सल्तनतकालीन वित्त-व्यवस्था (Financial Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन वित्त-व्यवस्था (Financial Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन वित्त-व्यवस्था

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सल्तनतकालीन वित्त-व्यवस्था का आधार इस्लामी कानून (शरीयत), संगठित कर-प्रणाली, दीवान-ए-विजारत तथा कृषि से प्राप्त भू-राजस्व था। राज्य की आय का प्रमुख स्रोत कृषि भूमि से प्राप्त लगान था, जबकि व्यापारिक करों और युद्ध से प्राप्त धन से भी राजकोष को सुदृढ़ किया जाता था। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य शाही सेना का व्यय वहन करना, प्रशासन का संचालन करना तथा राज्य की आर्थिक स्थिरता बनाए रखना था।

सल्तनत काल में खराज सबसे महत्वपूर्ण कर था। यह गैर-मुस्लिम कृषकों से लिया जाने वाला भू-राजस्व था, जो सामान्यतः कृषि उपज का एक-तिहाई से आधा भाग तक होता था। जकात केवल मुसलमानों पर लगाया जाने वाला धार्मिक कर था, जिसका उपयोग निर्धनों, अनाथों तथा अन्य लोककल्याणकारी कार्यों के लिए किया जाता था। जजिया गैर-मुस्लिम प्रजा से उनकी सुरक्षा और संरक्षण के बदले लिया जाने वाला कर था। सामान्यतः महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध तथा कुछ विशेष वर्ग इस कर से मुक्त रहते थे। खुम्स (खम्स) युद्ध में प्राप्त लूट (गनीमत) का पाँचवाँ भाग (1/5) था, जो शाही कोष में जमा किया जाता था, जबकि शेष चार-पाँचवाँ भाग सैनिकों में बाँट दिया जाता था।

भूमि-प्रशासन में खालसा भूमि सीधे सुल्तान के नियंत्रण में रहती थी और उससे प्राप्त समस्त आय शाही खजाने में जमा होती थी। इसके विपरीत, इक्ता भूमि अधिकारियों एवं सैनिकों को वेतन अथवा सेवा के प्रतिफल के रूप में दी जाती थी, जहाँ से वे निर्धारित राजस्व वसूलते थे। इसके अतिरिक्त आयात-निर्यात तथा व्यापारिक गतिविधियों पर भी चुंगी और अन्य कर लगाए जाते थे।

वित्त-प्रशासन का सर्वोच्च विभाग दीवान-ए-विजारत था। इसका प्रमुख वज़ीर राज्य की आय-व्यय व्यवस्था का संचालन करता था। मुशरिफ-ए-मुमालिक महालेखाकार के रूप में आय का लेखा-जोखा रखता था, जबकि मुस्तौफ़ी-ए-मुमालिक लेखा-परीक्षक के रूप में व्यय और खातों की जाँच करता था। इस प्रकार सल्तनतकालीन वित्त-व्यवस्था एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक ढाँचे पर आधारित थी।

कृषि एवं भू-राजस्व व्यवस्था

दिल्ली सल्तनत की वित्तीय व्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि तथा उससे प्राप्त होने वाला भू-राजस्व था। राज्य की अधिकांश आय कृषकों से वसूले जाने वाले लगान पर निर्भर करती थी, जिससे सेना, प्रशासन और शाही दरबार का व्यय पूरा किया जाता था। इस्लामी विधि (शरीयत) के अनुसार कृषि भूमि को सामान्यतः उश्री, सुलही तथा खिराजी भूमि में विभाजित किया गया था। यद्यपि भारतीय परिस्थितियों में इन सभी श्रेणियों का समान रूप से प्रयोग नहीं हुआ, फिर भी सल्तनतकालीन भू-राजस्व व्यवस्था को समझने में इनका विशेष महत्त्व है।

उश्री भूमि वह मानी जाती थी जिस पर अपेक्षाकृत कम कर लगाया जाता था। इसमें अरब की भूमि, इस्लाम स्वीकार करने वाले व्यक्तियों की भूमि, विजय के उपरान्त मुस्लिम सैनिकों में वितरित भूमि, मुस्लिम आबादी के उद्यान तथा इमाम की अनुमति से विकसित परती अथवा बंजर भूमि सम्मिलित थीं। इस भूमि पर सामान्यतः प्राकृतिक सिंचाई होने पर कृषि उत्पादन का दसवाँ भाग (1/10) तथा कृत्रिम सिंचाई होने पर बीसवाँ भाग (1/20) उश्र के रूप में लिया जाता था। कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल में नव-विजित प्रदेशों की कुछ भूमि को उश्री मानकर कर निर्धारण किए जाने का उल्लेख मिलता है। फिरोजशाह तुगलक के अभिलेखों में भी उश्री भूमि का उल्लेख प्राप्त होता है।

सुलही भूमि वह थी जो युद्ध के स्थान पर संधि अथवा समझौते के माध्यम से मुस्लिम राज्य के अधिकार में आई थी। इस भूमि के मूल स्वामियों को खेती करने का अधिकार प्राप्त रहता था, किंतु वे सामान्यतः उसे स्वतंत्र रूप से बेचने या हस्तांतरित करने के अधिकारी नहीं होते थे। समकालीन स्रोतों में इसका उल्लेख अत्यंत कम मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय परिस्थितियों में इसका महत्त्व सीमित था।

