेशम, मसाले, कीमती पत्थर, धातुएँ और वस्त्र जैसी चीज़ों का बड़े पैमाने पर आदान-प्रदान होता था। भारत और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्र और स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार से भी कुषाण अर्थव्यवस्था को लाभ मिला। कुषाणों की उच्च गुणवत्ता की सोने की मुद्राएँ उनकी आर्थिक ताक़त का ठोस प्रमाण हैं। व्यापार के साथ भाषाओं, धार्मिक विचारों, कला की शैलियों और सांस्कृतिक परंपराओं का भी प्रसार हुआ। इसीलिए कुषाण काल को भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी दुनिया के बीच सांस्कृतिक संपर्क का निर्णायक चरण माना जाता है।
कनिष्क की मुद्राएँ (सिक्के)
कनिष्क के सिक्के उसके शासन, धार्मिक नीति और सांस्कृतिक संपर्कों को जानने का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। उसने बहुत शुद्ध सोने के सिक्के चलाए, जिनके वज़न और बनावट पर रोमन सोने के सिक्कों का प्रभाव माना जाता है। इसके साथ ही बड़ी संख्या में ताँबे के सिक्के भी जारी हुए।
सिक्कों के एक ओर राजा की आकृति है, जो प्रायः वेदी पर आहुति देते हुए या खड़ी मुद्रा में दिखाई गई है। दूसरी ओर किसी देवता की आकृति और उसका नाम है। राजा को मध्य एशियाई पोशाक में दिखाया गया है: लंबा कोट, पतलून, भारी जूते और नुकीली टोपी। कुछ सिक्कों पर वह तलवार या भाला पकड़े है, और कुछ पर उसके कंधों से अग्नि की लपटें निकलती दिखती हैं। उसकी उपाधियों में ‘शाओनानोशाओ’ (राजाओं का राजा) और ‘कोशानो’ (कुषाण) जैसे रूप मिलते हैं। मथुरा से मिले अभिलेखों में उसे ‘महाराज राजातिराज देवपुत्र’ कहा गया है। इन सिक्कों से कुषाण अर्थव्यवस्था, धार्मिक विश्वास और राजनीतिक विचारधारा का ज्ञान होता है।

कनिष्क की धार्मिक नीति
कनिष्क की धार्मिक नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहिष्णुता थी। वह स्वयं बौद्ध धर्म का संरक्षक था, किंतु उसके सिक्कों पर अलग-अलग परंपराओं के देवताओं का चित्रण मिलता है। यूनानी परंपरा के देवताओं में हेलिओस (सूर्य), सेलिने (चंद्र) और हेराक्लीज़ उसके सिक्कों पर मिलते हैं। ईरानी परंपरा से मिहिर या मिथ्र (सूर्य), माओ (चंद्र), आतश (अग्नि) और नाना का अंकन मिलता है। भारतीय परंपरा से ओएशो (शिव से जुड़ा रूप), स्कंद-कुमार, महासेन, विशाख और बुद्ध के चित्र भी मिलते हैं। उसके कुछ सिक्कों पर ‘बोद्दो’ (बुद्ध) शब्द और बुद्ध की आकृति मिलती है, जो इस बात का प्रमाण है कि बौद्ध धर्म को राजकीय मान्यता मिल चुकी थी।
इस धार्मिक विविधता को केवल निजी आस्था के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक आवश्यकता के रूप में भी देखना चाहिए। साम्राज्य में यूनानी, ईरानी, भारतीय और मध्य एशियाई, सभी तरह के लोग रहते थे। सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करके कनिष्क ने साम्राज्य की स्थिरता को मज़बूत किया।
सूर्य और स्कंद-कार्तिकेय की उपासना
सिक्कों पर मिहिर जैसे ईरानी सूर्य-देवता का अंकन बताता है कि साम्राज्य में ईरानी धार्मिक प्रभाव था। लेकिन कनिष्क ने भारत में सूर्य-पूजा शुरू नहीं की, क्योंकि सूर्य की उपासना भारतीय परंपरा में बहुत पहले से चली आ रही थी। कुषाण काल का असली महत्त्व यह है कि इस समय सूर्य की एक ख़ास तरह की मूर्ति-परंपरा को बढ़ावा मिला, जिसमें मध्य एशियाई और ईरानी पहनावे के तत्त्व दिखाई देते हैं। मथुरा की कुषाणकालीन सूर्य-प्रतिमाओं में सूर्य को लंबे वस्त्र और ऊँचे जूतों में दिखाया गया है। इसी तरह सिक्कों पर स्कंद, महासेन और विशाख का अंकन बताता है कि कुषाण काल में कार्तिकेय की उपासना प्रतिष्ठित थी और उसे राजकीय सिक्कों पर भी जगह मिली।
