पूँजीवाद का अभ्युदय (The Rise of Capitalism)

पूँजीवाद का अभ्युदय (The Rise of Capitalism)
पूँजीवाद का अभ्युदय: उत्पत्ति, विकास और यूरोपीय देशों में विस्तार पूँजीवाद का अर्थ और मूल […]

पूँजीवाद का अभ्युदय: उत्पत्ति, विकास और यूरोपीय देशों में विस्तार

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पूँजीवाद का अर्थ और मूल स्वभाव

पूँजीवाद एक संस्था की अपेक्षा एक प्रवृत्ति अथवा प्रकृति है। अधिकाधिक धन प्राप्त करने की कभी भी तृप्त न होने वाली इच्छा पूँजीवादी प्रकृति की मूलभूत प्रवृत्ति है और यही प्रवृत्ति पूँजीवादी व्यवस्था का मूल आधार है। उत्पादित वस्तुओं पर लाभ के माध्यम से धन अर्जित किया जाता है तथा लाभ का निर्धारण वस्तुओं के मूल्य से होता है। पूँजीवादी व्यवस्था में धन अथवा संपत्ति अर्जित करना ही अंतिम लक्ष्य होता है और धन अर्जित करने के साधनों अथवा तरीकों की अपेक्षा उसके परिणाम पर अधिक ध्यान दिया जाता है। धन अर्जित करने की प्रबल कामना को नैतिक दृष्टि से न्यायोचित ठहराया जाता है तथा इसे व्यक्ति का सद्गुण माना जाता है। धन के महत्त्व को स्थापित करने के लिए स्वतंत्रता, मुक्त बाज़ार, मुक्त व्यापार तथा स्वतंत्र विश्व जैसे अनेक प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रवृत्ति की जड़ें अत्यंत गहरी हैं और इसकी अनेक संस्थागत अभिव्यक्तियाँ हैं। इसके एक आयाम का संबंध मुद्रा, बैंकिंग, ऋण-पत्रों, विनिमय-पत्रों और बीमा आदि से था। इसके दूसरे आयाम का संबंध संविदा, कंपनियों की हिस्सेदारी, शेयर, संयुक्त पूँजी, बाज़ार, स्वामित्व, न्याय-व्यवस्था तथा उत्पादक संघों से था।

पूँजीवाद के विकास के तीन चरण

पूँजीवाद के विकास को सामान्यतः तीन चरणों में विभाजित किया जाता है। 1500 से 1776 ई. के मध्य संगठित वाणिज्यिक उद्यमों पर आधारित व्यवस्था को वाणिज्यिक पूँजीवाद अथवा वाणिज्यवाद कहा जाता है। 1776 से 1850 ई. तक का काल औद्योगिक पूँजीवाद का युग माना जाता है, जबकि 1850 ई. के बाद वित्तीय पूँजीवाद का विकास हुआ, जिसमें संयुक्त-शेयर कंपनियों तथा विदेशों में पूँजी-निवेश का विस्तार हुआ।

कुछ विद्वानों के अनुसार पूँजीवाद के अभ्युदय एवं विकास के तीन प्रमुख आधार थे- पूँजीवादी प्रवृत्ति अथवा भावना का विकास, पूँजी का संचय तथा पूँजीवादी तकनीकों एवं संस्थाओं का विकास। पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से व्यावहारिक दृष्टि से किसी भी व्यवसाय में संलग्न हो सकता है। इस अधिकार को उपक्रम की स्वतंत्रता कहा जा सकता है। जे. ई. स्वेन ने अपनी कृति ‘विश्व सभ्यता का विकास’ में लिखा है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था की विशिष्ट विशेषता पूँजीवाद है, जो वाणिज्यिक क्रांति का विकसित रूप है।

सामान्यतः पूँजीवाद धनवान एवं संपन्न व्यक्तियों अथवा उनके समूहों द्वारा विशाल स्तर पर संचालित व्यापारिक संगठन की व्यवस्था है। पूँजीपति अपनी पूँजी से कच्चा माल तथा उपकरण प्राप्त करता है और अधिकाधिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए पारिश्रमिक पर श्रमिकों को नियुक्त करता है। इस व्यवस्था में लाभ ही मूल प्रेरक तत्त्व होता है तथा समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा का प्रमुख आधार उसकी संपत्ति मानी जाती है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्यांकन उनके आंतरिक गुणों की अपेक्षा माँग और पूर्ति के सिद्धांत पर आधारित होता है। पूँजीवादी व्यवस्था बड़े औद्योगिक उद्यमों के विकास के लिए संपत्ति के सीमित व्यक्तियों के हाथों में केंद्रीकरण का समर्थन करती है।

हरमन किंडर और वर्नर हिल्गेमैन ने ‘द पेंगुइन एटलस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ में लिखा है कि वस्तु-विनिमय से मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर क्रमिक परिवर्तन धर्मयुद्धों के पश्चात् प्रारंभ हुआ तथा मुद्रा का प्रसार उत्तरी एवं मध्य इटली से दक्षिणी जर्मनी, फ़्रांस और नीदरलैंड होते हुए समस्त यूरोप में फैल गया।

वाणिज्यवाद और पूँजीवाद के उदय की अनुकूल परिस्थितियाँ

पंद्रहवीं शताब्दी से यूरोप के अनेक क्षेत्रों में हुए आर्थिक एवं राजनीतिक विकासों ने पूँजीवाद के उदय के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं। इनमें सर्वप्रथम वाणिज्यवाद का महत्त्वपूर्ण स्थान था। वाणिज्यवादी नीति के समर्थक राष्ट्रों ने व्यक्तिवाद, व्यापार, उपनिवेशों पर अधिकार तथा सोना-चाँदी के संचय को राष्ट्रीय समृद्धि का आधार माना। ये सभी विशेषताएँ परिवर्तित रूप में पूँजीवाद में भी दिखाई देती हैं।

व्यक्तिवाद का विकास निजी स्वामित्व तथा व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना से हुआ। बाद में यही व्यक्तिवाद उदारवादी व्यक्तिवाद के रूप में विकसित हुआ, जिसमें व्यक्ति ने अपने अहस्तांतरणीय अधिकारों का दावा किया तथा राज्य को व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्मित संस्था माना। व्यापार प्रारंभ में अपेक्षाकृत स्वतंत्र था, किंतु बाद में संरक्षणवादी नीति का विकास हुआ। इसके पश्चात् मिश्रित व्यापार-नीति का उदय हुआ, जिसमें मुक्त व्यापार और संरक्षणवाद दोनों का समन्वय दिखाई देता है। इस व्यवस्था में आयात-निर्यात की अपेक्षा वस्तुओं की अधिकाधिक उपलब्धता को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा।

वाणिज्यवादी युग में बहुमूल्य धातुओं तथा मसालों के व्यापार ने यूरोप के अनेक राष्ट्रों को अत्यधिक समृद्ध बनाया। इन राष्ट्रों ने नवोदित मध्यम वर्ग के सहयोग से शक्तिशाली राष्ट्रीय राजतंत्रों की स्थापना की। पूँजीवादी व्यवस्था में वस्तुओं के व्यापक विनिमय ने आर्थिक गतिविधियों को और अधिक गति प्रदान की। वित्तीय पूँजीवाद के युग में समाज के उच्च वर्ग की जीवन-शैली अत्यधिक वैभवपूर्ण हो गई, तथा अधिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से द्रव पूँजी का निवेश दूरस्थ उपनिवेशों में किया जाने लगा।

