गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन (andhiji’s Harijan Upliftment Movement)

गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन (andhiji’s Harijan Upliftment Movement)
गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन: छुआछूत उन्मूलन, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक महत्त्व गांधीजी और अस्पृश्यता-निवारण की […]

गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन: छुआछूत उन्मूलन, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक महत्त्व

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गांधीजी और अस्पृश्यता-निवारण की पृष्ठभूमि

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महात्मा गांधी का हरिजनोद्धार आंदोलन सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता-निवारण और सामाजिक समरसता से जुड़ा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभियान था। गांधीजी के लिए भारत की स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश शासन से राजनीतिक मुक्ति का प्रश्न नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज के भीतर मौजूद सामाजिक असमानताओं, जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों को समाप्त करना भी उसका अनिवार्य हिस्सा था। उनका मानना था कि जब तक समाज के भीतर मनुष्य-मनुष्य के बीच जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का भेद बना रहेगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता अपने आप में अधूरी रहेगी। इसी कारण उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ छुआछूत-निवारण, हिंदू-मुस्लिम एकता, खादी, ग्रामोद्योग, स्वावलंबन और व्यापक सामाजिक सुधार को भी अपने रचनात्मक कार्यक्रम का केंद्रीय अंग बनाया।

गांधीजी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान का निर्णायक और सबसे संगठित चरण 1932 ईस्वी के सांप्रदायिक निर्णय और उसके बाद हुए पूना समझौते की पृष्ठभूमि में सामने आया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 1932 ईस्वी में विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संबंध में सांप्रदायिक निर्णय घोषित किया, जिसमें उस समय की सरकारी शब्दावली में दलित वर्गों के लिए, अर्थात तथाकथित ‘डिप्रेस्ड क्लासेज़’ के लिए, पृथक निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया गया था। गांधीजी ने इसका तीव्र विरोध किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे हिंदू समाज का राजनीतिक विभाजन स्थायी रूप ले सकता है और दलित समुदाय को शेष हिंदू समाज से सदा के लिए काट दिया जाएगा। इसी विरोध में गांधीजी ने 20 सितंबर 1932 ईस्वी को यरवदा जेल में आमरण अनशन आरंभ किया।

यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि गांधीजी का विरोध दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत से नहीं, बल्कि पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था से था। दूसरी ओर, डॉ. भीमराव आंबेडकर दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आवश्यक मानते थे, क्योंकि उनके विचार में सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव के कारण दलितों के हितों की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति अनिवार्य थी। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि आंबेडकर पहले ही 1932 ईस्वी के रैजा-मुंजे समझौते को अस्वीकार कर चुके थे, क्योंकि वह समझौता केवल संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटों तक सीमित था, जबकि वे पूर्ण पृथक निर्वाचन की माँग पर अड़े हुए थे। यही मूल वैचारिक अंतर आगे चलकर गांधी और आंबेडकर के बीच सामाजिक न्याय की रणनीति को लेकर एक गहरे और स्थायी वैचारिक मतभेद का आधार बना।

सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा

16 अगस्त 1932 ईस्वी को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की। यह निर्णय तीन गोलमेज सम्मेलनों (1930–1932 ई.) के दौरान विभिन्न भारतीय समुदायों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सर्वसम्मति न बन पाने के बाद सामने आया था। गांधी हेरिटेज पोर्टल की कालक्रम-सूची में इसकी तिथि 17 अगस्त 1932 ईस्वी दर्ज है, जबकि व्यापक रूप से प्रचलित ऐतिहासिक साहित्य और अधिकांश अकादमिक स्रोतों में 16 अगस्त 1932 ईस्वी की तिथि मिलती है।

सांप्रदायिक निर्णय के अंतर्गत मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन तथा यूरोपीय समुदायों को पहले से प्राप्त पृथक निर्वाचन की व्यवस्था के साथ-साथ दलित वर्गों के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल का नया प्रावधान जोड़ा गया था। इस व्यवस्था के अनुसार दलित मतदाता दोहरे मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे- एक सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में और दूसरा दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र में। गांधीजी ने इसे हिंदू समाज के राजनीतिक विभाजन की दिशा में एक अत्यंत गंभीर और खतरनाक कदम माना। उनका तर्क था कि दलितों को हिंदू समाज से अलग राजनीतिक निर्वाचन व्यवस्था देने से सामाजिक दूरी और अधिक बढ़ सकती है तथा अस्पृश्यता की समस्या का स्थायी और सौहार्दपूर्ण समाधान कठिन हो सकता है।

यरवदा जेल में आमरण अनशन

गांधीजी उस समय यरवदा केंद्रीय जेल, पुणे में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण बंद थे। उन्होंने सांप्रदायिक निर्णय में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल के प्रावधान के विरोध में 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन आरंभ किया। इस अनशन ने पूरे देश में अत्यंत तीव्र राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया उत्पन्न की। हिंदू नेताओं, दलित नेताओं तथा अन्य राजनीतिक व्यक्तियों पर शीघ्र समझौते का रास्ता खोजने का भारी दबाव बढ़ गया, क्योंकि यह आशंका थी कि गांधीजी के प्राणों को खतरा उत्पन्न हो सकता है और इससे देशभर में सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ सकता है।

गांधीजी के अनशन का उद्देश्य दलितों के राजनीतिक अधिकारों को समाप्त करना कदापि नहीं था। वे पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के भीतर दलितों के लिए बढ़े हुए आरक्षित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था चाहते थे। दूसरी ओर, डॉ. आंबेडकर आरंभ में दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए पृथक निर्वाचन के दृढ़ पक्षधर थे और उन्होंने गांधीजी के अनशन को शुरू में केवल एक राजनीतिक दबाव-रणनीति के रूप में भी देखा था। किंतु बढ़ते जनदबाव और गांधीजी के जीवन को उत्पन्न खतरे को देखते हुए अंततः वे बातचीत की मेज पर आने के लिए सहमत हुए।

पूना समझौता, 24 सितंबर 1932 ईस्वी

गांधीजी के अनशन के बीच गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित विभिन्न हिंदू नेताओं के बीच गहन बातचीत हुई। इन वार्ताओं में मदनमोहन मालवीय ने हिंदू पक्ष की ओर से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः 24 सितंबर 1932 ईस्वी को यरवदा केंद्रीय जेल में पूना समझौता संपन्न हुआ, जिस पर हिंदू और दलित पक्षों के कुल 23 प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। समझौते के अंतर्गत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन को स्वीकार किया गया, लेकिन इसके बदले प्रांतीय विधानमंडलों में उनके लिए आरक्षित सीटों की संख्या काफी बढ़ा दी गई।

