भारत में पुर्तगालियों का आगमन
भारत में पुर्तगालियों का आगमन विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिसने एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक तथा राजनीतिक संबंधों को नई दिशा प्रदान की। भारत में यूरोपीय शक्तियों के प्रवेश का इतिहास 1498 ई. में पुर्तगालियों के आगमन से प्रारंभ होता है। भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की खोज ने न केवल यूरोप और एशिया के मध्य व्यापारिक संपर्कों का नया युग आरंभ किया, बल्कि भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभुत्व की भी आधारशिला रखी। अपनी सुदृढ़ नौसैनिक शक्ति, संगठित प्रशासन तथा स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाने की नीति के कारण पुर्तगाली शीघ्र ही भारतीय महासागर के व्यापार और राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति बन गए।
वास्को डी गामा का भारत आगमन (1498 ई.)
20 मई 1498 ई. को पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा तीन जहाज़ों के साथ भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मलाबार के कालीकट (कोझिकोड) पहुँचा। उसकी समुद्री यात्रा में एक गुजराती नाविक अब्दुल मजीद ने मार्गदर्शन प्रदान किया था। इस ऐतिहासिक अभियान ने पहली बार यूरोप और भारत के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित किया और भारतीय महासागर के व्यापारिक इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ।
कालीकट के शासक ज़मोरिन (समूथिरि) ने प्रारंभ में पुर्तगालियों का स्वागत किया और उन्हें व्यापार करने की अनुमति दी, क्योंकि वह विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करना चाहता था। किंतु वहाँ पहले से सक्रिय अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों का विरोध किया, क्योंकि लंबे समय से हिंद महासागर के व्यापार पर एकाधिकार था। सीमा शुल्क, व्यापारिक शर्तों तथा मसाला व्यापार पर नियंत्रण को लेकर भी पुर्तगालियों और स्थानीय व्यापारियों के बीच मतभेद उत्पन्न हुए। वास्तव में पुर्तगालियों का उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं था, बल्कि मसाला व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना था।
कालीकट में कुछ समय व्यापार करने के बाद वास्को डी गामा बहुमूल्य मसालों के साथ पुर्तगाल लौट गया। उसके द्वारा लाए गए माल का मूल्य अभियान की लागत से 60 गुना अधिक था। इस सफलता ने भारत के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार की अपार संभावनाओं को सिद्ध कर दिया और अन्य यूरोपीय देशों को भी पूर्व की ओर समुद्री मार्ग खोजने के लिए प्रेरित किया।
प्रारंभिक पुर्तगाली व्यापारिक केंद्र
वास्को डी गामा की सफलता के बाद 1500 ई. में पेड्रो अल्वारेस कैब्राल भारत पहुँचा। उसने कालीकट में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु स्थानीय संघर्षों के कारण उसे वहाँ सफलता नहीं मिली। इसके बाद वह कोचीन चला गया, जहाँ कोचीन के शासक ने उसका स्वागत किया और पुर्तगालियों को एक फैक्ट्री (व्यापारिक गोदाम) स्थापित करने की अनुमति दी। इस प्रकार कोचीन मलाबार तट पर पुर्तगालियों का पहला स्थायी आधार बन गया। इसके पश्चात पुर्तगालियों ने कोचीन, कन्नूर और क्विलोन (कोल्लम) जैसे प्रमुख तटीय नगरों में व्यापारिक केंद्रों और किलों की स्थापना की। अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के नाम पर उन्होंने भारतीय महासागर के व्यापार में सैन्य हस्तक्षेप की नीति अपनाई तथा समुद्री मार्गों पर अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ किया।
पुर्तगाली व्यापारिक प्रभुत्व की स्थापना
1502 ई. में वास्को डी गामा एक शक्तिशाली नौसैनिक बेड़े के साथ दूसरी बार भारत आया। इस बार उसका उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में पुर्तगाली प्रभुत्व स्थापित करना था। उसने कालीकट के ज़मोरिन से अरब व्यापारियों को हटाने की माँग की, किंतु जब ज़मोरिन ने उसकी माँग को स्वीकार नहीं किया तो पुर्तगालियों ने कालीकट पर आक्रमण कर अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही उन्होंने कालीकट, कोचीन और कन्नानूर (कन्नूर) में अपने व्यापारिक केंद्रों को सुदृढ़ किया तथा उनकी किलेबंदी कराई। अरब व्यापारियों के समर्थन से ज़मोरिन ने पुर्तगालियों का विरोध किया, किंतु कोचीन के शासक और पुर्तगाली सेना के संयुक्त प्रयासों के कारण उसे सफलता नहीं मिली। इसके बाद मलाबार तट पर पुर्तगालियों का प्रभाव तेजी से बढ़ा और उन्होंने पश्चिमी तट पर अपने व्यापारिक तथा सामरिक ठिकानों को मजबूत कर लिया।
इस प्रकार पुर्तगालियों के आगमन ने भारतीय महासागर की पारंपरिक मुक्त व्यापार व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। उन्होंने समुद्री शक्ति, किलेबंदी और राजनीतिक हस्तक्षेप के माध्यम से व्यापार को नियंत्रित करने की नीति अपनाई, जिसने आगे चलकर भारत में पुर्तगाली औपनिवेशिक साम्राज्य की नींव रखी।
पुर्तगाली शक्ति का विस्तार
भारत में पुर्तगाली शक्ति के संगठित विस्तार का श्रेय मुख्यतः दो प्रमुख प्रशासकों—फ्रांसिस्को डी अल्मीडा और अल्फांसो डी अल्बुकर्क को दिया जाता है। अल्मीडा ने ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ के माध्यम से हिंद महासागर में पुर्तगाल की नौसैनिक सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास किया, जबकि अल्बुकर्क ने सामरिक बंदरगाहों, किलों और स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था पर बल देकर पुर्तगाली साम्राज्य को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। इन दोनों प्रशासकों की नीतियों ने भारत तथा हिंद महासागर क्षेत्र के व्यापारिक और राजनीतिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया तथा भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभुत्व के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (1505–1509 ई.)
ब्लू वाटर पॉलिसी
1505 ई. में पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने फ्रांसिस्को डी अल्मीडा को भारत का प्रथम पुर्तगाली वायसरॉय नियुक्त किया। उसे तीन वर्षों के लिए भारत भेजा गया तथा दक्षिण-पश्चिमी भारत के तट पर अंजेदीव द्वीप, कन्नूर, कोचीन और क्विलोन (कोल्लम) में किलों की स्थापना एवं पुर्तगाली व्यापारिक हितों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे एक शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ा और पर्याप्त सैन्य बल प्रदान किया गया।
अल्मीडा का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर में पुर्तगाल की समुद्री सर्वोच्चता स्थापित करना था। उसका विश्वास था कि भारत में पुर्तगाली शक्ति का आधार स्थलीय विजय नहीं, बल्कि समुद्र पर नियंत्रण होना चाहिए। इसी विचार के आधार पर उसने ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ (नीले जल की नीति) अपनाई। इस नीति का लक्ष्य हिंद महासागर के समुद्री मार्गों, प्रमुख बंदरगाहों तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पुर्तगाल का प्रभाव स्थापित करना था। अल्मीडा का मत था कि भारत में स्थायी प्रभुत्व तभी संभव है, जब समुद्री मार्गों पर पूर्ण नियंत्रण हो। इसी संदर्भ में उसका प्रसिद्ध कथन है : “जब तक समुद्र पर तुम्हारा प्रभुत्व रहेगा, तब तक भारत पर तुम्हारा अधिकार बना रहेगा; यदि समुद्र पर शक्ति नहीं रही, तो तट के किले भी किसी काम के नहीं रहेंगे।”
इसी नीति के अनुरूप अल्मीडा ने विशाल भू-भागों पर अधिकार करने के बजाय एक सुदृढ़ नौसेना के निर्माण, समुद्री किलों की स्थापना, नौसैनिक अड्डों के विकास तथा व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उसका मानना था कि समुद्री शक्ति के माध्यम से ही भारत तथा पूर्वी देशों के लाभदायक व्यापार, विशेषकर मसाला व्यापार, पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।
ब्लू वाटर पॉलिसी के अंतर्गत पुर्तगालियों ने हिंद महासागर में नियमित नौसैनिक गश्त प्रारंभ की, सामरिक बंदरगाहों को सुदृढ़ किया तथा समुद्री चौकियों का विकास किया। उनका उद्देश्य केवल अपने व्यापार की सुरक्षा करना नहीं था, बल्कि अरब, मिस्री तथा अन्य एशियाई व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा को सीमित कर मसाला व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना भी था।
कार्ताज़ व्यवस्था
ब्लू वाटर पॉलिसी को प्रभावी बनाने के लिए अल्मीडा ने कार्ताज़ नामक समुद्री व्यापार-लाइसेंस प्रणाली लागू की। इसके अनुसार हिंद महासागर में व्यापार करने वाले प्रत्येक व्यापारी जहाज़ के लिए पुर्तगाली अधिकारियों से कार्ताज़ (अनुमति-पत्र) प्राप्त करना अनिवार्य था। इस लिखित अनुमति-पत्र में जहाज़ के कप्तान का नाम, जहाज़ का आकार, चालक दल की संख्या, गंतव्य तथा ले जाए जाने वाले माल का विवरण अंकित रहता था। कार्ताज़ प्राप्त करने के लिए निर्धारित शुल्क देना पड़ता था, जिससे पुर्तगाली शासन को पर्याप्त राजस्व प्राप्त होता था।
इस व्यवस्था के माध्यम से पुर्तगालियों ने समुद्री व्यापार पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया। बिना कार्ताज़ के समुद्र में पाए जाने वाले जहाज़ों को रोक लिया जाता था, उनका माल जब्त कर लिया जाता था और आवश्यक होने पर जहाज़ भी अपने अधिकार में ले लिया जाता था। काली मिर्च, घोड़ों, हथियारों तथा गोला-बारूद जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के व्यापार पर विशेष निगरानी रखी जाती थी तथा अनेक वस्तुओं को शाही एकाधिकार के अंतर्गत रखा गया था। इस प्रकार कार्ताज़ व्यवस्था केवल व्यापारिक लाइसेंस प्रणाली नहीं थी, बल्कि हिंद महासागर में पुर्तगाल के सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व को बनाए रखने का एक प्रभावी साधन थी।
दीव का युद्ध (1509 ई.)
