गजपति राजवंश (Gajapati Dynasty)

गजपति राजवंश (Gajapati Dynasty)
उड़ीसा का सूर्यवंशी गजपति साम्राज्य (1434-35 ई.-1541 ई.) गजपति वंश मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख […]

उड़ीसा का सूर्यवंशी गजपति साम्राज्य (1434-35 ई.-1541 ई.)

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गजपति वंश मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख हिंदू राजवंश था, जिसका उदय प्राचीन कलिंग और उत्कल क्षेत्र में हुआ, जो वर्तमान ओडिशा तथा उत्तरी तटीय आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में फैला हुआ था। इस वंश की स्थापना कपिलेंद्र देव ने 1434-35 ई. में पूर्वी गंग वंश के स्थान पर की थी। कपिलेंद्र देव के शासनकाल में गजपति साम्राज्य की सीमा उत्तर में गंगा-हुगली क्षेत्र तक और दक्षिण में कावेरी तट तथा तिरुचिरापल्ली तक पहुँच गई, जिससे पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत के एक बड़े भूभाग पर गजपति शासकों की सत्ता स्थापित हुई। गजपति शासक स्वयं को ‘सूर्यवंशी’ कहते थे, इसलिए यह राजवंश सूर्यवंशी गजपति वंश के नाम से भी जाना जाता है। महानदी के निकट स्थित कटक इस साम्राज्य की राजधानी थी, जहाँ का बाराबाटी दुर्ग शासन, प्रशासन और सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। गजपति शासकों ने सैन्य शक्ति के साथ-साथ धर्म, कला, साहित्य और मंदिर स्थापत्य को भी संरक्षण दिया। वैष्णव धर्म के प्रति विशेष आस्था के कारण उन्होंने धार्मिक गतिविधियों तथा मंदिरों के विकास में योगदान दिया। साम्राज्य के विस्तार और सीमाओं की रक्षा के लिए गजपतियों को कई क्षेत्रीय शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा, जिनमें दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य, दक्कन में बहमनी सल्तनत, उत्तर में बंगाल के हुसैनशाही सुल्तान तथा बाद के समय में गोलकुंडा के कुतुबशाही शासक शामिल थे। इन संघर्षों के बावजूद गजपति वंश ने लगभग एक शताब्दी तक पूर्वी और दक्षिण भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऐतिहासिक स्रोत

गजपति राजवंश के इतिहास की जानकारी मुख्य रूप से साहित्यिक ग्रंथों, शिलालेखों (अभिलेखों) और ताम्रपत्रों जैसे ऐतिहासिक स्रोतों से मिलती है। साहित्यिक स्रोतों में संस्कृत ग्रंथ, ओड़िया साहित्य, क्षेत्रीय भाषाओं की रचनाएँ और फ़ारसी इतिहास-ग्रंथ सम्मिलित हैं। संस्कृत नाटक ‘परशुराम विजय’ और ‘अभिनव वेणीसंहारम’ जैसे ग्रंथ गजपति शासकों की सैन्य सफलताओं और साहित्यिक रुचि की जानकारी देते हैं। ओड़िया साहित्य में पुरी के जगन्नाथ मंदिर के इतिहास से जुड़े प्रसिद्ध ग्रंथ ‘मादला पांजी’ तथा ‘चैतन्य भागवत’ और ‘जगन्नाथ चरितामृत’ से इस काल की धार्मिक और सांस्कृतिक स्थितियों पर प्रकाश पड़ता है। बांग्ला और तेलुगु साहित्य से भी गजपति राजाओं और उनके पड़ोसी राज्यों, विशेषकर विजयनगर साम्राज्य के साथ संबंधों का ज्ञान होता है। इसी प्रकार ‘तारीख़-ए-फ़िरिश्ता’ जैसे फ़ारसी ऐतिहासिक ग्रंथ गजपति शासकों और सल्तनतकालीन सुल्तानों के बीच हुए संघर्षों का विवरण देते हैं।

पुरालेखीय स्रोतों में पुरी के जगन्नाथ मंदिर के शिलालेख गजपति राजाओं द्वारा मंदिर को दिए गए संरक्षण और दान तथा उनकी धार्मिक निष्ठा के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं, जबकि विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी के प्रांतीय शिलालेख कपिलेंद्र देव और प्रतापरुद्र देव की विजयों की पुष्टि करते हैं। इसके अतिरिक्त ‘वेलीचेरला ताम्रपत्र’ और ‘वेगलानी प्लेट्स’ जैसे अभिलेख प्रशासनिक आदेशों, भूमि अनुदान और शाही वंशावली को समझने में सहायक हैं।

नाम और उपाधि

‘गजपति’ संस्कृत-ओड़िया मूल का शब्द है। इसमें ‘गज’ का अर्थ हाथी और ‘पति’ का अर्थ स्वामी है, इसलिए गजपति का अर्थ ‘हाथियों का स्वामी’ है। उस समय हाथियों को सैन्य शक्ति और राजसी प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। युद्ध में वे चलते-फिरते दुर्ग की तरह कार्य करते थे, शत्रु की पंक्तियाँ तोड़ते और किलों के द्वार गिराते थे। हाथियों की संख्या से राजा के वैभव का अनुमान लगाया जाता था। ओडिशा के घने जंगलों में हाथी बड़ी संख्या में मिलते थे, इसलिए यहाँ के शासकों के पास हस्ति-बल की प्रचुरता थी।