कनिष्क और बौद्ध धर्म
बौद्ध परंपराओं में कनिष्क को अशोक के बाद बौद्ध धर्म के बड़े संरक्षकों में गिना जाता है। उसके शासन में बौद्ध विहारों, स्तूपों और धार्मिक संस्थाओं को बड़े पैमाने पर राजकीय संरक्षण मिला। कुषाण साम्राज्य की भौगोलिक स्थिति बौद्ध धर्म के प्रसार में मददगार थी। गांधार से रेशम मार्ग पर चलने वाले भिक्षु और व्यापारी बौद्ध ग्रंथ, मूर्तियाँ और विचार मध्य एशिया और आगे चीन तक ले गए।
चतुर्थ बौद्ध संगीति
बौद्ध परंपरा के अनुसार कनिष्क के संरक्षण में चतुर्थ बौद्ध संगीति हुई। यह परंपरा मुख्य रूप से उत्तरी और सर्वास्तिवादी स्रोतों में मिलती है, जैसे ह्वेनसांग आदि के विवरण। इसके अनुसार सभा कश्मीर के कुंडलवन विहार में हुई, जबकि कुछ स्रोत जालंधर का नाम लेते हैं। इसके अध्यक्ष वसुमित्र और उपाध्यक्ष अश्वघोष माने जाते हैं। कहा जाता है कि लगभग पाँच सौ विद्वान भिक्षु इसमें शामिल हुए। सभा में सर्वास्तिवाद परंपरा के अभिधर्म ग्रंथों पर बड़ी टीकाएँ तैयार की गईं, जिन्हें महाविभाषा कहा जाता है और जो बौद्ध दर्शन का विश्वकोश मानी जाती हैं। परंपरा के अनुसार इन टीकाओं को ताम्रपत्रों पर खुदवाकर किसी स्तूप में सुरक्षित रखा गया।
इस संगीति के आयोजन, स्थान और स्वरूप के बारे में अलग-अलग परंपराओं में अलग विवरण मिलते हैं। श्रीलंका की थेरवाद परंपरा इसे मान्यता नहीं देती। इसलिए आधुनिक इतिहासकार इसे पूरे बौद्ध जगत की सर्वमान्य घटना नहीं, बल्कि मुख्य रूप से उत्तर भारत की सर्वास्तिवादी परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण परंपरा मानते हैं। महाविभाषा की रचना की सही तिथि और कनिष्क से उसका सीधा संबंध भी विद्वानों में विवादित है।
महायान का विकास
कनिष्क के शासन को प्रायः महायान से जोड़ा जाता है, पर यह कहना सही नहीं है कि महायान की स्थापना कनिष्क ने की। महायान के विचारों की जड़ें उसके शासन से पहले ही विकसित होने लगी थीं। कनिष्क के समय इन प्रवृत्तियों को अनुकूल राजनीतिक माहौल और राजकीय संरक्षण मिला, जिससे बोधिसत्त्व का आदर्श, करुणा की भावना और बुद्ध की मानव-रूप मूर्तियों का चलन बढ़ा। साथ ही सर्वास्तिवाद जैसी परंपराएँ भी इस काल में प्रभावशाली रहीं।
एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार
कनिष्क के समय बौद्ध धर्म भारत से बाहर तेज़ी से फैला। खोतान, कूचा और तुर्फ़ान जैसे नगर बौद्ध शिक्षा के बड़े केंद्र बने। चीन में बौद्ध धर्म के प्रसार की शुरुआत दूसरी शताब्दी में हुई। लोकक्षेम जैसे यू-ची मूल के भिक्षु लुओयांग में सक्रिय थे और महायान ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद करने वाले शुरुआती विद्वानों में गिने जाते हैं। इन अनुवादों से चीनी बौद्ध परंपरा की नींव पक्की हुई। आगे चलकर यही धर्म कोरिया और जापान तक पहुँचा। इस तरह कुषाण साम्राज्य एशिया में बौद्ध धर्म के फैलाव के लिए एक अहम पुल बना।
स्थापत्य और निर्माण-संरक्षण
