एलोरा की गुफाएँ : इतिहास, स्थापत्य, मूर्तिकला और धार्मिक कला
परिचय
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व नाम औरंगाबाद) जिले के निकट स्थित एलोरा की गुफाएँ भारतीय शैल-कट वास्तुकला, मूर्तिकला और धार्मिक-सांस्कृतिक समन्वय का अद्वितीय उदाहरण हैं। मराठी में इन्हें ‘वेरूळ लेणी’ कहा जाता है। यह स्थल चरणाद्रि पहाड़ियों की ठोस बेसाल्ट चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं, मंदिरों और मठों का विशाल समूह है, जो लगभग दो किलोमीटर लंबी पहाड़ी-पंक्ति में फैला हुआ है। यहाँ सौ से अधिक शैल-कटी संरचनाएँ बताई जाती हैं, जिनमें से 34 गुफाएँ क्रमांकित हैं। इन 34 गुफाओं में बौद्ध, ब्राह्मणीय/हिंदू और जैन, तीनों परंपराओं से संबंधित मठ, मंदिर, चैत्यगृह, मंडप और मूर्तिकला है।
एलोरा की सबसे बड़ी विशेषता केवल इसकी कलात्मक भव्यता नहीं है। एक ही पहाड़ी पर अलग-अलग कालखंडों में तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं के लिए शैल-कट स्थापत्य विकसित हुआ। इसी कारण एलोरा को भारतीय कला के इतिहास में धार्मिक सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक निरंतरता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। यूनेस्को ने 1983 ईस्वी में एलोरा को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया। उसी वर्ष अजंता की गुफाओं, आगरा के किले और ताजमहल को भी यह दर्जा मिला था।
एलोरा की भौगोलिक स्थिति और नाम की उत्पत्ति
एलोरा छत्रपति संभाजीनगर शहर से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह स्थान प्राचीन काल में उत्तर भारत को दक्कन से जोड़ने वाले दक्षिणापथ व्यापार-मार्ग के निकट था। पैठण (प्राचीन प्रतिष्ठान) और उज्जैन जैसे नगरों से पश्चिमी तट के बंदरगाहों की ओर जाने वाले व्यापारिक मार्गों का प्रभाव भी इसी क्षेत्र पर रहा। यात्रियों, व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के आवागमन के कारण यहाँ मठों और मंदिरों को आर्थिक तथा सामाजिक संरक्षण मिलना स्वाभाविक था। यही कारण है कि कठोर बेसाल्ट की यह पहाड़ी धार्मिक-कलात्मक गतिविधियों का इतना बड़ा केंद्र बन सकी।
एलोरा का प्राचीन नाम एलापुरा या इलापुरा था। राष्ट्रकूट काल के अभिलेखों, विशेषकर कर्क द्वितीय के लगभग 812 ईस्वी के बड़ौदा ताम्रपत्र में एलापुर में कृष्णराज (कृष्ण प्रथम) द्वारा बनवाए गए एक अद्भुत शिव मंदिर का उल्लेख मिलता है। इतिहासकार इसे कैलाश मंदिर से जोड़ते हैं। ‘एलोरा’ शब्द इसी ‘एलापुर’ का परवर्ती रूप है, जबकि स्थानीय जन-भाषा में यह ‘वेरूळ’ कहलाता है। यहाँ की पहाड़ी को चरणाद्रि कहा गया है और यह सह्याद्रि-सातमाला पर्वत-श्रेणी का हिस्सा है।
एलोरा की गुफाओं का ऐतिहासिक काल
वर्तमान पुरातात्त्विक और यूनेस्को के प्रमाणों के अनुसार एलोरा की प्रमुख शैल-कट गतिविधि लगभग पाँचवीं/छठवीं शताब्दी ईस्वी से दसवीं शताब्दी ईस्वी तक और जैन गुफाओं के संदर्भ में कुछ बाद तक कई चरणों में विकसित हुई। यद्यपि एलोरा राष्ट्रकूटों की राजधानी नहीं थी, किंतु उनके संरक्षण में एलोरा एक महान धार्मिक और कलात्मक केंद्र था।
एलोरा की गुफाओं की क्रम-संख्या और उनके निर्माण-काल का क्रम एक जैसा नहीं है। कुछ हिंदू गुफाएँ, जैसे गुफा 21 (रामेश्वर) और गुफा 29 (धूमर लेणा) आरंभिक चरण की मानी जाती हैं, जबकि कुछ बौद्ध गुफाएँ, जैसे गुफा 11 और 12 अपेक्षाकृत बाद की हैं। इसलिए एलोरा को किसी एक राजवंश या एक शासक की रचना मानना उचित नहीं है।
एलोरा के निर्माण में राजवंशों और संरक्षकों की भूमिका
एलोरा के निर्माण में अलग-अलग कालों में अनेक राजनीतिक शक्तियों की भूमिका रही है। आरंभिक हिंदू गुफाओं का संबंध कलचुरी शासकों के काल से जोड़ा जाता है। बादामी के चालुक्यों के प्रभाव वाले काल में भी कुछ गुफाएँ बनीं। इसके बाद राष्ट्रकूट काल में एलोरा की शैल-कला अपने चरम पर पहुँची और इसी काल में विश्वप्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण हुआ। राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग (आठवीं शताब्दी के मध्य) का संबंध दशावतार गुफा के अभिलेख से बताया जाता है। कैलाश मंदिर अर्थात गुफा संख्या 16 का आरंभ संभवतः कृष्ण प्रथम (लगभग 756-773 ई.) के शासनकाल से हुआ था।
जैन गुफाओं के निर्माण का बड़ा भाग राष्ट्रकूट काल के बाद के चरणों में हुआ। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम जैन आचार्यों का संरक्षक था और इसी वातावरण में दिगंबर जैन परंपरा को यहाँ कलात्मक अभिव्यक्ति मिली। बाद में निकटवर्ती देवगिरि (दौलताबाद) में यादव वंश का उदय हुआ और इस क्षेत्र की धार्मिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ जारी रहीं। इस प्रकार एलोरा कई शताब्दियों में, अलग-अलग राजवंशों, धार्मिक समुदायों, कलाकारों और स्थानीय संरक्षकों के सहयोग से विकसित हुआ।
एलोरा और अजंता की गुफाओं में अंतर
