वहाबी आंदोलन (1826–1869 ई.)
वहाबी आंदोलन का परिचय
वहाबी आंदोलन (1826–1869 ई.) भारत में मुस्लिम समाज का एक प्रमुख धार्मिक सुधारवादी एवं राजनीतिक आंदोलन था। इसका उद्देश्य इस्लाम धर्म को प्रचलित कुरीतियों और गैर-इस्लामी प्रथाओं से मुक्त करके उसका शुद्धीकरण करना तथा विदेशी शासन का विरोध करना था। इस आंदोलन को वैचारिक प्रेरणा अरब के मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब के सुधारवादी विचारों से मिली थी, जबकि भारत में इसे संगठित और व्यापक रूप देने का श्रेय रायबरेली के सैयद अहमद बरेलवी को दिया जाता है। आंदोलन का प्रारंभिक प्रमुख मैदानी केंद्र पटना था, जहाँ से इसकी गतिविधियों का संचालन विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता था, जबकि सिताना (वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में) इसका महत्त्वपूर्ण सैन्य केंद्र था।
प्रारंभ में सैयद अहमद बरेलवी ने पंजाब में सिख शासन के विरुद्ध संघर्ष को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया, किंतु 1849 ई. में पंजाब के ब्रिटिश राज्य में विलय के बाद आंदोलन का प्रमुख विरोध ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हो गया। वहाबी विचारधारा में ऐसे क्षेत्र को, जहाँ मुस्लिम शासन न हो और गैर-मुस्लिम सत्ता का शासन हो, ‘दार-उल-हर्ब’ कहा जाता था, जबकि मुस्लिम शासन वाले क्षेत्र को ‘दार-उल-इस्लाम’ माना जाता था। इसी विचारधारा के अंतर्गत भारत में गैर-मुस्लिम शासन को समाप्त करके मुस्लिम शासन स्थापित करने की आकांक्षा भी आंदोलन के राजनीतिक पक्ष से जुड़ी थी। इसके अनुयायियों ने धार्मिक सुधार के साथ-साथ विदेशी सत्ता के विरोध, स्वावलंबन और राजनीतिक प्रतिरोध पर बल दिया। 1857 ई. के विद्रोह के दौरान भी अनेक वहाबी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर अंग्रेज-विरोधी गतिविधियों में भाग लेने के आरोप लगे।
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए व्यापक दमनात्मक कार्रवाई की और अंबाला (1864 ई.) तथा पटना (1865 ई.) सहित कई वहाबी मुकदमों के माध्यम से इसके नेताओं और समर्थकों को गिरफ्तार एवं दंडित किया। इन मुकदमों और लगातार सरकारी दमन के परिणामस्वरूप 1860 के दशक के उत्तरार्ध तक वहाबी आंदोलन की संगठित राजनीतिक गतिविधियाँ कमजोर पड़ गईं और लगभग 1869 ई. तक इसका प्रभाव काफी कम हो गया।
अरब में वहाबी आंदोलन की उत्पत्ति
वहाबी आंदोलन अठारहवीं शताब्दी में मध्य अरब के नज्द क्षेत्र में उदित एक धार्मिक सुधारवादी और पुनरुत्थानवादी आंदोलन था। इसका नेतृत्व मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब (1703–1792 ई.) ने किया। वे हंबली परंपरा से प्रभावित विद्वान थे और इस्लाम को उन धार्मिक मान्यताओं तथा प्रथाओं से मुक्त करना चाहते थे, जिन्हें वे बाद की जोड़ या ‘बिदअत’ मानते थे। उन्होंने मुसलमानों से कुरान और हदीस की शिक्षाओं की ओर लौटने तथा प्रारंभिक मुस्लिम पीढ़ियों, जिन्हें ‘सलफ़’ कहा जाता है, के आदर्शों का अनुसरण करने का आह्वान किया। आंदोलन के अनुयायी स्वयं को प्रायः ‘मुवह्हिदून’ (एकेश्वरवाद) में विश्वास रखने वाला कहते थे, जबकि ‘वहाबी’ नाम मुख्यतः बाहरी लोगों द्वारा प्रयुक्त किया गया।
मुहम्मद बिन सऊद से गठबंधन और सऊदी राजनीतिक विस्तार
वहाबी आंदोलन के इतिहास में 1744 ई. एक महत्त्वपूर्ण समय था, जब मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने स्थानीय शासक मुहम्मद बिन सऊद के साथ समझौता किया। इस समझौते ने धार्मिक सुधार और राजनीतिक सत्ता को एक-दूसरे से जोड़ दिया तथा आगे चलकर सऊदी राजनीतिक शक्ति के विस्तार का आधार तैयार किया। इस गठबंधन के परिणामस्वरूप वहाबी विचारधारा को राजनीतिक संरक्षण मिला और सऊदी सत्ता के विस्तार के साथ इसका प्रभाव भी बढ़ता गया। आगे चलकर मक्का तथा मदीना जैसे इस्लाम के पवित्र नगर भी इसके राजनीतिक प्रभाव में आए। बीसवीं शताब्दी में सऊदी अरब के तेल-आधारित आर्थिक विकास के बाद धार्मिक पुस्तकों, शिक्षण संस्थानों, मस्जिदों, छात्रवृत्तियों और विद्वानों के माध्यम से इस विचारधारा का अंतरराष्ट्रीय प्रसार और अधिक व्यापक हुआ।
