होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता (1916 ई.)
1916 ई. का ऐतिहासिक महत्त्व
1916 ई. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, क्योंकि इसी वर्ष होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौते ने भारतीय राजनीति को एक बिल्कुल नई दिशा प्रदान की। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन की नीतियों, राजनीतिक अधिकारों की बढ़ती माँग और स्वशासन की गहन आकांक्षा ने भारतीय राष्ट्रवाद को कहीं अधिक सक्रिय बना दिया था। इसी पृष्ठभूमि में बाल गंगाधर तिलक ने 28 अप्रैल 1916 ई. में तथा एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 ई. में अलग-अलग होमरूल लीगों की स्थापना करके भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन की माँग को व्यापक जनसमर्थन दिलाने का ऐतिहासिक प्रयास किया। होमरूल आंदोलन ने लंबे समय से अपेक्षाकृत निष्क्रिय पड़ी राष्ट्रीय राजनीति में नया उत्साह और गहरी राजनीतिक चेतना उत्पन्न की, तथा कांग्रेस के नरम और गरम दलों के बीच पुनः एकता का मार्ग प्रशस्त किया। इसी उत्साहपूर्ण राजनीतिक वातावरण में दिसंबर 1916 ई. में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक लखनऊ समझौता (लखनऊ पैक्ट) संपन्न हुआ, जिसमें दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों और भारतीयों के लिए अधिक राजनीतिक अधिकारों की माँग को लेकर ब्रिटिश सरकार पर संयुक्त दबाव बनाने की दिशा में सहयोग किया। इस समझौते ने कुछ समय के लिए हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को सुदृढ़ किया और कांग्रेस के दोनों गुटों- नरमपंथी तथा उग्रपंथी के पुनर्मिलन को भी संभव बनाया। इस प्रकार होमरूल आंदोलन ने स्वशासन की माँग को जन-राजनीति का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय बनाया, जबकि लखनऊ समझौते ने राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक सहयोग की नई संभावनाएँ प्रस्तुत कीं। इसीलिए 1916 का वर्ष भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में राजनीतिक पुनर्जागरण, संगठनात्मक एकता और स्वशासन की माँग के व्यापक विस्तार का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण माना जाता है।
प्रथम विश्वयुद्ध और भारतीय राजनीति की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918 ई.) के दौरान भारत के राजनीतिक जीवन एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। जो भारतीय राजनीतिज्ञ क्रांतिकारी नहीं थे, उन्होंने अंग्रेज सरकार के युद्धकालीन प्रयासों का व्यापक समर्थन किया। 1918 ई. में स्वयं तिलक और गांधीजी ने अंग्रेजों की सहायता के लिए सैन्य-भर्ती हेतु जन और धन जुटाने के उद्देश्य से गाँवों का दौरा किया। तिलक का प्रसिद्ध कथन था: “युद्ध के ऋणपत्र खरीदो, पर उन्हें होमरूल के पट्टे समझो।” इस प्रकार युद्ध के दौरान एक साझा राजनीतिक मंच का वस्तुगत आधार तैयार हुआ, जिसके अंतर्गत नरमदलीय, उग्रवादी और तथाकथित ‘यंग पार्टी’ के नियंत्रण वाली मुस्लिम लीग- इन सबका एक ही साझा कार्यक्रम था : युद्ध में समर्थन देने के बदले संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार पर संवैधानिक किंतु प्रबल दबाव डालना। उन्हें यह आशा थी कि ‘कृतज्ञ होकर ब्रिटेन भारत की वफादारी का पुरस्कार देगा और भारत स्वशासन की ओर एक लंबी छलांग लगाने में समर्थ होगा।’ वे यह भूल गए कि प्रथम विश्वयुद्ध की विभिन्न प्रतिस्पर्धी शक्तियाँ मूलतः केवल अपने-अपने उपनिवेशों को सुरक्षित रखने के लिए ही लड़ रही थीं।
अनेक भारतीय नेता अब भी यह मानते थे कि सरकार तब तक कोई वास्तविक राजनीतिक अधिकार नहीं देगी, जब तक उसके ऊपर जनता का सुसंगठित दबाव नहीं पड़ेगा और इसके लिए एक वास्तविक राजनीतिक जन-आंदोलन प्रारंभ करने की अत्यंत आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारण भी भारतीय राष्ट्रवाद को इसी दिशा में धकेल रहे थे। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण भारत के निर्धन वर्गों की आर्थिक स्थिति निरंतर बदहाल और दयनीय होती जा रही थी। वे यह भली-भाँति जानते थे कि युद्ध के कारण महँगाई और करों का बढ़ना लगभग अवश्यंभावी है, इसलिए वे किसी भी जुझारू विरोध-आंदोलन में सम्मिलित होने के लिए मानसिक रूप से तैयार थे।
किंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उस समय ऐसे किसी व्यापक जन-आंदोलन का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं थी, क्योंकि सूरत के बदनाम विभाजन (1907 ई.), स्वदेशी आंदोलनकारियों के विरुद्ध किए गए दमनकारी प्रहारों और 1909 ई. के मार्ले-मिंटो संवैधानिक सुधारों के कारण नरमपंथी दल अपेक्षाकृत निष्क्रिय और जड़ हो चुका था तथा जनता के बीच उसकी कोई प्रभावी पहुँच नहीं रह गई थी। नरमपंथी नेतृत्व के इस अपेक्षाकृत निष्प्रभावी होने में गोपाल कृष्ण गोखले की 19 फरवरी 1915 ई. को हुई असामयिक मृत्यु का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था, जिससे नरमपंथी खेमे में एक बड़ा नेतृत्व-शून्य उत्पन्न हो गया था। 