श्रमण परंपरा : उद्भव, प्राचीनता और ऐतिहासिक विकास
भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की पृष्ठभूमि
भारतीय प्रायद्वीप प्रागैतिहासिक काल से ही विभिन्न धर्मों के उद्भव, विकास और स्थायित्व का आश्रयदाता रहा है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों, जीवन-पद्धतियों के संघर्ष और समन्वय के माध्यम से ही भारतीय इतिहास की प्रगति एवं संस्कृति का विकास हुआ है। भारतीय संस्कृति में नवीनता और प्राचीनता के बीच निरंतर संघर्ष होता रहा है- इस संघर्ष में नवीनता पनपती रही, किंतु प्राचीनता का भी सर्वथा विनाश नहीं हुआ। दोनों को समय-समय पर यथोचित सम्मान मिलता रहा है।
भारतीय संस्कृति की विविधताओं को मोटे तौर पर दो प्रमुख धाराओं में वर्गीकृत किया जा सकता है-
ब्राह्मण धारा : इसके अंतर्गत वैदिक आर्य अथवा ब्राह्मण परंपराएँ आती हैं।
श्रमण धारा : इसमें जैन, बौद्ध, आजीवक और इसी प्रकार की अन्य तापसी अथवा यौगिक परंपराओं की गणना होती है।
इतिहासकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के अनुसार श्रमण-संस्कृति आर्यों के आगमन से भी पूर्व इस देश में विद्यमान थी।
सिंधु घाटी सभ्यता और आर्यों का प्रवेश
पहले के अनेक इतिहासकारों ने हड़प्पा सभ्यता के विनाश की व्याख्या “आर्यों के आक्रमण” के रूप में की थी अर्थात् एक सभ्य प्रदेश में एक बर्बर जाति के प्रवेश के रूप में, जिसने अपनी पूर्ववर्ती आर्येतर सभ्यता को ध्वस्त कर अपनी भाषा, धर्म और समाज-व्यवस्था भारत में प्रतिष्ठित की। यद्यपि यह सांस्कृतिक विध्वंस पूर्ण नहीं था, क्योंकि हड़प्पा संस्कृति के अनेक तत्त्व परवर्ती आर्य-सभ्यता में आत्मसात् हो गए। आर्य तथा आर्येत्तर परंपराओं का यही समन्वय भारतीय सभ्यता के निर्माण की आधारशिला सिद्ध हुआ।
बीसवीं सदी के मध्य में प्रचलित “आर्य आक्रमण सिद्धांत”, जिसे सर मॉर्टिमर व्हीलर जैसे पुरातत्त्वविदों ने आगे बढ़ाया था, को अधिकांश समकालीन इतिहासकारों और भाषाविदों ने दशकों पहले ही अस्वीकार कर दिया है। इसके स्थान पर “आर्य प्रवासन सिद्धांत” अधिक स्वीकृत है, जिसके अनुसार भारोपीय भाषा-भाषी समूहों का भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश किसी सैन्य आक्रमण के रूप में नहीं, बल्कि द्वितीय सहस्राब्दी ईसा-पूर्व में क्रमिक जन-प्रवासन के रूप में हुआ, न कि हड़प्पा नगरों के हिंसक विनाश के रूप में।
श्रमण संस्कृति: शब्द-व्युत्पत्ति और अर्थ
प्राकृत साहित्य में श्रमण के लिए ‘समण’ शब्द का प्रयोग हुआ है। विद्वानों ने ‘श्रमण’ शब्द के तीन संभावित मूल रूप बताए हैं- श्रमण, समन और शमन।
(क) श्रमण शब्द ‘श्रम’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है परिश्रम करना। तपस्या को भी परिश्रम का ही एक रूप माना गया है- ‘श्राम्यन्तीति श्रमणः तपस्यन्तीत्यर्थः’, अर्थात् जो व्यक्ति अपने श्रम (तप) से आत्म-उत्कर्ष प्राप्त करते हैं, वे श्रमण कहलाते हैं।