एलोरा की तुलना प्रायः अजंता की गुफाओं से की जाती है, क्योंकि दोनों महाराष्ट्र में स्थित महत्त्वपूर्ण शैल-कट कला केंद्र हैं। अजंता छत्रपति संभाजीनगर से लगभग 100 किलोमीटर दूर है, जबकि एलोरा लगभग 30 किलोमीटर दूर। दोनों के ऐतिहासिक विकास और धार्मिक स्वरूप में स्पष्ट अंतर है। अजंता मुख्यतः बौद्ध कला, विशेषकर अपने विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्रों और बौद्ध मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। एलोरा में बौद्ध धर्म के साथ ब्राह्मणीय और जैन परंपराओं के स्मारक भी विकसित हुए और यहाँ की पहचान मुख्यतः विशाल मूर्तिकला और मंदिर-स्थापत्य से है।
अजंता का आरंभिक चरण सातवाहन काल से और उसका बाद का प्रमुख चरण वाकाटक काल से संबंधित है। एलोरा का प्रमुख विकास इसके बाद के काल में हुआ। यह कहा जा सकता है कि एलोरा ने पश्चिमी भारत की पूर्ववर्ती शैल-कट परंपराओं से तकनीकी और कलात्मक प्रेरणा ग्रहण की और उन्हें नई धार्मिक तथा स्थापत्य आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया। अजंता जहाँ चित्रकला का चरम माना जाता है, वहीं एलोरा शैल-कट मंदिर-स्थापत्य का शिखर है।
एलोरा की गुफाओं का धार्मिक वर्गीकरण
एलोरा की 34 प्रमुख गुफाओं को सामान्यतः तीन समूहों में विभाजित किया गया है। गुफा संख्या 1 से 12 तक का समूह बौद्ध है, गुफा संख्या 13 से 29 तक का समूह ब्राह्मणीय या हिंदू है और गुफा संख्या 30 से 34 तक का समूह जैन है। यह क्रम पहाड़ी पर दक्षिण से उत्तर की ओर चलने वाले क्रम के अनुसार है। किंतु यह निर्माण-काल का क्रम नहीं है, केवल धार्मिक और स्थापत्य विकास को समझने के लिए उपयोगी है।
बौद्ध गुफाओं में मुख्यतः विहार (मठ) और एक चैत्यगृह मिलता है। ब्राह्मणीय गुफाओं में विशाल मंदिर-रूप और समृद्ध पौराणिक मूर्तिकला विकसित होती दिखाई देती है। जैन गुफाएँ अपेक्षाकृत बाद की सूक्ष्म एवं अलंकरण-प्रधान शैल-कला को प्रदर्शित करती हैं। इन तीनों समूहों के द्वारा एलोरा की कलात्मक यात्रा को समझा जा सकता है।
एलोरा की बौद्ध गुफाएँ (गुफा संख्या 1 से 12)
बौद्ध कला की विशेषताएँ
एलोरा की गुफा संख्या 1 से 12 तक का समूह बौद्ध धर्म से संबंधित है। इनमें मुख्यतः विहार यानी भिक्षुओं के निवास और साधना के लिए बने मठ मिलते हैं, तथा गुफा 10 के रूप में एक चैत्यगृह भी है। इन गुफाओं का विकास उस समय हुआ जब पश्चिमी भारत में महायान बौद्ध परंपरा प्रभावशाली थी। बाद की गुफाओं में बोधिसत्त्वों और अनेक बौद्ध देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। यूनेस्को के अनुसार गुफा 10, 11 और 12 विशेष महत्त्व रखती हैं, तथा इनसे बौद्ध परंपरा के विकसित चरणों का, जिनमें वज्रयान के तत्व भी सम्मिलित हैं, संकेत मिलता है।

प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को सीधे मानव रूप में दिखाने के स्थान पर स्तूप, धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, पदचिह्न और अन्य प्रतीकों के माध्यम से स्मरण करने की परंपरा रही थी। महायान बौद्ध धर्म के विकास के साथ बुद्ध की प्रतिमाओं और बोधिसत्त्वों की मूर्तिकला को विशेष महत्त्व मिला। एलोरा की बौद्ध गुफाओं में इस विकसित प्रतिमात्मक परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
गुफा संख्या 1
गुफा संख्या 1 अपेक्षाकृत सरल बौद्ध विहार है। इसमें भिक्षुओं के रहने और ध्यान करने के लिए कक्षों की व्यवस्था है। इसका स्थापत्य बाद की अधिक अलंकृत गुफाओं की तुलना में सादा है। कुछ विद्वान इसके एक बड़े कक्ष को भंडार या अन्न-संग्रह के रूप में प्रयुक्त मानते हैं। यह गुफा एलोरा के बौद्ध स्थापत्य के आरंभिक और क्रमिक विकास को समझने में सहायता करती है।
गुफा संख्या 2
गुफा संख्या 2 में बुद्ध की विशाल प्रतिमा और बोधिसत्त्वों से संबंधित मूर्तिकला दिखाई देती है। यहाँ प्रवेश के निकट द्वारपाल आकृतियाँ और स्त्री बोधिसत्त्व परंपरा से जुड़ी तारा जैसी प्रतिमाएँ मिलती हैं। सभा-कक्ष में विशाल स्तंभों की पंक्तियाँ हैं और भीतर के गर्भगृह में बुद्ध की प्रतिमा विराजमान है। गुफा की कुछ अधूरी आकृतियाँ यह समझने में सहायता करती हैं कि चट्टान को काटकर मूर्ति बनाने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ती थी।
गुफा संख्या 3 और 4
गुफा संख्या 3 और 4 भी बौद्ध विहारों की परंपरा से संबंधित हैं। इनकी योजना में भिक्षुओं के लिए कक्ष और धार्मिक उपयोग के स्थान दिखाई देते हैं। गुफा संख्या 4 में दो स्तरों वाली संरचना के अवशेष मिलते हैं और इसकी मूर्तिकला में बुद्ध तथा अन्य धार्मिक आकृतियों का समावेश है। गुफा 3 और 4 की गिनती प्रायः एलोरा की आरंभिक बौद्ध गुफाओं में की जाती है।
गुफा संख्या 5: महारवाड़ा, विशाल बौद्ध विहार