भारतीय पृष्ठभूमि : शाह वलीउल्लाह की सुधारवादी परंपरा
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय मुस्लिम समाज के एक वर्ग में धार्मिक सुधार तथा इस्लाम की मूल शिक्षाओं की ओर लौटने की प्रवृत्ति विकसित हुई। इस सुधारवादी विचारधारा की बौद्धिक पृष्ठभूमि दिल्ली के संत शाह वलीउल्लाह देहलवी की शिक्षाओं में निहित थी। आगे चलकर उनके पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ तथा शाह इस्माइल दहलवी जैसे विद्वानों ने धार्मिक शुद्धता, एकेश्वरवाद, कुरान-हदीस के अनुरूप जीवन तथा धार्मिक आडंबरों के विरोध पर बल दिया।
शाह वलीउल्लाह भारत से अंग्रेजों को हटाकर पुनः इस्लामिक शासन लाना चाहते थे। उनका मानना था कि भारत को ‘दार-उल-हर्ब’ (दुश्मनों का देश) नहीं, बल्कि ‘दार-उल-इस्लाम’ (इस्लाम का देश) बनाया जाना चाहिए और इसके लिए अंग्रेजों से ‘धर्मयुद्ध’ करना अनिवार्य है। उनका यह भी मानना था कि अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का सहयोग देना इस्लाम-विरोधी कार्य है। इसी व्यापक सुधारवादी वातावरण में सैयद अहमद बरेलवी (1786–1831 ई.) का प्रभाव बढ़ा और वे शाह वलीउल्लाह की इसी विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए।
भारतीय मुस्लिम राजनीतिक चिंतन में ‘दार-उल-हर्ब’ इस्लामी न्यायशास्त्र की एक ऐतिहासिक अवधारणा थी, जिसका प्रयोग सामान्यतः ऐसे क्षेत्र के लिए किया जाता था जो मुस्लिम राजनीतिक शासन के अधीन न हो। किंतु ब्रिटिश शासन के अधीन भारत की स्थिति को लेकर मुस्लिम विद्वानों के बीच इस अवधारणा की व्याख्या एक समान नहीं थी। सैयद अहमद और उनके अनुयायियों के राजनीतिक विचारों में धार्मिक पुनरुत्थान और मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना का तत्त्व अवश्य मौजूद था, किंतु आंदोलन से जुड़े विभिन्न नेताओं-समूहों के विचारों तथा राजनीतिक परिस्थितियों में पर्याप्त अंतर था। इसलिए भारतीय वहाबी आंदोलन के संपूर्ण उद्देश्य को केवल भारत को ‘दार-उल-हर्ब’ से ‘दार-उल-इस्लाम’ में परिवर्तित करना बताना सरलीकरण होगा और इस अवधारणा को पूरे आंदोलन की एकमात्र राजनीतिक व्याख्या नहीं बनाया जाना चाहिए।
सैयद अहमद बरेलवी: प्रारंभिक जीवन और वैचारिक विकास
सैयद अहमद बरेलवी का जन्म 1786 ई. में रायबरेली में हुआ था। 1821 ई. में वे मक्का गए और वहीं अरब के इब्न अब्दुल वहाब द्वारा चलाए गए वहाबी संप्रदाय से प्रभावित हुए। इन विचारों से प्रभावित होकर वे लगभग दो वर्ष बाद (1823 ई. के आसपास) एक ‘कट्टर धर्मयोद्धा’ के रूप में भारत लौटे और यहाँ वहाबी विचारों का प्रचार करना प्रारंभ किया। शाह वलीउल्लाह की विचारधारा से गहराई से प्रभावित होने के कारण भारत में इस आंदोलन को ‘तरीक़ा-ए-मुहम्मदिया’ अथवा ‘वलीउल्लाही आंदोलन’ भी कहा जाता है। इसी वैचारिक संबंध के कारण सैयद अहमद को इस ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) का नेता अर्थात् ‘इमाम’ चुना गया। उनकी सहायता के लिए एक परिषद का गठन किया गया और देशव्यापी संगठन खड़ा करने के उद्देश्य से उनके अधीन चार खलीफाओं की नियुक्ति की गई। सैयद अहमद के विचार ‘सिरात-ए-मुस्तक़ीम’ नामक एक फ़ारसी ग्रंथ में संकलित हैं।
