मुहम्मद शाह (Muhammad Shah)

मुहम्मद शाह (Muhammad Shah)
मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ (1719–1748 ई.) मुख्य लेख : परवर्ती मुगल  मुहम्मद शाह, जिन्हें नासिरुद्दीन मुहम्मद […]

मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ (1719–1748 ई.)

मुख्य लेख : परवर्ती मुगल 

मुहम्मद शाह, जिन्हें नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह, रोशन अख़्तर तथा लोकप्रिय रूप से मुहम्मद शाह रंगीला कहा जाता है, मुगल साम्राज्य के तेरहवें सम्राट थे। 1719 ई. में सैयद बंधुओं ने उन्हें मुगल सिंहासन पर बैठाया। लगभग 29 वर्षों के उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का राजनीतिक विघटन तेज हो गया। प्रांतीय शक्तियाँ अधिक स्वायत्त होती गईं, मराठों का प्रभाव बढ़ा और अंततः 1739 ई. में नादिर शाह के आक्रमण तथा दिल्ली की लूट ने मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया। दूसरी ओर, मुहम्मद शाह कला, संगीत, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों के महान संरक्षक थे। इसी कारण इतिहास में उनका व्यक्तित्व ऐसे शासक के रूप में दिखाई देता है, जिसके शासनकाल में राजनीतिक पतन और सांस्कृतिक उत्कर्ष दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं।

प्रारंभिक जीवन और सिंहासनारोहण

मुहम्मद शाह का जन्म 7 अगस्त 1702 ई. को हुआ था। वे बहादुर शाह प्रथम के पुत्र जहान शाह के पुत्र थे। 1712 ई. में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद मुगल उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में जहान शाह की भी हत्या कर दी गई। इसके बाद मुगल साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई और अंततः फ़र्रुख़सियर ने सत्ता पर अधिकार कर लिया। 1719 ई. में सैयद बंधुओं- अब्दुल्ला ख़ान बरहा और हुसैन अली ख़ान बरहा ने फ़र्रुख़सियर को अपदस्थ कर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने क्रमशः रफ़ी-उद-दरजात और रफ़ी-उद-दौला को सिंहासन पर बैठाया, किंतु दोनों अल्पकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। ऐसी स्थिति में सैयद बंधुओं ने रोशन अख़्तर को मुगल सम्राट बनाया। उन्होंने नासिरुद्दीन मुहम्मद शाह की उपाधि धारण की और 1719 ई. में मुगल सिंहासन पर बैठे।

प्रारंभ में मुहम्मद शाह सैयद बंधुओं के प्रभाव में थे। वास्तविक सत्ता उनके हाथों में थी और सम्राट की स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका सीमित थी। किंतु शीघ्र ही मुहम्मद शाह ने सैयद बंधुओं के प्रभुत्व को समाप्त करने के लिए उनके विरोधी अमीरों के साथ संबंध स्थापित किए।

सैयद बंधुओं का पतन

मुहम्मद शाह के शासन की प्रारंभिक सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना सैयद बंधुओं का पतन थी। हुसैन अली ख़ान अत्यंत शक्तिशाली सेनापति और मीर बख़्शी था, जबकि अब्दुल्ला ख़ान वज़ीर के पद पर था। दोनों भाइयों के हाथों में प्रशासन और सेना पर व्यापक नियंत्रण था।

मुहम्मद शाह ने सैयद बंधुओं के विरोध में दरबार के प्रभावशाली अमीरों का समर्थन प्राप्त किया। 9 अक्टूबर 1720 ई. को हुसैन अली ख़ान की हत्या कर दी गई। इसके बाद मुहम्मद शाह ने सेना की प्रत्यक्ष कमान अपने हाथ में ले ली। अब्दुल्ला ख़ान ने अपने भाई की मृत्यु के बाद संघर्ष जारी रखा, किंतु हसनपुर के युद्ध में वह पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया। इस प्रकार 1720 ई. तक सैयद बंधुओं का प्रभुत्व समाप्त हो गया।

सैयद बंधुओं के पतन से मुहम्मद शाह को कुछ समय के लिए स्वतंत्र रूप से शासन करने का अवसर मिला। किंतु यह स्वतंत्रता मुगल साम्राज्य की राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं कर सकी। दरबार में विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष जारी रहा और प्रांतीय शक्तियाँ केंद्र से लगातार दूर होती गईं।