पुर्तगालियों की बढ़ती समुद्री शक्ति से मिस्र के ममलूक सुल्तान, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, कालीकट (कोझिकोड) के ज़मोरिन तथा दक्कन की कुछ मुस्लिम शक्तियों ने पुर्तगालियों का मुकाबला करने के लिए एक संयुक्त नौसैनिक मोर्चा बनाया। 1508 ई. में चौल के निकट हुए संघर्ष में अल्मीडा का पुत्र लॉरेंसो डी अल्मीडा मारा गया। इसके प्रतिशोध तथा पुर्तगाली समुद्री प्रभुत्व को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अल्मीडा ने 1509 ई. में दीव के नौसैनिक युद्ध में संयुक्त बेड़े का सामना किया। इस युद्ध में पुर्तगाली नौसेना ने मिस्र के ममलूक सुल्तान, गुजरात के सुल्तान तथा कालीकट के ज़मोरिन के संयुक्त नौसैनिक बेड़े को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया।
दीव की इस विजय से हिंद महासागर में पुर्तगाल की नौसैनिक श्रेष्ठता स्थापित हो गई। इसके बाद पुर्तगालियों को अरब सागर, फ़ारस की खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में अपने व्यापारिक तथा सामरिक प्रभाव का विस्तार करने का अवसर मिल गया। 1509 ई. में ही फ्रांसिस्को डी अल्मीडा का कार्यकाल समाप्त हो गया।
अल्फांसो डी अल्बुकर्क (1509–1515 ई.)
अल्मीडा के बाद 1509 ई. में अल्फांसो डी अल्बुकर्क भारत का दूसरा पुर्तगाली वायसरॉय बना। उसे भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। जहाँ अल्मीडा ने समुद्री शक्ति और नौसैनिक प्रभुत्व को अपनी नीति का आधार बनाया था, वहीं अल्बुकर्क ने स्थायी औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना के लिए सामरिक बंदरगाहों, जलडमरूमध्यों तथा किलों पर अधिकार करने की नीति अपनाई। उसका मानना था कि केवल नौसैनिक शक्ति के सहारे साम्राज्य लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता है। व्यापारिक और राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों पर किले स्थापित किए जाएँ, स्थायी प्रशासन विकसित किया जाए तथा प्रमुख समुद्री मार्गों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाए।
इसी उद्देश्य से अल्बुकर्क ने हिंद महासागर के प्रमुख व्यापारिक मार्गों और सामरिक जलडमरूमध्यों पर पुर्तगाली प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया। उसके शासनकाल में कार्ताज़ व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया गया, जिससे समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का नियंत्रण और सुदृढ़ हो गया। साथ ही उन्होंने जहाज निर्माण केंद्रों तथा प्रमुख बंदरगाहों पर भी अपना प्रभाव बढ़ाया। फ़ारस की खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में उत्तम जहाज-निर्माण लकड़ी की कमी भी पुर्तगालियों के पक्ष में रही, क्योंकि इससे स्थानीय नौसैनिक शक्तियों की क्षमता अपेक्षाकृत सीमित रही।
गोवा पर अधिकार (1510 ई.)
अल्बुकर्क की सबसे बड़ी उपलब्धि 1510 ई. में बीजापुर के आदिलशाही से गोवा पर अधिकार स्थापित करना थी। प्रारंभिक विजय के बाद उसे कुछ समय के लिए गोवा छोड़ना पड़ा, किंतु उसी वर्ष उसने पुनः आक्रमण कर गोवा पर स्थायी रूप से अधिकार कर लिया। बाद में गोवा भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी तथा प्रशासन, व्यापार और धर्म-प्रचार का प्रमुख केंद्र बन गया।
गोवा का प्राकृतिक बंदरगाह अत्यंत सुरक्षित था तथा उसकी भौगोलिक स्थिति मलाबार तट और अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए अनुकूल थी। यहाँ से पुर्तगाली दक्कन के राज्यों की गतिविधियों पर निगरानी रख सकते थे तथा पश्चिमी तट के समुद्री व्यापार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते थे।
गोवा को आधार बनाकर अल्बुकर्क ने बीजापुर के प्रमुख बंदरगाहों—दांडा-राजापुरी और दाभोल की नाकाबंदी की और उन पर छापामार कार्रवाइयाँ कर बीजापुर के समुद्री व्यापार को गंभीर क्षति पहुँचाई। इससे हिंद महासागर में पुर्तगालियों की सामरिक स्थिति और मजबूत हो गई।
हिंद महासागर में विस्तार
अल्बुकर्क ने हिंद महासागर के महत्त्वपूर्ण सामरिक एवं व्यापारिक केंद्रों पर अधिकार स्थापित करने की नीति अपनाई। उसके शासनकाल में पुर्तगालियों ने श्रीलंका के कोलंबो तथा सुमात्रा के निकट अपने प्रभाव का विस्तार किया। 1511 ई. में उसने मलक्का पर विजय प्राप्त की, जिससे मलक्का जलडमरूमध्य पर पुर्तगाल का नियंत्रण हो गया। यह जलडमरूमध्य भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के मध्य समुद्री व्यापार का सबसे महत्त्वपूर्ण मार्ग था। मलक्का पर अधिकार के परिणामस्वरूप मसाला व्यापार में पुर्तगाल का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
पुर्तगालियों ने लाल सागर के प्रवेश द्वार पर स्थित सोकोत्रा द्वीप पर भी नियंत्रण कर लिया और अदन पर अधिकार करने का प्रयास किया, यद्यपि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। 1515 ई. में अल्बुकर्क ने होर्मुज़ (ओरमूज़) के शासक को संधि के लिए विवश कर वहाँ एक सुदृढ़ किला बनवाया, जिससे फ़ारस की खाड़ी के प्रवेश मार्ग पर पुर्तगालियों का नियंत्रण स्थापित हो गया और अरब सागर तथा फ़ारस की खाड़ी के व्यापारिक मार्ग उनके प्रभाव में आ गए।
गुजरात की ओर विस्तार
अल्बुकर्क की नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य गुजरात के समृद्ध व्यापारिक केंद्रों—दीव और खंभात (कंबे) पर प्रभुत्व स्थापित करना था। 1520–1521 ई. में पुर्तगालियों ने दीव पर अधिकार करने के दो प्रयास किए, किंतु गुजरात के गवर्नर अहमद अयाज़ के प्रभावी प्रतिरोध के कारण वे सफल नहीं हो सके। फिर भी बाद के वर्षों में संधियों और सैन्य अभियानों के माध्यम से पुर्तगालियों ने गुजरात में अपना प्रभाव निरंतर बढ़ाया।
अल्बुकर्क की सामाजिक एवं प्रशासनिक नीतियाँ
अल्बुकर्क केवल विजेता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक भी था। उसने गोवा में प्रशासन को संगठित करने तथा स्थायी उपनिवेश स्थापित करने पर विशेष बल दिया। स्थानीय समाज के साथ स्थायी संबंध विकसित करने के उद्देश्य से उसने पुर्तगाली सैनिकों और अधिकारियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसका विश्वास था कि इससे भारत में एक स्थायी पुर्तगाली समुदाय विकसित होगा और साम्राज्य की जड़ें अधिक सुदृढ़ होंगी। इसी नीति के परिणामस्वरूप आगे चलकर गोवा तथा अन्य पुर्तगाली बस्तियों में विशिष्ट लूसो-भारतीय समाज का विकास हुआ।
अल्बुकर्क ने स्थानीय प्रशासन में भारतीयों को भी सीमित रूप से स्थान दिया तथा प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया। उसने गोवा में सती प्रथा पर रोक लगाने का भी प्रयास किया, यद्यपि उसकी धार्मिक नीति पूर्णतः उदार नहीं थी। उसने ईसाई धर्म के प्रचार को प्रोत्साहित किया और अनेक अवसरों पर स्थानीय मुस्लिम व्यापारियों के प्रति कठोर नीति अपनाई। बाद के वर्षों में पुर्तगाली अधिकारियों द्वारा बलपूर्वक धर्मांतरण तथा धार्मिक असहिष्णुता की घटनाओं ने भारतीय समाज में उनके प्रति व्यापक असंतोष उत्पन्न किया।
निनो दा कुन्हा (1529–1538 ई.)
