रोमन साम्राज्य में दार्शनिक विचारधाराएँ
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
रोमन साम्राज्य में दर्शन का विकास मुख्यतः यूनानी दार्शनिक परंपराओं के प्रभाव में हुआ, किंतु रोमन विचारकों ने इन सिद्धांतों को अपने सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल दिया। रोमन दर्शन का प्रमुख उद्देश्य केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि मनुष्य को सदाचारपूर्ण, संयमित, कर्तव्यनिष्ठ और संतुलित जीवन जीने का मार्ग दिखाना था। इस काल में स्टोइवाद, एपिक्यूरियनवाद और बाद में नव-प्लेटोवाद विशेष रूप से प्रभावशाली रहे। इनमें स्टोइवाद ने रोमन राजनीतिक और नैतिक जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया। सिसरो ने यूनानी दार्शनिक विचारों को लैटिन भाषा और रोमन बौद्धिक परंपरा से जोड़ा तथा कर्तव्य, न्याय, राज्य और नैतिकता जैसे विषयों पर महत्त्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। स्टोइवाद का आधार आत्मसंयम, कर्तव्यपालन, विवेक और प्रकृति के अनुकूल जीवन जीने में था। इसके अनुसार मनुष्य को उन परिस्थितियों को शांतिपूर्वक स्वीकार करना चाहिए जिन्हें वह बदल नहीं सकता और अपने आचरण पर नियंत्रण रखना चाहिए। सेनेका, एपिक्टेटस और सम्राट मार्कस ऑरेलियस इसके प्रमुख रोमन प्रतिनिधि थे। एपिक्यूरियनवाद ने मानसिक शांति, भय से मुक्ति और संयमित सुख को जीवन का लक्ष्य माना। इसके अनुसार मनुष्य को मृत्यु और देवताओं के भय से मुक्त होकर सरल तथा शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहिए। रोमन कवि ल्युक्रेटियस ने इस दर्शन के विचारों को अपनी प्रसिद्ध कृति ‘दे रेऱुम नातूरा’ में काव्यात्मक रूप प्रदान किया। साम्राज्य के उत्तरार्ध में नव-प्लेटोवाद का प्रभाव बढ़ा। प्लोटिनस इसके प्रमुख प्रवर्तक थे। इस विचारधारा में समस्त अस्तित्व के परम स्रोत ‘द वन’ की अवधारणा तथा आत्मा के आध्यात्मिक उत्थान पर बल दिया गया। इस प्रकार रोमन साम्राज्य का दर्शन व्यावहारिक नैतिकता, आत्मसंयम, कर्तव्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक चिंतन का समन्वित रूप था। आगे चलकर इन दार्शनिक परंपराओं ने ईसाई चिंतन को भी प्रभावित किया और यूरोपीय बौद्धिक परंपरा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्टोइक मत
रोमन साम्राज्य में प्रचलित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में स्टोइक मत का स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि यह दर्शन मूलतः यूनान में विकसित हुआ था, परंतु रोम में इसे विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई। रोमन समाज का स्वभाव व्यावहारिक, अनुशासित तथा कर्तव्यपरायण था। इसलिए स्टोइक दर्शन के सिद्धांत रोमन जीवन-मूल्यों के अत्यंत अनुकूल सिद्ध हुए। यही कारण है कि साम्राज्यकाल तक आते-आते यह रोम की सबसे प्रभावशाली दार्शनिक विचारधारा बन गया।