गुफा संख्या 5 एलोरा की उल्लेखनीय बौद्ध गुफाओं में है। यह एक बहुत बड़ा, एक-मंजिला सभागार-विहार है, जिसकी लंबाई लगभग 36 मीटर और चौड़ाई लगभग 18 मीटर बताई जाती है। इसे लोक-परंपरा में ‘महारवाड़ा’ नाम से भी जाना जाता है। इसके मध्य में चट्टान काटकर बनाए गए लंबे पत्थर के चबूतरे या बेंच की दो पंक्तियाँ हैं। इन पर बैठकर भिक्षु सामूहिक पाठ, प्रवचन, शिक्षण अथवा भोजन जैसे कार्य करते रहे होंगे। इसके भीतर बुद्ध की प्रतिमा तथा बोधिसत्त्वों की मूर्तियाँ मिलती हैं। इस प्रकार गुफा 5 बौद्ध मठीय जीवन और सामुदायिक गतिविधियों के अध्ययन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।
गुफा संख्या 6
गुफा संख्या 6 एलोरा की बौद्ध गुफाओं में विशेष महत्त्व रखती है। इसमें बुद्ध की प्रतिमा के साथ तारा, अवलोकितेश्वर, मंजुश्री तथा अन्य बौद्ध देवताओं की आकृतियाँ मिलती हैं। यहाँ विद्या से संबंधित देवी की प्रतिमा भी उल्लेखनीय है, जिसे बौद्ध परंपरा में महामायूरी से जोड़ा जाता है। कुछ विद्वान इसकी तुलना हिंदू परंपरा की सरस्वती से भी करते हैं। इस गुफा से पता चलता है कि बौद्ध धर्म के विकसित चरण में स्थानीय धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं की अवधारणाएँ बौद्ध कला के व्यापक संसार में समाहित होती गईं।
गुफा संख्या 7, 8 और 9
गुफा संख्या 7 और 8 अपेक्षाकृत सरल हैं और कुछ स्थानों पर अपूर्ण दिखाई देती हैं। यहाँ बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मूर्तियाँ तथा विहार से संबंधित स्थापत्य तत्व मिलते हैं। इन गुफाओं की अधूरी अवस्थाएँ शैल-कट निर्माण तकनीक के अध्ययन में उपयोगी हैं। गुफा 9 का मुखभाग अपने अलंकरण और शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करता है और यह दिखाता है कि बौद्ध शिल्पी विहारों के बाहरी भाग को भी सजाने पर ध्यान देने लगे थे।
गुफा संख्या 10: विश्वकर्मा गुफा (सुतार की झोपड़ी)
एलोरा की गुफा संख्या 10 को विश्वकर्मा गुफा या सुतार की झोपड़ी कहा जाता है। यह एलोरा की सबसे प्रसिद्ध बौद्ध गुफाओं में से एक है और इस समूह की एकमात्र चैत्यगृह गुफा है। यहाँ चैत्यगृह की परंपरा का उत्कृष्ट विकास दिखाई देता है और यह संभवतः सातवीं शताब्दी की रचना है।
गुफा के भीतर एक विशाल स्तूप के सामने बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। यह संयोजन महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पुरानी स्तूप-पूजा और नई प्रतिमा-परंपरा साथ दिखाई देती है। गुफा की छत पर पत्थर में तराशी गई पसलीनुमा धरनें लकड़ी की छत की नकल हैं। बाहरी मुखभाग में चैत्य-खिड़की और ऊपर की बालकनी जैसे तत्व भी हैं। इसी कारण लकड़ी की वास्तु-परंपरा का शैल-कट रूपांतरण होने से इसे बढ़ई या सुतार की झोपड़ी का लोकप्रिय नाम मिला। इसकी छत, स्तंभों और चैत्य-खिड़की की योजना एलोरा की बौद्ध वास्तुकला की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है। यूनेस्को ने भी गुफा 10 को एलोरा के बौद्ध समूह की प्रमुख गुफाओं में माना है।

गुफा संख्या 11: दो ताल
गुफा संख्या 11 को सामान्यतः ‘दो ताल’ कहा जाता है। यह बहु-स्तरीय बौद्ध मठीय वास्तुकला के विकास का उदाहरण है। बाद की खुदाई और अध्ययन से इसके एक और निचले तल का पता चला, जिससे यह वस्तुतः तीन-स्तरीय संरचना सिद्ध होती है। यहाँ बुद्ध की प्रतिमा तथा अन्य धार्मिक आकृतियाँ मिलती हैं। गुफा में बौद्ध विषयों के साथ ऐसी प्रतिमाएँ भी हैं जिनमें भारतीय धार्मिक कला की व्यापक परंपरा का प्रभाव और वज्रयान विचारधारा की झलक दिखती है।
गुफा संख्या 12: तीन ताल
गुफा संख्या 12 को ‘तीन ताल’ कहा जाता है। यह एलोरा के सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्ध विहारों में से एक है और तीन मंजिलों वाली विशाल योजना के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यूनेस्को के अनुसार यह बौद्ध समूह का सबसे बड़ा तीन-स्तरीय मठ है। इसकी ऊपरी मंजिल में बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ, बोधिसत्त्वों के शिल्प और सप्त-बुद्ध तथा मैत्रेय से संबंधित आकृतियाँ मिलती हैं। इन दीवारों पर तारा जैसी देवियों का अंकन भी है। गुफा 12 से स्पष्ट होता है कि बौद्ध मठ केवल साधना और निवास के छोटे केंद्र नहीं थे, बल्कि उनमें बड़े सामुदायिक और धार्मिक संस्थान विकसित हो चुके थे।
एलोरा की हिंदू या ब्राह्मणीय गुफाएँ (गुफा संख्या 13 से 29)
ब्राह्मणीय कला का विकास
गुफा संख्या 13 से 29 तक का समूह ब्राह्मणीय अथवा हिंदू धार्मिक परंपरा से संबंधित है। इस समूह का निर्माण लगभग छठी शताब्दी के उत्तरार्ध से दसवीं शताब्दी तक अलग-अलग चरणों में हुआ। इस समूह में शिव, विष्णु, देवी, गणेश, सूर्य और अन्य देवताओं की मूर्तिकला के साथ रामायण, महाभारत और पुराणों के प्रसंग भी अंकित हैं।
इन गुफाओं में शैल-कट स्थापत्य की जटिलता बौद्ध विहारों की तुलना में अधिक दिखाई देती है। यहाँ चट्टान को काटकर मंदिर की पूरी स्थापत्य योजना, जिसमें मंडप, गर्भगृह, शिखर, नंदी-मंडप, ध्वजस्तंभ और अनेक उपमंदिर हैं, को मूर्त रूप दिया गया।