सांप्रदायिक निर्णय में दलित वर्गों के लिए प्रांतीय विधानमंडलों में कुल 71 सीटों का प्रावधान था, जबकि पूना समझौते में यह संख्या बढ़ाकर 148 सीट कर दी गई। समझौते में मद्रास के लिए 30, बॉम्बे और सिंध के लिए 25, पंजाब के लिए 8, बिहार और उड़ीसा के लिए 18, मध्य प्रांत के लिए 20, असम के लिए 7, बंगाल के लिए 30 और संयुक्त प्रांत के लिए 20 सीटें निर्धारित की गई थीं। इसके अतिरिक्त पूना समझौते में केंद्रीय विधानसभा में भी दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया तथा शिक्षा के लिए सरकारी अनुदान में दलित समुदाय की उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की बात भी शामिल की गई।

इस प्रकार पूना समझौते ने पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार किया, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण-व्यवस्था की मूल भावना का आधार भी बना। समझौते के बाद गांधीजी ने 26 सितंबर 1932 ईस्वी को अपना 6 दिवसीय अनशन समाप्त किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार अनशन समाप्त करते समय गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर भी वहाँ उपस्थित थे और उन्होंने इस अवसर पर गांधीजी को फल का रस पिलाकर अनशन तुड़वाया।

यह स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है कि पूना समझौता गांधी और आंबेडकर के बीच पूर्ण वैचारिक सहमति का प्रमाण नहीं था, बल्कि यह परिस्थितिजन्य दबाव में हुआ एक व्यावहारिक राजनीतिक समझौता था। दोनों की सामाजिक न्याय संबंधी दृष्टियों में मूलभूत अंतर बना रहा। गांधीजी अस्पृश्यता को हिंदू समाज की नैतिक और धार्मिक बुराई मानकर उसके विरुद्ध जनमत-निर्माण और हृदय-परिवर्तन का अभियान चलाना चाहते थे, जबकि आंबेडकर सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन और दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक तथा कानूनी अधिकारों पर अधिक बल देते थे। आंबेडकर ने बाद के वर्षों में इस समझौते को गांधीजी के अनशन के कारण उत्पन्न दबाव में लिया गया निर्णय भी बताया, जिसे उन्होंने एक प्रकार का नैतिक दबाव माना।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गांधीजी का आगमन (Gandhiji's Arrival in the Indian National Movement)
गांधीजी

हरिजनोद्धार आंदोलन का संगठित रूप

पूना समझौते के बाद गांधीजी ने अस्पृश्यता-निवारण को अपने रचनात्मक कार्यक्रम का सबसे प्रमुख विषय बना लिया। गांधीजी के लिए यह केवल राजनीतिक समझौते का परिणाम नहीं था, बल्कि हिंदू समाज के भीतर एक व्यापक और दीर्घकालिक सामाजिक सुधार अभियान था। उन्होंने समाज के तथाकथित उच्च वर्गों से आत्मालोचन और प्रायश्चित का आह्वान किया तथा दलित समुदायों को सामाजिक सम्मान और समान अधिकार दिलाने के लिए देशव्यापी जनजागरण अभियान आरंभ किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार 30 सितंबर 1932 ईस्वी को अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी लीग की स्थापना हुई। यही संगठन आगे चलकर हरिजन सेवक संघ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

हरिजन सेवक संघ की स्थापना और भूमिका

हरिजन सेवक संघ की स्थापना अस्पृश्यता के विरुद्ध गांधीजी के अभियान को एक स्थायी संस्थागत आधार देने की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके गठन की पृष्ठभूमि में जाति-हिंदू नेताओं की बैठक और अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए संगठित सामूहिक प्रयास शामिल थे। प्रारंभ में इसका नाम अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी लीग था। बाद में इसका नाम बदलकर हरिजन सेवक संघ किया गया।

इसके प्रमुख नेताओं में प्रसिद्ध उद्योगपति और गांधीजी के निकट सहयोगी घनश्यामदास बिड़ला तथा प्रख्यात समाजसेवी अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर, जिन्हें आदरपूर्वक ठक्कर बापा कहा जाता था, प्रमुख थे। घनश्यामदास बिड़ला संघ के प्रथम अध्यक्ष बने, जबकि ठक्कर बापा ने संगठन के महासचिव के रूप में जमीनी स्तर पर कार्य का संचालन किया। संघ का उद्देश्य केवल अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रचार करना नहीं था, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुधार, सार्वजनिक सुविधाओं के समान उपयोग और मंदिर-प्रवेश जैसे संवेदनशील प्रश्नों पर भी ठोस कार्य करना था।

हरिजन सेवक संघ ने देश के विभिन्न भागों में अपनी प्रांतीय और स्थानीय शाखाओं तथा समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से दलित समुदायों के बीच शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने का सतत प्रयास किया। इस संगठन ने विद्यालय, छात्रावास, स्वास्थ्य केंद्र तथा वाचनालय जैसी संस्थाएँ भी स्थापित कीं और गांधीजी के विचारों को गाँव-गाँव तथा कस्बे-कस्बे तक पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘हरिजन’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन

गांधीजी ने अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन के लिए पत्रकारिता को भी एक अत्यंत प्रभावशाली माध्यम बनाया। 11 फरवरी 1933 ईस्वी को अंग्रेजी साप्ताहिक ‘हरिजन’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार इसी क्रम में हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ का प्रकाशन 23 फरवरी 1933 ईस्वी से और गुजराती में ‘हरिजनबंधु’ का प्रकाशन 12 मार्च 1933 ईस्वी से शुरू हुआ। ये तीनों पत्र मिलकर गांधीजी के विचारों को भारत के भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी क्षेत्रों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बने।