वाणिज्यवादी युग में उपनिवेशों पर अधिकार स्थापित करने की प्रक्रिया के दौरान यूरोपीय राष्ट्रों ने अनेक सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का विनाश किया। आक्रमणकारी सैनिकों और व्यापारियों ने अधिकाधिक सोना-चाँदी प्राप्त करने की लालसा में विश्व के अनेक क्षेत्रों का निर्ममता से शोषण किया। पूँजीवाद के प्रारंभिक चरण में उपनिवेशों से आयात पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए। इसके द्वितीय चरण में पूँजीवादी देशों ने औपनिवेशिक क्षेत्रों के विकास एवं सेवा का दिखावटी प्रचार किया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पूँजीवादी देशों की नीतियाँ और गतिविधियाँ साम्राज्यवाद के रूप में विकसित हुईं।

वाणिज्यवाद के अंतिम चरण में आर्थिक संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। व्यापारिक गतिविधियों में बहुमूल्य धातुओं के स्थान पर मुद्रा का व्यापक प्रयोग होने लगा। व्यापार के विस्तार और उसकी बढ़ती जटिलताओं के कारण बैंकिंग, बीमा, संयुक्त-स्टॉक कंपनियों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं का विकास हुआ, जिन्होंने मुद्रा के आदान-प्रदान और पूँजी के प्रवाह को अधिक संगठित बनाया।

वाणिज्यवाद के इन समस्त परिणामों तथा दीर्घकालीन आर्थिक विकास-क्रम के फलस्वरूप पूँजीवाद का अभ्युदय हुआ। इसकी मूल प्रवृत्ति लाभार्जन और संपत्ति-संचय थी। इसी आधार पर बाज़ार-व्यवस्था, उद्यमिता, प्रबंधकीय दक्षता, पूँजी-संचय तथा आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे सिद्धांतों एवं आदर्शों का विकास हुआ।

पूँजीवाद की विकास-प्रक्रिया और परिपक्वता

पूँजीवाद के विकास एवं परिपक्वता ने यूरोपीय राष्ट्रों में अनेक विकास-कार्यों को प्रभावित किया। सोलहवीं शताब्दी से इन राष्ट्रों ने अनुभव किया कि अतिरिक्त कृषि-उत्पादन को भी मुद्रा (धन) में परिवर्तित किया जा सकता है और उस पूँजी का कृषि-व्यवसाय में निवेश करके अधिकाधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र में भी सोलहवीं शताब्दी से उद्यमी मध्यम वर्ग ने अनुभव किया कि उत्पादन के साधनों में परिवर्तन हेतु पूँजी-निवेश अत्यंत लाभदायक है। सोलहवीं शताब्दी से प्रारंभ हुई यह प्रक्रिया अठारहवीं शताब्दी के अंत तक अपने चरम बिंदु पर पहुँच गई। अठारहवीं शताब्दी के अंत से पूर्व ही उत्पादन-संबंधी गतिविधियों में उपयोगी परिवर्तन लाने के लिए विज्ञान के अधिकाधिक प्रयोग के प्रयास किए गए। परिणामस्वरूप यूरोपीय राष्ट्र उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से कुछ दशक पूर्व ही प्रौद्योगिकीय युग में प्रवेश कर चुके थे और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही प्रौद्योगिकीय क्रांति तीव्र गति से आगे बढ़ने लगी।

इसी अवधि में कल-कारखानों की स्थापना, शहरी क्षेत्रों का विकास, जनसंख्या-वृद्धि तथा व्यवसायों में क्रांतिकारी परिवर्तन के कारण लोगों के सामाजिक जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। विकास-कार्यों तथा सामाजिक परिवर्तनों के साथ राज्य की प्रशासनिक संरचना में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। प्रारंभिक चरण में सुदृढ़ एवं शक्तिशाली राजतंत्र ही प्रशासनिक व्यवस्था के मूल आधार थे, किंतु अठारहवीं शताब्दी से संवैधानिक राजतंत्रों अथवा लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली का अभ्युदय हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से समाजवादी विचारकों ने इन समस्त विकास-प्रक्रियाओं तथा उनकी जननी पूँजीवाद की कटु आलोचना आरंभ कर दी। कार्ल मार्क्स समाजवादी आलोचकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे।

समाजवादी विचारकों की कटु आलोचनाओं के परिणामस्वरूप उन्मुक्त बाज़ार, पूँजीवाद तथा उदारवाद के समर्थकों ने अपनी नीतियों और कार्यक्षेत्र में परिवर्तन किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड में उदार सामाजिक अधिनियमों का शुभारंभ हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मनी में बिस्मार्क की सामाजिक बीमा योजना भी इसी प्रकार के उदार सामाजिक सुधारों का प्रतीक थी। इस प्रकार की विकासोन्मुख गतिविधियाँ आज भी विश्व के लगभग सभी स्वतंत्र देशों में कल्याणकारी राज्य तथा सामाजिक सुरक्षा उपायों के रूप में दिखाई देती हैं।

विश्व को आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में पूँजीवाद एक महत्त्वपूर्ण शक्ति एवं अवयव रहा है। मिल्टन फ्रीडमैन तथा शिकागो विद्यालय के अर्थशास्त्रियों ने चिली में अपने अल्पकालीन प्रयोगों तथा विश्व के विख्यात नेताओं रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर द्वारा अपने सिद्धांतों एवं आदर्शों के समर्थन को अपनी विचारधारा की सफलता का प्रमाण माना। समाजवाद के अनेक आदर्श एवं सिद्धांत पूँजीवाद के संशोधित एवं परिवर्तित स्वरूप के रूप में भी देखे जाते हैं। कट्टर वामपंथी विचारक मार्क्सवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक रहे हैं। यद्यपि पूँजीवाद की अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं, तथापि इसके भविष्य के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हैं।

पूँजीवाद का उद्भव

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था, उसके सिद्धांतों तथा आदर्शों के आधार पर यूरोप विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रभुत्व-संपन्न महाद्वीप बन गया। पूँजीवाद का सूत्रपात मध्य युग में ही हो चुका था, किंतु वह अठारहवीं शताब्दी में पूर्णतः परिपक्व हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में इसका रूप वित्तीय पूँजीवाद में परिवर्तित हो गया। उन्नीसवीं शताब्दी से पूँजीवाद अनेक नामों, जैसे पूँजीवादी युग, साम्राज्यवादी युग, संयुक्त-स्टॉक पूँजीवाद, सामूहिक पूँजीवाद तथा आधुनिक काल में नव-उपनिवेशवाद से भी संबद्ध माना जाता है।

जे. ई. स्वेन द्वारा दी गई पूँजीवाद की परिभाषा के विश्लेषण से निम्नलिखित आधारभूत तत्त्व ज्ञात होते हैं : किसी धनी एवं संपन्न व्यक्ति अथवा संयुक्त-स्टॉक कंपनी द्वारा कारखाना-पद्धति के आधार पर अनेक व्यक्तियों को नियोजित करके विशाल स्तर पर व्यापार करना; कच्चे माल की नियमित एवं सुनिश्चित उपलब्धता; आवश्यक मशीनों तथा पारिश्रमिक पर उपलब्ध श्रमिकों की व्यवस्था; और पूँजीपतियों अथवा उद्यमियों के लाभ में निरंतर वृद्धि।

