सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था (Military Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था (Military Administration during the Delhi Sultanate)

सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था

दिल्ली सल्तनत की शासन-व्यवस्था का सबसे सशक्त आधार उसकी संगठित, अनुशासित और प्रशिक्षित सेना थी। मध्यकालीन परिस्थितियों में सुल्तान की शक्ति, प्रतिष्ठा तथा साम्राज्य की स्थिरता मुख्यतः उसकी सैन्य शक्ति पर निर्भर करती थी। एक सुदृढ़ सेना के बिना न तो नए प्रदेशों पर विजय प्राप्त की जा सकती थी और न ही विशाल साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा जा सकता था। साम्राज्य को बाह्य आक्रमणों के साथ-साथ आंतरिक विद्रोहों का भी निरंतर सामना करना पड़ता था। विशेषतः मंगोल आक्रमणों के निरंतर भय ने सल्तनतकालीन सेना के महत्त्व को और अधिक बढ़ा दिया। यही कारण था कि शासन, प्रशासन, कर-संग्रह, कानून-व्यवस्था तथा उत्तराधिकार जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों में भी सेना की निर्णायक भूमिका रहती थी। इस दृष्टि से दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप काफी हद तक सैन्य-प्रधान था।

सुल्तान : सर्वोच्च सेनानायक

सल्तनतकालीन सैन्य व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं सुल्तान होता था। वह राज्य का प्रधान सेनानायक था तथा सेना के संगठन, संचालन और युद्धनीति का अंतिम उत्तरदायित्व उसी पर होता था। अधिकांश सुल्तान कुशल योद्धा एवं अनुभवी सेनापति थे, जो स्वयं युद्ध अभियानों का नेतृत्व करते थे। सेना की संख्या, प्रशिक्षण, शस्त्र-सज्जा तथा अनुशासन पर उनका विशेष ध्यान रहता था। सल्तनत की सेना में देशी तथा विदेशी दोनों प्रकार के सैनिक सम्मिलित थे, जिनके संगठन एवं प्रशासन के लिए एक पृथक सैन्य विभाग की स्थापना की गई थी।

दीवान-ए-आरिज एवं आरिज-ए-ममालिक

सेना के प्रशासन का प्रमुख विभाग दीवान-ए-आरिज कहलाता था तथा उसका अध्यक्ष आरिज-ए-ममालिक होता था। यह अधिकारी सैनिक संगठन, भर्ती, प्रशिक्षण, अनुशासन तथा प्रशासन का प्रधान उत्तरदायी था। सैनिकों की भर्ती उनकी शारीरिक क्षमता, युद्ध-कौशल, अनुभव तथा दक्षता के आधार पर की जाती थी। आरिज-ए-ममालिक सैनिकों का नियमित निरीक्षण करता था तथा वर्ष में कम-से-कम एक बार सैनिकों, उनके घोड़ों और अस्त्र-शस्त्रों की जाँच अवश्य कराता था।

सैनिकों की पदोन्नति, पदावनति तथा वेतन निर्धारण का अधिकार भी उसी के पास था। वह नकद वेतन अथवा भूमि के रूप में दिए जाने वाले पारिश्रमिक की व्यवस्था का अनुमोदन करता था। युद्ध की तैयारी, अभियानों के लिए सैनिकों का चयन, रसद एवं सैन्य सामग्री की व्यवस्था तथा सेना की युद्ध-तत्परता बनाए रखना भी उसके प्रमुख दायित्वों में सम्मिलित था। किसी बड़े सैन्य अभियान में वह प्रायः स्वयं भाग लेता था और यदि किसी कारणवश उपस्थित न हो सके तो अपने नायब को भेजता था।

सैन्य प्रशासन एवं निरीक्षण व्यवस्था

आरिज-ए-ममालिक युद्ध अभियानों के लिए आवश्यक बोझा ढोने वाले पशुओं, सैन्य सामग्री तथा रसद की व्यवस्था भी करता था। युद्ध समाप्त होने के बाद प्राप्त लूट की संपत्ति को एकत्र कर सेनापति की उपस्थिति में उसका विधिवत वितरण कराया जाता था। इन विविध उत्तरदायित्वों के कारण उसके अधीन अनेक सहायक अधिकारी एवं कर्मचारी नियुक्त रहते थे, जो सैन्य अभिलेख, वेतन तथा निरीक्षण संबंधी कार्यों का संचालन करते थे।

