सल्तनत काल में राज्य का स्वरूप
सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम धर्म का उद्भव हुआ। इसके प्रवर्तक मुहम्मद (570–632 ई.) ने एकेश्वरवाद, नैतिक आचरण, सामाजिक समानता तथा मानव-भ्रातृत्व पर आधारित धर्म की स्थापना की। उनके द्वारा प्रतिपादित धार्मिक एवं सामाजिक सिद्धांत बाद में कुरआन तथा हदीस के रूप में संकलित हुए। इस्लामी जीवन-पद्धति का विधिक आधार इन्हीं दोनों स्रोतों से निर्मित हुआ, जिसे शरीअत (शरियत) कहा जाता है। शरीअत केवल धार्मिक नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मुसलमानों के व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन का मार्गदर्शन भी करती है। प्रत्येक मुसलमान से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने जीवन में शरीअत के सिद्धांतों का पालन करे। परंपरागत इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार शरीअत के मूल सिद्धांत ईश्वरीय माने जाते हैं, इसलिए उनमें मनमाना परिवर्तन स्वीकार्य नहीं माना गया है। इसी कारण इस्लामी राजनीतिक व्यवस्था में भी शासन की वैधता का आधार शरीअत का पालन ही था।
खिलाफत की स्थापना और खलीफा का पद
मुहम्मद साहब ने अपने जीवनकाल में विभिन्न अरब कबीलों को एक राजनीतिक और धार्मिक संगठन में संगठित किया। उन्होंने जातीय एवं कबायली विभाजनों को समाप्त कर अल्लाह की उपासना, समानता तथा पारस्परिक भाईचारे पर बल दिया। उनके प्रयासों से अरब समाज में अभूतपूर्व एकता स्थापित हुई। किंतु 632 ईस्वी में उनकी मृत्यु के पश्चात् मुस्लिम समुदाय के समक्ष सबसे बड़ी समस्या उत्तराधिकारी के चयन की थी, क्योंकि उन्होंने किसी व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था। कुरआन में केवल इतना निर्देश दिया गया था कि मुसलमान अपने सामूहिक मामलों का निर्णय परामर्श (शूरा) द्वारा करें।
मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद मदीना में आयोजित सभा में उत्तराधिकार का प्रश्न उठा। कुछ लोगों ने विभिन्न कबीलों के लिए अलग-अलग नेतृत्व का प्रस्ताव रखा, किंतु मुस्लिम समाज की एकता बनाए रखने के उद्देश्य से अंततः सर्वसम्मति से अबू बक्र को मुस्लिम समुदाय का नेता चुना गया। उन्हें खलीफा अर्थात् ‘पैग़म्बर का उत्तराधिकारी’ कहा गया। इस प्रकार इस्लामी इतिहास में खिलाफत संस्था का जन्म हुआ, जिसने धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व को एक सूत्र में बाँध दिया।
खलीफा के अधिकार और दायित्व
अबू बक्र के खलीफा बनने के बाद कुछ अरब कबीलों ने जकात देने से इनकार कर दिया तथा केंद्रीय सत्ता से अलग होने का प्रयास किया। अबू बक्र ने इसे इस्लामी एकता के विरुद्ध विद्रोह माना और उनके विरुद्ध अभियान चलाया, जिन्हें इतिहास में ‘रिद्दा युद्ध’ कहा जाता है। इन अभियानों की सफलता से यह सिद्ध हो गया कि खलीफा केवल धार्मिक प्रमुख ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मुस्लिम समुदाय का सर्वोच्च राजनीतिक और सैन्य नेता भी था।