पूँजीवाद के इन सभी तत्त्वों का पूर्ण विकास अठारहवीं शताब्दी में हुआ। सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक व्यावसायिक एवं व्यापारिक संघों (श्रेणियों) का पतन हो चुका था। भूस्वामियों ने अधीनस्थ कृषकों तथा किरायेदारों से अपनी आवश्यकतानुसार निःशुल्क सेवा लेना बंद कर दिया था तथा स्वतंत्र किरायेदारों से लगान प्राप्त करना और अपनी भूमि पर कृषि-कार्य के लिए पारिश्रमिक देकर कृषि-श्रमिकों को नियुक्त करना आरंभ कर दिया था। आर्थिक लाभ प्राप्त करने की इस प्रवृत्ति का ईसाई धर्माचार्यों ने भी समर्थन किया। उनका मत था कि उचित लाभ बाइबिल में निंदित और पाप घोषित सूदखोरी के समान नहीं है।

नगरों का उद्भव और पूँजीवाद का प्रारंभिक विकास

पूँजीवाद तथा पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में नगरों एवं कस्बों के उद्भव ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नगरों एवं कस्बों के निवासी परंपरागत शिल्प-संघों (श्रेणियों) के सदस्य मात्र नहीं थे, बल्कि उनमें महत्त्वाकांक्षी भू-स्वामी, व्यापारी, कुलीन, राज्य तथा गिरजाघर के अधिकारी भी सम्मिलित थे। इन लोगों ने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग अधिकाधिक निजी संपत्ति के संचय के लिए किया। नगरों के विकास के साथ भूमि के मूल्यों में भी वृद्धि हुई, और भू-स्वामियों ने ऊँचे मूल्य पर भूमि बेचकर बिना किसी विशेष उद्यम के पर्याप्त धन अर्जित किया। इटली के नगरों में सर्वप्रथम बैंकिंग-व्यवस्था का विकास हुआ। मेडिची परिवार उस समय का सर्वाधिक प्रसिद्ध बैंकिंग परिवार था। लाल गेंदों का चिह्न मेडिची परिवार का कुल-चिह्न था, जो आगे चलकर साहूकारों का सामान्य प्रतीक बन गया और बाद में पूँजीवाद के प्रतीकों में भी सम्मिलित किया जाने लगा।

उपनिवेशों का शोषण और पूँजी-संचय

यूरोपीय देशों में सोना-चाँदी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था। यूरोप के देशों की जनसंख्या भी अधिक नहीं थी, तथा प्राकृतिक संसाधनों का भी अभाव था। यूरोपवासियों ने एशिया, अफ्रीका तथा अमेरिका के देशों से संपर्क स्थापित करके इन अभावों की पूर्ति की। पूँजीपतियों ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मैक्सिको, पेरू तथा पूर्वी द्वीप-समूह की लूट, भारत, चीन और जापान जैसे सभ्य एवं सुसंस्कृत देशों तथा नए विश्व की जनजातियों के साथ असंतुलित व्यापार, करारोपण, वार्षिक कर की वसूली, तथा स्थानीय लोगों एवं दूरस्थ उपनिवेशों पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर अपार धन अर्जित किया।

इस प्रकार प्राप्त लाभ में दास-श्रम प्रणाली द्वारा और अधिक वृद्धि की गई। यह श्रम-प्रणाली अमेरिका में व्यापक रूप से प्रचलित थी। स्पेन एवं पुर्तगाल के खोजकर्ताओं ने दास-प्रथा को संगठित रूप दिया तथा नए विश्व में खानों से खनिज निकालने और विशाल बागानों में कार्य कराने के लिए दासों का उपयोग किया। स्पेन एवं पुर्तगालवासियों ने पश्चिमी द्वीप-समूह, पेरू, ब्राज़ील तथा मैक्सिको के स्थानीय निवासियों को दास बनाया। शीघ्र ही दास-प्रथा का यूरोप के अन्य देशों में भी प्रसार हो गया और बाद में इसका विस्तार अफ्रीका से लाए गए दासों के अटलांटिक व्यापार तक भी हुआ। अनेक ईसाई धर्माधिकारियों (बिशपों) ने भी दास-प्रथा का समर्थन किया। इस प्रकार गैर-यूरोपीय क्षेत्रों के संसाधनों और श्रम ने पूँजीवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

गैर-यूरोपीय देशों से प्राप्त बहुमूल्य धातुओं ने मुद्रा, बैंकिंग-प्रणाली तथा वित्तीय बाज़ारों के विकास में सहायता की। उन्होंने लाभदायक वाणिज्य एवं व्यापार को प्रोत्साहित किया, व्यक्तियों को नए उद्यमों के लिए प्रेरित किया, निर्यात तथा विदेशों में पूँजी-निवेश के लिए नए बाज़ार उपलब्ध कराए, और उपनिवेशों के विस्तार को बढ़ावा दिया। इन समस्त गतिविधियों ने समृद्ध एवं संपन्न मध्यम वर्ग के उद्भव और विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पूँजीपतियों की संपत्ति-संचय की प्रवृत्ति को भी इससे प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार वाणिज्यवाद ने पूँजीवाद के विकास की गति को तीव्र किया।

वैज्ञानिक आविष्कार और सामाजिक संरक्षण

पूँजीवाद के विकास में योगदान देने वाले उपर्युक्त प्रमुख अवयवों के अतिरिक्त यूरोप में राष्ट्रीय राजतंत्रों के संरक्षण, धर्मयुद्धों, भौगोलिक खोजों, समुद्री यात्राओं, तथा कुतुबनुमा (कम्पास), सूक्ष्मदर्शी यंत्र और जलयान-निर्माण की नई पद्धतियों जैसे वैज्ञानिक आविष्कारों ने पूँजी के संचय तथा पूँजीवादी प्रवृत्ति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण सहायता की। नए पूँजीपति राजाओं तथा धर्माधिकारियों के संरक्षण में विकसित हुए। कुलीन वर्ग ने भी उत्पादन तथा व्यापारिक गतिविधियों में पूँजी-निवेश को लाभदायक समझा, यद्यपि यह कार्य उनकी पारंपरिक प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं माना जाता था। प्रायः निर्धन कुलीन धन और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए धनी व्यापारियों की पुत्रियों से विवाह करने का प्रयास करते थे।

स्पेन और पुर्तगाल में पूँजीवाद का अभाव

स्पेन एवं पुर्तगाल, जिन्होंने दूरस्थ भौगोलिक खोजों, उपनिवेशीकरण, व्यापारिक गतिविधियों तथा दास-प्रथा के विस्तार में अग्रणी भूमिका निभाई, स्वयं प्रमुख पूँजीवादी देश नहीं बन सके। इन दोनों देशों की अधिकांश जनसंख्या कृषि-कार्य में लगी हुई थी और केवल अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाती थी। उपनिवेशों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनके पास पर्याप्त पूँजी नहीं थी। परिणामस्वरूप पूर्वी देशों की विलासिता की वस्तुओं के व्यापार की उनकी क्षमता सीमित रही। इसलिए दूरस्थ यात्राएँ करने वाले अनेक लोगों ने आवश्यक पूँजी के लिए विदेशी महाजनों की सहायता ली। इस प्रकार स्पेन और पुर्तगाल की संपत्ति पहले इटली के महाजनों तथा बाद में डच और जर्मन महाजनों के हाथों में चली गई। अतः आंतरिक आर्थिक परिस्थितियों के कारण इन दोनों देशों में पूँजीवाद का समुचित विकास नहीं हो सका।

