ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन (Intellectual Movement in the Sixth Century BC)

ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन (Intellectual Movement in the Sixth Century BC)
ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन भूमिका ई.पू. छठी शताब्दी प्राचीन भारत के इतिहास में […]

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ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन

भूमिका

ई.पू. छठी शताब्दी प्राचीन भारत के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकाल है। एक ओर उत्तर भारत में विशाल राज्यों और साम्राज्यों की नींव पड़ रही थी, तो दूसरी ओर उत्तर-पूर्वी भारत के मध्य गंगा क्षेत्र में पुरातन जीवन-दर्शन के विरुद्ध अनेक नए धार्मिक और दार्शनिक संप्रदायों का उदय हो रहा था। जैन और बौद्ध ग्रंथों, विशेषतः दीघनिकाय के ब्रह्मजाल सुत्त के अनुसार इस काल में लगभग बासठ (62) मतों और संप्रदायों के संन्यासी तथा परिव्राजक विचरण करते हुए अपने-अपने जीवन-दर्शन का प्रचार करते थे और परस्पर एक-दूसरे के मतों का खंडन-मंडन करते थे। इस बौद्धिक आंदोलन का प्रमुख केंद्र मगध और उसके आसपास का मध्य गंगा क्षेत्र था। आंदोलन की तीव्रता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इनमें से कई संप्रदायों ने ईश्वर की सत्ता को ही अस्वीकार कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि लगभग इसी काल में प्राचीन विश्व के अन्य भागों में भी परंपरागत मान्यताओं को चुनौती देने वाले चिंतकों का उदय हुआ- चीन में कन्फ्यूशियस और लाओत्से, ईरान में जरथुस्त्र, यहूदी परंपरा में पैगंबर यिर्मियाह (जेरेमिया), और यूनान में पाइथागोरस जैसे दार्शनिक इसी युग की उपज थे। इतिहासकार इस वैश्विक वैचारिक हलचल को कभी-कभी ‘अक्षीय युग’ (एक्सियल एज) की संज्ञा भी देते हैं।

बौद्धिक आंदोलन के कारण

भारत में इस धार्मिक-दार्शनिक आंदोलन के अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण थे, जो तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक परिवर्तनों में निहित थे। प्रवृत्तिमूलक (कर्मकांड-प्रधान) वैदिक संस्कृति की धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ नए आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक बनती जा रही थीं। जब यह कर्मकांड-प्रधान वैदिक संस्कृति अपने मूल कुरु-पांचाल क्षेत्र से पूर्वी प्रदेशों की ओर फैली, तो वहाँ पहले से विद्यमान निवृत्तिमूलक श्रमण-परंपरा के पक्षधर अनेक नए धर्मों और संप्रदायों का उदय हुआ। विशेषकर जैन और बौद्ध संप्रदायों ने वैदिक-ब्राह्मण धर्म की रूढ़ियों पर तीखा प्रहार किया। इसे प्रायः “सुधारवादी आंदोलन” कहा जाता है, किंतु वास्तव में उत्तर-पूर्वी भारत में यह वैदिक धर्म का आंतरिक सुधार न होकर स्वतंत्र श्रमण-परंपरा का विस्तार था, जिसमें प्रादेशिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसके विपरीत, पश्चिमी भारत (कुरु-पांचाल क्षेत्र) में वैदिक धर्म के भीतर ही सुधार की प्रवृत्तियाँ उपनिषदों जैसे रूपों में विकसित हुईं।

ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन (Intellectual Movement in the Sixth Century BC)
ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन के कारण

आर्थिक कारण: लौह-प्रौद्योगिकी और कृषि-क्रांति

उत्तर-पूर्वी भारत में नई कृषि-अर्थव्यवस्था का विकास इस बौद्धिक आंदोलन का एक प्रमुख कारण था। ई.पू. छठी शताब्दी में यज्ञ-प्रधान वैदिक संस्कृति अपने मूल कुरु-पांचाल क्षेत्र से उत्तर-पूर्व की ओर फैल रही थी। यह केवल धर्म का प्रसार नहीं था, बल्कि साथ ही एक नई उत्पादन-तकनीक का भी विस्तार था।