1914 ई. में मांडले (बर्मा) से निष्कासन की अवधि समाप्त होने पर लौटने के बाद तिलक ने अपने पुराने कांग्रेसी विरोधियों के प्रति वैर-भाव भुलाने की गहरी उत्सुकता दिखाई। उन्हें यह प्रतीत होता था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अब भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का पर्याय बन चुकी है और बिना इसकी अनुमति के कोई भी राष्ट्रीय आंदोलन सफल नहीं हो सकता। नरमपंथियों को समझाने-बुझाने, उनका विश्वास पुनः जीतने और भविष्य में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध किसी भी उग्र मार्ग को न अपनाने के आश्वासन के उद्देश्य से उन्होंने स्पष्ट घोषणा की : “मैं साफ-साफ कहता हूँ कि हम लोग हिंदुस्तान में प्रशासन-व्यवस्था का सुधार चाहते हैं, जैसा कि आयरलैंड में वहाँ के आंदोलनकारी माँग कर रहे हैं। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का हमारा कोई इरादा नहीं है।” उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई और भारतीय जनता से अपील की कि वह संकट की इस घड़ी में अंग्रेजी हुकूमत का साथ दे।
होमरूल आंदोलन की पृष्ठभूमि
थियोसोफिकल सोसाइटी की विश्व अध्यक्ष एनी बेसेंट, जो साम्राज्य-विरोधी तो बिल्कुल भी नहीं थीं, किंतु उन्हें यह प्रतीत होता था कि भारतीयों को पर्याप्त मात्रा में स्वायत्त शासन प्रदान करना भारत और ब्रिटेन की स्थायी मैत्री के लिए अत्यंत आवश्यक है। बेसेंट यह चाहती थीं कि ब्रिटिश रेडिकल आंदोलन और आयरिश होमरूल आंदोलन की तर्ज पर भारत में भी स्वशासन की माँग को लेकर एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन चलाया जाए। एनी बेसेंट को यह विश्वास था कि इस आंदोलन की सफलता के लिए कांग्रेस की अनुमति और उग्रपंथियों का सक्रिय सहयोग प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है। फलस्वरूप वे कांग्रेस के उदारपंथियों पर बार-बार दबाव डालती रहीं कि तिलक और उनके उग्रपंथी सहयोगियों को कांग्रेस में पुनः सम्मिलित कर लिया जाए।
फिरोजशाह मेहता की 5 नवंबर 1915 ई. को हुई मृत्यु तक उग्रवादी कांग्रेस में औपचारिक रूप से पुनः शामिल नहीं हो सके, जबकि कलकत्ता के भूपेंद्रनाथ बसु जैसे कुछ उदारवादी नेता किसी भी ऐसे साधन को स्वीकार करने के लिए तत्पर थे, जो कांग्रेस को उसकी वर्तमान राजनीतिक निष्क्रियता से बाहर निकाल सके। उस समय कांग्रेस अभी तक विशुद्ध रूप से वार्षिक विचार-विमर्श का एक मंच ही थी, जो किसी भी सतत और लगातार चलाए जाने वाले जन-आंदोलन के लिए संस्थागत रूप से तैयार नहीं थी। इसलिए तिलक और एनी बेसेंट ने स्वयं अपना राजनीतिक आंदोलन चलाने का निश्चय किया, किंतु साथ-साथ वे कांग्रेस पर यह दबाव भी बनाए रखते रहे कि वह उग्रपंथियों को पुनः अपना सदस्य बना ले। अंततः दिसंबर 1915 ई. में कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में तिलक के गुट (उग्रपंथियों) को कांग्रेस में पुनः सम्मिलित होने की औपचारिक अनुमति मिल गई।
होमरूल लीगों का गठन
होमरूल आंदोलन का अपेक्षाकृत साधारण किंतु स्पष्ट लक्ष्य था : भारत के लिए होमरूल (स्वशासन) प्राप्त करना तथा ऐसा व्यापक शिक्षा-कार्यक्रम चलाना, जो भारतीयों में अपनी मातृभूमि के प्रति गहरे गर्व की भावना का विकास कर सके।
आंदोलन को संगठित करने का प्रमुख कार्य तिलक और एनी बेसेंट की दो पृथक होमरूल लीगों ने किया। एनी बेसेंट ने दिसंबर 1915 ई. में ही ऐसी एक लीग की योजना सार्वजनिक रूप से घोषित कर दी थी और इससे पूर्व ही मद्रास से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘कॉमनवील’ (2 जनवरी 1914 ई.) तथा दैनिक पत्र ‘न्यू इंडिया’ (14 जुलाई 1914) के माध्यम से भारतीयों में स्वतंत्रता एवं राजनीतिक भावना जागृत करने का कार्य पहले ही आरंभ कर दिया था। इसके पश्चात 1915-16 ई. के आसपास बंबई से ‘यंग इंडिया’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन भी होमरूल प्रचार के उद्देश्य से आरंभ हुआ। यही पत्र आगे चलकर 1919 ई. में महात्मा गांधी द्वारा अधिगृहीत किया गया और उनके प्रमुख मुखपत्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ। बाल गंगाधर तिलक ने 28 अप्रैल 1916 ई. को बेलगाँव में आयोजित एक प्रांतीय सम्मेलन में अपनी ‘भारतीय होमरूल लीग’ की स्थापना की। इसका आंशिक कारण यह भी था कि वे महाराष्ट्र क्षेत्र में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को सुदृढ़ बनाए रखना चाहते थे।
एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 ई. में मद्रास के निकट अडयार में अपनी ‘होमरूल लीग’ की औपचारिक शुरुआत की और जॉर्ज अरुंडेल को इसका संगठन-सचिव नियुक्त किया। दोनों होमरूल लीगों ने यह निश्चय किया कि वे आपसी सहयोग से और साथ ही अपने-अपने पृथक क्षेत्रों में भी, स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगी। तिलक और एनी बेसेंट, दोनों ने अपनी-अपनी लीगों के लिए कार्य-क्षेत्रों का स्पष्ट बँटवारा कर लिया, ताकि किसी प्रकार की संगठनात्मक अव्यवस्था उत्पन्न न हो। तिलक की लीग कर्नाटक, महाराष्ट्र (बंबई शहर को छोड़कर), मध्य प्रांत तथा बरार तक ही सीमित रही, किंतु इसकी सदस्य संख्या अप्रैल 1917 ई. तक 14,000 और 1918 ई. के आरंभ तक बढ़कर लगभग 32,000 हो गई थी।