शिव की प्रधानता
एलोरा की ब्राह्मणीय गुफाओं में शिव की उपासना का विशेष महत्त्व है। शिव को नटराज, अर्धनारीश्वर, गंगाधर, भिक्षाटन, दक्षिणामूर्ति, हरिहर, लिंगोद्भव, कल्याणसुंदर, त्रिपुरांतक और अंधकासुरवध जैसे अनेक रूपों में दिखाया गया है। इस विविधता से स्पष्ट होता है कि शैव धर्म केवल लिंग-पूजा तक सीमित नहीं था। शिव के दार्शनिक, लौकिक, योगिक, नृत्यात्मक और पौराणिक स्वरूपों की व्यापक कल्पना उस समय तक विकसित हो चुकी थी।
गुफा संख्या 13 और 14: रावण की खाई
गुफा संख्या 13 अपेक्षाकृत सरल और सादा है। इसके बाद गुफा संख्या 14 में अधिक विकसित मूर्तिकला दिखाई देती है। इसे लोकप्रिय रूप से ‘रावण की खाई’ कहा जाता है और यह लगभग सातवीं शताब्दी की मानी जाती है। इसमें विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियाँ हैं, जिनमें सप्तमातृकाएँ, महिषासुरमर्दिनी दुर्गा, वराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार और गजलक्ष्मी जैसे प्रसंग उल्लेखनीय हैं। शिव-पार्वती से संबंधित दृश्य भी विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। गुफा में प्रदक्षिणा-पथ की व्यवस्था है, जो इसके मंदिर-सदृश चरित्र का सूचक है।
गुफा संख्या 15: दशावतार गुफा
गुफा संख्या 15 को दशावतार गुफा कहा जाता है। यह दो मंजिला गुफा है और इसके प्रांगण में नंदी के लिए एक स्वतंत्र मंडप भी बना है। इसकी ऊपरी मंजिल विशेष रूप से समृद्ध मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ शिव और विष्णु से संबंधित अनेक दृश्य मिलते हैं। हिरण्यकशिपु-वध करते नरसिंह, नटराज, लिंगोद्भव, अंधकासुरवध तथा अन्य पौराणिक प्रसंगों की मूर्तियाँ इस गुफा को महत्त्वपूर्ण बनाती हैं। इसमें राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग से संबंधित अभिलेख राजनीतिक इतिहास के लिए भी उपयोगी है।
दशावतार नाम के कारण इसे केवल विष्णु के दस अवतारों से जोड़ना स्वाभाविक है, किंतु इसकी मूर्तिकला केवल विष्णु विषयों तक सीमित नहीं है। इसमें शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं के विषय समाहित हैं। यही तथ्य इस गुफा को अपने समय की धार्मिक उदारता का सूचक बनाता है।
गुफा संख्या 16: कैलाश मंदिर
कैलाश मंदिर का निर्माण
एलोरा की सबसे प्रसिद्ध रचना गुफा संख्या 16 का कैलाश मंदिर है। यह भारतीय शैल-कट वास्तुकला की महानतम उपलब्धियों में गिना जाता है। इसे सामान्यतः राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम के शासनकाल से संबद्ध माना जाता है और अभिलेखीय साक्ष्य भी इसी ओर संकेत करते हैं। स्थापत्य के कुछ अंशों का पूर्ण होना संभवतः उनके उत्तराधिकारियों के काल तक चला। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस मंदिर की योजना में पट्टदकल के विरूपाक्ष मंदिर और काँची के कैलासनाथ मंदिर जैसी दक्षिण भारतीय परंपराओं का प्रभाव दिखता है।
कैलाश मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे अलग-अलग पत्थर जोड़कर नहीं, बल्कि एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया गया है। पहले पहाड़ी के आगे के भाग में तीन ओर गहरी खाई काटी गई, ताकि बीच में एक विशाल चट्टानी खंड बचे। इसके बाद उसी खंड को शिखर से आधार की ओर तराशकर पूरा मंदिर गढ़ा गया। अनुमान है कि इस कार्य में लगभग दो लाख टन बेसाल्ट चट्टान हटाई गई होगी। इस तकनीक ने शिल्पियों के सामने अत्यंत कठिन इंजीनियरिंग और स्थापत्य संबंधी चुनौतियाँ रखी होंगी।
यूनेस्को ने कैलाश मंदिर को मानव रचनात्मक प्रतिभा और तकनीकी कौशल का असाधारण उदाहरण माना है। इसका नाम शिव के निवास कैलाश पर्वत के आधार पर रखा गया। माना जाता है कि मूल रूप में इस पर चूने का श्वेत लेप रहा होगा, जिससे यह हिमाच्छादित कैलाश जैसा प्रतीत होता होगा।

कैलाश मंदिर की स्थापत्य योजना
कैलाश मंदिर का पूरा परिसर एक विशाल प्रांगण में निर्मित है। इसमें मुख्य मंदिर, मंडप, नंदी मंडप, प्रवेशद्वार, ध्वजस्तंभ, हाथियों की विशाल आकृतियाँ और अनेक उपमंदिर हैं। मंदिर तक पहुँचने के लिए दो-मंजिला प्रवेश-द्वार से गुजरना पड़ता है, जिसके ऊपर गजलक्ष्मी का शिल्प मिलता है। इसकी स्थापत्य योजना में दक्षिण भारतीय द्रविड़ मंदिर वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
यूनेस्को से संबद्ध संरक्षण रिपोर्टों के अनुसार मंदिर का प्रांगण लगभग 82 मीटर × 46 मीटर तक फैला है और पीछे की ओर चट्टान का ऊँचा कटाव लगभग 32 मीटर तक पहुँचता है। मंदिर में लिंग-गर्भगृह, द्रविड़ शैली का पिरामिडनुमा शिखर (विमान), सभा-मंडप और नंदी के लिए पृथक मंडप है। नंदी मंडप और मुख्य मंदिर को एक पत्थर के पुल से जोड़ा गया है। परिसर के चारों ओर चट्टान को काटकर बनाई गई स्तंभयुक्त दीर्घाएँ हैं, जिनमें अनेक मूर्ति-पट्ट उकेरे गए हैं।
कैलाश मंदिर की मूर्तिकला