कनिष्क के स्थापत्य-संरक्षण का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण पुरुषपुर (पेशावर) का विशाल स्तूप है, जिसे ‘कनिष्क स्तूप’ या ‘शाह-जी-की-ढेरी स्तूप’ कहा जाता है। फाह्यान, सुंग-युन और ह्वेनसांग ने इसकी ऊँचाई का आश्चर्य के साथ वर्णन किया है। इन विवरणों के अनुसार यह कई मंज़िलों वाला और बहुत ऊँचा था। इसकी ऊँचाई कई सौ फुट बताई गई है, हालाँकि इन आँकड़ों में बढ़ा-चढ़ाकर कहने की संभावना है। इसे प्राचीन भारत के सबसे ऊँचे स्मारकों में गिना जाता है।
1908-09 में शाह-जी-की-ढेरी की खुदाई में एक धातु की मंजूषा (कनिष्क कास्केट) मिली। इस पर बुद्ध और कनिष्क की आकृतियाँ तथा खरोष्ठी में अभिलेख हैं। यह कुषाण काल की कला और लेखन-परंपरा का उत्कृष्ट नमूना है। इसमें बुद्ध के अवशेष रखे थे, जिन्हें बाद में बर्मा (म्यांमार) भेज दिया गया। मंजूषा आज पेशावर संग्रहालय में है। अभिलेख में यूनानी अभियंता अगेसिलाओस का नाम मिलता है, जो निर्माण-कार्य की देखरेख करता था। यह कुषाण स्थापत्य में यूनानी तकनीकी ज्ञान और भारतीय बौद्ध परंपरा के मेल का उदाहरण है।
इसके अलावा कुषाण काल के और भी निर्माण-कार्य मिलते हैं। तक्षशिला में सिरसुख नगर कुषाणों ने बसाया था, और धर्मराजिका स्तूप में भी कुषाणकालीन निर्माण दिखता है। (तक्षशिला का सिरकप नगर और जंडियाल मंदिर कुषाण काल से पहले के हैं।) बैक्ट्रिया में सुरख कोतल का राजकीय मंदिर-परिसर इसी काल का है। मथुरा के देवकुल, जो राजकीय पूर्वज-मंदिर थे, उनके अवशेष माट में मिले हैं। इनके साथ कश्मीर और गांधार के बहुत से विहार भी इस काल की निर्माण-परंपरा को दिखाते हैं।
कनिष्क ने नगरों, विहारों और स्तूपों के निर्माण में राजकीय मदद दी, जिससे शिल्पकारों और अभियंताओं को बढ़ावा मिला। ये केंद्र पूजा-स्थल होने के साथ शिक्षा, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के भी केंद्र थे।
गांधार कला
कनिष्क के संरक्षण में गांधार कला अपने उत्कर्ष पर पहुँची। यह शैली पुरुषपुर, तक्षशिला, स्वात घाटी तथा अफ़ग़ानिस्तान के हद्दा और बामियान जैसे क्षेत्रों में विकसित हुई। इस पर यूनानी-रोमन कला का साफ़ असर था, इसलिए इसे यूनानी-बौद्ध (ग्रीको-बौद्ध) कला भी कहा जाता है। इसमें भारतीय बौद्ध विषयों और यूनानी-रोमन तकनीक का मेल दिखता है।
इस शैली की मूर्तियाँ मुख्य रूप से स्लेटी-नीले माइका शिस्ट और फ़ाइलाइट पत्थर से बनीं। आगे चलकर गारे (स्टको) का इस्तेमाल भी बढ़ा। कई मूर्तियों पर रंग भी किया जाता था। बुद्ध का चेहरा सुडौल है और प्रायः यूनानी देवता अपोलो जैसे आदर्श रूप का लगता है। बाल घुँघराले और लहरदार हैं, कपड़ों की सिलवटें असली जैसी बनाई गई हैं और शरीर के अनुपात का ध्यान रखा गया है। इसमें जातक कथाओं और बुद्ध के जीवन के प्रसंगों का विस्तार से अंकन भी मिलता है।
बुद्ध को मानव रूप में दिखाने की परंपरा से पहले उन्हें प्रतीकों, जैसे पदचिह्न, चक्र और बोधिवृक्ष, से दिखाया जाता था। इसका पूरा श्रेय केवल कनिष्क या गांधार को देना ठीक नहीं है, क्योंकि इसके शुरुआती संकेत उससे पहले भी मिलते हैं। लेकिन कुषाण संरक्षण के दौर में, गांधार और मथुरा दोनों जगह, यह परंपरा व्यापक रूप से जम गई और आगे चलकर एशिया की बौद्ध कला को गहराई से प्रभावित किया। इसके पीछे महायान की भक्ति-भावना और यूनानी मूर्तिकला की परंपरा, दोनों का योगदान माना जाता है।
मथुरा कला
