रोमन साहित्य
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
रोमन साहित्य का व्यवस्थित विकास मुख्यतः रोमन गणराज्य के काल में आरंभ हुआ। प्रारंभिक एट्रस्कन प्रभाव के समय रोमवासी लेखन-कला से परिचित थे, किंतु उस समय साहित्यिक रचनाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ था। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से रोम का यूनानी नगर-राज्यों और दक्षिणी इटली की यूनानी संस्कृति से संपर्क बढ़ा। यूनानी साहित्य, दर्शन, शिक्षा और कला के प्रभाव ने रोमन साहित्य को नई दिशा प्रदान की। रोमन लेखकों ने यूनानी रचनाओं का लैटिन में अनुवाद किया और धीरे-धीरे यूनानी साहित्यिक परंपराओं को अपनाते हुए मौलिक लैटिन साहित्य का सृजन किया।
गणतंत्रकालीन साहित्य के प्रारंभिक प्रमुख रचनाकारों में लिवियस एंड्रोनिकस का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसे सामान्यतः लैटिन साहित्य का प्रथम प्रमुख कवि माना जाता है। उसने होमर के ओडिसी का लैटिन में अनुवाद किया तथा यूनानी शैली पर आधारित दुखांत और सुखांत नाटकों की रचना की। उसके कार्यों से रोम में साहित्यिक नाटक और रंगमंच की परंपरा को विकसित होने में सहायता मिली। इसके बाद क्नेयस नेवियस ने यूनानी नाटकीय परंपरा को आगे बढ़ाया और प्रथम प्यूनिक युद्ध पर आधारित ‘बेल्लुम पोएनिकुम’ (प्यूनिक युद्ध/कार्थेज के विरुद्ध युद्ध) नामक महाकाव्यात्मक रचना की। इस रचना में रोमन इतिहास, युद्ध और राष्ट्रीय गौरव की भावना दिखाई देती है।
रोमन हास्य-नाटक के विकास में टाइटस मैक्कियस प्लॉटस का विशेष योगदान था। उसने यूनानी नवीन हास्य-नाटकों से प्रेरणा लेकर रोमन समाज और जनजीवन के अनुरूप नाटकों की रचना की। उसकी लगभग 130 रचनाओं में से लगभग 20 नाटक आज उपलब्ध हैं। ‘माइल्स ग्लोरियोसस’, ‘एंफिट्रिओ’, ‘औलुलारिया’ और ‘मेनेख्मी’ उसकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उसके नाटकों में हास्य, व्यंग्य, चतुर संवाद तथा सामान्य जनजीवन का जीवंत चित्रण मिलता है।
गणतंत्रकालीन साहित्य के महान कवियों में क्विंटस एनियस का नाम प्रमुख है। उसकी प्रसिद्ध कृति एनाल्स में रोम के इतिहास को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया था। इसमें रोम की आरंभिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से लेकर एनियस के अपने समय तक का वर्णन मिलता था। यह रचना लंबे समय तक रोमन राष्ट्रीय महाकाव्य की प्रतिष्ठा रखती रही और बाद में वर्जिल के ऐनीड के लिए महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती परंपरा बनी।
इतिहास-लेखन के क्षेत्र में क्विंटस फेबियस पिक्टर का विशेष महत्त्व था। उसने यूनानी भाषा में रोम का इतिहास लिखा और रोमन इतिहास-लेखन की प्रारंभिक परंपरा को विकसित किया। इसके बाद मार्कस पोर्सियस कैटो ने ‘ओरिजिंस’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो लैटिन में लिखा गया आरंभिक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ था। कैटो ने केवल रोम ही नहीं, बल्कि इटली के विभिन्न नगरों और समुदायों के इतिहास को भी अपने वर्णन में स्थान दिया। उसके लेखन में रोमन परंपराओं, नैतिक मूल्यों और सादगीपूर्ण जीवन के प्रति गहरा आग्रह दिखाई देता है।
गणतंत्रकालीन नाटक के विकास में पब्लियस टेरेंटियस आफ़र (टेरेंस) का स्थान भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मूलतः दास रहे टेरेंस को शिक्षा और संरक्षण प्राप्त हुआ तथा उन्होंने यूनानी साहित्य से प्रेरणा लेकर उत्कृष्ट नाटकों की रचना की। ‘एंड्रिया’, ‘हिसीरा’, ‘यूनुखुस’, ‘फोर्मियो’ और ‘आडेल्फोई’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उनके नाटक भाषा की शुद्धता, सुसंस्कृत शैली, सूक्ष्म चरित्र-चित्रण और मानवीय मनोविज्ञान की गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध हैं।
ऑगस्टसकालीन साहित्य
गणतंत्र के अंत और रोमन साम्राज्य की स्थापना के बाद ऑगस्टस के शासनकाल में रोमन साहित्य अपने उत्कर्ष पर पहुँचा। इतिहास में इस काल को प्रायः लैटिन साहित्य के स्वर्णयुग का प्रमुख चरण माना जाता है। इसकी तुलना प्राचीन यूनान के पेरिक्लीज़ युग और इंग्लैंड के एलिज़ाबेथीय युग से की जाती है। इस समय कविता, महाकाव्य, गीतिकाव्य, प्रेम-काव्य, इतिहास और गद्य साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ। साहित्यकारों को संरक्षक वर्ग तथा विशेष रूप से मेसिनास जैसे प्रभावशाली संरक्षकों का समर्थन प्राप्त था।
ऑगस्टसकालीन साहित्य की प्रमुख विशेषता उसका राष्ट्रीय और नैतिक स्वर था। साहित्यकारों ने रोम की महानता, उसकी विजयगाथाओं, प्राचीन परंपराओं और गौरवशाली अतीत को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। ऑगस्टस द्वारा पारंपरिक रोमन नैतिक मूल्यों, पारिवारिक जीवन और धार्मिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने के प्रयासों का प्रभाव भी साहित्य पर दिखाई देता है। इस युग के साहित्य में रोम की राजनीतिक स्थिरता और साम्राज्य की प्रतिष्ठा का गौरवपूर्ण चित्रण मिलता है।
इस काल का साहित्य परंपरावादी और कलात्मक, दोनों था। लेखकों ने प्राचीन रोमन आदर्शों को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ भाषा और शैली को अत्यंत परिष्कृत बनाया। यूनानी साहित्य का प्रभाव भी अत्यंत गहरा था। रोमन साहित्यकारों ने यूनानी महाकाव्य, गीतिकाव्य, दर्शन और नाटकीय परंपराओं से प्रेरणा लेकर उन्हें लैटिन भाषा और रोमन सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप ढाला। इसी प्रक्रिया में लैटिन भाषा साहित्यिक अभिव्यक्ति का अत्यंत समृद्ध और प्रभावशाली माध्यम बन गई।
यद्यपि इस काल का साहित्य मुख्यतः शिक्षित और अभिजात वर्ग के संरक्षण में विकसित हुआ, फिर भी इसमें प्रेम, नैतिकता, युद्ध, राजनीति, ग्रामीण जीवन और मानवीय भावनाओं जैसे व्यापक विषयों को स्थान मिला। इस कारण ऑगस्टसकालीन साहित्य ने केवल रोमन संस्कृति को समृद्ध नहीं किया, बल्कि बाद की यूरोपीय साहित्यिक परंपरा पर भी स्थायी प्रभाव डाला।
पद्य-साहित्य
ऑगस्टस के शासनकाल में पद्य-साहित्य का विशेष उत्कर्ष हुआ। महाकाव्य, गीतिकाव्य, प्रेम-काव्य और व्यंग्य-काव्य की उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आईं। इस काल के प्रमुख कवियों में वर्जिल, होरेस, टिबुलस, प्रोपर्टियस और ओविड प्रमुख थे। इनमें पब्लियस वर्जिलियस मारो (वर्जिल) का स्थान सर्वोच्च माना जाता है। उसकी महान कृति ‘ऐनीड’ रोमन साहित्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध राष्ट्रीय महाकाव्य है। इसमें ट्रॉय के वीर ऐनीयस की कथा के माध्यम से रोम की उत्पत्ति और उसके महान ऐतिहासिक भाग्य को प्रस्तुत किया गया। वर्जिल ने यूनानी महाकाव्य परंपरा को रोमन राष्ट्रीय भावना के साथ जोड़कर ऐसी कृति का निर्माण किया, जिसने लैटिन साहित्य को विश्व साहित्य में स्थायी प्रतिष्ठा प्रदान की। क्विंटस होरेस फ्लैकस (होरेस) ने गीतिकाव्य, व्यंग्य और काव्यशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी ‘ओड्स’ तथा ‘एपिस्टल्स’ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उसकी रचनाओं में संयम, संतुलन, मित्रता, सुख और नैतिक जीवन जैसे विषय प्रमुख हैं। टिबुलस और प्रोपर्टियस ने प्रेम-काव्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी रचनाओं में व्यक्तिगत भावनाओं, प्रेम और मानवीय संबंधों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। दूसरी ओर ओविड ने प्रेम, पौराणिक कथाओं और मानवीय रूपांतरणों को अत्यंत कलात्मक शैली में प्रस्तुत किया। उसकी ‘मेटामॉर्फोसिस’ प्राचीन यूनानी-रोमन मिथकों का विशाल काव्यात्मक संकलन है और बाद के यूरोपीय साहित्य तथा कला पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
इस प्रकार रोमन साहित्य का विकास यूनानी साहित्य से प्रेरणा ग्रहण करने के बावजूद केवल उसका अनुकरण नहीं था। रोमन साहित्यकारों ने यूनानी साहित्यिक रूपों को अपनी भाषा, इतिहास, राजनीति और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप ढालकर एक विशिष्ट लैटिन साहित्यिक परंपरा का निर्माण किया। गणतंत्रकाल की प्रारंभिक नाटकीय और ऐतिहासिक रचनाओं से लेकर ऑगस्टसकालीन महाकाव्य, गीतिकाव्य और गद्य तक रोमन साहित्य ने यूरोपीय बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।
वर्जिल (70 ई.पू.–19 ई.पू.)