1515 ई. में अफोंसो डी अल्बुकर्क की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी निनो दा कुन्हा ने 1529 से 1538 ई. तक भारत में पुर्तगाली गवर्नर के रूप में शासन किया। उसके कार्यकाल में पुर्तगाली सत्ता का उल्लेखनीय विस्तार हुआ तथा भारत में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ रूप प्रदान किया गया। उसने पुर्तगाली शासन का मुख्यालय कोचीन से गोवा स्थानांतरित किया। गोवा की सामरिक स्थिति, सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह तथा पश्चिमी तट के प्रमुख व्यापारिक मार्गों के निकट होने के कारण यह शीघ्र ही पुर्तगालियों की स्थायी राजधानी और भारत स्थित उनके प्रशासन का प्रमुख केंद्र बन गया।
निनो दा कुन्हा के शासनकाल में गुजरात, दक्कन तथा बंगाल में पुर्तगाली प्रभाव का विस्तार हुआ। पश्चिमी तट पर गोवा, दीव, दमन तथा बसेइन (वसई) जैसे महत्त्वपूर्ण केंद्रों पर उनका नियंत्रण सुदृढ़ हुआ। पूर्वी तट पर सेंट थोम (मायलापुर) और नागपट्टनम में व्यापारिक केंद्र स्थापित किए गए, जबकि बंगाल में हुगली, चटगाँव तथा अराकान क्षेत्र तक उनकी व्यापारिक गतिविधियाँ फैल गईं। इन केंद्रों के माध्यम से पुर्तगालियों ने भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और जापान के मध्य समुद्री व्यापार का व्यापक नेटवर्क विकसित किया।
गुजरात के साथ संबंध और दीव का प्रश्न
निनो दा कुन्हा के समय गुजरात राज्य पर मुगल सम्राट हुमायूँ के आक्रमण ने पश्चिमी भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया। मुगल आक्रमण से चिंतित गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1534 ई. में पुर्तगालियों से सहायता माँगी। इसके बदले उसने बसेइन (वसई) तथा उससे संबद्ध क्षेत्र पुर्तगालियों को सौंप दिया और दीव में किला बनाने की अनुमति प्रदान की। 1535 ई. में दीव में पुर्तगाली दुर्ग की स्थापना हुई, जिससे अरब सागर के समुद्री मार्गों पर उनकी सामरिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हो गई।
हुमायूँ के गुजरात से लौटने के बाद बहादुर शाह और पुर्तगालियों के संबंध तनावपूर्ण हो गए। बहादुर शाह ने पुर्तगालियों के विरुद्ध सहायता के लिए उस्मानी (ऑटोमन) सुल्तान से संपर्क किया। 1537 ई. में दीव के निकट पुर्तगालियों के साथ वार्ता के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद गुजरात ने दीव को पुनः प्राप्त करने के अनेक प्रयास किया , किंतु सफलता नहीं मिली और दीव पर पुर्तगालियों का नियंत्रण बना रहा।
पुर्तगाली क्षेत्रों का विस्तार
निनो दा कुन्हा के शासनकाल में गुजरात तट पर पुर्तगाली प्रभुत्व और अधिक सुदृढ़ हुआ। 1531 ई. में दमन पर अधिकार स्थापित किया गया, जिसे बाद में गुजरात द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया। 1534 ई. की बसेइन (वसई) संधि के परिणामस्वरूप सल्सेट, बंबई (मुंबई) तथा बसेइन भी पुर्तगालियों के अधिकार में आ गए। 1535 ई. में दीव में किले की स्थापना के साथ पश्चिमी भारत के समुद्री व्यापार तथा अरब सागर के प्रमुख मार्गों पर उनकी पकड़ और मजबूत हो गई।
बंगाल में पुर्तगाली गतिविधियाँ
निनो दा कुन्हा ने बंगाल में भी पुर्तगाली प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। उसने अनेक पुर्तगाली व्यापारियों और बसने वालों को बंगाल भेजा तथा हुगली को वहाँ की प्रमुख पुर्तगाली व्यापारिक बस्ती के रूप में विकसित किया। शीघ्र ही हुगली पूर्वी भारत में पुर्तगाली व्यापार, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा समुद्री संपर्क का प्रमुख केंद्र बन गया।
निनो दा कुन्हा के शासनकाल में प्रशासनिक संगठन, सामरिक बंदरगाहों पर नियंत्रण और व्यापारिक विस्तार ने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की नींव को और सुदृढ़ किया। उसकी समुद्री श्रेष्ठता तथा संगठित व्यापारिक नीति के कारण सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में पुर्तगाल भारत की सबसे प्रभावशाली यूरोपीय शक्ति बन गया।
तुर्क–पुर्तगाली संघर्ष
सोलहवीं शताब्दी में सुल्तान सुलेमान महान के नेतृत्व में उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य की शक्ति पश्चिम एशिया में तीव्र गति से बढ़ी। 1514 ई. में उस्मानी साम्राज्य ने सफ़वी साम्राज्य को चालदिरान के युद्ध में पराजित किया तथा उसके बाद सीरिया, मिस्र और अरब पर अधिकार स्थापित होने से उस्मानियों का प्रभाव हिंद महासागर क्षेत्र तक पहुँच गया। परिणामस्वरूप उन्होंने पुर्तगालियों के बढ़ते समुद्री प्रभुत्व को चुनौती देने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने भी पुर्तगालियों का प्रतिरोध करने के लिए उस्मानी सुल्तान से सहायता माँगी थी, जिसके फलस्वरूप दोनों पक्षों के बीच दूतों और पत्रों का आदान-प्रदान हुआ था।
1529 ई. के बाद उस्मानी साम्राज्य ने सुलेमान रईस के नेतृत्व में एक नौसैनिक बेड़ा गुजरात की सहायता के लिए भेजा। बहादुर शाह ने उसका स्वागत किया तथा तुर्क अधिकारियों को सूरत और दीव के प्रशासन में नियुक्त किया। इनमें प्रसिद्ध तोपची रूमी ख़ाँ भी था। 1531 ई. में पुर्तगालियों ने दमन और दीव पर आक्रमण किया, किंतु रूमी ख़ाँ के प्रतिरोध के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। इसी काल में पुर्तगालियों ने चौल में भी अपना किला स्थापित कर अपनी सामरिक स्थिति को सुदृढ़ किया।
1538 ई. का दीव अभियान
1538 ई. में उस्मानी साम्राज्य ने पुर्तगालियों के विरुद्ध हिंद महासागर का सबसे बड़ा नौसैनिक अभियान चलाया। लगभग 82 वर्षीय काहिरा के गवर्नर सुलेमान पाशा के नेतृत्व में एक विशाल उस्मानी बेड़ा दीव पहुँचा और वहाँ स्थित पुर्तगाली किले की घेराबंदी कर दी। इस बेड़े में अलेक्जेंड्रिया से प्राप्त वेनिसी गैलियों के अनुभवी नाविक भी सम्मिलित थे। लगभग दो महीने तक चली घेराबंदी के दौरान उस्मानियों को अपेक्षित स्थानीय सहयोग नहीं मिला। इसी बीच एक शक्तिशाली पुर्तगाली नौसैनिक बेड़े के पहुँचने का समाचार मिलने पर सुलेमान पाशा ने घेराबंदी समाप्त कर दी और वापस लौट गया। इस प्रकार हिंद महासागर में पुर्तगाली नौसैनिक प्रभुत्व और सुदृढ़ हो गया, जिससे पश्चिमी भारत में उनकी सामरिक स्थिति को स्थायी आधार मिल गया।
दीव की घेराबंदी की असफलता के बाद भी सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक उस्मानी और पुर्तगाली शक्तियों के बीच हिंद महासागर में संघर्ष चलता रहा। इस अवधि में पुर्तगालियों ने गोवा, दीव और दमन पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ कर अरब सागर के प्रमुख समुद्री मार्गों पर प्रभाव बनाए रखा। दूसरी ओर, उस्मानी साम्राज्य समय-समय पर पुर्तगाली प्रभुत्व को चुनौती देने का प्रयास करता रहा। 1554 ई. में अली रईस के नेतृत्व में उस्मानियों ने अंतिम महत्त्वपूर्ण नौसैनिक अभियान चलाया, किंतु यह भी पुर्तगाली समुद्री प्रभुत्व को समाप्त करने में सफल नहीं हो सका। परिणामस्वरूप सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में पुर्तगालियों की नौसैनिक श्रेष्ठता बनी रही।
पुर्तगालियों की सफलता के कारण
भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ
भारत में पुर्तगालियों की सफलता का एक प्रमुख कारण उस समय की राजनीतिक विखंडन की स्थिति थी। गुजरात को छोड़कर, जहाँ महमूद बेगड़ा जैसे शक्तिशाली शासक का प्रभाव था, अधिकांश भारतीय राज्य परस्पर संघर्षों में उलझे हुए थे। दक्षिण में बहमनी सल्तनत का विघटन हो चुका था और उसके स्थान पर बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा, बरार तथा बीदर जैसे स्वतंत्र दक्कनी राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों के बीच निरंतर संघर्ष के कारण वे समुद्री शक्ति के विकास और संगठित नौसेना के निर्माण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके। इस राजनीतिक विभाजन का लाभ उठाकर पुर्तगालियों ने अपने व्यापारिक और सामरिक आधारों को सुदृढ़ किया।
