भारत पर ईरानी आक्रमण ( Iranian Invasions of India)

भारत पर ईरानी आक्रमण ( Iranian Invasions of India)
भारत पर ईरानी आक्रमण पृष्ठभूमि जिस समय मगध साम्राज्य के नेतृत्व में पूर्वी भारत में […]

Table of Contents

भारत पर ईरानी आक्रमण

पृष्ठभूमि

जिस समय मगध साम्राज्य के नेतृत्व में पूर्वी भारत में राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी, ठीक उसी काल में पश्चिमोत्तर भारत राजनीतिक रूप से अत्यंत विखंडित और संघर्षग्रस्त था। यह विशाल क्षेत्र अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों तथा गणराज्यों में बँटा हुआ था, जो अपनी-अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए आपस में निरंतर संघर्षरत रहते थे। इस क्षेत्र में कोई ऐसी एकीकृत और शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता विद्यमान नहीं थी, जो इन बिखरे हुए राज्यों को एक सूत्र में पिरो सके।

आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत समृद्ध था, किंतु इसकी राजनीतिक दुर्बलता और आंतरिक फूट ने विदेशी आक्रमणकारियों को भारत की ओर आकर्षित किया। इसी परिस्थिति के परिणामस्वरूप भारत को प्राचीन काल में दो प्रमुख विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा—पहला ईरान के हखामनी (अकेमेनिड) शासकों का आक्रमण, और दूसरा मकदूनिया (मैसिडोनिया) के सिकंदर महान का आक्रमण।

हखामनी शासकों में साइरस महान (कुरुष द्वितीय) ने सर्वप्रथम उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों के कुछ भागों पर अपना अधिकार स्थापित किया, जबकि उसके परवर्ती शासक डेरियस प्रथम (दारा प्रथम) ने सिंध और पंजाब के विस्तृत क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में औपचारिक रूप से सम्मिलित कर लिया। इसके पश्चात 326 ईसा पूर्व में सिकंदर महान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर आक्रमण किया और झेलम नदी के तट पर राजा पोरस के साथ ऐतिहासिक युद्ध लड़ा।

इन क्रमिक आक्रमणों के परिणामस्वरूप भारत और पश्चिमी एशिया के मध्य व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्क में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और लिपि, प्रशासन-व्यवस्था तथा कला के क्षेत्र में गहरा बाह्य प्रभाव देखने को मिला। विशेष रूप से यूनानी संपर्क ने पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से प्रभावित किया, जिसने आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य-विस्तार के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं।

ईरानी (हखामनी) आक्रमण के ऐतिहासिक स्रोत

ईरानी आक्रमण के संबंध में जानकारी मुख्यतः यूनानी इतिहासकारों हेरोडोटस, टेसियस (क्टेसियस), स्ट्रैबो तथा एरियन के लेखों से प्राप्त होती है। इनके अतिरिक्त स्वयं हखामनी शासकों द्वारा उत्कीर्ण कराए गए राजकीय शिलालेख, विशेष रूप से बेहिस्तून, पर्सीपोलिस तथा नक्श-ए-रुस्तम के अभिलेख भी इस विषय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ये अभिलेख पुरानी फारसी, एलामाइट तथा बेबीलोनियाई लिपियों में उत्कीर्ण हैं और आधुनिक इतिहासकारों के लिए हखामनी साम्राज्य की प्रांतीय संरचना जानने का प्रमुख आधार हैं।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य में साइरस द्वितीय (कुरुष महान) (लगभग ई.पू. 559-529) नामक एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक ने पहले मीडिया साम्राज्य को पराजित कर फिर ईरान की सत्ता पर पूर्ण अधिकार जमाकर हखामनी (अकेमेनिड) साम्राज्य की स्थापना की। उसने अत्यंत शीघ्रता से पश्चिम तथा पूर्व दोनों दिशाओं में अपने साम्राज्य का विस्तार किया, और शीघ्र ही उसकी पूर्वी सीमा भारत के कपिशा (अफगानिस्तान के बगराम क्षेत्र) तक जा पहुँची। इतिहास में साइरस महान को विश्व का पहला बहु-सांस्कृतिक व सहिष्णु साम्राज्य-निर्माता भी माना जाता है, जिसने विजित प्रजाओं के धर्म एवं रीति-रिवाजों के प्रति उदार नीति अपनाई थी।