तिलक और उनके निकटतम सहयोगी नरसिंह चिंतामण केलकर पूना में रहकर पर्याप्त केंद्रीकृत ढंग से अपने संगठन का संचालन करते थे। इसके विपरीत एनी बेसेंट की लीग का स्वरूप कहीं अधिक अखिल-भारतीय था और इसके अडयार स्थित मुख्यालय की लगभग 200 स्थानीय शाखाएँ भारत के विभिन्न कस्बों, नगरों और गाँवों तक व्यापक रूप से फैली हुई थीं। 1917 ई. के मध्य तक बेसेंट की लीग की सदस्य संख्या लगभग 27,000 हो चुकी थी। इन दोनों लीगों ने आपस में विलय नहीं किया, क्योंकि स्वयं एनी बेसेंट के शब्दों में : “उनके (तिलक के) कुछ समर्थक मुझे पसंद नहीं करते थे और मेरे कुछ समर्थक उन्हें नापसंद करते थे।”
होमरूल आंदोलन की गतिविधियाँ और तिलक के प्रसिद्ध भाषण
तिलक और बेसेंट की दोनों होमरूल लीगों ने आपसी सहमति के आधार पर नगरों में संवाद-गोष्ठियों के आयोजन एवं वाचनालयों की स्थापना, बड़े स्तर पर परचों की बिक्री तथा सार्वजनिक व्याख्यानों के माध्यम से होमरूल (स्वशासन) की माँग के लिए एक अत्यंत व्यापक जन-आंदोलन आरंभ कर दिया। इन गतिविधियों का मूल स्वरूप पुरानी नरमदलीय राजनीति से बहुत अधिक भिन्न नहीं था, किंतु इनमें एक नई बात यह थी कि इनकी तीव्रता, संगठनात्मक विस्तार और जनसंपर्क कहीं अधिक व्यापक था।

तिलक की लीग ने अपनी स्थापना के मात्र एक वर्ष के भीतर ही 6 मराठी और 2 अंग्रेजी परचों की कुल 47,000 प्रतियाँ बेच दीं। बाद में इन्हीं परचों को गुजराती और कन्नड़ भाषा में भी छापा गया, जिससे इनकी पहुँच और अधिक व्यापक हो सकी। जनता को होमरूल के महत्त्व को समझाते हुए तिलक ने कहा : “भारत उस बेटे की तरह है, जो अब जवान हो चुका है। समय का तकाजा है कि बाप या पालक इस बेटे को उसका वाजिब हक दे दे। भारतीय जनता को अब अपना हक लेना ही होगा। उन्हें इसका पूरा अधिकार है।” इसी आंदोलन के दौरान तिलक ने अपना प्रसिद्ध और चिरस्मरणीय नारा दिया : “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” यह नारा आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सर्वाधिक प्रसिद्ध नारों में से एक बन गया।
तिलक ने होमरूल के व्यापक आदर्श को जनता की सुस्पष्ट एवं ठोस शिकायतों से सीधे संबद्ध करने का प्रयास किया, जैसे क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा की माँग और भाषाई प्रांतों के गठन की माँग। उन्होंने कहा : “मराठी, तेलुगु, कन्नड़ व अन्य भाषाओं के आधार पर प्रांतों के गठन की माँग का अर्थ ही है कि शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषा में हो। क्या अंग्रेज अपने यहाँ लोगों को फ्रांसीसी में शिक्षा देते हैं? क्या जर्मन अपने लोगों को अंग्रेजी में शिक्षा देते हैं या तुर्क फ्रेंच में शिक्षा देते हैं?” इससे यह स्पष्ट होता है कि तिलक में किसी भी प्रकार की क्षेत्रीय अथवा मराठी संकीर्णता नहीं थी, बल्कि वे एक व्यापक भारतीय दृष्टिकोण रखते थे।
गैर-ब्राह्मणों के प्रतिनिधित्व और छुआछूत जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर तिलक सिद्धांततः जातिवादी नहीं थे। उन्होंने गैर-ब्राह्मणों को यह समझाने का प्रयास किया कि वास्तविक झगड़ा ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मणों के बीच नहीं है, बल्कि वास्तविक भेद शिक्षित और अशिक्षित वर्गों के बीच है — चूँकि ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित हैं, इसलिए गैर-ब्राह्मणों की वकालत करने वाली सरकार भी अंततः मजबूर होकर सरकारी नौकरियों में मुख्यतः ब्राह्मणों की ही भर्ती करती है। छुआछूत उन्मूलन के लिए आयोजित एक सम्मेलन में तिलक ने यह साहसिक वक्तव्य दिया था : “यदि भगवान भी छुआछूत को बर्दाश्त करे, तो मैं भगवान को नहीं मानूँगा।” तिलक का यह आंदोलन विशुद्ध रूप से चितपावन ब्राह्मणों का आंदोलन भी नहीं था। होमरूल लीग की पूना की सदस्य-सूची से यह स्पष्ट होता है कि वहाँ इस आंदोलन में गैर-ब्राह्मण व्यापारियों की पर्याप्त सक्रिय भागीदारी थी और खानदेश जैसे जिलों में मराठा तथा गुजर सदस्यों की संख्या ब्राह्मणों की तुलना में कहीं अधिक थी।
तिलक के उस समय दिए गए भाषणों में कहीं भी सांप्रदायिक अथवा धार्मिक अपील नहीं झलकती थी। होमरूल की यह माँग पूरी तरह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर ही आधारित थी। उनका स्पष्ट मत था कि अंग्रेजों से विरोध का कारण यह बिल्कुल नहीं है कि वे किसी दूसरे धर्म के अनुयायी हैं, बल्कि उनका विरोध इसलिए है, क्योंकि वे भारतीय जनता के हित में कोई ठोस कार्य नहीं कर रहे हैं। तिलक के अपने शब्दों में : “अंग्रेज हो या मुसलमान, यदि वह इस देश की जनता के हित के लिए कार्य करता है, तो वह हमारे लिए पराया नहीं है। इस परायेपन का धर्म या व्यवसाय से कोई संबंध नहीं है, यह सीधे-सीधे हितों से जुड़ा प्रश्न है।”
तिलक पर सरकारी कार्रवाई और मुकदमा
होमरूल लीग के निरंतर बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अपनी दमनात्मक कार्रवाइयाँ तेज कर दीं। सरकार ने 23 जुलाई 1916 ई. को, जिस दिन तिलक का 60वाँ जन्मदिन था और उन्हें एक लाख रुपये की सम्मान-थैली भेंट की गई थी, उन्हें एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया, जिसमें पूछा गया कि उनकी गतिविधियों के चलते उन पर प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए। उन्हें 60 हजार रुपये का मुचलका (बॉन्ड) भरने के लिए कहा गया। तिलक के लिए यह मानो सबसे बड़ा राजनीतिक उपहार सिद्ध हुआ। उन्होंने इस पर कहा : “अब होमरूल आंदोलन जंगल में आग की तरह फैलेगा। सरकारी दमन विद्रोह की इस आग को और अधिक भड़काएगा।”
