प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षण केंद्र
वैदिक शिक्षा-परंपरा की पृष्ठभूमि
प्राचीन काल से लेकर आज तक भारत में अध्यापन को पुण्य का कार्य माना गया है। गृहस्थ ब्राह्मण के पाँच महायज्ञों में ब्रह्मयज्ञ का स्थान सर्वोच्च था और इस ब्रह्मयज्ञ में विद्यार्थियों को शिक्षा देना ही प्रधान कर्म माना जाता था। इस यज्ञ की सिद्धि के लिए प्रत्येक विद्वान गृहस्थ के लिए विद्यार्थियों का होना आवश्यक माना जाता था। इन विद्यार्थियों में आचार्य के अपने पुत्र भी सम्मिलित होते थे। इस प्रकार प्रत्येक विद्वान गृहस्थ का घर ही एक प्रकार का विद्यालय होता था। ऐसे विद्यालयों का प्रचलन वैदिक काल में विशेष रूप से था, और महाभारत में भी गृहस्थाश्रम में रहने वाले आचार्यों द्वारा अपने घरों में अध्यापन करने के उल्लेख प्राप्त होते हैं।
वैदिक विद्यालयों के संबंध में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे बड़े नगरों में स्थित नहीं होते थे। उनकी स्थिति सामान्यतः नगरों से दूर वनों में होती थी। महर्षि, गृहस्थ होने पर भी अपने निवास के लिए वनभूमि का ही चयन करते थे। जिन वनों, पर्वतों और उपनदीय प्रदेशों को स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था तथा जहाँ ग्रीष्म ऋतु का ताप अत्यधिक नहीं होता था, उन्हीं स्थानों को आचार्य अपने आश्रम और विद्यालय के रूप में चुनते थे। ऐसे स्थानों पर गायों के चरने के लिए घास के मैदान उपलब्ध होते थे, हवन के लिए समिधाएँ वन से प्राप्त हो जाती थीं तथा स्नान के लिए समीप ही नदी या सरोवर होता था।
तत्कालीन वैदिक विद्यार्थी-जीवन में ब्रह्मचर्य और जप का विशेष महत्त्व था। इनकी सिद्धि के लिए नगरों और ग्रामों से दूर रहना अधिक उपयुक्त समझा जाता था। उपनिषदों में भी ब्रह्मज्ञान के शिक्षक ऋषियों की आवास-भूमि अरण्य को ही बताया गया है। इन्हीं ब्रह्मज्ञानियों के समीप विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। इस प्रकार अरण्यवास ही ब्रह्मचर्य का पर्याय बन गया।
तक्षशिला : प्राचीनतम शिक्षा-केंद्र
वैदिक-ब्राह्मणकालीन शिक्षा-परंपरा में गुरुकुलों के अतिरिक्त तक्षशिला एक अत्यंत प्राचीन तथा प्रसिद्ध शिक्षा-केंद्र के रूप में विकसित हुआ था, जो बौद्ध शिक्षण-संस्थाओं के उदय से पूर्व ही अस्तित्व में आ चुका था। तक्षशिला में वेद, व्याकरण, आयुर्वेद, धनुर्विद्या तथा राजनीति-शास्त्र जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी और कहा जाता है कि आचार्य चाणक्य तथा वैद्य जीवक जैसे प्रसिद्ध विद्वानों ने यहीं शिक्षा ग्रहण की थी। यद्यपि तक्षशिला मूलतः बौद्ध शिक्षण-केंद्र नहीं था, तथापि बौद्ध धर्म के प्रसार के पश्चात यहाँ भी बौद्ध अध्ययन को प्रोत्साहन मिला और इसे परवर्ती बौद्ध विश्वविद्यालयों, जैसे नालंदा, विक्रमशिला आदि की वैचारिक पूर्ववर्ती परंपरा के रूप में देखा जा सकता है।
बौद्ध शिक्षा के प्रवर्तक : गौतम बुद्ध
बौद्ध शिक्षण-संस्थाओं के प्रमुख प्रवर्तक गौतम बुद्ध थे। उन्होंने अपने धर्म और दर्शन के अनुरूप मानव-व्यक्तित्व के विकास की जो योजना प्रस्तुत की, उसमें गृहस्थाश्रम को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया था। गौतम बुद्ध से पूर्व भी ऐसे अनेक विचारक थे, जो गृहस्थाश्रम को विद्वान या उन्नत विचारों वाले व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे।