शतपथ ब्राह्मण में विदेह माधव और अग्नि वैश्वानर (यज्ञाग्नि) की कथा से पता चलता है कि वैदिक लोग जंगलों को जलाकर और वृक्षों को काटकर भूमि को कृषि-योग्य बनाते हुए पूर्व दिशा में आगे बढ़े। इस प्रक्रिया में लोहे के उपयोग ने निर्णायक भूमिका निभाई। इस समय तक उत्तर भारत में लौह-युग का आगमन हो चुका था, और यह शताब्दी कृषि-कार्यों में लौह-उपकरणों के व्यापक प्रयोग की शताब्दी थी। पहले लोहे का उपयोग मुख्यतः शस्त्रों के लिए होता था, किंतु अब इसे हल के फाल जैसे कृषि-उपकरणों में भी प्रयुक्त किया जाने लगा, जिससे सघन वनों को साफ करना और भूमि को कृषि-योग्य बनाना अपेक्षाकृत सरल हो गया। युद्ध और कृषि- दोनों क्षेत्रों में लोहे के प्रयोग ने मूलभूत परिवर्तन ला दिए। शक्तिशाली क्षत्रिय वर्ग कमजोर जनसमूहों को अपने अधीन कर उन्हें युद्ध और कृषि दोनों में नियोजित कर सकता था, जबकि लौह-फाल से गहरी जुताई संभव होने के कारण उत्पादन-क्षमता में भारी वृद्धि हुई। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम ने बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। खाद्यान्न-अधिशेष उपलब्ध होने से उत्पादक वैश्य वर्ग खाद्य-सामग्री की चिंता से अपेक्षाकृत मुक्त हो गया और व्यापार-वाणिज्य तथा शिल्प-कर्मों की ओर उन्मुख हुआ।

लौह-फाल और नई कृषि-प्रणाली ने उत्पादन-अधिशेष को बढ़ाया, जो बड़ी-बड़ी बस्तियों और नगरों के उदय में सहायक सिद्ध हुआ। उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातीय आबादी की उत्पादन-प्रणाली और जीवन-पद्धति वैदिक आर्यों की तुलना में अपेक्षाकृत पिछड़ी हुई थी। ये लोग बिखरी हुई बस्तियों में ऊँचे स्थानों पर कुदाल से खेती करते थे और मुख्यतः चावल तथा मोटे अनाजों (श्री-धान्यों) का उत्पादन करते थे। पशुपालन का उद्देश्य मुख्यतः मांसाहार था, न कि दुग्ध-उत्पादन या कृषि-कार्य। नई उत्पादन-तकनीक ने इनकी जीवन-प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए।

नई कृषि-प्रणाली में हल जोतने और खाद के लिए अधिक संख्या में पशुओं की आवश्यकता पड़ने लगी। ऐसे में पशु-वध, चाहे वह वैदिक यज्ञों में हो या जनजातीय समुदायों की प्रथाओं में, एक अनुत्पादक और हानिकारक रूढ़ि मान लिया गया। कृषि-कार्यों में पशुओं की बढ़ती उपयोगिता के कारण पशुधन का संरक्षण आवश्यक हो गया। यही कारण है कि इस काल के अधिकांश धार्मिक संप्रदायों, विशेषकर जैन और बौद्ध धर्म ने, पशु-वध और हिंसा का प्रबल विरोध किया। उपनिषदों में भी पशु-वध की निंदा और अहिंसा का उपदेश मिलता है, किंतु बौद्ध ग्रंथों में पशुओं को “सुखदा” और “अन्नदा” कहकर अहिंसा के सिद्धांत का अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रचार किया गया।

नगरीकरण, व्यापार-वाणिज्य और मुद्रा-प्रणाली

नई कृषि-प्रणाली और लौह-प्रौद्योगिकी ने शिल्प एवं उद्योग-धंधों को प्रगति दी, जिससे व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन मिला और नगरीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई। पालि ग्रंथों में मध्य गंगा घाटी के प्रमुख नगरों- चंपा (अंग), राजगृह (मगध), वैशाली (वृज्जि), वाराणसी (काशी), कौशांबी (वत्स), कुशीनगर (मल्ल), श्रावस्ती (कोशल) और आगे चलकर पाटलिपुत्र का उल्लेख मिलता है। पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर ई.पू. 600 से 300 के मध्य उत्तर भारत में लगभग साठ नगरों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। कुशल कारीगर और शिल्पी धीरे-धीरे गाँवों से इन नगरों में बसने लगे।