तिलक की ओर से मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में प्रतिष्ठित वकीलों ने यह मुकदमा लड़ा। मजिस्ट्रेट की निचली अदालत में वे मुकदमा हार गए, किंतु नवंबर 1916 ई. में बंबई हाईकोर्ट ने उन्हें पूर्णतः निर्दोष करार दे दिया। गांधीजी के ‘यंग इंडिया’ अखबार ने इस पर लिखा : “यह अभिव्यक्ति की आजादी की बहुत बड़ी जीत है। होमरूल आंदोलन के लिए यह एक बड़ी सफलता है।” इस निर्णायक विजय के पश्चात तिलक भी अपने सार्वजनिक भाषणों में यह कहने लगे कि अब होमरूल या स्वशासन की माँग व्यक्त करने के लिए स्वयं सरकार ने भी अप्रत्यक्ष अनुमति दे दी है।
एनी बेसेंट की होमरूल लीग की गतिविधियाँ
एनी बेसेंट की होमरूल लीग ने भी स्वशासन की माँग के लिए बड़े पैमाने पर अपना आंदोलन शुरू किया। जॉर्ज अरुंडेल ने राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक बहस को प्रोत्साहित करने के लिए ‘न्यू इंडिया’ के माध्यम से पुस्तकालयों की स्थापना, छात्रों को राजनीतिक शिक्षा देने के लिए विशेष कक्षाओं का आयोजन, परचे बाँटने, चंदा एकत्रित करने, सामाजिक कार्य करने, राजनीतिक सभाओं का आयोजन करने, मित्रों के बीच होमरूल के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करने तथा उन्हें आंदोलन में सक्रिय भागीदार बनाने के लिए स्वयंसेवकों से कार्य करने की अपील की।

बेसेंट की लीग सितंबर 1916 ई. तक 26 अंग्रेजी पुस्तिकाओं की कुल 3,00,000 प्रतियाँ प्रकाशित कर चुकी थी। नवंबर 1916 ई. में जब एनी बेसेंट को बरार व मध्य प्रांत में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो जॉर्ज अरुंडेल की अपील पर लीग की समस्त शाखाओं ने व्यापक विरोध-बैठकें आयोजित कीं और वायसरॉय तथा गृह-सचिव को विरोध-प्रस्ताव भेजे। इसी प्रकार जब 1917 ई. में तिलक के पंजाब और दिल्ली जाने पर प्रतिबंध लगाया गया, तो पूरे देश में व्यापक विरोध-सभाएँ (प्रतिवाद-बैठकें) आयोजित हुईं।
कांग्रेस की जड़ता से क्षुब्ध अनेक नरमपंथी कांग्रेसी भी होमरूल लीग आंदोलन में सम्मिलित हो गए। जवाहरलाल नेहरू, विजयराघवाचार्य (वी. चक्रवर्ती) तथा जे. बनर्जी जैसे नेताओं ने भी लीग की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की। गोखले की ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ के सदस्यों को औपचारिक रूप से लीग का सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी, किंतु उन्होंने जनता के बीच भाषण देकर और परचे बाँटकर होमरूल आंदोलन को अनौपचारिक समर्थन दिया। उत्तर प्रदेश के अनेक उदारवादी राष्ट्रवादियों ने लखनऊ कांग्रेस सम्मेलन की तैयारी के लिए होमरूल लीग के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर गाँवों-कस्बों का व्यापक दौरा किया। 1916 ई. का लखनऊ अधिवेशन होमरूल लीग के सदस्यों के लिए अपनी संगठनात्मक ताकत प्रदर्शित करने का एक उपयुक्त अवसर सिद्ध हुआ। तिलक के समर्थकों ने लखनऊ पहुँचने के लिए विशेष रूप से एक ट्रेन आरक्षित की, जिसे कुछ लोगों ने ‘कांग्रेस स्पेशल’ तो कुछ अन्य लोगों ने ‘होमरूल स्पेशल’ कहकर पुकारा। अरुंडेल ने लीग के समस्त सदस्यों से यह अपील की कि वे हर संभव प्रयास करके लखनऊ अधिवेशन के प्रतिनिधि बनने का प्रयत्न करें।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ती निकटता
सूरत अधिवेशन (1907 ई.) के समय कांग्रेस में जो गहरा विभाजन हुआ था, वह लगभग 1916 ई. तक बना रहा। इस बीच जहाँ एक ओर सरकार राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों को कुचलने में सक्रिय रूप से लगी रही, वहीं दूसरी ओर 1909 ई. के मार्ले-मिंटो सुधारों के माध्यम से उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच तथा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने का सुनियोजित प्रयास भी करती रही। किंतु इसी दौरान दो-तीन ऐसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ हुईं, जिनके कारण अंग्रेज सरकार और मुसलमानों के बीच स्पष्ट अलगाव बढ़ता गया। बंगाल-विभाजन की निरस्ति (1911 ई. में दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा घोषित), इटली-तुर्की युद्ध (1911-12 ई.) तथा बाल्कन के युद्धों (1912-13 ई.) में इंग्लैंड द्वारा तुर्की (ओटोमन साम्राज्य) को कोई सहायता न दिए जाने, अगस्त 1912 ई. में अलीगढ़ में एक स्वतंत्र मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाने के प्रस्ताव को तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा अस्वीकार किए जाने तथा 1913 ई. में कानपुर की मछली बाजार मस्जिद से सटे एक चबूतरे को तोड़ने के परिणामस्वरूप हुए दंगे के कारण भारतीय मुसलमान ब्रिटिश सरकार से खासे नाराज हो गए थे। इसी दौरान 1912 ई. में तथाकथित ‘यंग पार्टी’ (युवा गुट) ने मुस्लिम लीग पर धीरे-धीरे नियंत्रण स्थापित करते हुए उसे अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक और राष्ट्रवाद-समर्थक बनाने का प्रयास किया। इस प्रकार मुस्लिम युवा वर्ग धीरे-धीरे ही सही, अलीगढ़ संप्रदाय के अपेक्षाकृत सीमित और सरकार-समर्थक राजनीतिक दृष्टिकोण के खोल से बाहर निकलकर कांग्रेस के निकट आने लगा था।