ऐसी स्थिति में अनेक माता-पिता अपने पुत्रों को ब्रह्मपरायण बनाने के उद्देश्य से उन्हें सोलह वर्ष की आयु में वन में भेज देते थे, ताकि वे आध्यात्मिक साधना कर सकें। ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार भी बाल्यावस्था से ही प्रव्रजित होने की परंपरा थी। ऐसे प्रव्रजित व्यक्ति प्रायः हिमालय क्षेत्र में किसी आचार्य के सान्निध्य में जीवन व्यतीत करते थे। वे समय-समय पर नगरों में आकर लोगों को उपदेश देते थे और राजाओं द्वारा उनका सम्मान किया जाता था।
ऋषि वर्षा ऋतु में एक ही स्थान पर रहते थे, जहाँ उनके लिए पर्णशालाएँ बनाई जाती थीं। वे वन में रहते हुए फल-फूल आदि से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। यह जीवन-शैली बौद्ध संस्कृति में विकसित होने वाली भिक्षु-परंपरा से अत्यधिक मिलती-जुलती थी।
गौतम बुद्ध ने प्रव्रज्या ग्रहण करने वाले ऋषियों की संघीय जीवन-पद्धति को अपनाया और आजीवन संयम तथा व्रत का विधान किया। किंतु उन्होंने अरण्यवास और पर्णशालाओं को उतना महत्त्व नहीं दिया, जितना वैदिक परंपरा में था। बौद्ध विहार नगरों के समीप बनाए गए, ताकि सामान्य जनता तक उनकी शिक्षाएँ सरलता से पहुँच सकें।
प्रारंभ में भिक्षु स्थायी रूप से किसी स्थान पर नहीं रहते थे। वे गौतम बुद्ध के पास शिक्षा ग्रहण करने आते और दिनभर अध्ययन के बाद रात्रि में वृक्षों के नीचे, गुफाओं में या वनों में विश्राम करते थे। किंतु जैसे-जैसे भिक्षुओं की संख्या बढ़ी, स्थायी निवास की आवश्यकता अनुभव की गई। राजगृह के एक सेठ के अनुरोध पर गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को विहारों में रहने की अनुमति दी।
प्रथम बौद्ध संगीति और मौखिक शिक्षा-परंपरा
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण (लगभग 483 ई.पू.) के तुरंत पश्चात राजगृह में प्रथम बौद्ध संगीति (सभा) का आयोजन हुआ, जिसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्यों आनंद और उपालि ने क्रमशः सुत्तपिटक तथा विनयपिटक का मौखिक संकलन प्रस्तुत किया। यह संगीति भी एक प्रकार से शिक्षण-परंपरा का ही विस्तार थी, क्योंकि इसी के माध्यम से बुद्ध की शिक्षाओं को संगठित रूप में संरक्षित कर आगामी पीढ़ियों के अध्ययन के लिए सुरक्षित रखा गया। इसके पश्चात हुई वैशाली में द्वितीय (लगभग 383 ई.पू.) तथा सम्राट अशोक के समय पाटलिपुत्र में तृतीय संगीतियों ने भी बौद्ध सिद्धांतों के मानकीकरण तथा शिक्षण-सामग्री के संकलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे बौद्ध विहारों में दी जाने वाली शिक्षा हेतु एक सुव्यवस्थित ग्रंथ-आधार तैयार हो सका।
बौद्ध शिक्षा के केंद्र : विहार
भिक्षुओं की अस्थायी जीवन-स्थिति को देखते हुए राजगृह के एक सेठ ने उनके लिए 60 गृहों का निर्माण करवाया। गौतम बुद्ध ने इस प्रकार के निर्माण की अनुमति दी और कहा कि भिक्षुओं के लिए विहार, प्रासाद, हम्र्य, गुहा आदि विभिन्न प्रकार के निवास स्थान हो सकते हैं।
विहार केवल निवास-स्थान नहीं थे, बल्कि वे शिक्षा, साधना और चिंतन के केंद्र भी थे। इनमें भिक्षु शांति से ध्यान कर सकते थे, अध्ययन कर सकते थे और अपने ज्ञान का प्रसार कर सकते थे। जनता में बौद्ध धर्म के प्रति बढ़ते उत्साह के कारण अनेक विहारों का निर्माण हुआ। पर्वतीय गुफाओं को भी विहार के रूप में उपयोग किया गया। अनेक राजाओं ने गुफाओं के समीप उपवनों का निर्माण करवाया, जिससे भिक्षुओं को सुविधा प्राप्त हो सके।
विहार की स्थापत्य-संरचना और वर्षावास परंपरा