विनिमय के साधन के रूप में “आहत मुद्राओं” का प्रचलन इस काल की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, जिससे व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार हुआ और धन-संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी। विविध शिल्पों और कलाओं ने व्यापार को मौद्रिक अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया। शिल्पी और व्यापारी अपने साझा हितों की रक्षा के लिए श्रेणियों और संघों में संगठित होने लगे। “सार्थवाहों” (व्यापारिक काफिलों के नेताओं) के प्रयासों से स्थल और जलमार्गों के माध्यम से नगर समृद्ध हुए। व्यक्तिगत संपत्ति की धारणा सुदृढ़ हुई और उसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हुई, जिससे गंगा घाटी में नए सामाजिक वर्गों का उदय हुआ। नगरों में मेंढक (अंग), अनाथपिंडक (कोशल) और घोषित (कौशांबी) जैसे धनी श्रेष्ठी (बैंकर-व्यापारी) और गाँवों में “गृहपति” नामक भू-संपन्न कृषक वर्ग उभरकर सामने आया।

उन्नत कृषि, शिल्प-व्यवसाय और व्यापार ने प्राचीन जनजातीय सामाजिक संरचना को विघटित कर दिया और कबायली जीवन की परंपरागत मान्यताएँ टूटने लगीं। कृषि-भूमि अब धन-संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा की माप-इकाई बन गई। इसके साथ ही समाज में भूमिहीन कृषकों और श्रमिक वर्ग का भी उदय हुआ। बुद्ध का प्रसिद्ध उपदेश था कि “कृषकों को बीज, श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक और व्यवसायियों को पूँजी उपलब्ध करानी चाहिए।” वैश्य वर्ग ने व्यापार से अपार संपत्ति अर्जित की, किंतु आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद वह ब्राह्मणों की सामाजिक सर्वोच्चता को स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

सामाजिक कारण: वर्ण-व्यवस्था और असमानता

वैदिक संस्कृति में समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- चार वर्णों में विभाजित था। प्रारंभ में वर्ण का निर्धारण कर्म (व्यवसाय) के आधार पर होता था, किंतु इस काल तक आते-आते वर्ण जन्म-आधारित होने लगा। ब्राह्मण और क्षत्रिय- दोनों अनुत्पादक वर्ग थे, जबकि वैश्य और शूद्र उत्पादन-कार्यों के लिए उत्तरदायी थे। ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्णों की सामाजिक श्रेष्ठता सुदृढ़ हो चुकी थी, और वे अपने निर्धारित कर्तव्यों से विचलित होने पर भी समाज में सम्मान की अपेक्षा रखते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। इसके विपरीत, उत्पादक होने के बावजूद वैश्यों और शूद्रों को समुचित सामाजिक सम्मान प्राप्त नहीं होता था, जिससे इन वर्णों में गहरा असंतोष व्याप्त था। शूद्रों की स्थिति विशेष रूप से दयनीय थी- धर्मसूत्रकार गौतम और आपस्तंब ने ब्राह्मणों द्वारा किए गए घोर अपराधों तक के लिए न्यूनतम दंड का विधान किया, जबकि शूद्र-वध का दंड कौवे या उल्लू जैसे पशु-पक्षी की हत्या के समान माना गया। मातंग जातक और चित्तसंभूत जातक जैसी कथाओं में शूद्रों पर होने वाले अत्याचारों का मार्मिक वर्णन मिलता है। स्त्रियों की स्थिति भी समाज में अधिकारविहीन बनी हुई थी। नास्तिक और श्रमण संप्रदायों ने इन सामाजिक विषमताओं का प्रबल विरोध किया और वैश्यों को ऋण, महाजनी तथा दास-व्यापार संबंधी अधिकार प्रदान करते हुए अपने धर्म का द्वार सभी वर्णों, यहाँ तक कि स्त्रियों के लिए भी खोल दिया।

इसी काल में वर्ण-व्यवस्था से संबंधित अव्यवस्था भी फैल रही थी। उत्तर-पूर्व के जनजातीय क्षेत्रों में वर्ण-व्यवस्था और नई उत्पादन-प्रणाली के प्रसार के साथ जनजातीय लोग अपनी योग्यता के आधार पर किसी न किसी वर्ण में स्थान पाने लगे। नई उत्पादन-तकनीक से जनसंख्या में वृद्धि हुई, जिससे वर्ण-आधारित सामाजिक स्तरीकरण और अधिक तीव्र हो गया। ब्राह्मणों का सामाजिक महत्त्व इस सीमा तक बढ़ गया कि उन्हें प्रायः देवतुल्य माना जाने लगा। यह मान्यता प्रचलित हो गई कि “ब्राह्मण राजा के बिना रह सकता है, किंतु राजा ब्राह्मण के बिना नहीं रह सकता।” शस्त्र धारण करने का अधिकार क्षत्रिय वर्ग तक सीमित मान लिया गया, और यही वर्ग कर तथा अधिशेष की वसूली करता था। शासक वर्ग और नए क्षत्रियों का अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति सजग रहना स्वाभाविक ही था।