हलिया एवं दाग प्रथा

सल्तनतकालीन सैन्य प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सैनिकों और घोड़ों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण था। दीवान-ए-आरिज प्रत्येक सैनिक का हलिया (हुलिया) अर्थात् उसका विस्तृत शारीरिक विवरण सुरक्षित रखता था, जिससे वेतन वितरण में किसी प्रकार की धोखाधड़ी न हो।

अलाउद्दीन खिलजी ने सेना में अनुशासन स्थापित करने के उद्देश्य से दाग (घोड़ों पर सरकारी चिन्ह अंकित करना) तथा हलिया प्रणाली को व्यवस्थित रूप से लागू किया। दाग प्रणाली के अंतर्गत सैनिकों के घोड़ों पर शाही चिन्ह अंकित किया जाता था, जिससे निरीक्षण के समय किसी अन्य घोड़े को प्रस्तुत करने की संभावना समाप्त हो जाती थी। इसी प्रकार सैनिकों के व्यक्तिगत विवरण दर्ज होने से वेतन में होने वाली अनियमितताओं पर भी नियंत्रण स्थापित हुआ।

इसके विपरीत, फिरोजशाह तुगलक ने दाग तथा हलिया प्रणाली को समाप्त कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप सेना में अनुशासन शिथिल हुआ तथा सैन्य दक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। बाद में सिकंदर लोदी ने पुनः हलिया व्यवस्था पर विशेष बल दिया, ताकि वास्तविक सैनिकों की पहचान सुनिश्चित हो सके तथा वेतन वितरण में किसी प्रकार की धोखाधड़ी न हो।

सेना का संगठन

सल्तनत की सेना केवल राजधानी तक सीमित नहीं थी। साम्राज्य के विभिन्न सामरिक केंद्रों, सीमावर्ती क्षेत्रों तथा दुर्गों में सैनिक टुकड़ियाँ नियुक्त रहती थीं। इनका प्रमुख दायित्व विद्रोहों का दमन करना, सीमाओं की सुरक्षा करना तथा स्थानीय प्रशासन को आवश्यक सैन्य सहायता प्रदान करना था। यदि किसी क्षेत्र में विद्रोह स्थानीय सेना के नियंत्रण से बाहर हो जाता था, तो निकटवर्ती क्षेत्रों से अतिरिक्त सेना भेजी जाती थी। आवश्यकता पड़ने पर राजधानी से भी सैनिक सहायता उपलब्ध कराई जाती थी।

राजधानी एवं प्रांतीय सेना

राजधानी दिल्ली में सामान्यतः दो प्रकार की सेनाएँ रहती थीं। पहली श्रेणी में शाही दास, जानदार (अंगरक्षक) तथा सुल्तान के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहने वाले विशिष्ट सैनिक सम्मिलित थे। दूसरी श्रेणी में मंत्रियों तथा उच्च अमीरों के अधीन रहने वाली सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जो आवश्यकता पड़ने पर सुल्तान की सेवा में उपस्थित होती थीं। इन दोनों वर्गों से मिलकर राजधानी की मुख्य सेना का गठन होता था, जिसे हश्म-ए-कल्ब कहा जाता था।

इसके अतिरिक्त सल्तनत की विशाल सेना का बड़ा भाग विभिन्न प्रांतों में नियुक्त रहता था। इन प्रांतीय सैनिक टुकड़ियों को हश्म-ए-अतराफ कहा जाता था। इनका कार्य अपने-अपने क्षेत्रों में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना, विद्रोहों का दमन करना तथा आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय सेना की सहायता करना था। उत्तर-पश्चिमी सीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में प्रायः राजकुमारों अथवा अनुभवी सेनानायकों के नेतृत्व में सुदृढ़ सैन्य बल तैनात रहता था तथा सीमावर्ती दुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इस प्रकार सल्तनतकालीन सेना का संगठन व्यापक, बहुस्तरीय तथा साम्राज्य की सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित था।