बौद्ध विहारों की स्थापत्य-योजना सामान्यतः एक वर्गाकार अथवा आयताकार प्रांगण के चारों ओर बनी छोटी-छोटी कोठरियों (भिक्षु-कक्षों) पर आधारित होती थी, जिसके मध्य में एक खुला आँगन तथा प्रवेश-द्वार के सम्मुख प्रायः एक सभा-कक्ष अथवा चैत्य-गृह (पूजा-स्थल) होता था। यह संरचना भिक्षुओं के सामूहिक जीवन, अध्ययन तथा ध्यान-साधना दोनों के अनुकूल थी। बौद्ध परंपरा में वर्षा ऋतु के चार मास (वर्षावास) में भिक्षुओं का भ्रमण वर्जित माना जाता था, इसी कारण उन्हें इस अवधि में किसी एक विहार में स्थायी रूप से निवास करना अनिवार्य था। यही परंपरा वस्तुतः स्थायी विहार-निर्माण की आवश्यकता का एक प्रमुख कारण भी बनी, क्योंकि प्रत्येक वर्ष वर्षावास के दौरान बड़ी संख्या में भिक्षुओं को एक साथ ठहरने तथा साथ ही सामूहिक अध्ययन करने की सुविधा चाहिए होती थी।
श्रावस्ती का जेतवन विहार
श्रावस्ती का जेतवन विहार बौद्ध शिक्षण का एक प्रमुख केंद्र था, जिसका निर्माण अनाथपिंडक ने गौतम बुद्ध के जीवनकाल में कराया था। इसका क्षेत्रफल लगभग 130 एकड़ था और इसमें 120 भवन तथा शालाएँ थीं।
यहाँ उपदेश, ध्यान, भोजन, स्नान, औषध-सेवा, अध्ययन और पुस्तक-संग्रह के लिए अलग-अलग व्यवस्था थी। पुस्तकालयों में बौद्ध धर्म के साथ-साथ वैदिक और अन्य दार्शनिक ग्रंथ भी उपलब्ध थे। विहार नगर से उचित दूरी पर स्थित था, जिससे शांति बनी रहती थी और आवश्यक सुविधाएँ भी उपलब्ध हो जाती थीं।
अनाथपिंडक की भूमि-क्रय कथा
बौद्ध परंपरा के अनुसार श्रावस्ती के धनी सेठ अनाथपिंडक ने राजकुमार जेत की स्वामित्व वाली इस भूमि को खरीदने के लिए जेत की उस शर्त को स्वीकार किया जिसमें कहा गया था कि भूमि को सोने की मुद्राओं से पूरी तरह ढँक देने पर ही वह भूमि बेची जाएगी। अनाथपिंडक ने अपनी संपत्ति व्यय कर इस शर्त को पूरा किया, जिससे प्रभावित होकर राजकुमार जेत ने स्वयं भी शेष भूमि तथा वृक्षों को गौतम बुद्ध के संघ को दान में समर्पित कर दिया। इसी कारण इस विहार का नाम ‘जेतवन’ (जेत का वन) पड़ा। गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के अंतिम 20-25 वर्षों में से अधिकांश वर्षावास इसी जेतवन विहार में व्यतीत किए थे, जिस कारण यह स्थान बौद्ध साहित्य में विशेष महत्त्वपूर्ण है और अनेक प्रमुख सुत्तों का उपदेश यहीं दिया गया था।
अशोक और बौद्ध विहारों का विकास
गौतम बुद्ध के पश्चात सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनेक विहारों और स्तूपों का निर्माण कराया। अजंता की गुफाएँ भी बौद्ध शिक्षण और साधना के केंद्र के रूप में विकसित हुईं, जिनमें उत्कृष्ट चित्रकला और मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय मिलता है।
तृतीय संगीति और धर्म-प्रचारक
सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया, जिसकी अध्यक्षता स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। इसी संगीति के पश्चात अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अपने पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा सहित अनेक धर्म-प्रचारकों को श्रीलंका, गांधार, कश्मीर, स्वर्णभूमि (दक्षिण-पूर्व एशिया) जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भेजा। इन धर्म-प्रचारकों ने जहाँ-जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार किया, वहाँ भी स्थानीय विहारों तथा शिक्षण-केंद्रों की स्थापना हुई, जिससे भारत के बौद्ध शिक्षण-मॉडल का प्रभाव एशिया के अन्य भागों तक भी विस्तृत हो गया।
अजंता की गुफाएँ, जो महाराष्ट्र में स्थित हैं, का निर्माण-काल दो चरणों में विभाजित माना जाता है- प्रथम चरण हीनयान काल (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.) से संबंधित है, जबकि द्वितीय एवं अधिक भव्य चरण वाकाटक शासकों, विशेषतः हरिषेण के संरक्षण में महायान काल (लगभग पाँचवीं शताब्दी ई.) में विकसित हुआ। यहाँ कुल 29 गुफाएँ हैं, जिनमें चैत्य-गृह (पूजा-स्थल) तथा विहार (आवास एवं अध्ययन-कक्ष) दोनों सम्मिलित हैं और भित्ति-चित्रों में जातक-कथाओं का अत्यंत सजीव तथा कलात्मक चित्रण मिलता है।