धार्मिक कारण: वैदिक कर्मकांड और यज्ञ-व्यवस्था

धार्मिक आंदोलन के उदय का एक प्रमुख कारण वैदिककालीन जटिल यज्ञीय विधि-विधान भी था। वेदों को ईश्वर-प्रदत्त अथवा स्वयंभू (अपौरुषेय) माना जाता था। वैदिक धर्म में अनेक देवी-देवताओं की कल्पना थी, जिनकी कृपा मनुष्य की भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य समझी जाती थी। इन देवताओं को जटिल मंत्रों और खर्चीले यज्ञों के माध्यम से प्रसन्न किया जाता था। वैदिक मंत्रों को देववाणी माना जाता था, जिनमें किसी प्रकार का परिवर्तन संभव नहीं था-  मंत्रोच्चारण में त्रुटि होने पर भयंकर अनिष्ट की आशंका व्यक्त की जाती थी। ऐसे वातावरण में पुरोहितों का महत्त्व निरंतर बढ़ता गया और यज्ञों को स्वर्ग-प्राप्ति की नौका के समान माना जाने लगा। अश्वमेध और राजसूय जैसे वर्षभर चलने वाले विशाल यज्ञों में बड़े पैमाने पर पशु-वध होता था, और पुरोहितों को दी जाने वाली बहुमूल्य दक्षिणा के कारण धन और पशुधन की भारी क्षति होती थी। समय के साथ दक्षिणा की उगाही केवल राजकीय यज्ञों तक सीमित न रहकर सामान्य जनसाधारण को भी कर्मकांड में सम्मिलित करने का प्रयास किया जाने लगा।

शतपथ ब्राह्मण से यह भी स्पष्ट होता है कि वैदिक यज्ञ-विधान उत्तर-पूर्वी भारत में क्रमशः फैल रहा था, किंतु कर्म-प्रधान वैदिक संस्कृति इस क्षेत्र में पूर्ण रूप से स्वीकार्य नहीं हो पाई, क्योंकि यह उपनिषदों के ज्ञान-मार्ग तथा श्रमण-परंपरा के निवृत्तिमार्गी संन्यास-प्रधान धर्म के मूलतः विपरीत थी। वेदवाद, यज्ञवाद और पुरोहितवाद उस समय के सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधक बनते जा रहे थे। इसीलिए ई.पू. छठी शताब्दी के अधिकांश नास्तिक संप्रदायों ने इन कर्मकांडों का प्रबल विरोध किया। भारत सरकार के प्रकाशनों में भी यह उल्लेख मिलता है कि ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित धर्म के विरुद्ध उठी यह विरोध की आवाज आगे चलकर जैन और बौद्ध धर्म के रूप में फलीभूत हुई।

राजनीतिक कारण: ब्राह्मण-क्षत्रिय द्वंद्व और गणराज्यों का प्रभाव

धार्मिक आंदोलन के उदय में राजनीतिक कारणों ने मुख्यतः दो प्रकार से योगदान दिया- ब्राह्मण-राजन्य (क्षत्रिय) द्वंद्व और गणराज्यों का अपेक्षाकृत स्वतंत्र-जनतांत्रिक वातावरण। अनेक इतिहासकारों ने क्षत्रिय वर्ग को इस युग के ब्राह्मण-विरोधी धार्मिक आंदोलन का अगुआ माना है। वैदिककालीन सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मण और क्षत्रिय- दोनों ही वर्ग अधिशेष-उत्पादन पर निर्भर थे। विजय, कृषि और व्यापार-वाणिज्य से प्राप्त अधिशेष पर नियंत्रण को लेकर इन दोनों वर्गों में द्वंद्व उत्पन्न होना स्वाभाविक था। विश्वामित्र और वशिष्ठ की पौराणिक शत्रुता, तथा परशुराम (जामदग्न्य) द्वारा क्षत्रिय-संहार की कथा से यह संकेत मिलता है कि क्षत्रिय वर्ग ब्राह्मणों की सामाजिक सर्वोच्चता का विरोध कर रहा था। शतपथ ब्राह्मण में सामाजिक अनुक्रम में क्षत्रिय को प्रायः प्रथम स्थान पर रखा गया है।