प्रथम विश्वयुद्ध और होमरूल आंदोलनों के कारण देश में जो नई राजनीतिक एकता की भावना निरंतर पनप रही थी, उससे केवल उदारवादियों और उग्रवादियों को ही नहीं, बल्कि मुसलमानों को भी यह अनुभव होने लगा था कि उनकी आपसी फूट के कारण उनके साझा राजनीतिक उद्देश्य की भारी हानि हो रही है, इसलिए उन्हें सरकार के विरुद्ध एकजुट हो जाना चाहिए। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता की इसी बढ़ती आकांक्षा के कारण तिलक, एनी बेसेंट तथा मुहम्मद अली जिन्ना के संयुक्त प्रयासों से 1915 ई. में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन एक साथ बंबई में आयोजित हुआ, जहाँ दोनों संगठनों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से एक मुस्लिम भोज का भी आयोजन किया। इसी समय से जिन्ना ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ के रूप में सम्मानित होने लगे थे। इसके अगले ही वर्ष लखनऊ में एक बार पुनः कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन साथ-साथ संपन्न हुआ, जिसमें ऐतिहासिक लखनऊ समझौता संभव हो सका।
कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन (1916 ई.) : नरमपंथी-गरमपंथी पुनर्मिलन
1916 ई. में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ घटित हुईं। पहली यह कि कांग्रेस के दोनों विभाजित हिस्से- उदारवादी और उग्रवादी पुनः एक हो गए। यह पुनर्मिलन समय की एक अनिवार्य आवश्यकता भी थी, क्योंकि आपसी फूट के कारण कांग्रेस लगभग एक दशक से निष्क्रियता का शिकार बनी हुई थी। कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुए अंबिकाचरण मजूमदार ने कहा : “दस वर्षों के दुखद अलगाव तथा गलतफहमी के कारण बेवजह के विवादों में भटकने के बाद भारतीय राष्ट्रीय दल के दोनों खेमों ने अब यह महसूस किया कि अलगाव ही उनकी पराजय है और एकता ही उनकी वास्तविक जीत। अब भाई-भाई फिर मिल गए हैं।” वस्तुतः 1914 ई. में मांडले की जेल से छूटने के बाद से ही तिलक ने कांग्रेस के दोनों गुटों को एकजुट करने का सुनियोजित प्रयास आरंभ कर दिया था और राष्ट्रवाद की उभरती हुई नई लहर के कारण पुराने कांग्रेसी नेता भी अब तिलक तथा अन्य गरमपंथी राष्ट्रवादियों के कांग्रेस में दोबारा लौटने का हार्दिक स्वागत करने को तत्पर थे।
लखनऊ समझौता (1916 ई.) : कांग्रेस-लीग पैक्ट
दूसरी अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई कि अपने पुराने मतभेद भुलाकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपनी साझी राजनीतिक माँगें प्रस्तुत कीं। कांग्रेस और लीग की यह ऐतिहासिक एकता एक औपचारिक कांग्रेस-लीग समझौते पर हस्ताक्षर के साथ स्थापित हुई, जिसे ‘लखनऊ पैक्ट’ के नाम से जाना जाता है। इन दोनों संगठनों को परस्पर निकट लाने में तिलक और जिन्ना, दोनों की ही अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, क्योंकि दोनों नेताओं का दृढ़ मत था कि केवल हिंदू-मुस्लिम एकता के माध्यम से ही भारत को स्वशासन प्राप्त हो सकता है। इस ऐतिहासिक समझौते में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक (पृथक) प्रतिनिधित्व की माँग को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। कांग्रेस और लीग दोनों ने अपने-अपने अधिवेशन में एक समान प्रस्ताव पारित किए: पृथक चुनाव-मंडलों के आधार पर राजनीतिक सुधारों की एक साझी योजना प्रस्तुत की गई, और माँग की गई कि ब्रिटिश सरकार यथाशीघ्र भारत को स्वशासन प्रदान करने की स्पष्ट घोषणा करे।
लखनऊ समझौते की प्रमुख शर्तों में मुसलमानों के लिए केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में पृथक निर्वाचन-मंडल तथा जनसंख्या के अनुपात से अधिक स्थानों का आरक्षण (विशेष रूप से उन प्रांतों में, जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक थे, जैसे संयुक्त प्रांत, मद्रास और बिहार) सम्मिलित था, जबकि उन प्रांतों में जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक थे (जैसे बंगाल और पंजाब), उन्हें अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व स्वीकार करना पड़ा। इसके साथ ही विधान परिषदों की सदस्य संख्या बढ़ाने, निर्वाचित सदस्यों का अनुपात बढ़ाने तथा कार्यपालिका परिषदों में भारतीयों के प्रतिनिधित्व की माँग भी इस समझौते का अभिन्न भाग थी।