इस्लामी विधिवेत्ताओं के अनुसार खलीफा के प्रमुख दायित्व इस्लाम की रक्षा करना, राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना, न्याय प्रदान करना, प्रशासन का संचालन करना तथा शरीअत के नियमों को लागू करना था। वह सेना का सर्वोच्च सेनापति और समस्त मुसलमानों का शासक माना जाता था। यद्यपि उसके अधिकार व्यापक थे, फिर भी वे शरीअत द्वारा सीमित थे। खलीफा को शरीअत की व्याख्या करने और उसके अनुसार शासन चलाने का अधिकार था, किंतु वह उसके मूल सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकता था। इस्लामी विधिवेत्ताओं ने समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार शरीअत की व्याख्या कर प्रशासन को अधिक व्यावहारिक बनाने का प्रयास किया, जिससे इस्लामी शासन व्यवस्था बदलती परिस्थितियों के अनुरूप कार्य कर सके।
इस्लामी साम्राज्य का विस्तार और प्रांतीय शासन
अब्बासी काल में इस्लामी साम्राज्य अत्यंत विशाल हो गया। इतने विस्तृत साम्राज्य पर एक ही केंद्र से शासन करना कठिन था। परिणामस्वरूप खलीफाओं ने विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय शासकों को मान्यता प्रदान की और उन्हें व्यापक प्रशासनिक अधिकार दिए। प्रसिद्ध इस्लामी विधिवेत्ता अल-मावर्दी ने इन शासकों को उनके अधिकारों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया। इनमें सीमित अधिकार वाले गवर्नर, व्यापक अधिकार वाले प्रांतीय शासक तथा वे स्वतंत्र शासक सम्मिलित थे जो अपने क्षेत्रों में स्वायत्त शासन करते हुए भी खलीफा की सर्वोच्चता को औपचारिक रूप से स्वीकार करते थे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य दारुल-इस्लाम अर्थात् इस्लामी जगत की राजनीतिक एवं धार्मिक एकता को बनाए रखना था। यद्यपि व्यवहार में अनेक प्रांतीय शासक स्वतंत्र हो चुके थे, फिर भी खलीफा की वैधानिक सर्वोच्चता को स्वीकार करना उनकी वैधता का आधार माना जाता था। इस प्रकार इस्लामी राजनीतिक व्यवस्था में धार्मिक वैधता और व्यावहारिक प्रशासन के बीच संतुलन स्थापित किया गया।
भारत में इस्लामी सत्ता और खलीफा की सर्वोच्चता
भारत में इस्लामी शासन की प्रारंभिक स्थापना 712 ईस्वी में हुई, जब उमय्यद शासन के अधीन इराक के शक्तिशाली गवर्नर अल-हज्जाज इब्न यूसुफ के निर्देशन में मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर विजय प्राप्त की। इसके बाद उत्तर-पश्चिम भारत में इस्लामी प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया।
ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद ग़ज़नवी ने अनेक अभियानों के माध्यम से पंजाब पर अपना अधिकार स्थापित किया। यद्यपि ग़ज़नवी शासक व्यवहार में स्वतंत्र थे, फिर भी वे अब्बासी खलीफा से वैधानिक मान्यता प्राप्त करते थे और उसके नाम का सम्मान बनाए रखते थे। महमूद के उत्तराधिकारी मसूद को भी अब्बासी खलीफा की स्वीकृति प्राप्त थी। यही परंपरा गोर वंश के शासकों के समय भी चलती रही।
मुहम्मद गोरी ने भी खलीफा की सर्वोच्चता को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। उसने अपने सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित कराया तथा अब्बासी खलीफाओं से सम्मानसूचक खिलअत प्राप्त की। उस समय इस्लामी जगत में यह परंपरा प्रचलित थी कि अनेक शासक सुल्तान की उपाधि खलीफा की स्वीकृति से धारण करते थे। इससे उनकी सत्ता को धार्मिक एवं वैधानिक मान्यता प्राप्त होती थी, यद्यपि व्यवहार में वे स्वतंत्र शासन करते थे।
दिल्ली सल्तनत और स्वतंत्र राज्य की स्थापना