यद्यपि वैदिक साहित्य में इन दोनों अनुत्पादक वर्गों के बीच सहयोग के भी अनेक उदाहरण मिलते हैं, तथापि अनेक क्षत्रिय याज्ञिक कृत्यों और यहाँ तक कि पौरोहित्य की ओर भी अग्रसर हो रहे थे। समर्थ राजन्यों ने दार्शनिक क्षेत्र में भी विजय प्राप्त की और स्वयं उपनिषदों की रचना में योगदान दिया। पांचालराज प्रवाहण जाबालि, विदेह-नरेश जनक, कैकयराज अश्वपति और काशिराज अजातशत्रु जैसे क्षत्रिय शासकों ने ब्राह्मणों के आचार्यत्व को चुनौती दी और स्वयं उन्हें आत्मविद्या की दीक्षा प्रदान की। उत्तर-पूर्वी भारत में लिच्छवि, शाक्य, मल्ल और वृज्जि जैसे क्षत्रिय-प्रधान गणराज्यों की प्रधानता थी, और यही वह भूमि थी जहाँ जैन और बौद्ध जैसे बुद्धिवादी संप्रदायों का उदय एवं विकास हुआ। आर्थिक लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजकीय सत्ता को लेकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों के मध्य चलती प्रतिद्वंद्विता इस बौद्धिक आंदोलन के उदय में सहायक सिद्ध हुई।

ई.पू. छठी शताब्दी तक “जन” (कबीले) का युग समाप्तप्राय हो चुका था, और अधिकांश जनपद या तो गणतंत्रीय शासन के अधीन थे या राजतंत्रीय शासन के। शासन-सत्ता प्रायः क्षत्रिय वर्ग के हाथों में केंद्रित थी, और राज्य के संगठन में भौगोलिक-राजनीतिक “देश-तत्त्व” कुल या जाति (सजात्य) की तुलना में अधिक शक्तिशाली हो चुका था। बौद्ध और जैन साहित्य से यह भी स्पष्ट होता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के जनपदों में क्षत्रिय-प्रधान गणों और निर्ग्रंथों जैसे श्रमणों का प्रभुत्व था- यही क्षेत्र इस बुद्धिवादी धार्मिक आंदोलन के उदय की उर्वर भूमि बना। सोलह महाजनपदों में से अनेक, विशेषतः वृज्जि और मल्ल संघ गणतांत्रिक शासन-पद्धति का पालन करते थे और इन गणराज्यों का अपेक्षाकृत खुला, वाद-विवाद-प्रधान और जनतांत्रिक वातावरण नए संप्रदायों के उदय में विशेष रूप से सहायक सिद्ध हुआ।

संशय और वैचारिक उथल-पुथल का वातावरण

वैदिक यज्ञवाद और कर्मप्रधान प्रवृत्तिमार्ग का श्रमण-संस्कृति के निवृत्तिमार्ग से टकराव स्वाभाविक ही था। इस काल में वैदिक धर्म का विरोध करने वाले परिव्राजक, वैरागी, तपस्वी और संन्यासी जन-साधारण के बीच अपने-अपने मतों का प्रचार कर रहे थे और परंपरागत नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे थे। इसके परिणामस्वरूप समाज में एक प्रकार की धार्मिक-वैचारिक अराजकता फैल गई। जैन-बौद्ध ग्रंथों (विशेषतः ब्रह्मजाल सुत्त) में बासठ नास्तिक-आस्तिक दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख मिलता है, जैसे- आजीवक, निर्ग्रंथ, मुंडश्रावक, जटिलक, परिव्राजक, मार्गंधक, त्रैदंडिक, अविरुद्धक, गौतमक, देवधार्मिक, उच्छेदवादी, पूर्वकृतवादी (पुब्बेकतावादी), अक्रियावादी और क्रियावादी आदि। इन सबमें छह आचार्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली माने जाते हैं- पूरण कश्यप, मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलिन, पकुध कात्यायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और निगंठ नाथपुत्त (महावीर)। इन छह आचार्यों का विवरण मुख्यतः दीघनिकाय के “सामञ्ञफल सुत्त” में मिलता है, जहाँ मगध-नरेश अजातशत्रु इनके दर्शन पर बुद्ध से प्रश्न पूछता है।

पूरण कश्यप

ब्राह्मण कुल में जन्मे पूरण कश्यप घोर अक्रियावादी थे। उनका मत था कि किसी भी कर्म का कोई फल नहीं होता। उन्होंने अक्रियावाद का प्रचार करते हुए पाप और पुण्य की अवधारणा को ही नकार दिया, जिसे बौद्ध और जैन स्रोत नैतिक अनाचार को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। उनका तर्क था कि आत्मा और शरीर परस्पर भिन्न हैं- आत्मा कोई क्रिया नहीं करती, शरीर ही करता है। अतः कोई भी कर्म, चाहे वह हत्या हो, चोरी हो या असत्य-भाषण, न तो पाप उत्पन्न करता है और न पुण्य।