कैलाश मंदिर की दीवारों और मंडपों पर रामायण, महाभारत, पुराणों और शैव-वैष्णव धार्मिक आख्यानों से जुड़ी असंख्य मूर्तियाँ अंकित हैं। यहाँ शिव-पार्वती, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, कार्तिकेय, गंगा, यमुना, सूर्य तथा अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं। मुख्य मंदिर की दीवारों और दीर्घाओं में महाभारत तथा रामायण के प्रसंग और वैष्णव कथाओं के दृश्य शिल्पित हैं। इसलिए कैलाश मंदिर केवल उपासना का स्थान नहीं है, बल्कि पौराणिक और महाकाव्यात्मक कथाओं को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने वाला विशाल शिल्प-ग्रंथ भी है।
रावणानुग्रह : रावण द्वारा कैलाश उठाने का दृश्य
कैलाश मंदिर का सबसे प्रसिद्ध शिल्प रावण द्वारा कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास है, जिसे रावणानुग्रह कहा जाता है। इस दृश्य में रावण अपनी भुजाओं से कैलाश को हिलाता दिखाया गया है, जबकि पर्वत के ऊपर शिव और पार्वती विराजमान हैं। इस मूर्तिकला की विशेषता इसकी गति और भावाभिव्यक्ति है। रावण का बल, पर्वत का कंपन, शिव की स्थिरता और पार्वती की प्रतिक्रिया को कलाकारों ने पत्थर में अत्यंत जीवंत रूप दिया है। यूनेस्को ने भी इसे कैलाश मंदिर की सबसे उल्लेखनीय मूर्तिकला रचनाओं में स्थान दिया है।
शिव-पार्वती और अन्य शिल्प
कैलाश मंदिर में शिव-पार्वती विवाह (कल्याणसुंदर), शिव का नृत्य, अर्धनारीश्वर, गंगाधर, लिंगोद्भव, अंधकासुरवध, त्रिपुरांतक, भिक्षाटन और अन्य शैव रूपों के साथ विष्णु के अनेक रूपों का अंकन भी मिलता है। वैष्णव विषयों में वराह, नरसिंह, वामन (त्रिविक्रम), शेषशायी विष्णु, गोवर्धनधारी कृष्ण, गरुड़ारूढ़ विष्णु और कालियामर्दन जैसे प्रसंग उल्लेखनीय हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कैलाश परिसर की कला केवल शैव विचारधारा को नहीं, बल्कि पूरे पौराणिक संसार को अपने भीतर समेटती है। इसी परिसर में लंकेश्वर नाम की एक निचली गुफा भी है, जो रावण और शिव से जुड़े विषयों के कारण इस स्थान के कथा-संसार को और विस्तार देती है।
कैलाश मंदिर की चित्रकला
एलोरा को मुख्यतः मूर्तिकला के लिए जाना जाता है, लेकिन यहाँ चित्रकला के अवशेष भी मिलते हैं। कैलाश मंदिर के मंडप और कुछ छतों पर प्राचीन चित्रों के अवशेष सुरक्षित हैं। यूनेस्को के अनुसार यहाँ अलग-अलग कालों की चित्रकला के अवशेष मिलते हैं, और कुछ छतों पर शिव-संबंधित तथा वैष्णव विषयों के चित्रांकन के चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि एलोरा की कलात्मक परंपरा पत्थर की मूर्तियों तक सीमित नहीं थी। चित्रांकन और स्थापत्य सज्जा भी इसके व्यापक कलात्मक कार्यक्रम का हिस्सा थी।
गुफा संख्या 17 से 20
गुफा संख्या 17 से 20 तक की गुफाओं में शैव तथा अन्य हिंदू धार्मिक विषयों से संबंधित मूर्तियाँ मिलती हैं। इनमें शिवलिंग, द्वारपाल, गणेश, दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियाँ दिखाई देती हैं। इन गुफाओं की कलात्मक गुणवत्ता कैलाश मंदिर जैसी विराट नहीं है, किंतु ये एलोरा में मंदिर-निर्माण की प्रक्रिया के क्रमिक विकास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
गुफा संख्या 21: रामेश्वर गुफा
गुफा संख्या 21 को रामेश्वर गुफा कहा जाता है। यह एलोरा की सुंदर और महत्त्वपूर्ण ब्राह्मणीय गुफाओं में से एक है और आरंभिक हिंदू गुफाओं में गिनी जाती है। इसके प्रवेश-क्षेत्र में नंदी की उपस्थिति तथा भीतर शिव से संबंधित मूर्तियाँ इसकी शैव पहचान को स्पष्ट करती हैं। प्रवेश के निकट गंगा और यमुना की मानवीकृत नदी-देवियों की प्रतिमाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शिव-पार्वती से संबंधित प्रसंग, नृत्यमुद्रा में शिव, सप्तमातृकाएँ और स्तंभों पर उकेरे गए मिथुन तथा अन्य देवी-देवताओं के शिल्प इसके कलात्मक वैभव को बढ़ाते हैं।
गुफा संख्या 22 से 28
गुफा संख्या 22 से 28 तक विभिन्न शैव और वैष्णव विषयों की मूर्तियाँ मिलती हैं। इनमें शिवलिंग, गणेश, कार्तिकेय, गजलक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ शामिल हैं। इस समूह में गुफा 25 विशेष रूप से चर्चित है, जिसमें सूर्य को सात अश्वों वाले रथ पर आरूढ़ दिखाया गया है। अन्य गुफाओं में शिव और विष्णु के विभिन्न रूपों का अंकन मिलता है। इन गुफाओं की मूर्तिकला से तत्कालीन धार्मिक विश्वासों और मंदिर-आधारित उपासना की व्यापकता का पता चलता है।
गुफा संख्या 29: धूमर लेणा
गुफा संख्या 29 को धूमर लेणा कहा जाता है। यह एलोरा की सबसे प्रभावशाली ब्राह्मणीय गुफाओं में से एक है, और इसे आरंभिक चरण की रचना माना जाता है। इसके निकट स्थित मौसमी जलप्रपात, जिसे ‘सीता की नहानी’ भी कहा जाता है, इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाता है। गुफा की योजना क्रूसाकार है, जिसमें केंद्रीय शिवलिंग-गर्भगृह और विशाल स्तंभ हैं। इसके प्रवेश की सीढ़ियों के पास सिंहों की आकृतियाँ बनी हैं और यहाँ शिव-पार्वती विवाह, रावण द्वारा कैलाश को हिलाने का प्रयास, अंधकासुरवध तथा अन्य शैव आख्यानों की मूर्तियाँ विशेष महत्त्व रखती हैं। कई विद्वान इसकी योजना की तुलना मुंबई के निकट स्थित एलिफेंटा की गुफा से करते हैं।