मदनमोहन मालवीय जैसे अनेक वरिष्ठ हिंदू नेता इस समझौते के विरुद्ध थे, क्योंकि उनके अनुसार यह समझौता मुस्लिम लीग को अपेक्षाकृत अत्यधिक महत्त्व प्रदान करता था। इस संबंध में स्वयं तिलक ने कहा : “कुछ महानुभावों का यह आरोप है कि हम हिंदू अपने मुसलमान भाइयों को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं। मैं कहता हूँ कि यदि स्वशासन का अधिकार केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाए, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा; राजपूतों को यह अधिकार मिले, तो भी परवाह नहीं। यदि यह अधिकार हिंदुओं के सबसे पिछड़े वर्गों को भी दिया जाए, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। हिंदुस्तान के किसी भी समुदाय को यह अधिकार दे दिया जाए, हमें कोई ऐतराज नहीं है। मेरा यह बयान समूची भारतीय राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करता है।” निःसंदेह लखनऊ समझौता हिंदू-मुस्लिम एकता के विकास की दिशा में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम था। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों के सिद्धांत को इसीलिए स्वीकार किया गया, ताकि अल्पसंख्यकों को यह भय न रहे कि बहुसंख्यक समुदाय उन पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। किंतु इस समझौते में हिंदुओं और मुसलमानों के राजनीतिक दृष्टिकोण को पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष बनाने का ऐसा कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया, जिससे वे यह गहराई से समझ सकें कि राजनीति में हिंदू या मुसलमान के रूप में उनके हित वस्तुतः अलग-अलग नहीं हैं और यही आगे चलकर सांप्रदायिक राजनीति के विस्तार का एक महत्त्वपूर्ण कारण भी बना।
लखनऊ समझौते के पश्चात भारतीय राजनीति में संप्रदायवाद के भविष्य में सिर उठाने की पूरी संभावना बनी रही। फिर भी, उदारवादियों और उग्र राष्ट्रवादियों के बीच तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एकता स्थापित होने के कारण उस समय पूरे देश में एक नई राजनीतिक उत्साह की लहर दौड़ गई। लखनऊ के इसी कांग्रेस अधिवेशन में संवैधानिक सुधारों की माँग को भी पुनः प्रमुखता से उठाया गया। तिलक ने एक प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस अधिवेशन के निर्णयों तथा कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने के लिए एक स्थायी कार्यकारिणी समिति का गठन किया जाए, किंतु उदारवादियों के तीव्र विरोध के कारण यह प्रस्ताव उस समय पारित नहीं हो सका। बाद में, ठीक चार वर्ष पश्चात 1920 ई. में जब गांधीजी ने कांग्रेस के संविधान को व्यापक रूप से संशोधित करके उसे एक बिल्कुल नया संगठनात्मक स्वरूप दिया, तो एक प्रकार से तिलक के इसी प्रस्ताव को अंततः स्वीकार कर लिया गया। कांग्रेस अधिवेशन की समाप्ति के तत्काल पश्चात उसी पंडाल में दोनों होमरूल लीगों की एक संयुक्त बैठक भी आयोजित हुई, जिसमें कांग्रेस-लीग समझौते की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।
सरकारी प्रतिक्रिया और देशव्यापी विरोध आंदोलन
लखनऊ की इन घटनाओं, विशेषकर कांग्रेस-लीग समझौते और होमरूल लीग के निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार का चिंतित होना पूर्णतः स्वाभाविक था। मद्रास सरकार ने छात्रों के राजनीतिक बैठकों में भाग लेने पर औपचारिक प्रतिबंध लगा दिया, जिसका पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ। तिलक ने इस पर कहा : “सरकार को मालूम है कि देशप्रेम की भावना छात्रों को ज्यादा उत्तेजित करती है। वैसे भी, कोई भी देश युवावर्ग की ताकत से ही उन्नति कर सकता है।”
मद्रास सरकार ने जून 1917 ई. में जब एनी बेसेंट और उनके दो प्रमुख थियोसोफिस्ट सहयोगियों- जॉर्ज अरुंडेल तथा बी.पी. वाडिया को नजरबंद कर दिया, तो इसके विरोध में पूरे भारत में व्यापक प्रदर्शन हुए। एस. सुब्रह्मण्यम अय्यर ने अपनी ‘नाइटहुड’ की सम्मान-उपाधि सरकार को वापस लौटा दी। मदनमोहन मालवीय, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और स्वयं मुहम्मद अली जिन्ना जैसे तमाम नरमपंथी नेता, जो अब तक होमरूल लीग में सम्मिलित नहीं हुए थे, अब लीग में सम्मिलित हो गए और उन्होंने एनी बेसेंट व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के प्रबल विरोध में अपनी आवाज उठाई। 28 जुलाई 1917 ई. को कांग्रेस की एक बैठक में तिलक ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार इन नज़रबंद नेताओं को तत्काल रिहा नहीं करती है, तो एक शांतिपूर्ण असहयोग आंदोलन चलाया जाएगा। शंकरलाल बैंकर और जमनादास द्वारकादास ने ऐसे लगभग एक हजार लोगों के हस्ताक्षर एकत्रित किए, जो सरकारी आदेशों की खुली अवहेलना करके जुलूस के रूप में एनी बेसेंट से मिलना चाहते थे। इन कार्यकर्ताओं ने स्वराज्य के समर्थन में किसानों और मजदूरों से भी बड़ी संख्या में हस्ताक्षर करवाए। होमरूल आंदोलन की व्यापकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1917-18 ई. तक होमरूल लीगों की कुल सदस्यता पूरे भारत में लगभग 60,000 तक पहुँच गई थी, विशेष रूप से गुजरात, सिंध, संयुक्त प्रांत, बिहार जैसे क्षेत्रों तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों में, जो इससे पहले राष्ट्रवादी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते थे। तत्कालीन भारत सचिव एडविन मॉंटेग्यू ने अपनी निजी डायरी में इस गिरफ्तारी पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए लिखा : “शिव ने अपनी पत्नी (सती) को 52 टुकड़ों में काटा था, भारत सरकार ने जब एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया, तो उसके साथ ठीक ऐसा ही हुआ (उनकी छवि देश के हर भाग में फैल गई)।”
मॉंटेग्यू की घोषणा (20 अगस्त 1917 ई.)
