मिस्री राष्ट्रवाद मिस्रवासियों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान पर आधारित एक राष्ट्रवादी विचारधारा है। इसका मूल आधार मिस्र की विशिष्ट सभ्यता, ऐतिहासिक परंपरा तथा राष्ट्रीय एकता है। सामान्यतः मिस्री राष्ट्रवाद एक नागरिक राष्ट्रवाद के रूप में विकसित हुआ, जिसने धर्म, जातीयता अथवा क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर सभी मिस्रवासियों की एकता पर बल दिया। इसका प्रमुख उद्देश्य विदेशी प्रभुत्व का अंत करके एक स्वतंत्र और आधुनिक मिस्री राष्ट्र-राज्य की स्थापना करना था। यद्यपि मिस्री राष्ट्रवाद की जड़ें प्राचीन इतिहास में निहित थीं, किंतु आधुनिक स्वरूप में इसका विकास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। 1919 की मिस्री क्रांति के दौरान यह एक व्यापक जनांदोलन के रूप में उदित हुआ और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रमुख आधार बन गया।
भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पूर्वी कोने में स्थित मिस्र विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के प्रमुख केंद्रों में से एक है। यह लगभग 22° से 32° उत्तरी अक्षांश तथा 24° से 37° पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। इसकी उत्तर से दक्षिण तक अधिकतम लंबाई लगभग 1,230 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चौड़ाई लगभग 1,080 किलोमीटर है। लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला यह देश उत्तर में भूमध्य सागर, पूर्व में लाल सागर और इज़राइल, दक्षिण में सूडान तथा पश्चिम में लीबिया से घिरा हुआ है।
मिस्र का अधिकांश भूभाग शुष्क रेगिस्तानी है। देश की केवल लगभग 2.6 प्रतिशत भूमि ही कृषि योग्य है, जो मुख्यतः नील नदी की घाटी और उसके डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। शेष क्षेत्र विस्तृत रेगिस्तानों और बंजर पठारों से आच्छादित है, जहाँ वनस्पति अत्यंत अल्प मात्रा में पाई जाती है। पश्चिमी भाग में सहारा तथा लीबियाई रेगिस्तान का विस्तार है, जबकि कुछ मरुद्यान ही यहाँ हरित एवं उपजाऊ क्षेत्र प्रदान करते हैं। नील नदी के कारण ही इस शुष्क प्रदेश में जीवन, कृषि और सभ्यता का विकास संभव हो सका।
यद्यपि मिस्र भौगोलिक दृष्टि से अफ्रीका का एक देश है, तथापि उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान पश्चिमी एशिया तथा भूमध्यसागरीय विश्व से भी गहराई से जुड़ी रही है। अफ्रीका और एशिया के संगम पर स्थित होने के कारण प्राचीन काल से ही मिस्र व्यापार, संस्कृति और सामरिक गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। यही भौगोलिक स्थिति उसके ऐतिहासिक विकास और विश्व इतिहास में उसके विशिष्ट स्थान का आधार रही है।
मिस्र की राष्ट्रीय चेतना का विकास उसकी दीर्घकालीन ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा हुआ था। प्राचीन काल में मिस्र पर विभिन्न विदेशी शक्तियों ने आक्रमण किए, जिनके कारण मिस्रवासियों में अपनी विशिष्ट पहचान के प्रति जागरूकता विकसित हुई।
सातवीं–छठी शताब्दी ईसा पूर्व में असीरियाई तथा बाद में बेबीलोनियाई शक्तियों के उदय ने मिस्रवासियों को विदेशी हस्तक्षेप और प्रभुत्व का अनुभव कराया। मिस्री परंपराओं में नेबुकदनेज़र द्वितीय को प्रायः एक विदेशी शासक तथा मिस्र के प्रतिद्वंद्वी के रूप में चित्रित किया गया है।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में फारसी शासक कैम्बिसीज़ द्वितीय द्वारा मिस्र की विजय तथा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में सिकंदर महान् की विजय ने भी मिस्री राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने कैंबीसीज को एक कठोर विजेता के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसने मिस्र की धार्मिक परंपराओं का अनादर किया था। दूसरी ओर, कुछ बाद की परंपराओं में कैंबीसीज के शासन को वैध ठहराने के प्रयास दिखाई देते हैं।
इसी प्रकार सिकंदर महान् के प्रति भी मिस्रवासियों का दृष्टिकोण मिश्रित था। कुछ परंपराएँ उसे विदेशी विजेता मानती थीं, जबकि अन्य परंपराएँ उसे मिस्री राजसत्ता का वैध उत्तराधिकारी सिद्ध करने का प्रयास करती थीं। इन परंपराओं से यह संकेत मिलता है कि प्राचीन मिस्र में सांस्कृतिक आत्मचेतना तथा विदेशी शासन के प्रति असंतोष की भावनाएँ विद्यमान थीं।
प्राचीन मिस्री साहित्य की कुछ कृतियाँ, जैसे— कुम्हार का भविष्यवचन (Prophecy of the Potter), मेमने का भविष्यवचन (Oracle of the Lamb) तथा नेक्टानेबो का स्वप्न (Dream of Nectanebo) विदेशी शासन के विरोध और राष्ट्रीय पुनरुत्थान की भावना को व्यक्त करती हैं। यद्यपि आधुनिक अर्थों में इन्हें राष्ट्रवादी साहित्य नहीं कहा जा सकता है, फिर भी इन्होंने मिस्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्राचीन मिस्र अपनी सभ्यता, संस्कृति और राजनीतिक शक्ति के कारण विश्व की महानतम् प्रारंभिक सभ्यताओं में गिना जाता है। किंतु उसके पतन के बाद वह क्रमशः विभिन्न विदेशी शक्तियों के अधीन होता गया। 332 ईसा पूर्व में यूनानियों ने, 30 ईसा पूर्व में रोमनों ने तथा बाद में बीजान्टिन साम्राज्य ने उस पर शासन किया। सातवीं शताब्दी के मध्य (639–642 ई.) में अरब विजय के बाद मिस्र लंबे समय तक विभिन्न इस्लामी खलीफाओं के अधीन रहा। इसके पश्चात् 1517 ई. में मिस्र ओटोमन (उस्मानी) साम्राज्य के अधिकार में चला गया और वह कई शताब्दियों तक ओटोमन साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण प्रांत बना रहा। अरब विजय के पश्चात् मिस्र की भाषा और संस्कृति पर अरबी प्रभाव पड़ा तथा अधिकांश जनसंख्या धीरे-धीरे अरबीभाषी बन गई। इन कारणों से मिस्र पश्चिमी एशिया की राजनीति और संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गया।
मिस्र के शासक को ‘खदीव’ कहा जाता था, जो औपचारिक रूप से ऑटोमन सुल्तान की अधीनता स्वीकार करते थे, किंतु उन्नीसवीं शताब्दी तक यह अधीनता लगभग नाममात्र की रह गई थी। ऑटोमन साम्राज्य इतना दुर्बल हो चुका था कि वह अपने दूरवर्ती प्रदेशों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने में असमर्थ था।
नेपोलियन बोनापार्ट ने 1798 ई. में मिस्र पर आक्रमण किया। उस समय भी मिस्र ओटोमन (उस्मानी) साम्राज्य का ही एक अंग था। ब्रिटेन ओटोमन साम्राज्य की सहायता के लिए प्रतिबद्ध था। अतः 1801 ई. में ब्रिटिश और ओटोमन साम्राज्य की संयुक्त सेनाओं ने फ्रांसीसी सेना को मिस्र से बाहर खदेड़ दिया। फ्रांसीसी सेना की वापसी के बाद मिस्र में ओटोमन सेना के अल्बानियाई अधिकारी मुहम्मद अली (मेहमत अली) ने अपनी शक्ति सुदृढ़ की और 1805 ई. में ओटोमन सुल्तान द्वारा मिस्र का वली (गवर्नर) नियुक्त किए गए, जिसके बाद उन्होंने मिस्र में अपना वंशानुगत शासन स्थापित किया।
उन्नीसवीं शताब्दी में मिस्र का इतिहास
1805 ई. में ओटोमन (उस्मानी) सुल्तान ने मुहम्मद अली (मेहमत अली) को मिस्र का वली (गवर्नर) स्वीकार कर लिया, जिन्हें मुहम्मद अली पाशा के नाम से जाना जाता है। मुहम्मद अली पाशा (1805-1849) ने मिस्र के प्रशासनिक, आर्थिक तथा सैन्य क्षेत्रों में आधुनिकीकरण का कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने फ्रांसीसी सलाहकारों और विशेषज्ञों की सहायता से प्रशासन, सेना, कृषि तथा उद्योगों में व्यापक सुधार किए। इस काल में मिस्र में आधुनिक उद्योगों की स्थापना की गई, कृषि तथा कपास के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया गया तथा सिंचाई व्यवस्था में सुधार किया गया। इन सुधारों के परिणामस्वरूप मिस्र की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया।
मुहम्मद अली पाशा के शासनकाल में मिस्र की सैन्य तथा आर्थिक शक्ति अत्यधिक बढ़ गई और उसकी गणना ओटोमन साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली प्रांतों में होने लगी। 1831 ई. में मिस्र की सेनाओं ने सीरिया पर भी अधिकार कर लिया। मिस्र की इस बढ़ती शक्ति से यूरोपीय राष्ट्र, विशेषकर ब्रिटेन तथा अन्य महाशक्तियाँ चिंतित हो उठीं क्योंकि उन्हें भय था कि मिस्र निकट भविष्य में एक शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य का रूप धारण कर सकता है।
इसी समय यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन मिस्र की सभ्यता, स्मारकों तथा अभिलेखों के अध्ययन से मिस्रवासियों में अपने गौरवशाली अतीत के प्रति नई रुचि उत्पन्न की और प्राचीन मिस्र की सभ्यता को राष्ट्रीय गौरव के एक महत्त्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जाने लगा।
अब्बास प्रथम (1848-1854 ई.)