लिस्बन तथा सैविल से आरंभ होने वाले भौगोलिक खोज-अभियानों को प्रारंभ में इटली के महाजनों ने वित्तीय सहायता प्रदान की। बाद में जर्मन तथा डच महाजनों ने इस क्षेत्र में प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया। तुर्कों की शत्रुता तथा ओटोमन साम्राज्य के विस्तार के कारण इटली के महाजनी व्यवसाय का पतन होने लगा। व्यापारिक मार्गों की असुरक्षा के कारण यूरोपीय व्यापारी वेनिस और जेनोआ की अपेक्षा लिस्बन और सैविल को अधिक महत्त्व देने लगे।

यद्यपि ओटोमन तुर्कों के विजय-अभियानों का प्रभाव भूमध्यसागरीय व्यापार पर पड़ा, फिर भी जर्मनी और नीदरलैंड के व्यापारी तथा महाजन अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुए। वे रूस, स्कैंडिनेविया तथा इंग्लैंड के साथ अपने पारंपरिक व्यापार का निरंतर विस्तार करते रहे। इसके अतिरिक्त उनके पास लोहे और ताँबे के समृद्ध खनिज-स्रोत उपलब्ध थे। इन खनिजों के आधार पर उन्होंने अपने उत्पादन में सुधार तथा विस्तार किया। चूँकि वे स्वयं व्यापक समुद्री व्यापार में संलग्न नहीं थे, इसलिए उन्हें समुद्री संघर्षों से अपेक्षाकृत कम हानि उठानी पड़ी।

एन्टवर्प: आधुनिक पूँजीवाद का प्रारंभिक केंद्र

एन्टवर्प प्राचीन एवं नवीन व्यापारिक मार्गों के संगम पर स्थित था और यह स्थिति व्यापारिक गतिविधियों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुई। प्रारंभ में आग्सबर्ग के प्रसिद्ध फुगर परिवार ने एन्टवर्प को अपनी व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया। सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैंड, नीदरलैंड तथा इटली के एक हज़ार से अधिक व्यापारी वहाँ स्थायी रूप से बस चुके थे। इसी नगर में आधुनिक पूँजीवाद की अनेक संस्थाओं का विकास हुआ। 1531 ई. में यहाँ बहुमूल्य धातुओं के संगठित बाज़ार (स्टॉक एक्सचेंज) की स्थापना हुई तथा सट्टा-व्यवहार का भी विकास हुआ। लॉटरी व्यवसाय का विस्तार हुआ, जीवन बीमा का शुभारंभ हुआ तथा स्थल एवं समुद्री व्यापार से संबंधित जहाज़ों और व्यापारिक वस्तुओं का प्राकृतिक आपदाओं एवं दुर्घटनाओं के विरुद्ध बीमा किया जाने लगा। इस प्रकार एन्टवर्प बैंकिंग एवं वित्तीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।

लंदन: इंग्लैंड की वित्तीय राजधानी

इंग्लैंड में लंदन वित्तीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। लंदन में लोम्बार्डी की बैंकिंग परंपरा के प्रभाव के कारण आज भी लोम्बार्ड स्ट्रीट बैंकिंग गतिविधियों के ऐतिहासिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। प्रारंभ में साहूकार बेंचों पर बैठकर धन का लेन-देन करते थे, जिनसे आगे चलकर ‘बैंक’ शब्द का विकास हुआ। सोलहवीं शताब्दी में लंदन मुख्यतः वस्त्र-व्यापार के कारण पूँजीपतियों का प्रमुख केंद्र बन गया। ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धन लोग अपने घरों में सूत कातते थे, जबकि नगरों एवं कस्बों में वस्त्र बुने जाते थे। इन वस्त्रों का समुद्री मार्ग से अन्य देशों को निर्यात किया जाता था। निरंतर विकसित होते वस्त्र-व्यापार पर लंदन ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। तत्कालीन लंदन के जनजीवन का वर्णन करते हुए एक विद्वान ने लिखा है कि सामान से लदे हुए घोड़ों के लंबे काफ़िले, जिनकी पीठ पर कपड़ों की गाँठें लदी रहती थीं, निरंतर समस्त इंग्लैंड में घूमते रहते थे और अंग्रेज़ी जीवन का आर्थिक तानाबाना बुन रहे थे। दूरस्थ क्षेत्रों तथा विभिन्न वर्गों के लोग मिलकर सुदृढ़ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे थे।

इस प्रकार स्पष्ट है कि यूरोप में पूँजीवाद के अभ्युदय एवं विकास के लिए अनेक शक्तियाँ, अवयव तथा घटनाएँ एक साथ कार्य कर रही थीं। यूरोप के प्रत्येक देश में ये सभी कारण समान रूप से उपस्थित नहीं थे, इसलिए प्रत्येक देश में पूँजीवाद का विकास भिन्न-भिन्न स्तरों और चरणों में हुआ।

इंग्लैंड में पूँजीवाद का विकास

इंग्लैंड में पूँजीवाद के विकास के लिए आवश्यक लगभग सभी तत्त्वों एवं अवयवों का परस्पर प्रभाव विद्यमान था, अतः वहाँ पूँजीवाद का विकास स्वाभाविक रूप से हुआ। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक प्रसिद्ध ‘गुलाबों का युद्ध’ में लंकास्टर तथा यॉर्क के कुलीन परिवारों के मध्य भीषण एवं विनाशकारी संघर्ष हुए। 1455 ई. में सेंट एल्बन्स के युद्ध से इसका आरंभ हुआ तथा 1485 ई. में बोसवर्थ के युद्ध के साथ इसका अंत हुआ। इन सामंती पारिवारिक संघर्षों ने इंग्लैंड को अत्यधिक क्षति पहुँचाई तथा कुलीन वर्ग की शक्ति को कमज़ोर कर दिया।

1485 ई. में ट्यूडर वंश के सत्ता में आने के बाद इंग्लैंड में एक सुदृढ़ एवं शक्तिशाली राजतंत्र की स्थापना हुई। इस वंश के शासकों ने तत्कालीन वाणिज्यवादियों की गतिविधियों का पूर्ण समर्थन किया तथा उन्हें हर संभव प्रोत्साहन दिया। परिणामस्वरूप इंग्लैंड में धीरे-धीरे धन एवं संपत्ति-संचय की प्रवृत्ति का विकास हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ अतिनैतिकतावादी (कट्टर धार्मिक), जिन्हें प्यूरिटन कहा जाता है, ने भी पूँजीवाद को निश्चित स्वरूप प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सत्रहवीं शताब्दी में प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों और स्टुअर्ट वंश के राजतंत्र के मध्य संघर्ष हुआ, जिसका अंत इसी वंश के शासक चार्ल्स प्रथम की हत्या के साथ हुआ। इसके पश्चात् प्यूरिटनों ने गणतंत्रात्मक शासन की स्थापना की, किंतु लगभग ग्यारह वर्षों के अल्पकालीन शासन के बाद गणतंत्र का अंत हो गया। उत्तर-प्यूरिटन युग के संबंध में यह कहा गया है कि यदि इंग्लैंड में कोई पंसारी अथवा कसाई पूर्णतः ईमानदार था, तो वह प्रायः क्रॉमवेल की सेना का पूर्व सैनिक होता था। इस दृष्टांत का अभिप्राय केवल इतना है कि परिपक्व पूँजीवाद के विकास के लिए व्यापारिक गतिविधियों में ईमानदारी एक आवश्यक तत्त्व मानी जाती थी।