भारतीय उपमहाद्वीप में खिराजी भूमि सर्वाधिक प्रचलित थी। यह मुख्यतः उन क्षेत्रों की भूमि थी जहाँ अधिकांश कृषक गैर-मुस्लिम थे और उनसे खिराज अथवा भू-राजस्व वसूला जाता था। तुर्क शासकों ने विजय के उपरांत अधिकांश भूमि स्थानीय कृषकों के अधिकार में रहने दी तथा उनसे नियमित भू-राजस्व प्राप्त किया। यदि कोई हिंदू उश्री भूमि खरीद लेता था, तो वह खिराजी भूमि मानी जाती थी। इसी प्रकार, यदि खिराजी भूमि का स्वामी इस्लाम स्वीकार कर लेता था, तब भी उसकी भूमि की राजस्व-श्रेणी खिराजी ही रहती थी।

कृषि व्यवस्था का विकास

सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था का आधार कृषि थी और अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती थी। सामान्यतः प्रत्येक गाँव में लगभग दो सौ या उससे अधिक लोग रहते थे। प्रत्येक कृषक अपनी भूमि का पृथक रूप से कृषि कार्य करता था; सामूहिक खेती की परंपरा प्रचलित नहीं थी। भूमि का स्वामित्व तथा जोत का आकार भी समान नहीं था। ग्रामीण समाज में खूत, मुकद्दम तथा साधारण कृषकों के बीच स्पष्ट आर्थिक भेद दिखाई देता था। खूत एवं मुकद्दमों के पास अपेक्षाकृत अधिक कृषि भूमि होती थी, जबकि सामान्य कृषकों के पास सीमित जोत होती थी।

कृषि तकनीक मुख्यतः परंपरागत थी। हल, बैलों तथा पारम्परिक कृषि उपकरणों का ही प्रयोग किया जाता था। फिर भी राज्य इस बात का प्रयास करता था कि सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करके कृषि उत्पादन में वृद्धि की जाए। कृषि को राज्य की आय का आधार मानते हुए सिंचाई के साधनों के विकास पर समय-समय पर विशेष ध्यान दिया गया।

सिंचाई के साधनों का विकास

दिल्ली सल्तनत के विभिन्न शासकों ने सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक झीलों, तालाबों, बाँधों तथा नहरों का निर्माण कराया। बंगाल में प्रारंभिक तुर्क विजेताओं ने अनेक बाँधों और तालाबों का निर्माण कराया तथा नदियों के जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया। उद्देश्य यह था कि अधिकाधिक भूमि को कृषि योग्य बनाया जा सके।

इल्तुतमिश के शासनकाल में दिल्ली तथा उसके आसपास जल-संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य हुए। उसने दिल्ली में ईदगाह के समीप तथा नगर के बाहर एक विशाल जलाशय का निर्माण कराया, जिसे हौज-ए-सुल्तानी कहा गया। इसमें यमुना तथा सूरजकुंड से जल लाने की व्यवस्था की गई थी। इसी प्रकार 1232 ई. के लगभग नागौर जनपद के बारीखाड़ नामक स्थान पर एक झील का निर्माण कराया गया तथा बदायूँ में भी जल-संचयन हेतु कुंड निर्मित किए गए।

अलाउद्दीन खिलजी ने भी अनेक तालाबों एवं जलाशयों का निर्माण कराया। उसके शासनकाल में हौज-ए-अलाई (वर्तमान हौज खास) का विस्तार और विकास विशेष उल्लेखनीय है, जिसने दिल्ली क्षेत्र की जल-आपूर्ति और सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।

तुगलक काल में सिंचाई का विस्तार

सिंचाई सुविधाओं के विकास की दृष्टि से तुगलक काल विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के आसपास जल-संरक्षण एवं जल-प्रबंधन के अनेक कार्य कराए। मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली तथा दौलताबाद सहित विभिन्न क्षेत्रों में तालाबों, झीलों और जलाशयों का निर्माण कराया। उसके शासनकाल में दोआब क्षेत्र में पड़े अकाल के समय कुओं एवं तालाबों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे कृषि उत्पादन को पुनर्जीवित किया जा सके।

फिरोजशाह तुगलक ने सिंचाई व्यवस्था के विकास को राज्य नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। उसके शासनकाल में अनेक नहरों, बाँधों, पुलों, जलसेतुओं तथा जलाशयों का निर्माण कराया गया। यमुना, सतलुज तथा घग्घर जैसी नदियों से नहरें निकालकर हरियाणा एवं आसपास के शुष्क क्षेत्रों तक सिंचाई की सुविधा पहुँचाई गई। उसके इन प्रयासों से कृषि योग्य भूमि का विस्तार हुआ, उत्पादन में वृद्धि हुई तथा राज्य की भू-राजस्व आय भी सुदृढ़ हुई। सिंचाई साधनों के विकास के कारण अनेक परती क्षेत्र पुनः कृषि योग्य बनाए गए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्राप्त हुई।