पुर्तगालियों की नौसैनिक श्रेष्ठता
भारतीय महासागर में पुर्तगालियों की सफलता का सबसे बड़ा आधार उनकी संगठित और शक्तिशाली नौसेना थी। भारतीय तथा अरब व्यापारियों के पास बड़े और सक्षम जहाज़ अवश्य थे, किंतु वे किसी केंद्रीय सैन्य संगठन के अधीन नहीं थे। इसके विपरीत, पुर्तगाली राज्य ने आधुनिक तोपों से सुसज्जित एक सुदृढ़ नौसैनिक बेड़े का निर्माण किया। उन्होंने समुद्री मार्गों पर नियमित गश्त, सामरिक बंदरगाहों और किलों की स्थापना तथा कार्ताज़ (समुद्री पास) प्रणाली के माध्यम से समुद्री व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।
नौसैनिक प्रौद्योगिकी और संगठन
तकनीकी दृष्टि से इंडो-अरब जहाज़ तथा चीनी जंक अपनी वहन क्षमता और समुद्री उपयोगिता के लिए प्रसिद्ध थे, किंतु पुर्तगाली कैरावेल और गैलियन युद्ध की दृष्टि से अधिक प्रभावी सिद्ध हुए। उनका ढाँचा अधिक मजबूत था, संचालन क्षमता बेहतर थी तथा वे भारी तोपों का भार वहन करने और गोलाबारी का सामना करने में सक्षम थे। इस तकनीकी श्रेष्ठता ने पुर्तगालियों को समुद्री युद्धों में निर्णायक बढ़त प्रदान की।
भारतीय शक्तियों की व्यावहारिक नीति
अधिकांश भारतीय शासकों ने पुर्तगालियों के साथ दीर्घकालीन नौसैनिक संघर्ष करने के स्थान पर व्यावहारिक नीति अपनाई। इसका प्रमुख कारण यह था कि पुर्तगालियों का प्रारंभिक उद्देश्य विशाल भू-भागों पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार और प्रमुख बंदरगाहों पर नियंत्रण प्राप्त करना था। इसलिए अनेक भारतीय राज्यों ने समय-समय पर संधियाँ कीं, व्यापारिक समझौते किए अथवा सीमित सहयोग का मार्ग अपनाया। इससे पुर्तगालियों को हिंद महासागर में लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखने में सहायता मिली।
मुगलों के साथ संबंधों में तनाव
प्रारंभिक काल में मुगलों और पुर्तगालियों के संबंध सामान्यतः मैत्रीपूर्ण थे, किंतु सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा। इसका प्रमुख कारण हिंद महासागर के व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास तथा अंग्रेजों के भारत आगमन से उत्पन्न नई राजनीतिक एवं व्यापारिक परिस्थितियाँ थीं।
1608 ई. में अंग्रेज कप्तान विलियम हॉकिंस इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर सूरत पहुँचा। पुर्तगालियों ने उसे मुगल दरबार तक पहुँचने से रोकने का प्रयास किया, किंतु वे सफल नहीं हुए। 1609 ई. में सम्राट जहाँगीर ने हॉकिंस का सम्मानपूर्वक स्वागत किया, उसे मनसब प्रदान किया तथा अंग्रेजों को व्यापारिक सुविधाएँ देने की दिशा में कदम उठाए। इससे मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।
1612 ई. में कप्तान थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में अंग्रेजों ने स्वाली (सूरत) के युद्ध में पुर्तगाली नौसैनिक बेड़े को पराजित किया। इस विजय के बाद जहाँगीर का विश्वास अंग्रेजों की समुद्री शक्ति में बढ़ा और मुगल दरबार में उनकी स्थिति अधिक सुदृढ़ हो गई। इसके विपरीत पुर्तगालियों का प्रभाव निरंतर घटता गया। 1613 ई. में पुर्तगालियों द्वारा मुगल जहाज़ों को रोकने, मुस्लिम तीर्थयात्रियों और व्यापारियों को बंदी बनाने तथा समुद्री व्यापार में हस्तक्षेप करने जैसी घटनाओं ने दोनों पक्षों के संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया।
स्थिति शाहजहाँ के शासनकाल में और गंभीर हो गई। बंगाल में पुर्तगालियों ने लगभग 1579 ई. में सतगाँव के निकट अपनी व्यापारिक बस्ती स्थापित की थी, जिसे बाद में हुगली स्थानांतरित कर दिया गया। समय के साथ उन्होंने वहाँ सीमा-शुल्क व्यवस्था विकसित की, स्थानीय व्यापार में हस्तक्षेप बढ़ाया तथा अपने प्रभाव का विस्तार किया। उन पर अवैध दास-व्यापार, समुद्री लूट, स्थानीय लोगों—विशेषकर बच्चों—का अपहरण, बलपूर्वक धर्मांतरण तथा मुगल प्रशासन की अवहेलना जैसे गंभीर आरोप भी लगे। इन गतिविधियों से सम्राट शाहजहाँ अत्यंत असंतुष्ट हुआ।
फलस्वरूप 24 जून 1632 ई. को शाहजहाँ के आदेश पर मुगल सेना ने हुगली की पुर्तगाली बस्ती की घेराबंदी कर दी। लगभग तीन महीने तक चले संघर्ष के बाद मुगलों ने हुगली पर अधिकार कर लिया। इस विजय ने बंगाल में पुर्तगालियों की राजनीतिक और सैन्य शक्ति को निर्णायक रूप से कमजोर कर दिया तथा मुगल साम्राज्य की सर्वोच्चता पुनः स्थापित हुई। इसके बाद मुगल साम्राज्य में पुर्तगालियों का राजनीतिक प्रभाव तीव्र गति से घटता गया और सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।
भारतीय व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार
भारत में पुर्तगालियों के आगमन ने हिंद महासागर के पारंपरिक समुद्री व्यापार की प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। उनके आगमन से पूर्व अरब, भारतीय, फ़ारसी तथा अन्य एशियाई व्यापारी अपेक्षाकृत स्वतंत्र वातावरण में व्यापार करते थे और समुद्री व्यापार किसी एक राज्य अथवा व्यापारी समुदाय के एकाधिकार में नहीं था। 1498 ई. में वास्को डी गामा के भारत आगमन के समय हिंद महासागर का व्यापारिक तंत्र अत्यंत विकसित, खुला और बहुराष्ट्रीय स्वरूप का था। कालीकट, कन्नूर, कोचीन, खंभात तथा अन्य भारतीय बंदरगाहों पर अरब, फ़ारसी, मिस्री, तुर्क, इथियोपियाई, श्रीलंकाई, पेगू (बर्मा), तेनासेरिम, मलय तथा चीन के व्यापारी नियमित रूप से व्यापार करते थे। स्वयं वास्को डी गामा ने उल्लेख किया है कि कालीकट एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र था, जहाँ विभिन्न देशों के व्यापारी बिना किसी विशेष प्रतिबंध के स्वतंत्र रूप से व्यापार करते थे। इस प्रकार हिंद महासागर का व्यापार मुक्त प्रतिस्पर्धा और बहुपक्षीय भागीदारी पर आधारित था।
भारत पहुँचने के बाद पुर्तगालियों ने इस मुक्त व्यापार व्यवस्था को समाप्त कर हिंद महासागर के समुद्री व्यापार, विशेषकर मसालों तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य अरब तथा अन्य एशियाई व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना और समुद्री व्यापार को अपने नियंत्रण में लाना था। इसके लिए उन्होंने भारतीय शासकों पर राजनीतिक एवं सैन्य दबाव डाला, सामरिक स्थानों पर किलों का निर्माण किया, सशस्त्र नौसैनिक गश्त प्रारंभ की तथा आधुनिक युद्धपोतों और शक्तिशाली तोपों से सुसज्जित नौसेना के बल पर प्रमुख समुद्री मार्गों को नियंत्रित करने का प्रयास किया।
इसी नीति के अंतर्गत 1502 ई. में पुर्तगालियों ने कार्ताज़ नामक समुद्री पास प्रणाली लागू की। इसके अनुसार हिंद महासागर में व्यापार करने वाले प्रत्येक जहाज़ के लिए पुर्तगाली अधिकारियों से अनुमति-पत्र प्राप्त करना अनिवार्य था। इस व्यवस्था का उद्देश्य समुद्री व्यापार को नियंत्रित करना, जहाज़ों की आवाजाही पर निगरानी रखना तथा पुर्तगाली बंदरगाहों पर सीमा-शुल्क की वसूली सुनिश्चित करना था। कालीकट के ज़ामोरिन द्वारा इस व्यवस्था को अस्वीकार करने पर वास्को डी गामा ने अरब सागर में पुर्तगाली सैन्य कार्रवाई को और अधिक तीव्र कर दिया। परिणामस्वरूप व्यापारिक जहाज़ों को रोकना, उनकी तलाशी लेना, माल जब्त करना तथा विरोध करने वालों के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग पुर्तगालियों की सामान्य नीति बन गया। इस प्रकार हिंद महासागर में पहली बार संगठित रूप से सशस्त्र व्यापार (Armed Trade) की नीति का विकास हुआ।
व्यापार पर अपने नियंत्रण को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए पुर्तगाली शासन ने मसाले, औषधियाँ, नील तथा अन्य रंग, ताँबा, सोना, चाँदी, हथियार, बारूद और युद्ध-घोड़ों जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं पर शाही एकाधिकार स्थापित कर दिया। इन वस्तुओं का व्यापार बिना सरकारी अनुमति के प्रतिबंधित था। यह प्रतिबंध केवल विदेशी व्यापारियों पर ही नहीं, बल्कि पुर्तगाली निजी व्यापारियों तथा अधिकारियों पर भी समान रूप से लागू होता था। इस व्यवस्था के माध्यम से पुर्तगाली राज्य ने लाभदायक व्यापारिक वस्तुओं तथा उनसे प्राप्त होने वाली आय पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित कर लिया।