अनेक अन्य घटनाओं ने भी इंग्लैंड में पूँजीवाद के विकास को प्रोत्साहित किया। ट्यूडर काल में लंदन वित्तीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया और 1688 ई. के बाद बैंकिंग-व्यवस्था को विधिक आधार प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त इंग्लैंड का अनेक उपनिवेशों पर अधिकार स्थापित हो गया। परिणामस्वरूप वाणिज्यवादियों के निर्देशन में व्यापारिक गतिविधियों को व्यापक प्रोत्साहन मिला। इंग्लैंड एक द्वीपीय देश होने के कारण उसकी भौगोलिक स्थिति अत्यंत अनुकूल थी। यूरोप के अन्य देशों में तीस वर्षीय युद्ध तथा अनेक राष्ट्रवादी युद्ध हुए, जिनमें उनकी शक्ति एवं संपत्ति का व्यापक विनाश हुआ, जबकि इंग्लैंड इन युद्धों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा। जहाँ इन युद्धों ने यूरोपीय देशों में पूँजीवाद के विकास को गंभीर आघात पहुँचाया, वहीं इंग्लैंड बिना किसी बड़े व्यवधान के पूँजीवाद के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहा।

1588 ई. में एक भीषण तूफ़ान के कारण स्पेन की नौसेना को भारी क्षति पहुँची। यह घटना इंग्लैंड में पूँजीवाद के विकास के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुई। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक विज्ञान तथा कृषि के क्षेत्र में हुए परिवर्तनों ने औद्योगीकरण को प्रोत्साहित किया और पूँजीवाद के विकास को गति प्रदान की। सोलहवीं शताब्दी में विकसित व्यक्तिवाद एवं संपत्ति-संचय की प्रवृत्ति ने साहसी एवं उत्साही व्यापारियों तथा पूँजीपतियों को नए उद्यमों के लिए प्रेरित किया। उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक कारखाना-व्यवस्था के विकास में श्रमिकों एवं शिल्पकारों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। कुशल कारीगरों एवं शिल्पकारों ने उत्पादन-प्रक्रिया में अनेक सुधार किए, जिसके परिणामस्वरूप अनेक मशीनों का आविष्कार हुआ तथा कारखानों की स्थापना हुई।

सत्रहवीं शताब्दी में व्यक्तिगत उत्साह, महत्त्वाकांक्षा, साहस, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रति बढ़ती रुचि ने वैज्ञानिक जगत में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किए। इस काल में निरंकुश राजतंत्र तथा धर्माधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त होने की मनुष्य की प्रबल आकांक्षा ने उद्यम की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया। इसके अतिरिक्त अठारहवीं शताब्दी में कृषि के क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी परिवर्तनों ने उद्योगों की निरंतर प्रगति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

अठारहवीं शताब्दी के अंत तक (1800 ई. से पूर्व) इंग्लैंड में राष्ट्रीय मुद्रा-व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों पर राज्य का नियमन, बीमा-प्रणाली तथा राष्ट्रीय ऋणों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय बैंक जैसी संस्थाओं का विकास हो चुका था। सरकार के वित्तीय सहयोगी के रूप में राष्ट्रीय बैंक ने पूँजीवाद की संस्थागत संरचना को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी तक इंग्लैंड एक पूर्णतः विकसित पूँजीवादी राज्य बन चुका था।

विशाल उद्योगों की स्थापना, व्यक्तिगत संपत्ति की पवित्रता एवं वैधता में विश्वास, अहस्तक्षेप की नीति के माध्यम से व्यक्तिगत लाभ को प्रोत्साहन, विदेशों में व्यापारिक विस्तार के लिए राज्य द्वारा मुक्त व्यापार की नीति, बैंकिंग-व्यवस्था का विकास, संयुक्त-पूँजी कंपनियों की स्थापना, विनिमय-पत्रों, शेयर बाज़ार तथा पूँजीवादी व्यवस्था के अन्य सभी संस्थागत तत्त्वों के विकास के परिणामस्वरूप उन्नीसवीं शताब्दी तक इंग्लैंड यूरोप का प्रमुख पूँजीवादी राष्ट्र बन गया। उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड का पूँजीवाद वित्तीय पूँजीवाद अथवा पूँजीवादी साम्राज्यवाद के रूप में विकसित होकर तत्कालीन राजनीति से घनिष्ठ रूप से संबद्ध हो गया।

फ़्रांस में पूँजीवाद का अपेक्षाकृत धीमा विकास

यूरोप के अन्य प्रमुख देशों में फ़्रांस में सत्रहवीं शताब्दी के दौरान इंग्लैंड के प्यूरिटनों तथा जर्मनी के कैल्विन-मतावलंबियों के समान उदात्त नैतिक एवं कट्टर धार्मिक भावनाओं, आदर्शों एवं सिद्धांतों से प्रेरित ह्यूगेनॉट रहते थे। ह्यूगेनॉट फ़्रांस के प्रोटेस्टेंट धर्मानुयायी थे, जो जॉन कैल्विन (1509–1564 ई.) के सिद्धांतों में आस्था रखते थे। धार्मिक उत्पीड़न के कारण उन्हें यूरोप के अन्य देशों में पलायन करना पड़ा। इसके अतिरिक्त फ़्रांस अनेक महाद्वीपीय युद्धों में भी उलझा रहा। परिणामस्वरूप वहाँ इंग्लैंड के समान पूँजीवाद का सुदृढ़ एवं व्यापक विकास नहीं हो सका। पूँजीवाद पर आधारित विशाल उद्योगों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया। शिल्प-संघ (गिल्ड) पूर्ववत् विद्यमान रहे, और पुटिंग-आउट प्रणाली भी लंबे समय तक प्रचलित रही।

फ़्रांस के श्रमिक स्वभावतः ग्रामीण जीवन से संतुष्ट थे। कारखानों में कार्य करने वाले अनेक श्रमिक हठी एवं अनुशासनहीन माने जाते थे तथा उनकी प्रौद्योगिकीय दक्षता भी सामान्य स्तर की थी। लगभग तीन-चौथाई औद्योगिक श्रमिकों का कृषि से संबंध बना हुआ था। भू-स्वामित्व की व्यवस्था के कारण फ़्रांसीसी श्रमिक अपनी भूमि से विशेष लगाव रखते थे, इसलिए वे कृषि से पूर्णतः संबंध-विच्छेद कर केवल औद्योगिक श्रमिक का जीवन अपनाने के इच्छुक नहीं थे। इस कारण उद्योगों को पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध नहीं हो पाते थे। इसके अतिरिक्त फ़्रांस ने अपने प्रचुर लौह-अयस्क संसाधनों के समुचित उपयोग के लिए आवश्यक रेलवे नेटवर्क का पर्याप्त विकास नहीं किया। उद्योगों के विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप आर्थिक नीतियाँ भी प्रभावी रूप से लागू नहीं की गईं। साथ ही उद्योगों के लिए आवश्यक कोयले की भी पर्याप्त उपलब्धता नहीं थी।