मुख्य लेख : वर्जिल
पब्लियस वर्जिलियस मारो, जिसे सामान्यतः वर्जिल के नाम से जाना जाता है, रोमन साहित्य के महानतम कवियों में से एक था। उसे लैटिन साहित्य के स्वर्णयुग का प्रमुख कवि तथा रोमन राष्ट्रीय महाकाव्य-परंपरा का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि माना जाता है। उसकी प्रमुख कृतियाँ ‘इक्लॉग्स’, ‘जॉर्गिक्स’ और ‘एनीड’ हैं। इन रचनाओं में प्रकृति, ग्रामीण जीवन, कृषि, प्रेम, नैतिकता, कर्तव्य, युद्ध, राष्ट्रीय गौरव और रोम की नियति जैसे विषयों का अत्यंत कलात्मक चित्रण मिलता है।
वर्जिल का जीवन
वर्जिल का जन्म 70 ईसा पूर्व में उत्तरी इटली के मंटुआ के निकट एक ग्रामीण क्षेत्र में हुआ था। उसका जन्म ऐसे समय में हुआ जब रोमन गणराज्य राजनीतिक संघर्षों और गृहयुद्धों से गुजर रहा था। उसका बचपन ग्रामीण वातावरण में बीता। इसी कारण उसकी रचनाओं में प्रकृति, कृषि, पशुपालन और ग्रामीण जीवन के प्रति गहरा अनुराग दिखाई देता है।
वर्जिल ने प्रारंभिक शिक्षा क्रेमोना और मिलान में प्राप्त की तथा बाद में उच्च शिक्षा के लिए रोम गया। उसने व्याकरण, वक्तृत्व, दर्शन और साहित्य का अध्ययन किया। विशेष रूप से यूनानी साहित्य और दर्शन का उस पर गहरा प्रभाव पड़ा। यूनानी कवि थियोक्रिटस और होमर की कृतियों से उसने साहित्यिक प्रेरणा ग्रहण की, किंतु बाद में उसने यूनानी परंपराओं को रोमन जीवन और राष्ट्रीय चेतना के अनुरूप ढालकर अपनी विशिष्ट काव्य-शैली विकसित की।
रोमन गृहयुद्धों के दौरान उत्तरी इटली की भूमि के पुनर्वितरण से वर्जिल के परिवार की संपत्ति भी प्रभावित हुई। उसकी पैतृक भूमि उससे छिन गई थी, यद्यपि बाद में उसे कुछ राहत प्राप्त हुई। इन व्यक्तिगत अनुभवों ने उसके भीतर ग्रामीण जीवन और किसानों के प्रति गहरी संवेदना उत्पन्न की।
लगभग 39 ईसा पूर्व में वर्जिल का संपर्क गायस सिल्नियस मैसीनस से हुआ, जो ऑगस्टस का निकट सहयोगी और साहित्यकारों का प्रसिद्ध संरक्षक था। मैसीनस ने वर्जिल को संरक्षण प्रदान किया और उसे साहित्य-सृजन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त हुईं। इसके बाद वर्जिल ने अपना अधिकांश जीवन अध्ययन और साहित्य-रचना में व्यतीत किया। वह स्वभाव से विनम्र, गंभीर, अध्ययनशील और एकांतप्रिय था।
वर्जिल की मृत्यु 19 ईसा पूर्व में यूनान की यात्रा से लौटते समय ब्रुंडिसियम में हुई। उसकी इच्छा थी कि एनीड को अंतिम रूप देकर प्रकाशित किया जाए, किंतु मृत्यु के समय यह कृति पूरी तरह संशोधित नहीं हो पाई थी। परंपरा के अनुसार उसने पांडुलिपि को नष्ट करने की इच्छा व्यक्त की थी, किंतु ऑगस्टस के आदेश से एनीड को सुरक्षित रखा गया और बाद में प्रकाशित किया गया। उसकी समाधि नेपल्स के निकट स्थित मर्गेलिना में मानी जाती है।
वर्जिल की प्रमुख रचनाएँ
इक्लॉग्स
वर्जिल की पहली प्रमुख कृति इक्लॉग्स है, जिसे ‘बुकोलिक्स’ भी कहा जाता है। इसकी रचना लगभग 42–37 ईसा पूर्व के बीच हुई और इसमें दस ग्रामीण गीतों का संग्रह है। इस कृति पर यूनानी कवि थियोक्रिटस की ग्रामीण काव्य-परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। इक्लॉग्स में चरवाहों, किसानों, प्रकृति, प्रेम और ग्रामीण जीवन का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। इसकी भाषा अत्यंत मधुर, संगीतात्मक और कल्पनाशील है। हालांकि इसमें आदर्श ग्रामीण संसार प्रस्तुत किया गया है, फिर भी तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल और भूमि-विवादों की छाया कई स्थानों पर दिखाई देती है। इस संग्रह की चौथी इक्लॉग विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसमें एक दिव्य बालक के जन्म की भविष्यवाणी की गई है, जिसके आगमन से एक नए और शांतिपूर्ण स्वर्णयुग की स्थापना होगी। बाद के ईसाई विद्वानों ने इस भविष्यवाणी को ईसा मसीह के जन्म से जोड़कर देखा। यद्यपि मूल संदर्भ को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, फिर भी इसी व्याख्या के कारण मध्यकालीन ईसाई परंपरा में वर्जिल को विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
जॉर्गिक्स
वर्जिल की दूसरी प्रमुख कृति जॉर्गिक्स है, जिसकी रचना लगभग 37–29 ईसा पूर्व के बीच हुई। जॉर्गिक्स का संबंध कृषि और भूमि पर किए जाने वाले श्रम से है। यह चार पुस्तकों में विभाजित एक दीर्घ काव्य है। इस कृति में खेती, भूमि की तैयारी, बीज बोना, फसल उगाना, अंगूर और जैतून की खेती, पशुपालन तथा मधुमक्खी-पालन का विस्तृत वर्णन मिलता है। लेकिन जॉर्गिक्स को केवल कृषि संबंधी निर्देशों का काव्य नहीं माना जा सकता। इसके पीछे वर्जिल का व्यापक नैतिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण भी मौजूद है।
वर्जिल के लिए कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं थी, बल्कि परिश्रम, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और नैतिक जीवन का आधार थी। किसान का कठोर श्रम प्रकृति की शक्तियों से संघर्ष करते हुए मानव जीवन को व्यवस्थित करता है। इस प्रकार जॉर्गिक्स में ग्रामीण जीवन और कृषि-श्रम को रोमन समाज के नैतिक आदर्शों से जोड़ा गया है। इस कृति में प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना तथा मानव और प्रकृति के संबंध का सुंदर चित्रण मिलता है। इसमें युद्ध और राजनीतिक संघर्षों के विपरीत शांतिपूर्ण ग्रामीण जीवन को विशेष महत्त्व दिया गया है। इसलिए जॉर्गिक्स साहित्यिक सौंदर्य के साथ-साथ रोमन ग्रामीण आदर्शों को समझने के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
एनीड
वर्जिल की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति एनीड है। इसकी रचना लगभग 29–19 ईसा पूर्व के बीच हुई और इसमें 12 पुस्तकें हैं। यह रोम का महान राष्ट्रीय महाकाव्य है। एनीड का नायक एनीयस है, जो ट्रॉय के विनाश के बाद अपने साथियों के साथ इटली की ओर यात्रा करता है। उसकी यात्रा के दौरान वह कार्थेज पहुँचता है, जहाँ उसकी भेंट रानी डिडो से होती है। दोनों के बीच प्रेम उत्पन्न होता है, लेकिन देवताओं द्वारा निर्धारित अपने कर्तव्य के कारण एनीयस को कार्थेज छोड़कर इटली जाना पड़ता है। अंततः वह इटली पहुँचता है और वहाँ उसके वंश तथा ट्रोजन समुदाय की स्थापना से भविष्य के रोमन राज्य की आधारभूमि तैयार होती है।
एनीड पर होमर के इलियड और ओडिसी का स्पष्ट प्रभाव है। इसके बावजूद यह केवल यूनानी महाकाव्यों का अनुकरण नहीं है। वर्जिल ने यूनानी महाकाव्य परंपरा को रोमन इतिहास, धार्मिक विश्वासों और राष्ट्रीय आदर्शों के साथ जोड़कर एक विशिष्ट रोमन महाकाव्य का निर्माण किया।
एनीयस को कर्तव्यपरायणता, आत्मसंयम, साहस, त्याग और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का आदर्श बनाया गया है। उसके चरित्र में pietas अर्थात देवताओं, परिवार और समुदाय के प्रति कर्तव्य की भावना विशेष रूप से दिखाई देती है। इस प्रकार व्यक्तिगत इच्छा और सार्वजनिक कर्तव्य के संघर्ष को महाकाव्य का एक प्रमुख विषय बनाया गया है।
एनीड में रोम की महानता और उसके भविष्य को दैवी नियति से जोड़ा गया है। एनीयस की वंश-परंपरा को आगे चलकर रोम और जूलियस सीज़र तथा ऑगस्टस के वंश से जोड़ा जाता है। इस प्रकार महाकाव्य रोमन राष्ट्रीय गौरव और ऑगस्टसकालीन राजनीतिक व्यवस्था को वैचारिक आधार भी प्रदान करता है। फिर भी, एनीड केवल रोम की विजय का महिमामंडन नहीं है। वर्जिल ने युद्ध की विनाशकारी शक्ति, मानवीय पीड़ा, प्रेम, वियोग और मृत्यु को भी अत्यंत संवेदनशीलता से चित्रित किया है। डिडो की त्रासदी और युद्ध में मारे गए युवाओं का चित्रण कवि की मानवीय संवेदना को स्पष्ट करता है। इसी कारण एनीड में राष्ट्रीय गौरव और मानवीय करुणा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
वर्जिल की साहित्यिक विशेषताएँ
वर्जिल की भाषा अत्यंत परिष्कृत, मधुर और प्रभावशाली है। उसकी कविता में प्रकृति-वर्णन, उपमा, रूपक, संगीतात्मकता और भावनात्मक गहराई का उत्कृष्ट समन्वय मिलता है। वह प्रकृति और मानवीय भावनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर प्रस्तुत करता है। उसके चरित्र केवल वीरता के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे प्रेम, भय, संघर्ष, कर्तव्य और दुःख जैसी मानवीय भावनाओं से भी प्रभावित होते हैं।
उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने यूनानी साहित्यिक परंपरा को आत्मसात करके उसे रोमन इतिहास और संस्कृति के अनुरूप नया रूप दिया। इसी कारण वर्जिल को रोमन साहित्य में यूनानी परंपरा और रोमन राष्ट्रीय चेतना के बीच सेतु माना जाता है।
वर्जिल की प्रतिष्ठा और आलोचना
वर्जिल को उसके जीवनकाल में ही व्यापक सम्मान प्राप्त होने लगा था। उसके समकालीन कवि होरेस ने भी उसकी प्रतिभा को अत्यंत सम्मान दिया। बाद की शताब्दियों में उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ती गई। कुछ आलोचकों ने एनीड में होमर के प्रभाव को अत्यधिक मानते हुए इसे साहित्यिक अनुकरण का उदाहरण माना। कुछ विद्वानों ने यह भी तर्क दिया कि महाकाव्य में ऑगस्टस और उसके शासन की प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला राजनीतिक तत्व मौजूद है। यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि एनीड में रोम की महानता और ऑगस्टस के युग की वैधता से जुड़े संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। फिर भी इसे केवल राजकीय प्रशस्ति मानना वर्जिल की मानवीय और काव्यात्मक दृष्टि को सीमित कर देना होगा।
मध्यकालीन यूरोप में वर्जिल को अत्यंत ऊँचा साहित्यिक और सांस्कृतिक स्थान मिला। ईसाई परंपरा में चौथी इक्लॉग की व्याख्या ने उसकी प्रतिष्ठा को और बढ़ाया। दांते ने ‘डिवाइन कॉमेडी’ में वर्जिल को अपना मार्गदर्शक बनाया, जो उसके साहित्यिक और बौद्धिक प्रभाव का असाधारण प्रमाण है। बाद के यूरोपीय कवियों, विशेषकर जॉन मिल्टन, ने भी उसकी महाकाव्यात्मक शैली से प्रेरणा ग्रहण की।
इस प्रकार वर्जिल केवल रोमन साहित्य का महान कवि नहीं, बल्कि विश्व साहित्य की स्थायी परंपरा के प्रमुख निर्माताओं में से एक था। इक्लॉग्स में प्रकृति और ग्रामीण जीवन, जॉर्गिक्स में श्रम और कृषि तथा एनीड में कर्तव्य, राष्ट्रीय नियति और मानवीय करुणा—इन तीनों के माध्यम से उसने लैटिन साहित्य को ऐसी ऊँचाई प्रदान की जिसका प्रभाव यूरोप के साहित्य, कला और बौद्धिक इतिहास पर सदियों तक बना रहा।
होरेस (65 ई.पू.–8 ई.पू.)