1848 ई. में मुहम्मद अली पाशा की मृत्यु के उपरांत उनके पौत्र अब्बास प्रथम (1848-1854 ई.) मिस्र के शासक बने। वह पश्चिमी सभ्यता तथा संस्कृति के विरोधी थे और मिस्र में यूरोपीय प्रभाव को पसंद नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने मुहम्मद अली पाशा द्वारा प्रारंभ किए गए अनेक सुधारों को सीमित या निरस्त कर दिया। 1854 ई. में अब्बास प्रथम की मृत्यु के बाद सईद पाशा मिस्र के शासक बने।
सईद पाशा (1854-1863 ई.)
सईद पाशा (1854-1863 ई.) अपेक्षाकृत उदार और प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने शासनकाल में पुनः सुधारों को प्रोत्साहन दिया तथा यूरोपीय शक्तियों के साथ सहयोग की नीति अपनाई। उनके शासनकाल में फ्रांसीसी राजनयिक एवं उद्यमी फर्डिनांड डी लेसेप्स ने स्वेज में एक विशाल नहर का निर्माण कर भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ने की योजना प्रस्तुत की, जिसका उद्देश्य यूरोप और एशिया के बीच समुद्री मार्ग को छोटा और सुविधाजनक बनाना था। 1859 ई. में स्वेज नहर की खुदाई का कार्य प्रारंभ हुआ, किंतु नहर के पूर्ण होने से पूर्व ही 1863 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद इस्माइल पाशा मिस्र के शासक बने।
इस्माइल पाशा (1863–1879 ई.)
इस्माइल पाशा (1863–1879 ई.) एक महत्त्वाकांक्षी और आधुनिकतावादी शासक थे। उनका उद्देश्य मिस्र को यूरोप के समकक्ष एक आधुनिक राष्ट्र बनाना था। उन्होंने रेलमार्गों, सड़कों, नहरों, बंदरगाहों, सार्वजनिक भवनों तथा शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण पर भारी धनराशि व्यय की। प्रशासनिक और शैक्षिक क्षेत्रों में भी अनेक सुधार किए गए। उनके शासनकाल में मिस्र में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को विशेष गति मिली।
इस्माइल के समय में 1869 ई. में फर्डिनांड डी लेसेप्स के नेतृत्व में स्वेज नहर परियोजना पूर्ण हुई और 17 नवंबर 1869 ई. को उसका औपचारिक उद्घाटन हुआ। स्वेज नहर के खुलने से मिस्र का अंतरराष्ट्रीय महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया, क्योंकि यूरोप से भारत तथा पूर्वी एशिया तक पहुँचने का समुद्री मार्ग पहले की तुलना में काफी छोटा हो गया। ब्रिटिश साम्राज्य के लिए यह भारत तथा पूर्वी उपनिवेशों तक पहुँचने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग था। इसलिए ब्रिटेन इस जलमार्ग पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहता था।
आर्थिक संकट
स्वेज नहर का संचालन स्वेज कैनाल कंपनी द्वारा किया जाता था, जिसमें फ्रांसीसी निवेशकों तथा मिस्र सरकार की भागीदारी थी। इस्माइल पाशा ने स्वेज नहर सहित अन्य महत्त्वाकांक्षी विकास योजनाओं के वित्तपोषण के लिए यूरोपीय बैंकरों से बड़े पैमाने पर ऋण लिया था, जिसके कारण मिस्र विदेशी ऋण के बोझ तले दब गया और उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। 1876 ई. तक उस पर लगभग 10 करोड़ पाउंड से अधिक का ऋण चढ़ चुका था। विदेशी ऋण चुकाने के लिए कर भी बढ़ाए गए, किंतु स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अंततः मिस्र के शासक इस्माइल पाशा ने वित्तीय संकट से उबरने के लिए 1875 ई. में स्वेज नहर कंपनी में मिस्र सरकार के स्वामित्व वाले शेयर बेचने का निर्णय लिया।
उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली थे, जो साम्राज्यवादी नीति के समर्थक थे और स्वेज नहर के महत्त्व को भली-भाँति समझते थे। उन्होंने तत्काल ब्रिटिश सरकार की ओर से लगभग 40 लाख पाउंड में मिस्र सरकार के स्वामित्व वाले लगभग 44 प्रतिशत शेयर खरीद लिए। इस घटना के बाद मिस्र की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर ब्रिटेन का प्रभाव बढ़ गया।
अब स्वेज नहर कंपनी में दो प्रमुख हिस्सेदार हो गए—फ्रांस और ब्रिटेन। स्वेज नहर के प्रबंध के लिए बनी स्वेज कैनाल कंपनी में अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों का प्रतिनिधित्व था। यद्यपि कंपनी का अधिकांश नियंत्रण फ्रांसीसी निवेशकों के हाथों में बना रहा, फिर भी नहर के संचालन तथा मिस्र के राजनीतिक मामलों में ब्रिटेन का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया।
ब्रिटिश निवेश और वित्तीय पुनर्गठन के प्रयासों के बावजूद मिस्र की आर्थिक व्यवस्था में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। बढ़ते ऋण संकट के कारण मिस्र सरकार ने अपने ऋणों के भुगतान में कठिनाइयाँ व्यक्त कीं, जिससे ब्रिटेन और फ्रांस चिंतित हो गए। अंततः 1876 ई. में ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र के वित्तीय प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ‘द्वैध नियंत्रण’ (Dual Control) की व्यवस्था लागू की। इस विदेशी हस्तक्षेप के कारण मिस्र में व्यापक असंतोष फैल गया।
यूरोपीय शक्तियों के दबाव के कारण 1879 ई. में खदीव इस्माइल पाशा को पदच्युत कर दिया गया और उनके स्थान पर तौफीक पाशा (1879-1892ई.) को मिस्र का नया खदीव बनाया गया।
मिस्री राष्ट्रवाद और उराबी आंदोलन
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश और फ्रांसीसी हितों को दी गई रियायतों तथा विदेशी हस्तक्षेप के बढ़ते प्रभाव के विरुद्ध मिस्र में राष्ट्रवाद का उदय हुआ। मिस्र की जनता अपने देश पर यूरोपीय शक्तियों के बढ़ते प्रभुत्व को देखकर चिंतित थी। तौफीक पाशा (1879-1892 ई.) के शासनकाल में मिस्र में अहमद उराबी पाशा (Ahmed Urabi) नामक एक राष्ट्रवादी सैनिक नेता के नेतृत्व में एक व्यापक आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसे ‘उराबी आंदोलन’ (Urabi Movement) के नाम से जाना जाता है।
उराबी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य मुहम्मद अली वंश की निरंकुशता को सीमित कर संवैधानिक शासन की स्थापना करना, मिस्र में बढ़ते यूरोपीय हस्तक्षेप का विरोध करना तथा मिस्रवासियों को शासन और सेना में उचित स्थान दिलाना था। इस आंदोलन का प्रसिद्ध नारा था : “मिस्र मिस्रवासियों के लिए है।”
उराबी पाशा के बढ़ते प्रभाव के कारण तौफीक पाशा को कुछ रियायतें देने और सुधारों का आश्वासन देने के लिए बाध्य होना पड़ा। उन्होंने एक प्रतिनिधि शासन व्यवस्था की दिशा में कदम उठाने तथा प्रशासन में मिस्रवासियों की भागीदारी बढ़ाने का वचन दिया।
मिस्र में उराबी पाशा के प्रभाव के बढ़ने के साथ ही ब्रिटेन और फ्रांस की चिंता भी बढ़ गई। यूरोपीय शक्तियों को आशंका थी कि यदि यह राष्ट्रवादी आंदोलन सफल हो गया तो मिस्र में उनके राजनीतिक और आर्थिक हितों को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। 1882 ई. में सिकंदरिया (अलेक्ज़ेंड्रिया) में अशांति और हिंसक घटनाओं को आधार बनाकर ब्रिटेन ने मिस्र में सैन्य हस्तक्षेप किया। ब्रिटिश नौसेना ने सिकंदरिया पर बमबारी की और बाद में ब्रिटिश सेनाओं ने स्वेज नहर क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके पश्चात् ब्रिटिश सेना ने मिस्र के भीतर अभियान चलाया और सितंबर 1882 ई. में तेल-अल-कबीर के युद्ध में उराबी पाशा को पराजित कर बंदी लिया और बाद में उन्हें श्रीलंका निर्वासित कर दिया। इसके बाद 1882 ई. से मिस्र पर ब्रिटिश प्रभाव और नियंत्रण निर्णायक रूप से स्थापित हो गया।