मथुरा कला मुख्य रूप से भारतीय परंपरा में विकसित हुई। इसमें मथुरा के पास सीकरी की खानों का लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर इस्तेमाल होता था। यहाँ के कलाकारों ने यक्ष-परंपरा और स्थानीय मूर्तिकला को आधार बनाकर बुद्ध, बोधिसत्त्व, जैन तीर्थंकर, यक्ष-यक्षिणी, नाग, शिव और दूसरे देवताओं की मूर्तियाँ बनाईं। इससे इस शैली की धार्मिक विविधता झलकती है। मथुरा की बुद्ध-प्रतिमाओं में प्रसन्न चेहरा, मुंडित या छोटे घुँघराले बाल, चौड़े कंधे और मज़बूत शरीर के रूप में भारतीय सौंदर्यबोध दिखता है। कंकाली टीले से जैन स्तूप, आयागपट और तीर्थंकर-प्रतिमाएँ मिली हैं।
सारनाथ से मिली बोधिसत्त्व प्रतिमा, जिस पर कनिष्क के तीसरे वर्ष का अभिलेख है, मथुरा शैली का सुंदर उदाहरण है। मथुरा के पास माट से मिली कनिष्क की सिरविहीन खड़ी मूर्ति में उसे लंबे कोट, जूते और तलवार के साथ सैनिक वेश में दिखाया गया है। यह राजकीय मूर्ति-परंपरा का उत्कृष्ट नमूना है। गांधार और मथुरा शैलियों में आपस में लेन-देन भी हुआ। मथुरा कला का प्रभाव आगे गुप्त काल की मूर्तिकला तक पहुँचा, जिसे भारतीय कला का स्वर्ण युग माना जाता है।
साहित्य और विद्वानों का संरक्षण
कनिष्क के शासन को बौद्ध साहित्य और विद्वत्ता के विकास का महत्त्वपूर्ण समय माना जाता है। परंपरा के अनुसार पार्श्व, वसुमित्र, अश्वघोष, संघरक्षक और मातृचेट जैसे बौद्ध विद्वान उसके दरबार या संरक्षण से जुड़े थे। परंपरा नागार्जुन और चरक को भी उसके दरबार से जोड़ती है, पर आधुनिक विद्वान इन दोनों के कनिष्क का समकालीन होने के बारे में सावधानी बरतते हैं, क्योंकि ऐसी कई परंपराएँ बाद के साहित्य में बनी हुई लगती हैं।
अश्वघोष संस्कृत साहित्य के शुरुआती और महान कवियों में हैं। उनका ‘बुद्धचरित’ बुद्ध के जीवन पर लिखा उत्कृष्ट महाकाव्य है, और ‘सौंदरनंद’ बुद्ध के सौतेले भाई नंद के संन्यास की कथा है। उन्होंने ‘शारिपुत्र प्रकरण’ नाम का नाटक भी लिखा, जिसके अंश मध्य एशिया (तुर्फ़ान) से मिली पांडुलिपियों में सुरक्षित मिले हैं। यह संस्कृत नाटक-साहित्य के सबसे पुराने उपलब्ध उदाहरणों में है। उनकी भाषा सरल, भावपूर्ण और अलंकारों से सजी है, और बाद के कवियों, जैसे कालिदास, पर उनके प्रभाव की चर्चा होती है। परंपरा उन्हें कनिष्क का समकालीन मानती है, पर कुछ विद्वान उन्हें कनिष्क से थोड़ा पहले, पहली शताब्दी ई. में रखते हैं, और सीधे समकालीन प्रमाण कम हैं।
वसुमित्र सर्वास्तिवादी परंपरा के प्रमुख आचार्य थे और उनका नाम चतुर्थ संगीति तथा महाविभाषा से जुड़ा है। पार्श्व भी इसी परंपरा के आचार्य माने जाते हैं।
नागार्जुन को माध्यमिक दर्शन का संस्थापक माना जाता है। उनकी ‘मूलमाध्यमिककारिका’ में शून्यता की गहरी दार्शनिक व्याख्या है। विग्रहव्यावर्तनी, युक्तिषष्टिका, शून्यतासप्तति और रत्नावली जैसी रचनाएँ भी उनके नाम से जुड़ी हैं। बहुत से आधुनिक विद्वान उन्हें दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध या तीसरी शताब्दी की शुरुआत में रखते हैं और उनका संबंध सातवाहन राजाओं से जोड़ते हैं। इसलिए उन्हें कनिष्क का सीधा समकालीन मानना सर्वमान्य नहीं है।
चरक आयुर्वेद के महान आचार्य थे और ‘चरकसंहिता’ आयुर्वेद के बुनियादी ग्रंथों में है, जिसमें रोगों की पहचान, चिकित्सा, औषधि और स्वास्थ्य के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन है। परंपरा उन्हें कनिष्क का राजवैद्य बताती है, पर ग्रंथ का मौजूदा रूप बाद की शताब्दियों में संपादित और बढ़ाया गया माना जाता है।