कृषि नीति एवं कृषिभूमि का विस्तार

1206 ई. से 1526 ई. तक दिल्ली सल्तनत के शासकों की कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य कृषि योग्य भूमि का अधिकतम उपयोग करना, बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाना तथा सिंचाई और नई कृषि योग्य भूमि के विकास के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विशेष रूप से दीवान-ए-कोही जैसे विभाग की स्थापना की गई, जिसने विशेषतः मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में कृषि सुधारों का प्रयास किया। बंजर भूमि को मदद-ए-माश (धार्मिक एवं शैक्षणिक अनुदान) के रूप में शेखों, उलमा, विद्वानों तथा धार्मिक संस्थाओं को प्रदान किया जाता था, जिससे वे उसे कृषि योग्य बनाकर उपयोग में ला सकें। अनेक स्थानों पर जंगलों की सफाई कर नई कृषि भूमि तैयार की गई। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप सल्तनत काल के लगभग तीन शताब्दियों में कृषि योग्य क्षेत्र का उल्लेखनीय विस्तार हुआ।

भूमि की प्रमुख श्रेणियाँ

सल्तनत काल की भू-राजस्व व्यवस्था में भूमि को प्रशासनिक दृष्टि से विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया था। इनमें प्रमुख थीं— मदद-ए-माश अथवा इनाम की भूमि, इक्ता भूमि, कृषकों की निजी खेती वाली भूमि तथा खालसा भूमि। मदद-ए-माश के अंतर्गत प्राप्त भूमि के धारक कृषकों से भू-राजस्व प्राप्त कर उसी से अपना निर्वाह करते थे। खालसा भूमि की आय सीधे राज्य को प्राप्त होती थी। इस भूमि से राजस्व वसूल करने के लिए राज्य द्वारा आमिल नियुक्त किए जाते थे, जिनकी सहायता शाहना, मलिक तथा अन्य अधिकारी करते थे। इक्ता क्षेत्रों में राजस्व संग्रह का कार्य इक्तादार के अधीन मुतसर्रिफ, आमिल, कारकुन, मुकद्दम (चौधरी) तथा अन्य स्थानीय अधिकारी सम्पन्न करते थे।

अलाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार

अलाउद्दीन खिलजी ने भू-राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार किए। उसने मिल्क, इनाम और वक्फ के रूप में दी गई अनेक भूमियों को पुनः खालसा में सम्मिलित कर राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया। उसने भूमि की व्यवस्थित पैमाइश कराने का आदेश दिया तथा बिस्वा को माप की इकाई के रूप में अपनाकर प्रत्येक खेत की उपज का आकलन कराया। इस आधार पर कुल उत्पादन का आधा भाग (50 प्रतिशत) भू-राजस्व के रूप में निर्धारित किया गया, जो विशेषतः दोआब और दिल्ली क्षेत्र में प्रभावी था। इन क्षेत्रों में अधिकांश राजस्व अनाज के रूप में वसूला जाता था, जबकि दूरस्थ प्रांतों में प्रायः नकद वसूली की जाती थी।

भू-राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से गृह कर (घरी) तथा चराई कर (चराई) भी लिया जाता था। गैर-मुस्लिम कृषकों पर जजिया भी लगाया जाता था, यद्यपि वह धार्मिक कर था और भू-राजस्व का भाग नहीं माना जाता था।

राजस्व प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए अलाउद्दीन ने दीवान-ए-वजारत का पुनर्गठन किया तथा वजीर की सहायता के लिए नायब-ए-वजीर, मुशरिफ-ए-ममालिक और मुस्तौफी-ए-ममालिक जैसे अधिकारियों की नियुक्ति की। परगनों में आमिल, मुशरिफ, मुहस्सिल, गुमाश्ता, सरहंग आदि अधिकारियों के माध्यम से राजस्व वसूली की जाती थी। लेखा-जोखा में अनियमितता पाए जाने पर अधिकारियों को कठोर दंड दिया जाता था। बकाया भू-राजस्व की वसूली के लिए उसने दीवान-ए-मुस्तखराज नामक पृथक विभाग की स्थापना भी की।

गयासुद्दीन तुगलक की भू-राजस्व नीति

गयासुद्दीन तुगलक ने भी भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए। उसके शासनकाल में सामान्यतः भू-राजस्व की दर कुल उत्पादन का लगभग एक-तिहाई से एक-चौथाई के बीच मानी जाती है, यद्यपि विभिन्न स्रोतों में इसमें कुछ भिन्नता मिलती है। उसने अलाउद्दीन की कठोर पैमाइश प्रणाली के स्थान पर बटाई (उपज के बँटवारे) की व्यवस्था को अधिक महत्त्व दिया। उसने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि कृषकों पर अत्यधिक कर न लगाया जाए तथा उनकी आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जाए। साथ ही इक्तादारों और प्रांतीय अधिकारियों को राजस्व वसूली में संयम बरतने तथा निर्धारित सीमा से अधिक वृद्धि न करने के आदेश दिए। उसकी नीति का उद्देश्य कृषकों के हितों की रक्षा करना तथा कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखना था।

मुहम्मद बिन तुगलक की भू-राजस्व व्यवस्था

मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351 ई.) के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत का विस्तार उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक हो गया था। इतने विशाल साम्राज्य में एक समान भू-राजस्व व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए उसने विभिन्न क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग राजस्व व्यवस्थाएँ अपनाईं। कुछ प्रांतों में दोआब के समान प्रत्यक्ष भू-राजस्व प्रणाली लागू की गई, जबकि अन्य क्षेत्रों में भू-राजस्व की वसूली ठेकेदारों अथवा स्थानीय अधिकारियों के माध्यम से कराई गई। जिन प्रांतों में ठेका प्रणाली लागू थी, वहाँ सामान्यतः कुल उत्पादन का लगभग एक-चौथाई या एक-पाँचवाँ भाग भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।