इन पत्रों के माध्यम से गांधीजी ने अस्पृश्यता, सामाजिक समानता, धार्मिक सुधार, शिक्षा, ग्राम सुधार तथा अपने रचनात्मक कार्यक्रमों पर अपने विचार जनता तक पहुँचाए। उन्होंने पत्रकारिता को केवल राजनीतिक प्रचार का साधन न मानकर सामाजिक चेतना निर्माण और नैतिक जागरण का सशक्त माध्यम बनाया। उल्लेखनीय है कि इससे पहले गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में ‘इंडियन ओपिनियन’ तथा भारत में ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ जैसे पत्रों के माध्यम से भी अपने विचार प्रसारित कर चुके थे, और ‘हरिजन’ पत्र उसी पत्रकारिता-परंपरा की अगली कड़ी था, जो विशेष रूप से अस्पृश्यता-निवारण को समर्पित थी।

गांधीजी ने दलित समुदायों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ उन्होंने ‘ईश्वर की संतान’ बताया। उस समय गांधीजी का उद्देश्य इस शब्द के माध्यम से सामाजिक सम्मान और मानवीय गरिमा की भावना को प्रोत्साहित करना था। आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में दलित समुदायों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग सामान्यतः स्वीकार्य नहीं माना जाता, और कई दलित चिंतकों ने इसे संरक्षणवादी तथा अपमानजनक भी बताया है; इसलिए ऐतिहासिक संदर्भ में इसका प्रयोग करते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह गांधीजी द्वारा उस समय प्रयुक्त तत्कालीन शब्दावली थी, न कि वर्तमान में अनुशंसित संबोधन।

हरिजन यात्रा, 1933–34 ईस्वी : देशव्यापी जनजागरण

हरिजनोद्धार आंदोलन का सबसे व्यापक और प्रभावशाली चरण गांधीजी की देशव्यापी हरिजन यात्रा थी। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार 7 नवंबर 1933 ईस्वी को हरिजन यात्रा आरंभ हुई, जो लगभग दस महीनों तक चलती रही और इस दौरान गांधीजी ने भारत के अधिकांश प्रांतों की यात्रा की।

इस यात्रा का उद्देश्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक जनमत तैयार करना, हरिजन सेवक संघ के कार्यों के लिए धन जुटाना, मंदिर-प्रवेश के प्रश्न को सार्वजनिक विमर्श का केंद्र बनाना और समाज के प्रभावशाली वर्गों को दलित समुदायों के प्रति अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करना था।

गांधीजी ने इस यात्रा के दौरान देश के अनेक नगरों, कस्बों और गाँवों में सार्वजनिक सभाएँ कीं और लोगों से अपील की कि वे सार्वजनिक कुओं, तालाबों, सड़कों, विद्यालयों, धर्मशालाओं और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग में जातिगत भेदभाव पूर्णतः समाप्त करें। उन्होंने मंदिर-प्रवेश को भी सामाजिक समानता के सबसे सशक्त और प्रतीकात्मक प्रश्नों में से एक माना और स्थान-स्थान पर मंदिर प्रबंधकों तथा पुजारियों से दलितों के लिए मंदिरों के द्वार खोलने का आग्रह किया।

1934 ईस्वी में बिहार और उड़ीसा सहित देश के अनेक क्षेत्रों में गांधीजी की यात्रा हुई। इसी वर्ष 15 जनवरी 1934 ईस्वी को बिहार में आए विनाशकारी भूकंप को गांधीजी ने अस्पृश्यता के पाप के लिए दैवीय दंड के रूप में व्याख्यायित किया, जिसकी रवींद्रनाथ ठाकुर सहित कुछ समकालीन बुद्धिजीवियों ने आलोचना भी की। 25 अप्रैल 1934 ईस्वी को बिहार में लालनाथ के नेतृत्व में सनातनी समूहों द्वारा गांधीजी के विरुद्ध हिंसक हमला किया गया, जिसमें गांधीजी पर लाठी और पत्थर बरसाए गए। इसके बाद 9 मई 1934 ईस्वी को उन्होंने उड़ीसा का पैदल दौरा भी किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल इस पूरी यात्रा को अस्पृश्यता-निवारण के व्यापक अभियान से जोड़ता है और इसे गांधीजी के जीवन की सबसे लंबी तथा सबसे कठिन यात्राओं में गिनता है।

गांधीजी के उपवास और अस्पृश्यता-निवारण

गांधीजी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अभियान में उपवास को आत्मशुद्धि और नैतिक दबाव के साधन के रूप में भी बार-बार अपनाया। 8 मई 1933 से 28 मई 1933 ईस्वी तक गांधीजी ने 21 दिन का उपवास किया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार यह उपवास मुख्यतः आत्मशुद्धि के उद्देश्य से था और इसी अवधि में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जेल से रिहा भी किया गया।

इसके बाद भी गांधीजी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अभियान को निरंतर जारी रखा। उनके उपवासों का उद्देश्य केवल राजनीतिक दबाव बनाना नहीं था, बल्कि वे इन्हें आत्मशुद्धि, नैतिक आत्मानुशासन और समाज की सोई हुई अंतरात्मा को जगाने का प्रभावी साधन मानते थे। उनके अनुसार उपवास किसी अन्य व्यक्ति या समूह पर बलपूर्वक दबाव डालने का हथियार नहीं, बल्कि स्वयं को शुद्ध करने और समाज को आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करने का आध्यात्मिक मार्ग था।

इस प्रकार गांधीजी की अस्पृश्यता-विरोधी राजनीति में सत्याग्रह, आत्मशुद्धि, जनजागरण और सामाजिक सुधार परस्पर गहराई से जुड़े हुए तत्व थे, जो एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करते थे।

दलित समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति

गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन का ठोस आधार उस समय भारतीय समाज में व्यापक रूप से प्रचलित सामाजिक भेदभाव था। अनेक दलित समुदायों को मंदिरों में प्रवेश से पूर्णतः वंचित रखा जाता था और कई स्थानों पर उन्हें सार्वजनिक कुओं, तालाबों, विद्यालयों, धर्मशालाओं तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के समान उपयोग का अधिकार भी प्राप्त नहीं था।

ग्रामीण भारत में सामाजिक पृथक्करण के कारण अनेक दलित बस्तियाँ गाँव के मुख्य आवासीय हिस्से से भौगोलिक रूप से अलग स्थित होती थीं, जिन्हें प्रायः ‘चेरी’, ‘टोला’ या इसी प्रकार के अन्य स्थानीय नामों से जाना जाता था। आर्थिक दृष्टि से भी बड़ी संख्या में दलित परिवार भूमिहीन कृषि मजदूर, परंपरागत सेवा-व्यवसाय से जुड़े श्रमिक अथवा अत्यंत निम्न आय वाले समूहों में शामिल थे, जिनके पास शिक्षा और आर्थिक अवसरों की भारी कमी थी।