साइरस द्वितीय (कुरुष महान) का भारत-अभियान

इस काल में पश्चिमोत्तर भारत की अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियाँ साइरस द्वितीय की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक स्वर्णिम अवसर प्रदान कर रही थीं। एरियन और स्ट्रैबो के विवरणों के आधार पर विशेषकर सिकंदर के थल-सेनाध्यक्ष नियार्कस के वर्णन से यह ज्ञात होता है कि साइरस ने पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक विशृंखलता का लाभ उठाते हुए लगभग 550 ईसा पूर्व के आसपास जेड्रोसिया (बलूचिस्तान) के भीषण रेगिस्तान से होकर भारत पर आक्रमण किया, किंतु इस अभियान में उसे विनाशकारी असफलता का सामना करना पड़ा। मार्ग की कठिनाइयों और जलाभाव के कारण उसकी विशाल सेना लगभग पूर्णतः नष्ट हो गई और स्वयं साइरस को अपने प्राण बचाकर मात्र सात सैनिकों के साथ किसी तरह वापस भागना पड़ा।

मेगस्थनीज के विवरण से यह भी पता चलता है कि काबुल घाटी के मार्ग से हिरेक्लीज, डायोनिसस तथा सिकंदर को छोड़कर अन्य किसी भी विदेशी शक्ति के द्वारा न तो भारतीय कभी युद्ध में जीते गए और न ही उन्होंने स्वयं को किसी बड़े युद्ध में उलझाया। यद्यपि पारसीकों ने हिड़क (क्षुद्रक जाति के) सैनिकों को भाड़े पर अपनी सेना में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित अवश्य किया था, फिर भी मेगस्थनीज के अनुसार पारसीकों ने भारत पर कभी सीधा आक्रमण नहीं किया।

आधुनिक इतिहासकार नियार्कस और मेगस्थनीज के इस विवरण को पूर्णतः सत्य नहीं मानते हैं। इसके विपरीत, रोमन प्रकृतिवादी लेखक प्लिनी का कथन है कि साइरस ने कपिशा नगर को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया था। इससे यह प्रतीत होता है कि साइरस अपनी प्रारंभिक असफलता से हतोत्साहित नहीं हुआ, बल्कि उसने दूसरी बार काबुल घाटी की दिशा से भारत पर आक्रमण किया, जिसमें उसे कुछ आंशिक सफलता भी प्राप्त हुई।

एरियन इस संदर्भ में लिखता है : ‘सिंधु तथा काबुल नदियों के मध्य स्थित भारतीय प्राचीन काल में पहले असीरियनों तथा मीडियनों के और बाद में पारसीकों के अधीन रह चुके थे। उन्होंने पारसीक सम्राट साइरस को नियमित कर (टैक्स) प्रदान किया था।’ इन प्रदेशों की अष्टक एवं अश्वक जातियाँ भी पारसीक सम्राट के अधीन थीं। इसी प्रकार यूनानी इतिहासकार जेनोफोन ने भी साइरस की जीवनी-रचना साइरोपीडिया में लिखा है कि उसने बैक्ट्रियनों और भारतीयों को जीतकर अपने साम्राज्य का प्रभाव एरिथ्रियन सागर (हिंद महासागर) तक विस्तृत कर लिया था। इन सभी विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि काबुल घाटी के एक बड़े भाग पर साइरस का प्रभावी अधिकार स्थापित हो चुका था। जर्मन इतिहासकार एडवर्ड मेयर का यह कथन इस विषय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है : ‘साइरस ने हिंदुकुश तथा काबुल घाटी, विशेष रूप से गांधार प्रदेश की भारतीय जनजातियों को जीता था। स्वयं दारा (डेरियस) सिंधु नदी तक आ पहुँचा था।’

साइरस की मृत्यु (ई.पू. 530 के आसपास) के पश्चात् उसका पुत्र कैंबिसीज द्वितीय या कंबुजीय (ई.पू. 529-522) हखामनी साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। उसने अपने शासनकाल का अधिकांश समय मिस्र-विजय तथा अपने साम्राज्य की आंतरिक समस्याओं के समाधान में व्यतीत किया, जिस कारण उसे भारत-विजय की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल सका।