मुख्य लेख : होरेस
क्विंटस होरातियस फ्लैकस (होरेस) ऑगस्टसकालीन लैटिन साहित्य के प्रमुख कवियों में से एक था। वर्जिल के बाद उसे इस युग का सबसे महत्त्वपूर्ण कवि माना जाता है। उसकी रचनाओं में व्यंग्य, गीतिकाव्य, नैतिक चिंतन, प्रकृति-प्रेम, मित्रता, संयम, आत्मसंयम और संतुलित जीवन के आदर्शों का सुंदर समन्वय मिलता है। उसकी काव्य-कला ने लैटिन साहित्य को अत्यंत परिष्कृत रूप प्रदान किया और बाद के यूरोपीय साहित्य पर भी गहरा प्रभाव डाला।
होरेस का जीवन
होरेस का जन्म 65 ईसा पूर्व में दक्षिणी इटली के वेनूसिया नगर में हुआ था। उसके पिता एक मुक्तदास थे, जिन्होंने परिश्रम और सूझ-बूझ से अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया। उन्होंने अपने पुत्र की शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया। होरेस की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उसे रोम भेजा गया, जहाँ उसने साहित्य, व्याकरण और वक्तृत्व का अध्ययन किया। बाद में वह एथेंस गया और वहाँ यूनानी साहित्य तथा दर्शन का अध्ययन किया। यूनानी साहित्य का उसकी काव्य-दृष्टि पर गहरा प्रभाव पड़ा।
रोमन गणराज्य के अंतिम चरण में हुए गृहयुद्धों ने उसके जीवन को भी प्रभावित किया। वह मार्कस जूनियस ब्रूटस के पक्ष में शामिल हुआ और फिलिप्पी के युद्ध (42 ईसा पूर्व) में उसके साथ रहा। युद्ध में ब्रूटस की पराजय के बाद होरेस रोम लौट आया। इस राजनीतिक परिवर्तन के दौरान उसकी पैतृक संपत्ति भी उससे छिन गई। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसने क्वाएस्टर के कोषागार से संबंधित एक लिपिकीय पद पर कार्य किया। इसी समय उसने गंभीरता से कविता लिखना आरंभ किया।
होरेस का साहित्यिक जीवन आगे चलकर निर्णायक रूप से बदल गया। उसके मित्र वर्जिल ने उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे गायस सिल्नियस मैसीनस से मिलवाया। मैसीनस ऑगस्टस का निकट सहयोगी तथा प्रसिद्ध साहित्यिक संरक्षक था। उसने होरेस को संरक्षण दिया और बाद में सैबाइन क्षेत्र में एक संपत्ति प्रदान की। वहाँ होरेस को शांत वातावरण में साहित्य-सृजन का अवसर मिला। उसका जीवन अपेक्षाकृत सादा, स्वतंत्र और अध्ययनशील था। उसका निधन 8 ईसा पूर्व में हुआ।
होरेस की प्रमुख रचनाएँ
होरेस की प्रमुख रचनाओं में ‘सैटायर्स’, ‘एपोड्स’, ‘ओड्स’, ‘कार्मेन सैकुलेरे’, ‘एपिस्टल्स’ तथा ‘आर्स पोएटिका’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
सैटायर्स
सैटायर्स होरेस की आरंभिक और महत्त्वपूर्ण रचनाओं में हैं। इनमें उसने हास्य तथा व्यंग्य के माध्यम से समकालीन रोमन समाज की कमजोरियों और मानवीय दोषों को उजागर किया। लालच, ईर्ष्या, दिखावा, अत्यधिक धन की इच्छा, सामाजिक आडंबर तथा नैतिक दुर्बलताओं पर उसने व्यंग्य किया है।
होरेस का व्यंग्य कटु आलोचना की अपेक्षा मध्यम, विनोदी और आत्मपरक है। वह दूसरों की कमियों पर प्रहार करते हुए मानव-स्वभाव की सामान्य कमजोरियों को भी पहचानता है। इसलिए उसकी सैटायर्स में उपदेशात्मकता होते हुए भी कठोरता नहीं दिखाई देती। इनमें सामान्य रोमन जीवन, मित्रता, भोजन, धन, सामाजिक संबंध और दैनिक व्यवहार के अनेक जीवंत चित्र मिलते हैं।
एपोड्स
एपोड्स होरेस की अपेक्षाकृत प्रारंभिक रचनाओं का संग्रह है। इन कविताओं में तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों, व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक जीवन की विभिन्न समस्याओं का चित्रण मिलता है। इनकी कुछ कविताओं में तीखा व्यंग्य और आक्रोश भी दिखाई देता है। एपोड्स में होरेस की काव्य-प्रतिभा के प्रारंभिक रूप दिखाई देते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण जीवन और सरल जीवन-पद्धति के प्रति उसका आकर्षण उल्लेखनीय है। वह अत्यधिक धन, विलासिता और महत्त्वाकांक्षा के विपरीत प्रकृति के निकट शांत जीवन को अधिक सुखद मानता है।
ओड्स
होरेस की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ओड्स है। यह लैटिन गीतिकाव्य की उत्कृष्ट उपलब्धियों में गिनी जाती है। इसकी रचना में होरेस ने यूनानी गीतिकाव्य की परंपराओं, विशेषकर अल्केयस और सैफो जैसी यूनानी कविताई परंपराओं से प्रेरणा ग्रहण की, किंतु उन्हें रोमन जीवन और अनुभवों के अनुरूप ढाला।
ओड्स में प्रेम, मित्रता, प्रकृति, धर्म, राजनीति, राज्य, युद्ध, जीवन और मृत्यु जैसे विविध विषयों का चित्रण मिलता है। होरेस ने ऑगस्टस के शासन के बाद स्थापित राजनीतिक स्थिरता और रोमन राष्ट्रीय गौरव को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया। उसकी नैतिक दृष्टि का प्रमुख आधार संयम और संतुलन है। वह अत्यधिक धन, विलासिता और अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा से सावधान करता है। उसके अनुसार मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और उपलब्ध परिस्थितियों में संतोषपूर्वक जीवन बिताना चाहिए। यही विचार उसकी प्रसिद्ध ‘मध्यम मार्ग’ की जीवन-दृष्टि से जुड़ा है।
होरेस के यहाँ वर्तमान जीवन का आनंद लेने की भावना भी दिखाई देती है। वह समय की क्षणभंगुरता को समझते हुए जीवन के सीमित सुखों का विवेकपूर्ण आनंद लेने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार उसकी कविता में नैतिक संयम और जीवन के सौंदर्य का संतुलन दिखाई देता है।
कार्मेन सैकुलेरे
कार्मेन सैकुलेरे एक सार्वजनिक अवसर के लिए रचित धार्मिक-राष्ट्रीय स्तुतिगान था, जिसे 17 ईसा पूर्व के सेक्युलर खेलों के अवसर पर प्रस्तुत किया गया। इसमें देवताओं से रोम की समृद्धि, शांति और भविष्य के लिए प्रार्थना की गई है। यह रचना ऑगस्टसकालीन धार्मिक और राष्ट्रीय पुनरुत्थान की भावना को अभिव्यक्त करती है।
एपिस्टल्स और आर्स पोएटिका
होरेस की एपिस्टल्स में पत्र के रूप में नैतिक, साहित्यिक और दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं। इनमें जीवन, मित्रता, साहित्य और मानवीय व्यवहार पर उसके विचार मिलते हैं। उसकी प्रसिद्ध कृति आर्स पोएटिका काव्य-कला और साहित्य-सृजन के सिद्धांतों से संबंधित है। इसमें कवि के लिए भाषा, विषय, शैली, कल्पना, अनुशासन और कलात्मक एकता के महत्त्व पर विचार किया गया है। बाद के यूरोपीय साहित्यिक सिद्धांतों पर इस कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा।
होरेस का साहित्यिक महत्त्व
