ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ (Copper-Stone Cattle Cultivator Cultures)

ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ (Copper-Stone Cattle Cultivator Cultures)
ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ: ऐतिहासिक विकास, क्षेत्रीय विस्तार एवं विशेषताएँ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद, […]

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ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ: ऐतिहासिक विकास, क्षेत्रीय विस्तार एवं विशेषताएँ

हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद, लगभग दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में सिंधु क्षेत्र के बाहर भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में अनेक ग्राम्य-संस्कृतियों का उदय हुआ। ये संस्कृतियाँ पशुपालन और कृषि पर आधारित थीं तथा पत्थर के परंपरागत उपकरणों के साथ-साथ ताँबे (कॉपर) के औजारों का भी प्रयोग करती थीं। इसी कारण इन्हें ‘ताम्र-पाषाणिक’ (चाल्कोलिथिक) संस्कृतियाँ कहा जाता है। यह शब्द ग्रीक शब्द ‘खाल्कोस’ (ताँबा) और ‘लिथोस’ (पत्थर) से बना है। ये बस्तियाँ मुख्यतः दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत में केंद्रित थीं। भौगोलिक दृष्टि से अधिकांश ताम्रपाषाणिक बस्तियाँ काली मिट्टी (रेगुर) वाले क्षेत्रों तथा नदी-तटों पर स्थापित हुईं, क्योंकि यह मिट्टी कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ थी। इन संस्कृतियों की पहचान मुख्यतः उनके विशिष्ट मृद्भांडों (पॉटरी) के आधार पर की जाती है, यद्यपि हाल के शोधों ने इनके व्यापारिक संपर्कों, पर्यावरणीय अनुकूलन और सामाजिक संरचना पर भी नई रोशनी डाली है।

कालानुक्रमिक एवं क्षेत्रीय आधार पर प्रमुख ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ

(क) गणेशवर-आहड़-बनास संस्कृति (लगभग 2100–1200 ई.पू.)

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की बनास नदी घाटी में आहड़ (उदयपुर), गिलुंद (चित्तौड़गढ़), बालाथल (उदयपुर) और ओझियाना जैसे स्थलों का उत्खनन किया गया है।

खोज एवं उत्खनन इतिहास

आहड़ का उत्खनन सर्वप्रथम 1953 ई. में अक्षय कीर्ति व्यास ने किया, तत्पश्चात् 1961-62 ई. में एच.डी. सांकलिया के नेतृत्व में डेक्कन कॉलेज पुणे की टीम ने इसे व्यवस्थित रूप से उत्खनित किया। गिलुंद का उत्खनन बी.बी. लाल ने 1957-58 ई. में किया था।

आवास एवं निर्माण

आहड़ और गिलुंद अपेक्षाकृत बड़ी बस्तियाँ थीं, जहाँ मकान मिट्टी के गारे और पत्थरों से बनाए जाते थे। नींव में पत्थरों का प्रयोग होता था तथा दीवारों को बाँस के पर्दों या पत्थर की पिंडिकाओं से सुदृढ़ किया जाता था। छतें ढलवाँ थीं, और गिलुंद में पक्की ईंटों के प्रयोग के साक्ष्य भी मिले हैं, जो इस काल के लिए असामान्य और उल्लेखनीय है। फर्श काली मिट्टी और पीली गाद से बनाए जाते थे, जिन पर कभी-कभी नदी की बजरी बिछाई जाती थी। आहड़ में 33 फीट 10 इंच लंबा एक मकान मिला है, जिसे कच्ची दीवार से दो भागों में बाँटा गया था। गिलुंद से भंडार-गर्त और बहु-मुखी चूल्हे भी प्राप्त हुए हैं, जो सामूहिक भंडारण व्यवस्था का संकेत देते हैं।

अर्थव्यवस्था एवं शिल्प

इस संस्कृति के लोग मुख्यतः कृषक और पशुपालक थे। वे गेहूँ, जौ, धान, चना, मूँग और संभवतः बाजरा की खेती करते थे, साथ ही गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सुअर पालते थे। उत्खनन में मछली, कछुए, मुर्गे और हिरण की अस्थियाँ भी मिली हैं, जो शिकार और मत्स्य-आखेट की पूरक भूमिका दर्शाती हैं।