1789 से 1871 ई. तक फ़्रांस क्रांति के कारण राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त रहा। पूँजी-निवेश आर्थिक विकास का मूल आधार था, किंतु राजनीतिक अस्थिरता के कारण व्यापारियों में व्याप्त अविश्वास ने पूँजी-निवेश को बाधित किया। इस प्रकार राजनीतिक अस्थिरता फ़्रांस में पूँजीवाद के विकास की प्रमुख बाधा बनी रही।

1789 ई. से पूर्व की दोषपूर्ण कर-व्यवस्था ने पूँजी-संचय की प्रवृत्ति को गंभीर आघात पहुँचाया। बैंकिंग-व्यवस्था भी सुव्यवस्थित नहीं थी। 1847–48 ई. के आर्थिक संकट के दौरान बैंकों ने छूट तथा भुगतान बंद कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप अनेक व्यापारिक परिवार आर्थिक रूप से नष्ट हो गए। यद्यपि पूँजीवाद की संस्थागत संरचना से संबंधित कुछ क्षेत्रों, जैसे वचन-पत्रों तथा कंपनियों में निष्क्रिय भागीदारी में फ़्रांस अग्रणी रहा। सार्वजनिक ऋण के क्षेत्र में भी प्रारंभिक काल में उसका प्रमुख स्थान था। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी में घरेलू पूँजी का बड़ा भाग मैक्सिको तथा इंडो-चीन में निवेश कर दिया गया। इस प्रकार फ़्रांस में पूँजीवाद की संस्थागत संरचना भी पूर्णतः संतोषजनक नहीं थी।

यद्यपि फ़्रांस में पूँजीवाद अपेक्षाकृत अव्यवस्थित, दुर्बल एवं बिखरा हुआ था तथा उद्योगों के विकास में अधिक समय लगा, फिर भी उसने उत्कृष्ट एवं परिष्कृत औद्योगिक उत्पादों के माध्यम से पूँजीवादी औद्योगिक युग में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नवीनता और उत्कृष्ट गुणवत्ता के इच्छुक उपभोक्ता फ़्रांसीसी उत्पादों को विशेष महत्त्व देते थे। फ़्रांस के रेशमी, ऊनी एवं सूती वस्त्र, महिलाओं के आकर्षक परिधान, उत्कृष्ट मदिराएँ, इत्र, सुगंधित पदार्थ तथा परिष्कृत हस्तशिल्प इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ थीं। ये उत्पाद फ़्रांसीसी समाज की सांस्कृतिक अभिरुचि एवं सौंदर्यबोध के प्रतीक थे। उनका मूल्यांकन केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं किया जा सकता है। आधुनिक फ़्रांस के वैमानिकी तथा परमाणु उद्योग यह प्रमाणित करते हैं कि वहाँ आविष्कार-क्षमता, तकनीकी दक्षता तथा यांत्रिक कौशल का अभाव कभी नहीं था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने बड़े पैमाने पर हथियार-निर्माण की अनेक तकनीकों का ज्ञान फ़्रांस से प्राप्त किया। अमेरिका के प्रारंभिक अभियंत्रिकी विद्यालयों में प्रयुक्त अनेक पाठ्य-पुस्तकें फ़्रांसीसी ग्रंथों का अनुवाद थीं।

जर्मनी में पूँजीवाद का विकास

जर्मनी में पूँजीवाद के विकास का इतिहास भी रोचक है। राजनीतिक दृष्टि से अनेक राज्यों में विभाजित होने के कारण वहाँ पूँजीवाद के विकास में गंभीर बाधाएँ थीं। पूँजीवाद के विकास के लिए आवश्यक प्रवृत्तियों का उद्भव कैल्विन-मतावलंबियों के आगमन तथा जर्मनी के कुछ राजवंशों से उनके घनिष्ठ संपर्क के बाद हुआ। तीस वर्षीय युद्ध के दौरान जर्मनी को अत्यधिक विनाश का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद लंबे समय तक ऑस्ट्रिया का प्रभाव जर्मनी पर बना रहा। नेपोलियन द्वारा जर्मनी के विभिन्न क्षेत्रों की विजय ने जर्मन जनता में सुप्त राष्ट्रवाद की भावना को जागृत किया। परिणामस्वरूप जोलवेराइन (सीमा-शुल्क संघ) की स्थापना ने आंतरिक सीमा-शुल्क संबंधी बाधाओं को समाप्त कर पूँजीवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

फ़्रांस में हेनरी चतुर्थ के शासनकाल में आंतरिक सीमा-शुल्क की बाधाओं को समाप्त कर दिया गया था, किंतु बाद में वे पुनः लागू हो गईं, जिससे वस्तुओं के निर्बाध आवागमन में बाधा उत्पन्न हुई। 1789 ई. की फ़्रांसीसी क्रांति के बाद इन बाधाओं को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया गया। इसके विपरीत इंग्लैंड में ट्यूडर वंश के शासनकाल से ही आंतरिक व्यापारिक बाधाएँ समाप्त कर दी गई थीं। कपड़ा व्यापार ने पूरे इंग्लैंड को एक आर्थिक इकाई में बाँध दिया था। ग्रामीण क्षेत्र, कस्बे, बंदरगाह तथा लंदन एक संगठित व्यापारिक तंत्र के अभिन्न अंग बन चुके थे।

आग्सबर्ग ने कुछ समय तक जर्मनी के प्रमुख बैंकिंग केंद्र के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आग्सबर्ग के प्रसिद्ध फुगर परिवार ने जर्मनी में बैंकिंग-व्यवस्था के विकास का नेतृत्व किया। 1871 ई. में जर्मनी के एकीकरण के बाद औद्योगीकरण ने तीव्र गति पकड़ी। नई जर्मन सरकार ने देश में तीव्र औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया तथा संरक्षणवादी नीति अपनाकर घरेलू उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

जर्मनी के तीव्र औद्योगिक विकास के कारण उसने पूँजीवाद के क्रमिक विकास के अनेक चरणों को लगभग छोड़ते हुए सीधे विकसित वित्तीय पूँजीवाद का रूप ग्रहण किया। वहाँ पूँजी-संचय, लघु-स्तरीय निवेश और क्रमिक औद्योगिक विस्तार जैसे चरण अपेक्षाकृत कम महत्त्वपूर्ण रहे। उत्पादक संघों (कार्टेलों) के विकास के कारण जर्मनी ने शीघ्र ही वित्तीय पूँजीवाद को विकसित किया, जिससे पूँजी का तीव्र संचय हुआ। पूँजीवाद की संस्थागत संरचना की दृष्टि से जर्मनी ने अग्नि-बीमा व्यवस्था के विकास में भी यूरोपीय देशों का नेतृत्व किया।