काली मिर्च के व्यापार पर नियंत्रण का प्रयास
पुर्तगालियों का प्रमुख उद्देश्य मसालों, विशेषकर काली मिर्च के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था। सोलहवीं शताब्दी में कालीकट (कोझिकोड) से केप कोमोरिन (कन्याकुमारी) तक फैले मलाबार तट पर प्रतिवर्ष लगभग 60,000 क्विंटल काली मिर्च का उत्पादन होता था। किंतु इसका केवल लगभग 15,000 क्विंटल भाग ही पुर्तगाली फैक्ट्रियों तक पहुँच पाता था, जबकि शेष उत्पादन भारतीय तथा अन्य एशियाई व्यापारियों द्वारा विभिन्न बंदरगाहों के माध्यम से निर्यात कर दिया जाता था। इस स्वतंत्र व्यापार को रोकने के लिए पुर्तगालियों ने स्थानीय उत्पादकों पर दबाव डाला कि वे अपनी काली मिर्च केवल उन्हें ही बेचें। 1503 ई. में निर्धारित क्रय मूल्य बढ़ाने से इनकार करने के कारण उत्पादकों और व्यापारियों में असंतोष फैल गया। परिणामस्वरूप अनेक व्यापारी पुर्तगालियों की निगरानी से बचकर अन्य बंदरगाहों के माध्यम से अधिक लाभ पर काली मिर्च का व्यापार करते रहे। इससे स्पष्ट हुआ कि कठोर नियंत्रण के बावजूद पुर्तगाली मसाला व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित करने में सफल नहीं हो सके।
भारतीय शासकों और व्यापारियों की प्रतिक्रिया
यद्यपि पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी भारतीय शासकों और व्यापारियों की गतिविधियाँ समाप्त नहीं हुईं। समुद्री व्यापार की व्यावहारिक आवश्यकताओं के कारण अनेक भारतीय शासकों—जैसे मुगल सम्राट अकबर, अहमदनगर के निज़ामशाही शासक, बीजापुर के आदिलशाही शासक, कोचीन के राजा, कालीकट के ज़ामोरिन तथा कन्नूर के शासकों—ने अपने व्यापारिक जहाज़ों के लिए पुर्तगालियों से कार्ताज़ प्राप्त किए। इससे स्पष्ट होता है कि सोलहवीं शताब्दी में हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का प्रभाव व्यापक था, किंतु उनका नियंत्रण पूर्ण नहीं था।
कन्नूर के शासक ने कार्ताज़ प्राप्त कर अपने जहाज़ों को खंभात और होर्मुज़ भेजना जारी रखा तथा वहाँ से घोड़ों सहित अन्य वस्तुओं का आयात किया। मलाबार के तानूर, चाले (चालीयम) और कालीकट के ज़ामोरिन ने भी समय-समय पर इसी प्रकार की व्यवस्था अपनाई। गुजरात के प्रभावशाली व्यापारी और अधिकारी—जैसे मलिक अयाज़, मलिक गोपी तथा ख़्वाजा सफ़र—भी पुर्तगाली नियंत्रण के बावजूद समुद्री व्यापार में सक्रिय रहे। अनेक व्यापारी कार्ताज़ लेकर व्यापार करते थे, जबकि कुछ अवसरों पर बिना अनुमति-पत्र के भी समुद्री मार्गों का उपयोग करते रहे।
अरब और गुजराती व्यापारियों का प्रतिरोध
अरब तथा गुजराती व्यापारी हिंद महासागर के पारंपरिक व्यापार के अत्यंत अनुभवी और प्रभावशाली संचालक थे। उन्होंने पुर्तगाली प्रतिबंधों और कार्ताज़ व्यवस्था को निष्प्रभावी करने के अनेक उपाय खोज लिए। वे वैकल्पिक समुद्री मार्गों का उपयोग करते रहे तथा स्थानीय शासकों के सहयोग से अपना व्यापार निरंतर जारी रखा। दूसरी ओर, पुर्तगाली प्रशासन के भीतर भी शाही एकाधिकार के प्रति असंतोष बढ़ने लगा। अधिकारियों का वेतन अपेक्षाकृत कम होने के कारण अनेक अधिकारी रिश्वत लेकर निजी व्यापारियों को संरक्षण देते थे। कई पुर्तगाली अधिकारी स्वयं भी राज्य की जानकारी के बिना मसालों, घोड़ों, वस्त्रों तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं के निजी व्यापार में संलग्न रहते थे। इस प्रकार प्रशासनिक भ्रष्टाचार और निजी व्यापार ने पुर्तगाली एकाधिकारवादी नीति को उल्लेखनीय रूप से कमजोर कर दिया।
पुर्तगाली नियंत्रण की सीमाएँ
यद्यपि पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी वे व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित नहीं कर सके। इसका प्रमुख कारण यह था कि हिंद महासागर का व्यापारिक तंत्र अत्यंत व्यापक, सुव्यवस्थित और बहुकेंद्रीय था, जिस पर सदियों से अरब, गुजराती, तमिल, मलय तथा अन्य एशियाई व्यापारी समुदायों का प्रभाव था। स्थानीय शासकों का सहयोग, वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों का अस्तित्व तथा विशाल समुद्री क्षेत्र पर सीमित पुर्तगाली संसाधनों के कारण उनका नियंत्रण व्यावहारिक रूप से सीमित रहा।
उनकी सबसे बड़ी सामरिक विफलता अदन (Aden) पर अधिकार प्राप्त न कर पाना था। अदन पर नियंत्रण के अभाव में वे लाल सागर के प्रवेश-द्वार को अपने अधीन नहीं कर सके, जिसके कारण मिस्र तथा पश्चिम एशिया के साथ होने वाला पारंपरिक व्यापार निरंतर चलता रहा। 1517 ई. में सीरिया, मिस्र और अरब पर उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य का अधिकार स्थापित होने के बाद यह चुनौती और बढ़ गई। उस्मानी नौसेना ने लाल सागर तथा पूर्वी भूमध्यसागर में पुर्तगाली प्रभाव को प्रभावी रूप से सीमित रखा।
इसी प्रकार दक्षिण-पूर्व एशिया में भी पुर्तगालियों को निरंतर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी में सुमात्रा के अचेह राज्य ने सुल्तान अली मुगायत शाह के नेतृत्व में एक शक्तिशाली नौसेना विकसित की और अनेक अवसरों पर पुर्तगाली बेड़ों को चुनौती दी। अचेह के शासकों ने उस्मानी सुल्तानों से सैन्य सहायता तथा कांस्य तोपें प्राप्त कर अपनी शक्ति को और सुदृढ़ किया। परिणामस्वरूप अचेह मसालों के निर्यात का प्रमुख केंद्र बन गया तथा पुर्तगाली नियंत्रित मलक्का का प्रभावी प्रतिद्वंद्वी सिद्ध हुआ। अरब और गुजराती व्यापारी भी मलक्का के स्थान पर अचेह तथा लक्काद्वीप मार्गों का उपयोग करते हुए लाल सागर और पश्चिम एशिया के साथ व्यापार करते रहे। इसी प्रकार समय के साथ मसाला द्वीपों (मोलुक्का) पर भी पुर्तगालियों का नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा।
पुर्तगालियों द्वारा लागू की गई कार्ताज़ प्रणाली भी व्यवहार में पूर्णतः सफल नहीं हो सकी। इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यापारी जहाज़ को पुर्तगाली अनुमति-पत्र के अधीन लाकर समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना था। प्रारंभ में इसका लक्ष्य विशेष रूप से मुस्लिम व्यापारियों को व्यापार से बाहर करना और समुद्री व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था, किंतु विशाल समुद्री क्षेत्र, सीमित प्रशासनिक क्षमता तथा स्थानीय व्यापारिक नेटवर्क की सुदृढ़ता के कारण उन्हें शीघ्र ही अपने नियमों में शिथिलता लानी पड़ी। अंततः अनेक भारतीय, अरब तथा अन्य मुस्लिम व्यापारियों को भी कार्ताज़ प्रदान किए जाने लगे।
व्यापारिक यथार्थ ने भी पुर्तगालियों की धार्मिक और व्यापारिक नीतियों को व्यावहारिक रूप से बदलने के लिए बाध्य किया। घोड़ों का व्यापार मुख्यतः मुस्लिम व्यापारियों के नियंत्रण में था और यह अत्यंत लाभदायक व्यवसाय था। इसके अतिरिक्त वस्त्र, काँच, इत्र, मसाले, कॉफी तथा अन्य विलासिता की वस्तुओं के व्यापार में भी मुस्लिम व्यापारी प्रमुख भूमिका निभाते थे। पुर्तगालियों के पास न तो इतनी पूँजी थी और न ही इतने जहाज़ कि वे संपूर्ण व्यापार स्वयं संचालित कर सकें। परिणामस्वरूप उन्हें उन्हीं व्यापारियों के साथ सहयोग करना पड़ा, जिन्हें प्रारंभ में वे व्यापार से बाहर करना चाहते थे। इस प्रकार आर्थिक हित धार्मिक पूर्वाग्रहों पर अधिक प्रभावी सिद्ध हुए।
पुर्तगालियों की एकाधिकारवादी नीति उनकी प्रशासनिक कमजोरियों से भी प्रभावित हुई। सीमित वित्तीय एवं मानवीय संसाधनों के कारण वे समस्त समुद्री मार्गों और बंदरगाहों की प्रभावी निगरानी नहीं कर सके। स्थानीय व्यापारियों द्वारा वैकल्पिक मार्गों का उपयोग, समुद्री तस्करी, निजी व्यापार तथा पुर्तगाली अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार ने भी उनके नियंत्रण को कमजोर किया। अनेक अधिकारी अल्प वेतन के कारण रिश्वत लेकर निजी व्यापारियों को संरक्षण देते थे और स्वयं भी सरकारी नियमों का उल्लंघन कर निजी व्यापार में संलग्न रहते थे।