इस काल में भाषा का बदलाव भी महत्त्वपूर्ण है। पहले बौद्ध ग्रंथ प्रायः प्राकृत और पालि में लिखे जाते थे, पर कुषाण काल में बौद्ध ग्रंथों और अभिलेखों में संस्कृत और मिश्रित संस्कृत का प्रयोग बढ़ा। गांधारी प्राकृत में खरोष्ठी लिपि में भोजपत्र पर लिखी बौद्ध पांडुलिपियाँ भी मिली हैं, जो इस काल के बौद्ध साहित्य का अमूल्य स्रोत हैं। भाषाओं, लिपियों और दार्शनिक परंपराओं के मेल से भारतीय साहित्य को नई दिशाएँ मिलीं।
कनिष्क के उत्तराधिकारी और कुषाण साम्राज्य का पतन
कनिष्क की मृत्यु की निश्चित तिथि और परिस्थितियों का कोई समकालीन वृत्तांत उपलब्ध नहीं है। उसके बाद वासिष्क ने शासन सँभाला और साम्राज्य को सुरक्षित रखा। उसके अभिलेख मथुरा और साँची से मिले हैं। कनिष्क द्वितीय के अभिलेख भी मिलते हैं, पर उसकी राजनीतिक स्थिति और क्रम पर विद्वानों में मतभेद है। इसके बाद हुविष्क शासक बना। उसके समय साम्राज्य लगभग कनिष्क जितना ही बड़ा रहा, और उसके सिक्कों पर स्कंद, विशाख, शिव, हेराक्लीज़ और सेरापिस जैसे देवताओं का अंकन मिलता है। हुविष्क के बाद वासुदेव प्रथम का शासन आया। उसके समय तक कुषाण सत्ता का भारतीयकरण ज़्यादा साफ़ दिखने लगा था। उसका नाम भारतीय है और उसके सिक्कों पर शिव और नंदी का प्रमुखता से अंकन मिलता है।
कनिष्क के बाद भी साम्राज्य कुछ दशकों तक शक्तिशाली बना रहा, पर उसका पतन धीरे-धीरे हुआ। तीसरी शताब्दी में ईरान में सासानी शक्ति के उदय से कुषाणों की पश्चिमी और मध्य एशियाई सत्ता को गंभीर चुनौती मिली। बैक्ट्रिया और आसपास के क्षेत्र सासानी नियंत्रण में चले गए और वहाँ के शासक सासानी अधीनता में ‘कुषाणशाह’ कहलाए। साथ ही भारतीय क्षेत्रों में स्थानीय राजवंशों और क्षेत्रीय शक्तियों के उभरने से साम्राज्य बिखरने लगा। इतने बड़े साम्राज्य को लंबे समय तक एक रखना कठिन था, और उत्तराधिकारियों में कनिष्क जैसी राजनीतिक क्षमता नहीं रही। साम्राज्य के हिस्से धीरे-धीरे स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र इकाइयों में बँटते गए, और तीसरी-चौथी शताब्दी तक कुषाणों की शक्ति काफ़ी सीमित हो चुकी थी। बाद में उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के उदय से एक नया राजनीतिक युग शुरू हुआ।
कनिष्क का महत्त्व और मूल्यांकन
कनिष्क का महत्त्व केवल विजयों तक सीमित नहीं है। उसने ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिसमें अलग-अलग भाषाएँ, धर्म और संस्कृतियाँ साथ-साथ फली-फूलीं। रेशम मार्ग के संरक्षक के रूप में उसने भारत, चीन, ईरान और रोम के बीच व्यापार और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण देकर उसने उसके मध्य और पूर्वी एशिया तक फैलने का रास्ता खोला, और महायान तथा सर्वास्तिवाद, दोनों के विकास के लिए अनुकूल हालात बने। कला के क्षेत्र में गांधार और मथुरा शैलियों का विकास उसके युग की बड़ी उपलब्धि है, जिसने बौद्ध मूर्तिकला और भारतीय मूर्तिकला को स्थायी रूप से प्रभावित किया। साहित्य में अश्वघोष जैसे विद्वानों की रचनाओं ने संस्कृत साहित्य की नींव मज़बूत की। उसके सिक्के आज भी साम्राज्य की धार्मिक उदारता और सांस्कृतिक विविधता का सबसे भरोसेमंद प्रमाण हैं, क्योंकि उन पर यूनानी, ईरानी, भारतीय और बौद्ध, चारों परंपराओं के देवताओं का एक साथ अंकन मिलता है।