गुफा 29 यह भी दिखाती है कि एलोरा के कलाकारों ने प्राकृतिक परिवेश को स्थापत्य के साथ किस प्रकार जोड़ा। जलप्रपात, चट्टान, विशाल कक्ष और मूर्तिकला, इन सबका संयुक्त प्रभाव इस गुफा को विशिष्ट बनाता है।
एलोरा की वैष्णव मूर्तिकला
एलोरा की ब्राह्मणीय गुफाओं में विष्णु के विभिन्न अवतारों का सुंदर चित्रण मिलता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में विष्णु को लोक-रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए विभिन्न रूपों में अवतरित होने वाला देवता माना गया है। एलोरा की मूर्तिकला में मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, राम और कृष्ण से जुड़े आख्यान विशेष रूप से दिखाई देते हैं। वराह रूप में पृथ्वी के उद्धार का प्रसंग, नरसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु-वध, वामन द्वारा बलि से संबंधित कथा तथा राम-कृष्ण के महाकाव्यात्मक आख्यान भारतीय धार्मिक कला की समृद्ध कथा-परंपरा को व्यक्त करते हैं।
ध्यातव्य है कि एलोरा की प्रत्येक गुफा में विष्णु के सभी दस अवतार समान रूप से अंकित नहीं हैं। अलग-अलग गुफाओं में अलग-अलग पौराणिक प्रसंग स्वतंत्र रूप से शिल्पित हैं।
रामायण और महाभारत के प्रसंग
एलोरा की हिंदू गुफाओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि धार्मिक आख्यानों के साथ रामायण और महाभारत की कथाएँ भी मूर्तिकला के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं। कैलाश मंदिर की दीवारों पर रामायण के राम, सीता, लक्ष्मण, रावण और अन्य पात्रों से जुड़े प्रसंग तथा महाभारत के युद्ध और पात्रों के दृश्य भारतीय महाकाव्य परंपरा को दृश्य रूप देते हैं।
इन आख्यानों को केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं देखना चाहिए। ये उस समय के सामाजिक मूल्यों, राजधर्म, वीरता, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक आदर्शों और नैतिक चिंतन के दृश्य प्रतिनिधित्व भी हैं। पत्थर में उकेरे गए ये प्रसंग उस युग में कथावाचन की परंपरा को समझने के लिए भी उपयोगी हैं।
एलोरा की जैन गुफाएँ (गुफा संख्या 30 से 34)
जैन गुफाओं का काल और स्वरूप
एलोरा की गुफा संख्या 30 से 34 तक का समूह जैन धर्म से संबंधित है। इनका निर्माण एलोरा के अपेक्षाकृत बाद के चरण में हुआ। यूनेस्को के अनुसार जैन गुफाओं का विकास लगभग नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच हुआ और इनमें जैन दर्शन, तीर्थंकरों, यक्ष-यक्षिणियों तथा अन्य जैन प्रतीकों की समृद्ध मूर्तिकला मिलती है। ये गुफाएँ मुख्यतः दिगंबर जैन परंपरा से जुड़ी हैं। इनका पूरा समूह राष्ट्रकूट काल के उत्तरार्ध की धार्मिक स्थिति और जैन मुनि-परंपरा के संरक्षण का प्रमाण है।
तीर्थंकर प्रतिमाओं की विशेषता
जैन कला में प्रत्येक तीर्थंकर की पहचान के लिए विशिष्ट लांछन (चिह्न) का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए ऋषभनाथ का संबंध वृषभ से, पार्श्वनाथ का सर्प-फण से और महावीर का सिंह-लांछन से जोड़ा जाता है। तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ प्रायः दो प्रमुख मुद्राओं में दिखाई देती हैं : पद्मासन और कायोत्सर्ग। कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी प्रतिमा शरीर से आसक्ति के त्याग और आध्यात्मिक एकाग्रता को व्यक्त करती है, जबकि पद्मासन ध्यान और समाधि का प्रतीक है।
गुफा संख्या 30: छोटा कैलाश
गुफा संख्या 30 को ‘छोटा कैलाश’ कहा जाता है। इसका यह नाम इसलिए पड़ा कि इसकी स्थापत्य योजना में कैलाश मंदिर की शैल-कट मंदिर परंपरा की झलक मिलती है। इसमें तीर्थंकर प्रतिमाएँ, स्तंभ और मंदिर-सदृश स्थापत्य तत्व हैं। इससे समझा जा सकता है कि बाद के जैन शिल्पियों ने एलोरा की पहले से विकसित शैल-कट परंपरा को अपनाया और उसे अपने धार्मिक विचारों के अनुरूप ढाला। यह गुफा पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई प्रतीत होती।
गुफा संख्या 31
गुफा संख्या 31 अपेक्षाकृत छोटी है और अपूर्ण-सी दिखती है। इसमें जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ तथा धार्मिक मूर्तिकला मिलती है। महावीर और पार्श्वनाथ से संबंधित प्रतिमाएँ इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं।
गुफा संख्या 32: इंद्र सभा