धातु-उद्योग एवं व्यापार

मृद्भांड मुख्यतः काले-और-लाल रंगों में थे, जिन पर सफेद रैखिक व बिंदीदार आकृतियाँ अंकित थीं। आहड़ का प्राचीन नाम ‘ताम्रवती’ (ताँबे वाला स्थान) भी मिलता है, जहाँ ताँबे के उपकरण सपाट कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ, अंगूठियाँ, सुरमे की सलाइयाँ और चाकू घरों में ही बनाए जाते थे। सीकर क्षेत्र के गणेश्वर से प्राप्त लगभग 2800 ई.पू. के ताम्र-उपकरणों, जिन्हें कुछ विद्वान ‘गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति’ कहते हैं, से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र प्रारंभिक ताम्र-प्रगलन (कॉपर स्मेल्टिंग) का केंद्र था, जहाँ से ताँबा मध्य भारत, दक्कन और स्वयं हड़प्पा सभ्यता को भी निर्यात किया जाता था। इस प्रकार गणेश्वर को हड़प्पाई ताम्र-आपूर्ति शृंखला का एक संभावित स्रोत माना जाता है।

(ख) कायथा संस्कृति (लगभग 2200–2000 ई.पू.)

कायथा संस्कृति का विकास मुख्यतः मध्य प्रदेश में, विशेषकर चंबल और उसकी सहायक नदियों (काली सिंध) के क्षेत्र में हुआ। इसका प्रमुख स्थल कायथा, वर्तमान उज्जैन के निकट स्थित है, जिसका उत्खनन वी.एस. वाकणकर ने 1965-67 ई. में किया।

विशेषताएँ एवं साक्ष्य

यहाँ चाक-निर्मित भूरे/चॉकलेटी रंग से चित्रित लाल मृद्भांड, ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, 28 ताँबे की चूड़ियाँ, सूक्ष्म पाषाण-उपकरण तथा बिल्लौर (कार्नेलियन), गोमेद (एगेट) व सेलखड़ी (स्टीटाइट) के मनके प्राप्त हुए हैं। कायथा संस्कृति के तीन क्रमिक मृद्भांड-चरण चिह्नित किए गए हैं, जिनमें अंतिम चरण में मालवा-शैली की पॉटरी के प्रारंभिक लक्षण दिखने लगते हैं।

सांस्कृतिक संबंध

इनका जीवन कृषि, पशुपालन और स्थानीय शिल्प पर आधारित था। पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि इनका संपर्क हड़प्पा-परंपराओं तथा आहड़-बनास संस्कृति से भी था, और यह संस्कृति कालक्रमानुसार मालवा संस्कृति की पूर्ववर्ती मानी जाती है।

(ग) मालवा संस्कृति (लगभग 1600–1300 ई.पू.)

मालवा संस्कृति मध्य प्रदेश के मालवा पठार में विकसित हुई, जिसका प्रमुख विस्तार नर्मदा और चंबल घाटी के आसपास दिखाई देता है। कायथा, एरण, नवदाटोली, माहेश्वर और नागदा इसके प्रमुख स्थल हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह अब तक ज्ञात सबसे व्यापक ताम्रपाषाण संस्कृति मानी जाती है, क्योंकि इसके अवशेष महाराष्ट्र (इनामगाँव, दायमाबाद) तक भी विस्तारित मिले हैं।

उत्खनन एवं कृषि

इसका सबसे प्रमुख साक्ष्य नवदाटोली से मिला है, जिसका उत्खनन प्रो. एच.डी. सांकलिया के निर्देशन में 1957-59 में किया गया। नवदाटोली भारत का सबसे विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम-स्थल है, जहाँ से दो प्रकार के गेहूँ, अलसी, मसूर, काला चना, हरा चना, हरी मटर और खेसरी की फसलों के अवशेष मिले हैं — यह दर्शाता है कि इस काल में बहु-फसली (मल्टी-क्रॉपिंग) कृषि पद्धति प्रचलित थी।

मृद्भांड एवं व्यापार

मालवा संस्कृति के मृद्भांड अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं- मोटे पीले-नारंगी आधार पर काले रंग से बनी ज्यामितीय, वानस्पतिक तथा कभी-कभी पशु-आकृतियाँ इनकी पहचान हैं। शोधों से पता चलता है कि मालवा क्षेत्र व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ से ताँबे के उपकरण एवं कृषि-उत्पाद अन्य क्षेत्रों में विनिमय किए जाते थे।

(घ) जोर्वे संस्कृति (लगभग 1400–700 ई.पू.)