रोम पर राजनीतिक विजय प्राप्त करने के बाद यूनानियों ने अपनी संस्कृति, शिक्षा, साहित्य और दर्शन का भी व्यापक प्रचार किया। अनेक यूनानी दार्शनिक रोम आए और उन्होंने अपने विचारों का प्रसार किया। प्रारंभ में रोमन अभिजात वर्ग इन विदेशी विचारों के प्रति सशंकित था। कुछ यूनानी दार्शनिक धर्म और परंपराओं की आलोचना करते थे, जिससे रोमन शासकों को भय हुआ कि कहीं ये विचार सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित न कर दें। इसी कारण 173 ईसा पूर्व में सीनेट ने दो एपीक्यूरियन दार्शनिकों को रोम से निष्कासित कर दिया। इसके बाद 161 ईसा पूर्व में यह आदेश भी जारी किया गया कि कोई भी विदेशी दार्शनिक रोम में निवास नहीं कर सकता। किंतु इन प्रतिबन्धों के बावजूद यूनानी विचारधाराओं का प्रवेश नहीं रुका।
155 ईसा पूर्व में एथेंस से तीन प्रमुख दार्शनिक परंपराओं के प्रतिनिधि रोम आए। इनमें प्लेटोनिक परंपरा के कार्नीडीज़, अरस्तूवादी परंपरा के क्रिटोलाउस तथा स्टोइक परंपरा के डिओजिनीज़ प्रमुख थे। इन विद्वानों के विचारों ने रोमन समाज को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से प्रसिद्ध रोमन कुलीन परिवार स्किपियो वंश ने स्टोइक दर्शन का स्वागत किया और इसके अध्ययन के लिए विद्वानों की एक गोष्ठी स्थापित की। रोम में स्टोइक विचारधारा के प्रारंभिक प्रचारक पैनैटियस थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘ऑन ड्यूटीज़’ (कर्तव्यों पर) में स्टोइक सिद्धांतों की व्याख्या की।
यद्यपि प्रारंभिक काल में स्टोइक मत का विरोध हुआ, किंतु साम्राज्यकाल में इसे शासकीय संरक्षण प्राप्त हो गया। परिणामस्वरूप पहली शताब्दी ईस्वी के अंत तक इसका व्यापक प्रसार हो गया। इस मत के प्रमुख विचारकों में सेनेका और एपिक्टेटस के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं, जबकि इसके महान प्रचारकों में सम्राट मार्कस ऑरेलियस का स्थान सर्वोपरि है। सेनेका ने अपने अनेक निबंधों— ‘ऑन एंगर’, ‘ऑन द ब्रेविटी ऑफ लाइफ’, ‘ऑन द ट्रैंक्विलिटी ऑफ सोल’, ‘ऑन क्लेमेंसी’, ‘ऑन द हैपी लाइफ’, ‘ऑन द कन्सिस्टेन्सी ऑफ सेज’, ‘ऑन बेनिफिट्स’ तथा ‘ऑन प्रोविडेन्स’ के माध्यम से स्टोइक दर्शन का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया। इन रचनाओं ने रोमन समाज में नैतिक जीवन और आत्मसंयम की भावना को सुदृढ़ किया।
स्टोइक दर्शन का मूल उद्देश्य मनुष्य को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी, सरल और प्रकृति के अनुकूल बनाना था। इसके अनुयायी मानते थे कि मनुष्य संपूर्ण विश्व-व्यवस्था का एक छोटा-सा अंग है। इसलिए उसे केवल अपने हित की नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण की चिंता करनी चाहिए। यदि समाज और मानवता के हित में आवश्यक हो, तो व्यक्ति को अपना सर्वस्व त्यागने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। इस दर्शन में व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा सामूहिक कल्याण को अधिक महत्त्व दिया गया।
स्टोइक विचारकों के अनुसार कर्तव्यपालन मनुष्य का सर्वोच्च धर्म है। वे मानते थे कि दया, करुणा, प्रेम और अन्य कोमल भावनाएँ कभी-कभी कर्तव्यपालन में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए मनुष्य को भावनाओं के अधीन न होकर विवेक और कर्तव्य के अनुसार आचरण करना चाहिए। जीवन में आने वाले कष्ट, दुःख और पीड़ा को धैर्यपूर्वक स्वीकार करना ही सच्ची मानवता है। यही कारण था कि यह दर्शन सैनिकों, प्रशासकों और राज्यसेवकों में विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। स्टोइक मत में ईश्वर को विश्व का नियामक और संचालक माना गया है। उनके अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड एक सुव्यवस्थित व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है। संसार में अच्छाई और बुराई दोनों विद्यमान हैं, किंतु अंततः सत्य और सदाचार की ही विजय होती है। इसलिए मनुष्य को ईश्वर की इच्छा को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। साथ ही, चूँकि मनुष्य में भी दैवी शक्ति का अंश विद्यमान है, इसलिए वह पूर्णतः असहाय नहीं है। उसे अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ के द्वारा परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित कर उन्नति करनी चाहिए।
स्टोइक दार्शनिक प्रकृति के अनुरूप जीवन को आदर्श मानते थे। उनके अनुसार कृत्रिम विलासिता मनुष्य को प्रकृति से दूर कर देती है। वे अत्यधिक ऐश्वर्य, भव्य भवनों, विलासपूर्ण जीवन और कृत्रिम सुख-सुविधाओं के विरोधी थे। उनका विश्वास था कि प्रकृति के निकट रहकर ही मनुष्य वास्तविक सुख और शांति प्राप्त कर सकता है। इसलिए वे सादगी, संयम और स्वाभाविक जीवन पर बल देते थे।
स्टोइक मत में संयम, विवेक, न्याय, दयालुता और सदाचार को सर्वोच्च नैतिक गुण माना गया। सेनेका के अनुसार धनलोलुपता और विलासिता मनुष्य की शांति और स्वास्थ्य दोनों को नष्ट कर देती हैं। शक्ति और अहंकार मनुष्य को पाशविक बना देते हैं। वह कहता है कि शरीर एक बार स्वस्थ होकर पुनः रोगग्रस्त हो सकता है, किंतु यदि मन और बुद्धि स्वस्थ हो जाएँ तो उनका प्रभाव स्थायी रहता है। इसलिए मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य सदाचारी जीवन होना चाहिए, न कि केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति। सेनेका का मत था कि सच्चा सुख विलासिता में नहीं, बल्कि सदाचार में निहित है। वह कहता है कि जो व्यक्ति भोग-विलास को जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लेता है, उसकी स्थिति उस कुत्ते के समान होती है जो एक मांस का टुकड़ा निगलते ही दूसरे की प्रतीक्षा में लग जाता है। उसे कभी संतोष नहीं मिलता। इसके विपरीत, सदाचार से प्राप्त संतोष स्थायी और वास्तविक होता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन अपने कार्यों का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उसने अपने कर्तव्यों का पालन कितनी निष्ठा से किया है।
स्टोइक दर्शन में सदाचार की दो प्रमुख कसौटियाँ मानी गईं— पूर्वजों द्वारा स्थापित नैतिक मर्यादाएँ और मनुष्य की अंतरात्मा। सेनेका के अनुसार अंतरात्मा ईश्वर की प्रेरणा से संचालित होती है। मनुष्य के भीतर दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं— उर्ध्वगामी और अधोगामी। उर्ध्वगामी प्रवृत्तियाँ उसे नैतिकता, आत्मसंयम और सदाचार की ओर ले जाती हैं, जबकि अधोगामी प्रवृत्तियाँ उसे पतन की दिशा में ले जाती हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव अपनी श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का अनुसरण करना चाहिए। स्टोइक मत आत्मा की प्रकृति के विषय में पूर्णतः एकमत नहीं था। कहीं इसे नश्वर माना गया, तो कहीं इसे अमर और शाश्वत बताया गया। फिर भी अधिकांश स्टोइक विचारकों का विश्वास था कि मृत्यु के बाद आत्मा ऐसे लोक में जाती है जहाँ ज्ञान, शांति और सदाचार का वास होता है। इस प्रकार उन्होंने नैतिक जीवन और आत्मिक उन्नति के बीच गहरा संबंध स्थापित किया।