मक्खलि गोशाल

महावीर के समकालीन मक्खलि गोशाल ने नियतिवाद का प्रचार करते हुए आजीवक संप्रदाय की स्थापना की, जिसका उल्लेख सम्राट अशोक के सातवें स्तंभ-लेख में भी मिलता है। जनश्रुति के अनुसार गोशाल का जन्म एक गोशाला में हुआ था, और उन्होंने अपने पिता के “मंख” व्यवसाय- अर्थात् चित्रपट (चित्रित वस्त्र या फलक) दिखाकर आजीविका चलाने वाले परिव्राजक-व्यवसाय को अपनाया, जिससे उनका नाम “मक्खलि” (मंख-लि) पड़ा। भगवतीसूत्र के अनुसार वे कुछ समय तक महावीर के सहवर्ती/शिष्य भी रहे, किंतु बाद में उनसे अलग होकर अपना स्वतंत्र संप्रदाय स्थापित किया। कट्टर नियतिवादी गोशाल का मत था कि समस्त प्राणी नियति के अधीन हैं और उनका अपना कोई स्वतंत्र पुरुषार्थ या पराक्रम नहीं है- वे केवल नियति, संगति और स्वभाव के कारण ही सुख-दुख का अनुभव करते हैं। बौद्ध और जैन दोनों ग्रंथ इस मत को अनैतिक और हानिकारक मानते थे, क्योंकि यह व्यक्तिगत नैतिक प्रयास के महत्त्व को नकारता था।

अजित केशकंबलिन

अजित केशकंबलिन को भारतीय भौतिकवाद (लोकायत दर्शन) का ऐतिहासिक अग्रदूत माना जाता है। वे मनुष्य के केशों से बने खुरदुरे कंबल धारण करते थे, इसीलिए “केशकंबलिन” कहलाए। उन्होंने उच्छेदवाद का प्रचार किया, जिसके अनुसार मृत्यु के पश्चात् पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि-  ये चारों महाभूत अपने-अपने मूल तत्त्व में विलीन हो जाते हैं, और इसके परे आत्मा की कोई स्वतंत्र सत्ता शेष नहीं रहती। उन्होंने पाप-पुण्य, यज्ञ, हवन और दान इन सभी को निरर्थक बताया। उनका चिंतन आगे चलकर लोकायत (चार्वाक) परंपरा को सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है।

पकुध कात्यायन

बुद्ध के समकालीन पकुध कात्यायन ने “अन्योन्यवाद” अथवा सप्त-काय-सिद्धांत का प्रचार किया। उनका मत था कि सात मूल तत्त्व- पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि), वायु, सुख, दुख और जीव- अकृत, अनिर्मित, नित्य और अबध्य हैं, और ये परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित नहीं कर सकते। इस आधार पर उन्होंने पुनर्जन्म और कर्मफल की अवधारणा को नकार दिया। उनका यह सिद्धांत “सत्कार्यवाद” का प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है, जो अनेक बिंदुओं पर परवर्ती वैशेषिक दर्शन से साम्य रखता है।

संजय वेलट्ठिपुत्त

संजय वेलट्ठिपुत्त राजगृह में एक विशाल धार्मिक संघ के संस्थापक और आचार्य थे। कहा जाता है कि बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्त और मोग्गल्लान भी प्रारंभ में उन्हीं के अनुयायी थे। उनका सिद्धांत अनिश्चयवाद अथवा अज्ञेयवाद (Skepticism) था, जिसके अनुसार परलोक, पुनर्जन्म और कर्मफल जैसे तत्त्वमीमांसीय प्रश्नों पर निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उनके अनुयायी “अमराविक्खेपिक” (टालमटोल करने वाले, विक्षेपवादी) कहलाए। संजय को महावीर के स्याद्वाद (अनेकांतवाद) और बुद्ध के विभज्यवाद, दोनों का एक वैचारिक पूर्ववर्ती माना जाता है।

निगंठ नाथपुत्त (महावीर)

निगंठ नाथपुत्त अर्थात् वर्धमान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे, जिन्हें परंपरागत रूप से जैन आंदोलन का प्रमुख प्रवर्तक व संगठनकर्ता माना जाता है। समस्त बंधनों, विशेषतः वस्त्र और परिग्रह से मुक्त होने के कारण वे “निर्ग्रंथ” (निगंठ) कहलाए। उनका जन्म वैशाली के निकट कुण्डग्राम में हुआ माना जाता है।