निज़ाम-उल-मुल्क और दक्कन में मुगल सत्ता का ह्रास

सैयद बंधुओं के पतन के बाद मुहम्मद शाह ने निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़ जाह प्रथम को वज़ीर नियुक्त किया। निज़ाम-उल-मुल्क अनुभवी और सक्षम प्रशासक था। उसने सम्राट को राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता समझाने का प्रयास किया। उसका मानना था कि सम्राट को अकबर जैसी राजनीतिक दूरदर्शिता और औरंगज़ेब जैसी सैन्य दृढ़ता अपनानी चाहिए।

दरबार में गुटबाज़ी और षड्यंत्रों से असंतुष्ट होकर निज़ाम-उल-मुल्क ने 1724 ई. में वज़ीर का पद छोड़ दिया और दक्कन लौट गया। वहाँ उसका संघर्ष मुगल सूबेदार मुबारिज़ ख़ान से हुआ। शकरखेड़ा के युद्ध (1724 ई.) में मुबारिज़ ख़ान को पराजित करने के बाद निज़ाम-उल-मुल्क ने दक्कन में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता स्थापित कर ली। आगे चलकर यही सत्ता हैदराबाद राज्य के रूप में विकसित हुई।

निज़ाम-उल-मुल्क की स्वतंत्रता मुगल साम्राज्य के विघटन का महत्त्वपूर्ण संकेत थी। दक्कन के विभिन्न सूबे धीरे-धीरे केंद्रीय नियंत्रण से बाहर होते गए। मुगल प्रशासन की कमजोरी का लाभ उठाकर मराठों ने भी दक्कन और उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाया।

मराठों का बढ़ता प्रभाव

मुहम्मद शाह के शासनकाल में मराठा शक्ति का विस्तार मुगल साम्राज्य के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक था। पेशवा बाजीराव प्रथम ने मराठा शक्ति को संगठित कर मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड में अपना प्रभाव स्थापित किया।

1728 ई. के पालखेड़ के युद्ध में बाजीराव प्रथम ने निज़ाम-उल-मुल्क को पराजित किया। इसके बाद मराठों का प्रभाव और बढ़ गया। 1728 ई. के अमझेरा के युद्ध में मुगल सूबेदार गिरधर बहादुर की पराजय और मृत्यु के बाद मालवा में मुगल सत्ता और कमजोर हो गई।

बाजीराव प्रथम ने गुजरात और मालवा में मराठा प्रभुत्व स्थापित करने के लिए निरंतर अभियान चलाए। अंततः मुगल सम्राट को मराठों के साथ समझौता करना पड़ा। इस प्रकार मुगल साम्राज्य के पश्चिमी और मध्य भारतीय क्षेत्रों पर मराठों का प्रभाव बढ़ता गया।

1737 ई. में बाजीराव प्रथम ने दिल्ली तक अभियान किया। इससे मुगल साम्राज्य की सैन्य कमजोरी स्पष्ट रूप से सामने आई। एक समय जो साम्राज्य पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख राजनीतिक शक्ति था, उसी की राजधानी अब बाहरी शक्तियों के आक्रमण से सुरक्षित नहीं रह गई थी।

अवध और बंगाल की स्वायत्तता

मुहम्मद शाह के शासनकाल में केवल दक्कन ही नहीं, बल्कि उत्तर और पूर्वी भारत में भी मुगल केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई। अवध में सआदत ख़ान ने अपनी शक्ति मजबूत की और आगे चलकर अवध लगभग स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित हुआ।

इसी प्रकार बंगाल में मुगल सूबेदारों ने व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया। बंगाल के शासक दिल्ली के सम्राट की औपचारिक अधीनता स्वीकार करते रहे, लेकिन वास्तविक प्रशासन और राजस्व पर उनका नियंत्रण बढ़ता गया।

इस प्रकार मुहम्मद शाह के शासनकाल में हैदराबाद, अवध और बंगाल जैसी प्रांतीय शक्तियाँ उभरीं। इन राज्यों ने नाममात्र की मुगल अधीनता स्वीकार करते हुए अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र नीतियाँ अपनानी शुरू कर दीं।