गांधीजी ने इस स्थिति को केवल आर्थिक गरीबी की समस्या नहीं माना। उनके अनुसार यह मूलतः मानवीय गरिमा और सामाजिक नैतिकता का प्रश्न था। इसलिए वे अस्पृश्यता को हिंदू समाज की एक गंभीर नैतिक बुराई कहते थे और सवर्ण हिंदुओं से इसके उन्मूलन की संपूर्ण जिम्मेदारी स्वीकार करने का बार-बार आह्वान करते थे।

मंदिर-प्रवेश आंदोलन और सामाजिक सुधार

हरिजनोद्धार आंदोलन में मंदिर-प्रवेश का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण और भावनात्मक रूप से संवेदनशील था। गांधीजी के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को केवल जन्म या जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो यह सामाजिक समानता और धार्मिक अधिकार, दोनों का ही स्पष्ट उल्लंघन है।

मंदिर-प्रवेश के प्रश्न की पृष्ठभूमि गांधीजी के 1930 के दशक के व्यापक अभियान से भी पहले की थी। केरल में वैकोम सत्याग्रह (1924–25 ई.) ने सार्वजनिक मार्गों और मंदिरों से संबंधित जातिगत प्रतिबंधों के विरुद्ध एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण जनआंदोलन खड़ा किया था, जिसमें गांधीजी ने भी सक्रिय रुचि ली थी और स्थल पर जाकर स्थानीय नेताओं से संवाद किया था। इसके अतिरिक्त गुरुवायूर जैसे स्थानों पर भी मंदिर-प्रवेश का प्रश्न सामाजिक सुधार आंदोलन के केंद्र में बना रहा, जहाँ के. केलप्पन के नेतृत्व में 1931–32 ईस्वी के दौरान गुरुवायूर सत्याग्रह चलाया गया था।

त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा (1936 ई.)

मंदिर-प्रवेश आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा थी। 12 नवंबर 1936 ईस्वी को त्रावणकोर के महाराजा चितिर तिरुनाल बलराम वर्मा के नाम से उद्घोषणा जारी की गई, जिसके द्वारा राज्य द्वारा नियंत्रित हिंदू मंदिरों में जन्म या जाति के आधार पर प्रवेश-प्रतिबंध समाप्त किया गया।

यह घटना भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में एक मील का पत्थर थी। यद्यपि इसे केवल गांधीजी के अभियान का प्रत्यक्ष परिणाम मानना ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः उचित नहीं होगा, क्योंकि त्रावणकोर में श्री नारायण गुरु और अन्य सामाजिक सुधारकों के दशकों लंबे प्रयासों तथा स्थानीय सामाजिक आंदोलनों की भी इसमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। गांधीजी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान ने इस व्यापक सामाजिक वातावरण को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सशक्त तथा प्रभावी बनाया।

इस प्रकार 1936 ईस्वी की त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा को गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन, केरल के स्वतंत्र सामाजिक सुधार आंदोलनों और स्थानीय सुधारवादी शक्तियों के व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में समझना कहीं अधिक उचित और संतुलित दृष्टिकोण है।

हिंदू शास्त्रों और मानवीय गरिमा के संबंध में गांधीजी के विचार

गांधीजी अपने अस्पृश्यता-विरोधी अभियान को केवल सामाजिक या राजनीतिक तर्कों पर आधारित नहीं रखते थे। वे हिंदू समाज के भीतर सुधार के लिए धार्मिक और नैतिक तर्कों का भी प्रभावी ढंग से प्रयोग करते थे।

उनका दृढ़ मत था कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अनिवार्य या मूल अंग नहीं है, बल्कि यह कालांतर में समाज में घुस आई एक विकृति है। वे उन धार्मिक व्याख्याओं को स्वीकार नहीं करते थे जिनके आधार पर किसी मनुष्य को केवल जन्म के कारण अपवित्र या सामाजिक रूप से निम्न समझा जाए।

गांधीजी का तर्क था कि यदि किसी धार्मिक ग्रंथ की ऐसी व्याख्या मानव गरिमा के विरुद्ध जाती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, चाहे वह व्याख्या कितनी भी पुरानी या प्रचलित क्यों न हो। उनके लिए सत्य, अहिंसा और मानव गरिमा किसी भी रूढ़ धार्मिक व्याख्या से सदैव ऊपर थे।

यह दृष्टिकोण गांधीजी की धार्मिक सुधारवादी सोच का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष था। वे हिंदू समाज के भीतर रहकर ही उसके नैतिक पुनर्गठन की सतत कोशिश कर रहे थे। वे हिंदू धर्म को छोड़ने के बजाय उसके भीतर से ही अस्पृश्यता का विरोध करना चाहते थे, ताकि सुधार स्वाभाविक और स्थायी हो सके।

अस्पृश्यता पर गांधीजी की आत्मालोचनात्मक दृष्टि

गांधीजी ने अस्पृश्यता की समस्या के लिए स्वयं को या सवर्ण हिंदू समाज को कभी अलग नहीं माना। वे बार-बार इस बात पर बल देते थे कि अस्पृश्यता का अपराध केवल दलितों के साथ किया गया अन्याय नहीं है, बल्कि यह उन सभी हिंदुओं की भी नैतिक जिम्मेदारी है जिन्होंने इस अमानवीय व्यवस्था को मौन स्वीकृति दी या इसे कभी चुनौती नहीं दी।

इसलिए गांधीजी अस्पृश्यता-विरोधी आंदोलन को प्रायश्चित और आत्मशुद्धि का आंदोलन भी मानते थे। उनका मानना था कि सवर्ण हिंदुओं को अपने सामाजिक व्यवहार की गंभीर समीक्षा करनी चाहिए और दलितों के प्रति सदियों से किए गए ऐतिहासिक अन्याय के लिए हार्दिक प्रायश्चित करना चाहिए।

