रोमन कानून
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
रोमन कानून से आशय प्राचीन रोम में विकसित उस विधि-व्यवस्था से है, जिसका विकास 753 ईसा पूर्व में रोम की स्थापना से आरंभ होकर पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन तक हुआ। पूर्वी रोमन या बाइजेंटाइन साम्राज्य में इसकी परंपरा 1453 ईस्वी तक बनी रही। रोमन कानून ने पश्चिमी सभ्यता के अधिकांश भाग तथा पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र की विधि-व्यवस्था के विकास को गहराई से प्रभावित किया। आधुनिक महाद्वीपीय यूरोप की नागरिक विधि-व्यवस्थाओं तथा लैटिन अमेरिका, एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों की विधि-व्यवस्थाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रोमन कानून का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
आज ‘रोमन कानून’ शब्द का अर्थ केवल प्राचीन रोम में लागू कानूनों तक सीमित नहीं है। रोमन न्यायविदों द्वारा विकसित विधिक संस्थाओं, सिद्धांतों और अवधारणाओं का प्रभाव साम्राज्य के पतन के बाद भी अनेक शताब्दियों तक यूरोप के विभिन्न देशों के कानूनों पर बना रहा। यहाँ तक कि जर्मनी के अनेक क्षेत्रों में 1900 ईस्वी में जर्मन नागरिक संहिता लागू होने तक रोमन कानून सहायक कानून के रूप में प्रयुक्त होता रहा।
मध्यकालीन यूरोप में प्रयुक्त रोमन कानून अपने प्राचीन स्वरूप में सुरक्षित नहीं था। उसका प्रमुख आधार सम्राट जस्टिनियन प्रथम द्वारा संकलित ‘कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस’ था, जिसकी व्याख्या, संशोधन और विकास 11वीं शताब्दी से आगे कई पीढ़ियों के न्यायविदों ने किया। इस प्रक्रिया में स्थानीय, जर्मनिक, सामंती और चर्च संबंधी विधि-परंपराओं का भी समावेश हुआ।
जुस सिविले और जुस जेंटियम का विकास
रोमन गणराज्य और साम्राज्य के लंबे इतिहास में विधि का क्रमिक विकास हुआ। प्रारंभिक गणराज्य में ‘जुस सिविले’ अर्थात् नागरिक कानून प्रमुख था। यह कानून मुख्यतः रोमन नागरिकों पर लागू होता था और इसका आधार रीति-रिवाजों तथा विधानों में था। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक रोम का व्यापार और राजनीतिक विस्तार बहुत बढ़ गया। विदेशी व्यापारियों और गैर-रोमन निवासियों से जुड़े विवादों के समाधान के लिए ‘जुस जेंटियम’ अर्थात् राष्ट्रों का कानून विकसित हुआ। यह किसी एक विधान द्वारा निर्मित कानून नहीं था, बल्कि उन प्रेटरों और प्रांतीय राज्यपालों की न्यायिक गतिविधियों से विकसित हुआ जो विदेशियों से संबंधित मामलों का निपटारा करते थे।
जुस जेंटियम में भूमध्यसागरीय व्यापारिक समुदायों की सामान्य प्रथाएँ, रोमन कानून के वे सिद्धांत जिन्हें औपचारिकताओं से मुक्त करके व्यापक रूप से लागू किया जा सकता था, तथा न्याय और समानता के संबंध में मजिस्ट्रेटों की व्यावहारिक समझ सम्मिलित थी। प्रांतों के अधिग्रहण के बाद भी यही व्यवस्था प्रांतीय निवासियों और रोमनों के बीच विवादों के समाधान में उपयोगी सिद्ध हुई।
आरंभ में रोमन कानून व्यक्तित्व के सिद्धांत पर आधारित था, अर्थात् किसी राज्य का कानून मुख्यतः उसके नागरिकों पर लागू होता था। विदेशियों के अधिकार सीमित थे। लेकिन रोम के बढ़ते व्यापारिक हितों और विदेशी समुदायों के साथ संबंधों के कारण विदेशियों को भी किसी प्रकार की कानूनी सुरक्षा देना आवश्यक हो गया। इसी आवश्यकता ने जुस जेंटियम के विकास को प्रोत्साहित किया।
तीसरी शताब्दी ईस्वी तक रोमन साम्राज्य के अधिकांश स्वतंत्र निवासियों को नागरिकता प्राप्त हो जाने के कारण जुस सिविले और जुस जेंटियम के बीच व्यावहारिक अंतर बहुत कम रह गया। जुस जेंटियम का एक सैद्धांतिक अर्थ भी विकसित हुआ। इसे ऐसा कानून माना जाने लगा जो सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू हो और जिसकी जड़ें प्राकृतिक न्याय में हों। इस विचार पर यूनानी दर्शन का भी प्रभाव था।
लिखित और अलिखित कानून
रोमन न्यायविदों ने कानून को मुख्यतः ‘जुस स्क्रिप्टम’ अर्थात् लिखित कानून और ‘जुस नॉन स्क्रिप्टम’ अर्थात् अलिखित कानून में विभाजित किया। अलिखित कानून से मुख्यतः प्रचलित रीति-रिवाजों का आशय था, जबकि लिखित कानून में विधान, मजिस्ट्रेटों के आदेश, सीनेट के प्रस्ताव, सम्राटों के आदेश और न्यायविदों के विधिक मत शामिल थे।
लेगेस और प्लेबिस्किटा
लिखित कानून का प्रमुख रूप ‘लेगेस’ था। ये रोमन जनता की सभाओं द्वारा पारित कानून थे। प्रारंभ में इन सभाओं पर कुलीन वर्ग अर्थात् पैट्रिशियनों का प्रभाव अधिक था, जबकि सामान्य नागरिकों अर्थात् प्लेबियनों की अपनी परिषद थी। प्लेबियन परिषद द्वारा पारित प्रस्तावों को ‘प्लेबिस्किटा’ कहा जाता था। 287 ईसा पूर्व के ‘लेक्स हॉर्टेंसिया’ के बाद प्लेबिस्किटा सभी रोमन नागरिकों पर बाध्यकारी हो गए। इसके बाद उन्हें भी सामान्य कानूनों के समान मान्यता प्राप्त हुई। गणराज्य में सभाएँ कानून निर्माण का महत्त्वपूर्ण स्रोत थीं। साम्राज्य की स्थापना के बाद सभाओं की वास्तविक राजनीतिक शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो गई और उनकी स्वीकृति सम्राट की इच्छा की औपचारिक पुष्टि तक सीमित रह गई।