तौफीक पाशा अभी भी मिस्र का खदीव बना रहा, परंतु राज्य की वास्तविक शक्ति ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में केंद्रित होती गई थी। मिस्र के शासन संचालन में ब्रिटिश प्रभाव को सुदृढ़ करने के लिए 1883 ई. में लॉर्ड क्रोमर को मिस्र में ब्रिटिश एजेंट एवं महावाणिज्यदूत नियुक्त किया गया। उसने प्रशासनिक तथा वित्तीय सुधारों के माध्यम से 1907 ई. तक मिस्र में ब्रिटिश प्रभुत्व को सुदृढ़ किया। इसी समय सूडान में महदी आंदोलन को दबाने के लिए जनरल किचनर ने सैन्य अभियान चलाया और 1898 ई. में ओमदुर्मन के युद्ध में महदीवादी शक्तियों को पराजित किया, जिसके परिणामस्वरूप सूडान पर ब्रिटेन का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया। सूडान पर अधिकार के दौरान 1898 ई. में फशोदा कांड की घटना भी घटी, जिसमें ब्रिटेन और फ्रांस आमने-सामने आ गए थे। अंततः फ्रांस ने पीछे हटना स्वीकार किया और मिस्र तथा सूडान में ब्रिटिश प्रभाव को चुनौती नहीं दी।
1882 ई. में मिस्र में ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना के बाद वहाँ कुछ आर्थिक और प्रशासनिक सुधार किए गए, किंतु इनका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश हितों की रक्षा तथा ऋणों की वसूली सुनिश्चित करना था। इसके साथ ही विदेशी प्रभुत्व और आर्थिक शोषण के कारण मध्यम वर्ग तथा कृषकों में असंतोष बढ़ता जा रहा था।
1892 ई. में तौफीक पाशा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अब्बास हिल्मी द्वितीय (1892-1914 ई.) मिस्र के खदीव बने। उनके शासनकाल में मिस्रवासियों में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की माँग और अधिक तीव्र हो गई।
मिस्र के राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रारंभ
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मिस्र में एक व्यापक सांस्कृतिक पुनर्जागरण (नहदा) हुआ। इस काल में प्राचीन मिस्री सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के प्रति नई रुचि उत्पन्न हुई, जबकि आधुनिक शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य और राजनीतिक चिंतन का भी तीव्र विस्तार हुआ। नहदा आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तकों में रिफ़ाअ अल-तहतावी का विशेष स्थान था। उन्होंने शिक्षा, अनुवाद और पत्रकारिता के माध्यम से आधुनिक राजनीतिक तथा सामाजिक विचारों का प्रचार किया, स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, जनकल्याण, राष्ट्रप्रेम और आधुनिक राज्य की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया तथा मिस्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय गौरव का स्रोत बताया। उनके प्रयासों से मिस्रवासियों में ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय आत्मगौरव की भावना विकसित हुई, जिसने आधुनिक राष्ट्रवाद की आधारशिला को सुदृढ़ किया।
1905 ई. में रूस-जापान युद्ध में जापान की विजय से भी मिस्र के लोगों में एक नया उत्साह पैदा हुआ। अब मिस्री राष्ट्रवाद का मुख्य उद्देश्य विदेशी प्रभुत्व का अंत कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करना बन गया। अनेक राष्ट्रवादी नेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करना प्रारंभ किया। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि विदेशी शासन केवल मिस्र की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए ही नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए भी गंभीर चुनौती है। इस दिशा में पत्रकार याकूब सानू का विशेष योगदान था, जिन्होंने मिस्री अरबी भाषा में लेखन और व्यंग्यचित्रों के माध्यम से खदीव शासन और ब्रिटिश हस्तक्षेप की तीखी आलोचना की। उनका समाचार-पत्र ‘अबू नद्दारा’ राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का प्रभावशाली माध्यम था।
1907 ई. में मिस्र में संगठित राजनीतिक दलों के विकास का एक नया चरण प्रारंभ हुआ। इस वर्ष उदारवादी राष्ट्रवादियों ने पीपुल्स पार्टी (अल-हिज़्ब अल-उम्मा) की स्थापना की, जबकि प्रख्यात राष्ट्रवादी नेता, पत्रकार और वकील मुस्तफ़ा कामिल पाशा ने पूर्व में स्थापित नेशनल पार्टी (अल-हिज़्ब अल-वतनी) का संगठनात्मक विस्तार किया। नेशनल पार्टी के राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम उसका समाचार-पत्र ‘अल-लिवा’ (द बैनर) था।
वास्तव में, मुस्तफ़ा कामिल पाशा जापान के आधुनिकीकरण और उसकी राष्ट्रीय शक्ति से अत्यधिक प्रभावित थे। उनका मानना था कि मिस्र भी जापान की भाँति आधुनिक बनकर विदेशी प्रभुत्व से मुक्त हो सकता है। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रीय गौरव को मिस्री राष्ट्रवाद के मूल सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया और ‘वतन’ (मातृभूमि) के प्रति निष्ठा को राष्ट्रीय जीवन का सर्वोच्च आदर्श बताया। उनके नेतृत्व में राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन न रहकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का व्यापक आंदोलन बन गया।
इसके विपरीत, पीपुल्स पार्टी ने अपेक्षाकृत उदार और संवैधानिक मार्ग अपनाया। उसका मुखपत्र ‘अल-जरीदा’ था। यह दल संवैधानिक शासन, राजनीतिक सुधारों, आधुनिक शिक्षा तथा क्रमिक राजनीतिक विकास का समर्थक था। इस प्रकार बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिस्र का राष्ट्रवादी आंदोलन दो प्रमुख धाराओं—उग्र राष्ट्रवादी धारा और उदार संवैधानिक धारा—में विकसित हुआ, जिनका प्रतिनिधित्व क्रमशः नेशनल पार्टी और पीपुल्स पार्टी करती थीं।
ब्रिटिश शासन की अलोकप्रिय आर्थिक, व्यापारिक और कृषि नीतियों के कारण मिस्र में असंतोष निरंतर बढ़ता जा रहा था। ब्रिटिश प्रशासन ने मिस्र की अर्थव्यवस्था को मुख्यतः कपास उत्पादन पर निर्भर बना दिया था। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक कपास मिस्र की प्रमुख निर्यातक वस्तु बन चुकी थी। दूसरी ओर, ब्रिटेन से आयातित सस्ते औद्योगिक उत्पाद स्थानीय उद्योगों और कुटीर उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बन गए। मूल्य प्रतिस्पर्धा में स्थानीय कारीगर और छोटे उत्पादक टिक नहीं सके, जिसके परिणामस्वरूप अनेक दस्तकार और हस्तशिल्पी बेरोजगार हो गए। यद्यपि इस काल में कपास तथा अन्य कच्चे माल के प्रसंस्करण हेतु कुछ नए कारखानों की स्थापना भी हुई, किंतु इन कारखानों में कार्य की परिस्थितियाँ प्रायः असुरक्षित, अस्वास्थ्यकर और शोषणपूर्ण थीं, जिसके कारण श्रमिक वर्ग के बीच संगठनात्मक चेतना विकसित होने लगी और राष्ट्रवादी नेता श्रमिकों को संगठित करने लगे। उनके प्रयासों से विभिन्न उद्योगों के श्रमिकों, जैसे सिगरेट उद्योग के श्रमिकों, कपास मिल कर्मचारियों, गोदाम कर्मियों तथा रेलवे कर्मचारियों के संगठन और श्रमिक संघ विकसित हुए।
इन श्रमिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने बेहतर वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियों तथा श्रमिक अधिकारों की माँग को लेकर हड़तालें और आंदोलन प्रारंभ किए। यद्यपि ये आंदोलन प्रारंभ में मुख्यतः आर्थिक माँगों तक सीमित थे, परंतु धीरे-धीरे वे राष्ट्रवादी राजनीति से भी जुड़ गए। इस प्रकार श्रमिक संघों और अन्य जनसंगठनों के विकास ने मिस्र में राजनीतिक जागरण को नई दिशा दी, जिससे मिस्री राष्ट्रवाद को और अधिक बल मिला।
प्रथम विश्व युद्ध और मिस्री राष्ट्रवाद
1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। इस युद्ध में ओटोमन (उस्मानी) साम्राज्य ने जर्मनी तथा उसके सहयोगियों के पक्ष में युद्ध में भाग लिया। इसलिए ब्रिटेन नहीं चाहता था कि मिस्र अब औपचारिक रूप से भी ओटोमन साम्राज्य का अंग बना रहे। 18 दिसंबर 1914 ई. को ब्रिटेन ने मिस्र को संरक्षित राज्य घोषित कर उसे ओटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त कर दिया और ओटोमन समर्थक अब्बास हिल्मी द्वितीय को पदच्युत कर अपने समर्थक हुसैन कामिल (1914-1917) को मिस्र का सुल्तान (खदीव) बनाया।