सिखों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की चुनौती

पंजाब में सिख शक्ति भी मुगल प्रशासन के लिए चुनौती बनी रही। बंदा सिंह बहादुर की मृत्यु के बाद सिखों ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को नए रूप में संगठित किया। वे स्थानीय मुगल अधिकारियों पर छापामार हमले करते थे और धीरे-धीरे पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाते गए।

मुहम्मद शाह के शासनकाल में गुजरात और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय विद्रोह भी हुए। केंद्रीय सत्ता की कमजोरी के कारण अनेक स्थानीय सरदार, ज़मींदार और क्षेत्रीय समुदाय कर देने से इनकार करने लगे। मुगल प्रशासन को इन विद्रोहों को दबाने के लिए लगातार सैन्य अभियान चलाने पड़ते थे। इससे केंद्रीय खजाने और सेना पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।

प्रशासनिक दुर्बलता

मुहम्मद शाह का शासन मुगल प्रशासन की आंतरिक कमजोरियों का स्पष्ट उदाहरण था। बादशाह स्वयं कला और मनोरंजन में अधिक रुचि लेते थे तथा दरबार में विभिन्न अमीर गुटों का प्रभाव बढ़ता गया। तूरानी, ईरानी, हिंदुस्तानी और अन्य दरबारी गुटों के बीच प्रतिस्पर्धा ने प्रशासन को कमजोर किया।

केंद्रीय सरकार के पास विशाल साम्राज्य को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त आर्थिक और सैन्य संसाधन नहीं रह गए थे। मनसबदारी और जागीरदारी व्यवस्था में भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो चुकी थीं। जागीरों की कमी, राजस्व की अनिश्चितता और प्रांतीय अधिकारियों की बढ़ती स्वायत्तता ने साम्राज्य की केंद्रीय संरचना को कमजोर कर दिया।

इस प्रकार मुहम्मद शाह की व्यक्तिगत विलासप्रियता को मुगल पतन का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। साम्राज्य का विघटन लंबे समय से चली आ रही आर्थिक, प्रशासनिक, सैन्य और राजनीतिक समस्याओं का परिणाम था।

नादिर शाह का आक्रमण

मुहम्मद शाह के शासनकाल की सबसे विनाशकारी घटना 1739 ई. में नादिर शाह का आक्रमण थी। नादिर शाह ईरान का शक्तिशाली शासक था। अफ़गानिस्तान और ईरान में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद उसने भारत की ओर ध्यान दिया।

मुगल साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा कमजोर हो चुकी थी। कंधार और अफ़गान क्षेत्रों में मुगल नियंत्रण प्रभावी नहीं रहा था। नादिर शाह ने इस स्थिति का लाभ उठाया और अफ़गानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश किया।

उसने क्रमशः ग़ज़नी, काबुल, पेशावर और लाहौर पर अधिकार कर लिया। लाहौर के पतन के बाद मुगल दरबार को नादिर शाह के अभियान की गंभीरता का अनुभव हुआ। मुहम्मद शाह ने एक विशाल सेना संगठित की और स्वयं उत्तर की ओर बढ़े।

करनाल का युद्ध

24 फ़रवरी 1739 ई. को करनाल के निकट मुगल और नादिर शाह की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। मुगल सेना संख्या में बहुत बड़ी थी, लेकिन उसमें एकीकृत नेतृत्व और अनुशासन का अभाव था। इसके विपरीत, नादिर शाह की सेना प्रशिक्षित, अनुशासित और युद्ध-कौशल में अधिक सक्षम थी।

मुगल सेना के प्रमुख अमीरों में आपसी मतभेद भी थे। परिणामस्वरूप विशाल मुगल सेना होने के बावजूद नादिर शाह ने उसे निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। मुहम्मद शाह को नादिर शाह के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा और वे उसके साथ दिल्ली की ओर बढ़े। करनाल की पराजय ने मुगल साम्राज्य की सैन्य कमजोरी को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया।

दिल्ली में नादिर शाह का प्रवेश

नादिर शाह के दिल्ली पहुँचने के बाद प्रारंभ में स्थिति शांत रही। मुगल दरबार ने उसके साथ समझौता करने का प्रयास किया। किंतु कुछ समय बाद दिल्ली में यह अफ़वाह फैल गई कि नादिर शाह की हत्या कर दी गई है। इस अफ़वाह के कारण दिल्ली के कुछ लोगों ने उसके सैनिकों पर हमला कर दिया।