इन सीमाओं का एक प्रमुख कारण स्वयं पुर्तगाल की आर्थिक स्थिति भी थी। पुर्तगाल अपेक्षाकृत छोटा यूरोपीय राज्य था, जिसके वित्तीय, मानवीय और प्राकृतिक संसाधन सीमित थे। पूर्वी व्यापार के विस्तार के लिए उसे जर्मन और इतालवी बैंकरों तथा व्यापारियों की पूँजी पर निर्भर रहना पड़ा। एशियाई बाज़ारों में यूरोपीय वस्तुओं की सीमित माँग के कारण व्यापार का भुगतान प्रायः चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं से करना पड़ता था। स्पेन के विपरीत उसके पास अमेरिका जैसी समृद्ध चाँदी की खदानें नहीं थीं, इसलिए विदेशी पूँजी और बहुमूल्य धातुओं पर उसकी निर्भरता बनी रही। यद्यपि सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक निजी पुर्तगाली व्यापारियों ने एशियाई व्यापार में अपनी भागीदारी बढ़ा ली, फिर भी संसाधनों की कमी उनकी शक्ति की मूलभूत सीमा बनी रही।
इसी कारण पुर्तगाली शासन की व्यापारिक व्यवस्था प्रत्यक्ष व्यापार की अपेक्षा पुनर्वितरणात्मक स्वरूप की बन गई। उनका उद्देश्य स्वयं समस्त व्यापार करना नहीं था, बल्कि समुद्री मार्गों, बंदरगाहों और व्यापारिक केंद्रों पर नियंत्रण स्थापित कर कार्ताज़ शुल्क, सीमा-शुल्क तथा अन्य करों के माध्यम से आय प्राप्त करना था। इस प्रकार एस्तादो दा इंडिया मुख्यतः समुद्री नियंत्रण और राजस्व-संग्रह पर आधारित प्रशासनिक एवं व्यापारिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ।
राजनीतिक दृष्टि से भी पुर्तगालियों का प्रभाव सीमित रहा। सीमित जनसंख्या और संसाधनों के कारण वे भारत अथवा एशिया के विशाल भूभागों पर स्थायी शासन स्थापित नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने अपनी शक्ति मुख्यतः तटीय नगरों, द्वीपों और सुदृढ़ किलों तक सीमित रखी, जहाँ समुद्री मार्ग से सैनिक सहायता और रसद आसानी से पहुँचाई जा सकती थी। 1510 ई. में गोवा पर अधिकार प्राप्त करने के बाद उसे भारत स्थित पुर्तगाली साम्राज्य का प्रमुख प्रशासनिक एवं राजनीतिक केंद्र बनाया गया, जहाँ से एस्तादो दा इंडिया का संचालन होता था। इसके अतिरिक्त कोचीन, कन्नूर, कालीकट तथा क्रंगानूर जैसे तटीय राज्यों के साथ संधियाँ कर उन्होंने उन्हें मसाला व्यापार में सहयोगी और मध्यस्थ के रूप में उपयोग किया।
गोवा में पुर्तगाली प्रशासन का संचालन गवर्नर तथा बाद में वायसराय के नेतृत्व में होता था, जिसकी सहायता के लिए एक परिषद कार्य करती थी। इस परिषद में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ चर्च के वरिष्ठ धर्माधिकारी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। सीमित यूरोपीय जनसंख्या के कारण स्थानीय महिलाओं से विवाह को प्रोत्साहित किया गया, जिससे एक विशिष्ट इंडो-पुर्तगाली समाज का विकास हुआ। यद्यपि इससे सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा मिला, फिर भी प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था जातीय आधार पर विभाजित रही। शुद्ध पुर्तगाली मूल के लोगों को उच्च प्रशासनिक एवं राजनीतिक पद प्राप्त होते थे, जबकि मिश्रित वंश के लोगों को अपेक्षाकृत निम्न प्रशासनिक और सामाजिक स्थान दिया जाता था।
इन सभी सीमाओं के बावजूद पुर्तगालियों ने हिंद महासागर की व्यापारिक संरचना को स्थायी रूप से प्रभावित किया। उन्होंने पहली बार समुद्री व्यापार को संगठित नौसैनिक शक्ति, किलों, कार्ताज़ व्यवस्था और राजकीय एकाधिकार से जोड़ दिया। यद्यपि वे पश्चिम एशिया और हिंद महासागर के व्यापार पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर सके, फिर भी सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक बड़ी मात्रा में मसाले लिस्बन पहुँचने लगे, जहाँ से उनका वितरण एंटवर्प, लेवांत तथा अन्य यूरोपीय व्यापारिक केंद्रों के माध्यम से किया जाता था। आगे चलकर डच, अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी कंपनियों ने भी इसी मॉडल को अपनाकर एशिया में अपने व्यापारिक तथा औपनिवेशिक साम्राज्यों का विस्तार किया।
पुर्तगालियों की धार्मिक नीति
भारत में पुर्तगालियों की धार्मिक नीति का मुख्य उद्देश्य कैथोलिक ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना तथा अपने राजनीतिक विस्तार के साथ धार्मिक प्रभाव स्थापित करना था। प्रारंभिक काल में उनकी नीति विशेष रूप से मुसलमानों के प्रति कठोर थी, क्योंकि वे उन्हें हिंद महासागर के व्यापार में अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानते थे। हिंदुओं के प्रति आरंभ में अपेक्षाकृत सहिष्णु नीति अपनाई गई, किंतु समय के साथ यह नीति अधिक कठोर होती गई। 1560 ई. में गोवा इन्क्विज़िशन की स्थापना के बाद धार्मिक असहिष्णुता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। धर्मांतरण को प्रोत्साहित करना, कुछ स्थानीय धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाना तथा ईसाई मत के विरोधियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई करना इस नीति के प्रमुख अंग थे। यद्यपि इन नीतियों का स्वरूप समय, स्थान और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा, फिर भी गोवा पुर्तगाली धार्मिक हस्तक्षेप का प्रमुख केंद्र बन गया।
पुर्तगाली शासन में कैथोलिक चर्च का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। गोवा में चर्च सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जीवन का भी एक महत्त्वपूर्ण संस्थान बन गया। मिशनरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार के साथ-साथ विद्यालयों, गिरजाघरों तथा अन्य धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की। दूसरी ओर, गोवा इन्क्विज़िशन के दौरान विधर्म के आरोपित व्यक्तियों पर मुकदमे चलाए गए तथा ऑटो-दा-फे जैसी दंडात्मक प्रक्रियाओं का प्रयोग किया गया। इन कठोर उपायों के कारण पुर्तगाली शासन की धार्मिक नीति की व्यापक आलोचना हुई।
अकबर के दरबार में जेसुइट मिशन
पुर्तगालियों की धार्मिक नीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष मुगल सम्राट अकबर के साथ उनके संबंध थे। अकबर विभिन्न धर्मों के अध्ययन तथा धार्मिक संवाद में विशेष रुचि रखता था। सितंबर 1579 ई. में उसने गोवा के पुर्तगाली अधिकारियों को पत्र भेजकर विद्वान ईसाई पादरियों को फतेहपुर सीकरी भेजने का अनुरोध किया। इसके फलस्वरूप 1580 ई. में रुडोल्फ़ो अक्वावीवा, एंटोनियो मोंसेर्राते तथा उनके सहयोगी फतेहपुर सीकरी पहुँचे। उन्होंने अकबर के इबादतखाने में आयोजित धार्मिक वाद-विवाद और चर्चाओं में सक्रिय भाग लिया तथा ईसाई धर्म के सिद्धांतों का परिचय कराया। यद्यपि अकबर ने ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया, फिर भी उसने मिशनरियों को सम्मान दिया और धार्मिक संवाद की परंपरा को प्रोत्साहित किया। 1583 ई. में प्रथम जेसुइट मिशन गोवा लौट गया, किंतु इसके बाद भी अकबर तथा बाद में जहाँगीर के शासनकाल में जेसुइट पादरियों और मुगल दरबार के बीच संपर्क एवं धार्मिक संवाद बना रहा।
पुर्तगाली शक्ति का पतन
1498 ई. में वास्को-दा-गामा के कालीकट आगमन के साथ भारत में यूरोपीय समुद्री साम्राज्यवाद का प्रारंभ हुआ। यूरोपीय शक्तियों में सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने भारत में व्यापारिक तथा राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया। उन्होंने हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करते हुए गोवा, दमन, दीव तथा अन्य तटीय क्षेत्रों में अपने व्यापारिक एवं सामरिक केंद्र विकसित किए। 1510 ई. में अफोंसो डी अल्बुकर्क द्वारा गोवा पर अधिकार प्राप्त करने के बाद भारत में पुर्तगाली सत्ता की वास्तविक नींव पड़ी। अल्बुकर्क की दूरदर्शी नीति और सुदृढ़ नौसैनिक संगठन के कारण पुर्तगाली शक्ति अपने उत्कर्ष पर पहुँची तथा मसाला व्यापार पर उनका प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