यद्यपि मिस्र औपचारिक रूप से प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918 ई.) में शामिल नहीं हुआ, किंतु युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने मिस्र के विभिन्न वर्गों में व्याप्त आक्रोश को और बढ़ा दिया। ब्रिटिश सेना की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इजिप्शियन लेबर कोर (Egyptian Labour Corps) तथा इजिप्शियन कैमेल ट्रांसपोर्ट कोर (Egyptian Camel Transport Corps) का गठन किया गया, जिनका कार्य फिलिस्तीन, सीरिया और सिनाई मोर्चों पर ब्रिटिश सेना के लिए रसद, सामग्री और परिवहन की व्यवस्था करना था। प्रारम्भ में इन सेवाओं में भर्ती मुख्यतः स्वैच्छिक थी और अपेक्षाकृत अच्छा पारिश्रमिक दिया जाता था, किंतु युद्ध के विस्तार के साथ श्रमिकों और ऊँटचालकों की व्यापक तथा अनेक मामलों में बाध्यकारी भर्ती की जाने लगी।
जबरन अथवा अर्द्ध-जबरन भर्ती, कठोर कार्य परिस्थितियों तथा अपर्याप्त सुविधाओं के कारण हजारों मिस्रवासियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अनेक श्रमिकों को अपने परिवारों से दूर फिलिस्तीन और सीरिया के युद्ध क्षेत्रों में भेजा गया, जहाँ प्रतिकूल जलवायु, रोगों और खराब व्यवस्थाओं के कारण उन्हें भारी कष्ट सहने पड़े। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश प्रशासन ने अनाज, पशु, ऊँट तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का अधिग्रहण अथवा क्रय अपने द्वारा निर्धारित दरों पर किया, जिससे किसानों और ग्रामीणों में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और आक्रोश निरंतर बढ़ता गया।
इस स्थिति का सर्वाधिक दुष्प्रभाव मिस्र के किसान वर्ग (फ़ल्लाहीन) पर पड़ा। बड़ी संख्या में किसानों को श्रमिक दलों और सहायक सैन्य सेवाओं में भर्ती होने के लिए विवश किया गया, जिससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण जीवन दोनों प्रभावित हुए। यद्यपि युद्धकालीन मांग के कारण कुछ व्यापारियों, ठेकेदारों और मध्यवर्गीय समूहों को आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ, फिर भी महँगाई, वस्तुओं की कमी, सरकारी नियंत्रण तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण वे भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। इस प्रकार युद्धकालीन परिस्थितियों ने समाज के लगभग सभी वर्गों को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया और ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को व्यापक बना दिया।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा प्रतिपादित आत्मनिर्णय के सिद्धांत तथा युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था संबंधी विचारों के कारण बुद्धिजीवियों, छात्रों, वकीलों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच राष्ट्रीय स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और स्वशासन की माँग और प्रबल हो गई।
1917 ई. में हुसैन कामिल की मृत्यु के बाद उनके भाई फुआद प्रथम (1917–1922 ई.) को मिस्र का सुल्तान बनाया गया और उन्होंने भी ब्रिटिश संरक्षित व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।
1919 ई. का जनविद्रोह और मिस्री राष्ट्रवाद
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन द्वारा अपनाई गई कठोर नीतियों के कारण मिस्र में व्यापक असंतोष व्याप्त था। विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही मिस्रवासी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संगठित होने लगे। राष्ट्रीय दल वफ़्द के नेता साद ज़गलूल पाशा ने मिस्र की स्वतंत्रता की माँग को प्रस्तुत करने के लिए नवंबर 1918 ई. में वफ़्द प्रतिनिधिमंडल का गठन किया और पेरिस शांति सम्मेलन में जाने का निर्णय लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन द्वारा प्रतिपादित आत्मनिर्णय के सिद्धांत तथा युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था संबंधी विचारों से ज़गलूल और उनके सहयोगी अत्यधिक प्रभावित थे। वे मिस्र में स्थित ब्रिटिश उच्चायुक्त विंगेट से मिले, परंतु उनकी सभी माँगें अस्वीकार कर दी गईं। इसके बाद ज़गलूल ने अल-वफ़्द अल-मिस्री (मिस्र प्रतिनिधिमंडल) के लिए जनसमर्थन जुटाने का अभियान चलाया, ताकि उनको और उनके सहयोगियों को राष्ट्र का वैध प्रतिनिधि माना जाए। किंतु ब्रिटिश सरकार ने 8 मार्च 1919 ई. को ज़गलूल तथा उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया और अगले दिन उन्हें माल्टा भेज दिया।
साद ज़गलूल की गिरफ्तारी और निर्वासन वह चिनगारी सिद्ध हुई जिसने 1919 के क्रांतिकारी जनविद्रोह को जन्म दिया और पूरे मिस्र में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक अभूतपूर्व आंदोलन भड़क उठा। 9 मार्च को अल-अज़हर तथा अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद छात्र आंदोलन तीव्र गति से फैलने लगा। सड़कों पर उमड़ी भीड़ के सामने पुलिस व्यवस्था कमजोर पड़ गई और ब्रिटिश प्रशासन को सेना की सहायता लेनी पड़ी। 11 मार्च को वकीलों ने हड़ताल प्रारंभ कर दी, जिसमें शिक्षा तथा लोक निर्माण विभागों के अनेक कर्मचारी भी सम्मिलित हो गए। 12 मार्च को डेल्टा क्षेत्र के नगर टांटा में हजारों प्रदर्शनकारियों ने रेलवे स्टेशन की ओर मार्च किया। ब्रिटिश सैनिकों ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं, जिससे अनेक लोग मारे गए और घायल हुए। इसके बाद रेलवे, डाक, तार तथा परिवहन सेवाएँ व्यापक रूप से प्रभावित होने लगीं। काहिरा के ट्राम कर्मचारियों तथा रेलवे कर्मचारियों ने भी हड़तालें प्रारंभ कर दीं। मार्च 1919 ई. के मध्य तक छात्रों, श्रमिकों, कर्मचारियों और पेशेवर वर्गों के विशाल जुलूस काहिरा तथा अन्य नगरों में निकलने लगे।
16 मार्च 1919 ई. को साद ज़गलूल की पत्नी सफ़िया ज़गलूल, हुदा शआरावी तथा मुनीरा फ़हमी सहित अनेक महिलाओं के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक ऐतिहासिक महिला जुलूस निकाला, जो मिस्र के इतिहास में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का एक महत्त्वपूर्ण चरण था।
इस आंदोलन में धार्मिक कट्टरता का अभाव था। निर्वासित वफ़्द नेताओं में से एक की पत्नी हुदा शआरावी ने लिखा—‘अंग्रेजों ने दावा किया कि हमारा राष्ट्रीय आंदोलन मुस्लिम बहुसंख्यकों द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध विद्रोह था। इस झूठे आरोप ने कॉप्ट और अन्य धार्मिक समूहों को क्रोधित कर दिया। मिस्रवासियों ने मस्जिदों, गिरजाघरों और अन्य उपासना स्थलों में एकजुट होकर अपनी एकता प्रदर्शित की। शेख, पादरी और अन्य धार्मिक नेता साथ-साथ चले।’ वस्तुतः इस जनविद्रोह के दौरान मुसलमानों और मिस्री ईसाइयों ने इस्लामी अर्धचंद्र और ईसाई क्रॉस को एक साझा राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया।
जनविद्रोह का दमन करने के लिए ब्रिटिश सेना ने कठोर उपाय अपनाए। अनेक स्थानों पर सेना ने गोलीबारी की, संचार साधनों और रेलमार्गों की सुरक्षा के लिए सैन्य बल तैनात किए गए तथा कुछ क्षेत्रों में हवाई शक्ति का भी उपयोग किया गया। ब्रिटिश अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर चिंता थी कि दमनात्मक कार्रवाइयों की सूचनाएँ ब्रिटेन में राजनीतिक विवाद का विषय बन सकती हैं। मार्च और अप्रैल 1919 ई. के दौरान सैकड़ों मिस्रवासी मारे गए, हजारों घायल हुए और अनेक गाँवों तथा कस्बों को भारी क्षति पहुँची।