इसी कारण गांधीजी आंबेडकर और अन्य दलित नेताओं की आलोचनाओं को केवल व्यक्तिगत विरोध के रूप में कभी नहीं देखते थे। वे यह सहजता से स्वीकार करते थे कि दलित समाज को उच्च जातीय समाज पर अविश्वास करने का पर्याप्त ऐतिहासिक कारण मौजूद है और यह अविश्वास एक दिन में उत्पन्न नहीं हुआ है।

गांधी और आंबेडकर: अस्पृश्यता-निवारण तथा जाति-प्रथा के प्रश्न पर मतभेद

हरिजनोद्धार आंदोलन को गहराई से समझने के लिए गांधीजी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के मूलभूत अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है। गांधीजी का प्रमुख लक्ष्य अस्पृश्यता का उन्मूलन था। वे चाहते थे कि हिंदू समाज अपने भीतर स्वेच्छा से सुधार करे और दलितों को समान सामाजिक सम्मान प्रदान करे। वे अंतर्जातीय विवाह और अंतर्जातीय सहभोज को अस्पृश्यता-निवारण की अनिवार्य पूर्व-शर्त नहीं मानते थे, यद्यपि व्यक्तिगत रूप से वे अंतर्जातीय विवाहों में सम्मिलित भी होते रहे।

इसके विपरीत, डॉ. आंबेडकर का दृढ़ विचार था कि अस्पृश्यता जाति-व्यवस्था की व्यापक संरचना से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। यदि जाति-आधारित ऊँच-नीच और सामाजिक विभाजन कायम रहेगा, तो अस्पृश्यता को पूरी तरह समाप्त करना अत्यंत कठिन होगा। इसलिए वे जाति-प्रथा के संपूर्ण विनाश, कानूनी अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन पर अधिक बल देते थे। आंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में इस दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत किया, जिसे मूल रूप से 1936 ईस्वी में लाहौर के जात-पात-तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन में भाषण के रूप में प्रस्तुत किया जाना था, किंतु आयोजकों से मतभेद के कारण यह भाषण कभी दिया नहीं जा सका और आंबेडकर ने इसे स्वयं प्रकाशित कराया।

इस प्रकार दोनों के बीच के अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता है : गांधीजी का जोर हृदय-परिवर्तन, नैतिक सुधार और सामाजिक समरसता पर था, जबकि आंबेडकर का जोर कानूनी अधिकार, राजनीतिक शक्ति और सामाजिक संरचना के मूलभूत परिवर्तन पर था। गांधीजी अस्पृश्यता को हिंदू समाज की नैतिक बुराई मानते थे, जबकि आंबेडकर अस्पृश्यता को जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ी एक संरचनात्मक समस्या मानते थे।

यह मतभेद भारतीय सामाजिक चिंतन के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे केवल गांधी बनाम आंबेडकर के व्यक्तिगत संघर्ष के रूप में देखना उचित नहीं है; यह वास्तव में सामाजिक सुधार की दो भिन्न-भिन्न रणनीतियों के बीच का गहरा वैचारिक अंतर था, जो आज भी भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में प्रासंगिक बना हुआ है।

वर्णाश्रम व्यवस्था पर गांधीजी के विचार

गांधीजी के वर्णाश्रम संबंधी विचार समय के साथ धीरे-धीरे विकसित हुए और इस विषय पर उनके विचारों में एक निश्चित जटिलता भी दिखाई देती है। हरिजन आंदोलन के प्रारंभिक चरण में वे वर्णाश्रम की कुछ अवधारणाओं को सामाजिक श्रम-विभाजन के एक रूप में देखते थे और उसका आंशिक बचाव करने की कोशिश भी करते थे, जबकि छुआछूत को वे बिना किसी अपवाद के स्पष्ट रूप से पाप और अमानवीय प्रथा मानते थे।

गांधीजी का मानना था कि किसी व्यक्ति को केवल जन्म के आधार पर सामाजिक रूप से उच्च या निम्न समझना नैतिक दृष्टि से पूर्णतः गलत है। वे समाज के विभिन्न कार्यों को परस्पर पूरक मानने की बात करते थे, लेकिन अस्पृश्यता और सामाजिक अपमान को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं करते थे। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में गांधीजी के विचारों में और अधिक परिवर्तन आया और वे जन्माधारित जाति-व्यवस्था के प्रति भी उत्तरोत्तर अधिक आलोचनात्मक होते गए।

आंबेडकर की दृष्टि इससे मूलतः भिन्न थी। वे जाति और वर्ण-आधारित समूची सामाजिक संरचना को ही असमानता की जड़ मूल समस्या मानते थे। इसलिए गांधी और आंबेडकर के बीच जाति तथा वर्ण के प्रश्न पर मतभेद अंत तक बना रहा।

गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन का विरोध

गांधीजी के अस्पृश्यता-विरोधी अभियान को समाज के सभी वर्गों से समर्थन नहीं मिला। रूढ़िवादी और सनातनी समूहों के एक बड़े हिस्से ने इसका अत्यंत तीव्र विरोध किया। कई स्थानों पर गांधीजी को काले झंडे दिखाए गए, उनकी सभाओं में हंगामा और विरोध किया गया, उनके विरुद्ध पर्चे बाँटे गए तथा कुछ स्थानों पर उन पर प्रत्यक्ष हिंसक हमले भी किए गए।

1934 ईस्वी में यह विरोध कई स्थानों पर हिंसक रूप में सामने आया। गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार 25 अप्रैल 1934 ईस्वी को बिहार में लालनाथ के नेतृत्व में सनातनी समूहों द्वारा गांधीजी के विरुद्ध लाठी और पत्थरों से हमला किया गया। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि अस्पृश्यता-विरोधी सुधार उस समय केवल एक वैचारिक बहस भर नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर मौजूद गहरे सामाजिक और धार्मिक तनावों से जुड़ा हुआ अत्यंत संवेदनशील प्रश्न था।

25 जून 1934 ईस्वी: पुणे में गांधीजी पर बम हमला

हरिजनोद्धार आंदोलन के विरोध की सबसे गंभीर और चौंकाने वाली घटनाओं में से एक 25 जून 1934 ईस्वी को पुणे में गांधीजी के काफिले पर हुआ बम हमला था।

गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार पुणे नगरपालिका द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में गांधीजी को सम्मानित किया जाना था। गांधीजी जिस मोटरकार में यात्रा कर रहे थे, उससे कुछ ही आगे चल रहे एक दूसरे वाहन के निकट बम फेंका गया, जिसे गांधीजी की कार समझने की भूल की गई थी। गांधीजी स्वयं सुरक्षित बच गए, जबकि इस घटना में कुछ अन्य लोग घायल हुए और पुलिसकर्मी भी प्रभावित हुए।