किंतु सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से पुर्तगाली साम्राज्य का क्रमिक पतन आरंभ हो गया। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक डच और अंग्रेज जैसी नई यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों ने हिंद महासागर में उनकी समुद्री श्रेष्ठता और व्यापारिक एकाधिकार को गंभीर चुनौती दी। परिणामस्वरूप अठारहवीं शताब्दी तक उनका प्रभुत्व घटकर गोवा, दमन, दीव तथा कुछ सीमित तटीय क्षेत्रों तक रह गया। यद्यपि इन क्षेत्रों पर उनका अधिकार बना रहा, परंतु समुद्री व्यापार पर उनका नियंत्रण लगभग समाप्त हो चुका था। अनेक पुर्तगाली निजी व्यापारी स्वतंत्र व्यापार करते रहे, जबकि कुछ समुद्री डकैती और लूटपाट में संलग्न हो गए। बंगाल का हुगली बंदरगाह भी कुछ समय तक पुर्तगाली समुद्री डाकुओं का प्रमुख केंद्र बना रहा।
पुर्तगालियों के पतन के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, धार्मिक तथा सामरिक कारण उत्तरदायी थे। अयोग्य उत्तराधिकारी, भ्रष्ट एवं दोषपूर्ण प्रशासन, धार्मिक असहिष्णुता, सीमित आर्थिक एवं मानव संसाधन, डच और अंग्रेज़ों की तीव्र प्रतिस्पर्धा तथा भारतीय शक्तियों के बढ़ते प्रतिरोध ने उनकी स्थिति को निरंतर कमजोर किया। इन परिस्थितियों ने उनके व्यापारिक एकाधिकार और नौसैनिक प्रभुत्व का अंत कर दिया। इतिहासकार के. एम. पणिक्कर के अनुसार “पुर्तगाली साम्राज्य की स्थापना जितनी तीव्र गति से हुई, उसका पतन भी उतनी ही शीघ्रता से प्रारंभ हो गया, क्योंकि उसका आधार स्थायी प्रशासन की अपेक्षा समुद्री शक्ति और व्यापारिक एकाधिकार पर अधिक निर्भर था।”
भारतीय एवं एशियाई शक्तियों का उदय
पुर्तगालियों की प्रारंभिक सफलता का प्रमुख कारण यह था कि उस समय भारत के पश्चिमी तट तथा हिंद महासागर क्षेत्र में उनके समकक्ष कोई संगठित समुद्री शक्ति नहीं थी। उन्होंने स्थानीय राज्यों के पारस्परिक संघर्षों का लाभ उठाकर अपने व्यापारिक केंद्र और किले स्थापित किए। किंतु 1526 ई. में मुगल साम्राज्य की स्थापना तथा अकबर और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा साम्राज्य के विस्तार ने उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा दिया। दूसरी ओर, फ़ारस के सफ़वीद शासकों, उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य तथा दक्कन की क्षेत्रीय शक्तियों के सुदृढ़ होने से उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती गई। 1622 ई. में फ़ारस ने अंग्रेज़ों के सहयोग से होर्मुज़ पर अधिकार कर लिया, जिससे फारस की खाड़ी में पुर्तगालियों की शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। आगे चलकर मराठा शक्ति के उदय ने भी उन्हें गंभीर क्षति पहुँचाई। 1739 ई. में मराठा सेनापति चिमाजी अप्पा ने वसई (बसेइन) और सालसेट पर अधिकार कर पश्चिमी भारत में पुर्तगालियों को निर्णायक पराजय दी।
अन्य यूरोपीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी (1600 ई.) तथा डच ईस्ट इंडिया कंपनी (1602 ई.) की स्थापना के बाद हिंद महासागर के व्यापार में तीव्र प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुई। डच और अंग्रेज़ों के पास अधिक पूँजी, आधुनिक जहाज़, संगठित व्यापारिक व्यवस्था तथा शक्तिशाली नौसेना थी। डचों ने 1641 ई. में मलक्का पर अधिकार कर लिया तथा श्रीलंका और इंडोनेशिया के अनेक क्षेत्रों से पुर्तगालियों को बाहर कर दिया। दूसरी ओर, अंग्रेज़ों ने भारत में अपने व्यापारिक केंद्रों का विस्तार किया और धीरे-धीरे पुर्तगालियों के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया।
धार्मिक असहिष्णुता और स्थानीय विरोध
धार्मिक कट्टरता भी पुर्तगाली शक्ति के पतन का एक प्रमुख कारण थी। पुर्तगाली शासकों ने ईसाई धर्म के प्रचार को राज्य-नीति का अंग बनाया तथा अनेक स्थानों पर बलपूर्वक धर्मांतरण और स्थानीय धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप किया। 1560 ई. में गोवा में इन्क्विज़िशन (धार्मिक न्यायालय) की स्थापना के बाद धार्मिक मामलों में कठोर दंड दिए जाने लगे। प्रारंभ में मुसलमान व्यापारियों के प्रति अपनाई गई कठोर नीति बाद में हिंदू समाज तक भी पहुँच गई। जेसुइट मिशनरियों की सक्रियता और धार्मिक हस्तक्षेप के कारण हिंदुओं, मुसलमानों तथा अन्य समुदायों में व्यापक असंतोष फैल गया। परिणामस्वरूप भारतीय शासकों और जनता का सहयोग उनसे समाप्त होने लगा।
व्यापारिक एवं प्रशासनिक कमजोरियाँ
पुर्तगाली प्रशासन अनेक आंतरिक कमजोरियों से ग्रस्त था। अधिकारियों को कम वेतन मिलने के कारण रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और निजी व्यापार की प्रवृत्ति बढ़ गई। अनेक अधिकारी शाही हितों की उपेक्षा कर व्यक्तिगत लाभ अर्जित करने लगे। कार्ताज़ प्रणाली के दुरुपयोग, अवैध निजी व्यापार, समुद्री लूट तथा व्यापारिक जहाजों की जब्ती ने उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँचाई। स्थानीय व्यापारियों का विश्वास समाप्त हो गया और पुर्तगालियों की छवि एक विश्वसनीय व्यापारी के बजाय समुद्री डाकुओं जैसी बन गई। सीमित जनसंख्या, वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक क्षमता के कारण वे अपने विस्तृत साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने में भी असफल रहे।
यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों का उदय
1580–1640 ई. के बीच स्पेन और पुर्तगाल के राजवंशीय संघ ने पुर्तगाल को स्पेन के शत्रुओं, विशेषकर डच और अंग्रेज़ों, का लक्ष्य बना दिया। इसी अवधि में डच तथा अंग्रेज़ी व्यापारिक कंपनियाँ अधिक संगठित, पूँजी-संपन्न और शक्तिशाली नौसैनिक बल के साथ उभरीं। उन्होंने मसाला व्यापार तथा हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों पर पुर्तगालियों की स्थिति को चुनौती दी और अंततः उनके अधिकांश व्यापारिक केंद्रों पर अधिकार कर लिया।
समुद्री मार्ग का रहस्य समाप्त होना
भारत के समुद्री मार्ग की खोज प्रारंभ में पुर्तगालियों की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, किंतु यह लाभ स्थायी सिद्ध नहीं हुआ। शीघ्र ही डच, अंग्रेज़ तथा अन्य यूरोपीय देशों ने भी अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से होकर भारत आने वाले समुद्री मार्ग तथा नौवहन तकनीकों में दक्षता प्राप्त कर ली। परिणामस्वरूप हिंद महासागर के व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार समाप्त हो गया और उन्हें तीव्र अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
ब्राज़ील और गोवा का बदलता महत्त्व
1500 ई. में ब्राज़ील की खोज के बाद पुर्तगाल का ध्यान धीरे-धीरे दक्षिण अमेरिका की ओर केंद्रित होने लगा। ब्राज़ील की प्राकृतिक संपदा और आर्थिक संभावनाएँ भारत की अपेक्षा अधिक आकर्षक सिद्ध हुईं, जिसके परिणामस्वरूप भारत तथा अन्य पूर्वी उपनिवेशों में निवेश, सैनिक सहायता और प्रशासनिक सहयोग घटने लगा। इससे भारत में पुर्तगालियों की स्थिति निरंतर कमजोर होती गई। दूसरी ओर, 1565 ई. में विजयनगर साम्राज्य के पतन तथा पश्चिमी तट के व्यापारिक परिवर्तनों के कारण गोवा का आर्थिक और सामरिक महत्त्व भी घटने लगा। यद्यपि गोवा, दमन और दीव लंबे समय तक पुर्तगाली अधिकार में बने रहे, फिर भी वे हिंद महासागर के व्यापारिक प्रभुत्व के प्रमुख केंद्र नहीं रह गए।
सीमित संसाधन और छोटा राष्ट्र