(ख) समन का अर्थ है समानता, प्राणीमात्र के प्रति समभाव रखना, राग-द्वेष व विषमता से दूर रहना। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भूमिका पर प्रतिष्ठित यह साम्य-दृष्टि श्रमण परंपरा का प्राण-तत्त्व है। श्रीमद्भागवत में इसी भाव को व्यंजित किया गया है : ‘आत्मारामाः समदृशः प्रायशः श्रमणाजनाः’।
(ग) शमन का अर्थ है शांत करना। जो साधक अपनी वृत्तियों को शांत कर वासनाओं का दमन करता है, वह श्रमण कहलाता है।
इस प्रकार श्रमण संस्कृति के मूल में श्रम, सम और शम- ये तीनों तत्त्व एक साथ विद्यमान हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता में श्रमण परंपरा के प्रमाण
विद्वानों का एक वर्ग श्रमण परंपरा को वेदों से भी प्राचीन और मूलतः आर्येत्तर धर्म मानने का आग्रह करता है। इस मत का प्रमुख आधार मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं।
तथाकथित ‘पशुपति मुद्रा’ (सील संख्या 420)
मोहनजोदड़ो से 1928-29 ई. के उत्खनन में प्राप्त एक प्रसिद्ध मृण्मय (स्टेटाइट) मुद्रा में एक शृंगधारी पुरुष-आकृति पद्मासन-सदृश योगमुद्रा में बैठी दिखाई गई है, जिसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा जैसे पशु अंकित हैं। पुरातत्त्वविद् सर जॉन मार्शल ने 1931 ई. में इसे ‘प्रोटो-शिव’ अथवा पशुपति (शिव का एक रूप) के प्रारंभिक निरूपण के रूप में पहचाना था और यह व्याख्या दशकों तक लोकप्रिय बनी रही।
कुछ आधुनिक विद्वानों ने इसी मुद्रा को जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की कायोत्सर्ग-सदृश ध्यान-मुद्रा के रूप में भी पढ़ने का प्रयास किया है, क्योंकि मूर्तिवाद, नग्नता और दीर्घकालिक स्थिर ध्यान-साधना जैन श्रमण-परंपरा की विशिष्ट पहचान रही है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा से प्राप्त अनेक नग्न-प्रतिमाएँ, जैसे प्रसिद्ध ‘धड़ प्रतिमा’ तथा अनेक मुद्राओं पर अंकित वृषभ (बैल) का चित्रण भी इस दिशा में एक अतिरिक्त प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह मुद्रा आज भी गहन अकादमिक और सार्वजनिक विवाद का विषय बनी हुई है। मई 2026 में जब भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इस मुद्रा को भारत की “अखंड सभ्यतागत निरंतरता” के प्रतीक के रूप में शिव-पशुपति निरूपित करते हुए साझा किया, तो अमेरिकी इतिहासकार (रटगर्स विश्वविद्यालय) ऑड्रे ट्रश्के ने इस पहचान को चुनौती दी। उनका तर्क था कि यह आकृति शिव नहीं, बल्कि निकट-पूर्व (प्रोटो-एलामाइट) की व्यापक ‘पशुओं के स्वामी’ प्रतिमा-परंपरा से प्रभावित हो सकती है, जो अनेक प्राचीन यूरेशियाई संस्कृतियों में मिलती है। अन्य विद्वानों, जैसे डोरिस श्रीनिवासन ने इससे पहले भी मार्शल की त्रिशूल एवं तीन-मुख वाली व्याख्या पर प्रश्न उठाए थे। इस विवाद से यह स्पष्ट होता है कि मुद्रा की सटीक धार्मिक पहचान, चाहे वह शिव हो, ऋषभ हो अथवा कोई सर्वथा भिन्न देवता, अनिर्णीत है, परंतु योगासन में स्थित यह आकृति तथा साधना-मुद्रा की उपस्थिति स्वयं इस तथ्य का सुदृढ़ प्रमाण है कि हड़प्पाई समाज में ध्यान व तपस्या जैसी श्रमणोचित साधना-पद्धतियाँ प्रचलित थीं।
मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की मूर्तियों से यह भी संकेत मिलता है कि हड़प्पा संस्कृति के लोग केवल योग-साधना ही नहीं करते थे, बल्कि योगियों की प्रतिमाओं की पूजा भी करते थे। मूर्तिवाद तथा नग्नता- दोनों ही जैन श्रमण परंपरा की प्रमुख विशेषताएँ रही हैं, जो इस साक्ष्य को श्रमण-परंपरा की प्राचीनता से जोड़ती हैं।
ऋग्वेद में मुनि, केशी और वातरशना परंपरा
ऋग्वेद के प्रसिद्ध ‘केशिसूक्त’ (10.136) में केशधारी, मैले गेरुए वस्त्र पहने, वायु में उड़ते, विष पीते, मौन-साधना से ‘उन्मदित’ तथा देवोपम मुनियों का विलक्षण चित्रण मिलता है-
मुनयो वातरशनाः पिशंगा वसते मला।
वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद् देवासो अविक्षत।।
उन्मदिता मौनेयेन वात आतस्यिमा वयम्।
शरीरेदस्माकं यूयं मर्तासो अभि पश्यथ।।
अर्थात् ‘अतींद्रियार्थदर्शी वातरशना मुनि मलिन वस्त्र धारण करते हैं, जिससे वे पिंगल वर्ण के दिखाई देते हैं। जब वे प्राणोपासना द्वारा वायु की गति को रोक लेते हैं, तब वे अपनी तप-महिमा से दीप्यमान होकर देव-स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं। मौन-वृत्ति से, सर्वलौकिक व्यवहार त्यागकर, वे उन्मत्त-सदृश वायु-भाव को प्राप्त होते हैं। साधारण मनुष्य केवल उनके बाह्य शरीर को ही देख पाते हैं, उनके सच्चे आभ्यंतर स्वरूप को नहीं।’
वातरशना मुनियों के संदर्भ में केशी की स्तुति भी उल्लेखनीय है- ‘केशी अग्नि, जल तथा स्वर्ग-पृथ्वी को धारण करता है। केशी समस्त विश्व-तत्त्वों का दर्शन कराता है। केशी ही प्रकाशमान ज्ञान-ज्योति (केवलज्ञानी) कहलाता है।’
अन्य वातरशना मुनियों के नाम
कात्यायन की सर्वानुक्रमणी में एक सूक्त के अंतर्गत वातरशना मुनियों के नाम इस प्रकार मिलते हैं- जूति, वातजूति, वृषाणक, करिक्रत, एतश, ऋष्यशृंग। ऋष्यशृंग की कथा परवर्ती साहित्य में अनेक रूपों में पाई जाती है, किंतु यह स्पष्ट है कि ऋष्यशृंग एक ब्रह्मचारी और आरण्यक तपस्वी थे। तैत्तिरीय आरण्यक में श्रमणों को ‘वातरशना’ कहा गया है, यद्यपि इस आरण्यक की रचना भगवान् पार्श्वनाथ की धर्मदेशना के काल से प्राचीन नहीं मानी जाती।
अन्य वैदिक संदर्भ
‘तांडयमहाब्राह्मण’ में ‘तुरोदेवमुनि’ का उल्लेख है। ऋग्वेद के अरण्यानी सूक्त के द्रष्टा ‘ऐरम्मद देवमुनि’ थे, जिसकी तुलना अथर्ववेद के ‘मुनेर्देवस्य मूलेन’ से की जा सकती है। इसी ग्रंथ में ‘मुनिमरण’ नामक स्थान का भी उल्लेख मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में तुर तथा कावशेय को ‘मुनि’ कहा गया है। शंकराचार्य ने अपने शारीरक भाष्य में एक उद्धरण दिया है, जिसके अनुसार कावषेय ऋषि वेदाध्ययन तथा यज्ञ के समर्थक नहीं थे। ऐतरेय ब्राह्मण से पता चलता है कि कवष ऐलूष को सरस्वती तट के वैदिक यज्ञ से ‘अब्राह्मण’ कहकर साक्रोश निकाल दिया गया था।