इसी प्रकार स्पेन और पुर्तगाल को छोड़कर यूरोप के अन्य देशों में भी पूँजीवाद का विकास अपेक्षाकृत धीमी गति से हुआ। अधिकांश देशों में राजनीतिक अस्थिरता, अविकसित एवं अपर्याप्त व्यापारिक गतिविधियाँ तथा निरंकुश राजतंत्र पूँजीवाद के विकास में प्रमुख बाधाएँ थे। स्पेन एवं पुर्तगाल में पूँजीवाद के उद्भव एवं विकास के लिए आवश्यक मूलभूत भावना, उत्साह तथा साहस का अभाव था। वहाँ के समाज में प्यूरिटनों अथवा कैल्विन-मतावलंबियों की भाँति यह विश्वास विकसित नहीं हो सका कि ईश्वर की कृपा से भौतिक समृद्धि प्राप्त करना भी एक नैतिक एवं उचित उद्देश्य हो सकता है।

पूँजीवाद एवं कृषि क्रांति

पूँजीवाद का आरंभ सोलहवीं शताब्दी से कृषि क्षेत्र में घटित परिवर्तनों से घनिष्ठ रूप से संबंधित है। पूँजीवाद और कृषि क्रांति की यात्रा सोलहवीं शताब्दी से साथ-साथ प्रारंभ हुई, तथा अठारहवीं शताब्दी में दोनों अपने विकास के चरम बिंदु पर पहुँचे। सेम और मटर जैसी दलहनी फ़सलों की खेती से भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी, जिससे उसकी उर्वरता में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप नकदी फ़सलों का उत्पादन आरंभ हुआ और आत्मनिर्भर जागीरें धीरे-धीरे उत्पादन-इकाइयों में परिवर्तित होने लगीं। ये इकाइयाँ अपनी उपज के विक्रय पर निर्भर रहने लगीं। तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दियों में अतिरिक्त कृषि-उत्पादन को निकटवर्ती नगरों एवं कस्बों में बेचा जाने लगा। इससे वाणिज्यिक एवं व्यापारिक गतिविधियों का निरंतर विस्तार हुआ तथा पूँजी अथवा संपत्ति-संचय की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला।

कृषि-कार्यों में प्रयुक्त औज़ारों एवं उपकरणों में भी परिवर्तन किए गए। मानव-शक्ति के स्थान पर धीरे-धीरे यांत्रिक तथा बाद में वाष्प-शक्ति का उपयोग बढ़ने लगा। क्रैंक तथा धातु-गढ़ाई संबंधी तकनीकों के विकास ने यूरोप के धातुकर्म उद्योग में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए, जिनका औद्योगिक उत्पादन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। मुद्रण कला के आविष्कार ने नई कृषि-तकनीकों के तीव्र एवं व्यापक प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि-कार्यों में कृषि-दासों के स्थान पर वेतनभोगी श्रमिकों को नियुक्त किया जाने लगा। स्वामी और दास के पारंपरिक संबंध शिथिल हुए तथा धीरे-धीरे मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार होने लगा।

चौदहवीं शताब्दी का जनसंख्या-संकट और कृषि-पुनर्गठन

चौदहवीं शताब्दी में जनसंख्या की दृष्टि से भी यूरोप में भीषण परिवर्तन हुए। लगातार कई वर्षों तक प्राकृतिक आपदाओं के कारण फ़सलें नष्ट होती रहीं। इसके बाद फैली भयंकर महामारी (ब्लैक डेथ) ने असंख्य लोगों का जीवन समाप्त कर दिया। परिणामस्वरूप यूरोप की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या नष्ट हो गई तथा कुछ क्षेत्रों में एक-तिहाई से लेकर आधी जनसंख्या तक समाप्त हो गई। इस जनसंख्या-संकट के बाद 1358 ई. में फ़्रांस तथा 1381 ई. में इंग्लैंड के कृषकों ने हिंसात्मक विद्रोह किए। इन विद्रोहों में भारी जनहानि हुई, जिससे श्रमिकों का अभाव उत्पन्न हो गया। चौदहवीं शताब्दी की इन विनाशकारी घटनाओं ने सोलहवीं शताब्दी में कृषि-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया। बाज़ारों के विकास तथा परिवहन के साधनों में सुधार ने मध्यकालीन आत्मनिर्भर जागीरों का स्वरूप बदल दिया। फलस्वरूप सोलहवीं शताब्दी में कृषकों ने बाज़ार की माँग के अनुसार अनाज, ऊन, मांस तथा दुग्ध-उत्पादों के उत्पादन पर विशेष बल देना प्रारंभ किया।

फ़सलों से प्राप्त नकद आय ने अनेक भू-स्वामियों को अपनी आय के स्रोत बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। कृषि-उत्पादों के मूल्यों में तीव्र वृद्धि हुई, जबकि भू-स्वामियों को प्राप्त पारंपरिक करों एवं किरायों का वास्तविक आर्थिक मूल्य घटने लगा। अधिक आय प्राप्त करने की इच्छा ने उन्हें पारंपरिक कृषि-पद्धतियों को छोड़कर नई तकनीकों एवं साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। श्रमिकों की कमी के कारण भू-स्वामियों ने चरागाहों के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने सार्वजनिक चरागाहों तथा मुक्त भूमि पर अधिकार स्थापित कर चारों ओर बाड़ लगवाई (बाड़ाबंदी आंदोलन) और उन्हें भेड़ों के चरागाह अथवा विशाल कृषि-इकाइयों में परिवर्तित कर दिया। साथ ही कृषि की संशोधित, परिष्कृत एवं उन्नत पद्धतियों को अपनाया। इस प्रकार कृषि के पूँजीवादी स्वरूप का विकास प्रारंभ हुआ।

हॉलैंड से आरंभ हुई कृषि क्रांति

सर्वप्रथम हॉलैंड में कृषि क्रांति का शुभारंभ हुआ। डच लोगों ने कृषि भूमि की समुचित सिंचाई एवं जल-निकास की अत्यंत विकसित व्यवस्था की, जिससे नई फ़सलों का उत्पादन संभव हुआ तथा चारे की उपलब्धता भी बढ़ी। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में हॉलैंड के व्यापारी कृषि भूमि से अधिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा से उसमें पूँजी निवेश करने लगे। उन्होंने अतिरिक्त वर्षा-जल निकालने के लिए पवनचक्कियों की स्थापना में निवेश किया। हॉलैंड की इस उन्नत जल-निकास एवं सिंचाई-व्यवस्था ने कृषि-उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की और लाभांश भी बढ़ाया। कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी इस प्रणाली को बाद में यूरोप के अन्य देशों ने भी धीरे-धीरे अपनाया।

सोलहवीं शताब्दी में कृषि-क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी परिवर्तन व्यापार, वाणिज्य तथा नगरों के विकास से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे। व्यापारिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों से विकसित होते नगरों की बढ़ती माँग ने कृषकों को व्यावसायिक एवं पूँजीवादी कृषि अपनाने के लिए प्रेरित किया। धनी एवं संपन्न कृषक कृषि के साथ-साथ व्यापार एवं वाणिज्य में भी पूँजी निवेश करके अधिकाधिक लाभ अर्जित करने के इच्छुक थे। व्यापक मुद्रा-प्रचलन तथा तीव्र गति से विकसित बैंकिंग-व्यवस्था ने कृषि, व्यापार और वाणिज्य — तीनों के विकास को महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन प्रदान किया।