पुर्तगाल यूरोप का एक छोटा देश था, जिसकी जनसंख्या तथा आर्थिक संसाधन सीमित थे। प्रारंभिक सफलताओं के बाद उसके लिए एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में फैले विशाल समुद्री साम्राज्य का संचालन कठिन हो गया। पर्याप्त सैनिकों, अधिकारियों और धन के अभाव में वह अपने उपनिवेशों का प्रभावी प्रशासन बनाए रखने में असफल रहा। साम्राज्य का विस्तार तो हुआ, किंतु उसके संरक्षण के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं थे।
अयोग्य उत्तराधिकारी और कमजोर नेतृत्व
पुर्तगालियों के पतन का एक प्रमुख कारण अफोंसो डी अल्बुकर्क (1509–1515 ई.) के बाद योग्य नेतृत्व का अभाव था। अल्बुकर्क एक दूरदर्शी प्रशासक, कुशल सेनानायक और सफल साम्राज्य-निर्माता था। उसने गोवा को पुर्तगाली सत्ता का प्रमुख केंद्र बनाया, समुद्री किलों का निर्माण कराया तथा व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की। उसके पश्चात नियुक्त अधिकांश वायसरॉय उसकी प्रशासनिक क्षमता और दूरदर्शिता से वंचित थे। वे प्रशासनिक सुधारों की अपेक्षा व्यक्तिगत विलासिता, निजी व्यापार और स्वार्थ में अधिक रुचि रखते थे, जिसके परिणामस्वरूप शासन-व्यवस्था शिथिल होती गई और पुर्तगाली साम्राज्य की नींव कमजोर पड़ने लगी।
स्पेन के साथ राजनीतिक विलय
1580 ई. में पुर्तगाल स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय के अधीन आ गया। इसके बाद उसकी स्वतंत्र विदेश-नीति समाप्त हो गई। स्पेन का मुख्य ध्यान यूरोप और अमेरिका के उपनिवेशों पर केंद्रित रहा, जबकि पूर्वी उपनिवेशों की अपेक्षाकृत उपेक्षा की गई। इस स्थिति का लाभ डच और अंग्रेज़ों ने उठाया तथा उन्होंने हिंद महासागर में पुर्तगालियों के व्यापारिक केंद्रों और समुद्री मार्गों को चुनौती देना प्रारंभ कर दिया।
समुद्री व्यापार पर एकाधिकार का अंत
प्रारंभ में पुर्तगालियों ने ब्लू वाटर नीति और कार्ताज़ व्यवस्था के माध्यम से हिंद महासागर के व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया था, किंतु समय के साथ डच और अंग्रेज़ों ने उनकी समुद्री श्रेष्ठता को चुनौती दी। आधुनिक नौसैनिक तकनीक, अधिक पूँजी तथा संगठित व्यापारिक कंपनियों के बल पर उन्होंने पुर्तगालियों के मसाला व्यापार और समुद्री एकाधिकार को समाप्त कर दिया। परिणामस्वरूप उनके प्रमुख व्यापारिक केंद्र क्रमशः प्रतिस्पर्धी यूरोपीय शक्तियों के हाथों निकलते गए।
भारत में पुर्तगाली शासन का अंत
अठारहवीं शताब्दी तक भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव मुख्यतः गोवा, दमन और दीव तक सीमित रह गया था। 1954 ई. में दादरा और नगर हवेली पुर्तगाली नियंत्रण से मुक्त हो गए। इसके बाद भारत सरकार ने 18 दिसंबर 1961 को ऑपरेशन विजय प्रारंभ किया। भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कार्रवाई के परिणामस्वरूप 19 दिसंबर 1961 तक गोवा, दमन और दीव भारतीय संघ में सम्मिलित हो गए। इसके साथ ही भारत में लगभग 463 वर्षों से चला आ रहा पुर्तगाली शासन समाप्त हो गया।
पुर्तगालियों का योगदान
भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग का महत्त्व
1498 ई. में वास्को डी गामा द्वारा भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की खोज विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इससे भारत पहली बार यूरोप के साथ नियमित समुद्री संपर्क में आया और वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों का अभिन्न अंग बन गया। इस मार्ग ने भारतीय मसालों, वस्त्रों, नील तथा अन्य उत्पादों के निर्यात को नई दिशा दी तथा भारत में बाज़ारोन्मुख आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला। अनेक इतिहासकारों के अनुसार पुर्तगालियों के आगमन ने भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक युग का सूत्रपात किया तथा समुद्री शक्ति के बढ़ते महत्त्व को स्थापित किया। यद्यपि चोल शासकों ने पूर्वकाल में प्रभावशाली नौसैनिक शक्ति का प्रदर्शन किया था, फिर भी समुद्री मार्ग से भारत पहुँचकर स्थायी राजनीतिक और व्यापारिक आधार स्थापित करने वाली पुर्तगाल पहली यूरोपीय शक्ति थी।
व्यापारिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
पुर्तगालियों ने भारत के व्यापारिक संबंधों का विस्तार जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका तथा ब्राज़ील सहित अटलांटिक विश्व तक किया। उन्होंने गोवा और उसके आसपास के क्षेत्रों में क्रुज़ाडो जैसे सिक्कों का प्रचलन किया, जिनका सीमित स्तर पर क्षेत्रीय व्यापार में उपयोग हुआ। यद्यपि उनका राजनीतिक साम्राज्य अपेक्षाकृत छोटा था, फिर भी समुद्री व्यापार, वैश्विक संपर्क, प्रशासनिक संगठन, मुद्रा-व्यवस्था तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
प्रौद्योगिकी का परिचय
पुर्तगालियों ने भारत में केवल समुद्री व्यापार का विस्तार ही नहीं किया, बल्कि अनेक नई प्रौद्योगिकियों और सैन्य तकनीकों का भी परिचय कराया। वे उन्नत नौवहन कला, समुद्री मानचित्रण तथा जहाज़ निर्माण में यूरोप की अग्रणी शक्ति थे। कोचीन और गोवा जैसे बंदरगाहों में उनके मार्गदर्शन में पश्चिमी शैली के जहाज़ निर्माण का विकास हुआ। पुर्तगाली कैरेक और कैरावेल जैसे बहु-डेक वाले जहाज़ मजबूत ढाँचे, अधिक माल-वहन क्षमता तथा भारी तोपों से सुसज्जित होते थे, जिससे उन्हें समुद्री युद्धों में स्पष्ट बढ़त मिलती थी। सोलहवीं शताब्दी में उन्होंने मलाबार तट पर शरीर-कवच, मैचलॉक बंदूकें, आधुनिक तोपें तथा संगठित नौसैनिक युद्ध-पद्धति का प्रभावी उपयोग किया। अनेक इतिहासकारों का मत है कि उनकी आग्नेयास्त्र एवं तोप निर्माण संबंधी तकनीकों ने भारतीय शासकों, विशेषकर मुगलों और दक्कनी राज्यों की सैन्य व्यवस्था को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। गोवा में 1556 ई. में मुद्रण कला (प्रिंटिंग प्रेस) का आरंभ हुआ, जिसे एशिया का पहला मुद्रणालय माना जाता है। इसके अतिरिक्त यांत्रिक घड़ियों, उन्नत सर्वेक्षण तकनीकों तथा कुछ क्षेत्रों में सड़क और सिंचाई संबंधी कार्यों का भी विकास हुआ, यद्यपि इनका प्रभाव मुख्यतः पुर्तगाली नियंत्रण वाले क्षेत्रों तक सीमित रहा।
कृषि में योगदान
पुर्तगालियों ने भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। उन्होंने अमेरिका तथा अपने अन्य उपनिवेशों से अनेक नई फसलें और फल भारत में पहुँचाए, जिनमें मक्का, तंबाकू, लाल मिर्च, काजू, अनानास, पपीता, अमरूद तथा बाद के काल में आलू प्रमुख थे। इनमें तंबाकू और लाल मिर्च शीघ्र ही भारतीय कृषि और व्यापार का महत्त्वपूर्ण भाग बन गए। काजू, जो मूलतः ब्राज़ील का पौधा था, गोवा तथा पश्चिमी तट पर बड़े पैमाने पर लगाया गया। उन्होंने आम तथा विभिन्न खट्टे फलों की उन्नत किस्मों के विकास और नारियल की बेहतर प्रजातियों के प्रसार को भी प्रोत्साहित किया। बागवानी की नई पद्धतियों तथा बड़े बागों की स्थापना से कृषि उत्पादन में विविधता आई और भारतीय किसानों ने इन लाभकारी फसलों को शीघ्र अपनाया, जिससे स्थानीय कृषि और व्यापारिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली।
सांस्कृतिक योगदान
पुर्तगालियों के सांस्कृतिक प्रभाव का सबसे प्रमुख माध्यम ईसाई मिशनरी और चर्च संस्थाएँ थीं। मिशनरियों ने केवल धार्मिक प्रचार ही नहीं किया, बल्कि विद्यालयों, पुस्तकालयों और शिक्षण संस्थानों की भी स्थापना की। उन्होंने चित्रकला, मूर्तिकला, लकड़ी की नक्काशी, धातु-शिल्प तथा चर्च वास्तुकला जैसी यूरोपीय कलाओं को भारत में प्रोत्साहित किया। गोवा विशेष रूप से यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रमुख केंद्र बन गया, जहाँ अनेक भव्य गिरजाघरों और धार्मिक भवनों का निर्माण हुआ। संगीत के क्षेत्र में भी पुर्तगालियों ने पश्चिमी वाद्ययंत्रों, बहुस्वर गायन तथा चर्च संगीत की परंपरा का परिचय कराया। इस सांस्कृतिक संपर्क के परिणामस्वरूप भारतीय और यूरोपीय कलात्मक परंपराओं का समन्वय विकसित हुआ, जिसने विशेषकर गोवा और भारत के पश्चिमी तट के सांस्कृतिक जीवन को स्थायी रूप से प्रभावित किया।