होरेस के साहित्य में रोमन राष्ट्रीय चेतना, नैतिक आदर्श, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के संतुलित आनंद का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उसकी विचारधारा पर विभिन्न यूनानी दार्शनिक परंपराओं का प्रभाव था। विशेष रूप से एपिक्यूरियन विचारधारा से प्रभावित होकर उसने सरल जीवन, मानसिक शांति और सीमित इच्छाओं के महत्त्व पर बल दिया, जबकि रोमन नैतिक परंपरा ने उसके भीतर कर्तव्य और आत्मसंयम की भावना को मजबूत किया।
होरेस की सबसे बड़ी विशेषता उसकी परिष्कृत भाषा और संतुलित शैली है। वह न तो अत्यधिक अलंकारिक है और न ही अनावश्यक रूप से सरल। उसके शब्दों में गहराई, लय और सौंदर्य का सुंदर संतुलन मिलता है। उसने व्यक्तिगत अनुभवों और सार्वभौमिक मानवीय भावनाओं को इस प्रकार व्यक्त किया कि उसकी कविताएँ अपने समय से आगे निकलकर विश्व साहित्य की स्थायी धरोहर बन गईं।
इस प्रकार होरेस लैटिन गीतिकाव्य का महानतम कवि माना जाता है। उसकी सैटायर्स सामाजिक जीवन का व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत करती हैं, ओड्स नैतिकता और सौंदर्य का समन्वय करती हैं, जबकि एपिस्टल्स और आर्स पोएटिका उसके साहित्यिक तथा दार्शनिक चिंतन को अभिव्यक्त करती हैं। उसकी कृतियों ने न केवल रोमन साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि पुनर्जागरण से लेकर आधुनिक यूरोपीय साहित्य तक कवियों और साहित्यकारों को निरंतर प्रभावित किया।
प्रणयगीत
वर्जिल और होरेस के बाद भी ऑगस्टसकालीन रोमन काव्य-परंपरा निरंतर विकसित होती रही, किंतु इस चरण में उसके विषय और भावभूमि में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। जहाँ वर्जिल और होरेस की रचनाओं में राष्ट्रीय गौरव, नैतिक आदर्श, धर्म, प्रकृति, ग्रामीण जीवन और रोमन राज्य की प्रतिष्ठा जैसे विषय प्रमुख थे, वहीं बाद के कवियों ने व्यक्तिगत भावनाओं, प्रेम और प्रणय-संबंधों को अपनी काव्य-सृष्टि का केंद्र बनाया। परिणामस्वरूप रोमन साहित्य में प्रणयगीत या प्रेम-काव्य की एक प्रभावशाली परंपरा विकसित हुई।
इस परिवर्तन के पीछे तत्कालीन रोमन समाज की बदलती परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण थीं। लंबे गृहयुद्धों के बाद ऑगस्टस के शासन में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि आई। साथ ही, शहरी जीवन, संपन्नता, विलासिता और व्यक्तिगत सुख की प्रवृत्तियाँ भी बढ़ीं। साहित्य में इस बदलती सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब दिखाई देता है। प्रणय-काव्य में प्रेम, आकर्षण, विरह, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, विश्वासघात, कामना और मानवीय संबंधों की जटिलताओं को प्रमुख स्थान मिला। इन कविताओं में तत्कालीन रोमन उच्चवर्गीय समाज के प्रेम-संबंधों और विलासी जीवन के अनेक पहलुओं की झलक मिलती है।
यद्यपि इन रचनाओं में वर्जिल या होरेस जैसी नैतिक और राष्ट्रीय चेतना हमेशा प्रमुख नहीं है, फिर भी ये तत्कालीन रोमन समाज के सामाजिक जीवन, भावनात्मक संसार और सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इस परंपरा के प्रमुख कवियों में अल्बियस टिबुलस, सेक्स्टस प्रोपर्टियस और पब्लियस ओविडियस नासो (ओविड) का विशेष स्थान है।
अल्बियस टिबुलस (लगभग 55–19 ईसा पूर्व)
अल्बियस टिबुलस ऑगस्टसकालीन प्रमुख प्रणयगीतकारों में से एक था। उसका जन्म इटली के लैटिन प्रदेश में स्थित एक संपन्न परिवार में हुआ था। गृहयुद्धों और भूमि-वितरण की राजनीतिक परिस्थितियों से उसका परिवार भी प्रभावित हुआ। बाद में उसे प्रसिद्ध सेनानायक और साहित्य-प्रेमी मार्कस वलेरियस मेसाला कोर्विनस का संरक्षण प्राप्त हुआ। वह कुछ समय तक मेसाला के साथ सैन्य अभियानों और यात्राओं में भी गया, किंतु उसका वास्तविक झुकाव युद्ध और राजनीति की अपेक्षा साहित्य तथा शांतिपूर्ण ग्रामीण जीवन की ओर था।
टिबुलस के काव्य का प्रमुख विषय प्रेम है। उसकी कविताओं में डेलिया नामक स्त्री के प्रति उसके प्रेम और उससे जुड़ी भावनाओं का विशेष स्थान है। प्रेम की मधुरता के साथ-साथ ईर्ष्या, विरह, प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा और मानसिक पीड़ा का भी उसने अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया है। उसकी कविता में व्यक्तिगत अनुभूति की प्रधानता है।
टिबुलस युद्ध, धन और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की अपेक्षा शांतिपूर्ण ग्रामीण जीवन को अधिक महत्त्व देता है। उसके आदर्श संसार में साधारण जीवन, कृषि, प्रकृति, प्रेम और घरेलू सुख प्रमुख हैं। इस कारण उसकी प्रणय-कविता केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण और सरल जीवन के प्रति उसकी व्यक्तिगत आकांक्षा को भी व्यक्त करती है।
टिबुलस की भाषा सरल, मधुर और स्वाभाविक है। उसमें अत्यधिक अलंकारिकता के बजाय भावों की कोमलता और आत्मीयता दिखाई देती है। इसी कारण उसे रोमन प्रणयगीत परंपरा के सबसे संवेदनशील कवियों में गिना जाता है।
सेक्स्टस प्रोपर्टियस (लगभग 50–15 ई. पू.)
सेक्स्टस प्रोपर्टियस का जन्म इटली के उम्ब्रिया क्षेत्र में हुआ था। उसकी शिक्षा रोम में हुई और बाद में वह मैसीनस के साहित्यिक संरक्षण से जुड़ी मंडली का सदस्य बना। यद्यपि वह उसी साहित्यिक वातावरण का हिस्सा था जिसमें होरेस भी था, दोनों की काव्य-दृष्टि अलग-अलग थी।
प्रोपर्टियस की कविता का केंद्रीय विषय उसकी प्रिय सिंथिया के प्रति प्रेम है। उसके काव्य में प्रेम केवल आनंद का विषय नहीं, बल्कि गहरे मानसिक संघर्ष और भावनात्मक पीड़ा का अनुभव भी है। प्रेम, विरह, ईर्ष्या, आकर्षण, अस्थिरता और आत्मसंघर्ष उसकी कविताओं में बार-बार दिखाई देते हैं। उसने सांसारिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की तुलना में व्यक्तिगत प्रेम को अधिक महत्त्व दिया।
प्रोपर्टियस मूलतः प्रणयगीतकार था, उसकी कविताओं में रोमन इतिहास, राष्ट्रीय गौरव, मृत्यु, धार्मिक परंपराओं और जीवन की नश्वरता से जुड़े विषय भी मिलते हैं। उसकी भाषा टिबुलस की अपेक्षा अधिक जटिल, अलंकारिक और विद्वत्तापूर्ण है। पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक संकेतों का व्यापक प्रयोग उसकी काव्य-शैली की विशेषता है। भावनात्मक तीव्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति के कारण प्रोपर्टियस को ऑगस्टसकालीन प्रमुख प्रेम-कवियों में स्थान प्राप्त है।
ओविड (43 ई. पू.–17/18 ई.)