इस घटना से क्रोधित होकर नादिर शाह ने दिल्ली में नरसंहार का आदेश दिया। बड़ी संख्या में लोगों की हत्या की गई। इसके बाद उसने मुगल खजाने और दिल्ली की संपत्ति को अपने अधिकार में ले लिया। नादिर शाह अपने साथ मयूर सिंहासन, कोहिनूर और दरिया-ए-नूर सहित अपार धन-संपत्ति ले गया। बड़ी संख्या में हाथी, घोड़े और अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ भी उसके साथ भेजी गईं।

दिल्ली की लूट ने मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मुगल सम्राट अपनी राजधानी तक की रक्षा करने में सक्षम नहीं रहा था। इस घटना के बाद मुगल साम्राज्य का पतन अधिक तीव्र हो गया।

नादिर शाह के आक्रमण के परिणाम

नादिर शाह के आक्रमण के अनेक गंभीर परिणाम हुए। इससे मुगल साम्राज्य की सैन्य प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा और शाही खजाने को भारी क्षति हुई। दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा तथा प्रांतीय शासकों का केंद्रीय सत्ता पर विश्वास कमजोर हुआ। इस स्थिति का लाभ उठाकर मराठों, अफ़गानों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर मिला। साथ ही, विदेशी व्यापारिक शक्तियों को भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरी का स्पष्ट संकेत मिला। इस प्रकार 1739 ई. का नादिर शाह का आक्रमण मुगल साम्राज्य के पतन की निर्णायक घटनाओं में से एक सिद्ध हुआ।

मुहम्मद शाह का सांस्कृतिक योगदान

राजनीतिक रूप से मुहम्मद शाह का शासन पतन का काल था, किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उन्हें संगीत, चित्रकला, साहित्य और कला के संरक्षण के लिए जाना जाता है। इसी कारण उन्हें लोकप्रिय रूप से ‘रंगीला’ कहा गया।

उनके दरबार में संगीतज्ञों और कलाकारों को विशेष संरक्षण मिला। मुगल दरबार में ख़याल गायन शैली के विकास को विशेष गति मिली। नियामत ख़ान ‘सदारंग’ और उनके भतीजे फ़िरोज़ ख़ान ‘अदारंग’ ने ख़याल संगीत को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सदारंग की रचनाओं ने उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को गहरा प्रभाव दिया।

मुहम्मद शाह स्वयं भी संगीत और कविता में रुचि रखते थे। ‘सदारंग’ नाम से रचनाएँ करने की परंपरा से उनके संबंध का भी उल्लेख मिलता है। उनके दरबार में विभिन्न शास्त्रीय रागों और संगीत की विविध शैलियों को संरक्षण प्राप्त हुआ।

चित्रकला का विकास

मुहम्मद शाह के शासनकाल में मुगल चित्रकला का एक विशिष्ट रूप विकसित हुआ। दरबारी जीवन, संगीत, नृत्य, उत्सव, शिकार और होली जैसे विषय चित्रों में दिखाई देने लगे। निधा मल और चित्रमन जैसे कलाकारों ने दरबारी जीवन के जीवंत चित्र बनाए। इन चित्रों से तत्कालीन मुगल दरबार की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। नादिर शाह के आक्रमण और राजनीतिक संकट के बावजूद कला का यह विकास भारतीय चित्रकला के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

भाषा और साहित्य

मुहम्मद शाह के समय उर्दू भाषा का दरबारी और साहित्यिक विकास तेजी से हुआ। फ़ारसी अभी भी प्रशासन और उच्च साहित्य की प्रमुख भाषा थी, किंतु उर्दू का प्रभाव बढ़ रहा था। दिल्ली और उसके आसपास के सांस्कृतिक वातावरण में उर्दू साहित्य को संरक्षण प्राप्त हुआ। दरबार और नगरों में उर्दू कविता का विकास हुआ और आगे चलकर दिल्ली तथा लखनऊ उर्दू साहित्य के प्रमुख केंद्र बने। इस प्रकार मुहम्मद शाह का काल उर्दू के विकास की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण चरण माना जाता है।