इन छह प्रमुख आचार्यों के अतिरिक्त उस युग में रावरी, पटतपाद (पूर्णक), संदूक, सरभ, सभिय, आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त जैसे अन्य आचार्यों का भी उल्लेख मिलता है, जो इस काल की व्यापक वैचारिक हलचल के परिचायक हैं।

ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन (Intellectual Movement in the Sixth Century BC)
ई.पू. छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन

जैन एवं बौद्ध धर्म: आंदोलन की परिणति

ई.पू. छठी शताब्दी के इसी विषम और अस्थिर वैचारिक वातावरण में महावीर और गौतम बुद्ध जैसे मानवतावादी महापुरुषों का उदय हुआ। इन दोनों को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ा- एक ओर वैदिक धर्म की रूढ़ियों का विरोध, और दूसरी ओर समकालीन परिव्राजकों के अतिवादी और परस्पर-विरोधी मतों का खंडन। जैन और बौद्ध धर्म ने वैदिक यज्ञ-व्यवस्था का विरोध किया, समकालीन परिव्राजकों के अव्यवस्थामूलक और नैतिकता-विरोधी मतों का खंडन किया, और साथ ही नई कृषि-वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था पर आधारित समाज को एक ठोस वैचारिक व नैतिक आधार प्रदान किया।

गौतम बुद्ध का जन्म परंपरागत मान्यता के अनुसार लुंबिनी में हुआ, बोधगया में उन्हें ज्ञान-प्राप्ति (बुद्धत्व) हुई, और सारनाथ में उन्होंने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्र-प्रवर्तन) दिया। बुद्ध और महावीर- दोनों ने वेदवाद, ब्राह्मणों की जन्म-आधारित सर्वोच्चता और कठोर जाति-प्रथा का प्रबल विरोध किया तथा अहिंसा एवं संन्यास-प्रधान जीवन-शैली को बढ़ावा दिया। वेदों को देववाणी मानने से इंकार करते हुए बुद्ध ने कहा कि वेद-मंत्र जल-विहीन मरुस्थल और मार्ग-विहीन सघन वन के समान निष्फल हैं। बुद्ध ने पुरोहितों के दक्षिणा-लोभ और पशु-वध की भी कठोर शब्दों में निंदा की। जैन और बौद्ध- दोनों ग्रंथों में जन्म-आधारित जाति-प्रथा का विरोध किया गया और कर्म (आचरण) को ही वास्तविक “जाति” का आधार बताया गया। दोनों धर्मों ने चारों वर्णों तथा स्त्रियों- सभी के लिए अपने धर्म-द्वार खोल दिए, जो उस युग में एक क्रांतिकारी कदम था।

बौद्धिक आंदोलन का ऐतिहासिक परिणाम

इस बौद्धिक आंदोलन का प्रभाव भारतीय इतिहास पर दीर्घकाल तक बना रहा। इसने अहिंसा, दया, करुणा, शांति और सेवा-भावना पर आधारित एक अपेक्षाकृत समतावादी युग की शुरुआत की। स्वतंत्र चिंतकों ने उच्च वर्गों के सामाजिक-धार्मिक एकाधिकार, सामाजिक कुप्रथाओं और वर्ण-आधारित असमानता का प्रबल विरोध किया। इन्होंने पारंपरिक ईश्वरीय सत्ता को नकारते हुए सम्यक् आचार-विचार को ही मुक्ति (निर्वाण/मोक्ष) का वास्तविक साधन बताया। वैदिक वर्ण-विभाजन से उत्पीड़ित कृषक, शिल्पकार और व्यापारी वर्ग स्वाभाविक रूप से इन नए धर्मों की ओर आकर्षित हुए, क्योंकि इनमें उन्हें सामाजिक सम्मान और समानता का आश्वासन मिलता था।