ऑगस्टसकालीन प्रणयगीतकारों में पब्लियस ओविडियस नासो (ओविड) सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली कवियों में से एक था। उसका जन्म 43 ईसा पूर्व में सुल्मो में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उसके पिता ने उसे शिक्षा के लिए रोम भेजा, जहाँ उसने वक्तृत्व और विधि का अध्ययन किया। इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए यूनान तथा अन्य भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की यात्रा पर भी गया। उसने कुछ समय सार्वजनिक जीवन में बिताया, किंतु उसकी वास्तविक रुचि साहित्य में थी। अंततः उसने सार्वजनिक पदों से दूरी बनाकर साहित्य-सृजन को अपना जीवन-कार्य बना लिया। ओविड की प्रमुख कृतियों में ‘एमोरेस’, ‘हेरोइड्स’, ‘आर्स अमेटोरिया’, ‘रेमेडिया अमोरिस’, ‘फास्ती’, ‘मेटामॉर्फोसिस’, ‘ट्रिस्टिया’ तथा ‘एपिस्टुले एक्स पोंटो’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
एमोरेस
एमोरेस प्रेम-कविताओं का संग्रह है। इसमें ओविड ने कोरिन्ना नामक स्त्री के माध्यम से प्रेम, आकर्षण, ईर्ष्या और प्रणय-संबंधों की विभिन्न अवस्थाओं को व्यक्त किया है। इसकी भाषा चंचल, मधुर, विनोदी और प्रवाहपूर्ण है। ओविड ने प्रेम को गंभीर नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे मानवीय अनुभव, मनोरंजन और भावनात्मक खेल के रूप में भी चित्रित किया।
आर्स अमेटोरिया
आर्स अमेटोरिया अर्थात् “प्रेम की कला” ओविड की अत्यंत चर्चित रचनाओं में है। इसमें प्रेम प्राप्त करने, प्रेम-संबंध स्थापित करने और उन्हें बनाए रखने के उपायों को काव्यात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। इस रचना ने उसे अत्यधिक लोकप्रिय बनाया, किंतु इसकी विषय-वस्तु और नैतिक दृष्टिकोण ऑगस्टस द्वारा प्रोत्साहित पारंपरिक रोमन नैतिक मूल्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाते थे। बाद में ओविड के निर्वासन के कारणों पर चर्चा करते समय इस रचना को भी महत्त्वपूर्ण संदर्भ माना गया है।
हेरोइड्स
हेरोइड्स में पौराणिक कथाओं की प्रसिद्ध स्त्रियों द्वारा लिखे गए काल्पनिक पत्रों के माध्यम से उनके प्रेम, विरह और मानसिक पीड़ा को अभिव्यक्त किया गया है। इस रचना में ओविड ने स्त्री-मन की भावनात्मक जटिलताओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
मेटामॉर्फोसिस
ओविड की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति मेटामॉर्फोसिस है। यह 15 पुस्तकों में विभाजित एक विशाल आख्यानात्मक काव्य है। इसका केंद्रीय विषय रूपांतरण है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर ओविड के समय तक की अनेक यूनानी और रोमन पौराणिक कथाओं को एक विस्तृत काव्यात्मक संरचना में जोड़ा गया है। इस कृति में प्रेम, ईर्ष्या, प्रतिशोध, देवताओं और मनुष्यों के संबंध, वीरता, त्रासदी तथा मानवीय भावनाओं के साथ रूपांतरण की कथाएँ जुड़ी हुई हैं। ओविड की कल्पनाशक्ति, कथावाचन-कौशल, विनोद, व्यंग्य और काव्य-सौंदर्य मेटामॉर्फोसिस को असाधारण बनाते हैं। बाद के यूरोपीय साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। मध्यकाल और विशेष रूप से पुनर्जागरण काल के अनेक कलाकारों और साहित्यकारों ने इससे प्रेरणा ग्रहण की।
ओविड का निर्वासन और उत्तरकालीन रचनाएँ
8 ईस्वी में ऑगस्टस ने ओविड को रोम से निर्वासित करके टोमी भेज दिया, जो काला सागर के पश्चिमी तट पर स्थित था। निर्वासन ने उसके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। परिवार, मित्रों और रोम से दूर रहकर उसने अकेलेपन और मानसिक पीड़ा का अनुभव किया। इसी अवधि में उसने ‘ट्रिस्टिया’ अर्थात् दुःख-गीत और ‘एपिस्टुले एक्स पोंटो’ अर्थात् पोंटस से पत्र जैसी रचनाएँ लिखीं। इनमें निर्वासन का दुःख, स्वदेश के प्रति प्रेम, अकेलापन और वापसी की आकांक्षा अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है।
साहित्यिक महत्त्व
ओविड की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण, चतुर और अत्यंत प्रभावशाली है। उसकी कल्पनाशक्ति, कथावाचन-कौशल, विनोदप्रियता और भावाभिव्यक्ति उसे अपने समकालीन कवियों से अलग पहचान देती है। उसने प्रेम-काव्य को केवल व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पौराणिक कथाओं और मानवीय मनोविज्ञान के साथ जोड़कर उसे व्यापक साहित्यिक रूप प्रदान किया।
इस प्रकार टिबुलस की कोमलता, प्रोपर्टियस की भावनात्मक तीव्रता और ओविड की कल्पनाशीलता ने ऑगस्टसकालीन रोमन प्रणयगीत को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से ओविड की मेटामॉर्फोसिस ने यूरोपीय साहित्य और कला पर स्थायी प्रभाव डाला। बोक्काच्चो, ज्योफ्री चौसर, एडमंड स्पेंसर और टॉर्क्वाटो टास्सो जैसे बाद के साहित्यकारों ने ओविडीय परंपरा से प्रेरणा ग्रहण की। इस प्रकार रोमन प्रणयगीत केवल प्रेम और व्यक्तिगत भावनाओं का साहित्य नहीं था, बल्कि उसने रोमन समाज की बदलती मानसिकता को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ यूरोपीय साहित्यिक परंपरा के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक साहित्य
ऑगस्टसकालीन रोमन साहित्य में पद्य के साथ-साथ गद्य-साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। गद्य की विभिन्न विधाओं में इतिहास-लेखन का विशेष महत्त्व था। इस काल के प्रमुख इतिहासकारों में टाइटस लिवियस (लिवी) और पॉम्पियस ट्रोगस उल्लेखनीय हैं। इनमें लिवी को रोमन इतिहास-लेखन की साहित्यिक परंपरा का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि माना जाता है।
टाइटस लिवियस ‘लिवी’ (59 ई.पू.–17 ई.)
मुख्य लेख : लिवी
टाइटस लिवियस, जिसे सामान्यतः लिवी कहा जाता है, का जन्म 59 ईसा पूर्व में इटली के पटवियम (पडुआ) नगर में हुआ था। उसके प्रारंभिक जीवन के संबंध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। उसने शिक्षा और साहित्यिक अध्ययन के लिए रोम की यात्रा की और अपना अधिकांश जीवन इतिहास-लेखन में व्यतीत किया। वह ऑगस्टस के शासनकाल के साहित्यिक वातावरण से जुड़ा हुआ था। परंपरा के अनुसार उसने भावी सम्राट क्लॉडियस को भी प्रोत्साहित किया और इतिहास-लेखन के प्रति उसकी रुचि विकसित की।
लिवी ने अपने जीवन के लगभग चार दशकों को रोम के इतिहास के लेखन के लिए समर्पित किया। उसकी महान कृति ‘अब उर्बे कोंडिता लिब्री’ अर्थात् ‘नगर की स्थापना से’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह रोम के इतिहास पर आधारित एक विशाल ग्रंथ था, जिसमें कुल 142 पुस्तकें थीं। इसमें रोम की स्थापना की परंपरागत कथा से लेकर लिवी के समकालीन काल तक का इतिहास प्रस्तुत किया गया था। आज इस विशाल कृति की केवल 35 पुस्तकें पूर्ण रूप में उपलब्ध हैं, जबकि अन्य पुस्तकों की जानकारी मुख्यतः सारांशों और उद्धरणों से प्राप्त होती है।
लिवी का उद्देश्य केवल घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करना नहीं था। वह रोमन इतिहास के माध्यम से राष्ट्रीय चरित्र और नैतिक आदर्शों को सामने लाना चाहता था। उसके अनुसार रोम का उत्थान केवल सैन्य शक्ति या राजनीतिक संस्थाओं के कारण नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे रोमन नागरिकों का अनुशासन, साहस, कर्तव्यनिष्ठा, आत्मसंयम और देशभक्ति जैसे गुण भी थे। वह अपने समय में बढ़ती विलासिता, धन-लोलुपता और नैतिक पतन से चिंतित था तथा प्राचीन रोमन मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता पर बल देता था।
इस दृष्टि से लिवी का इतिहास राष्ट्रीय चेतना और नैतिक शिक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ था। यूनानी इतिहासकार पॉलीबियस ने रोम की सफलता को उसकी राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था से जोड़कर देखा था, जबकि लिवी ने रोमन चरित्र और नैतिक अनुशासन को अधिक महत्त्व दिया। उसके इतिहास में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनमें साहस, त्याग, कर्तव्य और देशभक्ति को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है।
लिवी की लेखन-शैली
लिवी की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसकी साहित्यिक और प्रभावशाली शैली प्रमुख है। उसकी भाषा प्रवाहपूर्ण, ओजपूर्ण और भावात्मक है। वह घटनाओं को केवल सूचनात्मक ढंग से प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उन्हें संवाद, भाषण, चरित्र-चित्रण और नाटकीय प्रसंगों के माध्यम से जीवंत बना देता है। विशेष रूप से रोम और हैनिबल के संघर्षों का उसका वर्णन अत्यंत प्रभावशाली है।
लिवी के इतिहास में अनेक भाषण भी मिलते हैं। इन भाषणों का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक घटनाओं को दर्ज करना नहीं, बल्कि संबंधित पात्रों के विचारों और नैतिक दृष्टिकोण को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना भी था। इस कारण उसकी कृति में इतिहास और साहित्य का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। रोमन गद्य-साहित्य में उसका स्थान लगभग वही है जो पद्य-साहित्य में वर्जिल का है।
लिवी की सीमाएँ
लिवी एक महान साहित्यकार और प्रभावशाली इतिहासकार था, किंतु आधुनिक अर्थ में उसे पूर्णतः वैज्ञानिक और आलोचनात्मक इतिहासकार नहीं माना जा सकता। उसके इतिहास की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उसने प्रारंभिक रोमन इतिहास से संबंधित अनेक किंवदंतियों, लोकपरंपराओं, शकुनों और चमत्कारिक घटनाओं को भी स्थान दिया। वह कभी-कभी इन कथाओं की विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त करता है, लेकिन इतिहास और किंवदंती के बीच हमेशा स्पष्ट अंतर स्थापित नहीं कर पाता।
उसने पूर्ववर्ती इतिहासकारों, परंपरागत कथाओं और उपलब्ध अभिलेखों पर काफी निर्भरता दिखाई। घटनाओं के मूल कारणों तथा उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण उसकी प्रमुख चिंता नहीं थी। इसी कारण आधुनिक इतिहासलेखन की कसौटी पर उसकी आलोचनात्मक पद्धति सीमित दिखाई देती है।
लिवी ने रोमन समाज के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों का भी उतना गहरा विश्लेषण नहीं किया जितना आधुनिक इतिहासकार अपेक्षित मानते हैं। उसके इतिहास में अभिजात वर्ग और रोमन परंपराओं के प्रति सहानुभूति दिखाई देती है तथा सामान्य जनता और प्लेबियनों की भूमिका को अपेक्षाकृत कम महत्त्व मिला है। इसके अतिरिक्त, वह गणतंत्र और ऑगस्टस के साम्राज्यवादी शासन के बीच राजनीतिक अंतर का विस्तृत विश्लेषण नहीं करता।
फिर भी इन सीमाओं के बावजूद लिवी का ऐतिहासिक महत्त्व असाधारण है। उसने रोमन इतिहास को केवल घटनाओं के क्रम के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति, नैतिक आदर्श और रोमन पहचान की व्यापक कथा के रूप में प्रस्तुत किया। उसकी साहित्यिक शैली ने इतिहास-लेखन को आकर्षक और प्रभावशाली बनाया तथा उसकी कृति ने बाद की यूरोपीय ऐतिहासिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।
इस प्रकार लिवी रोमन इतिहास-लेखन में साहित्यिक सौंदर्य, राष्ट्रीय चेतना और ऐतिहासिक परंपरा के अद्वितीय समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि वह आधुनिक अर्थों में पूर्णतः आलोचनात्मक इतिहासकार नहीं था, फिर भी रोम के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अतीत को समझने के लिए उसकी अब उर्बे कोंडिता आज भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
पॉम्पियस ट्रोगस तथा वेरियस फ्लेकस
ऑगस्टसकालीन रोमन साहित्य में इतिहास-लेखन की परंपरा केवल लिवी तक सीमित नहीं थी। इस काल में पॉम्पियस ट्रोगस और वेरियस फ्लेकस जैसे विद्वानों ने भी इतिहास तथा ज्ञान-साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनके लेखन में रोमन इतिहास के साथ-साथ व्यापक भूमध्यसागरीय और विश्व-इतिहास के प्रति रुचि दिखाई देती है।
पॉम्पियस ट्रोगस लिवी का लगभग समकालीन इतिहासकार था। वह एक गैलिक परिवार से संबंधित था और उसके पूर्वजों ने रोमन प्रशासन तथा कूटनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘हिस्टोरिया फिलिपिका’ 44 पुस्तकों में रचित एक व्यापक विश्व-इतिहास थी। नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका केंद्र केवल मकदूनिया के राजा फिलिप द्वितीय का इतिहास था, किंतु वास्तव में इसकी विषय-वस्तु इससे कहीं अधिक व्यापक थी। इसमें प्राचीन पूर्वी राज्यों, यूनानी नगर-राज्यों, मकदूनिया, पार्थिया तथा अन्य शक्तियों के इतिहास का भी वर्णन किया गया था और अंततः रोमन शक्ति के उदय तक की घटनाओं को समाहित किया गया।
मूल ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है। इसके विषय में मुख्य जानकारी बाद के लेखक जस्टिन द्वारा तैयार किए गए संक्षिप्त सारांश से प्राप्त होती है। ट्रोगस का महत्त्व इस बात में है कि उसने रोमन इतिहास को केवल रोम-केंद्रित दृष्टिकोण से नहीं देखा, बल्कि विभिन्न राष्ट्रों और राज्यों के इतिहास को एक व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इस दृष्टि से उसकी कृति प्राचीन विश्व-इतिहास की समझ के लिए महत्त्वपूर्ण है।
वेरियस फ्लेकस भी प्रारंभिक रोमन साम्राज्य के विद्वानों में उल्लेखनीय था। उसकी प्रमुख उपलब्धि ‘एपिटोमे दे वर्बोरुम सिग्निफिकातू’ से संबंधित है, जो मूलतः प्राचीन शब्दों और उनके अर्थों से जुड़ा विद्वत्तापूर्ण कार्य था। उसकी रचना से रोमन भाषा, प्राचीन शब्दावली और रोमन सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन में सहायता मिलती है। यद्यपि उसकी अधिकांश मूल सामग्री आज उपलब्ध नहीं है, फिर भी बाद के लेखकों द्वारा उद्धृत अंश उसके विद्वत्तापूर्ण योगदान का प्रमाण देते हैं।
पारिभाषिक एवं तकनीकी ग्रंथ
ऑगस्टसकालीन युग में इतिहास और कविता के अतिरिक्त तकनीकी, वास्तुशिल्पीय, खगोलीय तथा पौराणिक साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। इस क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण नाम मार्कस विट्रुवियस पोल्लियो (विट्रुवियस) का है।
विट्रुवियस ने पहले जूलियस सीज़र के अभियानों में सैन्य अभियंता के रूप में कार्य किया और बाद में ऑगस्टस के शासनकाल में भी सेवा की। जीवन के उत्तरार्ध में उसने वास्तुकला पर अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘दे आर्किटेक्चुरा’ लिखा, जिसे सामान्यतः ‘ऑन आर्किटेक्चर’ कहा जाता है। यह दस पुस्तकों में विभाजित है और ऑगस्टस को समर्पित है। इस ग्रंथ में भवन-निर्माण की सामग्री, वास्तु के सिद्धांत, मंदिरों और सार्वजनिक भवनों की योजना, नगर-निर्माण, जल-प्रणालियों, मशीनों, सैन्य उपकरणों तथा जलघड़ियों जैसे अनेक विषयों का वर्णन मिलता है। विट्रुवियस ने वास्तुकला को केवल भवन-निर्माण की तकनीक नहीं माना, बल्कि उसे गणित, ज्यामिति, संगीत, दर्शन और प्रकृति के ज्ञान से संबंधित व्यापक विद्या के रूप में देखा।
यह ग्रंथ प्राचीन रोमन इंजीनियरिंग और वास्तुकला के अध्ययन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। विशेष रूप से रोमन कंक्रीट, जल-प्रणाली, नगर-योजना और निर्माण तकनीक को समझने में इससे महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। पुनर्जागरण काल में इसकी पुनर्खोज ने यूरोपीय वास्तुकला को गहराई से प्रभावित किया। लियोनार्दो दा विंची और आंद्रेआ पल्लादियो जैसे कलाकारों और वास्तुकारों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।
इस काल में गायस जूलियस हाइजिनस का नाम भी उल्लेखनीय है। उसे पौराणिक कथाओं और खगोल संबंधी साहित्य से जोड़ा जाता है। उसकी प्रमुख कृतियों में ‘फाबुले’ और ‘पॉएटिकॉन एस्ट्रोनॉमिकॉन’ का उल्लेख किया जाता है। इनमें यूनानी-रोमन पौराणिक कथाओं तथा नक्षत्रों से संबंधित कथाओं का संकलन मिलता है। यद्यपि उसकी रचनाओं की तिथि और लेखकीय पहचान के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं, फिर भी उनसे प्राचीन पौराणिक और खगोलीय परंपराओं के अध्ययन में सहायता मिलती है।
यूनानी भाषा में इतिहास-लेखन
रोमन साम्राज्य के बौद्धिक जीवन पर यूनानी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। इसलिए ऑगस्टसकालीन युग में कई विद्वानों ने यूनानी भाषा में भी इतिहास और ज्ञान संबंधी ग्रंथों की रचना की।
इनमें डिओडोरस सिकुलस का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘बिब्लियोथेका हिस्टोरिका’ एक विशाल विश्व-इतिहास है। इसमें प्राचीन विश्व की विभिन्न सभ्यताओं, राज्यों और घटनाओं का व्यापक विवरण प्रस्तुत किया गया है। उसने अनेक पूर्ववर्ती इतिहासकारों की सामग्री का उपयोग किया, जिसके कारण उसकी कृति उन लेखकों के खो चुके कार्यों के पुनर्निर्माण में भी उपयोगी है।
डिओनिसियस ऑफ हैलिकार्नासस भी ऑगस्टसकालीन युग का महत्त्वपूर्ण यूनानी इतिहासकार था। वह रोम में लंबे समय तक रहा और उसकी प्रमुख कृति ‘रोमन एंटिक्विटीज’ थी। यह मूलतः 20 पुस्तकों का ग्रंथ था, जिसमें रोम की स्थापना से लेकर प्रथम प्यूनिक युद्ध तक का इतिहास प्रस्तुत किया गया। उसने रोम की प्राचीन परंपराओं और संस्थाओं को यूनानी पाठकों के लिए समझाने का प्रयास किया। हालांकि प्रारंभिक रोमन इतिहास के वर्णन में उसने परंपरागत कथाओं पर पर्याप्त भरोसा किया, फिर भी उसकी कृति रोमन इतिहास के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत है। उसकी दूसरी प्रसिद्ध कृति ‘ऑन इमिटेशन’ थी, जबकि ‘ऑन द सब्लाइम’ को सामान्यतः किसी अज्ञात लेखक की रचना माना जाता है; अतः इसे डिओनिसियस की कृति मानना उचित नहीं है।
निकोलस ऑफ दमिश्क ने भी यूनानी भाषा में एक विशाल विश्व-इतिहास लिखा था। इसका अधिकांश भाग अब नष्ट हो चुका है। उपलब्ध अंशों में हेरोद, क्लियोपेट्रा, मार्क एंटनी और ऑगस्टस जैसे समकालीन व्यक्तियों से संबंधित सामग्री मिलती है। उसके लेखन में ऑगस्टस के प्रति प्रशंसात्मक दृष्टिकोण दिखाई देता है।
स्ट्रैबो और भूगोल
इस काल के महान विद्वानों में स्ट्रैबो का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह इतिहासकार होने के साथ-साथ प्राचीन विश्व का महान भूगोलवेत्ता भी था। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘ज्योग्राफिका’ 17 पुस्तकों में विभाजित है।
स्ट्रैबो ने स्पेन, गॉल, इटली, यूनान, एशिया माइनर, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका और एशिया के विभिन्न क्षेत्रों का विस्तृत वर्णन किया। उसने नदियों, पर्वतों, समुद्रों, जलवायु, नगरों, जनजातियों, प्राकृतिक संसाधनों और लोगों के जीवन का उल्लेख किया। उसके लिए भूगोल केवल स्थानों का वर्णन नहीं था, बल्कि प्राकृतिक पर्यावरण और मानव समाज के संबंधों को समझने का माध्यम भी था। इसलिए ज्योग्राफिका प्राचीन भूमध्यसागरीय विश्व के इतिहास और भूगोल दोनों के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
इस प्रकार ऑगस्टसकालीन युग केवल कविता और इतिहास का स्वर्णकाल नहीं था, बल्कि यह वास्तुकला, भूगोल, खगोल, पौराणिक अध्ययन और अन्य ज्ञान-विज्ञान संबंधी विषयों के विकास का भी महत्त्वपूर्ण काल था। लिवी, ट्रोगस, डिओनिसियस, स्ट्रैबो, विट्रुवियस और अन्य विद्वानों ने रोमन बौद्धिक परंपरा को व्यापकता प्रदान की। उनकी रचनाओं ने प्राचीन ज्ञान को सुरक्षित रखने के साथ-साथ मध्यकालीन और पुनर्जागरणकालीन यूरोप के ज्ञान-विकास की नींव भी तैयार की।
उत्तर-ऑगस्टसकालीन साहित्य
सम्राट ऑगस्टस की मृत्यु 14 ईस्वी से लेकर तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध तक रोमन साम्राज्य में साहित्य का निरंतर विकास होता रहा। प्रारंभिक साम्राज्यकाल के आरंभिक चरण, विशेषकर 14 ईस्वी से लगभग 117 ईस्वी तक के समय को लैटिन साहित्य का ‘रजत युग’ कहा जाता है। इस काल में साहित्य पर यूनानी संस्कृति के साथ-साथ पूर्वी भूमध्यसागरीय संस्कृतियों का भी प्रभाव बढ़ा। ऑगस्टसकालीन साहित्य में जहाँ राष्ट्रीय गौरव, नैतिक आदर्श और शास्त्रीय संतुलन पर विशेष बल था, वहीं उत्तर-ऑगस्टसकालीन साहित्य में व्यक्तिवाद, अलंकारिकता, दार्शनिक चिंतन, राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य, यथार्थवाद और भावनात्मक तीव्रता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। इस काल में कविता, इतिहास, वक्तृत्व, दर्शन, व्यंग्य, नाटक और गद्य की अनेक विधाओं का विकास हुआ। सेनेका, लूकन, पेट्रोनियस, क्विंटिलियन, टेसिटस, जुवेनल, मार्शल और स्टैटियस इस युग के प्रमुख साहित्यकार थे।
सेनेका
मुख्य लेख :
लूसियस एनियस सेनेका (लगभग 4 ई. पू.–65 ई.) उत्तर-ऑगस्टसकालीन साहित्य और दर्शन का अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व था। उसका जन्म स्पेन के कोर्डुबा नगर में हुआ, किंतु शिक्षा और सार्वजनिक जीवन का अधिकांश भाग रोम में बीता। उसके पिता सेनेका द एल्डर प्रसिद्ध वक्ता और लेखक थे। सेनेका पर स्टोइक दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा और उसने दर्शन, नैतिकता तथा साहित्य को परस्पर जोड़ने का प्रयास किया।
उसका जीवन राजनीतिक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। सम्राट क्लॉडियस के शासनकाल में उसे 41 ईस्वी में कोर्सिका निर्वासित कर दिया गया। लगभग आठ वर्ष बाद उसे वापस बुलाया गया और वह युवा नीरो का शिक्षक तथा बाद में उसका सलाहकार बना। प्रारंभ में उसने नीरो के शासन को संयमित रखने का प्रयास किया, किंतु बाद में राजनीतिक परिस्थितियों से उसका संबंध जटिल हो गया। 65 ईस्वी में पिसोनियन षड्यंत्र से संबंध के आरोप के बाद उसे आत्महत्या करने का आदेश दिया गया।
सेनेका की प्रमुख रचनाओं में ‘डी बेनेफिसियिस’, ‘डी ब्रेविताते विटाए’, ‘डी क्लेमेंटिया’ तथा अनेक दुखांत नाटक उल्लेखनीय हैं। उसके नाटकों में ‘मेडिया’, ‘फैद्रा’, ‘थायेस्टिस’ और ‘एडिपस’ प्रसिद्ध हैं। उसके नाटकों में कथानक की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक संघर्ष, भाषण, नैतिक प्रश्न और तीव्र भावनाओं को अधिक महत्त्व दिया गया है। इसी कारण उन्हें मंचन की अपेक्षा पठन के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है। उसकी अलंकारिक और प्रभावशाली शैली ने बाद के यूरोपीय दुखांत नाटकों, विशेषकर अंग्रेजी पुनर्जागरण नाटक, को प्रभावित किया।
मार्कस एनियस लूकन
मार्कस एनियस लूकन (39–65 ई.) सेनेका का भतीजा और उत्तर-ऑगस्टसकालीन प्रमुख कवि था। उसका जन्म भी कोर्डुबा में हुआ और बाल्यावस्था में वह रोम आ गया। उसने दर्शन, वक्तृत्व और साहित्य की शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभ में उसे सम्राट नीरो का संरक्षण मिला, किंतु बाद में दोनों के संबंध बिगड़ गए।
उसकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘फार्सालिया’ या ‘दे बेल्लो सिविली’ है। यह रोमन गृहयुद्ध और जूलियस सीज़र तथा पॉम्पियस के संघर्ष का काव्यात्मक वर्णन है। लूकन ने परंपरागत महाकाव्य की तरह देवताओं की भूमिका को प्रमुखता देने के बजाय ऐतिहासिक घटनाओं और मानवीय संघर्षों को केंद्र में रखा। उसने कैटो द यंगर को गणतांत्रिक स्वतंत्रता और नैतिक दृढ़ता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। 65 ईस्वी में पिसोनियन षड्यंत्र में उसकी संलिप्तता सामने आने के बाद उसे आत्महत्या का आदेश दिया गया।
पेट्रोनियस
पेट्रोनियस का जीवन अपेक्षाकृत रहस्यमय है। सामान्यतः उसे नीरो के दरबार से संबंधित पेट्रोनियस आर्बिटर के रूप में पहचाना जाता है। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘सैटिरिकॉन’ प्राचीन रोमन गद्य-साहित्य की विशिष्ट रचनाओं में है। यह मिश्रित गद्य-पद्य शैली में लिखी गई व्यंग्यात्मक कथा है, जिसका अधिकांश भाग अब नष्ट हो चुका है।
सैटिरिकॉन में दासों, पूर्वदासों, व्यापारियों और नगर के सामान्य लोगों के जीवन का यथार्थ चित्रण मिलता है। ट्रिमाल्कियो का भोज इसका सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है। पेट्रोनियस ने रोमन समाज की धन-लोलुपता, सामाजिक दिखावे और नैतिक विसंगतियों को हास्य तथा व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस दृष्टि से उसका साहित्य आदर्शवादी ऑगस्टसकालीन साहित्य से हटकर यथार्थवादी सामाजिक चित्रण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था।
मार्कस फेबियस क्विंटिलियन
मुख्य लेख : क्विंटिलियन
मार्कस फेबियस क्विंटिलियन (लगभग 35–100 ई.) रोमन वक्तृत्वशास्त्र, शिक्षा और साहित्यिक आलोचना का महान आचार्य था। उसका जन्म स्पेन के कैलागुरिस में हुआ। बाद में वह रोम आया और वहाँ प्रसिद्ध वक्ता तथा शिक्षक बना।
उसकी महान कृति ‘इन्स्टीट्यूटियो ओरेटोरिया’ बारह पुस्तकों में रचित है। इसमें उसने बाल्यावस्था से लेकर एक आदर्श वक्ता के निर्माण तक की संपूर्ण शिक्षा-पद्धति पर विचार किया। उसके अनुसार श्रेष्ठ वक्ता केवल कुशल भाषण देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि “अच्छा व्यक्ति और कुशल वक्ता” होना चाहिए। उसने शिक्षा में अनुशासन, नैतिकता, अध्ययन, स्मरणशक्ति, तर्क, भाषा और प्रभावशाली प्रस्तुति को महत्त्व दिया। क्विंटिलियन का ग्रंथ रोमन शिक्षा और वक्तृत्वकला के अध्ययन का अमूल्य स्रोत है।
टेसिटस
पब्लियस कॉर्नेलियस टेसिटस (लगभग 56–120 ईस्वी) को प्राचीन रोम के महानतम इतिहासकारों में गिना जाता है। वह इतिहासकार होने के साथ-साथ वक्ता और प्रशासक भी था। उसकी प्रमुख रचनाएँ ‘एग्रीकोला’, ‘जर्मानिया’, ‘हिस्ट्रीज’ और ‘एनल्स’ हैं। एग्रीकोला में उसने अपने ससुर के जीवन और ब्रिटेन में रोमन विजय का वर्णन किया। जर्मानिया में उसने जर्मनिक जनजातियों के जीवन, सामाजिक संस्थाओं और नैतिक गुणों का वर्णन किया। हिस्ट्रीज में 69 ईस्वी के चार सम्राटों के वर्ष से लेकर फ्लावियन शासन के प्रारंभ तक की घटनाओं का विवरण है, जबकि एनल्स में टिबेरियस से नीरो तक के प्रारंभिक साम्राज्य का इतिहास मिलता है। टेसिटस ने निरंकुश शासन, राजनीतिक षड्यंत्र, दरबारी भ्रष्टाचार और नैतिक पतन की तीखी आलोचना की। उसकी शैली संक्षिप्त, गंभीर, व्यंग्यपूर्ण और विश्लेषणात्मक है। इतिहास के माध्यम से उसने सत्ता और मानव-चरित्र के जटिल संबंधों को उजागर किया।
जुवेनल
डेसीमस जूनियस जुवेनालिस (लगभग 55/60–130 ईस्वी) रोमन साहित्य का महान व्यंग्यकार था। उसकी ‘सैटायर्स’ में रोमन समाज की विलासिता, भ्रष्टाचार, धन की लालसा, सामाजिक असमानता और नैतिक पतन पर तीखा प्रहार किया गया है। वह मानता था कि अत्यधिक धन और सत्ता की इच्छा ने पारंपरिक रोमन सद्गुणों को कमजोर कर दिया है। उसका व्यंग्य कठोर, आक्रामक और नैतिक चेतना से प्रेरित था।
मार्शल
मार्कस वलेरियस मार्शल (लगभग 40–104 ईस्वी) का जन्म स्पेन में हुआ, किंतु उसने अपने साहित्यिक जीवन का अधिकांश भाग रोम में बिताया। वह विशेष रूप से ‘एपिग्राम’ (लघु व्यंग्यात्मक कविताओं) के लिए प्रसिद्ध है। उसकी कविताओं में रोम के दैनिक जीवन, सामाजिक संबंधों, मित्रता, प्रेम, धन, प्रतिष्ठा और मानवीय कमजोरियों का चुटीला चित्रण मिलता है। उसकी भाषा संक्षिप्त, तीक्ष्ण और विनोदी है। मार्शल ने साधारण जीवन को साहित्य का विषय बनाकर रोमन समाज का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया।
स्टैटियस
मुख्य लेख : स्टैटियस
पब्लियस पपिनियस स्टैटियस (लगभग 45–96 ई.) फ्लावियन काल का प्रमुख कवि था। उसकी प्रमुख रचनाओं में ‘थेबैड’, ‘सिल्वी’ और अधूरी ‘अकिलीइड’ शामिल हैं। थेबैड यूनानी पौराणिक परंपरा पर आधारित महाकाव्य है, जिसमें थीब्स के संघर्षों का वर्णन किया गया है। सिल्वी में तत्कालीन रोमन जीवन और संरक्षकों के सम्मान में लिखी गई कविताएँ हैं। स्टैटियस की भाषा अलंकृत, भव्य और प्रभावशाली थी। उसे अपने समय में पर्याप्त लोकप्रियता मिली और उसने सम्राट डोमिटियन की भी प्रशंसा की।
स्यूटोनियस (लगभग 69–126 ई.)
मुख्य लेख : स्यूटोनियसगायस
स्यूटोनियस ट्रैंक्विलस, जिसे सामान्यतः स्यूटोनियस के नाम से जाना जाता है, प्रारंभिक रोमन साम्राज्यकाल का एक प्रमुख जीवनीकार था। रोमन जीवनी-लेखन के विकास में उसका स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘द ट्वेल्व सीज़र्स’ है, जिसमें उसने जूलियस सीज़र से लेकर डोमिटियन तक के बारह प्रमुख रोमन शासकों के जीवन का वर्णन किया है। स्यूटोनियस का उद्देश्य केवल राजनीतिक घटनाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि सम्राटों के व्यक्तित्व, चरित्र, आदतों, रुचियों, पारिवारिक संबंधों, निजी जीवन और दरबारी वातावरण का चित्रण करना था।
स्यूटोनियस ने रोमन सम्राटों के जीवन को विभिन्न पक्षों से प्रस्तुत किया। वह उनके जन्म, वंश, शिक्षा, राजनीतिक जीवन, सैन्य गतिविधियों, प्रशासन, व्यक्तिगत व्यवहार, मनोरंजन, धार्मिक विश्वासों तथा मृत्यु का वर्णन करता है। उसकी जीवनी-शैली आधुनिक अर्थों में पूर्णतः वैज्ञानिक या आलोचनात्मक इतिहास-लेखन से भिन्न थी। उसने अनेक उपाख्यानों, अफवाहों, लोकप्रचलित कथाओं और दरबारी वृत्तांतों को भी अपने विवरण में स्थान दिया। इसलिए उसकी रचनाओं में ऐतिहासिक तथ्य और लोकप्रिय परंपराएँ कई बार साथ-साथ दिखाई देते हैं। फिर भी सम्राटों के निजी जीवन और रोमन दरबार की आंतरिक परिस्थितियों के अध्ययन के लिए उसका लेखन अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
स्यूटोनियस की विशेषता यह थी कि उसने शासकों को केवल विजेता या प्रशासक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उनके मानवीय गुण-दोषों को भी सामने रखा। इससे उसकी जीवनी में व्यक्तित्व-चित्रण की प्रभावशाली परंपरा विकसित हुई। उसकी शैली अपेक्षाकृत सरल, स्पष्ट और रोचक थी। इस कारण उसकी रचनाएँ विद्वानों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी आकर्षक बनी रहीं।
यूनानी भाषा के लेखक
लैटिन साहित्य के समान प्रारंभिक रोमन साम्राज्यकाल में यूनानी भाषा का साहित्य भी अत्यंत समृद्ध हुआ। रोमन साम्राज्य के पूर्वी प्रदेशों में यूनानी भाषा शिक्षा, दर्शन और साहित्य की प्रमुख भाषा बनी रही। अनेक यूनानी विद्वानों ने रोमन शासन के अधीन रहते हुए इतिहास, जीवनी, दर्शन, निबंध और व्यंग्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण रचनाएँ कीं। इनमें प्लूटार्क और लूसियन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दोनों लेखकों ने यूनानी साहित्य को नई दिशा प्रदान की और बाद के यूरोपीय साहित्य तथा इतिहास-लेखन पर गहरा प्रभाव डाला।
प्लूटार्क (लगभग 46–120 ई.)
मुख्य लेख : प्लूटार्क
प्लूटार्क का जन्म लगभग 46 ईस्वी में बोयोटिया के कैरोनिया नगर में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उसने एथेंस में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उसने दर्शन, साहित्य, वक्तृत्व और अन्य विषयों का अध्ययन किया। वह विशेष रूप से प्लेटोनिक दर्शन से प्रभावित था। व्यापक यात्राओं के कारण उसे यूनानी और रोमन संसार की विभिन्न संस्कृतियों तथा राजनीतिक परंपराओं को निकट से समझने का अवसर मिला। वह रोम भी गया और वहाँ रोमन अभिजात वर्ग से उसके घनिष्ठ संबंध स्थापित हुए। प्लूटार्क की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘लाइव्स’ है। इसमें उसने यूनान और रोम के प्रमुख व्यक्तियों की जीवनियाँ युग्मों के रूप में प्रस्तुत कीं। सामान्यतः एक यूनानी और एक रोमन व्यक्ति की तुलना की जाती थी। उदाहरण के लिए, उसने अलेक्जेंडर और जूलियस सीज़र, सोलोन और पब्लिकोला, तथा लाइकरगस और नूमा जैसे व्यक्तित्वों को साथ रखकर उनके चरित्र और उपलब्धियों की तुलना की। प्लूटार्क का उद्देश्य आधुनिक अर्थ में इतिहास लिखना नहीं था। वह स्वयं स्पष्ट करता है कि उसे केवल महान घटनाओं की अपेक्षा मनुष्य के चरित्र और उसके नैतिक गुण-दोषों में अधिक रुचि थी। उसके लिए इतिहास नैतिक शिक्षा का माध्यम था। वह यह दिखाना चाहता था कि महान व्यक्तियों के जीवन से मनुष्य सद्गुण, आत्मसंयम, साहस, न्याय और कर्तव्यपरायणता जैसे गुण सीख सकता है।
प्लूटार्क की जीवनी-कला की सबसे बड़ी विशेषता उसका चरित्र-चित्रण है। वह किसी व्यक्ति के महान कार्यों के साथ-साथ उसकी छोटी-छोटी आदतों, व्यवहार और व्यक्तिगत कमजोरियों का भी उल्लेख करता है। इस प्रकार वह अपने पात्रों को केवल आदर्श नायक के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय गुण-दोषों से युक्त व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करता है। यद्यपि प्लूटार्क एक महान जीवनीकार था, लेकिन आधुनिक दृष्टि से उसे पूर्णतः वैज्ञानिक इतिहासकार नहीं माना जा सकता। उसके विवरण में तिथियों और घटनाओं से संबंधित कुछ त्रुटियाँ मिलती हैं। कई बार उसने प्रचलित कथाओं, उपाख्यानों और परंपराओं को भी स्वीकार कर लिया। फिर भी उसकी रचनाएँ प्राचीन यूनान और रोम के राजनीतिक तथा सामाजिक इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। प्लूटार्क का प्रभाव बाद के यूरोपीय साहित्य पर भी व्यापक रहा। शेक्सपियर ने अपने कई प्रसिद्ध रोमन नाटकों की कथावस्तु और चरित्रों के लिए प्लूटार्क की लाइव्स से सामग्री ग्रहण की। पुनर्जागरण और आधुनिक युग के अनेक साहित्यकारों तथा चिंतकों ने भी उसकी जीवनी-परंपरा से प्रेरणा प्राप्त की। इस प्रकार प्लूटार्क की रचनाएँ प्राचीन इतिहास और नैतिक चिंतन के साथ-साथ विश्व साहित्य की भी महत्त्वपूर्ण धरोहर बन गईं।
लूसियन (लगभग 125–180 ई. के बाद)
मुख्य लेख : लूसियन
यूनानी भाषा के व्यंग्यात्मक साहित्य के प्रमुख प्रतिनिधि समोसाटा का लूसियन था। उसका जन्म सीरिया के समोसाटा नगर में हुआ था। वह प्रतिभाशाली व्यंग्यकार, निबंधकार और संवाद-लेखक था। उसकी रचनाओं में समकालीन समाज, धार्मिक विश्वासों, दार्शनिक संप्रदायों और बौद्धिक पाखंडों पर तीखा व्यंग्य मिलता है। लूसियन की साहित्यिक शैली अत्यंत विशिष्ट थी। उसने संवाद, हास्य, व्यंग्य और कल्पना का प्रभावशाली प्रयोग किया। उसके प्रसिद्ध संवादों में ‘डायलॉग्स ऑफ द गॉड्स’, ‘डायलॉग्स ऑफ द डेड’, ‘डायलॉग्स ऑफ द कोर्टिसंस’ तथा ‘फिलॉसफीज फॉर सेल’ जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। ‘ए ट्रू स्टोरी’ में उसने कल्पनात्मक और व्यंग्यात्मक शैली का अद्भुत प्रयोग किया। लूसियन ने अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड, झूठे दार्शनिक दावे और सामाजिक आडंबरों की आलोचना की। उसकी रचनाओं में हास्य के पीछे एक गंभीर आलोचनात्मक दृष्टिकोण दिखाई देता है। उसकी भाषा अपेक्षाकृत सरल, जीवंत और संवादात्मक थी, जिसके कारण उसकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुईं।
इस प्रकार स्यूटोनियस, प्लूटार्क और लूसियन ने प्रारंभिक रोमन साम्राज्यकाल के साहित्य को विविधता प्रदान की। स्यूटोनियस ने जीवनी-लेखन को समृद्ध किया, प्लूटार्क ने चरित्र और नैतिकता को इतिहास के केंद्र में रखा तथा लूसियन ने व्यंग्य और संवाद के माध्यम से समाज एवं बौद्धिक जीवन की आलोचना की। इनके योगदान से रोमन साम्राज्यकालीन साहित्य केवल रोम की राजनीतिक उपलब्धियों का वर्णन करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव-चरित्र, समाज, नैतिकता और बौद्धिक जीवन का व्यापक दर्पण बन गया।