पश्चिमी महाराष्ट्र में जोर्वे, नेवासा, दायमाबाद, सोनगाँव, चंदोली, प्रकाश और इनामगाँव जैसे स्थलों से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। जोर्वे संस्कृति को सामान्यतः दो उप-चरणों में बाँटा जाता है- प्रारंभिक जोर्वे (लगभग 1400–1000 ई.पू.) और उत्तर/अंतिम जोर्वे (लगभग 1000–700 ई.पू.), जिनमें बाद वाले चरण में शुष्कता बढ़ने के साथ बस्तियों का आकार घटता गया।

स्तरीकृत सांस्कृतिक अनुक्रम

दायमाबाद के उत्खनन (बी.पी. बोपार्डीकर व बाद में एस.ए. साली द्वारा) से पता चलता है कि यहाँ का प्रथम स्तर हड़प्पा-सदृश तत्त्वों से, द्वितीय स्तर आहड़ से, तृतीय स्तर मालवा से और चतुर्थ स्तर जोर्वे संस्कृति से संबद्ध है, जो इन संस्कृतियों के परस्पर सांस्कृतिक अंतर्संबंध और क्रमिक अध्यारोहण (सुपरइंपोज़िशन) को स्पष्ट करता है।

मृद्भांड एवं धातु साक्ष्य

जोर्वे मृद्भांड लाल तल पर काली ज्यामितीय आकृतियों और टोंटीदार (स्पाउटेड) बर्तनों के लिए प्रसिद्ध हैं। ताँबे के उपकरणों में चूड़ियाँ, मनके, फलक, छेनियाँ, सलाइयाँ, कुल्हाड़ियाँ और छोटे बर्तन शामिल हैं। दायमाबाद से प्राप्त ताँबे की चार विशाल ठोस आकृतियाँ- रथ, गैंडा, हाथी और साँड़ इस काल की उन्नत धातु-शिल्पकला की परिचायक हैं तथा भारतीय पुरातत्त्व में अद्वितीय मानी जाती हैं।

कृषि एवं जीवन स्तर

जोर्वे संस्कृति में जौ, गेहूँ, मसूर, कुलिथ (हॉर्स ग्राम), मटर और चावल की खेती होती थी। बेर की गुठलियाँ और पटसन (जूट) के साक्ष्य भी मिले हैं। पालतू पशुओं में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, सुअर और घोड़ा शामिल थे। इनामगाँव में सिंचाई हेतु बाँध और नहर-व्यवस्था के प्रमाण भी मिले हैं, जो कृषि-प्रबंधन के प्रारंभिक स्वरूप को दर्शाते हैं। हाल के शोधों से यह भी संकेत मिलता है कि दायमाबाद व इनामगाँव में किलेबंद बस्तियों और व्यापारिक ढाँचे के साथ नगरीकरण की प्रारंभिक प्रक्रिया आरंभ हो चुकी थी, यद्यपि यह पूर्ण नगरीय अवस्था तक नहीं पहुँच सकी।

(ङ) ऊपरी गंगा घाटी और दोआब: गेरुए मृद्भांड (OCP) एवं ताम्रनिधि (लगभग 2000–1500 ई.पू.)

ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दोआब में गेरुए मृद्भांड (OCP) संस्कृति प्रमुख थी, जो सहारनपुर के मायापुर से इटावा के साईपाई तक विस्तृत थी। इसके अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों में अंबखेड़ी, बहादराबाद, लाल किला (हस्तिनापुर के निकट) और अतरंजीखेड़ा शामिल हैं।

ताम्रनिधि (कॉपर होर्ड्स)

इस क्षेत्र से ‘गंगा घाटी ताम्रनिधि’ प्राप्त हुई है, जिसमें मानव-आकृतियाँ (एंथ्रोपोमॉर्फिक फिगर), कुल्हाड़ियाँ, मत्स्य-भाले (हार्पून) और श्रृंगिकायुक्त तलवारें (शोल्डर्ड सेल्ट्स) शामिल हैं। साईपाई से तलवार और मत्स्य-भाले का सिरा मिला है। कुछ विद्वान, जैसे बी.बी. लाल गेरुए मृद्भांड संस्कृति को इन ताम्रनिधियों से जोड़ते हैं, यद्यपि इस संबंध पर विद्वानों में अभी भी मतभेद है, कुछ इसे स्वतंत्र और भिन्न-कालिक परंपरा मानते हैं।

संक्रमण चरण

अतरंजीखेड़ा से काले-लाल मृद्भांड शैली मिली है, जो गेरुए मृद्भांड और परवर्ती चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति के बीच की सांस्कृतिक कड़ी मानी जाती है।

(च) पूर्वी भारत की ताम्रपाषाण संस्कृति (लगभग 1500–700 ई.पू.)

पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल के वीरभूम, बर्दवान, मिदनापुर और बाँकुड़ा (पांडुराजार ढिबि, महिशाल, मंगलकोट), बिहार के चिरांद व सोनपुर, उड़ीसा के गोपालपुर तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के खैराडीह व नौहान से ताम्र-पाषाणिक साक्ष्य मिले हैं।

विशेषताएँ

पांडुराजार ढिबि और महिशाल जैसे स्थलों से चावल-आधारित ग्राम-संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। काले-लाल मृद्भांड इस क्षेत्र की प्रमुख विशेषता हैं। चिरांद से हड्डी के उपकरणों (बोन टूल्स) का प्रचुर संग्रह मिला है, जो इस क्षेत्र की एक विशिष्ट पहचान है। यह संस्कृति पूर्णतः स्थानीय जलोढ़ (एल्यूवियल) पर्यावरण के अनुकूल थी और मुख्यतः धान की कृषि पर निर्भर थी।

(छ) दक्षिण भारत की नवपाषाण-ताम्रपाषाण संस्कृति (लगभग 2300–900 ई.पू.)

दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ताम्र-पाषाणिक तत्त्वों के प्रसार के साक्ष्य ब्रह्मगिरि, मास्की, पिकलीहल, उतनूर, संगनकल्लू, पायमपल्ली, हेम्मिगे, नागार्जुनकोंडा और कोडेकल जैसे स्थलों से मिले हैं।

विकास क्रम

नए शोधों के अनुसार दक्षिण भारत की ये संस्कृतियाँ प्रारंभिक चरण में चरवाहा-प्रधान (राख के टीले, जैसे उतनूर व कुडेकल में थीं, जो पशुओं के गोबर को बार-बार जलाने से बने विशाल राख-स्तूपों के रूप में प्रकट होती हैं। कालांतर में ये समुदाय कृषि-आधारित स्थायी अर्थव्यवस्था में विकसित हुए।

साक्ष्य

मृद्भांडों में विविधता (धूसर, काले-लाल एवं बर्नेश्ड वेयर) और पॉलिशदार पत्थर के उपकरण यहाँ की प्रमुख विशेषताएँ हैं। बाजरा और चना मुख्य फसलें थीं। टेक्कलकोटा से प्राप्त सोने की लटकन इस बात का संकेत देती है कि इस काल में दक्कन में स्वर्ण का उपयोग भी आरंभ हो गया था।

(ज) अन्य क्षेत्रीय संस्कृतियाँ

पश्चिमी भारत में सवाल्दा संस्कृति का विकास मुख्यतः महाराष्ट्र के तापी क्षेत्र (सवाल्दा, टेकवाड़ा जैसे स्थल) में हुआ, जिसे मालवा व जोर्वे से भी प्राचीन माना जाता है। प्रभास पाटन संस्कृति गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में विकसित हुई, जिसका संबंध हड़प्पाई परंपराओं तथा स्थानीय सांस्कृतिक विकास से था। गुजरात की रंगपुर संस्कृति (लोथल व रंगपुर स्थल) भी उत्तर-हड़प्पा एवं ताम्रपाषाण सांस्कृतिक परंपराओं के संक्रमण को समझने में महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, जहाँ लोथल-शैली की लाल-चित्रित पॉटरी उत्तरोत्तर स्थानीय रूपों में परिवर्तित होती दिखती है।

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों की मुख्य सामाजिक-आर्थिक विशेषताएँ

(क) चित्रित मृद्भांड एवं तकनीकी प्रगति

इन संस्कृतियों की सबसे प्रमुख पहचान चाक-निर्मित चित्रित मृद्भांड थे। आकृतियाँ प्रायः ज्यामितीय होती थीं और बर्तनों पर काला, लाल तथा सफेद रंग प्रयोग में लाया जाता था। मृद्भांडों को लगभग 500-700 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भट्ठियों में पकाए जाने के प्रमाण मिलते हैं, जो उस काल की अपेक्षाकृत उन्नत तापीय तकनीक को प्रदर्शित करता है।

(ख) उपकरण एवं औद्योगिकी

पत्थर के सूक्ष्म ब्लेड (माइक्रोलिथ) और शल्क (फ्लेक) उद्योग इनकी मुख्य आधारशिला थे। चेल्सेडनी, चर्ट, जैस्पर और एगेट से बने समानांतर ब्लेड, दाँतेदार ब्लेड, चाकू, अर्द्धचंद्राकार व त्रिकोण उपकरण व्यापक रूप से प्रचलित थे। ताँबे के सीमित उपयोग के कारण समतल कुठार, सेल्ट, तीर, भाले, चूड़ियाँ और मनके बनाए जाते थे। इस काल में ताँबा एक बहुमूल्य धातु मानी जाती थी और मुख्यतः आभूषणों व छोटे औजारों तक सीमित रहती थी। सूत, रेशम के धागे और कतली-चक्र (स्पिंडल व्होर्ल) से कताई-बुनाई उद्योग के साक्ष्य भी मिलते हैं।

(ग) बस्तियाँ, आवास एवं सामाजिक संरचना

इन समुदायों ने विशाल ग्रामीण बस्तियों की स्थापना की। बालाथल और गिलुंद में सुरक्षा-प्राचीर (किलेबंदी) के साक्ष्य मिले हैं, जो संभवतः बाढ़-नियंत्रण या सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा दोनों उद्देश्यों से बनाई गई थीं। घर आयताकार, वर्गाकार या वृत्ताकार होते थे, जिन्हें मिट्टी, गारे, बाँस और घास-फूस से बनाया जाता था। नवदाटोली में चौकोर व वृत्ताकार घर, जोर्वे संस्कृति में पाँच कमरों वाला बड़ा मकान और नेवासा में 45×20 फीट आकार का विस्तृत घर मिला है- ये आकार में भिन्न-भिन्न घर समाज में श्रम-विभाजन, आर्थिक असमानता और पारिवारिक स्वरूपों के संकेतक माने जाते हैं। इनामगाँव में उत्खनन से यह भी पता चला है कि गाँव के मुखिया या प्रधान व्यक्ति का घर आकार में बड़ा और केंद्रीय स्थान पर होता था, जो प्रारंभिक सामाजिक स्तरीकरण का प्रमाण है।

(घ) शवाधान एवं धार्मिक विश्वास

विभिन्न क्षेत्रों में शवाधान की भिन्न-भिन्न पद्धतियाँ प्रचलित थीं:

महाराष्ट्र (जोर्वे क्षेत्र)

शवों को अस्थि-कलश में रखकर घर के फर्श के नीचे उत्तर से दक्षिण दिशा में दफनाया जाता था। जोर्वे चरण में वयस्कों के पैर के टखने काट दिए जाते थे, जिसे कुछ विद्वान पुनर्जन्म-भय या शव को स्थिर रखने की मान्यता से जोड़ते हैं। इनामगाँव से चार पैरों वाला विशाल मिट्टी का अस्थि-कलश (80×50 सेमी) मिला है, जिसमें एक वयस्क पुरुष कंकाल बैठाने की मुद्रा में रखा गया था। यह इस काल की सर्वाधिक असाधारण शवाधान-पद्धतियों में से एक मानी जाती है।

अन्य क्षेत्र

दक्षिण भारत में शवों को पूर्व से पश्चिम दिशा में, पश्चिमी भारत में पूर्ण शवाधान (एक्सटेंडेड बरायल) और पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान प्रचलित था।

धार्मिक मान्यताएँ

वृषभ (बैल) और मातृदेवी की पूजा सर्वप्रमुख थी। इनामगाँव और नेवासा से सिररहित नारी-प्रतिमाएँ व बैल की मूर्तियाँ मिली हैं, जिन्हें उर्वरता की देवी (कुछ विद्वानों द्वारा ‘शाकंभरी’ से संबद्ध) माना जाता है। स्थलों से प्राप्त अग्निवेदियों से अग्निपूजा के प्रचलन का अनुमान लगाया जाता है, जो परवर्ती वैदिक यज्ञ-परंपरा से एक सांस्कृतिक सातत्य का संकेत भी दे सकता है, यद्यपि इस संबंध पर विद्वानों में सहमति नहीं है।

अंतःक्षेत्रीय संपर्क, पतन एवं ऐतिहासिक महत्त्व

इन संस्कृतियों को पूर्णतः पृथक-थलग परंपराएँ नहीं माना जा सकता। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि अरावली के ताँबे, दक्कन के पत्थरों (चर्ट, जैस्पर) और विभिन्न मृद्भांड-शैलियों के आदान-प्रदान के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के बीच व्यापक व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संपर्क विद्यमान था। दायमाबाद जैसे स्थलों पर मिला सांस्कृतिक अध्यारोहण इस अंतर्संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों के पतन के कारण

ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों का अवसान किसी एक कारण से नहीं हुआ। लगभग 1200-700 ई.पू. के दौरान जलवायु परिवर्तन, निरंतर घटती वर्षा, नदियों का सूखना, बढ़ती शुष्कता तथा मृदा की उर्वरता में क्रमिक कमी जैसे पर्यावरणीय दबावों के कारण कृषि-व्यवस्था चरमरा गई। इसके साथ ही कुछ विद्वान लौह-धातु के आगमन और नए तकनीकी एवं सामाजिक परिवर्तनों को भी एक सहायक कारण मानते हैं। परिणामस्वरूप, अधिकांश बस्तियाँ धीरे-धीरे उजड़ गईं या छोटे, बिखरे हुए समुदायों में सिमट गईं।

ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों की तुलनात्मक सारणी

संस्कृति
प्रमुख क्षेत्र
अनुमानित काल
विशिष्ट मृद्भांड
प्रमुख स्थल
गणेशवर-आहड़-बनासदक्षिण-पूर्वी राजस्थान2100–1200 ई.पू.काले-लाल, सफेद अलंकरणआहड़, गिलुंद, बालाथल
कायथामध्य प्रदेश (चंबल)2200–2000 ई.पू.भूरा/चॉकलेटी चित्रितकायथा
मालवामालवा पठार, नर्मदा घाटी1600–1300 ई.पू.पीले तल पर काली आकृतियाँनवदाटोली, एरण
जोर्वेपश्चिमी महाराष्ट्र1400–700 ई.पू.लाल तल पर काली, टोंटीदारइनामगाँव, दायमाबाद
गेरुए मृद्भांड (OCP)ऊपरी गंगा-यमुना दोआब2000–1500 ई.पू.गेरुआ रंगसाईपाई, अतरंजीखेड़ा
पूर्वी भारतप. बंगाल, बिहार, उड़ीसा1500–700 ई.पू.काले-लालपांडुराजार ढिबि, चिरांद
दक्षिण भारतकर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडु2300–900 ई.पू.धूसर, काले-लालब्रह्मगिरि, संगनकल्लू