डेरियस प्रथम (दारा प्रथम) और भारत पर पारसीक आधिपत्य

डेरियस प्रथम या दारा प्रथम (ई.पू. 521-485) के काल से भारत पर पारसीक आधिपत्य के संबंध में अपेक्षाकृत कहीं अधिक ठोस और विश्वसनीय ऐतिहासिक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। दारा वंशानुगत उत्तराधिकारी नहीं था, बल्कि उसने आंतरिक विद्रोहों को दबाकर सत्ता प्राप्त की थी, और अपनी विजय को न्यायोचित ठहराने के लिए ही उसने प्रसिद्ध बेहिस्तून अभिलेख उत्कीर्ण करवाया था। उसके शासनकाल के तीन प्रमुख अभिलेखों—बेहिस्तून, पर्सीपोलिस और नक्श-ए-रुस्तम से भारत-पारसीक संबंधों के विषय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। बेहिस्तून अभिलेख (लगभग ई.पू. 520-518) में दारा के साम्राज्याधीन कुल 23 प्रांतों की सूची दी गई है, जिसमें ‘शतग’ (सत्तगिडाई) और ‘गदर’ (गांधार) के नाम तो अंकित हैं, किंतु उसमें ‘हिदु’ (सिंधु/भारत) का नाम सम्मिलित नहीं है।

इसके विपरीत, बाद में उत्कीर्ण पर्सीपोलिस (लगभग ई.पू. 518-515) तथा नक्श-ए-रुस्तम (लगभग ई.पू. 515) के अभिलेखों में ‘शतगु’ और ‘गदर’ के साथ-साथ ‘हिदु’ शब्द का भी स्पष्ट उल्लेख उसके साम्राज्य के एक प्रांत के रूप में मिलता है। इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि शतगु, गदर और हिदु- ये तीनों प्रदेश दारा के विशाल साम्राज्य में सम्मिलित थे। ये तीनों प्रदेश दारा के साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर सिंधु घाटी क्षेत्र में स्थित थे।

‘शतगु’ शब्द का तात्पर्य सप्तसैंधव प्रदेश (सात नदियों का क्षेत्र, अर्थात् पंजाब का उत्तरी भाग) से लिया जाता है, जबकि ‘गदर’ का अभिप्राय गांधार प्रदेश से है, जो निचली काबुल घाटी में स्थित था। वहीं ‘हिदु’ शब्द का आशय निचली सिंधु घाटी से लगाया जाता है। इन प्रमाणों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि दारा ने लगभग ईसा पूर्व 518 के आसपास पश्चिमोत्तर भारत के इन प्रदेशों को अपने अधिकार में ले लिया था।

हेरोडोटस का विवरण और भारत से प्राप्त कर

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस, जिन्हें ‘इतिहास का जनक’ भी कहा जाता है, के विवरण से यह ज्ञात होता है कि भारत दारा के विशाल साम्राज्य का बीसवाँ (20वाँ) प्रांत था। यह भारतीय प्रांत आर्थिक दृष्टि से इतना समृद्ध था कि इससे दारा को अपने संपूर्ण साम्राज्य के राजस्व का लगभग तीसरा भाग अर्थात 360 टैलेंट सोना प्रतिवर्ष कर के रूप में प्राप्त होता था, जो हखामनी साम्राज्य के किसी भी अन्य प्रांत की तुलना में सर्वाधिक था।

हेरोडोटस के वर्णन से ही यह भी पता चलता है कि दारा ने लगभग ईसा पूर्व 517 में अपने नौसेनाध्यक्ष स्काईलैक्स के नेतृत्व में एक अन्वेषक जहाजी बेड़ा सिंधु नदी के मार्ग की खोज करने हेतु भेजा था। यह अभियान लगभग ढाई वर्षों तक चला और सिंधु नदी से होते हुए अरब सागर, तत्पश्चात लाल सागर के मार्ग से मिस्र तक पहुँचा। संभावना है कि इसी नौसैनिक अभियान की सहायता से दारा को भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार करने में सुविधा हुई हो। हेरोडोटस के विवरण से यह भी स्पष्ट होता है कि दारा प्रथम के अधिकार-क्षेत्र में सिंधु घाटी का संपूर्ण प्रदेश सम्मिलित था, जिसमें संभवतः पंजाब का एक बड़ा भू-भाग भी शामिल रहा होगा। दारा का यह संपूर्ण अभियान राजनैतिक प्रभुत्व-विस्तार के साथ-साथ स्पष्ट रूप से आर्थिक उद्देश्यों से भी प्रेरित प्रतीत होता है।