दोआब में कर-वृद्धि और उसके परिणाम

मुहम्मद बिन तुगलक की सबसे विवादास्पद नीति गंगा-यमुना दोआब में लागू की गई। इस उपजाऊ क्षेत्र में उसने भू-राजस्व की दर में उल्लेखनीय वृद्धि कर दी तथा अनेक अतिरिक्त कर भी लगा दिए। समकालीन इतिहासकारों के अनुसार यह वृद्धि लगभग 10 से 20 प्रतिशत तक थी। दुर्भाग्यवश, इसी समय दोआब भीषण अकाल की चपेट में आ गया, जिससे कृषि उत्पादन अत्यंत घट गया। ऐसी परिस्थितियों में बढ़े हुए करों की कठोर वसूली ने किसानों की आर्थिक स्थिति को अत्यंत दयनीय बना दिया।

राजस्व अधिकारियों द्वारा कठोरता से कर वसूले जाने के कारण किसानों में व्यापक असन्तोष फैल गया और अनेक स्थानों पर विद्रोह प्रारंभ हो गए। लगातार दो वर्षों तक दोआब का बड़ा भाग अकाल, करों की अधिकता तथा अधिकारियों के अत्याचारों के कारण उजड़ गया। इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक की दोआब संबंधी राजस्व नीति उसके शासन की सबसे बड़ी प्रशासनिक त्रुटियों में गिनी जाती है।

कृषकों के पुनर्वास के प्रयास

जब सुल्तान को अपनी नीति की विफलता का अनुभव हुआ, तब उसने किसानों के पुनर्वास और कृषि के पुनर्जीवन का प्रयास किया। कृषकों को ऋण प्रदान किए गए ताकि वे कुएँ खुदवा सकें, हल-बैल खरीद सकें, बीज प्राप्त कर सकें तथा पुनः खेती प्रारंभ कर सकें। समकालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के अनुसार इस उद्देश्य के लिए लगभग सत्तर लाख टंका वितरित किए गए, जबकि शम्स-ए-सिराज अफीफ ने यह राशि लगभग तीन करोड़ टंका बताई है। यद्यपि राज्य द्वारा पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदान की गई, फिर भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। अधिकांश किसानों ने इस धन का उपयोग तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति में कर लिया और कृषि उत्पादन को शीघ्र पुनर्स्थापित नहीं किया जा सका। परिणामस्वरूप दोआब की स्थिति में तत्काल सुधार नहीं आया। अंततः सुल्तान ने पुनः कठोर नीति अपनाई और अनेक स्थानों पर विद्रोहियों तथा कर न देने वालों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही कराई।

फिरोजशाह तुगलक

1351 ई. में फिरोजशाह तुगलक के गद्दी पर बैठने के समय सल्तनत की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी। दोआब का क्षेत्र अभी तक पूर्णतः पुनर्जीवित नहीं हो पाया था, राजकोष लगभग रिक्त था, अनेक प्रांतों में दुर्भिक्ष की स्थिति बनी हुई थी तथा किसान करों के बोझ और प्रशासनिक कठोरता से पीड़ित थे। शासन और कृषकों के मध्य विश्वास का संकट भी विद्यमान था। ऐसी परिस्थितियों में फिरोजशाह ने अपेक्षाकृत उदार एवं व्यावहारिक भू-राजस्व नीति अपनाई।

भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार

फिरोजशाह तुगलक ने प्रांतों में योग्य एवं विश्वसनीय मुक्ताओं (इक्तादारों) तथा वलियों की नियुक्ति की और उन्हें भू-राजस्व व्यवस्था के संचालन का दायित्व सौंपा। उसने गयासुद्दीन तुगलक की नीति का अनुसरण करते हुए ठेकेदारों तथा कर-वृद्धि से लाभ उठाने वाले अधिकारियों के हस्तक्षेप को सीमित किया। साथ ही, प्रांतीय अधिकारियों को प्रशासनिक कार्यों में कुछ व्यावहारिक छूट भी प्रदान की।

पूर्ववर्ती परंपरा के अनुसार प्रांतीय अधिकारी दरबार में सुल्तान के लिए बहुमूल्य उपहार लेकर आते थे। इन उपहारों का मूल्य प्रांतीय आय से वसूल किया जाता था, जिसका भार अंततः किसानों पर पड़ता था। फिरोजशाह ने इस व्यवस्था में सुधार करते हुए आदेश दिया कि दरबार में प्रस्तुत प्रत्येक उपहार का मूल्य निर्धारित किया जाए तथा उतनी राशि संबंधित प्रांत के राजस्व लेखे से समायोजित कर दी जाए। इससे अधिकारियों द्वारा किसानों का अतिरिक्त शोषण काफी सीमा तक रुक गया। साथ ही, मुक्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे किसानों के साथ नम्र और न्यायपूर्ण व्यवहार करें।