भागवत पुराण में ऋषभावतार और वातरशना श्रमण-ऋषि
ऋग्वेद के केशी व वातरशना मुनियों की साधना की तुलना भागवत पुराण में वर्णित वातरशना श्रमण-ऋषियों, उनके अधिनायक ऋषभ तथा उनकी साधना-पद्धति से की जा सकती है-
…बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायने मेरुदेव्यां धर्मान् दर्शयितुकामो वातरशनानां श्रमणानाम् ऊर्ध्वमन्थिनां शुक्लया तन्वावततार।
अर्थात् यज्ञ में परम ऋषियों द्वारा प्रसन्न किए जाने पर स्वयं भगवान् विष्णु ने महाराज नाभि के प्रिय-हेतु उनकी रानी मेरुदेवी के गर्भ में अवतार लिया, और यह पवित्र अवतार उन्होंने वातरशना श्रमण ऋषियों के धर्मों को प्रकट करने की इच्छा से धारण किया।
इससे स्पष्ट है कि ऋषभदेव केवल जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर ही नहीं, अपितु पौराणिक हिंदू परंपरा में भी साक्षात् विष्णु के अवतार माने गए हैं। कतिपय इतिहासकारों के अनुसार भागवत पुराण में गौतम बुद्ध के समान ऋषभदेव को भी विष्णु के अवतारों में सम्मिलित करना, ब्राह्मणेत्तर धर्मों को आत्मसात् करने (पचाने) की व्यापक प्रक्रिया का ही परिणाम था। यह प्रक्रिया श्रमण परंपरा के व्यापक जन-प्रभाव और उसकी प्राचीनता का ही परिचायक है।
शिवमहापुराण में ऋषभ के योगावतार
ऋषभ के ईश्वरावतार की मान्यता प्राचीन काल में इतनी सुदृढ़ हो चुकी थी कि शिवमहापुराण में उन्हें शिव के अट्ठाईस योगावतारों में गिना गया है। भागवत पुराण में इस अवतार का हेतु यह बताया गया है कि भगवान का यह अवतार रजोगुण से आवृत लोगों को कैवल्य की शिक्षा देने के लिए हुआ (अयमवतारो रजसोपप्लुत-कैवल्योपशिक्षणार्थः)। इसका एक अर्थ यह भी लगाया गया है कि यह अवतार रजोधारण (मलधारण) की वृत्ति द्वारा कैवल्य-प्राप्ति की शिक्षा देने हेतु हुआ था। जैन मुनियों के आचार में अस्नान, अदंतधावन तथा मलपरीषह द्वारा ‘रजोधारण’ को संयम का ही अंग माना गया है। बुद्ध के समय में भी ‘रजोजल्लिक’ श्रमण विद्यमान थे।
इस प्रकार ऋग्वेद के केशी व वातरशना मुनि तथा भागवत के वातरशना श्रमण-ऋषि व ऋषभ के बीच इतनी समानता है कि भागवत पुराण मानो ऋग्वेद के केशिसूक्त का ही विस्तृत भाष्य प्रतीत होता है।
केशी-वृषभ एकत्व
केशी और ऋषभ (वृषभ) के एकत्व का समर्थन ऋग्वेद में वर्णित मुद्गल ऋषि और ज्ञानी नेता ‘केशी वृषभ’ के उल्लेख से भी होता है। केशी स्पष्टतः वातरशना मुनियों के अधिनायक हैं, जिनकी साधना में मलधारण, मौनवृत्ति व उन्माद-भाव का विशेष उल्लेख मिलता है। ऋषभ भगवान् के कुटिल केशों की परंपरा जैन मूर्तिकला में आज भी अक्षुण्ण है और महावीर के समय पार्श्व-संप्रदाय के एक नेता का नाम ‘केशीकुमार’ होना भी संयोग-मात्र प्रतीत नहीं होता। ऋग्वेद में ‘त्रिधा बद्धो वृषभो’ का उल्लेख है- अर्थात् ज्ञान, दर्शन और चारित्र्य, इन तीनों से अनुबद्ध वृषभ ने धर्म-घोषणा की और महान देव के रूप में मर्त्यलोक में प्रविष्ट हुए। इसी संदर्भ में ऋग्वेद के शिश्नदेवों (नग्नदेवों) का उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण है।