इस प्रकार 1919 ई. की क्रांति ने मिस्र की सरकार और ब्रिटिश प्रशासन को हिलाकर रख दिया। इस जनविद्रोह में मिस्री समाज के लगभग सभी वर्गों—छात्रों, श्रमिकों, किसानों, पेशेवरों, व्यापारियों, महिलाओं, विभिन्न धार्मिक समुदायों तथा ग्रामीण जनसमूहों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसके कारण यह आंदोलन एक व्यापक राष्ट्रीय हड़ताल में बदल गया और देश का आर्थिक तथा प्रशासनिक जीवन लगभग ठप्प हो गया।
मार्च 1919 ई. के तीसरे सप्ताह तक ब्रिटिश अधिकारियों को यह स्पष्ट हो गया कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने मिस्र में प्रशासनिक परिवर्तन किए और बाद में जनरल एडमंड एलनबी को विशेष उच्चायुक्त नियुक्त किया। ब्रिटिश सरकार की इस नीति-परिवर्तन का एक कारण मिस्र में बिगड़ती हुई स्थिति तथा साम्राज्यिक हितों की रक्षा की आवश्यकता थी।
मिस्र पहुँचने के बाद एलनबी ने राष्ट्रवादी नेताओं से वार्ता की। राष्ट्रवादियों की प्रमुख माँग यह थी कि साद ज़गलूल और उनके सहयोगियों को रिहा किया जाए तथा उन्हें पेरिस शांति सम्मेलन में मिस्र का पक्ष रखने की अनुमति दी जाए। अंततः अप्रैल 1919 ई. में ज़गलूल तथा उनके सहयोगियों को रिहा कर दिया गया और उन्हें पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने की अनुमति भी दे दी गई। उन्होंने पेरिस शांति सम्मेलन में मिस्र और सूडान की स्वतंत्रता की माँग प्रस्तुत की, किंतु इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
यद्यपि तनाव कुछ कम हो गया था, किंतु मिस्र की स्वतंत्रता का प्रश्न अनसुलझा था। ब्रिटेन अपने सामरिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध था, जबकि मिस्री राष्ट्रवादी पूर्ण स्वतंत्रता की माँग कर रहे थे। इस समस्या के समाधान के लिए दिसंबर 1919 ई. में लॉर्ड मिलनर की अध्यक्षता में एक आयोग मिस्र भेजा गया। प्रारंभ में राष्ट्रवादियों ने आयोग का बहिष्कार किया, किंतु बाद में लंबी बातचीत के बाद 1920 ई. में मिलनर ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि मिस्र में ब्रिटिश संरक्षित राज्य की व्यवस्था असफल हो चुकी है, अतः मिस्र को कुछ शर्तों के साथ स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए।
अप्रैल 1921 ई. में जब वफ़्द पार्टी के नेता साद ज़गलूल स्वदेश लौटे, तो उनका भव्य स्वागत किया गया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश प्रशासन ने दिसंबर 1921 ई. में उन्हें पुनः निर्वासित कर दिया और इस बार उन्हें सेशेल्स द्वीपसमूह भेज दिया। उनके पुनर्निर्वासन के विरुद्ध मिस्र के अनेक नगरों में पुनः हड़तालें और प्रदर्शन हुए, जिससे राजनीतिक संकट और गहरा गया।
मिस्र की सीमित स्वतंत्रता की घोषणा
अंततः मिस्र में बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलन को शांत करने और ब्रिटिश हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से ब्रिटेन ने 28 फ़रवरी 1922 ई. को मिस्र की स्वतंत्रता की घोषणा की। यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं थी, क्योंकि इसके साथ कुछ महत्त्वपूर्ण शर्तें भी जोड़ी गई थीं—
- ब्रिटेन ने मिस्र को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता दी।
- ब्रिटिश साम्राज्य के संचार मार्गों, विशेषकर स्वेज नहर की सुरक्षा ब्रिटेन के नियंत्रण में रहेगा।
- मिस्र में विदेशी हितों तथा विदेशी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व ब्रिटेन के पास रहेगा।
- किसी विदेशी आक्रमण अथवा बाहरी खतरे की स्थिति में मिस्र की रक्षा से संबंधित विषय ब्रिटेन के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे।
- सूडान की स्थिति का अंतिम निर्णय भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया और उस पर ब्रिटिश प्रभाव बना रहा।
- मिस्र पर ओटोमन (उस्मानी) साम्राज्य का कोई अधिकार या संरक्षण नहीं रहेगा।
इस प्रकार 1919 ई. की क्रांति और उसके परिणामस्वरूप हुए राजनीतिक परिवर्तनों ने आधुनिक मिस्री राष्ट्रवाद को सुदृढ़ आधार प्रदान किया और पूर्ण स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
दो विश्वयुद्धों के मध्य मिस्र की स्वतंत्रता के प्रयास
1922 ई. की व्यवस्था से मिस्र के राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी नेता संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि इससे ना तो मिस्र को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी और न ही ब्रिटेन के विशेष अधिकारों तथा प्रभाव का अंत हुआ था। परिणामस्वरूप पुनः आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष प्रारंभ हो गए।
इसी बीच सुल्तान फुआद प्रथम ने मिस्र की नवीन अंतरराष्ट्रीय स्थिति को औपचारिक रूप देने के लिए 15 मार्च 1922 ई. को स्वयं को ‘राजा फुआद प्रथम’ घोषित कर दिया।
1923 ई. में मिस्र में एक नया संविधान लागू किया गया और संसदीय चुनाव कराए गए। जनवरी 1924 ई. के चुनावों में वफ़्द पार्टी को भारी सफलता मिली और साद ज़गलूल पाशा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। वह प्रारंभ से ही 1922 ई. समझौते का विरोधी थे और मिस्र की पूर्ण स्वतंत्रता के हिमायती थे। वह किसी भी रूप में ब्रिटेन के प्रभुत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इस समय तुर्की मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में एक गणतंत्र राज्य बन चुका था और जागलुल पाशा भी मिस्र को ब्रिटिश प्रभुत्व से पूर्णरूपेण स्वतंत्र करा कर एक गणतंत्र बनाना चाहते।
इसी क्रम में ज़गलूल पाशा लंदन गए और वहाँ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि 1922 की व्यवस्था को समाप्त कर मिस्र को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाए। किंतु ब्रिटिश सरकार ने इस माँग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मिस्र में पुन: हिंसक क्रांति भड़क उठी और ब्रिटिश अधिकारियों पर पुनः आक्रमण शुरू हो गए। इसी दौरान 19 नवंबर 1924 ई. को सूडान के गवर्नर-जनरल तथा मिस्र में ब्रिटिश सेना के सेनापति सर ली स्टैक की काहिरा में हत्या कर दी गई।
साद ज़गलूल पाशा तथा राजा फुआद दोनों ने इस घटना की भर्त्सना करते हुए अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया। किंतु ब्रिटिश सरकार ने इसे अपने अधिकार और प्रतिष्ठा के लिए गंभीर चुनौती माना और मिस्र को दंडित करने के लिए 22 नवंबर 1924 ई. को निम्नलिखित शर्तें प्रस्तुत कीं—
- मिस्र की सरकार इस हत्या के लिए ब्रिटिश सरकार से क्षमा-याचना करे और यह आश्वासन दे कि भविष्य में ऐसी घटना नहीं होगी ।
- हत्या के लिए ब्रिटेन को 5 लाख पाउंड का हर्जाना दिया जाए।
- हत्या के दोषियों को कठोरतम् दंड दिया जाए।
- सूडान में तैनात सभी मिस्री सैनिकों और अधिकारियों को 24 घंटे के भीतर वापस बुलाया जाए।
- सूडान के कपास उत्पादक क्षेत्रों को नील नदी के जल के उपयोग की पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए।
साद ज़गलूल पाशा पहली तीन शर्तों को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, किंतु अंतिम दो शर्तों को स्वीकार करना उनके लिए संभव नहीं था। विशेष रूप से नील नदी के जल से संबंधित माँग मिस्र के लिए अत्यंत संवेदनशील थी, क्योंकि नील नदी ही उसकी अर्थव्यवस्था और कृषि जीवन का आधार थी। यदि जल का नियंत्रण सूडान के पक्ष में चला जाता, तो मिस्र की कृषि व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुँच सकती थी।
जब ब्रिटेन अपनी सभी माँगें मनवाने में सफल नहीं हुआ, तब उसने धमकी दी कि अलेजेंड्रिया के चुंगीघर पर कब्जा कर लिया जाएगा। इस संकटपूर्ण परिस्थिति में साद जगलुल पाशा ने नवंबर 1924 ई. में प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और तीन साल बाद 1927 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।
साद ज़गलूल के बाद मुस्तफ़ा अल-नहास पाशा प्रधानमंत्री बने और मिस्र की राजनीति में अपेक्षाकृत स्थिरता आई और मिस्र की राजनीति में अपेक्षाकृत स्थिरता आई। 1929 ई. में ब्रिटेन में लेबर पार्टी के पुनः सत्ता में आने के बाद परिस्थितियों में कुछ सुधार हुआ। ब्रिटेन के विदेश सचिव आर्थर हेंडरसन ने 1930 ई. में लंदन और काहिरा के मध्य एक नई संधि का प्रारूप प्रस्तुत किया। यद्यपि यह संधि मिस्र को अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम थी, फिर भी राष्ट्रवादी मुस्तफ़ा नहास पाशा इससे पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। फलतः मिस्र में पुनः असंतोष की भावना उभरने लगी और संसद को बार-बार स्थगित करना पड़ा।
राजा फुआद से मतभेद के कारण नहास पाशा को पद छोड़ना पड़ा और इस्माइल सिदकी पाशा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। उन्होंने 1930 ई. में एक नया संविधान लागू किया, जो 1923 के उदार संविधान की अपेक्षा कम लोकतांत्रिक था और जिसमें राजा फुआद को संसद तथा राष्ट्रवादी दलों की तुलना में अधिक शक्तियाँ दी गई थीं।
इस्माइल सिदकी पाशा ने ब्रिटेन के साथ समझौते की नीति अपनाई और ब्रिटेन की लगभग सभी माँगों को स्वीकार कर लिया। इसके बदले ब्रिटेन ने आश्वासन दिया कि सूडान की सिंचाई योजनाओं के लिए मुख्यतः नीली नील (Blue Nile) के जल का उपयोग किया जाएगा और सफेद नील (White Nile) के जल को मिस्र के लिए छोड़ दिया जाएगा। फिर भी, मिस्रवासी ब्रिटेन की बाँध तथा सिंचाई योजनाओं को संदेह की दृष्टि से देखते रहे।
मिस्र की संसद ने इस व्यवस्था में संशोधन के लिए राष्ट्र संघ में अपील की, किंतु ब्रिटेन ने यह तर्क दिया कि यह कोई अंतरराष्ट्रीय विवाद नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य और उसके अधीन क्षेत्रों से संबंधित विषय है। अतः राष्ट्र संघ ने इस मामले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा और मिस्र की अपील प्रभावहीन सिद्ध हुई।
1936 ई. की आंग्ल–मिस्र संधि
सितंबर 1933 ई. में स्वास्थ्य कारणों तथा शासन में राजा फुआद प्रथम के बढ़ते हस्तक्षेप से असंतुष्ट होकर इस्माइल सिदकी पाशा ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके पश्चात् अब्देल फत्ताह याह्या पाशा (1933–1934 ई.) तथा बाद में तौफीक नसीम पाशा (1934–1936 ई.) प्रधानमंत्री बने। इस अवधि में मिस्र की राजनीति में संवैधानिक शासन की पुनर्स्थापना और ब्रिटिश प्रभाव को सीमित करने की माँग निरंतर प्रबल होती गई।
अक्टूबर 1935 ई. में इटली द्वारा इथियोपिया (अबीसीनिया) पर आक्रमण किए जाने से भूमध्यसागरीय तथा उत्तर-पूर्वी अफ्रीका की स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई। इस संकट के कारण ब्रिटेन ने स्वेज नहर और मिस्र की सुरक्षा के लिए अपनी सैन्य तथा नौसैनिक गतिविधियों में वृद्धि कर दी। मिस्रवासियों ने इसे ब्रिटिश हस्तक्षेप और प्रभुत्व के विस्तार के रूप में देखा। कुछ राष्ट्रवादियों को आशंका थी कि मिस्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध संभावित आंग्ल-इटालियन संघर्ष में घसीटा जा सकता है, जबकि अन्य राष्ट्रवादी नेताओं का मत था कि यह ब्रिटेन पर दबाव डालकर राष्ट्रीय माँगें मनवाने का उपयुक्त अवसर है।
इस समय काहिरा तथा अन्य नगरों में ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन प्रारंभ हो चुके थे। इसी बीच ब्रिटिश विदेश सचिव सैमुअल होर ने 9 नवंबर 1935 ई. को लंदन में दिए गए एक भाषण में स्वीकार किया कि ब्रिटिश सरकार ने 1923 ई. के संविधान की पुनर्स्थापना का समर्थन नहीं किया था, क्योंकि वह उसे तत्कालीन परिस्थितियों में व्यावहारिक नहीं मानती थी। सैमुअल के इस वक्तव्य से मिस्र के राष्ट्रवादियों में व्यापक असंतोष फैल गया और संवैधानिक शासन तथा पूर्ण राष्ट्रीय संप्रभुता की माँग और अधिक तीव्र हो गई।
वफ़्द दल के नेता मुस्तफ़ा नहास पाशा ने ब्रिटेन को स्पष्ट चेतावनी दी कि वह मिस्र से किसी भी प्रकार की सहायता की अपेक्षा न करे। सहयोग केवल समानता के आधार पर ही संभव है। ब्रिटेन ने आश्वासन दिया कि वह अपनी नीतियों और गतिविधियों की जानकारी मिस्र को देता रहेगा, किंतु साथ ही यह भी कहा कि संधि पर पुनर्विचार करने का यह उचित समय नहीं है। इस दौरान कई नगरों में ब्रिटिश-विरोधी दंगे हो रहे थे।
1935 ई. के अंत तक लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने मिलकर नहास पाशा के नेतृत्व में एक संयुक्त मोर्चे (यूनाइटेड फ्रंट) का गठन किया। मिस्र में राजनीतिक संकट की संभावना को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवादियों की माँगों के प्रति नरम रुख अपनाया। 12 दिसंबर 1935 ई. को राजा फुआद प्रथम ने एक शाही आदेश जारी करके 1923 ई. के संविधान को पुनः लागू कर दिया। इसके कुछ ही समय बाद 28 अप्रैल 1936 ई. को राजा फुआद की मृत्यु हो गई और उनके सोलहवर्षीय पुत्र फारूक प्रथम मिस्र के सिंहासन पर बैठे। उनकी अल्पायु के कारण एक संरक्षक परिषद् (Regency Council) ने शासन की संवैधानिक शक्तियाँ संभालीं। 10 मई 1936 ई. को मुस्तफ़ा नहस पाशा पुनः प्रधानमंत्री बनाए गए । इसी समय राष्ट्रवादियों ने ग्रेट ब्रिटेन के साथ ऐसी नई संधि की माँग की, जो मिस्र को पूर्ण संप्रभुता प्रदान करे।
वास्तव में, इटली की बढ़ती शक्ति से मिस्र स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहा था और उसे बाहरी सुरक्षा की आवश्यकता थी। दूसरी ओर ब्रिटेन भी स्वेज नहर और मध्य-पूर्व में अपने सामरिक हितों को सुरक्षित करना चाहता था। अंततः लंबी बातचीत के बाद 26 अगस्त 1936 को लंदन में आंग्ल–मिस्र संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने मिस्र की औपचारिक संप्रभुता को स्वीकार करते हुए भी स्वेज नहर क्षेत्र में ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति को बनाए रखा।
1936 की संधि की प्रमुख शर्तें
- ब्रिटेन और मिस्र के मध्य सैन्य सहयोग स्थापित किया जाएगा। युद्ध की स्थिति में दोनों देश एक-दूसरे की सहायता करेंगे। मिस्र इस बात के लिए सहमत था कि उसकी सेना का आधुनिकीकरण ब्रिटिश सैन्य उपकरणों और प्रशिक्षण की सहायता से किया जाएगा।
- मिस्र ने ब्रिटेन को अलेक्ज़ेन्ड्रिया तथा पोर्ट सईद के बंदरगाहों का उपयोग करने की अनुमति दी। युद्ध की स्थिति में ब्रिटिश सेना मिस्र के क्षेत्र से होकर आवागमन कर सकती थी।
- ब्रिटेन मिस्र के अधिकांश भाग से अपनी सेना हटाने पर सहमत हुआ, किंतु स्वेज नहर की सुरक्षा के लिए उसे नहर क्षेत्र में लगभग 10,000 सैनिक तथा 400 वायुसेना कर्मी रखने का अधिकार मिला।
- सूडान के संबंध में मिस्र को वहाँ की आंग्ल–मिस्री संयुक्त शासन व्यवस्था को स्वीकार करना पड़ा।
- मिस्र की सरकार विदेशियों तथा उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होगी तथा उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी।
- मिस्र की बढ़ती स्वतंत्रता को मान्यता देते हुए ग्रेट ब्रिटेन ने अपने उच्चायुक्त के स्थान पर राजदूत नियुक्त करने पर सहमति व्यक्त की। साथ ही उसने मिस्र को राष्ट्र संघ की सदस्यता दिलाने में सहयोग देने का आश्वासन भी दिया।