मध्यकालीन भारत के शासक अपनी शक्ति के अनुसार चार प्रमुख उपाधियाँ धारण करते थे। ओडिशा के शासक ‘गजपति’ (हाथी-बल के स्वामी) कहलाते थे। विजयनगर के शासकों की उपाधि ‘नरपति’ (पैदल-बल के स्वामी) थी। बहमनी सुल्तान ‘अश्वपति’ (अश्व-बल के स्वामी) कहे जाते थे। चौथी उपाधि ‘छत्रपति’ थी, जो छत्र अर्थात् सार्वभौम सत्ता के स्वामी के लिए प्रयुक्त होती थी। इस चतुर्विध वर्गीकरण से स्पष्ट है कि उस काल की राजनीति में सैन्य अंगों के आधार पर शासकों की पहचान होती थी।

पूर्वी गंग वंश के शासक नरसिंह देव प्रथम पहले कलिंग शासक थे, जिन्होंने औपचारिक रूप से ‘गजपति’ की उपाधि धारण की। ढेंकानाल ज़िले की कपिलास पहाड़ी पर स्थित चंद्रशेखर मंदिर का 1246 ई. का शिलालेख इसका प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। इसके बाद 1434-35 ई. में कपिलेंद्र देव ने ‘सूर्यवंशी गजपति राजवंश’ की स्थापना की, जिसके पश्चात् यह उपाधि ओडिशा के शासकों की स्थायी पहचान बन गई। सूर्यवंशी गजपतियों के बाद भोई वंश तथा खुर्दा के राजाओं ने भी इस उपाधि का प्रयोग किया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

गजपतियों से पहले कलिंग पर पूर्वी गंग वंश का शासन था। आरंभिक गंग शासक कलिंगनगर से शासन करते थे। इस स्थान की पहचान वर्तमान आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम के पास स्थित मुखलिंगम से की जाती है, जहाँ प्रसिद्ध मधुकेश्वर (मुखलिंगेश्वर) मंदिर है। तेरहवीं सदी में पूर्वी गंगों ने राजधानी कटक स्थानांतरित की, जिससे महानदी का उपजाऊ डेल्टा इस वंश का केंद्र बन गया। यह क्षेत्र खेती और व्यापार के लिए अनुकूल तो था ही, यहाँ से समुद्र तक उनकी पहुँच भी सुगम हो गई।

पूर्वी गंग वंश के प्रसिद्ध शासक अनंतवर्मन चोडगंग (1078–1150 ई.) ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर के निर्माण की नींव रखी। परंपरा के अनुसार उस पर वैष्णव आचार्य रामानुज का प्रभाव था। चोडगंग का साम्राज्य गोदावरी से गंगा तक फैला था और उसके काल में पुरी वैष्णव आस्था का केंद्र बन गया। उसके वंशज नरसिंह देव प्रथम (1238–1264 ई.) ने कोणार्क का विश्व-प्रसिद्ध सूर्य मंदिर बनवाया, जो पत्थर में गढ़ा हुआ एक विशाल रथ है, जिसमें सात घोड़े और बारह जोड़ी पहिए हैं। बाद में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर घोषित किया गया। नरसिंह देव ने सिंहाचलम (विशाखापत्तनम) के वराह लक्ष्मी नरसिंह मंदिर को भी संरक्षण दिया। उसने मुस्लिम शक्तियों, विशेषकर बंगाल के सुल्तानों, के विरुद्ध सफल अभियान भी चलाए।

आंध्र क्षेत्र की कोल्लेरू झील के आसपास मिले ताम्रपत्रों और लोक-कथाओं में इस काल की सैन्य उपस्थिति का संकेत मिलता है। कथा के अनुसार झील के द्वीप पर बना ‘कोल्लेटी कोटा’ ओड़िया सेनाओं का सुरक्षित गढ़ था और शत्रुओं ने झील का पानी समुद्र में बहाकर किले पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी। यद्यपि इस कथा की ऐतिहासिकता संदिग्ध है, फिर भी इससे उस क्षेत्र में ओड़िया सेनाओं की उपस्थिति का संकेत मिलता है।

चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में पूर्वी गंग वंश की शक्ति क्षीण हो गई। उत्तर से दिल्ली सल्तनत के दबाव, बंगाल के सुल्तानों के आक्रमणों और आंतरिक उत्तराधिकार के झगड़ों ने राजसत्ता को खोखला कर दिया। अंतिम शासक भानु देव चतुर्थ (1424–1434 ई.) के काल में उसके शक्तिशाली मंत्री और सेनापति कपिलेंद्र देव ने लगभग 1434-35 ई. में सिंहासन पर अधिकार कर लिया और गजपति वंश की स्थापना की। यह सत्ता-परिवर्तन मुख्यतः सैन्य और प्रशासनिक वर्चस्व का परिणाम था। परंपरागत रूप से इसे भगवान जगन्नाथ का आदेश और दैवी संकेत बताया गया है।

गजपति वंश का उत्कर्ष और विस्तार

गजपति वंश का उत्कर्ष पंद्रहवीं शताब्दी में ओडिशा में पूर्वी गंग वंश के पतन के बाद हुआ। इस शक्तिशाली राजवंश की स्थापना सूर्यवंशी शासक कपिलेंद्र देव ने लगभग 1434-35 ई. में की। उसने पूर्वी गंग वंश के अंतिम शासक भानु देव चतुर्थ के बाद सत्ता सँभाली और ओडिशा की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया।

गजपति राजवंश के प्रमुख शासक

कपिलेंद्र देव (1435-1467 ई.)

कपिलेंद्र देव गजपति वंश का संस्थापक और सबसे शक्तिशाली शासक था, जिसने लगभग 1435 से 1467 ई. तक शासन किया। वह मूलतः सेना का उच्च अधिकारी था और अपने सैन्य कौशल से राजसत्ता तक पहुँचा था। सिंहासन पर बैठते ही उसने राज्य के भीतर विद्रोही सामंतों का दमन किया और सेना का नया संगठन तैयार किया। उसने बहमनी सुल्तानों, विजयनगर के शासकों तथा दक्षिण के स्थानीय राजाओं से लंबे युद्ध लड़े। उसके अभियानों में कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र, राजमहेंद्री (राजमंड्री), कोंडवीडु, कोंडापल्ली, उदयगिरि और दक्षिण में कावेरी तट तक के इलाके शामिल थे। उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र हंवीर देव को राजमहेंद्री और कोंडवीडु का राज्यपाल नियुक्त किया, जिसने दक्षिणी अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विजयनगर की आंतरिक कमज़ोरी, विशेषकर मल्लिकार्जुन राय के काल में, उसे इन विजयों का अवसर मिला।

अपनी सैन्य प्रतिभा और विजय अभियानों के चलते उसने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर में गंगा नदी से लेकर दक्षिण में बीदर और कावेरी नदी (तमिलनाडु) तक किया। 1464 ई. के आसपास गजपति साम्राज्य अपने चरम पर पहुँच गया और कपिलेंद्र देव दक्षिण-पूर्वी भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। उसके शिलालेखों में उसे ‘गजपति गौडेश्वर नवकोटि कर्नाट कलबर्गेश्वर’ जैसी विरुदावली दी गई है। इसका अर्थ है कि वह गजपति होने के साथ बंगाल (गौड़) का स्वामी, कर्नाट की नौ करोड़ सेना का विजेता और कलबुर्गा का अधिपति था।

इतने विशाल क्षेत्र को केवल केंद्र से चलाना कठिन था, इसलिए उसने साम्राज्य के दक्षिणी हिस्सों को दंडपाट और राज्य नामक दो प्रशासनिक भागों में बाँट दिया और अपने पुत्रों तथा सामंतों को प्रशासन का कार्य सौंप दिया। इससे एक प्रकार की सुरक्षा-व्यवस्था स्थापित हुई, किंतु आगे चलकर इसने उत्तराधिकार के विवादों को भी जन्म दिया।

कपिलेंद्र वैष्णव धर्म का अनुयायी था और उसने पुरी के जगन्नाथ मंदिर के विस्तार में सहयोग किया। उसने ब्राह्मणों द्वारा पहले दिया जाने वाला चौकीदारी कर समाप्त कर दिया और परती तथा चरागाह भूमि की व्यवस्था की। उसने अपने अधिकारियों को न्याय, धर्म और आध्यात्मिक शिक्षाओं के मार्ग पर चलने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर उन्हें निर्वासन भोगना पड़ेगा।

कपिलेंद्र कला और धर्म का भी संरक्षक था। उसने भुवनेश्वर में कपिलेश्वर मंदिर बनवाया और जगन्नाथ मंदिर को उदार दान दिया। उसके दरबार में कवि सरला दास ने ओड़िया महाभारत की रचना की, जिसके कारण सरला दास को ‘आदिकवि’ की प्रतिष्ठा मिली।

लगभग 1467 ई. में कपिलेंद्र देव की मृत्यु हो गई। उसके बाद गजपति साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर उसके दो पुत्रों, हंवीर और पुरुषोत्तम के बीच संघर्ष हुआ।

पुरुषोत्तम देव (1467-1497 ई.)

कपिलेंद्र देव के बाद उसके पुत्र पुरुषोत्तम देव ने पिता की विरासत सँभाली, जो सूर्यवंशी गजपति वंश का दूसरा शासक था। पिता कपिलेंद्र देव ने उसे ओडिशा साम्राज्य का उत्तराधिकारी चुना था, किंतु इस निर्णय से उसका ज्येष्ठ भाई हंवीर देव असंतुष्ट था। हंवीर दक्षिणी प्रांतों में पिता के प्रतिनिधि के रूप में प्रभावशाली था, इसलिए उसने उत्तराधिकार का दावा किया और गजपतियों के शत्रु बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय से समझौता कर लिया। 1472 ई. में मुहम्मद शाह की सहायता से हंवीर देव ने राजमहेंद्री और कोंडापल्ली सहित पुरुषोत्तम देव के आधे से अधिक क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और स्वयं को गजपति घोषित कर दिया। किंतु आंतरिक कलह और भीषण अकाल के कारण 1476 ई. के आसपास बहमनी सल्तनत कमज़ोर पड़ गई। पुरुषोत्तम देव ने इस स्थिति का लाभ उठाकर उत्तर से आक्रमण किया, हंवीर को पराजित कर बहमनी सैन्य-टुकड़ियों को खदेड़ दिया और राजमहेंद्री तथा कोंडापल्ली को पुनः अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार उसे गजपति सिंहासन पर पूर्ण अधिकार मिल गया, किंतु इस आंतरिक संघर्ष से गजपतियों की शक्ति क्षीण हो गई और दक्षिण के कुछ क्षेत्र साम्राज्य से निकल गए।

पुरुषोत्तम देव का सबसे प्रसिद्ध प्रतिद्वंद्वी सालुव नरसिंह था, जो पहले विजयनगर का शक्तिशाली सरदार था और बाद में वहाँ का शासक (1485–1491 ई.) बना। उसके कारण आंध्र तथा दक्षिण भारत के क्षेत्रों को लेकर गजपतियों और विजयनगर के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। सालुव नरसिंह ने उदयगिरि जैसे दुर्गों पर अधिकार करना आरंभ किया और बहमनी सुल्तान भी राजमहेंद्री-कोंडापल्ली की ओर बढ़ने लगा, परंतु पुरुषोत्तम देव ने सालुव नरसिंह को पराजित कर बंदी बना लिया और उदयगिरि का किला छीन लिया।

पुरुषोत्तम देव पुरी के जगन्नाथ मंदिर और जगन्नाथ संस्कृति के संरक्षण के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। उसके शासनकाल में गजपति सत्ता का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व और बढ़ा तथा जगन्नाथ-परंपरा और मज़बूत हुई। वह स्वयं विद्वान था और उसके शासनकाल में काव्य-रचना का उत्कर्ष हुआ। उसने संस्कृत में कई रचनाएँ लिखीं, जिनमें अभिनव गीतगोविंद, गोपालपूजा, वेणीसंहार, भक्ति विष्णु और त्रिकांडकोश आदि गिनी जाती हैं।

लोक-परंपरा में काँची अभियान और राजकुमारी पद्मावती से विवाह की कथा प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार काँची के राजा ने पुरुषोत्तम को अपनी कन्या देने से इनकार कर दिया था, तब भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने स्वयं सेना की सहायता की। इसी स्मृति से पुरी की रथयात्रा में गजपति द्वारा छेरा पहँरा की परंपरा जुड़ी है, जिसमें सोने की झाड़ू से रथ-मार्ग बुहारा जाता है। इस परंपरा के अनुसार राजा स्वयं को जगन्नाथ का सेवक मानता था; इस रस्म से पता चलता है कि राजा सर्वोच्च सत्ता नहीं, देवता का विनम्र सेवक है और सत्ता का वास्तविक स्वामी स्वयं जगन्नाथ है। यही धारणा गजपति राजत्व की वैचारिक नींव थी।

प्रतापरुद्र देव (1497-1540 ई.)

1497 ई. में प्रतापरुद्र देव अपने पिता पुरुषोत्तम देव का उत्तराधिकारी हुआ और लगभग चार दशक तक शासन किया। वह योद्धा और विद्वान दोनों था। उसके शासन के आरंभिक वर्षों में गजपति साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था, किंतु इसी काल में उसकी शक्ति का क्रमिक ह्रास भी आरंभ हो गया।

आगामी कई वर्षों तक वह विजयनगर के साथ लंबे संघर्ष में उलझा रहा। विजयनगर के सम्राट कृष्णदेव राय ने 1512-1518 ई. के अभियानों में उदयगिरि और कोंडवीडु (गुंटूर ज़िला) जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग जीत लिए। उसकी सेनाएँ कोंडापल्ली और राजमहेंद्री तक पहुँच गईं और गजपति सेना को कृष्णा नदी के उत्तर तक पीछे हटना पड़ा। इसके बाद दोनों पक्षों में संधि हुई। परंपरा के अनुसार इस संधि के अंतर्गत प्रतापरुद्र ने अपनी पुत्री जगन्मोहिनी देवी का विवाह कृष्णदेव राय से किया और दहेज के रूप में कृष्णा नदी के दक्षिण के सभी क्षेत्रों पर अपना दावा त्याग दिया। इस संधि से दोनों राज्यों की सीमा तो निश्चित हो गई, किंतु गजपतियों का दक्षिणी साम्राज्य के बड़े भाग से संबंध टूट गया।

उत्तर में बंगाल के हुसैनशाही सुल्तानों (1494-1538 ई.) का दबाव बढ़ने लगा। सोलहवीं सदी के आरंभिक वर्षों में बंगाल की सेनाओं ने ओडिशा के भीतर तक घुसपैठ की। दूसरी ओर, दक्षिण-पश्चिम में गोलकुंडा के कुतुबशाही सुल्तान ने तेलंगाना और तटीय आंध्र की ओर बढ़ना शुरू किया। इन सब दबावों के कारण गजपतियों के हाथ से दक्षिणी साम्राज्य का बड़ा हिस्सा निकल गया और वे मुख्यतः ओडिशा और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों के शासक रह गए।

प्रतापरुद्र देव ने ढेंकानाल ज़िले की कपिलास पहाड़ी पर चंद्रशेखर मंदिर और जाजपुर ज़िले में देवी बिरजा के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उसके काल में कटक ज़िले के मंचेश्वर में धवलेश्वर मंदिर और काखड़ी के निकट बलरामपुर गाँव में सर्पेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ। उसने पुरी में जगन्नाथ मंदिर का सभामंडप भी बनवाया।

गजपति राजवंश (Gajapati Dynasty)
गजपति शासक प्रतापरुद्र देव

उंदावल्ली अभिलेख में उसे सभी कलाओं का स्वामी और चौंसठ प्रकार की विद्याओं का भंडार कहा गया है। उसके शासनकाल में भक्ति आंदोलन का प्रभाव बढ़ा और चैतन्य महाप्रभु का पुरी क्षेत्र में आगमन हुआ। इसी कालखंड में पंचसखाओं- बलराम दास, जगन्नाथ दास, अनंत दास, अच्युतानंद दास और यशोवंत दास की अमर ओड़िया रचनाओं से ओड़िया साहित्य को उच्च प्रतिष्ठा मिली। इन संतकवियों ने ओड़िया समाज में भक्ति को गहराई से स्थापित किया। 1540 ई. में प्रतापरुद्र की मृत्यु के साथ ही गजपतियों की शक्ति के गौरवशाली अध्याय का अंत हो गया।

कखरुआ देव (1540 ई.)

प्रतापरुद्र देव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कखरुआ देव गजपति वंश की गद्दी पर बैठा। उसका शासन अत्यंत अल्पकालिक रहा और 1540 ई. के केवल कुछ महीनों तक चला। वह एक कमज़ोर शासक था। उसके पास न अपने पिता जैसा अनुभव था और न ही दरबारियों पर नियंत्रण। इस स्थिति में राज्य की वास्तविक सत्ता धीरे-धीरे मंत्री गोविंद विद्याधर के हाथों में चली गई। वह चतुर और महत्त्वाकांक्षी था और उसने राजा की कमज़ोरी का पूरा लाभ उठाया। अंततः गोविंद विद्याधर ने कखरुआ को रास्ते से हटा दिया। परंपरागत विवरणों में उसकी हत्या का उल्लेख मिलता है।

कलुआ देव (1540-1541 ई.)

कखरुआ के बाद गोविंद विद्याधर ने प्रतापरुद्र के दूसरे पुत्र कलुआ देव को गद्दी पर बैठाया। वह गजपति वंश का अंतिम शासक था। उसका शासन भी एक वर्ष से कम चला। वह लगभग कठपुतली शासक था, जिस पर गोविंद विद्याधर का प्रभाव था। उसके पास न स्वतंत्र सत्ता थी, न दरबार पर नियंत्रण। अंततः गोविंद ने 1541 ई. में कलुआ देव की भी हत्या करवा दी और स्वयं राजा बन गया। गोविंद विद्याधर ने भोई वंश की स्थापना की और इसी के साथ गजपति वंश का शासन भी समाप्त हो गया।

भोई वंश भी अधिक समय तक शासन नहीं कर सका। उसके अंतिम शासकों के समय ओडिशा में आंतरिक अस्थिरता व्याप्त रही और अंततः भोई वंश की सत्ता का अंत हो गया। इसके बाद मुकुंद देव ने सत्ता सँभाली, किंतु सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के अफ़गान शासकों के सेनापति कालापहाड़ के आक्रमण (लगभग 1568 ई.) के बाद ओडिशा अफ़गानों के प्रभाव में चला गया। इसके बाद ओडिशा पर अफ़गान सुल्तानों और फिर मुगलों का प्रभाव बढ़ता गया। लगभग 1590 के दशक में अकबर के सेनापति राजा मानसिंह के अभियानों के बाद ओडिशा मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया।

गजपति साम्राज्य का विस्तार

पंद्रहवीं शताब्दी में ओडिशा के गजपति अपनी शक्ति के चरम पर थे। कपिलेंद्र देव के नेतृत्व में उन्होंने उत्तर में हुगली के निकट गंगा क्षेत्र (बंगाल) से लेकर दक्षिण में कावेरी नदी (तमिलनाडु) तक फैले विशाल साम्राज्य पर शासन किया। पूर्वी तट के बड़े हिस्से पर उनका नियंत्रण था और आंध्र प्रदेश, ओडिशा, बंगाल के कुछ भागों तथा तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र में उनका प्रभुत्व स्थापित हुआ। इस प्रकार यह साम्राज्य पूर्वी भारत की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गया। गजपति शासक वैष्णव धर्म के समर्थक और भगवान विष्णु के भक्त थे और उन्होंने विष्णु को समर्पित अनेक मंदिर बनवाए। किंतु सोलहवीं शताब्दी के आरंभ तक उन्होंने अपने दक्षिणी अधिकार-क्षेत्र का बड़ा भाग विजयनगर और गोलकुंडा के हाथों खो दिया। प्रतापरुद्र देव इस वंश का अंतिम शक्तिशाली गजपति शासक था। उसकी मृत्यु के कुछ ही समय बाद गजपति शासन समाप्त हो गया और ओडिशा की सैन्य सर्वोच्चता तथा साम्राज्यिक प्रतिष्ठा जाती रही।

सैन्य संगठन

गजपति साम्राज्य एक पूर्णतः सैन्य राज्य था, जहाँ रक्षा और विस्तार को राज्य के साथ-साथ जनता का भी दायित्व माना जाता था। सैन्य भावना समाज के विभिन्न वर्गों में समाई हुई थी। गजपति शासकों ने एक मज़बूत सैन्य व्यवस्था और क्षेत्रीय प्रशासन विकसित किया, जिसमें स्थानीय अधिकारियों और सामंतों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। राजा के पास एक विशाल स्थायी सेना थी और अधीन सामंत युद्ध के समय निश्चित संख्या में सैनिक उपलब्ध कराते थे। पाइक कहलाने वाले सैनिक-किसान खेती करते और बदले में कर-मुक्त भूमि पाते थे, किंतु युद्ध की पुकार पर शस्त्र उठाते थे। इस व्यवस्था से राज्य को बिना भारी वेतन-भार के बड़ी सेना मिल जाती थी। गंगा शासकों से मिली इस सैन्य विरासत को कपिलेंद्र देव ने और संगठित किया।

प्रमुख सैन्य उपाधियाँ

सेना और प्रशासन में अनेक पद थे, जिनमें से कई आज भी ओडिशा के उपनामों में जीवित हैं। सेनापति और चम्पति जैसे सेनानायक थे। ‘पैकराय’ घुड़सवार सेना का कमांडर होता था और ‘साहनी’ हाथी सेना का। ‘दंडपाट’ और ‘दंडसेना’ जैसे पद दंड-व्यवस्था और सैन्य संगठन से जुड़े थे, जबकि ‘पश्चिमकवाट’ और ‘उत्तरकवाट’ सीमाओं के रक्षक थे। इनके अलावा नायक, पट्टनायक, दंडनायक और गड़नायक, पात्र और महापात्र, बेहरा और दलबेहरा, जेना, प्रधान, सामल, खुंटिया, परिच्छा, पदिहारी तथा दंडपाणि जैसी उपाधियाँ भी प्रचलित थीं। इनमें से बहुत-से नाम बाद में परिवारों के उपनाम बन गए, जो आज भी ओडिशा के समाज में प्रचलित हैं।

सैन्य विभाग

कपिलेंद्र देव के समकालीन कवि सरला दास ने अपनी ओड़िया महाभारत में सेना के सात विभागों का वर्णन किया है। सबसे आगे ‘हंतकारु’ दल चलता था, जो सेना का अग्रिम अभियांत्रिक दल था। वह मार्ग की टोह लेता, जंगल साफ़ करता और रास्ते चिह्नित करता था। उसके बाद ‘अगुआनी ठाटा’ होता था, यानी आक्रमण करने वाली अग्रिम टुकड़ियाँ, जो मुख्य सेना से आगे चलती थीं। इनमें ‘धेनकिया’ (आक्रमणकारी समूह), ‘बनुआ’ या ‘धनुकी’ (तीरंदाज़) और घुड़सवार शामिल थे।

तीसरा और सबसे बड़ा भाग ‘प्रधान’ था, यानी सेना का मुख्य भाग, जहाँ सर्वाधिक सैनिक होते थे। इसमें तलवार-ढाल चलाने वाले ‘धेनकिया’, विष-बुझे तीरों और सशक्त धनुषों वाले ‘बनुआ’, चमड़े का कवच पहनने वाले और निकट-युद्ध में निपुण ‘फदिकारा’, घुड़सवार और हाथी दस्ता शामिल थे। इसके साथ ‘इटाकारा’ भी रहते थे, जो घुमुरा जैसे वाद्यों और नृत्य से सैनिकों का उत्साह बढ़ाते थे और गैर-लड़ाकू कर्मियों के प्रभारी ‘बाहुबलेंद्र’ को रिपोर्ट करते थे।

सेना का पिछला भाग ‘पछियानी ठाटा’ कहलाता था, जिसका काम पार्श्वों की सुरक्षा करना था। राजा, राजपरिवार और बड़े सेनानायकों की रक्षा के लिए ‘अंगवाला’ नामक अंगरक्षक दल होता था। ‘परिधान’ उन अधिकारियों की टुकड़ियों का नाम था, जो विजित प्रदेशों और दुर्गों के प्रशासन और रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते थे। उनका प्रमुख ‘नायक’ या ‘गड़नायक’ होता था। सातवाँ विभाग ‘प्रहरी’ था, यानी कर्तव्य पर तैनात पहरेदार, जो राज्य में सैन्य पुलिस का काम भी करते थे।

पैदल सेना की इकाइयाँ

पैदल सेना की सबसे छोटी इकाई दला थी, जिसमें 27 पाइक होते थे और जिसका नेतृत्व दलाबेहेरा करता था। इससे बड़ी इकाई भुइयाँ थी, जो 70 पाइकों की पलटन होती थी और जिसका नायक पाइकराय कहलाता था। कई भुइयाँ पलटनों को मिलाकर वाहिनी बनती थी, यानी एक ब्रिगेड, जिसका नेतृत्व वाहिनीपति करता था। सबसे ऊपर चमू थी, यानी कई वाहिनियों की रेजिमेंट, जिसकी कमान चमुपति या चम्पति के पास होती थी। इस श्रेणीबद्ध ढाँचे से आदेश नीचे तक सुगमता से पहुँचते थे, और यह आधुनिक सेनाओं की टुकड़ी-पलटन-ब्रिगेड-रेजिमेंट की व्यवस्था से काफ़ी मिलता है।

वाद्य और शस्त्र

युद्ध के समय सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए डमालु, तमाका, घुमुरा, भेरी, तुरी और रणसिंघा जैसे वाद्य बजाए जाते थे। इन वाद्यों की ध्वनि आदेश-संप्रेषण में भी काम आती थी। शस्त्रों में धनु (धनुष), सारा (बाण), असि (तलवार), कुंटा (भाला), परिघा, पट्टिसा और जथी आदि का उल्लेख मिलता है। घोड़ों, हाथियों और लोहे के औज़ारों से किलों के द्वार और दीवारें तोड़ने की युक्तियों का भी वर्णन है। हाथियों का दुर्ग-द्वार तोड़ने में उपयोग उस काल के घेराबंदी-युद्ध की विशिष्ट पहचान था।

गजपति सेना की प्रसिद्धि कई समकालीन स्रोतों में दर्ज है। मुस्लिम इतिहासकारों के ग्रंथों, जैसे बुरहान-ए-मआसिर और निज़ामुद्दीन के विवरणों में गजपतियों के विशाल हाथी-बल और लाखों पैदल सैनिकों का उल्लेख है। यद्यपि ये संख्याएँ अतिरंजित हैं, फिर भी इनसे पता चलता है कि गजपतियों का हाथी-बल पड़ोसी राज्यों की तुलना में असाधारण था। विजयनगर में रहे पुर्तगाली यात्री और इतिहास-लेखक फर्नाओ नुनेस के अनुसार प्रतापरुद्र की सेना में लगभग 13,000 हाथी और 20,000 घोड़े थे और वह एक श्रेष्ठ योद्धा था। तेलुगु ग्रंथ रायवाचकमु में कटक में गजपति सैनिकों के अभ्यास और करतबों का वर्णन मिलता है। इन विवरणों से गजपति सेना की प्रतिष्ठा स्पष्ट रूप से प्रमाणित होती है।

धर्म और संस्कृति

जगन्नाथ पंथ का उत्कर्ष

गजपति शासक वैष्णव धर्म के प्रबल अनुयायी थे और स्वयं को भगवान जगन्नाथ का सेवक मानते थे। राजा को ‘गजपति’ के साथ-साथ जगन्नाथ का आद्य सेवक (प्रथम सेवक) भी कहा जाता है। उन्होंने पुरी के जगन्नाथ मंदिर का विस्तार किया और उसे राज्य की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बना दिया। इसी काल में राजा की सेवा-विधियाँ निर्धारित हुईं, जैसे रथयात्रा में छेरा पहँरा। उनके काल में जगन्नाथ-आराधना केवल पुरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे ओडिशा में जनसाधारण की आस्था बन गई।

गजपति काल में बालेश्वर ज़िले में रायबनिया दुर्ग के निकट एक मंदिर का निर्माण हुआ, जिसमें पुरुषोत्तम देव ने भगवान जगन्नाथ और बलराम की ग्रेनाइट की दो प्रतिमाएँ स्थापित की गईं, जिनमें वे भाइयों के रूप में घोड़ों पर सवार और युद्ध-वेश में दिखाए गए हैं। परंपरा के अनुसार पुरुषोत्तम देव काँची पर विजय के स्मृति-चिह्न के रूप में उच्छिष्ट (कामदा) गणेश और गोपाल की प्रतिमाएँ लाया था। इनमें गणेश की प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थापित है, जबकि गोपाल की प्रतिमा, जो साक्षीगोपाल के नाम से प्रसिद्ध है, पुरी ज़िले के सत्यबादी (साखीगोपाल) में पूजित है।

मंदिर और स्थापत्य

गजपति शासक कला और संस्कृति के संरक्षक थे और उन्होंने मंदिर स्थापत्य को विशेष संरक्षण दिया। गजपति राजाओं ने शैव और वैष्णव परंपराओं के बीच समन्वय बनाए रखा। कपिलेंद्र देव के काल में भुवनेश्वर में शैव कपिलेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ, जो उसकी धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण है। पुरी का नरेंद्र सरोवर भी उसी के काल से संबंधित माना जाता है, जहाँ जगन्नाथ की प्रसिद्ध चंदन यात्रा मनाई जाती है।

कला, नृत्य और नाटक

गजपति काल में जगन्नाथ मंदिर नाटक, संगीत और नृत्य, विशेषकर ओडिसी का केंद्र था। मंदिर की सेवा-परंपरा में महारी (देवदासी) नृत्य और गीतगोविंद गायन के रूप में कला-परंपराएँ विकसित हुईं। जयदेव के गीतगोविंद का गायन मंदिर की नित्य सेवा का अंग बन गया। इसी मंदिर-केंद्रित परंपरा से आगे चलकर शास्त्रीय ओडिसी नृत्य का स्वरूप निखर कर सामने आया।

भाषा और साहित्य

गजपति काल में ओड़िया भाषा को राजकीय और साहित्यिक सम्मान मिला। सरला दास की ओड़िया महाभारत इसी काल की रचना है, जिसने ओड़िया को एक समृद्ध साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया। सरला दास ने संस्कृत महाभारत का केवल अनुवाद नहीं किया, बल्कि कथाओं को स्थानीय परिवेश, लोक-विश्वास और ओड़िया जनमानस के अनुरूप ढाला। बाद में पंचसखा कवियों ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

चैतन्य महाप्रभु और भक्ति आंदोलन

प्रतापरुद्र देव के काल में बंगाल के संत चैतन्य महाप्रभु पुरी आए और चैतन्य ने अपने जीवन के अंतिम लगभग 18 वर्ष वहीं बिताए। चैतन्य का कीर्तन-प्रधान वैष्णव भक्ति आंदोलन ओडिशा में बहुत लोकप्रिय हुआ। चैतन्य से प्रभावित होकर प्रतापरुद्र अध्यात्म की ओर झुकता चला गया।

गजपति साम्राज्य के पतन के कारण

सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में गजपति साम्राज्य का पतन शुरू हुआ। जो साम्राज्य कभी गंगा-हुगली क्षेत्र से लेकर कावेरी तट तक विस्तारित था, वह धीरे-धीरे सिमटता चला गया और अंततः 1541 ई. में उसका अंत हो गया। परंपरागत इतिहास-लेखन में राज्य की सैन्य भावना में गिरावट को इसका एक कारण माना जाता था, किंतु यह पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। विजयनगर की बढ़ती शक्ति, बहमनी-उत्तराधिकारी सल्तनतों का दबाव और बंगाल के सुल्तानों के आक्रमण जैसे राजनीतिक-सैन्य कारण भी उतने ही महत्त्वपूर्ण थे। इन बाहरी दबावों में आंतरिक उत्तराधिकार-विवाद और मंत्रियों की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा भी जुड़ गई। इस प्रकार यह पतन कई बाहरी और आंतरिक कारणों का परिणाम था।

पतन का पहला प्रमुख कारण विजयनगर साम्राज्य के साथ चलने वाले लगातार युद्ध थे। आंध्र प्रदेश और दक्षिणी तटीय क्षेत्रों पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए गजपतियों को दशकों तक संघर्ष करना पड़ा। इन युद्धों में भारी सैन्य और आर्थिक संसाधन खर्च हुए, जिससे साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगी। विजयनगर के शक्तिशाली शासकों के दबाव में गजपतियों के लिए दक्षिणी सीमा की रक्षा करना कठिन होता गया, और उनके हाथ से कई क्षेत्र निकल गए।

दूसरा कारण गोलकुंडा सल्तनत का बढ़ता प्रभाव था। बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद दक्कन में नई सत्ताएँ उभरीं, जिनमें गोलकुंडा की कुतुबशाही सल्तनत प्रमुख थी। यह सल्तनत दक्षिण-पश्चिम दिशा में गजपतियों के लिए नई चुनौती बन गई। इस प्रकार गजपतियों पर एक साथ दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम और उत्तर, तीनों ओर से दबाव पड़ने लगा।

तीसरा कारण आंतरिक राजनीतिक संघर्ष और कमज़ोर उत्तराधिकारी थे। कपिलेंद्र देव जैसे सक्षम शासकों के बाद सत्ता सँभालने वाले उत्तराधिकारी उतने योग्य और दूरदर्शी नहीं थे। दरबार में गुटबाज़ी और उत्तराधिकार के झगड़ों से केंद्रीय सत्ता कमज़ोर पड़ गई। जब शासक स्वयं स्थिर न हो, तो सेनापतियों और सामंतों पर उसका नियंत्रण ढीला पड़ना स्वाभाविक है, और यही गजपति साम्राज्य के साथ हुआ।

चौथा कारण क्षेत्रीय शक्तियों का उदय था। केंद्र के कमज़ोर होते ही दूर-दराज़ के सामंतों और स्थानीय शासकों को अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का अवसर मिल गया। इससे साम्राज्य की एकता टूटने लगी, और राजा का आदेश पहले जैसे प्रभावी ढंग से सभी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाता था।

इन सभी कारणों के संयुक्त प्रभाव से गजपति साम्राज्य को अपने दक्षिणी क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा खोना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक उसका प्रभाव काफ़ी घट गया, और वह केवल ओडिशा के मूल क्षेत्र तक सीमित रह गया।

इसके बाद ओडिशा पर अफ़गान शक्तियों का नियंत्रण स्थापित हुआ। यह वह दौर था जब उत्तर भारत में राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदल रहे थे। अंततः सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यह क्षेत्र मुगल साम्राज्य के अधीन आ गया, और इस प्रकार गजपति शासन की विरासत इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई।

गजपतियों की विरासत और महत्त्व

गजपति काल ओडिशा के इतिहास में सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और कलात्मक पुनर्जागरण का युग था। इस काल की विरासत के पाँच प्रमुख पक्ष हैं। पहला पक्ष ओड़िया भाषा और साहित्य का उत्कर्ष है, जिसमें सरला दास की रचनाओं ने ओड़िया भाषा को स्थायी साहित्यिक आधार दिया। दूसरा पक्ष जगन्नाथ संस्कृति की व्यापक लोकप्रियता है, जो आज भी पुरी की रथयात्रा में जीवित है। तीसरा पक्ष ओडिसी नृत्य और मंदिर-आधारित कलाओं का विकास है। चौथा पक्ष दक्षिण भारत की राजनीति में ओडिशा की निर्णायक भूमिका है, जिसने विजयनगर, बहमनी और कुतुबशाही सत्ताओं की रणनीति को प्रभावित किया। पाँचवाँ पक्ष वह सैन्य परंपरा है, जो ओडिशा के पाइक समुदाय में बनी रही और बाद के पाइक विद्रोह (1817 ई.) तक स्मृति में जीवित रही।

इस प्रकार गजपति काल में ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ हुई, जिसे प्रायः ‘ओडिशा का सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ कहा जाता है। आज भी पुरी के गजपति की उपाधि और रथयात्रा में उसकी सेवा की परंपरा इस विरासत की जीवित कड़ी है। खुर्दा राजवंश के उत्तराधिकारी आज भी यह उपाधि धारण करते हैं और रथयात्रा में छेरा पहँरा की रस्म निभाते हैं।

गजपति साम्राज्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. गजपति साम्राज्य की स्थापना किसने और कब की थी?

गजपति साम्राज्य की स्थापना कपिलेंद्र देव ने लगभग 1434-35 ई. में की थी, जब वह पूर्वी गंग वंश के अंतिम शासक भानु देव चतुर्थ का मंत्री और सेनापति था। इसे ‘सूर्यवंशी गजपति’ वंश भी कहा जाता है।

2. ‘गजपति’ का अर्थ क्या है?

‘गज’ यानी हाथी और ‘पति’ यानी स्वामी, अर्थात् ‘हाथियों का स्वामी’। हाथी उस समय सैन्य शक्ति और राजसी प्रतिष्ठा के प्रतीक थे। इसी तरह विजयनगर के शासक नरपति और बहमनी सुल्तान अश्वपति कहलाते थे।

3. गजपति साम्राज्य की सीमाएँ और राजधानी क्या थीं?

गजपति साम्राज्य अपने उत्कर्ष काल में उत्तर में गंगा-हुगली क्षेत्र से दक्षिण में कावेरी तट और तिरुचिरापल्ली तक फैला था। इसकी राजधानी कटक थी।

4. गजपति वंश के प्रमुख शासक कौन थे?

कपिलेंद्र देव (1435-1467 ई.), पुरुषोत्तम देव (1467-1497 ई.) और प्रतापरुद्र देव (1497-1540 ई.)। इनके बाद कखरुआ देव (1540 ई.) और कलुआ देव (1540-1541 ई.) अंतिम राजा थे।

5. गजपति वंश का जगन्नाथ संस्कृति और साहित्य में क्या योगदान रहा?

गजपति राजा स्वयं को जगन्नाथ का आद्य सेवक मानते थे और उन्होंने पुरी मंदिर का विस्तार किया। रथयात्रा में छेरा पहँरा की परंपरा जुड़ी। सरला दास की ओड़िया महाभारत और ओडिसी नृत्य का विकास इसी काल में हुआ।

6. गजपति साम्राज्य का पतन कैसे हुआ?

विजयनगर के कृष्णदेव राय के अभियानों (1512-1518 ई.), बंगाल और गोलकुंडा के सुल्तानों के दबाव और आंतरिक विवादों से गजपतियों की शक्ति घटी। 1540 ई. में प्रतापरुद्र की मृत्यु के बाद मंत्री गोविंद विद्याधर ने उसके दोनों पुत्रों की हत्या कर 1541 ई. में भोई वंश की स्थापना की।
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