फाह्यान और ह्वेनसांग के वर्णन
चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग ने भारत के बौद्ध विहारों का विस्तृत वर्णन किया है। फाह्यान के अनुसार विभिन्न प्रदेशों में सैकड़ों विहार थे, जहाँ हजारों भिक्षु निवास करते थे। ह्वेनसांग के अनुसार उसके समय भारत में लगभग 6000 विहार थे और उनमें ढाई लाख भिक्षु रहते थे।
यात्रा-काल और उद्देश्य
फाह्यान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में लगभग 399-412 ईस्वी के मध्य बौद्ध ग्रंथों तथा विनय-संहिताओं की मूल प्रतियाँ प्राप्त करने के उद्देश्य से भारत आया था और उसने अपनी यात्रा का वर्णन ‘फो-क्वो-की’ (बौद्ध देशों का वर्णन) नामक ग्रंथ में किया है। इसके लगभग दो शताब्दी पश्चात ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में लगभग 630-645 ईस्वी के मध्य भारत आया और उसने अपनी यात्रा-विवरण ‘सी-यू-की’ (पश्चिमी क्षेत्रों का वर्णन) में नालंदा सहित अनेक विहारों का अत्यंत विस्तृत तथा प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। ह्वेनसांग स्वयं नालंदा में कई वर्षों तक अध्ययनरत रहा था और उसका वर्णन नालंदा के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन स्रोत माना जाता है।
नालंदा विश्वविद्यालय
नालंदा प्राचीन भारत का सबसे प्रसिद्ध बौद्ध शिक्षण केंद्र था। यह एक विशाल विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ था। यहाँ हजारों विद्यार्थी और आचार्य रहते थे। नालंदा में बौद्ध धर्म के साथ-साथ व्याकरण, तर्क, दर्शन, चिकित्सा आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। चीन, तिब्बत, कोरिया और जापान से विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे। इसकी विशालता, सुंदरता और शिक्षण-व्यवस्था अद्वितीय थी।
स्थापना, प्रमुख आचार्य और विनाश
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (लगभग पाँचवीं शताब्दी ई. के प्रारंभ) द्वारा की गई थी और बाद के गुप्त तथा हर्षवर्धन जैसे शासकों ने भी इसे उदार दान तथा संरक्षण प्रदान किया। ह्वेनसांग के अनुसार यहाँ लगभग 10,000 विद्यार्थी तथा 1500-2000 आचार्य निवास करते थे और प्रवेश के लिए द्वारपंडित द्वारा अत्यंत कठिन प्रवेश-परीक्षा ली जाती थी, जिसमें केवल लगभग 20 प्रतिशत अभ्यर्थी ही उत्तीर्ण हो पाते थे। नालंदा में नागार्जुन, आर्यदेव, वसुबंधु, धर्मपाल, शीलभद्र तथा दिङ्नाग जैसे विश्वप्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों ने अध्यापन कार्य किया। नालंदा में नौ मंजिला एक विशाल पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ भी था, जिसमें तीन भवन- रत्नसागर, रत्नोदधि तथा रत्नरंजक सम्मिलित थे। कहा जाता है कि इस गौरवशाली शिक्षा-केंद्र को लगभग 1193 ईस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने ध्वस्त करा दिया था, जिससे भारत में बौद्ध शिक्षा-परंपरा को अपूरणीय क्षति पहुँची।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय
विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पालवंशी शासक धर्मपाल ने की थी। यह भी बौद्ध शिक्षा का एक महान केंद्र था। यहाँ लगभग 3000 विद्यार्थी अध्ययन करते थे और अनेक प्रसिद्ध आचार्य कार्यरत थे। इसका संचालन सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा किया जाता था और इसका व्यय दान तथा भेंट से पूरा होता था।