बारह तालिकाओं का कानून
रोमन कानून का सबसे प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण लिखित संकलन ‘बारह तालिकाओं का कानून’ था। इसे 451–450 ईसा पूर्व में प्लेबियनों के राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में तैयार किया गया। इसका उद्देश्य ऐसा सार्वजनिक और लिखित कानून उपलब्ध कराना था जिसे कुलीन मजिस्ट्रेट मनमाने ढंग से बदल न सकें। मूल बारह तालिकाएँ आज उपलब्ध नहीं हैं। उनके बारे में जानकारी बाद के लेखकों, विशेषकर सिसरो, के उद्धरणों और संदर्भों से प्राप्त होती है। इनमें पारिवारिक संबंधों, संपत्ति, उत्तराधिकार, अपकृत्य और न्यायिक प्रक्रिया जैसे विषयों से संबंधित नियम थे। बारह तालिकाओं का महत्त्व केवल उनके विषय-वस्तु में नहीं था, बल्कि इस तथ्य में भी था कि उन्होंने रोमन कानून को सार्वजनिक और लिखित रूप देने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया।
एडिक्टा और प्रेटोर का कानून
367 ईसा पूर्व में नागरिकों से संबंधित बढ़ते न्यायिक मामलों को संभालने के लिए प्रेटोर का पद स्थापित किया गया। बाद में विदेशियों से संबंधित मामलों के लिए एक अलग ‘प्रेटोर पेरेग्रीनस’ नियुक्त किया गया। पद ग्रहण करते समय प्रेटोर एक ‘एडिक्टम’ या आदेश जारी करता था, जिसमें वह बताता था कि अपने कार्यकाल में किन परिस्थितियों में वह न्यायिक सहायता प्रदान करेगा। बाजारों की देखरेख करने वाले कुरुले एडील भी आदेश जारी करते थे। गणराज्य के अंतिम चरण में प्रेटोरों के एडिक्टा विधिक विकास का महत्त्वपूर्ण साधन बन गए। प्रेटोर अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुराने नागरिक कानून में आवश्यक लचीलापन पैदा करते थे। इसी प्रक्रिया से ‘जुस ऑनोरारियम’ विकसित हुआ, जिसने कई मामलों में जुस सिविले की कठोरता को दूर किया।
हैड्रियन और प्रेटोरियन एडिक्टा का संकलन
सम्राट हैड्रियन के शासनकाल में लगभग 131 ईस्वी में प्रेटोरियन एडिक्टा को व्यवस्थित और संकलित कराया गया। इस संकलन को बाद में स्थायी स्वरूप प्रदान किया गया और सम्राट की अनुमति के बिना उसमें परिवर्तन करना संभव नहीं रहा। इस प्रकार प्रेटोरियन विधि का स्वतंत्र विकास सीमित हो गया।
सीनेट के प्रस्ताव
लिखित कानून का एक अन्य स्रोत ‘सेनेटस कंसल्टा’ अर्थात् रोमन सीनेट के प्रस्ताव थे। गणराज्य में इनके पास सामान्यतः प्रत्यक्ष विधायी शक्ति नहीं थी, लेकिन मजिस्ट्रेट इनके आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई कर सकते थे। साम्राज्य के प्रारंभिक काल में सभाओं की शक्ति घटने और सम्राट की शक्ति बढ़ने के साथ सीनेट के प्रस्ताव अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए। सम्राट अपने प्रस्ताव सीनेट के समक्ष रखते थे और सीनेट उन्हें स्वीकृति देती थी। धीरे-धीरे यह स्वीकृति औपचारिक बन गई और वास्तविक विधायी शक्ति सम्राट के हाथों में केंद्रित हो गई।
सम्राटों के संविधान
दूसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक सम्राट मूलतः कानून का प्रमुख निर्माता बन चुका था। सम्राट द्वारा जारी कानूनों को ‘कॉनस्टिट्यूशन्स प्रिंसिपुम’ कहा जाता था। इनके प्रमुख रूप थे — फरमान या घोषणाएँ, अधिकारियों को दिए गए निर्देश, कानूनी प्रश्नों के लिखित उत्तर और सम्राट द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए निर्णय। इन शाही आदेशों ने धीरे-धीरे सीनेट और जनसभाओं के विधायी कार्यों का स्थान ले लिया।
न्यायविदों की भूमिका
लिखित और अलिखित कानून की व्याख्या करने वाले विद्वान न्यायविदों का वर्ग गणराज्य के अंतिम चरण में विकसित हुआ। इन्हें ‘ज्यूरिस कंसल्टी’ या ‘प्रूडेंट्स’ कहा जाता था। वे कानून की व्याख्या करते, प्रेटरों को सलाह देते और मुकदमों में पक्षकारों तथा न्यायाधीशों की सहायता करते थे। सम्राट ऑगस्टस ने कुछ प्रमुख न्यायविदों को सम्राट के अधिकार से विधिक मत देने का विशेषाधिकार प्रदान किया। इससे उनके मतों को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। प्रारंभिक साम्राज्य में महान न्यायविदों ने नागरिक कानून, प्रेटोरियन कानून, अनुबंध, संपत्ति और उत्तराधिकार सहित विधि के अनेक क्षेत्रों पर विस्तृत ग्रंथ लिखे। पाँचवीं शताब्दी में ऐसे नियम बनाए गए जिनके अनुसार न्यायालयों में केवल कुछ मान्यता प्राप्त न्यायविदों के ग्रंथों का आधिकारिक रूप से हवाला दिया जा सकता था। उत्तर-शास्त्रीय काल में स्वतंत्र विधिक चिंतन का स्तर धीरे-धीरे कम हुआ।
जस्टिनियन का कानून
जस्टिनियन का विधि-सुधार