यह घटना इस बात का पुख्ता प्रमाण थी कि सामाजिक सुधार के प्रश्न पर गांधीजी को कट्टरपंथी शक्तियों के अत्यंत तीव्र और हिंसक विरोध का सामना करना पड़ रहा था। इसके बावजूद उन्होंने अपने अभियान को कभी हिंसा के माध्यम से नहीं, बल्कि सदैव अहिंसा, खुले संवाद और नैतिक अपील के माध्यम से ही आगे बढ़ाया।

गांधीजी की अहिंसा-आधारित और सहमतिपरक रणनीति

गांधीजी का अस्पृश्यता-विरोधी अभियान उनकी व्यापक अहिंसात्मक राजनीति और नैतिक सुधार की मूल रणनीति पर आधारित था। वे उन लोगों को भी, जो उनके आंदोलन का प्रबल विरोध कर रहे थे, अपना शत्रु मानकर उनके विरुद्ध हिंसा या दमन का सहारा लेने के कभी पक्ष में नहीं थे।

गांधीजी का दृढ़ विश्वास था कि सामाजिक बुराइयों का स्थायी और टिकाऊ समाधान केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता में गहरे परिवर्तन से ही संभव है। इसलिए वे रूढ़िवादी हिंदुओं से भी निरंतर संवाद करते थे और उन्हें तर्क तथा नैतिक अपील के माध्यम से समझाने का प्रयास करते थे, बजाय इसके कि उन्हें दुश्मन घोषित कर दिया जाए।

यह रणनीति उनकी संपूर्ण सामाजिक सुधार संबंधी सोच का मूल तत्व थी। वे चाहते थे कि अस्पृश्यता को समाप्त करने की इच्छा समाज के भीतर से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो और लोग इसे किसी बाहरी दबाव के कारण नहीं, बल्कि इसे नैतिक रूप से पूर्णतः गलत समझकर स्वेच्छा से त्यागें।

हरिजनोद्धार आंदोलन: राजनीतिक आंदोलन से आगे सामाजिक-धार्मिक सुधार

गांधीजी स्वयं हरिजनोद्धार आंदोलन को केवल एक राजनीतिक आंदोलन कभी नहीं मानते थे। उनके लिए यह हिंदू समाज के नैतिक पुनर्गठन और सामूहिक आत्मशुद्धि का एक दीर्घकालिक अभियान था।

1930 के दशक के आरंभ में सविनय अवज्ञा आंदोलन और व्यापक राजनीतिक संघर्ष के उतार-चढ़ाव के बीच गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व देना आरंभ किया। 18 मई 1934 ईस्वी को उन्होंने सामूहिक सविनय अवज्ञा वापस लेने की घोषणा की और उसी वर्ष अक्टूबर 1934 ईस्वी में कांग्रेस की सक्रिय सदस्यता से अलग होने का निर्णय भी लिया, ताकि वे रचनात्मक कार्यों, विशेषकर अस्पृश्यता-निवारण, के लिए अधिक स्वतंत्रतापूर्वक समय दे सकें। गांधी हेरिटेज पोर्टल इस अवधि को उनके रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक ध्यान केंद्रित करने के महत्त्वपूर्ण चरण के रूप में दर्ज करता है।

इस संदर्भ में हरिजन आंदोलन कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ताओं के लिए भी रचनात्मक कार्य का प्रमुख माध्यम बना। गांधीजी चाहते थे कि राजनीतिक आंदोलन के अतिरिक्त कार्यकर्ता ग्रामीण समाज, शिक्षा, स्वच्छता, खादी, ग्रामोद्योग, सामाजिक समानता और अस्पृश्यता-निवारण जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय रूप से कार्य करें, ताकि स्वराज्य केवल राजनीतिक सत्ता-हस्तांतरण तक सीमित न रहकर एक व्यापक सामाजिक रूपांतरण का पर्याय बन सके।

हरिजन आंदोलन और गांधीजी का रचनात्मक कार्यक्रम

हरिजनोद्धार आंदोलन गांधीजी के व्यापक रचनात्मक कार्यक्रम का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा था। इस कार्यक्रम में अस्पृश्यता-निवारण, खादी और स्वदेशी, ग्रामोद्योग, ग्राम सुधार, बुनियादी शिक्षा (नई तालीम), हिंदू-मुस्लिम एकता, स्त्री-सशक्तीकरण, तथा स्वच्छता और सामाजिक सेवा जैसे अनेक विषयों को समुचित महत्त्व दिया गया।

गांधीजी का दृढ़ मत था कि स्वतंत्रता केवल सत्ता-परिवर्तन का पर्याय नहीं है। यदि ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाए, किंतु भारतीय समाज के भीतर जातिगत अपमान, अस्पृश्यता, गरीबी और सामाजिक असमानता ज्यों की त्यों बनी रहे, तो प्राप्त की गई राजनीतिक स्वतंत्रता अत्यंत अधूरी और खोखली सिद्ध होगी। इसलिए हरिजन आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को सामाजिक सुधार के गहरे प्रश्न से जोड़ने में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और दूरगामी भूमिका निभाई।

हरिजनोद्धार आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व

गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण और दूरगामी परिणाम यह था कि अस्पृश्यता का प्रश्न भारतीय राष्ट्रीय सार्वजनिक विमर्श का केंद्रीय विषय बन गया। इससे पहले भी महात्मा ज्योतिराव फुले, श्री नारायण गुरु, श्रीनारायण धर्म परिपालन आंदोलन, रामलिंग स्वामी, अय्यंकाली, ई.वी. रामासामी पेरियार, डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा अनेक अन्य समर्पित सामाजिक सुधारकों ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया था। गांधीजी के अत्यंत व्यापक जनाधार ने इस प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन के विशाल मंच तक पहुँचा दिया, जिससे यह विषय केवल क्षेत्रीय आंदोलन न रहकर एक अखिल भारतीय सरोकार बन गया।