धार्मिक सुधार के साथ-साथ सैयद अहमद ने मुस्लिम समाज में नैतिक अनुशासन और संगठन स्थापित करने का प्रयास किया। वे ऐसी धार्मिक प्रथाओं का विरोध करते थे जिन्हें वे इस्लाम की मूल शिक्षाओं के अनुरूप नहीं मानते थे तथा कुरान-हदीस पर आधारित जीवन, एकेश्वरवाद और नैतिक आचरण पर बल देते थे। उनके आंदोलन का प्रारंभिक उद्देश्य धार्मिक-सामाजिक सुधार था, किंतु आगे चलकर इसमें राजनीतिक और सैन्य तत्व भी शामिल हो गए। इस प्रसार में रायबरेली और दिल्ली जैसे क्षेत्र महत्त्वपूर्ण रहे। दिल्ली शाह वलीउल्लाह की सुधारवादी परंपरा का प्रमुख बौद्धिक केंद्र था, जबकि रायबरेली सैयद अहमद के जीवन और प्रारंभिक गतिविधियों से जुड़ा था।

भारतीय इतिहास में सैयद अहमद बरेलवी से संबंधित इस आंदोलन को बाद में ब्रिटिश अधिकारियों और अनेक इतिहासकारों ने ‘वहाबी आंदोलन’ कहा, किंतु भारतीय आंदोलन को अरब में मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब द्वारा चलाए गए आंदोलन का पूर्ण पर्याय मानना उचित नहीं है। सैयद अहमद की गतिविधियाँ भारतीय मुस्लिम सुधारवादी परंपरा, विशेषकर शाह वलीउल्लाह की वैचारिक परंपरा, से गहराई से जुड़ी थीं। इसीलिए इस आंदोलन को तरीक़ा-ए-मुहम्मदिया तथा ‘मुजाहिदीन आंदोलन’ के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तर-पश्चिम की ओर अभियान और सिख सत्ता के विरुद्ध संघर्ष (1826 ई.)
भारत में वहाबी आंदोलन का सक्रिय राजनीतिक-सैन्य आरंभ 1826 ई. में हुआ। यद्यपि यह आंदोलन मूलतः धार्मिक था, सैयद अहमद बरेलवी ने इसे राजनीतिक स्वरूप देते हुए अपने अनुयायियों को शस्त्र धारण करने के लिए प्रशिक्षित किया और स्वयं भी सैनिक वेशभूषा धारण की। एकेश्वरवाद और ‘हिजरत’ अर्थात् दुश्मनों को भारत से भगाने का प्रण लेकर उन्होंने पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के कबायली इलाके में ‘सिताना’ को केंद्र बनाया और अपने लगभग 3000 समर्थकों के साथ पेशावर में एक स्वतंत्र शासन की स्थापना की। सीमाप्रांत में शासन चलाने हेतु अस्त्र-शस्त्र, धन और जन बंगाल से सिताना तक बनाए गए खानकाहों के माध्यम से, जो गुप्त रूप से सहायता पहुँचाने का माध्यम थे, वहाँ पहुँचाए जाने लगे।
उस समय पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में सिख सत्ता का प्रभाव था और इस चरण में आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक-सैन्य लक्ष्य सिख शासन का विरोध था। इसलिए 1826 ई. के इस प्रारंभिक अभियान को सीधे ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। पेशावर और यूसुफज़ई क्षेत्र इस दौर में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बने। 1826 से 1831 ई. के बीच सैयद अहमद और उनके अनुयायियों ने स्थानीय पठान कबीलों तथा अन्य समर्थकों को संगठित करते हुए उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में सिख शासन के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। इस अवधि को आंदोलन के विकास का निर्णायक प्रारंभिक राजनीतिक चरण माना जा सकता है, यद्यपि धार्मिक सुधार इसकी मूल वैचारिक पृष्ठभूमि बना रहा।
बालाकोट का युद्ध और सैयद अहमद की मृत्यु (1831 ई.)
आंदोलन के इतिहास में 1831 ई. निर्णायक वर्ष था। 6 मई 1831 ई. को बालाकोट के युद्ध में सिख सेना के साथ संघर्ष के दौरान सैयद अहमद बरेलवी और शाह इस्माइल दहलवी मारे गए। उनकी मृत्यु के बाद आंदोलन को पहले जैसा केंद्रीय नेतृत्व प्राप्त नहीं रहा, यद्यपि इससे आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उनके अनुयायियों ने उत्तर-पश्चिमी सीमांत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं। परिणामस्वरूप आंदोलन का स्वरूप एक केंद्रीय नेता के नेतृत्व वाले अभियान से बदलकर विभिन्न स्थानीय केंद्रों और नेटवर्कों पर आधारित हो गया।
सीमांत संबंध और पटना केंद्र का उदय (1831-1849 ई.)
1831 ई. के बाद सैयद अहमद के अनुयायियों ने उत्तर-पश्चिमी सीमांत में धार्मिक प्रचार, संगठन और सशस्त्र प्रतिरोध की गतिविधियाँ जारी रखीं। सिताना जैसे क्षेत्र आंदोलन से जुड़े अनुयायियों के लिए महत्त्वपूर्ण आधार बने रहे, और इस अवधि में आंदोलन का स्वरूप अधिक विकेंद्रित हो गया, जिसमें विभिन्न स्थानीय नेतृत्व केंद्रों ने अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार कार्य किया। इसी दौरान भारत के मैदानी क्षेत्रों और सीमांत के बीच संपर्क बनाए रखने वाले नेटवर्क भी विकसित हुए, जिसमें आगे चलकर पटना एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बना।
पटना के विलायत अली और इनायत अली जैसे नेताओं ने सैयद अहमद की मृत्यु के बाद आंदोलन को पुनर्गठित करने और उसकी गतिविधियों को व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इतिहासकार क़यामुद्दीन अहमद के अध्ययन के अनुसार, बालाकोट के बाद आंदोलन कुछ समय के लिए कमजोर हुआ, लेकिन पटना के अनुयायियों ने इसे पुनर्जीवित किया। 19वीं शताब्दी के मध्य तक पटना धार्मिक विद्वानों, अनुयायियों और समर्थकों के ऐसे नेटवर्क का केंद्र बन गया, जिसका संपर्क उत्तर-पश्चिमी सीमांत के सक्रिय समूहों से था। इन्हीं संपर्कों के माध्यम से धार्मिक प्रचार, आर्थिक सहायता, संदेशों और लोगों की आवाजाही का तंत्र संचालित होता था। इस प्रकार आंदोलन का स्वरूप बहु-केंद्रीय हो गया: उत्तर-पश्चिमी सीमांत का सिताना क्षेत्र मुख्यतः सैन्य-संगठनात्मक आधार बना, जबकि पटना और बंगाल जैसे मैदानी क्षेत्र संपर्क, प्रचार और आर्थिक सहयोग के केंद्र के रूप में उभरे।
बंगाल में वहाबी आंदोलन: तितू मीर का संघर्ष
बंगाल में वहाबी आंदोलन के नेता तितू मीर थे, जिनके आंदोलन में किसानों और शिल्पकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जमींदारों द्वारा कर बढ़ाए जाने का वहाबी समर्थकों, जो अधिकांशतः किसान वर्ग से थे, ने विरोध किया। जब नदिया (बंगाल) के जमींदार कृष्णराय ने लगान की राशि बढ़ाई, तो तितू मीर ने उन पर हमला कर दिया। ऐसी कई घटनाएँ अन्य स्थानों पर भी हुईं जहाँ जमींदारों को विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे तितू मीर किसानों के लिए एक मसीहा बन गए। एक अवसर पर तितू मीर ने अपने वहाबी समर्थकों के साथ अंग्रेजी सेना द्वारा बनाए गए एक किले को नष्ट कर दिया, किंतु वे इसी संघर्ष में मारे गए।

पंजाब का ब्रिटिश शासन में विलय और आंदोलन की दिशा में परिवर्तन (1849 ई.)
1849 ई. में द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया। यह घटना आंदोलन के राजनीतिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ थी। सैयद अहमद के जीवनकाल में आंदोलन का प्रमुख संघर्ष सिख सत्ता के विरुद्ध था, किंतु 1849 ई. के बाद उसी क्षेत्र में ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया, जिसके परिणामस्वरूप आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों का संघर्ष धीरे-धीरे ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरोध से भी जुड़ गया। पंजाब और पश्चिमोत्तर प्रांतों में वहाबी आंदोलन के समर्थकों और अंग्रेजों के बीच कई बार मुठभेड़ हुई और 1849 ई. के बाद यह आंदोलन मौलवी अहमदुल्ला के नेतृत्व में स्पष्ट रूप से ब्रिटिश-विरोधी स्वरूप धारण करने लगा। फलतः अंग्रेजों ने वहाबियों के केंद्र सिताना और मुल्का को नष्ट कर दिया; अनेक समर्थक गिरफ्तार हुए और कई लोगों पर मुकदमा चलाकर काला पानी तथा कारावास की सजा दी गई।
धर्मयुद्ध की घोषणा और प्रारंभिक ब्रिटिश दमन (1852-1860 ई.)
पटना के वहाबियों ने 1852 ई. में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी, जिसमें उन्हें ग्रामीण किसानों और नगरों के निवासियों दोनों से बड़ा समर्थन मिला। इनायत अली को इस दौर में बंगाल का कार्यभार दिया गया था। अंग्रेजों को यह भय था कि वहाबियों को अफ़गानिस्तान अथवा रूस से सहायता मिल सकती है, इसलिए 1860 ई. के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनात्मक सैनिक कार्रवाई करते हुए वहाबियों को बंगाल एवं बिहार से निष्कासित कर दिया और पटना के केंद्र को भी नष्ट कर दिया। पीर अली, शेख करामत अली आदि इस दौर के अन्य महत्त्वपूर्ण वहाबी नेता थे।
वास्तव में ब्रिटिश प्रशासन ने ‘वहाबी’ शब्द का प्रयोग कई बार अत्यंत व्यापक अर्थ में किया, इसलिए उस समय ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा ‘वहाबी’ कहे गए प्रत्येक व्यक्ति या समूह को एक ही केंद्रीकृत संगठन का सदस्य मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
1857 का विद्रोह और ब्रिटिश संदेह
1857 ई. के विद्रोह के दौरान और विशेष रूप से उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन मुस्लिम धार्मिक-सामाजिक नेटवर्कों पर विशेष निगरानी रखी जिन्हें वह ब्रिटिश-विरोधी मानती थी। वहाबी गतिविधियों से जुड़े कुछ व्यक्तियों पर विद्रोहियों की सहायता करने तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध षड्यंत्र करने के आरोप लगाए गए। किंतु सभी वहाबी अनुयायियों को 1857 ई. के विद्रोह में एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में शामिल बताना सही नहीं है। 1857 ई. के बाद ब्रिटिश प्रशासन का संदेह अवश्य बढ़ा और उसने पटना तथा अन्य केंद्रों से जुड़े लोगों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी। आंदोलन के इतिहास में 1857 ई. को एक महत्त्वपूर्ण संक्रमण-बिंदु के रूप में देखना उपयुक्त है, न कि उसकी समस्त गतिविधियों का एकमात्र आधार मानना।
अंबेला युद्ध (1863 ई.)
आंदोलन के इतिहास में 1863 ई. का अंबेला (अंबेयला) युद्ध अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उत्तर-पश्चिमी सीमांत में ब्रिटिश सैन्य अभियान और मुजाहिदीन प्रतिरोध के बीच संघर्ष इस समय अपने चरम पर पहुँचा। क़यामुद्दीन अहमद के अध्ययन में अंबेला युद्ध को आंदोलन के उत्कर्ष का चरण माना गया है। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए अधिक कठोर प्रशासनिक और सैन्य कदम उठाए- गिरफ्तारियाँ, संपत्ति की जब्ती, निगरानी तथा न्यायिक कार्रवाई तेज कर दी गई, ताकि आंदोलन से जुड़े नेटवर्कों की आर्थिक-संगठनात्मक शक्ति को कमजोर किया जा सके। इस प्रकार 1863 ई. का अंबेला युद्ध और उसके बाद के मुकदमे आंदोलन के दमन के दो परस्पर जुड़े, किंतु अलग-अलग चरण थे।
वहाबी मुकदमे (1864-1865 ई.)
ब्रिटिश दमन का प्रमुख कानूनी चरण 1864–1865 ई. में सामने आया। 1864 ई. का अंबाला मुकदमा और 1865 ई. का पटना मुकदमा इस प्रक्रिया के प्रमुख उदाहरण थे, जिनमें उन व्यक्तियों पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध षड्यंत्र और सीमांत क्षेत्र में सक्रिय सशस्त्र समूहों को सहायता पहुँचाने जैसे आरोप लगाए गए। पटना मुकदमे से संबंधित ऐतिहासिक अध्ययन में मौलवी अहमदुल्लाह के मुकदमे को विशेष महत्त्व दिया गया है। इन मुकदमों के परिणामस्वरूप अनेक व्यक्तियों को दीर्घकालीन कारावास तथा अंडमान द्वीपसमूह में निर्वासन जैसी सजाएँ दी गईं। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत नेताओं को दंडित करना नहीं था, बल्कि भारत के विभिन्न मैदानी केंद्रों और उत्तर-पश्चिमी सीमांत के बीच मौजूद संगठनात्मक तथा आर्थिक संपर्क को भी कमजोर करना था।
1860 के दशक का उत्तरार्ध: आंदोलन का क्षय
1860 के दशक के उत्तरार्ध तक लगातार गिरफ्तारियों, मुकदमों, निर्वासन, संपत्ति की जब्ती और सरकारी निगरानी के कारण आंदोलन की संगठित राजनीतिक एवं सैन्य शक्ति काफी कमजोर हो गई, विशेष रूप से पटना जैसे मैदानी केंद्रों और उत्तर-पश्चिमी सीमांत के बीच संपर्क तंत्र को तोड़ने की ब्रिटिश नीति प्रभावी रही। किंतु 1869 ई. को आंदोलन के पूर्ण अंत का निश्चित वर्ष मानना उचित नहीं है क्योंकि 1863–65 ई. के मुकदमों के बाद भी आंदोलन की गतिविधियों और दमन की प्रक्रिया जारी रहने का उल्लेख मिलता है तथा 1870–1871 ई. में राजमहल, मालदा और पटना में और मुकदमे चलाए जाने का भी उल्लेख है। इस प्रकार स्पष्ट है कि 1860 के दशक के उत्तरार्ध तक आंदोलन की संगठित राजनीतिक शक्ति निर्णायक रूप से कमजोर हो गई, जबकि उसकी शेष गतिविधियाँ आगे भी कुछ समय तक जारी रहीं।
वहाबी आंदोलन के धार्मिक सिद्धांत
वहाबी आंदोलन का केंद्रीय सिद्धांत तौहीद, अर्थात् ईश्वर की एकता, था। आंदोलन के समर्थकों ने ऐसी धार्मिक प्रथाओं का विरोध किया जिन्हें वे ईश्वर की उपासना में मध्यस्थता या साझेदारी का रूप मानते थे, विशेष रूप से संतों की पूजा, कब्रों और दरगाहों से संबंधित प्रथाओं, मजारों की यात्रा तथा उनसे सहायता या सिफारिश माँगने जैसी परंपराओं की आलोचना की गई, क्योंकि उनके अनुसार उपासना और सहायता की अंतिम अपेक्षा केवल ईश्वर से होनी चाहिए। इसी कारण उन्होंने ऐसी प्रथाओं को शिर्क या धार्मिक विचलन के रूप में देखा।
धार्मिक आचरण में यह विचारधारा अपेक्षाकृत कठोर अनुशासन पर बल देती थी। इसके समर्थकों ने पाँचों समय की नमाज़, धार्मिक कर्तव्यों के पालन तथा सार्वजनिक नैतिकता पर विशेष जोर दिया और संगीत, कुछ प्रकार के मनोरंजन, संत-पूजा, मजारों से जुड़ी प्रथाओं की आलोचना की, जिन्हें वे बिदअत या शिर्क मानते थे। यद्यपि इन सभी प्रथाओं के संबंध में सभी वहाबी विद्वानों और अनुयायियों के विचार समान नहीं थे तथा समय और स्थान के अनुसार व्यवहार में भी परिवर्तन दिखाई देता है।
तकलीद का विरोध और इज्तिहाद का समर्थन
वहाबी विद्वानों ने धार्मिक मामलों में किसी एक विद्वान या मजहबी परंपरा का बिना विचार किए अनुसरण करने वाली ‘तकलीद’ की आलोचना की, और ‘इज्तिहाद’ (धार्मिक ग्रंथों) के आधार पर स्वतंत्र विवेचन एवं कानूनी निर्णय को महत्त्व दिया। उनके अनुसार धार्मिक प्रश्नों का समाधान मुख्यतः कुरान और हदीस से खोजा जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर इज्मा तथा स्वतंत्र धार्मिक विवेचन का सहारा लिया जा सकता था। इस दृष्टिकोण के कारण उनका मत उन धार्मिक विद्वानों से अलग दिखाई दिया जो परंपरागत मजहबी अनुकरण को अधिक महत्त्व देते थे।
वहाबीवाद, सलाफीवाद और अहल-ए-हदीस: संबंध और अंतर
वहाबीवाद और सलाफीवाद को अकसर एक-दूसरे का पर्याय समझ लिया जाता है, किंतु दोनों में अंतर है। सलाफीवाद एक व्यापक धार्मिक प्रवृत्ति है, जो प्रारंभिक मुस्लिम पीढ़ियों के आदर्शों की ओर लौटने पर बल देती है, जबकि ‘वहाबीवाद’ विशेष रूप से मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब द्वारा अठारहवीं शताब्दी में नज्द में आरंभ किए गए सुधार आंदोलन के लिए प्रयुक्त नाम है। अतः वहाबी विचारधारा को सलाफी परंपरा की एक विशिष्ट ऐतिहासिक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है, किंतु प्रत्येक सलाफी को वहाबी कहना उचित नहीं है।
वहाबी आंदोलन अठारहवीं और बीसवीं शताब्दी में उभरे व्यापक इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलनों की पृष्ठभूमि का ही एक हिस्सा था। इन आंदोलनों का सामान्य उद्देश्य इस्लाम के मूल धार्मिक स्रोतों की ओर लौटना, धार्मिक-सामाजिक जीवन में सुधार लाना तथा उन स्थानीय प्रथाओं को हटाना था, जिन्हें समर्थक इस्लाम की मूल शिक्षाओं से विचलन मानते थे। इसी व्यापक पुनरुत्थानवादी वातावरण में भारत का फराइज़ी आंदोलन, सैयद अहमद बरेलवी का मुजाहिदीन आंदोलन, पश्चिमी अफ्रीका के कुछ इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन तथा अन्य क्षेत्रीय आंदोलनों का विकास हुआ। इनके बीच प्रत्यक्ष समानता मानना उचित नहीं है, किंतु धार्मिक शुद्धीकरण और पुनरुत्थान की समान प्रवृत्तियाँ अवश्य दिखाई देती हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में वहाबी विचारों का प्रभाव स्थानीय परिस्थितियों के साथ जुड़कर विकसित हुआ। बाद में भारतीय अहल-ए-हदीस आंदोलन के अनेक विद्वानों के साथ वहाबी विद्वानों के संपर्क स्थापित हुए- दोनों धाराओं में कुरान-हदीस पर जोर, तकलीद की आलोचना तथा कुछ सूफी प्रथाओं और मजार-केंद्रित धार्मिक व्यवहारों का विरोध जैसी समानताएँ थीं। किंतु भारतीय अहल-ए-हदीस और अरब के वहाबी आंदोलन को पूरी तरह एक ही आंदोलन मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।
‘वहाबी’ नाम को लेकर ऐतिहासिक विवाद
‘वहाबी’ शब्द स्वयं आंदोलन के अनुयायियों द्वारा सदैव स्वीकार नहीं किया गया। प्रारंभिक अनुयायी स्वयं को मुवह्हिदून, मुसलमान, अहल अल-सुन्नत अथवा बाद के समय में सलाफी कहने लगे। उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक अधिकारियों ने ‘वहाबी’ शब्द का प्रयोग कई ऐसे मुस्लिम धार्मिक और राजनीतिक समूहों के लिए भी किया, जिन्हें वे ब्रिटिश शासन के लिए संभावित खतरा मानते थे, भले ही इन समूहों की विचारधाराएँ एक-दूसरे से पूरी तरह समान न हों। इसलिए भारतीय संदर्भ में ‘वहाबी’ शब्द का प्रयोग कई बार व्यापक और राजनीतिक अर्थ में हुआ, न कि किसी एक सुसंगत धार्मिक संप्रदाय के अर्थ में। इसी कारण अरब के वहाबी आंदोलन, सैयद अहमद बरेलवी के तरीक़ा-ए-मुहम्मदिया/मुजाहिदीन आंदोलन, भारतीय अहल-ए-हदीस और आधुनिक सलाफीवाद को एक ही राजनीतिक या धार्मिक आंदोलन मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है। इनके बीच संबंध, प्रभाव और समानताएँ होने के बावजूद इनकी ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और विकास अलग-अलग रहे हैं।
आंदोलन के प्रमुख केंद्र
वहाबी आंदोलन का स्वरूप किसी एक स्थान तक सीमित नहीं था और इसके विभिन्न केंद्रों की भूमिका समय के साथ बदलती रही। रायबरेली सैयद अहमद बरेलवी के जन्म और प्रारंभिक जीवन से संबंधित महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था, जबकि दिल्ली शाह वलीउल्लाह की सुधारवादी परंपरा तथा धार्मिक-बौद्धिक गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा। इस प्रकार ये दोनों क्षेत्र आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़े रहे। पेशावर और यूसुफज़ई क्षेत्र 1826 ई. के बाद आंदोलन के प्रारंभिक राजनीतिक-सैन्य अभियान के प्रमुख क्षेत्र बने, जबकि सिताना 1831 ई. के बाद सीमांत गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण सैन्य आधार बना। पटना उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में धार्मिक प्रचार, आर्थिक सहायता और सीमांत नेटवर्कों से संपर्क का प्रमुख मैदानी केंद्र बना, जबकि बंगाल में भी संबंधित धार्मिक-सामाजिक नेटवर्क सक्रिय रहे।
किसान आंदोलन के रूप में परिवर्तन और व्यापक सामाजिक असंतोष
वहाबी आंदोलन की शुरुआत भले ही मुस्लिम समुदाय के पुनरुत्थान के रूप में हुई हो, किंतु बाद में इस आंदोलन ने दिशा बदल ली। यद्यपि यह आंदोलन देश में मुस्लिम शासन की पुनर्स्थापना के लक्ष्य को लेकर आरंभ हुआ था, किंतु कालांतर में यह मुख्यतः एक किसान आंदोलन बनकर रह गया, जिससे कई हिंदू भी इससे जुड़ गए। यह सही है कि वहाबियों ने किसानों और निम्न वर्ग पर हो रहे अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई और सरकार-विरोधी अभियान चलाकर उन्होंने 1857 ई. के विद्रोह के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करने में भी योगदान दिया।
वैसे भी ब्रिटिश राज की पहली सदी में भारत में हथियारबंद विद्रोह, सामाजिक लूट या कानूनी अराजकता की घटनाएँ सामान्य थीं- विस्थापित राजाओं, जमींदारों और किसानों-दस्तकारों की तरह शहरी समाज के निम्न वर्ग भी प्रतिरोध में उतने ही मुखर थे। इसी व्यापक असंतोष के उदाहरणस्वरूप 1833–38 ई. में पश्चिमी हिंदुस्तान और दिल्ली में अनाज व्यापारियों की जमाखोरी तथा हस्तक्षेप करने वाले ब्रिटिश अफसरों के विरुद्ध अनाज-दंगे और प्रतिरोध हुए; वेल्लोर में चावल के लिए दंगे हुए; और 1806 से 1858 ई. के बीच दक्षिण भारत में ईसाई मत में धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध भी दंगे हुए। इसी प्रकार अंग्रेजों की मुक्त व्यापारवादी नीति के फलस्वरूप हस्तशिल्प उद्योगों के पतन के कारण 1789 ई. में कलकत्ता, 1790 ई. में तथा 1800 के दशक में सूरत और 1809-1818 ई. के बीच रुहेलखंड-बनारस में दस्तकार समूहों के शहरी विद्रोह हुए। यद्यपि ये सभी विद्रोह प्रत्यक्षतः उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन नहीं थे, फिर भी इनका संबंध औपनिवेशिक शासन की नीतियों और तत्कालीन परिस्थितियों से अवश्य था और इसी व्यापक सामाजिक अस्थिरता के परिदृश्य में वहाबी आंदोलन का किसान-आधारित विस्तार समझा जाना चाहिए।
वहाबी आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व
वहाबी आंदोलन ने अठारहवीं शताब्दी के मध्य से अरब की धार्मिक और राजनीतिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला। धार्मिक स्तर पर इस आंदोलन ने तौहीद (एकेश्वरवाद), कुरान और हदीस की शिक्षाओं की ओर वापसी, बिदअत का विरोध तथा इज्तिहाद पर बल दिया। राजनीतिक स्तर पर मुहम्मद बिन सऊद के साथ इसके गठबंधन ने इसे एक शक्तिशाली राज्य-निर्माण प्रक्रिया से जोड़ दिया। आगे चलकर इसकी विचारधारा का प्रभाव अरब से बाहर भी पहुँचा और विभिन्न मुस्लिम सुधारवादी एवं पुनरुत्थानवादी आंदोलनों के साथ इसका वैचारिक संपर्क स्थापित हुआ।
भारतीय वहाबी आंदोलन को एक स्थिर, एकरूप और एक ही उद्देश्य से संचालित आंदोलन के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। इसका विकास एक क्रमिक और बहु-केंद्रीय प्रक्रिया के रूप में हुआ। प्रारंभिक चरण में यह धार्मिक सुधार तथा इस्लाम की मूल शिक्षाओं की ओर लौटने की प्रवृत्ति से जुड़ा था। 1826 ई. के बाद सैयद अहमद बरेलवी के नेतृत्व में यह उत्तर-पश्चिमी भारत में सिख सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक-सैन्य संघर्ष से जुड़ गया। 1831 ई. के बालाकोट युद्ध में सैयद अहमद बरेलवी और शाह इस्माइल दहलवी की मृत्यु के बाद आंदोलन का संगठन अधिक विकेंद्रित हो गया। 1849 ई. में पंजाब के ब्रिटिश शासन के अधीन आने के बाद इससे जुड़े कुछ नेटवर्क ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों से जुड़ गए। इस दौरान पटना, बंगाल और उत्तर भारत के अन्य केंद्रों ने आंदोलन से संबंधित धार्मिक, आर्थिक और संगठनात्मक संपर्कों को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1863 ई. के अंबेला युद्ध के बाद ब्रिटिश दमन तेज हुआ और 1864–1865 ई. के अंबाला तथा पटना मुकदमों ने आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेतृत्व और संगठनात्मक नेटवर्क को गंभीर क्षति पहुँचाई। 1860 के दशक के उत्तरार्ध तक इसकी संगठित राजनीतिक शक्ति काफी कमजोर हो चुकी थी, यद्यपि इससे संबंधित कुछ गतिविधियाँ और मुकदमे 1870–1871 ई. तक भी जारी रहे।
अतः भारतीय इतिहास में ‘वहाबी आंदोलन’ को समझते समय अरब के मूल वहाबी आंदोलन, सैयद अहमद बरेलवी के तरीक़ा-ए-मुहम्मदिया या मुजाहिदीन आंदोलन, तथा ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा व्यापक अर्थ में प्रयुक्त ‘वहाबी’ श्रेणी के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। इन तीनों को एक-दूसरे का पूर्ण पर्याय मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। यह अंतर भारतीय वहाबी आंदोलन के धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा औपनिवेशिक-विरोधी स्वरूप को अधिक सटीक और ऐतिहासिक रूप से सुसंगत ढंग से समझने में सहायता करता है।