ऐतिहासिक महत्त्व

यद्यपि ये संस्कृतियाँ कांस्य-युगीन हड़प्पा सभ्यता जैसी पूर्ण नगरीय व्यवस्था को जन्म नहीं दे सकीं और मुख्यतः ग्रामीण ही बनी रहीं, तथापि इन्होंने दक्कन, मध्य और पूर्वी भारत में कृषि एवं धातुकर्म के विस्तृत क्षेत्र को तैयार किया। जोर्वे संस्कृति जैसे कुछ अपवाद लगभग 700 ई.पू. तक बने रहे। इन्हीं ताम्र-पाषाणिक पृष्ठभूमियों पर आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप में लौह युग और ईसा पूर्व छठी-पाँचवीं शताब्दी के ‘द्वितीय नगरीकरण’ का आधार निर्मित हुआ, जब गंगा घाटी में महाजनपदों का उदय हुआ। इस प्रकार ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ हड़प्पाई नगरीय सभ्यता और परवर्ती ऐतिहासिक भारत के बीच एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन कड़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं।

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ क्या थीं?

ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियाँ वे ग्रामीण संस्कृतियाँ थीं जिनमें लोग कृषि और पशुपालन दोनों पर निर्भर रहते थे। ये पत्थर के परंपरागत उपकरणों के साथ-साथ ताँबे के औजारों का भी प्रयोग करते थे तथा स्थायी या अर्ध-स्थायी बस्तियों में रहते थे। हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद, लगभग दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में, इनका विकास सिंधु क्षेत्र के बाहर भारत के विभिन्न भागों में हुआ।

2. प्रश्न: इन संस्कृतियों का प्रमुख क्षेत्र कौन-सा था?

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों का प्रमुख विकास दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र, गुजरात, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत में हुआ। आहड़-बनास, कायथा, मालवा, जोर्वे, सवाल्दा, प्रभास पाटन और रंगपुर जैसी संस्कृतियाँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

3. प्रश्न: इन संस्कृतियों के प्रमुख कृषि उत्पाद क्या थे?

क्षेत्र के अनुसार ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के लोग गेहूँ, जौ, चावल, बाजरा, विभिन्न दालें (चना, मसूर, मूँग, मटर, कुलिथ) और तिलहन (जैसे अलसी) उगाते थे। कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार था, और कुछ स्थलों पर सिंचाई-व्यवस्था (जैसे इनामगाँव में बाँध-नहर) के भी प्रमाण मिले हैं।

4. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक किन पशुओं को पालते थे?

ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के प्रमुख पालतू पशुओं में गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर शामिल थे। कुछ स्थलों से मछली, कछुए, मुर्गे और हिरण जैसे शिकार-आधारित पशुओं के अवशेष भी मिले हैं। कुछ ताम्रपाषाण स्थलों (जैसे कायथा, इनामगाँव) से घोड़े जैसी हड्डियाँ बताई गई हैं, किंतु यह पहचान विद्वानों में विवादित है और सर्वसम्मति से स्वीकृत नहीं है। पशुओं का उपयोग भोजन, कृषि-कार्य और अन्य आर्थिक गतिविधियों में किया जाता था।

5. प्रश्न: ताम्र-पाषाणिक पशुचारी-कृषक संस्कृतियों की प्रमुख भौतिक विशेषताएँ क्या थीं?

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों  में ताँबे व पत्थर के उपकरण, विशिष्ट प्रकार के चित्रित मृद्भांड (मुख्यतः काले-लाल), बिल्लौर-गोमेद-सेलखड़ी के मनके, आभूषण तथा कृषि-उपकरण मिलते हैं। बस्तियों में मिट्टी, बाँस और लकड़ी से बने घर, अनाज-भंडारण की व्यवस्था तथा कुछ स्थलों (बालाथल, गिलुंद) पर सुरक्षा-प्राचीर के भी प्रमाण मिले हैं।

6. प्रश्न: इन संस्कृतियों का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था?

ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियों ने कृषि, पशुपालन, धातु-प्रयोग, शिल्प और ग्रामीण बस्तियों के विकास को आगे बढ़ाया। विभिन्न क्षेत्रों के बीच वस्तुओं और तकनीकों के आदान-प्रदान ने सांस्कृतिक संपर्क को मज़बूत किया। यद्यपि ये पूर्ण नगरीय व्यवस्था तक नहीं पहुँच सकीं, तथापि इन्होंने आगे चलकर लौह युग और भारतीय उपमहाद्वीप के ‘द्वितीय नगरीकरण’ की आधारभूमि तैयार की।
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