स्थापना-काल, विषय और प्रसिद्ध आचार्य
विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग आठवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में गंगा नदी के तट पर वर्तमान बिहार के भागलपुर जिले में हुई थी और नालंदा के पतनोन्मुख होने के पश्चात यह तांत्रिक बौद्ध अध्ययन (वज्रयान) का प्रमुख केंद्र बन गया। यहाँ 108 आचार्यों की स्थायी नियुक्ति की व्यवस्था थी, जिनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध आचार्य अतीश दीपंकर श्रीज्ञान थे, जिन्होंने ग्यारहवीं शताब्दी में तिब्बत जाकर वहाँ बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्रमशिला में तर्कशास्त्र, व्याकरण, तंत्रशास्त्र तथा दर्शन की विशेष शिक्षा दी जाती थी और यहाँ भी नालंदा की भाँति प्रवेश के लिए द्वारपंडितों द्वारा परीक्षा ली जाती थी। बताया जाता है कि यह विश्वविद्यालय भी लगभग 1193 ईस्वी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण में नष्ट कर दिया गया था।
बलभी, ओदंतपुरी और अन्य केंद्रों का विवरण
नालंदा और विक्रमशिला के अतिरिक्त बलभी, कश्मीर, वाराणसी और ओदंतपुरी आदि स्थानों पर भी बौद्ध शिक्षा के केंद्र विकसित हुए। इन केंद्रों में विभिन्न शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी और देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ अध्ययन हेतु आते थे।
गुजरात में स्थित बलभी विश्वविद्यालय मैत्रक वंश के शासकों के संरक्षण में विकसित हुआ था और यह हीनयान बौद्ध परंपरा, विशेषतः सम्मितीय शाखा के अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। ह्वेनसांग के अनुसार यहाँ की शिक्षा-गुणवत्ता नालंदा के समकक्ष मानी जाती थी।
बिहार में स्थित ओदंतपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना पाल शासक गोपाल द्वारा की गई थी और यह भी वज्रयान बौद्ध अध्ययन का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। कुछ इतिहासकार इसे विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय मानते हैं।
इनके अतिरिक्त बंगाल में सोमपुर महाविहार (पाल शासक धर्मपाल द्वारा स्थापित, जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है) तथा जगद्दल महाविहार भी पाल-काल में विकसित हुए महत्त्वपूर्ण बौद्ध शिक्षण-केंद्र थे। कश्मीर क्षेत्र भी बौद्ध विद्वानों तथा दार्शनिक चिंतन का प्राचीन काल से ही एक प्रमुख केंद्र रहा, जहाँ से अनेक विद्वान मध्य एशिया तथा चीन तक बौद्ध धर्म का प्रचार करने गए थे।
इस प्रकार प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षण केंद्रों ने शिक्षा, संस्कृति और धर्म के प्रसार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये केंद्र केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने दर्शन, विज्ञान, कला और साहित्य के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वैदिक कालीन गुरुकुल-परंपरा से आरंभ होकर गौतम बुद्ध द्वारा स्थापित विहार-व्यवस्था, अशोक के धर्म-प्रचार अभियान तथा अंततः नालंदा, विक्रमशिला, बलभी, ओदंतपुरी और सोमपुर जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों तक की यह संपूर्ण विकास-यात्रा भारत की शिक्षा-परंपरा की गहराई और वैश्विक प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण है। यद्यपि बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणों के परिणामस्वरूप इनमें से अधिकांश केंद्र नष्ट हो गए, तथापि भारत की यह समृद्ध शैक्षिक परंपरा आज भी विश्व के लिए प्रेरणास्रोत है।