जय सिंह द्वितीय और वैज्ञानिक विकास

मुहम्मद शाह के शासनकाल में आमेर के शासक सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर वेधशालाओं का निर्माण कराया और खगोलीय गणनाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया। जय सिंह द्वितीय ने ‘ज़ीज़-ए-मुहम्मदशाही’ नामक खगोलीय ग्रंथ तैयार कराया। दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में निर्मित वेधशालाएँ भारतीय खगोल विज्ञान के इतिहास में विशेष महत्त्व रखती हैं।

मुहम्मद शाह का व्यक्तिगत जीवन

मुहम्मद शाह का निजी जीवन भी उनके व्यक्तित्व की रंगीन छवि से जुड़ा रहा। उनकी प्रमुख पत्नी बादशाह बेगम थीं, जिन्हें उन्होंने ‘मलिका-उज़-ज़मानी’ की उपाधि प्रदान की। उनकी अन्य पत्नियों में साहिबा महल का उल्लेख मिलता है। क़ुदसिया बेगम से उनके पुत्र अहमद शाह बहादुर का जन्म हुआ। बादशाह बेगम ने अहमद शाह बहादुर के पालन-पोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुहम्मद शाह की विलासप्रियता और संगीत, नृत्य तथा मनोरंजन के प्रति विशेष रुचि के कारण उन्हें ‘रंगीला’ कहा गया। किंतु उनके व्यक्तित्व को केवल विलासी शासक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि वे कला और संस्कृति के सक्रिय संरक्षक भी थे।

अफ़गान चुनौती और अंतिम वर्ष

नादिर शाह की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य के विघटन से अफ़गान क्षेत्रों में नई राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं। इनमें अहमद शाह दुर्रानी सबसे प्रमुख था। उसने उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर विस्तार करना शुरू किया।

मुहम्मद शाह के शासन के अंतिम चरण में अफ़गान चुनौती गंभीर हो गई। 1748 ई. में मनूपुर के युद्ध में मुगल सेना का सामना अहमद शाह दुर्रानी की सेना से हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना को सफलता मिली, लेकिन उसे भारी क्षति भी उठानी पड़ी। इस युद्ध में मुगल वज़ीर क़मरुद्दीन ख़ान की मृत्यु हो गई। जब मुहम्मद शाह को इसकी सूचना मिली तो वे अत्यंत दुखी हुए। कुछ ही समय बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और 1748 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र अहमद शाह बहादुर मुगल सम्राट बने।

मुहम्मद शाह का मूल्यांकन

मुहम्मद शाह का शासन मुगल इतिहास का एक निर्णायक संक्रमणकाल था। उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता तेजी से कमजोर हुई। हैदराबाद में निज़ाम-उल-मुल्क, अवध में सआदत ख़ान, बंगाल में प्रांतीय शासकों तथा मालवा और गुजरात में मराठों की शक्ति बढ़ी।

1739 ई. का नादिर शाह का आक्रमण इस पतन का सबसे स्पष्ट प्रतीक था। करनाल की पराजय और दिल्ली की लूट ने मुगल साम्राज्य की सैन्य और राजनीतिक कमजोरी को उजागर कर दिया। इसके बाद मुगल सम्राट की सत्ता मुख्यतः दिल्ली और उसके आसपास तक सीमित होती गई।

फिर भी सांस्कृतिक दृष्टि से यह काल महत्त्वपूर्ण रहा। संगीत, विशेषकर ख़याल, चित्रकला, उर्दू साहित्य और दरबारी संस्कृति को संरक्षण मिला। जय सिंह द्वितीय की वैज्ञानिक गतिविधियों को भी इसी काल में प्रोत्साहन मिला।

इसलिए मुहम्मद शाह के शासन का मूल्यांकन दो परस्पर विरोधी पक्षों के आधार पर किया जाना चाहिए। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से यह मुगल साम्राज्य के तीव्र पतन का काल था, जबकि सांस्कृतिक दृष्टि से यह संगीत, कला और साहित्य के विकास का महत्त्वपूर्ण युग था। ‘मुहम्मद शाह रंगीला’ का व्यक्तित्व इसी विरोधाभास का प्रतिनिधित्व करता है—एक ओर विलासप्रिय और राजनीतिक रूप से कमजोर सम्राट, तो दूसरी ओर भारतीय कला और संगीत परंपरा का महत्त्वपूर्ण संरक्षक।

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