गुफा संख्या 32 को इंद्र सभा कहा जाता है और यह एलोरा की सबसे प्रसिद्ध जैन गुफाओं में से एक है। इसका यह नाम परवर्ती काल में लोक-परंपरा में पड़ा, जबकि यह वस्तुतः जैन मंदिर परिसर है। यह बहु-स्तरीय संरचना है, और इसकी स्थापत्य योजना तथा मूर्तिकला अत्यंत प्रभावशाली है। परिसर के प्रांगण में स्वतंत्र रूप से खड़ा एक विशाल शैल-कट मंदिर और हाथी की आकृति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इंद्र सभा में महावीर, पार्श्वनाथ और गोम्मटेश्वर (बाहुबली) जैसी प्रतिमाओं के साथ मातंग और सिद्धायिका (अंबिका) जैसे यक्ष-यक्षिणी पात्रों का अंकन मिलता है। इस गुफा की छतों पर चित्रकला के अवशेष भी पाए गए हैं, जो बताते हैं कि जैन कला में मूर्तिकला के साथ चित्रकला का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। यूनेस्को के अनुसार जैन समूह की गुफाओं में दिगंबर परंपरा से संबंधित चित्र और मूर्तिकला के अवशेष बहुमूल्य हैं।
गुफा संख्या 33: जगन्नाथ सभा
गुफा संख्या 33 को ‘जगन्नाथ सभा’ भी कहा जाता है। यह भी दो-स्तरीय जैन गुफा है, और इसे जैन समूह की सबसे समृद्ध गुफाओं में गिना जाता है। इसमें तीर्थंकरों, यक्ष-यक्षिणियों तथा अन्य धार्मिक आकृतियों का अंकन है। इसके स्तंभों पर की गई नक्काशी और धार्मिक मूर्तिकला जैन कला की सूक्ष्मता को प्रदर्शित करती है।
गुफा संख्या 34
गुफा संख्या 34 जैन समूह की अंतिम प्रमुख गुफा है, जो आकार में छोटी है। इसमें तीर्थंकरों और जैन धार्मिक प्रतीकों की मूर्तियाँ मिलती हैं। यह गुफा एलोरा के जैन कला-चरण की निरंतरता को दर्शाती है।
एलोरा की शिल्प तकनीक और इंजीनियरिंग
एलोरा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी शैल-कट निर्माण तकनीक है। यहाँ कलाकारों ने बने-बनाए भवनों को पत्थर के खंडों से खड़ा नहीं किया, बल्कि प्राकृतिक बेसाल्ट चट्टान को काटकर उसके भीतर से कक्ष, स्तंभ, मंडप, मूर्तियाँ और मंदिरों के विभिन्न भाग तैयार किए। यह निर्माण की सामान्य प्रक्रिया से बिल्कुल उलटी दिशा थी, क्योंकि इसमें जोड़ने की जगह लगातार हटाना पड़ता था।
विशेषकर कैलाश मंदिर में ऊपर से नीचे की दिशा में चट्टान काटने की तकनीक का असाधारण प्रयोग हुआ। इसका अर्थ है कि शिल्पियों को हर चरण में भविष्य की पूरी स्थापत्य योजना की कल्पना पहले से करनी पड़ती थी। एक छोटी गणनात्मक या संरचनात्मक भूल भी पूरी रचना को क्षति पहुँचा सकती थी। हथौड़ी, छेनी और अन्य पारंपरिक औजारों से विशाल मात्रा में बेसाल्ट हटाकर मंदिर और मूर्तियाँ तैयार की गईं। इस दृष्टि से एलोरा केवल कला का ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग, मापन, स्थापत्य नियोजन और श्रम-संगठन का भी महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

एलोरा की मूर्तिकला की प्रमुख विशेषताएँ
एलोरा की मूर्तिकला में शरीर की गति, चेहरे के भाव, वस्त्र, आभूषण, केश-विन्यास, आयुध तथा धार्मिक प्रतीकों का सूक्ष्म अंकन मिलता है। कलाकारों ने कठोर बेसाल्ट जैसी चट्टान में अत्यंत जटिल और गतिशील आकृतियाँ रचीं। शिव के नटराज रूप में गति और लय, रावणानुग्रह में शक्ति और तनाव, गंगा-यमुना की प्रतिमाओं में सौंदर्य, विष्णु के अवतारों में पौराणिक ऊर्जा और जैन तीर्थंकरों में ध्यान एवं वैराग्य को अलग-अलग कलात्मक शैली में अभिव्यक्त किया गया है।
इस प्रकार एलोरा की कला केवल सजावट नहीं है। वह धार्मिक विचारों और दार्शनिक अवधारणाओं को दृश्य भाषा में बदलने का माध्यम है। यही कारण है कि यहाँ की हर मूर्ति के पीछे कोई कथा, कोई दर्शन या कोई धार्मिक विश्वास छिपा है।
एलोरा में धार्मिक सह-अस्तित्व
एलोरा का सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्ष यह है कि बौद्ध, ब्राह्मणीय और जैन समुदायों से संबंधित धार्मिक स्थापत्य एक ही पहाड़ी पर विकसित हुआ। इन गुफाओं का निर्माण एक ही समय में नहीं हुआ। अलग-अलग चरणों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों ने इस क्षेत्र का उपयोग किया।
इसलिए ऐतिहासिक दृष्टि से इसे तीनों धर्मों को एक ही समय में पूर्णतः समान राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण मिलने का प्रमाण मानने के बजाय एक दीर्घकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है। यूनेस्को भी एलोरा को तीन धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व और प्राचीन भारत की सांस्कृतिक सहिष्णुता के महत्त्वपूर्ण प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है।
एलोरा और भारतीय संस्कृति
एलोरा की गुफाएँ भारतीय इतिहास के अनेक पहलुओं को समझने में सहायता करती हैं। यहाँ की मूर्तियों से धार्मिक विश्वासों, वस्त्रों, आभूषणों, स्थापत्य परंपराओं, राजकीय संरक्षण, सामाजिक जीवन और कलात्मक रुचियों की जानकारी मिलती है। कैलाश मंदिर जैसे स्मारक यह बताते हैं कि मध्यकालीन भारत में बड़े धार्मिक निर्माण केवल पूजा के लिए नहीं होते थे। वे शासकीय शक्ति, धार्मिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक वैभव और तकनीकी क्षमता के प्रदर्शन का माध्यम भी बनते थे।