राष्ट्रवादी और सरकार-विरोधी भावनाओं की उठती हुई तीव्र लहर को शांत करने के लिए भयानक दमन का सहारा लेने वाली ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर पारंपरिक ‘गुड़ खिलाकर डंडा मारने’ की कूटनीतिक नीति अपनाई। राष्ट्रवादी जनमत को संतुष्ट करने के उद्देश्य से भारत सचिव एडविन मॉंटेग्यू ने ब्रिटिश संसद में 20 अगस्त 1917 ई. को यह ऐतिहासिक घोषणा की : “ब्रिटिश शासन की नीति है कि भारत के प्रशासन में भारतीय जनता को भागीदार बनाया जाए और स्वशासन के लिए विभिन्न संस्थाओं का क्रमिक विकास किया जाए, जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़ी कोई उत्तरदायी सरकार क्रमशः स्थापित की जा सके।”
यह बयान भारत सचिव मार्ले के उस पूर्व बयान के ठीक विपरीत था, जो उन्होंने 1909 ई. में संसद में संवैधानिक सुधार (मार्ले-मिंटो सुधार) प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि इन सुधारों का उद्देश्य देश में स्वराज्य की स्थापना कतई नहीं है। किंतु मॉंटेग्यू की इस घोषणा का सबसे बड़ा तात्कालिक लाभ यह हुआ कि अब होमरूल या स्वराज्य की माँग को खुले तौर पर देशद्रोही घोषित नहीं किया जा सकता था। इसका यह अर्थ भी बिल्कुल नहीं था कि ब्रिटिश हुकूमत तत्काल स्वराज की माँग मानने ही जा रही थी। मॉंटेग्यू की घोषणा में यह शर्त भी स्पष्ट रूप से जोड़ी गई थी कि स्वशासन की स्थापना तभी होगी, जब उसका उचित समय आएगा, और वह समय आया है अथवा नहीं, इसका अंतिम निर्णय स्वयं ब्रिटिश हुकूमत ही करेगी। इससे यह पूर्णतः स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार निकट भविष्य में वास्तविक सत्ता सौंपने वाली नहीं थी। मॉंटेग्यू की इस घोषणा के आधार पर सितंबर 1917 ई. में एनी बेसेंट को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया। इस समय एनी बेसेंट की राजनीतिक लोकप्रियता इतनी अधिक बढ़ चुकी थी कि दिसंबर 1917 ई. में उन्हें कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया और इस प्रकार वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली प्रथम महिला बनीं, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना है।
होमरूल आंदोलन की समाप्ति
1918 ई. में अनेक कारणों से होमरूल आंदोलन क्रमशः कमजोर पड़ने लगा। एनी बेसेंट की गिरफ्तारी से उत्तेजित होकर जो नरमपंथी नेता इस आंदोलन में सम्मिलित हुए थे, उनकी रिहाई के पश्चात वे धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गए। इसके अतिरिक्त जुलाई 1918 ई. में मॉंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों (मॉंटफोर्ड रिपोर्ट) की औपचारिक घोषणा से अनेक नेताओं को यह प्रतीत होने लगा कि अब आगे किसी व्यापक आंदोलन की आवश्यकता नहीं रह गई है। इन सुधार योजनाओं की घोषणा से राष्ट्रवादी खेमे में एक नई दरार भी उत्पन्न हो गई। कुछ नेता इन सुधारों को ज्यों का त्यों स्वीकार करने के पक्ष में थे, जबकि कुछ अन्य इन्हें पूरी तरह अस्वीकार करना चाहते थे। इन प्रस्तावित सुधारों और शांतिपूर्ण असहयोग आंदोलन के प्रश्न पर स्वयं एनी बेसेंट भी गहरी दुविधा में थीं, कभी वे इन्हें अपर्याप्त और गलत कहतीं, तो कभी अपने ही समर्थकों के दबाव में इन्हें उचित ठहरातीं। तिलक बहुत लंबे समय तक अपने दृढ़ निर्णय पर अडिग रहे, किंतु बेसेंट की इस ढुलमुल नीति और नरमपंथियों के बदलते हुए रुख के कारण वे अकेले अपने बूते पर इन सुधारों का प्रभावी विरोध करने में असमर्थ रहे और अंततः सितंबर 1918 ई. में अपना मानहानि का मुकदमा लड़ने के लिए इंग्लैंड चले गए, जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ के लेखक वैलेंटाइन चिरोल पर मानहानि का मुकदमा दायर कर रखा था (यह मुकदमा तिलक अंततः 1919 ई. में हार गए)। इसी बीच 1917-18 ई. के दौरान महात्मा गांधी चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद के अपने प्रारंभिक सत्याग्रहों के माध्यम से भारतीय राजनीति में पहली बार व्यापक ख्याति प्राप्त कर रहे थे और आगे चलकर वे ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के निर्विवाद नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे।
होमरूल आंदोलन का ऐतिहासिक मूल्यांकन
होमरूल आंदोलन का और विशेष रूप से एनी बेसेंट की लीग का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व इसी बात में निहित है कि इसका विस्तार भारत के बिल्कुल नए क्षेत्रों, नए सामाजिक समूहों और एक प्रकार की राजनीतिक रूप से बिल्कुल नई पीढ़ी तक हुआ। महाराष्ट्र को छोड़कर, दो अन्य पुराने उग्रवादी क्षेत्र- बंगाल और पंजाब इस दौरान अपेक्षाकृत शांत बने रहे, क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ये दोनों ही क्षेत्र विशेष रूप से ब्रिटिश दमन के गंभीर शिकार रहे थे, जहाँ किसी भी प्रकार का खुला जुझारू आंदोलन चलाना अत्यंत कठिन था।