सेना के प्रमुख अंग

दिल्ली सल्तनत की सेना अनेक अंगों से मिलकर बनी थी, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण अश्वारोही सेना थी। तुर्क सैन्य परंपरा में घुड़सवार सेना को युद्ध की निर्णायक शक्ति माना जाता था। प्रत्येक अश्वारोही सैनिक के पास सामान्यतः दो तलवारें, एक खंजर, तुर्की धनुष (कमान) तथा तीरों का तरकश होता था। उत्तम नस्ल के घोड़ों की आपूर्ति के लिए अरब, तुर्किस्तान, मध्य एशिया तथा रूस आदि क्षेत्रों से घोड़े आयात किए जाते थे। साथ ही दिल्ली के सुल्तान भारत में भी घोड़ों की नस्ल सुधारने और उनके पालन-पोषण को प्रोत्साहित करते थे। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली तथा उसके आसपास लगभग सत्तर हजार घोड़ों के रख-रखाव की व्यवस्था की गई थी। घोड़ों की नियमित जाँच, दाग (ब्रांडिंग) तथा सैनिकों के विवरण (हुलिया) के अभिलेख रखने की व्यवस्था से सेना की कार्यक्षमता और अनुशासन बनाए रखा जाता था।

हाथी सेना का महत्त्व

सल्तनत कालीन सेना का दूसरा प्रमुख अंग हाथी सेना थी। हाथियों का उपयोग केवल युद्ध में ही नहीं, बल्कि शाही प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के लिए भी किया जाता था। समकालीन स्रोतों के अनुसार बलबन का मत था कि युद्धभूमि में एक प्रशिक्षित हाथी पाँच सौ घुड़सवारों के बराबर प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। मुहम्मद बिन तुगलक के पास लगभग तीन हजार हाथी थे, जबकि फिरोजशाह तुगलक के बंगाल अभियान के समय उसके साथ लगभग 475 हाथी थे। हाथियों की देख-रेख तथा प्रशिक्षण का उत्तरदायित्व शाहना-ए-पील नामक अधिकारी पर होता था। उसके अधीन महावतों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती थी, जो हाथियों के प्रशिक्षण, भोजन, स्वास्थ्य तथा युद्ध-सज्जा का प्रबंध करते थे।

पदाति सेना एवं सहायक दल

सेना का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग पदाति सेना था। पैदल सैनिकों को सामान्यतः पायक कहा जाता था। इनमें बड़ी संख्या हिंदू सैनिकों की होती थी, जबकि शेष भारतीय मुसलमानों तथा दास सैनिकों से मिलकर बनती थी। ये सैनिक तलवार, भाला, ढाल तथा धनुष-बाण जैसे शस्त्रों से सुसज्जित रहते थे। विशिष्ट तीरंदाजों को धनुक कहा जाता था, जिनकी युद्धभूमि में विशेष भूमिका होती थी।

मुख्य सेना के अतिरिक्त अनेक सहायक वर्ग भी सैन्य अभियानों का अभिन्न अंग थे। बंजारे सेना के लिए खाद्यान्न, पशुओं के लिए चारा तथा आवश्यक रसद उपलब्ध कराते थे। इनके अतिरिक्त लकड़हारे, पुल एवं मार्ग बनाने वाले श्रमिक, खाइयाँ खोदने वाले कर्मचारी, पशु-पालक तथा अन्य सेवा-संबद्ध व्यक्ति भी सेना के साथ चलते थे। इनकी सहायता से सेना लम्बे अभियानों के दौरान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाती थी।

सेना का संगठन एवं अनुशासन

दिल्ली सल्तनत की सेना का संगठन मुख्यतः दशमलव प्रणाली पर आधारित था। इस व्यवस्था में दस अश्वारोहियों पर एक सर-ए-खैल नियुक्त होता था। दस सर-ए-खैलों के ऊपर सिपहसालार, दस सिपहसालारों के ऊपर अमीर, दस अमीरों के ऊपर मलिक तथा दस मलिकों के ऊपर खान का अधिकार होता था। इस प्रकार खान के अधीन लगभग दस हजार या उससे अधिक सैनिक होते थे, जबकि मलिक, अमीर और सिपहसालार क्रमशः छोटे सैन्य दलों का नेतृत्व करते थे।

सेना के प्रत्येक विभाग में अभिलेख रखने के लिए लिपिक नियुक्त रहते थे, जो सैनिकों की संख्या, वेतन, अस्त्र-शस्त्र तथा घोड़ों का विवरण सुरक्षित रखते थे। निरीक्षण अथवा युद्ध के समय सैनिकों को संगठित करने के लिए अनेक अधिकारी कार्यरत रहते थे। नकीब आदेशों की उद्घोषणा करते थे, जबकि चौश सैनिकों को पंक्तिबद्ध कर अनुशासन बनाए रखते थे। सैनिकों को अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों का कठोरता से पालन करना पड़ता था। साथ ही अभियानों के दौरान कृषकों की फसलों को अनावश्यक क्षति न पहुँचे, इस बात का भी विशेष ध्यान रखा जाता था।