इसी प्रकार बौद्ध गुफाएँ मठीय जीवन और शिक्षा-साधना की परंपरा का संकेत देती हैं, जबकि जैन गुफाएँ तप, ध्यान, तीर्थंकर-पूजा और जैन दार्शनिक परंपरा की कलात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती हैं। एलोरा के निकट ही घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर है, जिसका वर्तमान स्वरूप 18वीं शताब्दी में अहिल्याबाई होल्कर द्वारा कराए गए पुनर्निर्माण से जुड़ा है। यह इस क्षेत्र की शैव आस्था की निरंतरता का जीवित प्रमाण है।
आधुनिक काल में एलोरा
एलोरा का उल्लेख मध्यकालीन यात्रियों और लेखकों ने भी किया है और सत्तरहवीं से अठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय यात्रियों के विवरणों से इसकी ख्याति पश्चिम तक पहुँची। 1790 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी सर चार्ल्स मैलेट का एलोरा पर लिखा विवरण अंग्रेज़ी में इसके शुरुआती वैज्ञानिक वर्णनों में गिना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में जेम्स बर्गेस और जेम्स फर्ग्यूसन जैसे विद्वानों ने भारत की गुफा-वास्तुकला का व्यवस्थित अध्ययन किया, जिससे एलोरा के स्थापत्य-इतिहास की नींव पड़ी। तब से यह स्थल कला-इतिहास, पुरातत्व और धर्म-अध्ययन के शोधकर्ताओं के लिए एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
एलोरा का विश्व धरोहर महत्त्व
एलोरा को 1983 ईस्वी में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। इसे उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य वाला स्थल माना गया है, क्योंकि यहाँ मानव रचनात्मक प्रतिभा, प्राचीन भारतीय सभ्यता की निरंतरता और तीन धार्मिक परंपराओं के स्थापत्य-सांस्कृतिक साक्ष्य एक साथ मिलते हैं।
यूनेस्को के अनुसार एलोरा की महत्ता मुख्यतः तीन आधारों पर समझी जाती है। पहला, यह असाधारण कलात्मक उपलब्धि है और कैलाश मंदिर मानव रचनात्मक प्रतिभा की उत्कृष्ट कृति है। दूसरा, यह प्राचीन भारतीय सभ्यता के दीर्घकालीन विकास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। तीसरा, यह बौद्ध, ब्राह्मणीय और जैन धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व का उल्लेखनीय उदाहरण है।
संरक्षण और वर्तमान महत्त्व
एलोरा की गुफाएँ वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण और प्रबंधन के अधीन हैं। इस विशाल परिसर के संरक्षण में जल का रिसाव, चट्टानों में दरारें, पर्यावरणीय प्रभाव और बड़ी संख्या में आने वाले पर्यटकों का प्रबंधन प्रमुख चुनौतियाँ हैं। मानसून में चट्टानों के भीतर पानी का रिसाव चित्रों, चूने के लेप और मूर्तियों की सतह को नुकसान पहुँचाता है, जबकि भीड़ और प्रदूषण का असर भी समय के साथ बढ़ता है। यूनेस्को ने भी दीर्घकालीन संरक्षण के लिए जल-रिसाव और दरारों की निगरानी तथा आगंतुक-प्रबंधन को महत्त्वपूर्ण बताया है।
इस प्रकार एलोरा की गुफाएँ भारतीय शैल-कट वास्तुकला की एक ऐसी महान परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसमें धर्म, कला, स्थापत्य, तकनीक और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। लगभग पाँचवीं/छठवीं शताब्दी से लेकर बाद के मध्यकालीन चरणों तक विकसित यह परिसर बौद्ध, ब्राह्मणीय और जैन धार्मिक परंपराओं की कलात्मक अभिव्यक्तियों को एक ही भौगोलिक क्षेत्र में प्रस्तुत करता है।
बौद्ध गुफाओं की मठीय वास्तुकला, गुफा 10 का चैत्यगृह और गुफा 12 का विशाल तीन-तलीय विहार एलोरा के बौद्ध चरण की विशेषताएँ हैं। ब्राह्मणीय समूह में गुफा 15, गुफा 16 का कैलाश मंदिर, गुफा 21 का रामेश्वर और गुफा 29 का धूमर लेण भारतीय मंदिर वास्तुकला और पौराणिक मूर्तिकला की उच्च उपलब्धियों के सूचक हैं। वहीं गुफा 30 से 34 तक का जैन समूह जैन तीर्थंकरों, यक्ष-यक्षिणियों, सूक्ष्म मूर्तिकला और चित्रकला की परंपरा को सामने लाता है।
इन सभी में कैलाश मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर बनाया गया यह मंदिर धार्मिक आस्था का स्मारक होने के साथ-साथ प्राचीन भारतीय शिल्पियों की स्थापत्य कल्पना, गणनात्मक क्षमता, तकनीकी दक्षता और कलात्मक प्रतिभा का असाधारण प्रमाण भी है। रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाने का दृश्य, शिव-पार्वती से जुड़े प्रसंग, विष्णु के अवतारों की मूर्तियाँ और मंदिर के विशाल स्थापत्य घटक एलोरा की कला को विश्व कला इतिहास में विशिष्ट स्थान देते हैं।
एलोरा केवल गुफाओं का समूह नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के दीर्घकालीन धार्मिक, कलात्मक और स्थापत्य विकास का जीवंत दस्तावेज है। यहाँ चट्टान में तराशी गई हर प्रतिमा, हर स्तंभ और हर मंदिर भारतीय इतिहास के किसी न किसी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक पक्ष को अभिव्यक्त करता है। इसी कारण एलोरा का आज भी भारतीय कला और वास्तुकला के इतिहास में अद्वितीय स्थान है और इसकी गणना विश्व सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख स्मारकों में की जाती है।