इस आंदोलन ने समाज के अनेक हिस्सों में मंदिर-प्रवेश, सार्वजनिक सुविधाओं के समान उपयोग, शिक्षा और सामाजिक सम्मान के प्रश्न पर बहस को काफी तेज किया। हरिजन सेवक संघ तथा गांधीजी की विभिन्न यात्राओं ने इन ज्वलंत मुद्दों को स्थानीय और राष्ट्रीय, दोनों ही स्तरों पर प्रभावी ढंग से उठाया।

किंतु गांधीजी के आंदोलन को अस्पृश्यता के आंशिक उन्मूलन का एकमात्र कारण मानना ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः उचित नहीं है। दलित नेताओं, स्वतंत्र सामाजिक सुधारकों, क्षेत्रीय आंदोलनों और स्वयं दलित समुदायों के दशकों लंबे संघर्ष ने भी इस परिवर्तन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई।

गांधीजी के आंदोलन और स्वतंत्र भारत में अस्पृश्यता-निषेध

स्वतंत्र भारत के संविधान ने अस्पृश्यता को स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से अस्वीकार किया। 26 जनवरी 1950 ईस्वी को लागू हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अंतर्गत अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन किया गया और इसके किसी भी रूप में व्यवहार को कानूनन दंडनीय अपराध घोषित किया गया।

इसके बाद अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 बनाया गया, जिसका नाम 1976 ईस्वी में संशोधन करके नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया। आगे चलकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे और अधिक कठोर कानून भी बनाए गए, जो दलित समुदायों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों की रोकथाम के लिए विशेष रूप से लाए गए थे।

इस प्रकार गांधीजी और अन्य सामाजिक सुधार आंदोलनों द्वारा अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्मित किए गए नैतिक और सामाजिक वातावरण ने स्वतंत्र भारत में कानूनी और संवैधानिक परिवर्तन के लिए एक महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार की। फिर भी संवैधानिक समानता की स्थापना को केवल गांधीजी के आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम मानना उचित नहीं होगा; इसके पीछे डॉ. आंबेडकर और संविधान सभा की केंद्रीय भूमिका, स्वतंत्र दलित आंदोलनों तथा दशकों लंबे सामाजिक संघर्षों का भी निर्णायक और अपरिहार्य योगदान था। यह उल्लेखनीय है कि डॉ. आंबेडकर स्वयं संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने अनुच्छेद 17 जैसे प्रावधानों को संवैधानिक रूप देने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

हरिजनोद्धार आंदोलन की सीमाएँ और आलोचनाएँ

हरिजनोद्धार आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व स्वीकार करते हुए भी इसकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से समझना समान रूप से आवश्यक है। डॉ. आंबेडकर और अनेक दलित चिंतकों ने गांधीजी की पद्धति की गंभीर आलोचना की। उनका मानना था कि केवल सवर्ण हिंदुओं के हृदय-परिवर्तन से सदियों पुरानी जातिगत शोषण की संरचना समाप्त नहीं होगी। उनके अनुसार सामाजिक समानता के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, आर्थिक अवसर, कानूनी सुरक्षा और स्वयं जाति-व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक है, न कि केवल नैतिक अपील।

गांधीजी का दृष्टिकोण मुख्यतः सामाजिक और नैतिक सुधार पर केंद्रित था, जबकि आंबेडकर सामाजिक न्याय को अधिकारों और संस्थागत शक्ति के प्रश्न के रूप में देखते थे। इसीलिए गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन को समझते समय दो बातों को साथ-साथ देखना अत्यंत आवश्यक है—पहली, इसने अस्पृश्यता को राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में पहुँचाया और इस विषय पर देशव्यापी संवाद को संभव बनाया; दूसरी, इसकी सुधारवादी सीमा के कारण दलित मुक्ति की गहरी संरचनात्मक समस्याएँ पूर्णतः समाप्त नहीं हो सकीं और इसीलिए स्वतंत्रता के बाद भी संवैधानिक तथा कानूनी उपायों की आवश्यकता बनी रही।

वास्तव में गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सामाजिक पक्ष का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य अध्याय था। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक समानता भी उतनी ही आवश्यक है। गांधीजी ने अस्पृश्यता को हिंदू समाज की एक गंभीर नैतिक बुराई माना और इसके विरुद्ध व्यापक जनजागरण, उपवास, देशव्यापी यात्राओं, सक्रिय पत्रकारिता, संगठन-निर्माण तथा निरंतर सामाजिक सुधार का सहारा लिया।

इस आंदोलन का महत्त्व केवल गांधीजी की व्यक्तिगत भूमिका तक ही सीमित नहीं था। यह भारत में सामाजिक सुधार की उस दीर्घ परंपरा का ही एक हिस्सा था, जिसमें फुले, नारायण गुरु, आंबेडकर और अनेक क्षेत्रीय सामाजिक सुधारकों तथा स्वतंत्र दलित आंदोलनों ने जातिगत असमानता को निरंतर चुनौती दी। गांधीजी ने इस प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक जनाधार से सफलतापूर्वक जोड़ा, जबकि आंबेडकर ने इसे अधिकार, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संरचना के मूलभूत परिवर्तन से जोड़ा।

इस प्रकार गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन भारतीय इतिहास में अस्पृश्यता-विरोध, सामाजिक समरसता, नैतिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन के सामाजिक आयाम को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसकी उपलब्धियों के साथ-साथ इसकी सीमाओं और गांधी–आंबेडकर के गहरे वैचारिक मतभेदों को समान गंभीरता से समझना ही इस आंदोलन का संतुलित, समग्र और ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।

गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन क्या था?

गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध चलाया गया एक व्यापक सामाजिक-सुधार अभियान था। इसका उद्देश्य दलित समुदायों को सामाजिक सम्मान, समान अधिकार और सार्वजनिक जीवन में बराबरी दिलाना तथा हिंदू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता की प्रथा को समाप्त करना था।  

सांप्रदायिक निर्णय, 1932 क्या था?

सांप्रदायिक निर्णय ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा 16 अगस्त 1932 ईस्वी गांधीजी का हरिजनोद्धार आंदोलन को घोषित एक संवैधानिक व्यवस्था थी, जिसमें विभिन्न समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए भिन्न-भिन्न निर्वाचन व्यवस्थाएँ निर्धारित की गई थीं। इसमें तथाकथित डिप्रेस्ड क्लासेज़’ के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल का प्रावधान किया गया था। गांधीजी ने इस व्यवस्था का विरोध किया और 20 सितंबर 1932 ईस्वी को यरवदा जेल में आमरण अनशन आरंभ किया।

गांधीजी ने सांप्रदायिक निर्णय का विरोध क्यों किया?