इस प्रकार दारा प्रथम की विजयों ने संपूर्ण सिंधु घाटी क्षेत्र को एकता के सूत्र में आबद्ध करते हुए भारत का सीधा संपर्क पाश्चात्य जगत से स्थापित कर दिया। उल्लेखनीय है कि दारा के उत्तराधिकारियों ने अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमा को इससे आगे बढ़ाने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया, वरन् वे मुख्यतः दारा द्वारा पहले से विजित प्रदेशों को ही सुरक्षित बनाए रखने में संलग्न रहे।

जरक्सीज (क्षयार्ष) के काल में भारतीय प्रांत

दारा प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जरक्सीज या क्षयार्ष (ई.पू. 485-465) हखामनी साम्राज्य का शासक बना। पर्सीपोलिस से प्राप्त एक अभिलेख में भारत के तीनों प्रदेशों- गांधार, शतगु तथा हिदु का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि जरक्सीज ने अपने पिता से विरासत में मिले भारतीय साम्राज्य को सफलतापूर्वक सुरक्षित बनाए रखा था।

इसी पर्सीपोलिस लेख से यह भी ज्ञात होता है कि देवता ‘अहुरमज्दा’ की इच्छानुसार जरक्सीज ने कुछ क्षेत्रों में स्थानीय देवताओं के मंदिरों को गिरवा दिया था तथा उनकी पूजा-अर्चना को बंद करवा दिया था। इतिहासकारों का सामान्य अनुमान है कि जरक्सीज ने यूनान के विरुद्ध लड़े गए प्रसिद्ध थर्मोपाइली के युद्ध (ई.पू. 480) में सिंधु एवं गांधार प्रदेश के भारतीय सैनिकों से सैन्य सहायता प्राप्त की थी। स्वयं हेरोडोटस ने इन भारतीय सैनिकों की वेशभूषा का वर्णन करते हुए लिखा है : ‘भारतीय सैनिकों के वस्त्र सूती कपड़े के बने होते थे। उनके कंधों पर धनुष तथा तीर-तरकश लटके रहते थे।’ यह विवरण भारतीय सैन्य-तकनीक तथा वस्त्र-निर्माण कला के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का भी परिचायक है। किंतु जरक्सीज का अंत अत्यंत दुखद रहा और वह ईसा पूर्व 465 में अपने ही राजदरबार के अंगरक्षकों की साजिश का शिकार होकर मार डाला गया।

उत्तरवर्ती हखामनी शासक

जरक्सीज की मृत्यु के पश्चात् क्रमशः अर्तजरक्सीज प्रथम (ई.पू. 465-425) तथा अर्तजरक्सीज द्वितीय (ई.पू. 405-359) जैसे उत्तराधिकारी हखामनी सिंहासन पर आसीन हुए। पर्सीपोलिस स्थित दक्षिणी मकबरे के ऊपरी भाग में भी कुछ महत्त्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त होते हैं। कलात्मक शैली के आधार पर यह मकबरा इन्हीं शासकों के काल का माना जाता है। इस मकबरे पर सम्राट के सिंहासन के ऊपर करदाता प्रजाओं के प्रतिनिधि रूप में सत्तगिडाई, गांधार तथा हिदु प्रदेशों के प्रजाजनों का शिल्पांकन किया गया है, जो इन क्षेत्रों की निरंतर अधीनता का सूचक है।

अर्तजरक्सीज द्वितीय के राजवैद्य टीसियस (क्टेसियस), जो एक यूनानी चिकित्सक एवं इतिहासकार था, ने अपने लेखों में उल्लेख किया है कि उसने स्वयं भारतीय राजाओं द्वारा पारसीक सम्राट को भेंट किए गए बहुमूल्य उपहारों को अपनी आँखों से देखा था। इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि इस कालखंड में भी उपर्युक्त तीनों भारतीय प्रांत हखामनी साम्राज्य के अभिन्न अंग बने रहे।