इन सभी उल्लेखों से यह प्रतीत होता है कि श्रमण संप्रदाय का प्राचीन रूप ऋग्वैदिक काल में ही अस्तित्व में था, जो कालांतर में स्पष्टतः अवैदिक संप्रदायों के रूप में प्रकट हुआ। वातरशना मुनियों का आचरण- मलधारण, मौनवृत्ति, अस्नान, अदंतधावन, प्राणोपासना वैदिक ऋषियों को स्वाभाविक रूप से विचित्र प्रतीत होता था, क्योंकि निवृत्तिपरक तप ऋग्वैदिक जीवन-दर्शन के प्रतिकूल था और वैदिक सूक्तकार इन योगजन्य सिद्धियों से अपरिचित थे।
यति और तापस
ऋग्वेद में मुनियों के अतिरिक्त ‘यतियों’ का उल्लेख भी बहुतायत से मिलता है। यद्यपि ऋषियों, मुनियों और यतियों के बीच कहीं-कहीं घालमेल भी पाया जाता है, फिर भी ये तीनों समान रूप से पूज्य माने जाते थे। तथापि वैदिक परंपरा में कालांतर में यतियों के प्रति रोष उत्पन्न होने के प्रमाण ब्राह्मण-ग्रंथों में मिलते हैं। ‘यतियों’ को इंद्र का शत्रु कहा गया है और इंद्र द्वारा यतियों को शालावृकों (शृगालों व कुत्तों) से नुचवाए जाने का वर्णन भी मिलता है। यह उल्लेखनीय है कि देवों ने इंद्र के इस कृत्य को उचित नहीं माना और उसका बहिष्कार किया, जो यह संकेत करता है कि यतियों के प्रति वैमनस्य वैदिक परंपरा के भीतर भी सर्वस्वीकृत नहीं था।
‘तांडयमहाब्राह्मण’ में यतियों के लिए ‘वेदविरुद्ध, नियमोपेत, कर्मविरोधी, ज्योतिष्टोमादि यज्ञ न करने वाले’ जैसे विशेषणों का प्रयोग हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि यति अवैदिक मत को मानने वाले अर्थात् श्रमण-समाज के ही सदस्य थे। उत्तरकाल में ‘यति’ शब्द का अर्थ ‘तापस’ हो गया।
भगवद्गीता में ऋषियों, मुनियों और यतियों- तीनों को ही समान रूप से योगप्रवृत्त बताया गया है। गीता में मुनि को इंद्रिय और मन का संयमकर्ता, इच्छा-भय-क्रोध से रहित, मोक्षपरायण एवं सदा-मुक्त-सदृश बताया गया है, जबकि यति को क्रोधरहित, संयमचित्त एवं वीतराग कहा गया है। इस प्रकार यति ब्राह्मण-परंपरा के न होकर श्रमण-परंपरा के ही साधु सिद्ध होते हैं और यह संज्ञा आज भी संपूर्ण जैन-साहित्य में प्रचलित है।
व्रात्य परंपरा
अथर्ववेद के पंद्रहवें अध्याय में ‘व्रात्यों’ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिन्हें ‘तांडयमहाब्राह्मण’ तथा लाट्यायन, कात्यायन एवं आपस्तंबीय श्रौतसूत्रों में ‘व्रात्यस्तोमाविधि’ के द्वारा शुद्ध करके वैदिक परंपरा में सम्मिलित किया गया था।
वास्तव में ये व्रात्य वैदिक विधि से ‘अदीक्षित व संस्कारहीन’ थे। वे ‘अदुरुक्त’ रीति से अर्थात् वैदिक संस्कृत के बजाय समकालीन प्राकृत भाषा में बोलते थे और वे ‘ज्याहृद’ (प्रत्यंचारहित धनुष) धारण करते थे। इससे प्रतीत होता है कि व्रात्य भी श्रमण-परंपरा के ही साधु व गृहस्थ थे, जो वेद-विरोधी होने के कारण वैदिक अनुयायियों के कोप-भाजन बने।
जैन धर्म में अहिंसा आदि पाँच मूल नियमों को ‘व्रत’ कहा गया है। इन्हें धारण करने वाले गृहस्थ ‘अणुव्रती श्रावक’ और मुनि ‘महाव्रती’ कहलाते थे। किंतु जो व्यक्ति विधिवत् इन व्रतों को धारण नहीं करते थे, केवल धर्म में श्रद्धा रखते थे, संभवतः उन्हीं को ‘व्रात्य’ कहा जाता था। मनुस्मृति के दशम अध्याय में लिच्छवि, नट, मल्ल आदि क्षत्रिय जातियों की गणना भी ‘व्रात्य’ में की गई है।
अर्हत् तथा अर्हत्-चैत्य
‘अर्हत्’ और ‘अर्हत्-चैत्य’ की अवधारणाएँ भगवान् महावीर और बुद्ध के जन्म से भी पहले विद्यमान थीं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि ‘अर्हत्’ का आदर्श जैन परंपरा और हीनयान बौद्ध मत दोनों में मान्य रहा है, यद्यपि जैन धर्म में इसका स्वरूप बौद्ध मत से भिन्न है। जैन परंपरा के अनुसार तीर्थंकरों ने अर्हत् होकर ही धर्मोपदेश दिया था। जैन दर्शन में जब जीव कर्मों से पृथक् होकर ‘केवलज्ञानी’ हो जाता है, तभी उसे ‘अर्हत्’ की संज्ञा प्राप्त होती है।
‘अर्हत्’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘अर्ह’ धातु से हुई है, जो पूजा-वाचक है। ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है- ‘अर्हन्ता चित्पुरोदधेंऽशेव देवावर्वते’। इन्हीं अर्हतों के अनुयायी ‘व्रात्य’ कहलाते थे। जैन, आजीवक और बौद्ध ये तीनों परंपराएँ स्पष्टतः श्रमण-संस्कृति की ही शाखाएँ हैं, जो सदैव वैदिक परंपरा के विरोध में रही हैं।
उपनिषदों में श्रमण शब्द
उपनिषदों में ‘श्रमण’ शब्द का प्रयोग तुलनात्मक रूप से कम (सकृत्) हुआ है, यद्यपि मुंडकोपनिषद् संभवतः किसी मुंडित-शिर श्रमण की ही रचना प्रतीत होती है, जो यज्ञ-विधि का निंदक है, क्योंकि ‘मुंडक’ शब्द का ही एक अर्थ ‘श्रमण’ होता है।
इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक समाज की सांस्कृतिक पर्यंत-भूमि में मुनियों और श्रमणों का एक निराला वर्ग विद्यमान था, जिसका योग-विद्या से घनिष्ठ परिचय था और जिसका संबंध संभवतः पूर्ववर्ती हड़प्पा-संस्कृति से स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार मुनि-श्रमण, ब्राह्मण-प्रधान वैदिक समाज से बाह्य होते हुए भी एक प्राचीन और उदात्त आध्यात्मिक परंपरा के जीवंत अवशेष थे।
जैन साहित्य में श्रमणों के पाँच प्रकार
जैन साहित्य में महावीर व बुद्ध से पूर्व भी वेद-निरपेक्ष अनेक समुदायों का उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य में पाँच प्रकार के श्रमणों का उल्लेख है-
निग्गंथा, सक्क, तावस, गेरुय, आजीव पंचहा समणा अर्थात् निर्ग्रंथ, शाक्य, तापस, गैरिक (गेरुए वस्त्रधारी) और आजीवक।
श्रमण परंपरा में जैन साधु ‘निर्ग्रंथ’ कहलाते थे। वैदिक साहित्य में भी ‘निर्ग्रंथ’ शब्द का प्रयोग मिलता है और पालि त्रिपिटक में भगवान् महावीर को ‘निगंठ’ (निर्ग्रंथ) कहा गया है।
आजीवक संप्रदाय और मक्खलि गोशाल
श्रमण परंपरा की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, किंतु आज लुप्तप्राय शाखा आजीवक संप्रदाय थी, जिसकी स्थापना का श्रेय पाँचवीं शताब्दी ईसा-पूर्व के मक्खलि (मस्करी) गोशाल को दिया जाता है। आजीवक दर्शन ‘नियतिवाद’ अथवा कठोर नियतिवाद पर आधारित था। इनके अनुसार प्रत्येक जीव का भाग्य पूर्णतः नियति द्वारा निर्धारित है, कर्म या पुरुषार्थ का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जैन और बौद्ध दोनों ही साहित्यिक परंपराओं में मक्खलि गोशाल का बार-बार उल्लेख हुआ है, जिससे यह सिद्ध होता है कि आजीवक संप्रदाय अपने समय का एक अत्यंत प्रभावशाली और बहुजन-मान्य धर्म-संघ था। जैन परंपरा स्वयं यह स्वीकार करती है कि गोशाल का धर्म-संघ भगवान् महावीर के संघ से भी बड़ा था। इस मत की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि जहाँ महावीर के श्रावकों की संख्या लगभग 1,59,000 बताई गई है, वहीं गोशाल के अनुयायियों की संख्या लगभग 11,61,000 बताई गई है।
श्वेतांबर परंपरा के अनुसार गोशाल भगवान् महावीर के शिष्य थे, जबकि दिगंबर परंपरा के अनुसार वे भगवान् की प्रथम धर्म-परिषद् में उपस्थित थे और मूलतः पार्श्वनाथ की पूर्वकालिक परंपरा के एक निर्ग्रंथ श्रमण थे। इन दोनों मान्यताओं से यह पता चलता है कि गोशाल का प्रारंभिक दीक्षा-संबंध पार्श्व-परंपरा से रहा होगा और बाद में उनका महावीर से घनिष्ठ संपर्क स्थापित हुआ, जो अंततः वैचारिक मतभेद के कारण विच्छेद में परिणत हुआ। बौद्ध साहित्य में भी गोशाल को समकालीन छह प्रमुख ‘तीर्थंकरों’ (धर्म-नायकों) में गिना गया है, जिससे यह पुष्ट होता है कि आजीवक संप्रदाय जैन व बौद्ध धर्म का एक प्रतिस्पर्धी किंतु समकक्ष श्रमणिक संघ था।
यद्यपि आजीवक संप्रदाय आगे चलकर विलुप्त हो गया, यद्यपि दक्षिण भारत में इसके कुछ अवशेष चौदहवीं शताब्दी तक मिलते हैं, इसका अस्तित्व इस तथ्य का सुदृढ़ प्रमाण है कि छठी-पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में श्रमण परंपरा केवल जैन व बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं थी, बल्कि अनेक स्वतंत्र, संगठित और विशाल संघों के रूप में विद्यमान थी।
पार्श्वनाथ: श्रमण परंपरा की ऐतिहासिक कड़ी
जैन परंपरा में पार्श्वनाथ को तेईसवाँ तीर्थंकर माना जाता है और अधिकांश आधुनिक इतिहासकार उन्हें एक ऐतिहासिक व्यक्ति मानते हैं, जो भगवान् महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व (अनुमानतः आठवीं-सातवीं शताब्दी ईसा-पूर्व) हुए थे। यह पार्श्व-परंपरा ही महावीर-पूर्व श्रमण संघों की निरंतरता को प्रमाणित करती है।

उत्तराध्ययन सूत्र में केशी और गौतम (महावीर के शिष्य) के मध्य हुए एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का उल्लेख मिलता है, जिसमें केशी को पार्श्वनाथ की पूर्वकालिक निर्ग्रंथ-परंपरा का प्रतिनिधि बताया गया है। यह संवाद इस बात का प्रमाण है कि महावीर के समय पार्श्व-परंपरा के अनुयायी एक स्वतंत्र, सुसंगठित संघ के रूप में विद्यमान थे तथा महावीर ने पार्श्व की चातुर्याम (चार महाव्रतों की) परंपरा को अपने पंच-महाव्रत के रूप में परिष्कृत किया। इस प्रकार श्रमण परंपरा की शृंखला ऋग्वेद के वातरशना मुनियों व केशी से लेकर पार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ से महावीर व बुद्ध तक एक अविच्छिन्न ऐतिहासिक सातत्य में देखी जा सकती है।
छठी शताब्दी ईसा-पूर्व की श्रमण-क्रांति
वैदिक साहित्य में उल्लिखित श्रमण, यति, व्रात्य, वातरशना, मुनि आदि सभी वेद व इंद्र-विरोधी जन-समुदाय से संबद्ध थे और इनका उल्लेख वैदिक धार्मिक मान्यताओं की प्रतिद्वंद्वी विचारधारा के सबल अस्तित्व एवं व्यापक जन-प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
संसारवाद (संसार-चक्र से मुक्ति की धारणा) के साथ परिव्राज्य (गृहत्याग कर भ्रमणशील तपस्वी जीवन) का ग्रहण ब्राह्मणों ने श्रमणों से किया, न कि श्रमणों ने ब्राह्मणों से। छठी शताब्दी ईसा-पूर्व के वैदिक और अवैदिक दोनों प्रकार के भिक्षु-संप्रदायों के मूल में श्रमणों की इसी प्राचीन परंपरा का योगदान मानना उचित है। यही वह काल है जब भगवान् महावीर व गौतम बुद्ध ने इस पूर्ववर्ती श्रमण-परंपरा को नए सिरे से संगठित रूप, दार्शनिक गहराई और व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। किंतु जिस धर्म व दर्शन का उन्होंने प्रचार-प्रसार किया, उसकी जड़ें प्राक्-वैदिक युग से ही पोषित होती आई थीं। ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ का यह कथन इसी तथ्य को स्पष्ट करता है- ‘समयाए समणो होइ’ अर्थात् समभाव की साधना करने से ही कोई श्रमण होता है।
इस प्रकार श्रमण परंपरा का अस्तित्व केवल अनुमानाश्रित नहीं, अपितु वैदिक साहित्य, पौराणिक साहित्य तथा जैन-बौद्ध साहित्य तीनों परंपराओं में सुसंगत रूप से प्रमाणित, इतिहास-अनुमोदित तथ्य है। हड़प्पा सभ्यता की योग-मुद्राओं से लेकर ऋग्वेद के वातरशना मुनियों, भागवत पुराण के ऋषभावतार, पार्श्वनाथ की ऐतिहासिक परंपरा, आजीवक जैसे विशाल किंतु विस्मृत संघों और अंततः महावीर व बुद्ध के धर्म-आंदोलनों तक यह एक सतत, विकासमान परंपरा रही है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का यह कथन इस संपूर्ण विवेचन का सार प्रस्तुत करता है : ‘श्रमण-संस्कृति आर्यों के आगमन के पूर्व से ही इस देश में विद्यमान थी।’ आधुनिक पुरातात्त्विक व आनुवंशिक शोध, चाहे आर्य-प्रवासन के स्वरूप को लेकर आपस में मतभेद रखते हों, इस मूल निष्कर्ष का खंडन नहीं करते कि योग व तप की परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप में वैदिक धर्म से भी प्राचीन है।