इस संधि के परिणामस्वरूप मिस्र की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हुई। अपनी प्रतिज्ञा के अनुरूप ग्रेट ब्रिटेन ने 1937 ई. में मॉन्त्रॉ (Montreux) सम्मेलन में विदेशी विशेषाधिकारों को समाप्त करने की दिशा में सहयोग दिया। 1937 ई. में मिस्र राष्ट्र संघ का सदस्य बन गया और राजा फारूक को स्वतंत्र मिस्र के शासक के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई। 29 जुलाई 1937 ई. को वयस्क होने के पश्चात् फारूक ने स्वयं शासन की बागडोर संभाली और धीरे-धीरे राजसत्ता को पुनः सशक्त बनाने का प्रयास किया।
इतिहासकार मैरियट के अनुसार 1936 ई. की संधि ने मिस्र को पूर्ण स्वतंत्रता तो नहीं दी, किंतु उसने ब्रिटिश संरक्षण-व्यवस्था को काफी हद तक कमजोर कर दिया और मिस्र को अधिक स्वायत्त राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ाया। इस संधि से मिस्रवासियों में केवल यही असंतोष था कि स्वेज नहर क्षेत्र से ब्रिटिश सेनाएँ नहीं हटाई गईं थीं। सेना हटाने की अवधि 20 वर्ष निर्धारित की गई थी और इस संधि के संपन्न होने के केवल तीन वर्ष बाद ही द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया।
स्वतंत्रता प्राप्ति और संविधान निर्माण
1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। यद्यपि मिस्र ने प्रारंभ में जर्मनी और इटली के विरुद्ध युद्ध की घोषणा नहीं की, फिर भी युद्ध के दौरान मिस्र मित्र राष्ट्रों के लिए एक महत्त्वपूर्ण सैनिक आधार बना रहा। जब 1940–1942 ई. के दौरान जर्मनी और इटली की सेनाएँ उत्तरी अफ्रीका में आगे बढ़ीं और मिस्र की सीमाओं के निकट पहुँच गईं, तब मिस्र पर ब्रिटिश नियंत्रण और कडा हो गया। राजा फारूक ब्रिटिश नीतियों से अकसर असहमत रहते थे और मिस्र की राजनीति में राजशाही की भूमिका बढ़ाना चाहते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने कई प्रधानमंत्रियों को हटाया और नियुक्त किया। फरवरी 1942 ई. में अब्दीन पैलेस संकट के दौरान ब्रिटिश दबाव के कारण फारूक को वफ़्द पार्टी के नेता मुस्तफ़ा नहास पाशा को प्रधानमंत्री नियुक्त करना पड़ा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मिस्र के विभिन्न राजनीतिक दलों तथा समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा यह माँग उठाई जाती रही कि 1936 की आंग्ल–मिस्र संधि का पुनरीक्षण किया जाए। वास्तव में, मिस्रवासी स्वेज नहर क्षेत्र में ब्रिटिश सेना की उपस्थिति तथा सूडान पर संयुक्त नियंत्रण के कारण ब्रिटेन के विरोधी थे, जबकि ग्रेट ब्रिटेन नहर क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखना चाहता था। इस विवाद के कारण दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे।
1945 ई. में सादिस्ट दल सत्ता में आया और अहमद माहिर पाशा प्रधानमंत्री बने। अहमद माहिर भी 1936 ई. की संधि में परिवर्तन करना चाहते थे, किंतु फरवरी 1945 ई. में उनकी हत्या हो गई। इसके बाद भी मिस्र की विभिन्न सरकारें ब्रिटेन के साथ संधि के पुनरीक्षण का प्रश्न उठाती रहीं, किंतु इंग्लैंड इस विषय में कोई मूलभूत परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं था।
1947 ई. में मिस्र ने अपनी शिकायत संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष रखी। उसने सुरक्षा परिषद से अनुरोध किया कि ब्रिटेन मिस्री जनता की इच्छा के विरुद्ध मिस्र की भूमि पर अपनी सेना रखे हुए है, इसलिए सुरक्षा परिषद ब्रिटिश सेनाओं को मिस्र से हटाने तथा सूडान के प्रश्न के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाए। किंतु सुरक्षा परिषद इस विषय पर कोई निर्णायक कार्यवाही नहीं कर सकी, जिससे मिस्र में पुनः राष्ट्रवादी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया।
1948 ई. में अरब–इज़राइल युद्ध तथा उसमें अरब देशों की पराजय ने मिस्र की राजनीति को और अधिक उग्र बना दिया। मिस्र में वफ़्द पार्टी तथा मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठन उग्र राष्ट्रवाद और ब्रिटिश-विरोधी भावना को प्रोत्साहित कर रहे थे। 1950 ई. के चुनावों में वफ़्द पार्टी को पुनः बहुमत मिला। मुस्तफ़ा नहास पाशा के नेतृत्व में बनी सरकार ने पुनः स्वेज नहर और सूडान के प्रश्न को हल करने का प्रयास किया।
अंततः अक्टूबर 1951 ई. में नहास पाशा ने 1936 ई. की आंग्ल–मिस्र संधि को एकतरफा समाप्त घोषित कर दिया तथा राजा फारूक को ‘मिस्र और सूडान का राजा’ घोषित किया। इसके बाद मिस्र में ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन और तीव्र हो गया। मिस्र की जनता, पुलिस बल तथा फ़िदायीन (गुरिल्ला) समूहों ने स्वेज नहर क्षेत्र में ब्रिटिश सेनाओं के विरुद्ध प्रतिरोध आरंभ कर दिया।
1952 की मिस्र क्रांति
जनवरी 1952 ई. में काहिरा में भीषण अशांति और हिंसक घटनाएँ हुईं। 25 जनवरी 1952 ई. को स्वेज नहर क्षेत्र के नगर इस्माइलिया में ब्रिटिश सेना और मिस्री पुलिस बल के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें अनेक मिस्री पुलिसकर्मी मारे गए और घायल हुए। इस घटना से पूरे मिस्र में तीव्र आक्रोश फैल गया। आज भी 25 जनवरी को मिस्र में ‘पुलिस दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस्माइलिया की घटना के अगले ही दिन 26 जनवरी 1952 ई. को काहिरा में क्रोधित भीड़ ने ब्रिटिश प्रतिष्ठानों, होटलों, क्लबों, सिनेमाघरों, दुकानों तथा अन्य विदेशी संपत्तियों को आग लगा दी, जिसे ‘काहिरा अग्निकांड’ कहा जाता है।
इस तनावपूर्ण वातावरण में 23 जुलाई 1952 ई. को मिस्र में ‘मुक्त अधिकारी आंदोलन’ (फ्री ऑफ़िसर्स मूवमेंट) के नेतृत्व में एक सैनिक क्रांति हुई। इस आंदोलन का नेतृत्व जनरल मुहम्मद नगीब और गमाल अब्देल नासिर ने किया। विद्रोही सैनिकों ने काहिरा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और राजा फारूक प्रथम को पदत्याग के लिए विवश कर दिया। 26 जुलाई 1952 ई. को फारूक ने अपने अल्पव्यस्क पुत्र फुआद द्वितीय के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया और देश छोड़कर निर्वासन में चले गए। फुआद द्वितीय नाममात्र के राजा बने रहे, जबकि वास्तविक सत्ता जनरल नजीब और क्रांतिकारी कमान परिषद के हाथों में चली गई।
नई क्रांतिकारी सरकार ने अनेक उच्चाधिकारियों को पदच्युत किया, राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए तथा प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत की। सितंबर 1952 ई. में भूमि सुधार कानून लागू किए गए, जिसके अंतर्गत बड़े भू-स्वामित्व की सीमा निर्धारित की गई और किसानों की स्थिति को सुधारने के प्रयास किए गए।
जनवरी 1953 ई. में सभी राजनीतिक दलों को भंग कर दिया गया। 18 जून 1953 ई. को राजशाही को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया और मिस्र को गणराज्य घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही लगभग डेढ़ शताब्दी से चला आ रहा मुहम्मद अली वंश का शासन समाप्त हो गया। इसके बाद मुहम्मद नगीब मिस्र के प्रथम राष्ट्रपति बने तथा कुछ समय तक प्रधानमंत्री का दायित्व भी संभालते रहे।
सूडान और स्वेज नहर का प्रश्न अभी भी विवादास्पद बना रहा। एक ओर मिस्र की नगीब सरकार ब्रिटिश सेना को हटाने के लिए प्रयत्नशील थी, तो दूसरी ओर सूडान में भी राष्ट्रवाद का उदय हो चुका था और वहाँ की जनता न तो ब्रिटिश नियंत्रण में रहना चाहती थी और न ही मिस्र के अधीन रहना चाहती थी। नगीब की सरकार ने सूडान के आत्मनिर्णय के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप 1953 ई. के आंग्ल–मिस्र समझौते के बाद सूडान की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ और अंततः 1 जनवरी 1956 ई. को वह एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया। स्वेज नहर के प्रश्न पर भी ब्रिटेन के साथ वार्ता प्रारंभ की गईं।