बेसेंट की लीग को मुख्य रूप से समर्थन देने वाले प्रमुख सामाजिक समूह थे- मद्रास प्रांत के तमिल ब्राह्मण, संयुक्त प्रांत के विभिन्न व्यावसायिक समूह, जैसे कायस्थ, कश्मीरी ब्राह्मण एवं कुछ प्रबुद्ध मुस्लिम वर्ग, सिंध प्रांत के हिंदू अल्पसंख्यक तथा गुजरात और बंबई के युवा गुजराती उद्योगपति, व्यापारी एवं वकील। इन सामाजिक समूहों के बीच थियोसोफी की व्यापक लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण यह था कि थियोसोफी में थोड़े-बहुत सामाजिक सुधार के साथ-साथ प्राचीन हिंदू ज्ञान-परंपरा और वैभव के सिद्धांत का एक आकर्षक मेल विद्यमान था। दूसरा कारण यह था कि इन क्षेत्रों में ब्रह्म समाज अथवा आर्य समाज जैसे सुधारवादी संगठनों की उतनी गहरी पैठ नहीं थी। तीसरा और महत्त्वपूर्ण कारण यह भी था कि इन क्षेत्रों में एक प्रकार का राजनीतिक शून्य-सा भी विद्यमान था, क्योंकि बंबई और मद्रास जैसे बड़े शहरों को छोड़ दें, तो इन क्षेत्रों में उग्रवादी अथवा नरमदलीय किसी भी प्रकार की सुस्थापित राजनीतिक परंपरा पहले से मौजूद नहीं थी।
फिर भी, यह स्पष्ट है कि होमरूल लीगें भारत में वास्तविक व्यापक जन-आंदोलनों की राजनीति का पूर्ण आरंभ नहीं कर सकीं। मद्रास, महाराष्ट्र और कर्नाटक में, अछूत वर्गों के थोड़े-बहुत समर्थन के बावजूद इन लीगों पर मुख्यतः ब्राह्मणों का ही प्रभावी वर्चस्व बना रहा और गैर-ब्राह्मणों के एक बड़े वर्ग ने इनका खुला विरोध भी किया। इसके अतिरिक्त, स्वयं एनी बेसेंट ने अपने घनिष्ठ सहयोगियों के साथ आगे चलकर जुझारू राजनीति से लगभग संन्यास ले लिया।
फिर भी, होमरूल आंदोलन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और स्थायी उपलब्धि यह रही कि इसने आगामी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए बिल्कुल नए और जुझारू राजनीतिक कार्यकर्ता तैयार किए, जैसे मद्रास में एस. सत्यमूर्ति, कलकत्ता में जितेंद्रलाल बनर्जी, इलाहाबाद और लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू तथा खलीकुज्जमाँ तथा बंबई और गुजरात में रंगों का आयात करने वाले धनी व्यापारी जमनादास द्वारकादास, प्रभावशाली उद्योगपति उमर सोभानी, शंकरलाल बैंकर और इंदुलाल याज्ञनिक। जब 1919 ई. में महात्मा गांधी ने विवादास्पद रौलट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह की व्यापक अपील की, तो इसमें वे लगभग सभी कार्यकर्ता स्वतःस्फूर्त रूप से सम्मिलित हो गए, जिन्हें होमरूल आंदोलन ने राजनीतिक रूप से पहले ही सुसंगठित और जागरूक बना दिया था। वास्तव में होमरूल आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उदारवादी राजनीति से जन-आंदोलन आधारित गांधीवादी राजनीति की ओर संक्रमण की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस प्रकार 1916 ई. का वर्ष भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत निर्णायक पड़ाव सिद्ध हुआ। एक ओर तिलक और एनी बेसेंट की होमरूल लीगों ने स्वशासन की माँग को जन-जन तक पहुँचाकर भारतीय राजनीति में एक नई राजनीतिक चेतना और संगठनात्मक ऊर्जा का संचार किया, तो दूसरी ओर लखनऊ समझौते ने कांग्रेस के आंतरिक विभाजन को समाप्त करते हुए हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक एकता की एक नई संभावना प्रस्तुत की। यद्यपि होमरूल आंदोलन 1918 ई. तक आते-आते मॉंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा और आंतरिक मतभेदों के कारण धीरे-धीरे क्षीण पड़ गया, तथापि इसने जो व्यापक राजनीतिक जनाधार और प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार किए, वे आगे चलकर गांधीजी के नेतृत्व में चलने वाले असहयोग आंदोलन और उसके पश्चात के व्यापक स्वतंत्रता संग्राम की आधारशिला सिद्ध हुए। इसी प्रकार लखनऊ समझौता, यद्यपि दीर्घकालीन रूप से सांप्रदायिक राजनीति की समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सका, फिर भी उसने अल्पकाल के लिए भारतीय राष्ट्रवाद को एक संयुक्त और सशक्त राजनीतिक स्वरूप अवश्य प्रदान किया। इसीलिए 1916 ई. के होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौते को आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में एक साथ, अन्योन्याश्रित रूप से समझना अत्यंत आवश्यक है।