कुछ स्टोइक विचारकों ने जीवन की पीड़ाओं से मुक्ति के साधन के रूप में आत्महत्या का समर्थन भी किया। उनका मत था कि यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक दुःख और असहनीय परिस्थितियों में फँस जाए तथा उसके लिए सम्मानजनक जीवन असंभव हो जाए, तो वह बिना किसी को हानि पहुँचाए आत्महत्या कर सकता है। सेनेका ने भी अपने कुछ पत्रों में इस प्रकार के विचार व्यक्त किए हैं। यद्यपि यह मत विवादास्पद था, फिर भी इससे यह स्पष्ट होता है कि स्टोइक दर्शन व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अत्यधिक महत्त्व देता था। स्टोइक मत में मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष अथवा आत्मिक मुक्ति माना गया। यद्यपि इसके साधनों का स्पष्ट और व्यवस्थित विवेचन नहीं मिलता, फिर भी यह दर्शन मनुष्य को सदाचार, आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा के माध्यम से उच्च जीवन की ओर प्रेरित करता है। इसी कारण कुछ विद्वान इसे दर्शन से अधिक आचारशास्त्र मानते हैं।
यद्यपि स्टोइक मत ने कोई अत्यंत जटिल दार्शनिक प्रणाली विकसित नहीं की, फिर भी रोमन समाज के नैतिक उत्थान में इसकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। इसके सार्वभौमिक मानवता के सिद्धांत ने जातीय भेदभाव को कम करने में सहायता की। दासों और निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति का भाव भी इसी दर्शन से प्रेरित हुआ। इस प्रकार स्टोइक मत ने रोमन समाज में नैतिकता, कर्तव्यपरायणता और मानव-समता की भावना को सुदृढ़ करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।
एपिक्युरियन मत
रोमन साम्राज्य में प्रचलित दार्शनिक विचारधाराओं में एपिक्युरियन मत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। यद्यपि इसका मूल विकास यूनान में हुआ था, किंतु रोमन समाज में भी इसने व्यापक प्रभाव डाला। विशेष रूप से संपन्न तथा शिक्षित वर्ग के लोग इस विचारधारा के अनुयायी बने। इस मत का प्रमुख प्रवक्ता और प्रचारक ल्युक्रिटस था, जिसका जन्म लगभग 98 अथवा 95 ईसा पूर्व तथा मृत्यु 55 अथवा 51 ईसा पूर्व के बीच मानी जाती है। उसने अपने दार्शनिक विचारों को ‘डी रेरम नेचुरा’ (वस्तुओं के स्वभाव पर) नामक महान ग्रंथ में प्रस्तुत किया। यह कृति केवल दर्शन का ही नहीं, बल्कि विश्व साहित्य का भी एक उत्कृष्ट महाकाव्य मानी जाती है।
एपिक्युरियन दर्शन का मूल आधार भौतिकवाद था। इसके अनुयायी मानते थे कि संसार की प्रत्येक वस्तु का निर्माण अणुओं और परमाणुओं से हुआ है। उनके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी दैवी शक्ति अथवा ईश्वर की इच्छा से नहीं, बल्कि अणुओं के आकस्मिक संयोग से हुई है। जिस प्रकार पदार्थों का निर्माण अणुओं के मेल से होता है, उसी प्रकार जीवन और चेतना भी अणुओं के संयोजन का परिणाम हैं। इसलिए संसार की घटनाओं को समझने के लिए किसी अलौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है।