सिंचाई एवं कृषि विकास की नीति

फिरोजशाह तुगलक ने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई के साधनों के विकास पर विशेष बल दिया। उसके शासनकाल में अनेक नहरों, बाँधों तथा जलाशयों का निर्माण कराया गया, जिससे बड़ी मात्रा में भूमि सिंचित होने लगी। अधिकारियों के उदार व्यवहार तथा सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के परिणामस्वरूप कृषि का पुनरुत्थान हुआ, खेती योग्य भूमि का विस्तार हुआ और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

फिरोजशाह की भू-राजस्व नीति

दिल्ली तथा दोआब के क्षेत्रों में फिरोजशाह ने भू-राजस्व की दर कुल उत्पादन का लगभग एक-चौथाई निर्धारित की, जो अपेक्षाकृत संतुलित मानी जाती है। उसने किसानों पर लगाए गए अनेक अतिरिक्त उपकरों (अबवाब) को समाप्त कर दिया, जिससे कृषकों को पर्याप्त राहत मिली। हालांकि, जिन क्षेत्रों में राज्य द्वारा निर्मित नहरों से सिंचाई की जाती थी, वहाँ उसने सिंचाई सुविधा के बदले हक़-ए-शर्ब (सिंचाई कर) के रूप में कुल उत्पादन का लगभग एक-दसवाँ भाग वसूल किया।

इस प्रकार फिरोजशाह तुगलक की भू-राजस्व नीति अपेक्षाकृत उदार, व्यावहारिक तथा कृषक-हितैषी थी। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, अतिरिक्त करों के उन्मूलन तथा प्रशासनिक सुधारों के कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई, खेती का विस्तार हुआ और सल्तनत की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया।

सैय्यद काल की भू-राजस्व व्यवस्था

पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली सल्तनत का शासन फिरोजशाह तुगलक के उत्तराधिकारियों तथा सैय्यद वंश के शासकों के हाथों में रहा। इस काल में आंतरिक विद्रोहों, तैमूर के आक्रमण तथा प्रांतीय स्वायत्तता के कारण सल्तनत की सीमाएँ अत्यधिक सिकुड़ गईं। अनेक प्रांतीय शासक व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गए और स्थानीय हिंदू जमींदारों की शक्ति भी निरंतर बढ़ती गई। सैय्यद शासकों को सीमित संसाधनों के बल पर साम्राज्य को संगठित रखने का प्रयास करना पड़ा। इस काल में सामान्यतः भू-राजस्व की दर कुल कृषि उत्पादन का लगभग एक-चौथाई (1/4) बनी रही।

लोदी काल में भू-राजस्व नीति

लोदी वंश की स्थापना के साथ राजनीतिक स्थिरता में कुछ सुधार हुआ। बहलोल लोदी ने अनेक क्षेत्रों में भू-राजस्व की वसूली अनाज के रूप में कराना प्रारंभ किया, जिससे राज्य को प्रत्यक्ष रूप से खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। उसके उत्तराधिकारी सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी ने प्रशासनिक सुविधा और मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से पुनः अधिकांश क्षेत्रों में भू-राजस्व की नकद वसूली को बढ़ावा दिया।

फरीद (शेरशाह) के प्रारंभिक सुधार

इब्राहीम लोदी के शासनकाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में हसन सूर के पुत्र फरीद (भावी शेरशाह सूरी) ने अपने पिता की जागीर के प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भू-राजस्व सुधार किए। उसने तत्कालीन प्रचलित बटाई तथा कनकूत जैसी प्रणालियों को व्यवहार में बनाए रखा, परन्तु उन्हें अधिक व्यवस्थित रूप प्रदान किया। स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि वे किसानों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें तथा उनके हितों की रक्षा करें।

फरीद ने कृषकों और राज्य के मध्य प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। प्रत्येक कृषक को उसकी भूमि के संबंध में पट्टा दिया जाता था, जिसमें भूमि का क्षेत्रफल, स्वामित्व अथवा जोत का विवरण तथा देय भू-राजस्व का उल्लेख रहता था। इसके बदले कृषक कबूलियत के माध्यम से निर्धारित कर के भुगतान की स्वीकृति देता था। इस व्यवस्था से स्थानीय अधिकारियों की मनमानी पर नियंत्रण स्थापित हुआ तथा किसानों को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त हुआ।

भूमि मापन एवं वर्गीकरण

फरीद ने भूमि की नियमित पैमाइश कराने, उसकी उर्वरता के आधार पर वर्गीकरण करने तथा विभिन्न श्रेणियों की भूमि की औसत उपज का आकलन कर उसके अनुसार भू-राजस्व निर्धारित करने की व्यवस्था को आगे बढ़ाया। इस नीति का उद्देश्य एक ओर राज्य की आय में वृद्धि करना था, तो दूसरी ओर किसानों के अनावश्यक शोषण को रोकना भी था। यही सिद्धांत आगे चलकर शेरशाह सूरी तथा मुगल सम्राट अकबर की राजस्व व्यवस्था की आधारशिला बने।

सल्तनतकालीन राजस्व की मात्रा

1206 ई. से 1526 ई. तक दिल्ली सल्तनत की सीमाएँ निरंतर परिवर्तित होती रहीं। फलस्वरूप संपूर्ण साम्राज्य की वार्षिक आय का निश्चित अनुमान प्रस्तुत करना कठिन है। समकालीन इतिहासकारों ने भी समग्र राजस्व का व्यवस्थित विवरण नहीं दिया है। शम्स-ए-सिराज अफीफ के अनुसार फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में साम्राज्य की कुल वार्षिक आय लगभग छः करोड़ पचहत्तर लाख टंका थी। इनमें से केवल दोआब क्षेत्र से लगभग चालीस लाख टंका की आय प्राप्त होती थी। इसके अतिरिक्त अधीनस्थ राज्यों से लगभग एक लाख अस्सी हजार टंका वार्षिक कर एवं भेंट के रूप में प्राप्त होते थे।