सैनिकों का वेतन एवं इक्ता व्यवस्था

सल्तनत काल के प्रारंभिक चरण में उच्च सैनिक अधिकारियों तथा अमीरों को वेतन के स्थान पर इक्ता अथवा भूमि-अनुदान प्रदान किया जाता था। इन इक्ताओं की आय से वे अपना निर्वाह करते तथा अपने अधीन सैनिकों का वेतन और रख-रखाव सुनिश्चित करते थे। कालान्तर में विशेषकर केंद्रीय सेना के साधारण सैनिकों को नकद वेतन देने की व्यवस्था अधिक प्रचलित हुई।

अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों का वार्षिक वेतन लगभग 234 टंका निर्धारित किया। यदि कोई सैनिक एक अतिरिक्त घोड़ा रखता था तो उसे लगभग 78 टंका अतिरिक्त भत्ता दिया जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में सैनिकों का वेतन बढ़ाकर लगभग 500 टंका प्रतिवर्ष कर दिया गया। युद्ध अभियानों के दौरान सैनिकों को भोजन तथा पशुओं के लिए चारा भी राज्य की ओर से उपलब्ध कराया जाता था।

समकालीन लेखक इब्न बतूता तथा शम्स-ए-सिराज अफीफ के विवरणों से ज्ञात होता है कि उच्च सैन्य अधिकारियों को उनके पदानुसार पर्याप्त वेतन मिलता था। एक खान को लगभग दो लाख टंका, मलिक को पचास से साठ हजार टंका, अमीर को तीस से चालीस हजार टंका तथा सिपहसालार को लगभग बीस हजार टंका वार्षिक वेतन दिया जाता था। निम्न श्रेणी के अधिकारियों का वेतन उनके पद एवं दायित्वों के अनुसार निर्धारित होता था।

फिरोजशाह तुगलक ने सैनिकों को भी इक्ताएँ प्रदान करने की नीति अपनाई तथा अनेक इक्ताओं को वंशानुगत बना दिया। उसने वृद्ध सैनिकों को यह सुविधा भी दी कि वे अपनी सेवा के स्थान पर अपने पुत्र अथवा किसी निकट संबंधी को सेना में नियुक्त करा सकते थे। यद्यपि इससे सैनिकों का आर्थिक हित सुरक्षित हुआ, किंतु सेना की दक्षता और अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ा।

सेना की संख्या एवं सामरिक महत्त्व

सल्तनत काल में सेना की संख्या समय-समय पर बदलती रही। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में लगभग 4,75,000 अश्वारोही सैनिकों का उल्लेख मिलता है, जबकि मुहम्मद बिन तुगलक के समय सेना की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई। समकालीन स्रोतों में उसकी विशाल सेना का उल्लेख मिलता है, यद्यपि विभिन्न इतिहासकारों ने उसके आँकड़ों पर मतभेद व्यक्त किए हैं। फिरोजशाह तुगलक के समय स्थायी सेना अपेक्षाकृत छोटी थी, किंतु उसके अधीन बड़ी संख्या में दास, सैनिक तथा सार्वजनिक कार्यों में नियुक्त कर्मचारी थे। बंगाल के दूसरे अभियान में उसके साथ लगभग अस्सी हजार सैनिकों का होना उसकी सैन्य शक्ति का प्रमाण है।

सल्तनत काल में आंतरिक विद्रोहों के दमन, सीमाओं की सुरक्षा, मंगोल आक्रमणों के प्रतिरोध तथा साम्राज्य के विस्तार में सेना की निर्णायक भूमिका रही। विशेषतः लोदी काल में विभिन्न अफगान कबीलों के सैनिक बड़ी संख्या में सेना का भाग बने, फिर भी सुल्तान का केंद्रीय नियंत्रण सेना पर बना रहा। इसी संगठित, अनुशासित तथा बहुआयामी सैन्य व्यवस्था के कारण दिल्ली सल्तनत दीर्घकाल तक अपने विशाल साम्राज्य का संचालन करने में सफल रही।

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