एपिक्युरियन विचारकों के अनुसार धर्म मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। उनका मत था कि मनुष्य देवी-देवताओं में श्रद्धा के कारण नहीं, बल्कि भय के कारण विश्वास करता है। अज्ञात शक्तियों का भय उसे धार्मिक कर्मकांडों और अंधविश्वासों की ओर ले जाता है। वे विधाता, भाग्य या पूर्वनियति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते थे। उनके अनुसार प्रकृति स्वयं अपने नियमों के अनुसार संचालित होती है और उसके संचालन के लिए किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं है। इस दर्शन के अनुसार यह ब्रह्मांड अनंत है और इसमें अनेक विश्व विद्यमान हैं। प्रत्येक विश्व प्राकृतिक नियमों के अनुसार स्वतः संचालित होता है। किसी घटना के पीछे कोई दैवी उद्देश्य नहीं होता। संसार में जो कुछ घटित होता है, वह प्राकृतिक कारणों और परिस्थितियों का परिणाम होता है। इसलिए मनुष्य को चमत्कारों और अलौकिक घटनाओं पर विश्वास करने के स्थान पर तर्क और अनुभव के आधार पर सत्य की खोज करनी चाहिए।
एपिक्युरियन मत में अणुओं की विशेषताओं का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके अनुसार अणु अविनाशी, अपरिवर्तनीय, ठोस, सूक्ष्म तथा अनंत संख्या में विद्यमान हैं। उनमें न तो रंग होता है, न स्वाद, न गन्ध और न ही ध्वनि। संसार की सभी वस्तुएँ इन्हीं अणुओं के विभिन्न संयोजनों से निर्मित होती हैं। जब कोई वस्तु नष्ट होती है तो वास्तव में उसका विनाश नहीं होता, बल्कि उसके अणु पुनः अन्य रूप धारण कर लेते हैं। इस प्रकार विनाश केवल रूप-परिवर्तन है, पूर्ण समाप्ति नहीं।
एपिक्युरियन दर्शन आत्मा के संबंध में भी विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार आत्मा कोई आध्यात्मिक अथवा शाश्वत सत्ता नहीं है। आत्मा भी शरीर की भाँति अणुओं से निर्मित है और उसका अस्तित्व शरीर के साथ ही जुड़ा हुआ है। जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब आत्मा भी समाप्त हो जाती है। इसलिए मृत्यु के बाद किसी प्रकार के जीवन, स्वर्ग, नरक अथवा पुनर्जन्म की कल्पना निराधार है। उनके अनुसार मरणोपरान्त जीवन में विश्वास करना केवल भ्रम और अज्ञान का परिणाम है।
एपिक्युरियन विचारकों का मानना था कि मनुष्य का परम लक्ष्य सुख की प्राप्ति है। किंतु उनका सुख का अर्थ केवल भोग-विलास नहीं था। वे मानसिक शांति, भयमुक्त जीवन और शारीरिक कष्टों से मुक्ति को वास्तविक सुख मानते थे। उनका मत था कि मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसमें अनावश्यक इच्छाएँ, भय, लोभ और चिंताएँ न हों। जो व्यक्ति मन की शांति और आत्मसंतोष प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में सुखी है। इस मत के अनुसार दुःख का मुख्य कारण अज्ञान, अंधविश्वास और मृत्यु का भय है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं है और संसार प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलता है, तो उसका भय समाप्त हो जाएगा और वह अधिक सुखी जीवन जी सकेगा। इस प्रकार एपिक्युरियन दर्शन ने मानव जीवन को भयमुक्त बनाने का प्रयास किया।
यद्यपि एपिक्युरियन मत को प्रायः भोगवादी दर्शन कहा जाता है, किंतु वास्तव में यह संयमित सुखवाद का समर्थन करता है। इसके अनुयायी मानते थे कि अत्यधिक विलासिता और भोग अंततः दुःख का कारण बनते हैं। इसलिए मनुष्य को साधारण, सन्तुलित और विवेकपूर्ण जीवन अपनाना चाहिए। सच्चा सुख आत्मसंयम, मित्रता और मानसिक शांति में निहित है।
सामाजिक दृष्टि से भी एपिक्युरियन मत महत्त्वपूर्ण था। इसके अनुयायियों ने मानव-समता और विश्वबंधुत्व का समर्थन किया। वे मानते थे कि सभी मनुष्य समान हैं और उन्हें परस्पर सहयोग तथा मैत्री के भाव से रहना चाहिए। इस प्रकार यह विचारधारा सामाजिक सद्भाव और मानवता की भावना को प्रोत्साहित करती थी। यद्यपि रोमन समाज में स्टोइक मत की अपेक्षा एपिक्युरियन मत कम लोकप्रिय था, फिर भी शिक्षित वर्ग पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसने अंधविश्वासों, धार्मिक भय और रूढ़ियों के विरुद्ध तर्क तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया। इसी कारण ल्युक्रिटस की रचना ‘डी रेरम नेचुरा’ को प्राचीन विश्व की सबसे प्रभावशाली दार्शनिक कृतियों में गिना जाता है।
नियो-पाइथागोरियन मत
नियो-पाइथागोरियन मत का विकास यूनानी तथा पूर्वी धार्मिक-दार्शनिक विचारधाराओं के संमिश्रण से हुआ था। जब रोम ने यूनान पर विजय प्राप्त की, तब पाइथागोरस के विचार भी रोम पहुँचे। समय के साथ पाइथागोरस के वैज्ञानिक सिद्धांतों का महत्त्व कम हो गया, किंतु उनके आध्यात्मिक और धार्मिक विचारों को नए रूप में प्रस्तुत कर एक नवीन दार्शनिक परंपरा विकसित हुई, जिसे नियो-पाइथागोरियन मत कहा गया। इस मत के अनुयायी रोमन समाज के उच्च तथा मध्यम दोनों वर्गों में पाए जाते थे। वे संसार को दो मूल तत्त्वों— पदार्थ और आत्मा में विभाजित मानते थे। उनके अनुसार भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत दोनों का अस्तित्व है और दोनों परस्पर संबंधित हैं। जीवन और मृत्यु एक सतत और शाश्वत प्रक्रिया के दो पक्ष हैं।
नियो-पाइथागोरियन विचारकों का विश्वास था कि ईश्वर और मनुष्य दोनों अमर हैं। दोनों में केवल स्तर अथवा श्रेणी का अंतर है। मनुष्य में दैवी तत्व विद्यमान है, किंतु वह ईश्वर की तुलना में निम्न स्तर पर स्थित है। इस प्रकार वे मानव आत्मा को अत्यंत महत्त्वपूर्ण और पवित्र मानते थे। इस मत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के भीतर दो प्रकार की आत्मिक शक्तियाँ अथवा योनियाँ निवास करती हैं— एक दैवी और दूसरी दुष्ट। दुष्ट आत्माएँ मनुष्य को कष्ट, भ्रम और पाप की ओर ले जाती हैं, जबकि दैवी आत्माएँ उसे ज्ञान, विवेक और सदाचार की प्रेरणा देती हैं। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने भीतर की दैवी शक्तियों को सुदृढ़ करे और बुरी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करे।
नियो-पाइथागोरियन मत में ज्ञान को मुक्ति का प्रमुख साधन माना गया है। उनके अनुसार मनुष्य का उद्धार केवल ज्ञान, आत्मसंयम और नैतिक जीवन द्वारा ही संभव है। इसलिए वे नियम, संयम और आत्मानुशासन पर विशेष बल देते थे। उनका विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन अपने आचरण और विचारों की समीक्षा करनी चाहिए तथा यह देखना चाहिए कि उसने अपने जीवन में कितनी नैतिक प्रगति की है। इस मत के अनुयायी अत्यंत सरल जीवन व्यतीत करने का प्रयास करते थे। वे सादगी, संयम और आत्मनियंत्रण को आदर्श मानते थे। साथ ही वे शकुन-अपशकुन, ज्योतिष और जादू-टोने जैसी धारणाओं में भी विश्वास रखते थे। इस कारण उनके विचारों में तर्क और रहस्यवाद दोनों का समन्वय दिखाई देता है।
नियो-पाइथागोरियन प्रचारक नगरों और गाँवों में घूम-घूमकर अपने सिद्धांतों का प्रचार करते थे। उन्होंने नैतिक जीवन, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देकर रोमन समाज को प्रभावित किया। इस प्रकार यह मत धार्मिक आस्था और नैतिक अनुशासन का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गया।