दारा तृतीय और हखामनी साम्राज्य का पतन

हखामनी साम्राज्य का अंतिम शासक दारा तृतीय (ई.पू. 336-330) था। एरियन के ऐतिहासिक विवरण से पता चलता है कि सिकंदर महान के विरुद्ध लड़े गए निर्णायक गागामेला के युद्ध (ई.पू. 331) में सिंधु नदी के पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों भागों के सैनिकों ने दारा तृतीय की सेना का साथ दिया था। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उस समय तक भी इन भारतीय प्रदेशों पर पारसीक साम्राज्य का प्रभुत्व किसी न किसी रूप में बना हुआ था।

गागामेला के युद्ध में दारा तृतीय की करारी पराजय हुई और इसके पश्चात सिकंदर द्वारा संपूर्ण हखामनी साम्राज्य पर अधिकार कर लेने तथा ई.पू. 330 में दारा तृतीय की उसके ही सेनापति बेसस द्वारा हत्या कर दिए जाने के उपरांत ही भारतीय क्षेत्र औपचारिक रूप से पारसीक प्रभाव से पूर्णतः मुक्त हुए। इस प्रकार लगभग दो शताब्दियों (ई.पू. 550-ई.पू. 330 तक) के बाद हखामनी साम्राज्य का प्रभाव समाप्त हो गया और इसके तुरंत बाद ही 326 ईसा पूर्व में सिकंदर महान ने स्वयं भारत पर आक्रमण कर दिया।

ईरानी (हखामनी) आक्रमण का भारत पर व्यापक प्रभाव

यद्यपि भारत के केवल पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र के कुछ ही प्रदेश हखामनी साम्राज्य के प्रत्यक्ष अधीन हुए थे, तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि इस संपर्क ने भारतीय इतिहास को विविध रूपों में गहराई से प्रभावित किया।

राजनीतिक प्रभाव

पश्चिमोत्तर भारत के बिखरे हुए तथा असंगठित प्रदेशों को सर्वप्रथम पारसीकों ने ही एक व्यवस्थित प्रशासनिक ढाँचे में संगठित किया, जिससे आगे चलकर बाद के भारतीय शासकों, विशेषकर चंद्रगुप्त मौर्य को पश्चिमोत्तर भारत को संगठित एवं एकीकृत करने में अप्रत्यक्ष सहायता मिली।

सांस्कृतिक एवं वैचारिक प्रभाव

विशाल हखामनी साम्राज्य की स्थापना से भारत का पश्चिमी संसार (ईरान, मेसोपोटामिया, यूनान) के साथ संपर्क कहीं अधिक दृढ़ हुआ और इससे भारत तथा पश्चिमी जगत के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस संपर्क के फलस्वरूप भारतीय विद्वान एवं दार्शनिक पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की परंपराओं से भी परिचित हुए।

आर्थिक एवं व्यापारिक प्रभाव

हखामनी साम्राज्य से घनिष्ठ संबंध स्थापित होने के कारण भारत के विदेशी व्यापार को महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन मिला। नौसेनाध्यक्ष स्काईलैक्स ने भारत से पश्चिमी देशों तक जाने वाला एक समुद्री मार्ग खोज निकाला, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय व्यापारी पश्चिमी देशों में स्वतंत्र रूप से आने-जाने लगे और भारतीय वस्तुएँ सुदूर मिस्र तथा यूनान तक पहुँचने लगीं। पश्चिमोत्तर सीमा-प्रांत से बड़ी संख्या में प्राप्त होने वाले प्राचीन ईरानी सिक्के भारत-ईरान के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते हैं। ईरान की प्रचलित स्वर्ण-मुद्रा डारिक तथा रजत-मुद्रा सिग्लोई (शेकेल) भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्रों से पुरातात्त्विक उत्खनन में प्राप्त हुई हैं।