सम्राट जस्टिनियन प्रथम ने 527 ईस्वी में सत्ता संभाली। उस समय रोमन कानून अत्यंत विस्तृत, बिखरा हुआ और कई स्थानों पर परस्पर विरोधी था। पुराने कानून में गणराज्य और प्रारंभिक साम्राज्य के कानून, सीनेट के प्रस्ताव तथा न्यायविदों के ग्रंथ शामिल थे। दूसरी ओर, नए कानून में बाद के सम्राटों द्वारा जारी किए गए असंख्य शाही आदेश सम्मिलित थे। कई पुराने कानून अप्रचलित हो चुके थे और अनेक विधिक ग्रंथ दुर्लभ या नष्ट हो चुके थे। उपलब्ध सामग्री में विरोधाभास भी थे। इसलिए जस्टिनियन ने कानून को व्यवस्थित और संहिताबद्ध करने का व्यापक अभियान शुरू किया।
कोडेक्स
जस्टिनियन ने शाही संविधानों के संकलन के लिए एक आयोग नियुक्त किया। आयोग ने पुराने संग्रहों और उपलब्ध शाही आदेशों का अध्ययन किया, अप्रचलित नियमों को हटाया तथा विरोधाभासी प्रावधानों को संशोधित किया। 529 ईस्वी में ‘कोडेक्स कॉन्स्टिट्यूशनम’ प्रकाशित हुआ। बाद में इसमें संशोधन किए गए और 534 ईस्वी में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ।
डाइजेस्ट
530 ईस्वी में न्यायविदों के ग्रंथों को व्यवस्थित करने के लिए एक नए आयोग का गठन किया गया। लगभग 16 प्रमुख विधिवेत्ताओं ने इस कार्य को पूरा किया। इसका परिणाम 533 ईस्वी में प्रकाशित ‘डाइजेस्ट’ या ‘पैंडेक्ट्स’ के रूप में सामने आया। डाइजेस्ट में शास्त्रीय रोमन न्यायविदों के महत्त्वपूर्ण विधिक विचारों और व्याख्याओं को व्यवस्थित किया गया। इसके लागू होने के बाद पुराने न्यायविदों के अनेक ऐसे ग्रंथों को आधिकारिक उपयोग से बाहर कर दिया गया जिन्हें संकलन में शामिल नहीं किया गया था।
इंस्टिट्यूट्स
जस्टिनियन के कानून का एक संक्षिप्त परिचयात्मक ग्रंथ ‘इंस्टिट्यूट्स’ था। इसका उद्देश्य कानून के विद्यार्थियों को रोमन विधि के मूल सिद्धांतों से परिचित कराना था। इसमें व्यक्तियों, वस्तुओं और विधिक कार्यवाहियों से संबंधित मूलभूत नियमों को व्यवस्थित किया गया।
नोवेल्स
534 ईस्वी से 565 ईस्वी में अपनी मृत्यु तक जस्टिनियन ने अनेक नए कानून जारी किए। इन्हें ‘नोवेल्ले कॉन्स्टिट्यूशन्स’ कहा गया। इनमें समय की नई परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में विधिक परिवर्तन किए गए। कोडेक्स, डाइजेस्ट, इंस्टिट्यूट्स और नोवेल्स को सामूहिक रूप से ‘कॉर्पस ज्यूरिस सिविलिस’ कहा जाता है। यही संकलन बाद की यूरोपीय विधि-परंपरा के लिए रोमन कानून का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत बना।
जस्टिनियन के बाद का विकास
नौवीं शताब्दी में सम्राट लियो षष्ठ ने ‘बेसिलिका’ नामक विधि-संकलन तैयार कराया। यह यूनानी भाषा में था और इसमें जस्टिनियन के कोडेक्स, डाइजेस्ट और नोवेल्स की सामग्री को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया। पश्चिमी यूरोप में जस्टिनियन का कानून लंबे समय तक विद्वानों के अध्ययन का आधार बना रहा। ग्यारहवीं शताब्दी से बोलोग्ना और अन्य विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन के पुनरुत्थान ने यूरोपीय विधि के इतिहास में एक नया चरण आरंभ किया।
रोमन कानून की प्रमुख श्रेणियाँ
व्यक्तियों का कानून
दूसरी शताब्दी के न्यायविद गायस के अनुसार व्यक्तियों के कानून में मूलभूत विभाजन स्वतंत्र और दास व्यक्तियों के बीच था। रोमन कानून में दास को कानूनी दृष्टि से वस्तु माना जाता था और उस पर स्वामी का अधिकार होता था। वह सामान्यतः अनुबंध का स्वतंत्र पक्षकार या संपत्ति का स्वतंत्र स्वामी नहीं हो सकता था। फिर भी दास पूर्णतः अधिकारहीन नहीं था। उसे स्वामी द्वारा कुछ संपत्ति के उपयोग की अनुमति दी जा सकती थी, जिसे ‘पेकुलियम’ कहा जाता था। मुक्ति प्राप्त करने के बाद वह सामान्यतः स्वतंत्र व्यक्ति और कई मामलों में रोमन नागरिक बन सकता था।
नागरिकता
रोमन नागरिकता निजी कानून के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि जुस सिविले का अधिकांश भाग नागरिकों पर लागू होता था। गैर-नागरिकों में लैटिनी और पेरेग्रीनी प्रमुख वर्ग थे। 212 ईस्वी में सम्राट काराकल्ला ने साम्राज्य के लगभग सभी स्वतंत्र निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान कर दी। इसके बाद नागरिक और गैर-नागरिक के बीच विधिक अंतर बहुत कम रह गया।
परिवार का कानून
पितृसत्तात्मक सत्ता
रोमन परिवार की सबसे प्रमुख विशेषता ‘पैट्रिया पोटेस्टास’ अर्थात् पितृसत्तात्मक सत्ता थी। परिवार का पुरुष मुखिया, सामान्यतः पिता, अपने बच्चों और दूर के वंशजों पर व्यापक अधिकार रखता था। यह अधिकार बच्चों की आयु बढ़ने के बाद भी बना रह सकता था। प्रारंभिक काल में पिता की शक्ति अत्यंत व्यापक थी और सैद्धांतिक रूप से उसे अपने बच्चों को कठोर दंड देने का अधिकार भी प्राप्त था। समय के साथ इन शक्तियों में कमी आई। साम्राज्यकाल में पुत्र को अपनी सैन्य आय और कुछ अन्य संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार मिलने लगे। जस्टिनियन के समय तक पितृसत्तात्मक सत्ता काफी सीमित हो चुकी थी और संपत्ति के संबंध में भी पुत्रों के अधिकार बढ़ गए थे। सामान्यतः पैट्रिया पोटेस्टास पिता की मृत्यु या बच्चे की विधिक मुक्ति से समाप्त होती थी।
विवाह
रोमन कानून में विवाह के दो प्रमुख रूप थे- पति के अधिकार के अधीन विवाह और पति के अधिकार से बाहर विवाह। पहला रूप गणराज्य के अंतिम काल तक ही दुर्लभ हो गया था।
पति के अधिकार से बाहर विवाह में पत्नी अपने पिता के परिवार से विधिक रूप से जुड़ी रहती थी और उसकी संपत्ति सामान्यतः पति की संपत्ति में विलीन नहीं होती थी। पति-पत्नी के बीच संपत्ति संबंध भी अलग बने रहते थे। प्रारंभिक रोम में तलाक सीमित परिस्थितियों में संभव था, लेकिन बाद में वैवाहिक संबंध समाप्त करना अपेक्षाकृत सरल हो गया। ईसाई सम्राटों ने अनुचित तलाक पर दंड लगाने का प्रयास किया, फिर भी विवाह-विच्छेद की विधिक संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
रखैल प्रथा
रोमन समाज में ‘कॉनक्यूबिनाटस’ अर्थात् रखैल प्रथा को दहेज-विहीन वैवाहिक संबंध के रूप में मान्यता प्राप्त थी। इसमें स्त्री का सामाजिक दर्जा पत्नी से कम होता था और उसकी संतान को सामान्यतः वैध उत्तराधिकार नहीं मिलता था। चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने कुछ परिस्थितियों में बाद के वैध विवाह द्वारा ऐसी संतानों को वैध बनाने की व्यवस्था की।
संरक्षकता
यौवनारंभ से कम आयु के बच्चों को संरक्षक की आवश्यकता होती थी। सामान्यतः पुरुषों के लिए यौवनारंभ की आयु 14 वर्ष और महिलाओं के लिए 12 वर्ष मानी जाती थी। बाद में 25 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए भी संरक्षकता की व्यवस्था विकसित हुई। प्रारंभिक काल में महिलाओं को भी, यदि वे पैट्रिया पोटेस्टास या किसी अन्य पुरुष अधिकार के अधीन नहीं थीं, संरक्षक की आवश्यकता होती थी। साम्राज्यकाल में यह व्यवस्था धीरे-धीरे औपचारिकता बन गई और जस्टिनियन के समय तक इसका महत्त्व काफी घट चुका था।
निगम और सामूहिक संस्थाएँ
रोमन कानून में आधुनिक अर्थों में निगम या कानूनी व्यक्ति की सामान्य अवधारणा विकसित नहीं हुई थी। फिर भी कुछ समूहों को सामूहिक रूप से संपत्ति रखने, अनुबंध करने और अन्य विधिक कार्य करने के अधिकार दिए गए थे।
नगरपालिकाएँ
नगरपालिकाओं को संपत्ति प्राप्त करने, अनुबंध करने और कुछ परिस्थितियों में उत्तराधिकार स्वीकार करने का अधिकार था। साम्राज्यकाल में उनके अधिकारों का विस्तार हुआ।
रोमन जनता
‘पोपुलस रोमानुस’ अर्थात् रोमन जनता सामूहिक रूप से संपत्ति प्राप्त कर सकती थी, अनुबंध कर सकती थी और उत्तराधिकार ग्रहण कर सकती थी। सार्वजनिक संपत्ति में राज्य की विभिन्न प्रकार की संपत्तियाँ शामिल थीं।
कॉलेजिया
‘कॉलेजिया’ विभिन्न प्रकार के निजी संगठन थे। इनमें व्यापारिक और शिल्प संघ, अंत्येष्टि समितियाँ तथा धार्मिक संगठन शामिल थे। सम्राटों ने इन संस्थाओं की स्थापना और गतिविधियों को नियंत्रित किया।
धर्मार्थ निधियाँ
उत्तर-शास्त्रीय काल में धर्मार्थ कार्यों के लिए दान और वसीयत द्वारा संपत्ति अलग रखने की व्यवस्था विकसित हुई। चर्च सहित विभिन्न धार्मिक संस्थाएँ इन निधियों के प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
संपत्ति और कब्जे का कानून
रोमन कानून में भूमि और चल संपत्ति पर निजी स्वामित्व की व्यापक अवधारणा विकसित हुई। पूर्ण स्वामित्व को ‘डोमिनियम’ कहा जाता था। यह रोमन विधि की प्रमुख विशेषताओं में से एक था।
मैनसिपातियो
‘मैनसिपातियो’ संपत्ति के औपचारिक हस्तांतरण की एक प्राचीन प्रक्रिया थी। इसमें हस्तांतरणकर्ता और प्राप्तकर्ता के अतिरिक्त पाँच वयस्क रोमन नागरिक गवाह, एक तराजू और कांस्य या तांबे का टुकड़ा आवश्यक था। निर्धारित औपचारिक शब्दों और क्रियाओं के माध्यम से संपत्ति का हस्तांतरण किया जाता था।
न्यायिक हस्तांतरण
‘इन् यूरे केस्सियो’ के अंतर्गत संपत्ति का हस्तांतरण न्यायालय के समक्ष एक औपचारिक दावे के रूप में किया जाता था। प्राप्तकर्ता वस्तु पर अपना अधिकार घोषित करता और हस्तांतरणकर्ता उसका विरोध नहीं करता। इसके बाद मजिस्ट्रेट वस्तु को प्राप्तकर्ता के अधिकार में घोषित कर देता था।
उसुकैपियो
‘उसुकैपियो’ का अर्थ लंबे समय तक वैध कब्जे के आधार पर स्वामित्व प्राप्त करना था। प्रारंभिक कानून में भूमि के लिए दो वर्ष और चल संपत्ति के लिए एक वर्ष का निरंतर कब्जा पर्याप्त हो सकता था। विकसित कानून में कब्जा सद्भावना से प्राप्त होना चाहिए था तथा वस्तु चोरी या हिंसापूर्वक प्राप्त नहीं होनी चाहिए थी।
अधिग्रहण के अन्य तरीके
बिना स्वामी की वस्तु पर पहला वैध कब्जा करने वाला व्यक्ति उसका स्वामी बन सकता था। यह नियम जंगली पशुओं और कुछ अन्य प्राकृतिक वस्तुओं पर भी लागू होता था। ‘एक्सेसियो’ के अनुसार किसी सहायक वस्तु के किसी मुख्य वस्तु से जुड़ जाने पर उसका स्वामित्व मुख्य वस्तु के स्वामी को प्राप्त हो जाता था। उदाहरण के लिए, भूमि पर निर्मित भवन भूमि का ही हिस्सा माना जाता था।
‘स्पेसिफिकातियो’ में किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे की सामग्री से नई वस्तु बनाने का प्रश्न उठता था। इस संबंध में रोमन न्यायविदों में मतभेद था। जस्टिनियन ने मध्य मार्ग अपनाया और यह देखा कि वस्तु को उसकी मूल अवस्था में वापस लाया जा सकता है या नहीं। ‘थिसॉरी इन्वेंटियो’ के अनुसार अपनी भूमि में प्राप्त खजाना सामान्यतः खोजकर्ता का माना जाता था, जबकि दूसरे की भूमि में मिले खजाने में खोजकर्ता और भूमि-स्वामी का हिस्सा निर्धारित किया जाता था।
ट्रेडितियो
‘ट्रेडितियो’ कब्जे के सरल हस्तांतरण की प्रक्रिया थी। इसमें स्वामित्व हस्तांतरित करने के इरादे से वस्तु दूसरे व्यक्ति को सौंप दी जाती थी। यह जुस जेंटियम के अंतर्गत स्वामित्व हस्तांतरण का महत्त्वपूर्ण साधन था। प्रेटोरों ने ऐसे मामलों में खरीदार के कब्जे की रक्षा के लिए उपाय विकसित किए। इससे ‘बोनिटरी स्वामित्व’ की अवधारणा विकसित हुई। जस्टिनियन ने अंततः नागरिक स्वामित्व और बोनिटरी स्वामित्व के बीच के सैद्धांतिक अंतर को समाप्त कर दिया।
पट्टा और संपत्ति संबंधी अधिकार
सामान्य किरायेदार को मकान-मालिक के विरुद्ध मुख्यतः संविदात्मक अधिकार प्राप्त होते थे। लेकिन कृषि और दीर्घकालीन भवन-पट्टों में किरायेदारों को अधिक स्थायी और हस्तांतरणीय अधिकार प्राप्त हो सकते थे। दूसरे की संपत्ति में सीमित अधिकारों की भी व्यवस्था थी। ग्रामीण अधिकारों में आवागमन और जल के अधिकार प्रमुख थे, जबकि शहरी अधिकारों में प्रकाश और दृश्य से संबंधित अधिकार शामिल थे।
‘उसुसफ्रक्टस’ किसी वस्तु के उपयोग और उससे प्राप्त फलों का उपभोग करने का अधिकार था। ‘उसुस’ इससे सीमित अधिकार था, जिसमें वस्तु के उपयोग की अनुमति थी, लेकिन उससे आर्थिक लाभ प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। कब्जा स्वामित्व से अलग विधिक स्थिति थी। रोमन कानून में कब्जे की रक्षा के लिए विशेष प्रेटोरियन उपाय विकसित किए गए।
अपकृत्य और अनुबंध
शास्त्रीय रोमन न्यायविदों ने दायित्वों को मुख्यतः अपकृत्य और अनुबंध से उत्पन्न दायित्वों में विभाजित किया। जस्टिनियन के कानून में अर्ध-अपकृत्य और अर्ध-अनुबंध को भी स्वतंत्र श्रेणियों के रूप में स्वीकार किया गया।
अपकृत्य
छठी और पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में निजी प्रतिशोध की प्रथा धीरे-धीरे आर्थिक क्षतिपूर्ति की व्यवस्था में परिवर्तित हुई। ‘तालियो’ के सिद्धांत के अंतर्गत चोट के बदले समान चोट का विचार था, लेकिन बाद में निश्चित आर्थिक दंड अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए।
चोरी के लिए सामान्यतः चोरी की वस्तु के मूल्य का दोगुना दंड निर्धारित था। रंगे हाथ पकड़े गए चोरों के लिए अधिक कठोर दंड हो सकता था। ‘लेक्स एक्विलिया’ ने संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से संबंधित कानून को व्यवस्थित किया। बाद के न्यायविदों ने इसकी व्याख्या को व्यापक बनाकर अनेक प्रकार की क्षति को इसके अंतर्गत शामिल किया। जस्टिनियन के इंस्टिट्यूट्स में चार प्रमुख निजी अपकृत्यों का उल्लेख मिलता है — चोरी, हिंसापूर्वक डकैती, संपत्ति को नुकसान और अपमान या हमला।
अनुबंध
प्रारंभिक गणराज्य में अनुबंध का विकसित कानून बहुत सीमित था। ‘नेक्सम’ नामक एक कठोर ऋण-व्यवस्था थी, जिसके कारण ऋणी लेनदार के अत्यधिक नियंत्रण में आ सकता था। बाद में यह व्यवस्था समाप्त हो गई। शास्त्रीय रोमन कानून में अनुबंधों को चार प्रमुख वर्गों में बाँटा गया — शाब्दिक, मौखिक, वास्तविक और सहमति-आधारित अनुबंध।
शाब्दिक अनुबंध
शाब्दिक अनुबंध में लेनदार की लेखा-पुस्तिका में प्रविष्टि द्वारा दायित्व उत्पन्न किया जाता था। समय के साथ इसका महत्त्व कम हो गया।
मौखिक अनुबंध
मौखिक अनुबंध में निर्धारित शब्दों का उच्चारण आवश्यक था। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण रूप ‘स्टिपुलातियो’ था। इसमें प्रश्न और उत्तर के माध्यम से समझौता किया जाता था। उदाहरण के लिए, एक पक्ष पूछता था — “क्या तुम मुझे दस हजार सेस्टर्स देने का वचन देते हो?” दूसरा पक्ष उत्तर देता था — “मैं वचन देता हूँ।” जस्टिनियन के समय तक लिखित प्रमाण को भी पर्याप्त महत्त्व मिलने लगा।
वास्तविक अनुबंध
वास्तविक अनुबंध में किसी वस्तु का हस्तांतरण आवश्यक था। इनमें धन का ऋण, वस्तु का ऋण, जमा और गिरवी प्रमुख थे।
सहमति-आधारित अनुबंध
इनमें केवल पक्षकारों की सहमति पर्याप्त थी। प्रमुख उदाहरण थे — विक्रय, वस्तुओं या सेवाओं का किराया, साझेदारी और आदेश। समय के साथ रोमन कानून में यह सिद्धांत विकसित हुआ कि कुछ पारस्परिक समझौतों में यदि एक पक्ष अपना दायित्व पूरा कर चुका है तो वह दूसरे पक्ष को भी अपना दायित्व पूरा करने के लिए बाध्य कर सकता है।
अर्ध-अपकृत्य
अर्ध-अपकृत्य में ऐसे दायित्व आते थे जो पूर्णतः पारंपरिक अपकृत्यों के अंतर्गत नहीं आते थे। इनमें भवन से सार्वजनिक स्थान पर वस्तु गिरने या फेंके जाने से हुई क्षति तथा जहाज-मालिक, सराय-मालिक या अस्तबल-मालिक के कर्मचारियों द्वारा ग्राहकों की संपत्ति को हुई चोरी या क्षति से संबंधित दायित्व शामिल थे।
अर्ध-अनुबंध
अर्ध-अनुबंध में ऐसे दायित्व शामिल थे जिनमें औपचारिक अनुबंध नहीं था और कोई अपकृत्य भी नहीं हुआ था। इसका प्रमुख उदाहरण ‘नेगोटियोरम गेस्टियो’ था, जिसमें कोई व्यक्ति बिना औपचारिक अधिकार के दूसरे व्यक्ति के हित में कार्य करता था। एक अन्य महत्त्वपूर्ण उदाहरण अनुचित संवर्धन था। यदि किसी व्यक्ति को दूसरे की संपत्ति के खर्च पर ऐसी राशि प्राप्त हो जाती थी जिसका वह अधिकारी नहीं था, तो उसे वापस करने का दायित्व उत्पन्न हो सकता था। ‘कंडिक्टियो इंडेबिटि’ इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण था।
उत्तराधिकार का कानून
उत्तराधिकार रोमन कानून का अत्यंत विकसित और जटिल क्षेत्र था। कोई वयस्क रोमन नागरिक वसीयत बना सकता था, लेकिन वैध वसीयत के लिए निर्धारित औपचारिकताओं का पालन आवश्यक था। वसीयत की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता एक या अधिक उत्तराधिकारियों की नियुक्ति थी। रोमन अर्थ में उत्तराधिकारी मृतक के हस्तांतरणीय अधिकारों और दायित्वों का सार्वभौमिक उत्तराधिकारी होता था। वह मृतक की संपत्ति के साथ-साथ उसके ऋणों का भी उत्तराधिकारी बन सकता था।
इस कारण उत्तराधिकार स्वीकार करना कभी-कभी उत्तराधिकारी के लिए आर्थिक रूप से हानिकारक हो सकता था। जस्टिनियन ने ऐसी स्थिति से बचाने के लिए यह व्यवस्था की कि संपत्ति की विधिवत सूची बनाने वाला उत्तराधिकारी मृतक की संपत्ति के मूल्य से अधिक ऋण चुकाने के लिए बाध्य नहीं होगा। वसीयत की स्वतंत्रता भी पूर्ण नहीं थी। कुछ निकट संबंधियों, विशेषकर बच्चों, के लिए संपत्ति का निश्चित भाग सुरक्षित रखना आवश्यक था।
बिना वसीयत के उत्तराधिकार
प्राचीन कानून में सबसे पहले मृतक के अपने अधिकाराधीन उत्तराधिकारियों को संपत्ति मिलती थी। उनके अभाव में निकट सगोत्रीय संबंधियों और फिर गोत्र के सदस्यों को उत्तराधिकार प्राप्त होता था।
बाद के सुधारों में अधिकार से मुक्त किए गए बच्चों को भी अधिकाराधीन बच्चों के समान दर्जा दिया गया। समय के साथ पति-पत्नी और अन्य निकट संबंधियों के उत्तराधिकार अधिकार भी बढ़े।
जस्टिनियन के समय तक उत्तराधिकार की व्यवस्था अधिक व्यवस्थित हो गई। सबसे पहले वंशजों का अधिकार था। उनके अभाव में पूर्वजों, भाई-बहनों और उनके वंशजों को उत्तराधिकार मिलता था। इसके बाद अन्य निकट संबंधियों का क्रम आता था। जस्टिनियन ने निर्धन विधवा के लिए भी विशेष व्यवस्था की। उसे कुछ परिस्थितियों में पति की संपत्ति के एक-चौथाई हिस्से का अधिकार दिया गया।
प्रक्रिया का कानून
प्रारंभिक न्यायिक प्रक्रिया
प्रारंभिक रोमन न्यायिक प्रक्रिया दो चरणों में होती थी। पहला चरण मजिस्ट्रेट के सामने और दूसरा चरण नियुक्त न्यायाधीश के सामने चलता था। पहले चरण में पक्षकारों को निर्धारित विधिक शब्दों और औपचारिकताओं का पालन करना पड़ता था। प्रक्रिया इतनी कठोर थी कि थोड़ी-सी औपचारिक त्रुटि भी मुकदमे को विफल कर सकती थी। दूसरे चरण में न्यायाधीश के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते थे। वादी पर अपने दावे को सिद्ध करने का भार होता था।
फॉर्मुलरी प्रक्रिया
ईसा पूर्व दूसरी और पहली शताब्दी में अधिक लचीली ‘फॉर्मुलरी’ प्रक्रिया विकसित हुई। इसमें मजिस्ट्रेट मामले को एक लिखित निर्देश के रूप में न्यायाधीश के सामने भेजता था। इसमें बताया जाता था कि यदि निर्धारित तथ्य सिद्ध हों तो न्यायाधीश को क्या निर्णय देना चाहिए।
इस प्रक्रिया ने कठोर मौखिक औपचारिकताओं को कम किया और रोमन न्याय-व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक बनाया।
साम्राज्यकालीन प्रक्रिया
गणराज्य के अंतिम काल और साम्राज्य के दौरान एक नई प्रक्रिया विकसित हुई, जिसमें मजिस्ट्रेट या शाही अधिकारी स्वयं विवाद की जाँच कर निर्णय दे सकता था। इसे प्रशासनिक या असाधारण न्यायिक प्रक्रिया के रूप में विकसित किया गया। सम्राट द्वारा नियुक्त अधिकारियों ने धीरे-धीरे गणराज्यकालीन मजिस्ट्रेटों की जगह ले ली। इसके परिणामस्वरूप दो चरणों वाली प्रक्रिया और पक्षकारों की सहमति पर आधारित पुरानी व्यवस्था कमजोर हो गई। न्याय अधिक प्रत्यक्ष रूप से राज्य की शक्ति के माध्यम से प्रदान किया जाने लगा।
रोमन कानून और नागरिक विधि
‘नागरिक विधि’ शब्द का आधुनिक अर्थ महाद्वीपीय यूरोप में विकसित उस विधि-परिवार से है जिसकी ऐतिहासिक नींव रोमन, जर्मनिक, चर्च संबंधी, सामंती, व्यापारिक और प्रथागत कानूनों के मिश्रण में है। यह विधि-परिवार लैटिन अमेरिका तथा एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में भी अपनाया गया है।
प्राचीन रोम में ‘जुस सिविले’ का अर्थ रोम के नागरिकों पर लागू कानून था। इसके विपरीत जुस जेंटियम का प्रयोग नागरिकों और विदेशियों दोनों से संबंधित व्यापक विधिक व्यवस्था के लिए किया जाता था। आधुनिक अर्थ में नागरिक विधि को सार्वजनिक और आपराधिक कानून से अलग निजी कानून के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जाता है।
रोमन-जर्मनिक नागरिक विधि की उत्पत्ति
पाँचवीं और छठी शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी और मध्य यूरोप के बड़े हिस्से पर जर्मनिक समुदायों का नियंत्रण स्थापित हो गया। एंग्लो-सैक्सन, फ्रैंक, बरगुंडियन, विसिगोथ और लोम्बार्ड जैसे समुदायों की अपनी प्रथाएँ थीं। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद अनेक क्षेत्रों में जर्मनिक रीति-रिवाज प्रमुख हो गए।
मध्यकाल में सामंतवाद, नगरों के विकास, व्यापार के विस्तार और चर्च की बढ़ती शक्ति ने विधि को अधिक जटिल बना दिया। व्यापारियों की प्रथाएँ और रोमन कैथोलिक चर्च का कैनन कानून इस विकास में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थे। कैनन कानून के माध्यम से रोमन विधि की अनेक अवधारणाएँ मध्यकालीन यूरोप में जीवित रहीं।
रोमन कानून का पुनरुत्थान
ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्तरी इटली में रोमन कानून का पुनः अध्ययन शुरू हुआ। बोलोग्ना विश्वविद्यालय इसका प्रमुख केंद्र बना। पूरे यूरोप से विद्यार्थी वहाँ कानून का अध्ययन करने आए।
प्रशिक्षित न्यायाधीशों और प्रशासकों की बढ़ती आवश्यकता ने रोमन विधि के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। बोलोग्ना से प्रशिक्षित विधिवेत्ता यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों में गए और रोमन कानून की अवधारणाओं को न्याय-व्यवस्था में लागू करने लगे। जर्मनी और नीदरलैंड में रोमन कानून का प्रभाव विशेष रूप से मजबूत हुआ। पवित्र रोमन साम्राज्य में सम्राटों द्वारा स्वयं को रोमन सम्राटों का उत्तराधिकारी मानने के कारण भी रोमन कानून को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
जुस कम्यून
रोमन कानून ने स्थानीय कानूनों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। इसके बजाय रोमन, जर्मनिक, सामंती और चर्च संबंधी कानूनों का मिश्रण विकसित हुआ। अनुबंध और अपकृत्य के क्षेत्र में रोमन कानून का प्रभाव विशेष रूप से मजबूत रहा, जबकि विवाह और उत्तराधिकार में कैनन, जर्मनिक तथा स्थानीय परंपराओं का प्रभाव बना रहा। इस साझा विधिक परंपरा को ‘जुस कम्यून’ कहा गया। यह पूरे यूरोप में समान रूप से लागू होने वाला कानून नहीं था, बल्कि सामान्य विधिक ज्ञान, सिद्धांतों और प्रशिक्षण की एक साझा परंपरा थी।
राष्ट्रीय संहिताकरण का विकास
धर्म-सुधार, प्रति-धर्म-सुधार और राष्ट्रवाद के उदय ने यूरोपीय विधिक एकता को कमजोर किया। विभिन्न राष्ट्रों ने अपने कानूनों को संहिताबद्ध करना शुरू किया। डेनमार्क में 1683 ईस्वी, नॉर्वे में 1687 ईस्वी, स्वीडन-फिनलैंड में 1734 ईस्वी और प्रशिया में 1794 ईस्वी में महत्त्वपूर्ण संहिताकरण हुए।
नेपोलियन संहिता
फ्रांसीसी क्रांति के बाद फ्रांस में व्यापक विधायी परिवर्तन हुए। कानून के प्रमुख स्रोत के रूप में लिखित विधान को सर्वोच्च स्थान मिला। पुरानी न्यायिक संस्थाओं को समाप्त कर एकीकृत न्यायालय-व्यवस्था स्थापित की गई।
क्रांतिकारी कानून स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों से प्रभावित था। सामंती विशेषाधिकारों को समाप्त किया गया और कानून के समक्ष नागरिकों की समानता पर बल दिया गया।
विवाह को नागरिक संस्था के रूप में व्यवस्थित किया गया, तलाक की अनुमति दी गई, पितृसत्तात्मक अधिकारों को सीमित किया गया और उत्तराधिकार में बच्चों की समानता को बढ़ावा दिया गया।
नेपोलियन के शासनकाल में इन परिवर्तनों को व्यवस्थित संहिताओं में संकलित किया गया। 1804 ईस्वी की ‘नागरिक संहिता’ को बाद में ‘नेपोलियन संहिता’ के नाम से प्रसिद्धि मिली। इसने फ्रांस के साथ-साथ बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों की विधि-व्यवस्था को प्रभावित किया।
जर्मन संहिताकरण
जर्मनी में राष्ट्रीय विधि-संहिताकरण फ्रांस की तुलना में बाद में हुआ। 1871 ईस्वी में राजनीतिक एकीकरण के बाद न्यायालयों के संगठन और नागरिक तथा आपराधिक प्रक्रिया में एकरूपता लाई गई। जर्मन नागरिक संहिता 1896 ईस्वी में पूरी हुई और 1 जनवरी 1900 ईस्वी से प्रभावी हुई। इस संहिता ने जर्मन विधि-विज्ञान को आधुनिक नागरिक विधि के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया। उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन विधि-विज्ञान का प्रभाव ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, नॉर्डिक देशों और पूर्वी यूरोप के अनेक क्षेत्रों तक पहुँचा। स्विस संहिताकरण ने बाद में तुर्की और चीन की विधि-व्यवस्था को भी प्रभावित किया।
रोमन-जर्मनिक विधि-परिवार
नागरिक विधि को व्यापक रूप से रोमन-जर्मनिक विधि-परिवार भी कहा जाता है। संहिताकरण की अलग-अलग परंपराओं और विधिक विद्या की भिन्न शैलियों के कारण इसे सामान्यतः दो प्रमुख शाखाओं में बाँटा जाता है — फ्रांसीसी या रोमनवादी शाखा तथा जर्मन या जर्मनिक शाखा। जापान की विधि-व्यवस्था मुख्यतः जर्मन शाखा से प्रभावित है, यद्यपि उसमें अपनी विशिष्ट विशेषताएँ भी हैं।
फ्रांसीसी विधि-प्रणाली
फ्रांसीसी क्रांति के दौरान कानून को समाज के पुनर्गठन का प्रमुख साधन माना गया। विधान को कानून का सर्वोच्च स्रोत बनाया गया और न्यायालयों का मुख्य कार्य कानून को लागू करना माना गया।
क्रांतिकारी व्यवस्था का वैचारिक आधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व था। सामंती विशेषाधिकार समाप्त किए गए और कुलीन तथा पादरी वर्ग को प्राप्त विशेषाधिकारों को समाप्त कर नागरिकों की कानूनी समानता स्थापित की गई।
व्यावसायिक संघों और ऐसे संगठनों पर भी नियंत्रण लगाया गया जिनके कारण नागरिकों और राज्य के बीच स्वतंत्र समूहों की शक्ति बनी रह सकती थी। चर्च की संपत्ति का धर्मनिरपेक्षीकरण किया गया और पादरियों तथा बिशपों की स्थिति को राज्य के नियंत्रण में लाया गया।
पारिवारिक कानून में परिवर्तन
क्रांतिकारी सिद्धांतों के प्रभाव से विवाह को नागरिक संस्था के रूप में स्थापित किया गया। तलाक को मान्यता मिली और पिता की पारंपरिक सत्ता को सीमित किया गया। पति और पत्नी की कानूनी स्थिति में अधिक समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया। उत्तराधिकार में बच्चों की समानता पर बल दिया गया और वसीयतकर्ता की संपत्ति-वितरण की स्वतंत्रता को सीमित किया गया, ताकि उत्तराधिकार में असमानता पुनः स्थापित न हो सके।
नागरिक संहिता की अवधारणा
1804 ईस्वी की नागरिक संहिता का उद्देश्य फ्रांसीसी निजी कानून को एकीकृत करना था। इसके निर्माताओं का विश्वास था कि कानून स्पष्ट और सामान्य भाषा में लिखा जाना चाहिए ताकि नागरिक उसे समझ सकें। संहिता को छोटे और स्पष्ट अनुच्छेदों में व्यवस्थित किया गया। इसके निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि कानून निर्माता जीवन की प्रत्येक संभावित परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। इसलिए संहिता में व्यापक और सामान्य नियम बनाए गए, जिन्हें बदलती परिस्थितियों में न्यायालयों द्वारा लागू किया जा सके। संहिता में तर्क और अनुभव दोनों का समन्वय था। इसके निर्माताओं को पूर्व-क्रांतिकारी फ्रांसीसी कानून का पर्याप्त अनुभव था और वे परंपरा को पूरी तरह अस्वीकार करने के बजाय उसे नई सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना चाहते थे।
नागरिक संहिता में बाद के परिवर्तन
1804 से 1880 ईस्वी तक नागरिक संहिता में बहुत कम बड़े परिवर्तन हुए। 1816 ईस्वी में तलाक समाप्त कर दिया गया, लेकिन बाद में इसे पुनः स्वीकार किया गया। लंबे समय तक फ्रांसीसी न्यायविदों और न्यायालयों का प्रमुख ध्यान संहिता की व्याख्या और उसके सामान्य नियमों को विशिष्ट मामलों में लागू करने पर रहा। तीसरे गणतंत्र के दौरान सामाजिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं। सार्वभौमिक मताधिकार के विस्तार के साथ श्रमिक वर्ग का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा। उदार व्यक्तिवाद की अपेक्षा सामाजिक संरक्षण की अवधारणा को अधिक महत्त्व मिलने लगा। राज्य ने कमजोर वर्गों की रक्षा के लिए आर्थिक और सामाजिक मामलों में अधिक हस्तक्षेप करना शुरू किया।
बीसवीं शताब्दी के विश्वयुद्धों ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया। आपातकालीन कानूनों और सामाजिक हितों की रक्षा के लिए राज्य के अधिकारों का विस्तार हुआ। परिणामस्वरूप निजी अधिकारों पर सामाजिक हितों की प्राथमिकता बढ़ी, जिसे कानून का ‘सामाजीकरण’ कहा गया। कानून को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालने में न्यायालयों और विधिवेत्ताओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। न्यायालयों ने संहिता के मूल सिद्धांतों की सीमा में रहते हुए नई परिस्थितियों के लिए उनकी व्याख्या विकसित की। कई महत्त्वपूर्ण विधानों का मसौदा न्यायाधीशों, विधि-प्राध्यापकों और वकीलों से बने आयोगों ने तैयार किया।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में पारित अनेक कानून मूल संहिता में सीधे शामिल नहीं किए गए, बल्कि अलग विधानों के रूप में लागू रहे। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक नागरिक संहिता में व्यापक संशोधन की आवश्यकता स्पष्ट हो गई। इसके लिए विभिन्न आयोगों ने नए प्रारूप तैयार किए। 1958 में चार्ल्स द गॉल के सत्ता में आने के बाद संपूर्ण नई संहिता बनाने का प्रयास रुक गया और इसके स्थान पर क्रमिक तथा विषय-विशेष आधारित संशोधनों की प्रक्रिया जारी रही। परिवार कानून से संबंधित प्रावधानों में विशेष रूप से व्यापक पुनर्गठन किया गया।