गांधीजी का विरोध दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से नहीं, बल्कि पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था से था। उनका मानना था कि इससे हिंदू समाज का राजनीतिक विभाजन स्थायी हो सकता है। वे दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के भीतर पर्याप्त आरक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पक्षधर थे।

पूना समझौता, 1932 क्या था?

24 सितंबर 1932 ईस्वी को गांधीजी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और अन्य नेताओं के बीच यरवदा जेल में पूना समझौता हुआ, जिस पर कुल 23 प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन स्वीकार किया गया तथा प्रांतीय विधानमंडलों में आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई।

पूना समझौते का गांधीजी और आंबेडकर के संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ा?

पूना समझौते ने तत्काल राजनीतिक संकट को समाप्त किया, लेकिन गांधीजी और आंबेडकर के बीच सामाजिक सुधार की रणनीति को लेकर वैचारिक मतभेद पूर्णतः समाप्त नहीं हुए। गांधीजी नैतिक सुधार और सामाजिक हृदय-परिवर्तन पर बल देते थे, जबकि आंबेडकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानूनी अधिकार और सामाजिक संरचना के मूलभूत परिवर्तन को आवश्यक मानते थे।

हरिजन सेवक संघ की स्थापना कब हुई?

30 सितंबर 1932 ईस्वी को अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी लीग की स्थापना हुई, जो आगे चलकर हरिजन सेवक संघ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसका उद्देश्य अस्पृश्यता का उन्मूलन और दलित समुदायों के सामाजिक उत्थान के लिए संगठित रूप से कार्य करना था।

 ‘हरिजन’ पत्र का प्रकाशन कब शुरू हुआ?

गांधीजी के अंग्रेजी साप्ताहिक ‘हरिजन’ का प्रकाशन 11 फरवरी 1933 ईस्वी से शुरू हुआ। इसके बाद हिंदी में ‘हरिजन सेवक’ (23 फरवरी 1933 ई.) और गुजराती में ‘हरिजनबंधु’ (12 मार्च 1933 ई.) प्रकाशित हुए। इन पत्रों के माध्यम से गांधीजी ने अस्पृश्यता-निवारण और सामाजिक सुधार संबंधी विचारों को जनता तक पहुँचाया।

गांधीजी की हरिजन यात्रा कब शुरू हुई?

गांधीजी की देशव्यापी हरिजन यात्रा 7 नवंबर 1933 ईस्वी को आरंभ हुई और लगभग दस महीनों तक चली। इस यात्रा के माध्यम से उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में जाकर अस्पृश्यता के विरुद्ध जनजागरण किया और मंदिर-प्रवेश, सार्वजनिक सुविधाओं में समान अधिकार तथा सामाजिक सम्मान के प्रश्नों को उठाया।

गांधीजी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध उपवास क्यों किए?

गांधीजी उपवास को आत्मशुद्धि, नैतिक अनुशासन और समाज की अंतरात्मा को जगाने का माध्यम मानते थे। 8 से 28 मई 1933 ईस्वी तक उनका 21 दिन का उपवास विशेष रूप से आत्मशुद्धि से संबंधित था और अस्पृश्यता-विरोधी अभियान के व्यापक संदर्भ में देखा जाता है।

गांधीजी और डॉ. आंबेडकर के विचारों में अस्पृश्यता को लेकर मुख्य अंतर क्या था?

गांधीजी अस्पृश्यता को हिंदू समाज की गंभीर नैतिक बुराई मानते थे और सामाजिक सुधार, हृदय-परिवर्तन तथा नैतिक जागरण के माध्यम से इसे समाप्त करना चाहते थे। आंबेडकर का विचार था कि अस्पृश्यता जाति-व्यवस्था की व्यापक संरचना से जुड़ी है और इसे समाप्त करने के लिए जातिगत व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन, कानूनी अधिकार और राजनीतिक शक्ति आवश्यक हैं।

त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा का क्या महत्त्व था?

12 नवंबर 1936 ईस्वी को त्रावणकोर में मंदिर प्रवेश उद्घोषणा जारी की गई, जिसके द्वारा राज्य के नियंत्रित हिंदू मंदिरों में जाति के आधार पर प्रवेश-प्रतिबंध समाप्त किया गया। यह दक्षिण भारत के सामाजिक सुधार और मंदिर-प्रवेश आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी।

25 जून 1934 ईस्वी की पुणे घटना क्या थी?

25 जून 1934 ईस्वी को पुणे में गांधीजी के काफिले पर बम फेंका गया। गांधीजी इस हमले में सुरक्षित रहे, जबकि कुछ अन्य लोग घायल हुए। यह घटना अस्पृश्यता-विरोधी अभियान के विरुद्ध कट्टरपंथी विरोध की गंभीरता का सूचक है।

हरिजनोद्धार आंदोलन का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है?

हरिजनोद्धार आंदोलन ने अस्पृश्यता को राष्ट्रीय सार्वजनिक विमर्श का महत्त्वपूर्ण विषय बनाया। इसने सामाजिक समानता, मंदिर-प्रवेश, सार्वजनिक सुविधाओं में समान अधिकार और दलितों की सामाजिक गरिमा के प्रश्नों को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचाया। स्वतंत्र भारत में संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन और बाद के नागरिक अधिकार संबंधी कानून इस व्यापक सामाजिक संघर्ष की महत्त्वपूर्ण संवैधानिक परिणतियों के रूप में देखे जा सकते हैं।

गांधीजी के हरिजनोद्धार आंदोलन की सीमा क्या थी?

इस आंदोलन की प्रमुख आलोचना यह रही कि गांधीजी का दृष्टिकोण मुख्यतः नैतिक और सुधारवादी था, जबकि आंबेडकर और अनेक दलित चिंतक जाति-व्यवस्था की संरचनात्मक समाप्ति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कानूनी अधिकार और सामाजिक-आर्थिक शक्ति के पुनर्वितरण को आवश्यक मानते थे। इसलिए हरिजनोद्धार आंदोलन के ऐतिहासिक महत्त्व के साथ-साथ उसकी सुधारवादी सीमाओं को भी समझना उतना ही आवश्यक है।
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