ब्राह्मण-क्षत्रिय प्रतिद्वंद्विता का प्रभाव आगे चलकर भारतीय इतिहास पर भी पड़ा। परवर्ती काल में भागवत धर्म और भक्ति-संप्रदायों के उदय ने भी ब्राह्मणों का निम्न वर्गों के साथ वैचारिक संघर्ष आरंभ किया, यद्यपि निम्न वर्गों के विरुद्ध प्रायः ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग परस्पर एकजुट हो जाते थे। बौद्ध ग्रंथों में कुछ ब्राह्मणों को “पथभ्रष्ट” भी कहा गया है, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के फलस्वरूप अनेक ब्राह्मण वैद्य, कृषक, व्यापारी और अन्य आजीविकाओं में संलग्न हो गए थे। इस आंदोलन के संन्यासियों और आचार्यों ने संस्कृत के स्थान पर पालि और प्राकृत जैसी जन-भाषाओं में उपदेश दिए और ग्रंथों की रचना की, जिससे धर्म आम जनता के लिए अधिक सुगम और सुलभ हो सका और उत्कृष्ट कोटि के धर्मग्रंथों की रचना संभव हुई।

इस प्रकार ई.पू. छठी शताब्दी का यह बौद्धिक आंदोलन किसी एक कारण की उपज नहीं था, बल्कि लौह-प्रौद्योगिकी पर आधारित कृषि-क्रांति, नगरीकरण और मौद्रिक अर्थव्यवस्था के उदय, वर्ण-आधारित सामाजिक असमानता, वैदिक कर्मकांड की जटिलता और खर्चीलेपन तथा ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इन सभी कारकों के जटिल अंतर्संबंध का परिणाम था। इस आंदोलन ने न केवल जैन और बौद्ध धर्म जैसे स्थायी धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं को जन्म दिया, बल्कि भारतीय चिंतन में तर्क, अहिंसा और सामाजिक समानता की एक ऐसी परंपरा स्थापित की, जिसका प्रभाव आगामी शताब्दियों में भी निरंतर बना रहा।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन के उदय से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. प्रश्न: ईसा पूर्व छठी शताब्दी में बौद्धिक आंदोलन के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?

उत्तर: इस काल में कृषि और व्यापार का विस्तार, नगरों का विकास, नए सामाजिक वर्गों का उदय, महंगे वैदिक कर्मकांडों से असंतोष और ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर प्रश्न उठने लगे। इन परिस्थितियों ने नए धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों के विकास को प्रोत्साहित किया।

2. प्रश्न: ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्धिक आंदोलन की प्रमुख विशेषता क्या थी?

उत्तर: इस काल में वैदिक कर्मकांड और यज्ञ की प्रधानता को चुनौती देते हुए कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष, अहिंसा और नैतिक आचरण जैसे विषयों पर नए विचार विकसित हुए। अनेक श्रमण परंपराओं ने व्यक्तिगत साधना और नैतिक जीवन पर बल दिया।

3. प्रश्न: ईसा पूर्व छठी शताब्दी में कौन-कौन से प्रमुख धार्मिक आंदोलन का उदय हुआ?

उत्तर: इस काल में बौद्ध धर्म और जैन धर्म सबसे प्रभावशाली नए धार्मिक आंदोलनों के रूप में उभरे। इनके अतिरिक्त आजीवक तथा अन्य श्रमण परंपराएँ भी सक्रिय थीं। इन आंदोलनों ने वैदिक धार्मिक परंपराओं के समानांतर वैकल्पिक विचार प्रस्तुत किए।

4. प्रश्न: बौद्धिक आंदोलन में श्रमण परंपरा का क्या महत्त्व था?

उत्तर: श्रमण परंपरा ने यज्ञ-कर्मकांड, जन्म-आधारित सामाजिक श्रेष्ठता और ब्राह्मण पुरोहितों की धार्मिक भूमिका पर प्रश्न उठाए। इसके अनुयायियों ने तप, ध्यान, नैतिक आचरण और व्यक्तिगत मुक्ति पर जोर दिया। बौद्ध और जैन धर्म इसी व्यापक श्रमण परंपरा से जुड़े थे।

5. प्रश्न: ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्धिक आंदोलन का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: इन आंदोलनों ने व्यक्ति के नैतिक आचरण और कर्म को महत्त्व दिया तथा धार्मिक जीवन को अधिक सरल और जनसुलभ बनाने में योगदान दिया। व्यापारियों, शिल्पियों और नगरों में रहने वाले लोगों सहित विभिन्न सामाजिक समूहों ने नए धर्मों और विचारधाराओं को समर्थन दिया।

6. प्रश्न: ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्धिक आंदोलन का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व था?

उत्तर: इस आंदोलन ने भारतीय चिंतन में तर्क, नैतिकता, अहिंसा, कर्म, पुनर्जन्म और मुक्ति संबंधी विचारों को नई दिशा दी। बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार से धार्मिक एवं दार्शनिक विविधता बढ़ी तथा तत्कालीन भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीतिक जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा।
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