अठारहवीं शताब्दी की द्वितीय कृषि क्रांति

सोलहवीं शताब्दी की भाँति अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भी वस्तुओं के मूल्यों में पुनः वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप कृषि-क्षेत्र में एक बार फिर व्यापक परिवर्तन हुए। इस बार कृषि-सुधारों का सूत्रपात इंग्लैंड में हुआ। लॉर्ड टाउनशेंड ने फ़सलों की क्रमावर्तन पद्धति का प्रचलन किया। अठारहवीं शताब्दी में अधिकांश कृषकों ने जेथ्रो टल की सीड ड्रिल तथा उन्नत कृषि-पद्धतियों को अपनाया। इन उन्नत कृषि-विधियों से खर-पतवार एवं हानिकारक कीटों का नियंत्रण होता था तथा भूमि की नमी भी सुरक्षित रहती थी। अधिकांश कृषि-सुधारों के लिए पर्याप्त पूँजी की आवश्यकता थी। धनी एवं संपन्न वर्ग सफल वाणिज्यिक गतिविधियों से प्रेरित होकर कृषि-उत्पादन में वृद्धि के लिए उत्सुक था। अतः व्यापारियों ने लाभदायक कृषि-उत्पादन के लिए पूँजी निवेश करने में कोई संकोच नहीं किया।

यूरोप के अन्य देशों ने भी ब्रिटेन में हुए कृषि-सुधारों एवं विकास-कार्यों को अपनाया। यूरोपीय देशों के कृषक उन्नत कृषि-पद्धतियों का अध्ययन करने तथा उचित परामर्श प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड आने लगे। उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप के अनेक देशों में कृषि-व्यवस्था का व्यापक रूपांतरण हुआ। फ़्रांस ने 1789 ई. की क्रांति के बाद अनेक नवीन कृषि-पद्धतियों को अपनाया। इसी प्रकार जर्मनी ने भी उन्नीसवीं शताब्दी में कृषि-सुधारों एवं नई कृषि-तकनीकों को स्वीकार किया।

मशीनीकरण और कृषि क्रांति का आधुनिक रूप

1800 ई. के बाद मशीनों के व्यापक विकास के साथ परंपरागत कृषि-पद्धतियों के स्थान पर वैज्ञानिक कृषि-पद्धतियों का प्रयोग आरंभ हुआ। हल-बैल द्वारा खेती की अपेक्षा कृषि-मशीनों का उपयोग बढ़ा, तथा रासायनिक उर्वरकों का व्यापक प्रयोग होने लगा। कृषि-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका, तथा रासायनिक उर्वरकों के विकास में जर्मनी ने अग्रणी भूमिका निभाई।

कृषि क्रांति ने बैंकिंग-व्यवस्था के विकास तथा उसके व्यापक प्रसार को भी प्रोत्साहित किया। प्राचीन काल में सभ्यता और संस्कृति का विकास कृषि के आधार पर ही हुआ था, किंतु उसके विस्तार की गति लंबे समय तक सीमित रही। कृषि क्रांति ने सभ्यता एवं संस्कृति के तीव्र विकास के लिए एक शक्तिशाली प्रेरक के रूप में कार्य किया। इसने यह सिद्ध कर दिया कि उन्नत कृषि-पद्धतियों के माध्यम से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण सरलता से किया जा सकता है।

औद्योगिक क्रांति के समय हुई तीव्र जनसंख्या-वृद्धि का भरण-पोषण कृषि-उत्पादन में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के कारण ही संभव हो सका। किंतु विडंबना यह रही कि उन्नीसवीं शताब्दी में ही आर्थिक विकास में कृषि की प्राथमिकता धीरे-धीरे कम होने लगी, और औद्योगिक तथा वित्तीय पूँजीवाद ने अर्थव्यवस्था के केंद्र का स्थान ले लिया। इस प्रकार पूँजीवाद का यह संपूर्ण विकास-क्रम- वाणिज्यवाद से औद्योगिक पूँजीवाद और फिर वित्तीय पूँजीवाद तक- न केवल यूरोप की आर्थिक संरचना को, बल्कि संपूर्ण आधुनिक विश्व की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा को भी गहराई से प्रभावित करने वाला सिद्ध हुआ।

पूँजीवाद का अभ्युदय से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. पूँजीवाद का अभ्युदय क्या है?

पूँजीवाद का अभ्युदय उस ऐतिहासिक प्रक्रिया को कहा जाता है, जिसमें मध्यकालीन सामंती व्यवस्था के स्थान पर निजी संपत्ति, लाभ, बाजार, पूँजी निवेश और स्वतंत्र व्यापार पर आधारित आर्थिक व्यवस्था का विकास हुआ। इसका प्रारंभ यूरोप में मध्यकाल के उत्तरार्ध में हुआ और सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच यह प्रक्रिया अधिक तीव्र हुई।

2. पूँजीवाद के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?

पूँजीवाद के उदय के प्रमुख कारणों में व्यापार और वाणिज्य का विस्तार, नगरों का विकास, व्यापारिक वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) का उदय, भौगोलिक खोजें, उपनिवेशवाद, बैंकिंग एवं ऋण व्यवस्था का विकास, मुद्रा अर्थव्यवस्था का विस्तार और उत्पादन की नई तकनीकों का विकास शामिल थे।

3. भौगोलिक खोजों ने पूँजीवाद के विकास में कैसे योगदान दिया?

पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी की भौगोलिक खोजों से यूरोपीय व्यापार का विस्तार एशिया, अफ्रीका और अमेरिका तक हुआ। नए समुद्री मार्गों तथा उपनिवेशों के कारण सोना-चाँदी, मसाले और अन्य वस्तुओं का व्यापार बढ़ा। इससे यूरोपीय व्यापारियों और कंपनियों के पास पूँजी का संचय हुआ तथा व्यापारिक पूँजीवाद को प्रोत्साहन मिला।

4. बुर्जुआ वर्ग ने पूँजीवाद के उदय में क्या भूमिका निभाई?

बुर्जुआ वर्ग में मुख्यतः व्यापारी, साहूकार, बैंकर्स और बाद में उद्योगपति शामिल थे। इस वर्ग ने व्यापार, बैंकिंग, निवेश और उत्पादन में पूँजी लगाई। सामंती प्रतिबंधों के कमजोर होने तथा बाजार के विस्तार के साथ इस वर्ग का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ा, जिसने पूँजीवादी व्यवस्था के विकास को गति दी।

5. औद्योगिक क्रांति और पूँजीवाद के बीच क्या संबंध था?

पूँजीवाद का विकास औद्योगिक क्रांति से पहले ही प्रारंभ हो चुका था, लेकिन 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्रांति ने इसे नई दिशा और गति दी। मशीनों, कारखाना-व्यवस्था, बड़े पैमाने के उत्पादन, मजदूरी श्रम और बाजार के विस्तार ने औद्योगिक पूँजीवाद को मजबूत किया। इस प्रकार व्यापारिक पूँजीवाद से औद्योगिक पूँजीवाद की ओर संक्रमण हुआ।
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