लिपि और भाषा पर प्रभाव

पारसीक लोगों के संपर्क का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं दूरगामी परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी भारत में दाईं से बाईं ओर लिखी जाने वाली खरोष्ठी नामक एक नवीन लिपि का प्रचलन हुआ, जिसकी उत्पत्ति ईरानी ‘आरमेइक’ लिपि से मानी जाती है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि मौर्य सम्राट अशोक के मानसेहरा तथा शहबाजगढ़ी शिलालेखों में यही खरोष्ठी लिपि प्रयुक्त हुई है, जो सैकड़ों वर्षों बाद भी पारसीक-भारतीय सांस्कृतिक संपर्क की जीवंत साक्षी है। इसके अतिरिक्त पारसीक भाषा के प्रभाव के कारण ही ‘दिपि’ (राजाज्ञा/शिलालेख) तथा ‘निपिष्ट’ (लिखित) जैसे शब्द इस प्रदेश की भाषाओं में प्रचलित हुए। भाषाविदों के अनुसार आधुनिक ‘इंडिया’ नामक शब्द की व्युत्पत्ति भी इसी संपर्क की देन है- पारसीक शब्द ‘हिदु’ (सिंधु से व्युत्पन्न) यूनानी भाषा में ‘इंडोस’ और बाद में लैटिन-अंग्रेज़ी में ‘इंडिया’ के रूप में परिवर्तित हो गया।

प्रशासन और स्थापत्य कला पर प्रभाव

मौर्य शासन-व्यवस्था के विभिन्न तत्त्वों के विकास में पारसीक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। मौर्य सम्राटों ने पारसीक नरेशों की दरबारी शान-ओ-शौकत तथा कुछ राजकीय परंपराओं का अनुकरण किया। पाटलिपुत्र की पुरातात्त्विक खुदाई में प्राप्त चंद्रगुप्त मौर्य के विशाल स्तंभयुक्त राजप्रासाद में अनेक पारसीक स्थापत्य-तत्त्वों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इतिहासकारों का मानना है कि इसमें स्तंभ-मंडप बनाने की प्रेरणा दारा प्रथम के प्रसिद्ध शत-स्तंभ भवन (अपादान) से ग्रहण की गई प्रतीत होती है, जो पर्सीपोलिस में स्थित था।

यह भी संभव है कि सम्राट अशोक ने शिलाओं पर अपने शासनादेश (धर्म-लेख) खुदवाने की शैली दारा प्रथम के अभिलेखों से ही ग्रहण की हो, क्योंकि दोनों ही परंपराओं में शासक अपने आदेशों को स्थायी रूप से पत्थर पर उत्कीर्ण करवाकर साम्राज्य के दूर-दराज क्षेत्रों में स्थापित करवाते थे। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि प्रसिद्ध मौर्ययुगीन स्तंभों पर बनाई गई घंटाशीर्ष (बेल-कैपिटल) की परिकल्पना तथा उन स्तंभों की विशिष्ट चमकदार पॉलिश (मौर्य पॉलिश) भी मूलतः फारसी (हखामनी) स्तंभों की स्थापत्य-परंपरा से ही प्रेरित होकर ग्रहण की गई थी।

प्रांतीय प्रशासन-प्रणाली पर प्रभाव

पारसीक शासक अपने विशाल साम्राज्य को सुचारु प्रशासन हेतु अनेक प्रांतों में विभाजित करते थे, जिन्हें ‘क्षत्रप’ कहा जाता था और जिनका संचालन ‘क्षत्रप’ नामक राज्यपाल करते थे। मौर्यकाल में भी साम्राज्य को इसी प्रकार विभिन्न प्रांतों में विभाजित करने की प्रथा जारी रही, जिनका संचालन राजकुमारों अथवा उच्च राजपुरुषों द्वारा किया जाता था। यह भी उल्लेखनीय है कि ईरानी प्रभाव के कारण ही कालांतर में उत्तर-पश्चिमी भारत में विदेशी शासकों (शक, पह्लव, कुषाण) के अंतर्गत ‘क्षत्रप शासन-प्रणाली’ का व्यापक विकास हुआ, जो शताब्दियों बाद तक भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक स्वरूप बना रहा।

इस प्रकार यद्यपि ईरानी (हखामनी) आक्रमण भारत के सुदूर उत्तर-पश्चिमी भाग तक ही सीमित रहा, फिर भी इसने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, भारतीय राजनीति, प्रशासन, लिपि, स्थापत्य-कला तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार को दीर्घकालिक और गहन रूप से प्रभावित किया।