नियो-प्लेटोनिक मत
नियो-प्लेटोनिक मत रोमन साम्राज्य के उत्तरकाल की सबसे प्रभावशाली दार्शनिक विचारधाराओं में से एक था। यह मूलतः प्लेटो के दर्शन का विकसित और परिवर्तित रूप था, जिसमें यूनानी, पारसी, मिस्री तथा भारतीय विचारधाराओं का भी समावेश हो गया था। इस मत के प्रवर्तक एमोनियस सैकस थे, जबकि इसके महान व्याख्याता और उन्नायक प्लॉटिनस थे। प्लॉटिनस का जन्म लगभग 205 ईस्वी में हुआ था। उन्होंने दस वर्षों तक एमोनियस सैकस से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे पारसी सेना के साथ पूर्वी देशों की यात्रा पर गए। मेसोपोटामिया, सीरिया और अन्य क्षेत्रों की यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों और दार्शनिक परंपराओं का अध्ययन किया। अंततः वह रोम पहुँचे और जीवन के शेष वर्ष वहीं व्यतीत किए।
प्लॉटिनस का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। वह विलासिता और ऐश्वर्य से परिपूर्ण रोम में रहते हुए भी एक साधु के समान जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने सांसारिक सुखों और शारीरिक भोगों से स्वयं को दूर रखा। वह मांस, मदिरा तथा यौन-विलास से परहेज करते थे, यद्यपि वह दूसरों पर अपने विचार थोपने का प्रयास नहीं करते थे।
प्लॉटिनस के अनुसार शरीर आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। उनकी दृष्टि में शरीर लोहे के पिंजरे के समान है, जिसमें आत्मा बंदी बनकर रहती है। इसलिए मनुष्य को केवल शरीर की आवश्यकताओं में नहीं उलझना चाहिए, बल्कि आत्मा के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उसके विचारों में वैराग्य और आध्यात्मिकता की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
नियो-प्लेटोनिक दर्शन के अनुसार संपूर्ण सृष्टि एक परम तत्त्व से उत्पन्न हुई है। उसी परम सत्ता से प्रकृति, आत्मा और समस्त जगत का विकास हुआ है। यह परम सत्ता सभी वस्तुओं में विद्यमान है और संपूर्ण अस्तित्व का मूल स्रोत है। संसार में दिखाई देने वाली विविधता वास्तव में उसी एक परम सत्य की अभिव्यक्ति है। प्लॉटिनस का मत था कि बुद्धि मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च मार्गदर्शक है। बुद्धि ही मन, आत्मा और शरीर का संचालन करती है। यद्यपि संसार में अनेक जीव दिखाई देते हैं, परंतु वास्तव में सभी आत्माएँ एक ही विश्वात्मा से उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार संपूर्ण मानवता एक आध्यात्मिक एकता से बँधी हुई है।
नियो-प्लेटोनिक दर्शन के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा में विलीन होना है। यह लक्ष्य केवल वैराग्य, आत्मचिंतन, सदाचार और आध्यात्मिक साधना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जब आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर लेती है, तब उसे परमानन्द की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाती है। प्लॉटिनस के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व तर्कों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता। ईश्वर को केवल आध्यात्मिक अनुभव, ध्यान, चिंतन और अंतर्दृष्टि के माध्यम से ही जाना जा सकता है। इसलिए उसने भक्ति, प्रेम, सदाचार और आत्मानुशासन को ईश्वर-प्राप्ति के प्रमुख साधन बताया। नियो-प्लेटोनिक मत में धर्म और दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इसमें यूनान के प्लेटोनिक विचार, पर्सिया की आध्यात्मिक परंपराएँ, मिस्र की रहस्यवादी मान्यताएँ तथा भारत की आत्मा-परमात्मा संबंधी धारणाएँ एक साथ समाहित हैं। इसी कारण यह दर्शन रोमन साम्राज्य के उत्तरकाल में अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आगे चलकर ईसाई दर्शन को भी गहराई से प्रभावित किया।
ग्नॉस्टिक मत
रोमन साम्राज्य के उत्तरकाल में यूनानी तथा पौर्वात्य देशों के धार्मिक और दार्शनिक विचारों के संमिश्रण से अनेक नवीन मतों का विकास हुआ। इनमें ग्नॉस्टिक मत अत्यंत प्रसिद्ध था। इस मत का प्रमुख प्रवक्ता क्लेमेंटियस माना जाता है। ‘ग्नॉस्टिक’ शब्द यूनानी भाषा के ‘ग्नोसिस’ से बना है, जिसका अर्थ है—‘ज्ञान’। इस प्रकार ग्नॉस्टिक मत का मूल आधार विशेष आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति था। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित मत नहीं था, बल्कि यूनान, पर्सिया, मिस्र तथा पश्चिमी एशिया की विभिन्न धार्मिक एवं दार्शनिक परंपराओं के समन्वय से विकसित हुआ था।
ग्नॉस्टिक मत का प्रारंभिक स्वरूप पहली शताब्दी ईस्वी में दिखाई देता है, किंतु दूसरी शताब्दी ईस्वी तक आते-आते इसका व्यापक प्रचार-प्रसार हो गया। आगस्टस के काल में इसके बीज अवश्य विद्यमान थे, परंतु उसकी मृत्यु के बाद यह तेजी से फैलने लगा। रोम के अतिरिक्त सीरिया, मिस्र तथा निकट-पूर्व के अन्य प्रदेशों में भी इसके अनुयायी बड़ी संख्या में थे। समय के साथ इसकी अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ विकसित हुईं, जिनके सिद्धांतों में कुछ भिन्नताएँ थीं, किंतु उनका मूल आधार आध्यात्मिक ज्ञान ही था।
ग्नॉस्टिक मत का प्रमुख आधार रहस्यवाद था। इसके अनुयायी यह नहीं मानते थे कि सत्य की प्राप्ति केवल तर्क, बुद्धि अथवा सामान्य ज्ञान के माध्यम से की जा सकती है। उनके अनुसार वास्तविक सत्य अत्यंत गूढ़ और रहस्यमय है, जिसे केवल ईश्वर द्वारा प्रदत्त विशेष आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से ही जाना जा सकता है। वे मानते थे कि सामान्य मनुष्य संसार के बाह्य रूप को ही देख पाता है, जबकि वास्तविक ज्ञान आत्मा के भीतर छिपा रहता है।
ग्नॉस्टिक विचारधारा के अनुसार आत्मा अमर और शाश्वत है, जबकि शरीर नश्वर और बंधनकारी है। वे मानव शरीर की तुलना एक ऐसे पिंजरे से करते थे, जिसमें आत्मा पक्षी के समान कैद रहती है। इस कारण वे सांसारिक विषयों, भौतिक सुखों तथा इन्द्रिय-भोगों से दूर रहने की शिक्षा देते थे। उनका विश्वास था कि आत्मा का वास्तविक लक्ष्य इस भौतिक बंधन से मुक्त होकर ईश्वरीय सत्य की प्राप्ति करना है। इस मत में अनेक धार्मिक संस्कारों, अनुष्ठानों तथा रहस्यपूर्ण क्रियाओं का समावेश किया गया था। इनके माध्यम से साधक आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता था। ग्नॉस्टिक अनुयायी स्वर्ग और नरक के अस्तित्व में विश्वास करते थे तथा यह मानते थे कि मनुष्य के कर्मों के अनुसार उसे मृत्यु के बाद फल प्राप्त होता है। इस प्रकार ग्नॉस्टिक मत ने रहस्यवाद, आत्मा की अमरता तथा आध्यात्मिक ज्ञान की महत्ता पर विशेष बल दिया।