राष्ट्रपति मुहम्मद नगीब लोकतांत्रिक शासन की शीघ्र बहाली तथा नए संविधान के निर्माण के पक्षधर थे। दिसंबर 1952 में क्रांतिकारी कमान परिषद ने 1923 ई. के संविधान को समाप्त कर दिया और नए संवैधानिक ढाँचे की तैयारी प्रारंभ की। किंतु लोकतंत्र की स्थापना और सेना की राजनीतिक भूमिका के प्रश्न पर नगीब तथा गमाल अब्देल नासिर के बीच गंभीर मतभेद हो गए।
फरवरी 1954 ई. में क्रांतिकारी कमान परिषद ने मुहम्मद नगीब को राष्ट्रपति पद से हटा दिया और गमाल अब्देल नासिर को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। किंतु व्यापक जनदबाव और सेना के एक वर्ग के विरोध के कारण मार्च 1954 में नगीब को पुनः राष्ट्रपति पद पर बहाल करना पड़ा। इसके बावजूद वास्तविक सत्ता धीरे-धीरे नासिर के हाथों में केंद्रित होती गई। अंततः 14 नवंबर 1954 ई. को नगीब को सभी पदों से हटाकर नज़रबंद कर दिया गया। इसके बाद नासिर मिस्र के निर्विवाद नेता बन गए। जून 1956 में नए संविधान पर हुए जनमत-संग्रह के साथ नासिर आधिकारिक रूप से मिस्र के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और 28 सितंबर 1970 ई. को अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे।
गमाल अब्देल नासिर के नेतृत्ववाली मिस्री सरकार को अनेक आंतरिक और बाह्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों, विशेषकर ब्रिटेन और फ्रांस से थी। ब्रिटेन 1882 से मिस्र के राजनीतिक मामलों में प्रभावी भूमिका निभा रहा था और स्वेज नहर क्षेत्र में उसकी सैन्य उपस्थिति बनी हुई थी। दूसरी ओर, फ्रांस और ब्रिटेन दोनों ही अफ्रीका तथा अरब जगत में उभर रहे राष्ट्रवादी आंदोलनों से चिंतित थे, क्योंकि इससे उनके औपनिवेशिक हितों को खतरा हो सकता था। इसके अतिरिक्त, इज़राइल के साथ जारी तनाव और अरब–इज़राइल संघर्ष भी मिस्र की विदेश नीति के लिए एक गंभीर चुनौती था।
अरबों के समर्थन किया और अरब राष्ट्रवाद को अपनी नीति का महत्त्वपूर्ण आधार बनाया, जिससे मिस्र में अरब राष्ट्रवाद को नई दिशा और गति मिली। उनका विश्वास था कि अरब जगत की राजनीतिक एकता ही साम्राज्यवाद तथा इज़राइल के विरुद्ध प्रभावी प्रतिरोध का आधार बन सकती है। नासिर ने यह प्रतिज्ञा की कि वह देश से सभी विदेशी सेनाओं को निकाले बिना चैन की सांस नहीं लेगा।
औपचारिक आंग्ल–मिस्र समझौता (9 अक्टूबर 1954 ई.)
नासिर की दृढ़ नीतियों तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया कि वह अधिक समय तक स्वेज नहर क्षेत्र को अपने नियंत्रण में नहीं रख सकेगी। फलतः 1954 में मिस्र और ब्रिटेन के बीच वार्ता प्रारंभ हुई। 27 जुलाई 1954 ई. को दोनों पक्षों के बीच समझौते के मूल सिद्धांतों पर सहमति बनी और 19 अक्टूबर 1954 ई. को एक औपचारिक आंग्ल–मिस्र समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। आंग्ल–मिस्र समझौते के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे—
- ब्रिटेन 20 महीनों के भीतर स्वेज नहर क्षेत्र से अपनी सभी सैन्य टुकड़ियाँ हटा लेगा।
- स्वेज नहर क्षेत्र में स्थित ब्रिटिश सैन्य अड्डे और प्रतिष्ठान मिस्र को सौंप दिए जाएँगे।
- किसी बाहरी आक्रमण अथवा ऐसे अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में ब्रिटेन निर्धारित शर्तों के अंतर्गत स्वेज क्षेत्र की सुविधाओं का उपयोग कर सकेगा।
समझौते के अनुसार ब्रिटिश सेना की वापसी की प्रक्रिया आरंभ हुई और 13 जून 1956 ई. को अंतिम ब्रिटिश सैनिक ने स्वेज नहर क्षेत्र छोड़ दिया। इस प्रकार 1954 ई. के आंग्ल–मिस्र समझौते ने स्वेज नहर क्षेत्र में ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति का अंत कर दिया और मिस्र की संप्रभुता को सुदृढ़ किया।
राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने 26 जुलाई 1956 ई. को स्वेज नहर कंपनी के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की, जो बाद में ‘स्वेज संकट’ का कारण बनी। नासिर की घोषणा के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और इज़राइल ने अक्टूबर 1956 ई. में संयुक्त रूप से मिस्र पर आक्रमण कर दिया। यद्यपि सैन्य दृष्टि से मिस्र को क्षति उठानी पड़ी, फिर भी अंतरराष्ट्रीय दबाव, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के विरोध के कारण आक्रमणकारी शक्तियों को पीछे हटना पड़ा। परिणामस्वरूप स्वेज नहर पर मिस्र का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया और देश की राष्ट्रीय संप्रभुता तथा नासिर की प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस घटना ने न केवल मिस्र में, बल्कि समूचे अरब जगत में उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों में नई ऊर्जा का संचार किया।
नासिर ने पैन-अरबवाद की नीति को बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1958 ई. में मिस्र और सीरिया ने मिलकर संयुक्त अरब गणराज्य की स्थापना की। यद्यपि प्रशासनिक और राजनीतिक मतभेदों के कारण 1961 ई. में सीरिया इस संघ से अलग हो गया, फिर भी नासिर के शासनकाल में मिस्र अरब राष्ट्रवाद का प्रमुख केंद्र बना रहा और समूचे अरब विश्व में उसका व्यापक प्रभाव स्थापित हुआ।
1960 के दशक में गमाल अब्देल नासिर ने ‘अरब समाजवाद’ की नीति को अधिक व्यवस्थित रूप से अपनाया। इसके अंतर्गत प्रमुख उद्योगों, बैंकों, बीमा कंपनियों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण आर्थिक संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया गया और अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका का विस्तार किया गया। नियोजित आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय तथा संसाधनों के अधिक समान वितरण को इस नीति का प्रमुख उद्देश्य बनाया गया।
राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी शासन ने राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। विदेशी हस्तक्षेप, आंतरिक अस्थिरता, शीतयुद्ध की प्रतिस्पर्धा तथा इज़राइल के साथ निरंतर संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुदलीय राजनीति को समाप्त कर एक-दलीय व्यवस्था स्थापित की गई और विपक्षी दलों पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए। यह व्यवस्था 1970 ई. में नासिर की मृत्यु तक बनी रही।
इस प्रकार मिस्री राष्ट्रवाद का विकास एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। इसकी जड़ें प्राचीन मिस्र की सांस्कृतिक परंपराओं में निहित थीं, जबकि इसका आधुनिक स्वरूप उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों में विकसित हुआ। सांस्कृतिक पुनर्जागरण, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष, 1919 ई. की क्रांति, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन तथा 1952 की क्रांति ने मिस्री राष्ट्रवाद को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। साथ ही, अरब राजनीति के साथ इसके संबंधों ने भी इसके स्वरूप और दिशा को प्रभावित किया। यद्यपि समय-समय पर मिस्री राष्ट्रवाद और अरब राष्ट्रवाद के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया, तथापि मिस्र की विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान आज भी मिस्री राष्ट्रवाद का मूल आधार बनी हुई है।