राज्य की आय के अन्य स्रोत

भू-राजस्व के अतिरिक्त दिल्ली सल्तनत की आय के अनेक अन्य स्रोत भी थे। अधीनस्थ हिंदू राजाओं, राणाओं, रावतों, जमींदारों तथा अर्द्धस्वतंत्र राज्यों से नियमित कर एवं भेंट प्राप्त होती थी। विदेशी दूतों द्वारा प्रस्तुत उपहार, विजित प्रदेशों से प्राप्त धन-संपत्ति तथा युद्धों में अर्जित लूट भी राजकोष की आय के महत्त्वपूर्ण साधन थे।

इस्लामी विधि (शरीअत) के अनुसार राज्य को मुख्यतः खिराज (भू-राजस्व), जज़िया, ज़कात और खुम्स वसूल करने का अधिकार था। इसके अतिरिक्त तरकात (लावारिस संपत्ति की जब्ती) भी आय का एक स्रोत था। हनफ़ी विधिवेत्ताओं का मत था कि गैर-मुस्लिम प्रजा से राज्य को अधिकाधिक कर प्राप्त करना चाहिए, किंतु व्यवहार में अधिकांश सुल्तानों ने प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार कर-व्यवस्था अपनाई।

अलाउद्दीन खिलजी की कर-व्यवस्था

अलाउद्दीन खिलजी ने वित्तीय संसाधनों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से भू-राजस्व की दर बढ़ाकर अनेक क्षेत्रों में कुल उत्पादन का लगभग आधा (1/2) कर दिया। इसके अतिरिक्त उसने गृह-कर (घरी) तथा चराई-कर (चराई) भी लगाया। कर निर्धारण में उसने धार्मिक वर्ग (उलमा) की सलाह को अनिवार्य नहीं माना और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लिए।

इस काल में विभिन्न प्रकार के व्यापारिक, बाजार तथा व्यवसायिक कर भी प्रचलित थे। इनमें बाजार शुल्क, दलाली कर, कसाइयों पर कर, सुगंधित पदार्थों पर कर, पान पर कर, खाद्यान्नों पर चुंगी, नील, रेशम, घी, सब्जियों, साबुन, मछली, रुई, दुकानों तथा अन्य व्यापारिक गतिविधियों पर लगाए जाने वाले कर सम्मिलित थे। इनसे राज्य को पर्याप्त आय प्राप्त होती थी।

फिरोजशाह तुगलक द्वारा करों का उन्मूलन

फिरोजशाह तुगलक ने सिंहासन पर बैठने के पश्चात उन अनेक करों को समाप्त कर दिया जिन्हें वह शरीअत के सिद्धान्तों के प्रतिकूल मानता था। फुतूहात-ए-फिरोजशाही तथा सीरत-ए-फिरोजशाही से ज्ञात होता है कि उसने लगभग तेईस अतिरिक्त करों का उन्मूलन किया। उसका उद्देश्य कर-व्यवस्था को सरल बनाना तथा धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप सीमित कर प्रणाली लागू करना था। उसने कराधान में अपेक्षाकृत समानता और न्याय के सिद्धांत पर बल दिया।

सीमा शुल्क एवं व्यापारिक आय

सल्तनतकाल में सीमा शुल्क भी राज्य की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत था। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता के अनुसार जब वह मुल्तान पहुँचा, तब उसके सामान पर लगभग 25 प्रतिशत सीमा शुल्क तथा प्रत्येक घोड़े पर सात दीनार शुल्क लिया गया। बाद में मुहम्मद बिन तुगलक ने व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अनेक सीमा शुल्कों में कमी की तथा कुछ शुल्क समाप्त भी कर दिए।

खुम्स (युद्ध-लाभ का कर)

इस्लामी परंपरा के अनुसार युद्ध में प्राप्त लूट की संपत्ति का एक-पाँचवाँ (1/5) भाग राज्य अथवा बैतुलमाल के लिए सुरक्षित रखा जाता था तथा शेष चार-पाँचवाँ (4/5) भाग सैनिकों में बाँट दिया जाता था। प्रारंभिक मुस्लिम विधिवेत्ता इसी व्यवस्था का समर्थन करते थे। अलाउद्दीन खिलजी ने इस परंपरा में परिवर्तन करते हुए युद्ध-लाभ का चार-पाँचवाँ भाग राजकोष में जमा करना प्रारंभ किया तथा केवल एक-पाँचवाँ भाग सैनिकों में वितरित कराया। मुहम्मद बिन तुगलक ने भी इसी नीति का अनुसरण किया। इसके विपरीत फिरोजशाह तुगलक ने पुनः शरीअत के मूल सिद्धांत को स्वीकार करते हुए एक-पाँचवाँ भाग राज्य के लिए तथा शेष चार-पाँचवाँ भाग सैनिकों में वितरित करने की व्यवस्था पुनः लागू कर दी।

सल्तनतकालीन कर-व्यवस्था एवं मुद्रा-प्रणाली

करों का स्वरूप

इस्लामी विधिवेत्ताओं के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य की आय के दो प्रमुख आधार होते थे—धार्मिक कर तथा लौकिक (सांसारिक) कर। धार्मिक कर केवल मुसलमानों से ही वसूल किए जाते थे, जबकि लौकिक करों का क्षेत्र व्यापक था। दिल्ली सल्तनत में धार्मिक करों में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘ज़कात’ था। ज़कात का मूल उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना तथा संपन्न मुसलमानों को निर्धनों, अनाथों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए प्रेरित करना था। इसे धार्मिक कर्तव्य माना जाता था और इसके संग्रह एवं वितरण की व्यवस्था राज्य के संरक्षण में की जाती थी।

ज़कात केवल उसी मुसलमान से लिया जाता था, जिसकी संपत्ति या आय निर्धारित न्यूनतम सीमा (निसाब) से अधिक हो तथा वह संपत्ति कम-से-कम एक वर्ष तक उसके स्वामित्व में रही हो। सामान्यतः सोना, चाँदी, व्यापारिक वस्तुएँ, पशुधन तथा अन्य चल-अचल संपत्तियाँ ज़कात के अंतर्गत आती थीं। इसकी सामान्य दर कुल संपत्ति का 1/40 (2.5 प्रतिशत) निर्धारित थी। दिल्ली सल्तनत के अधिकांश सुल्तानों ने ज़कात की व्यवस्था को बनाए रखा। ‘फ़िक़्ह-ए-फ़िरोज़शाही’ से ज्ञात होता है कि ज़कात के लिए पृथक राजकोष की व्यवस्था थी, जिसमें इस कर से प्राप्त धन जमा किया जाता था। सिकंदर लोदी ने खाद्यान्न की कमी के समय अनाज पर ज़कात समाप्त कर दी, किंतु भूमि, व्यापारिक संपत्ति तथा आयातित वस्तुओं पर मुसलमानों से ज़कात की वसूली जारी रही।

जज़िया : गैर-मुसलमानों पर लगाया जाने वाला कर

सल्तनतकालीन कर-व्यवस्था में जज़िया एक महत्त्वपूर्ण लौकिक कर था, जो केवल गैर-मुसलमान प्रजाजनों से लिया जाता था। यह कर उन व्यक्तियों पर लगाया जाता था, जो राज्य की सैनिक सेवा में सम्मिलित नहीं थे। इसके पीछे यह सिद्धांत था कि जो लोग सैन्य सेवा नहीं करते, वे राज्य की सुरक्षा के बदले यह कर अदा करें।

जज़िया से वृद्ध, विकलांग, अंधे, अत्यंत निर्धन, असहाय, साधु-संत, फकीर, पुरोहित तथा धार्मिक साधना में संलग्न व्यक्तियों को सामान्यतः छूट प्राप्त थी। इस्लामी परंपरा में इसकी दर आर्थिक स्थिति के अनुसार निर्धारित थी—निम्न वर्ग से एक दीनार, मध्यम वर्ग से दो दीनार तथा संपन्न वर्ग से तीन दीनार प्रतिवर्ष। दिल्ली सल्तनत में यह कर क्रमशः लगभग 10, 20 और 40 टंका प्रतिवर्ष की दर से वसूल किया जाता था।

फ़िरोज़शाह तुगलक से पूर्व ब्राह्मण सामान्यतः जज़िया से मुक्त थे। किंतु फ़िरोज़शाह ने उलेमा की सलाह पर ब्राह्मणों को भी इस कर के दायरे में सम्मिलित किया। इससे व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ। अंततः दिल्ली के संपन्न हिंदुओं ने अनेक ब्राह्मणों की ओर से जज़िया देने का दायित्व स्वीकार किया, जिसके बाद फ़िरोज़शाह ने ब्राह्मणों के लिए इसकी दर घटाकर लगभग 10 टंका कर दी। यद्यपि इस नीति का विरोध हुआ, फिर भी सल्तनतकाल में जज़िया का नियमित संग्रह होता रहा।

व्यापारिक कर एवं आयात-शुल्क

सल्तनतकाल में विदेशी तथा आंतरिक व्यापार से भी राज्य को पर्याप्त आय प्राप्त होती थी। आयातित वस्तुओं पर ज़कात अथवा सीमा-शुल्क लगाया जाता था। मुसलमान व्यापारियों से सामान्यतः आयातित वस्तुओं के मूल्य का 2.5 प्रतिशत तथा घोड़ों पर लगभग 5 प्रतिशत शुल्क लिया जाता था, जबकि गैर-मुसलमान व्यापारियों से कई परिस्थितियों में इससे अधिक दर पर कर वसूला जाता था।

इब्न बतूता के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक के शासन के प्रारंभिक वर्षों में कुछ वस्तुओं पर सीमा-शुल्क अपेक्षाकृत अधिक था, किंतु बाद में व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इसमें कमी कर दी गई। विभिन्न कालों में दनगानह जैसे व्यापारिक शुल्क भी लिए जाते थे, जिन्हें फ़िरोज़शाह तुगलक ने समाप्त कर दिया। बिक्री के लिए लाई गई वस्तुओं का मूल्यांकन पहले सराय-ए-अदल में किया जाता था, जहाँ से उन्हें अन्य बाजारों में भेजा जाता था। वहाँ निर्धारित दर के अनुसार बिक्री कर अथवा शुल्क वसूला जाता था।

अन्य राजस्व स्रोत

भू-राजस्व, जज़िया और ज़कात के अतिरिक्त राज्य को अनेक अन्य स्रोतों से भी आय प्राप्त होती थी। खानों से प्राप्त सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, सीसा तथा अभ्रक जैसी खनिज संपत्तियों पर कर लगाया जाता था। लावारिस संपत्ति (तरकात) पर भी राज्य का अधिकार होता था और वह राजकोष में सम्मिलित कर ली जाती थी। गड़े हुए खजानों की प्राप्ति पर भी राज्य कर वसूल करता था।

फ़िरोज़शाह तुगलक ने सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ ‘हक़्क़-ए-शर्ब’ (सिंचाई कर) लगाया। जिन कृषकों की भूमि राज्य द्वारा निर्मित नहरों से सिंचित होती थी, उनसे कुल उत्पादन का लगभग दसवाँ भाग (1/10) इस कर के रूप में लिया जाता था। इस कर से प्राप्त आय राजकोष के स्थान पर सुल्तान के निजी कोष में जमा होती थी।

फ़िरोज़शाह के समय ‘जज़ारी’ नामक कर भी लिया जाता था, जो कसाइयों से प्रति गाय के वध पर वसूल किया जाता था। इसका उद्देश्य संभवतः दुग्ध देने वाले पशुओं की रक्षा करना था। नई राजधानी फ़िरोज़ाबाद के निर्माण के समय व्यापारियों से बैलों द्वारा निर्माण सामग्री ढुलवाने जैसी बेगार भी ली जाती थी। कुछ इतिहासकार इसे ‘दूरी’ नामक कर अथवा श्रम-दायित्व से जोड़ते हैं। दिल्ली में मकानों और दुकानों के किराए पर ‘मुस्तग़िल्ल’ नामक कर लगाया जाता था, जिससे राज्य को पर्याप्त आय प्राप्त होती थी। इन करों के अतिरिक्त भी अनेक स्थानीय उपकर समय-समय पर प्रचलित रहे, जिनसे राज्य को आय होती थी।

सल्तनतकालीन मुद्रा-प्रणाली

दिल्ली सल्तनत के आर्थिक जीवन में मुद्रा-प्रणाली का विशेष महत्त्व था। प्रारंभिक काल में वस्तु-विनिमय की प्रथा प्रचलित थी, किंतु व्यापार और शहरीकरण के विकास के साथ मुद्रा का उपयोग निरंतर बढ़ता गया। करों का भुगतान, व्यापारिक लेन-देन तथा सैनिकों का वेतन क्रमशः मुद्रा में दिया जाने लगा।

सल्तनतकाल में मुख्यतः सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के प्रचलित थे। इल्तुतमिश ने सुव्यवस्थित मुद्रा-प्रणाली की स्थापना की। उसके द्वारा जारी चाँदी का सिक्का ‘टंका’ तथा ताँबे का सिक्का ‘जीतल’ अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आगे के अधिकांश सुल्तानों ने भी इन्हीं मानकों को अपनाया। सोने के सिक्कों का भी सीमित प्रचलन था।

तुगलक सुल्तानों की मुद्रा-नीति

मुहम्मद बिन तुगलक ने वित्तीय प्रयोगों के अंतर्गत ताँबे की सांकेतिक मुद्रा (टोकन करेंसी) चलाने का प्रयास किया। इन सिक्कों को प्रायः ‘अदली’ कहा जाता था। पर्याप्त नियंत्रण एवं सुरक्षा के अभाव में इनकी व्यापक नक़ल होने लगी, जिसके कारण यह प्रयोग असफल हो गया। उसने विभिन्न भारमान वाले चाँदी के सिक्के भी जारी किए, जिनका उपयोग छोटे लेन-देन में किया जाता था।

फ़िरोज़शाह तुगलक ने भी चाँदी के विभिन्न भारमान वाले सिक्के जारी किए तथा आधे और चौथाई जीतल मूल्य के सिक्कों को भी चलाया। उसके शासनकाल में छोटे मूल्यवर्ग के सिक्कों का उपयोग बढ़ा, जिससे दैनिक व्यापारिक लेन-देन में सुविधा हुई।

लोदी काल की मुद्रा एवं टकसालें

लोदी काल में बहलोल लोदी ने जीतल के स्थान पर ‘बहलोली’ नामक सिक्का प्रचलित किया, जो लोदी टंका का लगभग एक-चौथाई मूल्य का था। इस प्रकार सल्तनतकाल में टंका, जीतल, दीनार, दिरहम, अदली, बहलोली तथा अन्य मूल्यवर्ग के सिक्कों का प्रचलन रहा। इन सिक्कों का निर्माण राज्य नियंत्रित शाही टकसालों में किया जाता था। दिल्ली के अतिरिक्त लखनौती, देवगिरि (दौलताबाद), सतगाँव, धार, तुगलकपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर तथा आगरा जैसे प्रमुख नगरों में भी टकसालें स्थापित थीं। इन टकसालों द्वारा जारी मानक सिक्कों ने सल्तनतकालीन व्यापार, राजस्व-संग्रह तथा प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

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