कुल मिलाकर भारत पर हुए ईरानी (हखामनी) आक्रमण भले ही सैन्य दृष्टि से सीमित क्षेत्र तक ही सफल हो सके, किंतु सभ्यतागत दृष्टि से इनका महत्त्व अत्यंत व्यापक रहा है। साइरस महान की असफल किंतु साहसिक चेष्टा से लेकर दारा प्रथम द्वारा सिंधु घाटी के औपचारिक विलय और अंततः सिकंदर महान द्वारा हखामनी साम्राज्य के पतन तक यह संपूर्ण कालखंड भारत और पश्चिमी एशिया के बीच सतत सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक आदान-प्रदान का साक्षी रहा है। यही आदान-प्रदान आगे चलकर मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, लिपि-विकास तथा स्थापत्य-कला में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ,और इस अर्थ में ईरानी आक्रमण को प्राचीन भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन कड़ी माना जा सकता है।

भारत पर ईरानी आक्रमण से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. भारत पर सबसे पहला ईरानी आक्रमण किसने किया था?

भारत पर सबसे पहला ईरानी (हखामनी) आक्रमण साइरस द्वितीय (कुरुष महान) ने लगभग 550 ईसा पूर्व में जेड्रोसिया के रेगिस्तान के मार्ग से किया था, किंतु यह अभियान असफल रहा और उसकी सेना लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई थी।

2. भारत को हखामनी साम्राज्य में औपचारिक रूप से किसने सम्मिलित किया?

भारत के सिंधु घाटी क्षेत्र (शतगु, गांधार और हिदु प्रांत) को हखामनी साम्राज्य में औपचारिक रूप से डेरियस प्रथम (दारा प्रथम) ने लगभग 518 ईसा पूर्व में सम्मिलित किया था।

3. हेरोडोटस के अनुसार भारत हखामनी साम्राज्य का कौन-सा प्रांत था?

हेरोडोटस के विवरण के अनुसार भारत दारा प्रथम के साम्राज्य का 20वाँ प्रांत था और यह अपने राजस्व-योगदान (360 टैलेंट सोना) की दृष्टि से साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत माना जाता था।

4. ईरानी आक्रमण का भारतीय लिपि पर क्या प्रभाव पड़ा?

ईरानी संपर्क के परिणामस्वरूप पश्चिमी भारत में खरोष्ठी लिपि का विकास हुआ, जो ईरानी आरमेइक लिपि से उत्पन्न हुई थी। यही लिपि आगे चलकर सम्राट अशोक के मानसेहरा तथा शहबाजगढ़ी अभिलेखों में भी प्रयुक्त हुई।

5. मौर्य स्थापत्य कला पर ईरानी प्रभाव कैसे देखा जा सकता है?

चंद्रगुप्त मौर्य के पाटलिपुत्र स्थित राजप्रासाद की स्तंभ-मंडप शैली दारा प्रथम के पर्सीपोलिस स्थित शत-स्तंभ भवन से प्रेरित मानी जाती है। इसके अतिरिक्त अशोक के शिलालेख उत्कीर्ण करवाने की परंपरा तथा मौर्य स्तंभों की चमकदार पॉलिश पर भी फारसी स्थापत्य-कला का प्रभाव माना जाता है।

6. हखामनी साम्राज्य का पतन कब और कैसे हुआ?

हखामनी साम्राज्य का अंतिम शासक दारा तृतीय था, जो गागामेला के युद्ध (331 ई.पू.) में सिकंदर महान से पराजित हुआ और 330 ईसा पूर्व में अपने ही सेनापति द्वारा मार डाला गया। इसके साथ ही हखामनी साम्राज्य का अंत हो गया और भारतीय क्षेत्र पारसीक प्रभाव से मुक्त हुए।

7. ‘इंडिया’ नाम की उत्पत्ति ईरानी आक्रमण से कैसे जुड़ी है?

पारसीक शब्द ‘हिदु’ (सिंधु नदी से व्युत्पन्न) यूनानी भाषा में ‘इंडोस’ बना और कालांतर में लैटिन तथा अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से ‘इंडिया’ शब्द के रूप में विकसित हुआ, जो आज भी प्रचलन में है।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks