वर्साय की संधि (Treaty of Versailles)

वर्साय की संधि (Treaty of Versailles)
वर्साय की संधि (28 जून 1919 ई.) परिचय कभी-कभी शांति स्थापित करने का प्रयास भी […]

वर्साय की संधि (28 जून 1919 ई.)

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परिचय

कभी-कभी शांति स्थापित करने का प्रयास भी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है, जो भविष्य में संघर्ष का कारण बन जाती हैं। वर्साय की संधि प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918 ई.) के बाद जर्मनी और विजयी मित्र राष्ट्रों तथा उनसे संबद्ध शक्तियों के बीच संपन्न की गई प्रमुख शांति-संधि थी। प्रथम विश्व युद्ध का वास्तविक युद्धविराम 11 नवंबर 1918 ई. को हो चुका था, परंतु युद्ध के बाद स्थायी शांति-व्यवस्था निर्धारित करने के लिए जनवरी 1919 ई. से पेरिस शांति सम्मेलन आयोजित किया गया। लगभग छह महीने तक चली चर्चाओं के बाद जर्मनी के साथ वर्साय की संधि का प्रारूप तैयार किया गया और इस पर 28 जून 1919 ई. को फ्रांस के वर्साय स्थित वर्साय पैलेस के प्रसिद्ध शीशमहल (दर्पण कक्ष) में हस्ताक्षर किए गए। यह संधि 10 जनवरी 1920 ई. से प्रभावी हुई।

इस संधि का उद्देश्य युद्ध के बाद जर्मनी की स्थिति निर्धारित करना, उसकी सैन्य शक्ति को सीमित करना, युद्ध से हुई क्षति की भरपाई की व्यवस्था करना और यूरोप में नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करना था। संधि में राष्ट्र संघ की वाचा को भी शामिल किया गया था। इसके माध्यम से जर्मनी पर राजनीतिक, प्रादेशिक, सैनिक और आर्थिक दृष्टि से अनेक कठोर प्रतिबंध लगाए गए- जर्मनी को अपने यूरोपीय भू-भाग का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा खोना पड़ा, उसके सभी उपनिवेश उससे छीन लिए गए, उसकी सैन्य शक्ति को सीमित कर दिया गया तथा उसे युद्ध से हुई क्षति की भरपाई के लिए क्षतिपूर्ति स्वीकार करनी पड़ी।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद पराजित केंद्रीय शक्तियों के साथ अलग-अलग शांति-संधियाँ की गईं- जर्मनी के साथ वर्साय की संधि (1919 ई.), ऑस्ट्रिया के साथ सेंट-जर्मेन की संधि (1919 ई.), बुल्गारिया के साथ न्यूई की संधि (1919 ई.), हंगरी के साथ त्रियानोन की संधि (1920 ई.) और उस्मानी साम्राज्य के साथ सेव्र की संधि (1920 ई.); बाद में सेव्र की संधि को तुर्की के साथ लॉज़ेन की संधि (1923 ई.) ने प्रभावी रूप से प्रतिस्थापित कर दिया। इन संधियों ने यूरोप और निकटवर्ती क्षेत्रों के राजनीतिक मानचित्र में व्यापक परिवर्तन किए। अनेक पुराने साम्राज्यों का विघटन हुआ, नए या पुनर्गठित राष्ट्रों का उदय हुआ, और मध्य एवं पूर्वी यूरोप में नई राजनीतिक सीमाएँ निर्धारित की गईं। इनमें से वर्साय की संधि का विशेष महत्त्व था, क्योंकि इसकी कठोर शर्तों ने जर्मनी में गहरा असंतोष उत्पन्न किया, जिसका उपयोग बाद में नाजी प्रचार ने जर्मन राष्ट्रवाद को उग्र बनाने और वर्साय व्यवस्था को समाप्त करने के लिए किया। इसलिए वर्साय की संधि को द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, यद्यपि इसे द्वितीय विश्व युद्ध का एकमात्र कारण मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है।

पेरिस शांति सम्मेलन की पृष्ठभूमि

मुख्य लेख : पेरिस शांति सम्मेलन

प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम चरण में अक्टूबर 1918 ई. में जर्मन सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन से सामान्य युद्धविराम की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। जर्मनी ने संकेत दिया कि वह जनवरी 1918 ई. में अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष प्रस्तुत विल्सन के चौदह सूत्रों को एक न्यायपूर्ण शांति के आधार के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार है। यद्यपि मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी से युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की नागरिक आबादी और उनकी संपत्ति को हुई क्षति के लिए क्षतिपूर्ति की माँग की। इसके अतिरिक्त, युद्ध के दौरान ब्रिटेन, फ्रांस और इटली द्वारा किए गए विभिन्न गुप्त समझौतों तथा यूनान, रोमानिया आदि से संबंधित समझौतों ने क्षेत्रीय प्रश्नों को और अधिक जटिल बना दिया।

18 जनवरी 1919 ई. को पेरिस में शांति सम्मेलन आरंभ हुआ। सम्मेलन में अनेक देशों ने भाग लिया, किंतु प्रमुख निर्णय लेने में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो, अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन और इटली के प्रधानमंत्री विटोरियो ऑरलैंडो की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रही। इन चारों नेताओं को सामान्यतः ‘बिग फोर’ कहा जाता है, यद्यपि जर्मनी के साथ शांति की शर्तें निर्धारित करने में विल्सन, क्लेमेंसो और लॉयड जॉर्ज विशेष रूप से प्रभावशाली रहे। इन नेताओं के बीच जर्मनी के भविष्य को लेकर गहरे मतभेद थे। विल्सन अपेक्षाकृत उदार तथा आत्मनिर्णय और सामूहिक सुरक्षा पर आधारित शांति के पक्षधर थे, क्लेमेंसो जर्मनी को कमजोर करके फ्रांस की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते थे, जबकि लॉयड जॉर्ज जर्मनी को दंडित करने की सार्वजनिक माँग और यूरोप में दीर्घकालीन शक्ति-संतुलन बनाए रखने के बीच संतुलन स्थापित करना चाहते थे।

चौदह सूत्र और शांति की अपेक्षा

अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने जनवरी 1918 ई. में अपने प्रसिद्ध चौदह सूत्र प्रस्तुत किए थे, जिनमें खुले कूटनीतिक समझौतों, समुद्री स्वतंत्रता, व्यापारिक बाधाओं में कमी, हथियारों में कमी, राष्ट्रीय आत्मनिर्णय तथा एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना जैसे विचार शामिल थे। विल्सन की कल्पना ऐसी शांति-व्यवस्था की थी जिसमें भविष्य के युद्धों को सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से रोका जा सके। किंतु पेरिस शांति सम्मेलन में फ्रांस और ब्रिटेन की सुरक्षा तथा राजनीतिक हितों को भी पर्याप्त महत्त्व मिला, जिसके परिणामस्वरूप अंतिम शांति-व्यवस्था विल्सन के चौदह सूत्रों का पूर्ण प्रतिबिंब नहीं बन सकी। जर्मनी में यह भावना विकसित हुई कि उसके साथ ऐसी शर्तें लागू की गई हैं, जिन्हें उसने समान भागीदारी के साथ स्वीकार नहीं किया था। जर्मन सरकार का तर्क था कि चूँकि उसने युद्धविराम विल्सन के चौदह सूत्रों की भावना के आधार पर स्वीकार किया था, अतः अंतिम शांति-व्यवस्था भी राष्ट्रीय आत्मनिर्णय, समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए थी।

जर्मन प्रतिनिधिमंडल और संधि का प्रारूप

संधि का प्रारूप 1919 ई. के वसंत में पेरिस शांति सम्मेलन के दौरान कई महीनों के विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया। यह संधि कुल 15 भागों और 440 अनुच्छेदों में विभाजित थी, जिसमें जर्मनी की क्षेत्रीय सीमाओं, सैन्य शक्ति, आर्थिक क्षतिपूर्ति तथा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से संबंधित विस्तृत प्रावधान किए गए थे। जर्मन प्रतिनिधिमंडल अप्रैल 1919 ई. के अंत में वर्साय पहुँचा, जिसका नेतृत्व जर्मन विदेश मंत्री काउंट उलरिख फॉन ब्रॉकडॉर्फ-रांटजौ कर रहे थे। जर्मन प्रतिनिधियों को वर्साय में अपेक्षाकृत कठोर निगरानी में रखा गया और उनके आवागमन तथा संपर्कों पर प्रतिबंध लगाए गए, जिससे उनमें यह भावना उत्पन्न हुई कि मित्र राष्ट्र उन्हें समान पक्ष के रूप में नहीं, बल्कि पराजित शक्ति के रूप में देख रहे हैं।

7 मई 1919 ई. को संधि का प्रारूप जर्मन प्रतिनिधिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया गया। जर्मनी को संधि तैयार करने की मुख्य वार्ताओं में विजयी राष्ट्रों के समान भागीदारी नहीं दी गई थी। जर्मन प्रतिनिधियों को संधि की शर्तों पर अपनी आपत्तियाँ और सुझाव केवल लिखित रूप में प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया, किंतु उन्हें स्वतंत्र रूप से बराबरी के आधार पर वार्ता करने का अवसर नहीं मिला। जर्मन प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से सैन्य निःशस्त्रीकरण, क्षेत्रीय हानि, आर्थिक क्षतिपूर्ति तथा अनुच्छेद 231 पर व्यापक आपत्तियाँ व्यक्त कीं और अनेक संशोधनों का प्रस्ताव रखा। जर्मनी चाहता था कि युद्ध की जिम्मेदारी से संबंधित अनुच्छेद 231 को हटाया या संशोधित किया जाए। जर्मन सरकार ने यह भी तर्क दिया कि युद्ध के लिए केवल उसे जिम्मेदार ठहराना अनुचित है, निरस्त्रीकरण का सिद्धांत सभी राष्ट्रों पर समान रूप से लागू होना चाहिए और किसी बड़े राष्ट्र को आर्थिक-राजनीतिक रूप से अपमानित करके स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती।

मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी के अधिकांश प्रमुख संशोधन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कर दिया कि यदि जर्मनी निर्धारित समय के भीतर संधि स्वीकार नहीं करता, तो युद्धविराम समाप्त कर सैन्य कार्रवाई पुनः शुरू की जा सकती है। इस दबाव के कारण जर्मन सरकार ने अंततः संधि स्वीकार करने का निर्णय लिया।

हस्ताक्षर और प्रतीकात्मक महत्त्व

28 जून 1919 ई. को वर्साय के शीशमहल (दर्पण कक्ष) में जर्मन प्रतिनिधियों ने संधि पर हस्ताक्षर किए। इसी कारण जर्मनी में इस संधि को ‘थोपी गई शांति’ के रूप में देखा गया। वर्साय के इसी दर्पण कक्ष का चयन प्रतीकात्मक रूप से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था क्योंकि लगभग पचास वर्ष पहले 1871 ई. में इसी स्थान पर प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मन सम्राट घोषित किया गया था और जर्मन साम्राज्य की स्थापना की घोषणा हुई थी। 1919 ई. में उसी स्थान पर पराजित जर्मनी को एक कठोर शांति-संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े, जिस कारण वर्साय का दर्पण कक्ष जर्मनी के लिए राष्ट्रीय अपमान और पराजय का प्रतीक बन गया। संधि 10 जनवरी 1920 ई. को प्रभावी हुई।

वर्साय संधि के प्रमुख प्रावधान

राष्ट्र संघ की स्थापना

मुख्य लेख : राष्ट्र संघ

वर्साय संधि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रावधान राष्ट्र संघ की स्थापना से संबंधित था। संधि की प्रारंभिक 26 धाराएँ राष्ट्र संघ की वाचा (से संबंधित थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का दृढ़ विश्वास था कि स्थायी विश्व शांति के लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था आवश्यक है जो राज्यों के बीच विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा सके। इसी उद्देश्य से राष्ट्र संघ की वाचा को संधि के प्रारंभिक भाग में शामिल किया गया। राष्ट्र संघ का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना, सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था स्थापित करना, सदस्य राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना, आर्थिक प्रतिबंधों की व्यवस्था करना, अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना तथा अंतरराष्ट्रीय निरस्त्रीकरण को प्रोत्साहित करना था। राष्ट्र संघ को कुछ जनादेश प्राप्त क्षेत्रों, सार क्षेत्र और डांज़िग जैसे मामलों की निगरानी का दायित्व भी दिया गया। वर्साय की व्यापक व्यवस्था में स्थायी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसी संस्थाओं के विकास का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।

राष्ट्र संघ की स्थापना अंतरराष्ट्रीय शांति की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम थी, किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका स्वयं इसमें शामिल नहीं हो सका। अमेरिकी सीनेट ने मार्च 1920 ई. में वर्साय की संधि की पुष्टि करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बना और उसने बाद में जर्मनी के साथ अलग शांति-व्यवस्था स्थापित की। जर्मनी को प्रारंभ में राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बनाया गया; वह बाद में 1926 ई. में इसका सदस्य बना, किंतु हिटलर के शासन में 1933 ई. में जर्मनी ने राष्ट्र संघ से अलग होने का निर्णय लिया। अमेरिका की अनुपस्थिति ने राष्ट्र संघ की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को आरंभ से ही कमजोर कर दिया।

प्रादेशिक प्रावधान: पश्चिमी और उत्तरी सीमा

वर्साय की संधि के परिणामस्वरूप जर्मनी को अपने पूर्ववर्ती साम्राज्य के लगभग दस प्रतिशत भू-भाग और जनसंख्या से वंचित होना पड़ा। पश्चिम में अल्सास-लोरेन को फ्रांस को वापस कर दिया गया। ये प्रदेश 1870-71 ई. के फ्रांस-प्रशा युद्ध के बाद जर्मनी के अधीन चले गए थे और इनके पुनः फ्रांस में शामिल होने को फ्रांस की एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-राष्ट्रीय उपलब्धि माना गया। उत्तर में यूपेन और माल्मेडी के क्षेत्र बेल्जियम को दिए गए। उत्तरी श्लेसविग में जनमत-संग्रह कराया गया, जिसके परिणामस्वरूप उसका उत्तरी भाग डेनमार्क को प्राप्त हुआ जबकि दक्षिणी श्लेसविग जर्मनी में रहा। मेमल क्षेत्र को प्रारंभ में मित्र राष्ट्रों के नियंत्रण में रखा गया और बाद में 1923 ई. में उसे लिथुआनिया में शामिल कर दिया गया।

राइनलैंड को जर्मनी से अलग नहीं किया गया, किंतु उसे स्थायी रूप से असैन्यीकृत क्षेत्र घोषित कर दिया गया। इसका अर्थ था कि जर्मनी वहाँ सैनिक बल, सैन्य प्रतिष्ठान या किलेबंदी स्थापित नहीं कर सकता था। मित्र राष्ट्रों की सेना को राइनलैंड के कुछ क्षेत्रों में अस्थायी रूप से तैनात किया गया, ताकि जर्मनी संधि की शर्तों का पालन करे और फ्रांस-बेल्जियम की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके; यह सैन्य उपस्थिति स्थायी नहीं थी और समय के साथ समाप्त होनी थी। जर्मनी को हेलिगोलैंड की किलेबंदी नष्ट करनी पड़ी और भविष्य में वहाँ पुनः सैन्य किलेबंदी न करने की शर्त स्वीकार करनी पड़ी।

प्रादेशिक प्रावधान: पूर्वी सीमा

प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र पोलैंड का पुनर्गठन किया गया। वर्साय की व्यवस्था के अंतर्गत पोलैंड को पूर्व जर्मन क्षेत्रों में पोजनान और पश्चिमी प्रशा के महत्त्वपूर्ण हिस्से प्राप्त हुए। उसे बाल्टिक सागर तक पहुँच प्रदान करने के लिए जर्मन भू-भाग के बीच से एक भू-मार्ग भी दिया गया, जिसे सामान्यतः पोलिश कॉरिडोर कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी प्रशा जर्मनी के मुख्य भू-भाग से अलग हो गई। ऊपरी सिलेसिया के एक हिस्से का भी बाद में जनमत-संग्रह तथा अंतरराष्ट्रीय निर्णयों के आधार पर पुनर्गठन किया गया।

डांज़िग (ग्दांस्क) को जर्मनी से अलग करके मुक्त नगर बनाया गया और इसे राष्ट्र संघ के संरक्षण में रखा गया; पोलैंड को इस क्षेत्र के बंदरगाह तथा कुछ महत्त्वपूर्ण आर्थिक, व्यापारिक और संचार संबंधी अधिकार प्राप्त हुए।

जर्मनी और सोवियत रूस के संबंध में प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम चरण में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे- ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि (3 मार्च 1918 ई.) के द्वारा बोल्शेविक रूस ने जर्मनी के साथ शांति स्थापित कर बड़े क्षेत्रों से अपना नियंत्रण छोड़ा था, किंतु जर्मनी की पराजय के बाद यह व्यवस्था समाप्त हो गई। बाल्टिक क्षेत्र में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय हुआ, यद्यपि इन्हें सीधे वर्साय की संधि द्वारा जर्मनी से छीने गए प्रदेशों पर स्थापित हुआ कहना सही नहीं है। इन परिवर्तनों का संबंध रूसी क्रांति, जर्मनी की पराजय और पूर्वी यूरोप के व्यापक युद्धोत्तर राजनीतिक पुनर्गठन से था। इसी प्रकार चेकोस्लोवाकिया जैसे नए राज्यों का उदय भी युद्ध, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के विघटन और अन्य शांति-संधियों का परिणाम था, न कि केवल वर्साय की संधि का प्रत्यक्ष परिणाम।

सार क्षेत्र की विशेष व्यवस्था

जर्मनी के महत्त्वपूर्ण कोयला-उत्पादक सार क्षेत्र को 15 वर्षों के लिए राष्ट्र संघ के प्रशासन के अधीन रखा गया, तथा इस क्षेत्र की कोयला खदानों का आर्थिक स्वामित्व और उपयोग फ्रांस को प्रदान किया गया, ताकि उसे युद्ध में हुई औद्योगिक क्षति की कुछ भरपाई मिल सके। 15 वर्ष बाद वहाँ जनमत-संग्रह कराया जाना था, ताकि जनता स्वयं तय कर सके कि वह जर्मनी के साथ रहना चाहती है या किसी अन्य व्यवस्था को स्वीकार करना चाहती है। 1935 ई. में हुए जनमत-संग्रह में भारी बहुमत से जर्मनी में पुनः शामिल होने के पक्ष में मतदान हुआ, जिसके बाद सार क्षेत्र जर्मनी को वापस मिल गया। इसके अतिरिक्त जर्मनी को युद्ध से प्रभावित कुछ देशों को निश्चित अवधि तक कोयला और अन्य संसाधन उपलब्ध कराने पड़े; जर्मनी में इन व्यवस्थाओं को आर्थिक दंड और राष्ट्रीय संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण के रूप में देखा गया।

जर्मन उपनिवेशों की समाप्ति और मैंडेट प्रणाली

वर्साय की संधि के अंतर्गत जर्मनी के सभी विदेशी उपनिवेश उससे छीन लिए गए। इन क्षेत्रों को सीधे विजेता राष्ट्रों की स्थायी संपत्ति घोषित करने के बजाय अधिकांश को राष्ट्र संघ की जनादेश प्रणाली (मैंडेट प्रणाली) के अंतर्गत रखा गया, जिसके तहत ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसी शक्तियों को विभिन्न क्षेत्रों के प्रशासन की जिम्मेदारी दी गई। अफ्रीका में जर्मनी के उपनिवेशों का पुनर्वितरण किया गया; प्रशांत क्षेत्र में भूमध्य रेखा के उत्तर के जर्मन द्वीपीय क्षेत्र जापान के जनादेश के अधीन आए, जबकि दक्षिण के कई क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के प्रशासन में गए। मैंडेट प्रणाली का औपचारिक उद्देश्य इन क्षेत्रों की जनता को भविष्य में स्वशासन के लिए तैयार करना था, किंतु व्यवहार में इन क्षेत्रों पर विजयी औपनिवेशिक शक्तियों का ही नियंत्रण स्थापित हो गया। इस प्रकार जर्मनी एक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया।

उपनिवेशों के समाप्त होने से जर्मनी को अपने विदेशी आर्थिक और सामरिक प्रभाव का बड़ा हिस्सा खोना पड़ा, यद्यपि यह कहना उचित नहीं है कि केवल उपनिवेशों के चले जाने से जर्मनी की आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं। इसके पीछे युद्धोत्तर उत्पादन-संकट, क्षतिपूर्ति, मुद्रा-संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण थीं।

शानतुंग प्रश्न और चीन का विरोध

जर्मनी के पूर्वी एशियाई अधिकारों से संबंधित प्रश्न भी वर्साय व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। चीन के शानतुंग प्रांत में जर्मनी के अधिकारों को जापान को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया, जिसका चीन ने तीव्र विरोध किया और चीनी प्रतिनिधिमंडल ने वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इस निर्णय ने चीन में राष्ट्रीय असंतोष को बढ़ाया और 4 मई 1919 ई. के आंदोलन (मे फोर्थ मूवमेंट) को प्रोत्साहित करने वाले प्रमुख कारणों में योगदान दिया। इस प्रकार वर्साय की व्यवस्था का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा।

अंतरराष्ट्रीय नदियाँ और कील नहर

वर्साय की व्यवस्था में कुछ प्रमुख नदियों के अंतरराष्ट्रीय नौवहन से संबंधित प्रावधान भी किए गए, जिनका उद्देश्य व्यापार और अंतरराष्ट्रीय आवागमन को सुगम बनाना था- राइन, एल्बे और ओडर जैसी महत्त्वपूर्ण नदियों के नौवहन को अंतरराष्ट्रीय नियमों के अधीन लाया गया। इसी प्रकार कील नहर को भी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया, जिसके माध्यम से विभिन्न देशों के जहाजों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के अंतर्गत आवागमन की सुविधा प्राप्त हुई। इसका उद्देश्य जर्मनी की नौसैनिक शक्ति को सीमित करना तथा बाल्टिक और उत्तरी सागर के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्री संपर्क सुनिश्चित करना था। इन प्रावधानों ने जर्मनी की संप्रभुता पर कुछ सीमाएँ अवश्य लगाईं, किंतु इन्हें जर्मनी की सभी प्रमुख नदियों पर पूर्ण विदेशी नियंत्रण के रूप में समझना उचित नहीं है।

सैनिक निःशस्त्रीकरण

वर्साय की संधि का सबसे कठोर पक्ष जर्मनी की सैन्य शक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध थे। मित्र राष्ट्रों, विशेषकर फ्रांस, का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जर्मनी भविष्य में यूरोप के लिए सैन्य खतरा न बन सके। यद्यपि विल्सन के चौदह सूत्रों में सामान्य और व्यापक निःशस्त्रीकरण की भावना व्यक्त की गई थी, तत्कालीन वर्साय व्यवस्था में कठोर सैन्य प्रतिबंध मुख्यतः जर्मनी पर ही लागू किए गए।

जर्मन थलसेना को अधिकतम एक लाख (1,00,000) सैनिकों तक सीमित कर दिया गया। अनिवार्य सैन्य सेवा (सैनिक भर्ती) समाप्त कर दी गई और जर्मन जनरल स्टाफ को भंग कर दिया गया- सेना को मुख्यतः सीमित अवधि के स्वैच्छिक सैनिकों पर आधारित रखा गया। जर्मनी को टैंक, सैन्य विमान (वायुसेना), पनडुब्बियाँ और रासायनिक हथियार जैसे आधुनिक आक्रामक सैन्य साधन रखने या विकसित करने की अनुमति नहीं थी; भारी तोपखाने और सैन्य उत्पादन पर भी कठोर नियंत्रण लगाए गए। जर्मन नौसेना की शक्ति भी अत्यंत सीमित कर दी गई- उसे केवल सीमित संख्या में (छह) छोटे युद्धपोत रखने की अनुमति थी, जबकि पनडुब्बियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया और नौसेना कर्मियों की संख्या भी निर्धारित सीमा के भीतर रखी गई।

सीमा शुल्क अधिकारियों, वन रक्षकों, तटरक्षकों और पुलिस बल की संख्या पर भी नियंत्रण रखा गया तथा विभिन्न नागरिक एवं अर्धसैनिक संगठनों को सैन्य प्रशिक्षण अथवा गतिविधियों से दूर रखने का प्रयास किया गया। जर्मनी द्वारा इन प्रतिबंधों का पालन सुनिश्चित करने के लिए मित्र राष्ट्रों की ओर से नियंत्रण एवं निरीक्षण की व्यवस्था भी की गई। मित्र राष्ट्रों को आशा थी कि जर्मनी का यह निःशस्त्रीकरण व्यापक अंतरराष्ट्रीय निःशस्त्रीकरण की दिशा में पहला कदम बनेगा, किंतु यह अपेक्षा पूरी तरह सफल नहीं हुई। जर्मन राष्ट्रवादियों ने इन सैन्य प्रतिबंधों को राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता के विरुद्ध अपमान के रूप में देखा।

अनुच्छेद 231 और युद्ध-क्षतिपूर्ति

वर्साय की संधि का सबसे विवादास्पद प्रावधान अनुच्छेद 231 था, जिसे जर्मनी में सामान्यतः ‘युद्ध-दोष धारा’ कहा गया। इसका मुख्य कानूनी उद्देश्य मित्र राष्ट्रों द्वारा जर्मनी और उसके सहयोगियों से युद्ध के कारण हुई क्षति की क्षतिपूर्ति मांगने के लिए कानूनी आधार निर्धारित करना था। इसे इस सरल अर्थ में समझना उचित नहीं है कि इस धारा ने जर्मनी को अकेले प्रथम विश्व युद्ध के प्रत्येक पहलू के लिए नैतिक रूप से पूर्णतः दोषी घोषित कर दिया था। फिर भी जर्मन जनता और राजनीतिक वर्ग के एक बड़े हिस्से ने इसे जर्मनी पर संपूर्ण युद्ध का दोष थोपने के रूप में देखा, जिस कारण यह अनुच्छेद जर्मन राष्ट्रीय अपमान का शक्तिशाली प्रतीक बन गया।

युद्ध के दौरान फ्रांस और बेल्जियम को भारी जन-धन तथा औद्योगिक क्षति हुई थी, और फ्रांस जर्मनी से व्यापक क्षतिपूर्ति प्राप्त करना चाहता था। संधि में क्षतिपूर्ति की अंतिम राशि निश्चित नहीं की गई थी; यह तय किया गया कि वास्तविक राशि बाद में एक आयोग द्वारा निर्धारित की जाएगी। 1921 ई. में मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी की कुल क्षतिपूर्ति 132 अरब स्वर्ण मार्क निर्धारित की। जर्मनी को यह क्षतिपूर्ति केवल धन के रूप में ही नहीं, बल्कि कोयला, जहाज तथा अन्य औद्योगिक-आर्थिक संसाधनों के रूप में भी करनी थी।

बाद में जर्मनी की आर्थिक कठिनाइयों और भुगतान संबंधी समस्याओं के कारण क्षतिपूर्ति व्यवस्था में परिवर्तन किए गए- 1924 ई. की डावेस योजना और 1929 ई. की यंग योजना ने भुगतान की शर्तों को पुनर्गठित किया और अंततः 1932 ई. के लॉज़ान सम्मेलन ने क्षतिपूर्ति के प्रश्न को लगभग समाप्त कर दिया। इससे स्पष्ट होता है कि वर्साय की मूल आर्थिक व्यवस्था बाद के वर्षों में स्थिर और अपरिवर्तित नहीं रही।

कैसर विलियम द्वितीय पर अभियोग

वर्साय की संधि में पूर्व जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय के विरुद्ध कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया था, उन्हें अंतरराष्ट्रीय नैतिकता और संधियों की पवित्रता के विरुद्ध गंभीर अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराकर उनके विरुद्ध अभियोग चलाने की योजना बनाई गई थी। इसके अतिरिक्त युद्ध के दौरान कथित युद्ध-अपराधों में शामिल जर्मन अधिकारियों-सैनिकों के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान था। विलियम द्वितीय युद्ध के बाद नीदरलैंड चले गए थे; मित्र राष्ट्रों ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की, किंतु नीदरलैंड सरकार ने उन्हें सौंपने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय मुकदमा वास्तव में नहीं चल सका।

‘थोपी गई शांति’: जर्मन प्रतिक्रिया

वर्साय की संधि को प्रायः ‘थोपी गई शांति’ (डिक्टाट) कहा जाता है, क्योंकि जर्मनी को संधि की अंतिम शर्तें तैयार करने की प्रक्रिया में विजयी राष्ट्रों के समान भागीदार के रूप में शामिल नहीं किया गया था। उसे मुख्यतः अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत करने का अवसर मिला, किंतु शर्तों पर बराबरी के आधार पर व्यापक वार्ता नहीं हो सकी। संधि की प्रादेशिक, सैनिक और आर्थिक शर्तों ने जर्मनी में व्यापक असंतोष उत्पन्न किया। जर्मन राष्ट्रवादियों ने इन शर्तों को राष्ट्रीय अपमान के रूप में प्रस्तुत किया, और बाद में हिटलर ने इसी भावना को अपने राजनीतिक प्रचार का महत्त्वपूर्ण आधार बनाया। इतिहासकार ई.एच. कार ने वर्साय की व्यवस्था की आलोचना करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यह विजेताओं और पराजितों के बीच समान स्तर पर हुई बातचीत का परिणाम नहीं थी।

वाइमर गणराज्य और आंतरिक राजनीतिक प्रभाव

1918 ई. की जर्मन क्रांति और जर्मन साम्राज्य के पतन के बाद स्थापित वाइमर गणराज्य को युद्ध की हार और वर्साय की संधि की कठोर शर्तों के लिए दोषी ठहराने का व्यापक प्रयास किया गया। दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों ने लोकतांत्रिक नेताओं पर ‘राष्ट्रीय विश्वासघात’ का आरोप लगाया और ‘पीठ में छुरा घोंपने की किंवदंती’ (स्टैब-इन-द-बैक मिथक) को लोकप्रिय बनाया, जिसके अनुसार जर्मन सेना युद्धभूमि में पराजित नहीं हुई थी, बल्कि देश के भीतर के राजनेताओं ने उसे धोखा दिया था। वर्साय की संधि को इसी कथित विश्वासघात के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रचार ने वाइमर गणराज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और कम्युनिस्ट तथा दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी दोनों ही उग्रवादी शक्तियों को इस राजनीतिक अस्थिरता के वातावरण में समर्थन मिलने लगा।

आर्थिक प्रभाव

वर्साय की संधि ने जर्मनी की आर्थिक समस्याओं को बढ़ाने वाले कई दबाव उत्पन्न किए, यद्यपि जर्मनी की समस्त आर्थिक कठिनाइयों के लिए केवल इस संधि को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध के कारण जर्मनी पहले से ही भारी आर्थिक संकट, ऋण और सामाजिक अव्यवस्था से जूझ रहा था। क्षतिपूर्ति भुगतान और युद्धोत्तर वित्तीय समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बनाया। 1923 ई. में जर्मनी में अत्यधिक मुद्रास्फीति (हाइपरइन्फ्लेशन) हुई और जर्मन मुद्रा का मूल्य तेजी से गिरा। 1924 ई. के बाद डावेस योजना और विदेशी ऋण के माध्यम से कुछ समय के लिए जर्मन अर्थव्यवस्था में स्थिरता आई, किंतु 1929 ई. की महामंदी ने इस सुधार को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया, जिससे बेरोजगारी और सामाजिक असंतोष में भारी वृद्धि हुई, जिसका राजनीतिक लाभ बाद में नाजी पार्टी ने उठाया।

संधि के क्रियान्वयन की कमजोरी

वर्साय की संधि की एक बड़ी समस्या यह थी कि इसके अनेक प्रावधानों को लंबे समय तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं कराया जा सका। 1920 के दशक में जर्मनी को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पुनः शामिल करने की नीति अपनाई गई- 1925 ई. की लोकार्नो संधियों और 1926 ई. में जर्मनी के राष्ट्र संघ में प्रवेश ने जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को कम किया। किंतु 1933 ई. में हिटलर के सत्ता में आने के बाद यह सहयोग समाप्त हो गया, जर्मनी ने राष्ट्र संघ से हटने का निर्णय लिया और पुनः खुले रूप से सैन्य विस्तार की नीति अपनाई। मित्र राष्ट्रों की ओर से जर्मनी के प्रारंभिक उल्लंघनों के प्रति कमजोर प्रतिक्रिया ने भी हिटलर को प्रोत्साहित किया, विशेष रूप से 1936 ई. में राइनलैंड में जर्मन सेना के प्रवेश के समय यदि फ्रांस और ब्रिटेन कठोर कार्रवाई करते तो जर्मनी को पीछे हटने के लिए बाध्य किया जा सकता था, किंतु ऐसा नहीं हुआ और बाद में तुष्टीकरण की नीति के कारण हिटलर की आक्रामकता निरंतर बढ़ती गई।

संयुक्त राज्य अमेरिका और राष्ट्र संघ से दूरी

वर्साय की व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह थी कि राष्ट्र संघ की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाने वाले राष्ट्रपति विल्सन अपने ही देश को उसमें शामिल नहीं करा सके। अमेरिकी सीनेट के भीतर कुछ रिपब्लिकन सदस्य, जिन्हें ‘इर्रिकन्साइल्स’ कहा जाता था, राष्ट्र संघ और संधि की कुछ शर्तों का कड़ा विरोध करते थे। सीनेट ने मार्च 1920 ई. में वर्साय की संधि की पुष्टि करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका न तो वर्साय की संधि का औपचारिक पक्षकार बना और न ही राष्ट्र संघ का सदस्य बना। अमेरिकी भागीदारी के इस अभाव ने युद्धोत्तर सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को आरंभ से ही कमजोर कर दिया।

इटली और जापान का असंतोष

वर्साय के बाद उत्पन्न असंतोष केवल जर्मनी तक सीमित नहीं था। इटली प्रथम विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ा था, किंतु युद्ध के बाद उसे अपेक्षित क्षेत्रीय लाभ न मिलने से वहाँ ‘विक्टोरिया म्यूटिलाटा’ (अपूर्ण विजय) की भावना विकसित हुई, जिसने फासीवाद के उदय को बढ़ावा देने वाले कारकों में योगदान दिया। जापान भी प्रशांत और पूर्वी एशिया में अपने प्रभाव-विस्तार को लेकर अधिक महत्वाकांक्षी हो गया। यद्यपि इटली और जापान की नीतियों को सीधे वर्साय की संधि का परिणाम मानना उचित नहीं है, किंतु प्रथम विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इन शक्तियों की असंतुष्ट और विस्तारवादी राजनीति को रोकने में सफल नहीं रही।

आत्मनिर्णय के सिद्धांत की सीमाएँ

राष्ट्रपति विल्सन के चौदह सूत्रों में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था। युद्ध के बाद यूरोप में अनेक नई सीमाएँ और नए राष्ट्र बनाए गए, किंतु आत्मनिर्णय के सिद्धांत को हर क्षेत्र में समान रूप से लागू करना संभव नहीं हो सका। नई सीमाओं के भीतर अनेक राष्ट्रीय और भाषायी अल्पसंख्यक समुदाय रह गए, और जर्मन-भाषी आबादी के कुछ क्षेत्र भी जर्मनी से बाहर रह गए। विशेष रूप से जर्मनी और ऑस्ट्रिया के संभावित एकीकरण पर लगाई गई रोक ने जर्मन राष्ट्रवादियों में गहरा असंतोष उत्पन्न किया। जर्मन साम्राज्य, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य, रूसी साम्राज्य और उस्मानी साम्राज्य के विघटन-पुनर्गठन की इस प्रक्रिया में जातीय, भाषाई और राजनीतिक सीमाएँ प्रायः एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाती थीं, जिससे मध्य और पूर्वी यूरोप में अल्पसंख्यक प्रश्न तथा सीमा-विवाद बने रहे। इस प्रकार आत्मनिर्णय का सिद्धांत युद्धोत्तर यूरोप में पूरी तरह लागू नहीं हो सका और वर्साय के बाद बनी प्रादेशिक व्यवस्था पूरी तरह स्थायी तथा निर्विवाद नहीं हो सकी।

नाजीवाद का उदय और वर्साय-विरोधी राजनीति

वर्साय की संधि जर्मनी के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक बन गई। एडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी ने जर्मन जनता की इसी असंतुष्टि का व्यापक राजनीतिक उपयोग किया- हिटलर ने जर्मनी की क्षेत्रीय हानि, सैन्य प्रतिबंधों और क्षतिपूर्ति को राष्ट्रीय अपमान के रूप में प्रस्तुत किया तथा वर्साय व्यवस्था को समाप्त करने, जर्मनी की सैन्य शक्ति को पुनः स्थापित करने और खोए हुए क्षेत्रों को वापस प्राप्त करने का वादा किया।

संधि का क्रमिक उल्लंघन और द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर बढ़ाव

1933 ई. में हिटलर के जर्मनी का चांसलर बनने और सत्ता में आने के बाद नाजी शासन ने वर्साय की सैन्य एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं को क्रमशः चुनौती देना आरंभ किया। 1935 ई. में जर्मनी ने खुले रूप से पुनः शस्त्रीकरण की घोषणा की और अनिवार्य सैनिक सेवा पुनः बहाल की। 1936 ई. में जर्मन सेना ने असैन्यीकृत राइनलैंड में प्रवेश कर उसे पुनः सैन्यीकृत किया, जो संधि की विसैन्यीकरण व्यवस्था का स्पष्ट उल्लंघन था। ब्रिटेन और फ्रांस ने इस कदम का प्रभावी सैन्य प्रतिरोध नहीं किया, जिससे हिटलर का आत्मविश्वास और बढ़ गया। 1938 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का विलय (आनशलुस) कर लिया और उसी वर्ष म्यूनिख समझौते के बाद चेकोस्लोवाकिया के सूडेटेनलैंड को जर्मनी के अधीन कर दिया गया। मार्च 1939 ई. में जर्मनी ने बोहेमिया और मोराविया पर कब्जा कर चेकोस्लोवाकिया के शेष क्षेत्रों पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया। अंततः 1 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया और 3 सितंबर 1939 ई. को ब्रिटेन तथा फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, जिससे द्वितीय विश्वयुद्ध का यूरोपीय चरण आरंभ हो गया।

इस प्रकार वर्साय की संधि ने जर्मन राष्ट्रवाद और संशोधनवाद को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियाँ अवश्य उत्पन्न कीं, किंतु द्वितीय विश्व युद्ध का एकमात्र कारण वर्साय की संधि को मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है- नाजी विचारधारा, हिटलर की विस्तारवादी नीति, 1929 ई. की महामंदी, राष्ट्र संघ की कमजोरियाँ, सामूहिक सुरक्षा की विफलता, ब्रिटेन-फ्रांस की तुष्टीकरण नीति तथा इटली-जापान की विस्तारवादी नीतियों जैसे अनेक कारकों ने भी युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।

इतिहासकारों का मूल्यांकन

वर्साय की संधि के मूल्यांकन को लेकर इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विचारकों के बीच लंबे समय से गहरे मतभेद रहे हैं। ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स वर्साय की संधि के सबसे प्रसिद्ध आलोचक थे। वे पेरिस शांति सम्मेलन में ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे, किंतु संधि की आर्थिक दिशा से असहमत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अपनी 1919 ई. में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक ‘द इकोनॉमिक कॉन्सिक्वेंसेज़ ऑफ द पीस’ में उन्होंने वर्साय की संधि को ‘कार्थेजीयन शांति’ कहा क्योंकि उनका तर्क था कि विजयी राष्ट्रों ने जर्मनी को आर्थिक रूप से कमजोर करने और दंडित करने का प्रयास किया, जिससे केवल जर्मनी ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाएगी और भारी क्षतिपूर्ति व आर्थिक प्रतिबंधों से जर्मनी में असंतोष बढ़ेगा जो भविष्य में नए संघर्ष को जन्म दे सकता है।

जर्मन इतिहासकार फ्रिट्ज़ फिशर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘जर्मनीज़ एम्स इन द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर’ (1961 ई.) में यह तर्क दिया कि प्रथम विश्व युद्ध के लिए जर्मनी की जिम्मेदारी अपेक्षाकृत अधिक थी, इसलिए वर्साय की संधि में जर्मनी पर लगाए गए कुछ दंडात्मक प्रावधान पूरी तरह अनुचित नहीं थे। उनके अनुसार जर्मनी की विस्तारवादी-साम्राज्यवादी नीतियाँ युद्ध के प्रमुख कारणों में थीं, और नाजीवाद-जर्मन विस्तारवाद की जड़ें जर्मनी की पूर्ववर्ती राजनीतिक परंपराओं में भी निहित थीं।

कनाडाई इतिहासकार मार्गरेट मैकमिलन ने अपनी पुस्तक ‘पेरिस 1919: सिक्स मंथ्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ (2001 ई.) में वर्साय की संधि का अधिक संतुलित मूल्यांकन प्रस्तुत किया। उनके अनुसार संधि में कमियाँ अवश्य थीं, किंतु यह जर्मनी को पूरी तरह नष्ट करने वाली व्यवस्था नहीं थी; जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी औद्योगिक शक्तियों में बना रहा। मैकमिलन का तर्क है कि द्वितीय विश्व युद्ध के लिए हिटलर की विचारधारा, महामंदी, राष्ट्र संघ की कमजोरी और तुष्टीकरण नीति भी उतनी ही जिम्मेदार थीं।

ब्रिटिश इतिहासकार ए.जे.पी. टेलर का मत था कि वर्साय की संधि में नैतिक वैधता का अभाव था, विशेषकर आत्मनिर्णय के सिद्धांत के असमान प्रयोग के कारण, मित्र राष्ट्रों ने कुछ क्षेत्रों में राष्ट्रीयता के सिद्धांत को अपनाया, किंतु जर्मनी-ऑस्ट्रिया के संबंध में इसका पालन नहीं किया गया, जिससे जर्मनी में असंतोष और संशोधनवादी राजनीति को बल मिला।

आधुनिक इतिहासकार रूथ हेनिग का मत है कि वर्साय की संधि को प्रायः आवश्यकता से अधिक कठोर बताया गया है- मित्र राष्ट्रों का उद्देश्य जर्मनी का पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित कर यूरोप में शक्ति-संतुलन स्थापित करना था और बाद के वर्षों में क्षतिपूर्ति संबंधी शर्तों में कई संशोधन भी किए गए। अमेरिकी इतिहासकार गर्हार्ड वाइनबर्ग का तर्क है कि जर्मनी एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में बना रहा और उसकी औद्योगिक क्षमता समाप्त नहीं हुई थी, इसलिए संधि को अत्यधिक कठोर बताना उचित नहीं है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री एतिएन मंतू ने अपनी पुस्तक ‘द कार्थेजिनियन पीस’ (1946 ई.) में कीन्स की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि कीन्स ने जर्मनी की आर्थिक क्षमता को कम आँका और क्षतिपूर्ति के प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया।

आधुनिक इतिहासकरों का मानना है कि वर्साय की संधि ने जर्मनी में असंतोष के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ अवश्य पैदा कीं, किंतु उन परिस्थितियों को विनाशकारी युद्ध में बदलने के लिए हिटलर की विचारधारा, नाजी शासन की नीतियाँ और 1930 के दशक की अंतरराष्ट्रीय विफलताएँ निर्णायक थीं।

फोश का कथन: ‘बीस वर्ष का युद्धविराम’

फ्रांसीसी मार्शल फर्डिनांड फोश से यह प्रसिद्ध कथन जोड़ा जाता है कि वर्साय की संधि शांति नहीं, बल्कि लगभग ‘बीस वर्ष का युद्धविराम’ है। यद्यपि इस कथन के शब्दशः रूप और श्रेय को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, यह वर्साय व्यवस्था की अस्थिरता के संबंध में समकालीन आलोचना को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। वास्तव में 1919 ई. की वर्साय व्यवस्था और 1939 ई. में छिड़े द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच लगभग दो दशकों का ही अंतर था, जो इस बात को स्पष्ट करता है कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद स्थापित शांति स्थायी और सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। इसे संधि की भविष्यवाणी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उस समय की आलोचनात्मक धारणा के रूप में देखना अधिक उचित है।

इस प्रकार वर्साय की संधि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद निर्मित नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज थी। इसने जर्मनी की सैन्य शक्ति को सीमित किया, उसकी सीमाओं में व्यापक परिवर्तन किया, क्षतिपूर्ति का दायित्व निर्धारित किया, उसके उपनिवेशों को राष्ट्र संघ की जनादेश व्यवस्था के अधीन किया, और राष्ट्र संघ की स्थापना के माध्यम से सामूहिक सुरक्षा की नई व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। संधि की कठोरता और जर्मनी को निर्णय-प्रक्रिया से लगभग बाहर रखे जाने के कारण वहाँ गहरा राष्ट्रीय असंतोष उत्पन्न हुआ, जिसे बाद में नाजी दल ने प्रभावी राजनीतिक हथियार बनाया।

फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से वर्साय की संधि को द्वितीय विश्व युद्ध का अकेला और प्रत्यक्ष कारण मानना उचित नहीं है। नाजी विचारधारा, हिटलर की विस्तारवादी नीति, 1929 ई. की आर्थिक महामंदी, वाइमर गणराज्य की राजनीतिक कमजोरियाँ, राष्ट्र संघ की विफलता, ब्रिटेन-फ्रांस की तुष्टीकरण नीति और सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का पतन इन सभी ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। इसलिए वर्साय की संधि को द्वितीय विश्व युद्ध का एकमात्र कारण नहीं, बल्कि उन राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी माना जाना चाहिए, जिन्होंने मिलकर यूरोप को अंततः एक और विश्वव्यापी युद्ध की ओर धकेल दिया। इस प्रकार वर्साय की संधि को युद्धोत्तर यूरोपीय व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक कमजोरी और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में कार्य करने वाले अनेक कारकों में से एक महत्त्वपूर्ण दीर्घकालीन कारक के रूप में समझना ही सर्वाधिक उचित है।

वर्साय की संधि से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. प्रश्न : वर्साय की संधि कब और कहाँ हस्ताक्षरित हुई?

वर्साय की संधि पर 28 जून 1919 ई. को फ्रांस के वर्साय राजमहल के शीशमहल (दर्पण कक्ष) में जर्मनी और मित्र राष्ट्रों के बीच हस्ताक्षर किए गए। यह संधि 10 जनवरी 1920 ई. से प्रभावी हुई।

2. प्रश्न : वर्साय की संधि किन देशों के बीच हुई थी?

यह संधि मुख्य रूप से जर्मनी और प्रथम विश्व युद्ध के मित्र राष्ट्रों के बीच हुई थी। मित्र राष्ट्रों की ओर से ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, इटली तथा अन्य संबद्ध शक्तियाँ प्रमुख थीं। जर्मनी को संधि की शर्तें तैयार करने में समान भागीदारी नहीं दी गई थी।

3. प्रश्न : वर्साय की संधि के प्रमुख शिल्पकार कौन थे?

पेरिस शांति सम्मेलन में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो, अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन और इटली के प्रधानमंत्री विटोरियो ऑरलैंडो प्रमुख नेता थे। इन्हें सामूहिक रूप से ‘बिग फोर’ कहा जाता है।

4. प्रश्न : वर्साय की संधि के अंतर्गत जर्मनी पर कौन-कौन से सैन्य प्रतिबंध लगाए गए?

जर्मन सेना को अधिकतम 1,00,000 सैनिकों तक सीमित कर दिया गया और अनिवार्य सैन्य सेवा समाप्त कर दी गई। जर्मन जनरल स्टाफ को भंग कर दिया गया। जर्मनी को वायुसेना और पनडुब्बियाँ रखने, टैंक तथा कुछ आधुनिक आक्रामक हथियार विकसित करने पर प्रतिबंध लगाया गया। राइनलैंड को असैन्यीकृत क्षेत्र घोषित किया गया और जर्मन नौसेना को भी कठोर सीमाओं के भीतर रखा गया।

5. प्रश्न : वर्साय की संधि के कारण जर्मनी को कौन-कौन से क्षेत्र खोने पड़े?

अल्सास-लोरेन फ्रांस को वापस मिला। यूपेन और माल्मेडी बेल्जियम को दिए गए। उत्तरी श्लेसविग जनमत-संग्रह के बाद डेनमार्क को मिला। पोजनान और पश्चिमी प्रशा के बड़े हिस्से पोलैंड को प्राप्त हुए तथा डांज़िग को राष्ट्र संघ के संरक्षण में मुक्त नगर बनाया गया। सार क्षेत्र को 15 वर्षों के लिए राष्ट्र संघ के प्रशासन के अधीन रखा गया। इसके अतिरिक्त जर्मनी के सभी विदेशी उपनिवेश उससे छीन लिए गए।

6. प्रश्न : वर्साय की संधि का अनुच्छेद 231 क्या था?

अनुच्छेद 231 ने मित्र राष्ट्रों द्वारा जर्मनी से युद्ध-क्षतिपूर्ति की मांग के लिए कानूनी आधार प्रदान किया। जर्मनी में इसे व्यापक रूप से ‘युद्ध-दोष धारा’ के रूप में देखा गया और यह जर्मन राष्ट्रीय असंतोष का प्रमुख कारण बना। 1921 में जर्मनी की कुल क्षतिपूर्ति 132 अरब स्वर्ण मार्क निर्धारित की गई।

7. प्रश्न : वर्साय की संधि में राष्ट्र संघ का क्या प्रावधान था?

वर्साय की संधि में राष्ट्र संघ (की वाचा को शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सामूहिक सुरक्षा, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान तथा सदस्य देशों की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना था। हालांकि अमेरिकी सीनेट द्वारा संधि की पुष्टि न किए जाने के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं बना, जिससे उसकी प्रभावशीलता कमजोर हुई।

8. प्रश्न : क्या वर्साय की संधि ही द्वितीय विश्व युद्ध का मुख्य कारण थी?

वर्साय की संधि ने जर्मनी में राष्ट्रीय अपमान, आर्थिक असंतोष और संशोधनवादी भावना को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका बाद में एडॉल्फ हिटलर ने राजनीतिक लाभ उठाया। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध का एकमात्र कारण वर्साय की संधि नहीं थी। नाजी विचारधारा, हिटलर की विस्तारवादी नीति, महामंदी, राष्ट्र संघ की कमजोरी, सामूहिक सुरक्षा की विफलता और तुष्टीकरण की नीति भी युद्ध के महत्त्वपूर्ण कारण थे।
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