25 मार्च 1206 ईस्वी को दमयक (धामियक) नामक स्थान पर मुहम्मद गोरी की हत्या हो गई। उसके जीवनकाल में उसके तुर्क सेनानायकों ने उत्तरी भारत के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। उसकी मृत्यु के बाद भारत स्थित तुर्की प्रदेशों को संगठित कर स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित करने का कार्य कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया। इसी प्रक्रिया से दिल्ली सल्तनत की वास्तविक नींव पड़ी।
प्रारंभ में ऐबक ने स्वयं को मलिक अथवा सिपहसालार की उपाधि तक ही सीमित रखा और तत्काल सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की। गजनी के शासक ताजुद्दीन यल्दूज़ के दावों का सामना करने तथा अपनी वैधानिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए उसने 1208 ईस्वी में गोर के शासक गयासुद्दीन महमूद से राजचिह्न एवं सम्मान प्राप्त किए। उसे सुल्तान की उपाधि प्रदान की गई, किंतु उपलब्ध प्रमाणों से संकेत मिलता है कि उसने इस उपाधि का औपचारिक प्रयोग नहीं किया। उसने अपने नाम से स्वतंत्र सिक्के भी जारी नहीं किए और न ही अब्बासी खलीफा से औपचारिक मान्यता-पत्र प्राप्त किया।
फिर भी व्यावहारिक दृष्टि से कुतुबुद्दीन ऐबक पूर्णतः स्वतंत्र शासक था। भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि खलीफा से औपचारिक स्वीकृति प्राप्त करना अब अनिवार्य नहीं रह गया था। भारतीय मुस्लिम विधिवेत्ताओं ने भी इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि ऐबक वैचारिक रूप से खलीफा की सर्वोच्चता को स्वीकार करता था। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत का राज्य इस्लामी राजनीतिक परंपराओं से प्रभावित होने के साथ-साथ भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुआ, जहाँ धार्मिक वैधता और राजनीतिक स्वतंत्रता का व्यावहारिक समन्वय दिखाई देता है।
सुल्तान की वैधानिक स्थिति : स्वतंत्रता और धार्मिक वैधता
दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक इतिहास में सुल्तान की वैधानिक स्थिति के दो प्रमुख पक्ष थे। पहला, वह अपने राज्य का स्वतंत्र एवं सर्वोच्च शासक था, और दूसरा, वह इस्लामी परंपरा के अनुसार खलीफा का प्रतिनिधि अथवा अधीनस्थ माना जाता था। यद्यपि व्यवहार में दिल्ली के सुल्तान पूर्णतः स्वतंत्र थे, फिर भी वे अपनी सत्ता को धार्मिक वैधता प्रदान करने के लिए अब्बासी खलीफा की सर्वोच्चता को औपचारिक रूप से स्वीकार करते थे। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था में वास्तविक सत्ता और धार्मिक वैधता का एक विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है।
दिल्ली सल्तनत की आधारशिला कुतुबुद्दीन ऐबक ने रखी, किंतु उसे पूर्ण वैधानिक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय शम्सुद्दीन इल्तुतमिश को प्राप्त है। इल्तुतमिश ने एक ओर अपनी सैन्य एवं प्रशासनिक शक्ति के बल पर स्वतंत्र शासन स्थापित किया, तो दूसरी ओर उसने इस्लामी राजनीतिक परंपरा के अनुरूप अब्बासी खलीफा की औपचारिक सर्वोच्चता को स्वीकार कर अपनी सत्ता को धार्मिक मान्यता भी दिलाई।
इल्तुतमिश और अब्बासी खलीफा से वैधानिक मान्यता
इल्तुतमिश ने खलीफा से औपचारिक मान्यता प्राप्त होने से पूर्व भी अपने सिक्कों पर अब्बासी खलीफा का नाम अंकित कराया था। अंततः फरवरी 1229 ईस्वी में अब्बासी खलीफा अल-मुस्तनसिर बिल्लाह (कुछ स्रोतों में अल-मुस्तनसिर अथवा अल-मुस्तनसिर बिल्लाह) के दूत दिल्ली पहुँचे। उन्होंने इल्तुतमिश को मानपत्र (मंशूर), खिलअत तथा राजचिह्न प्रदान किए। इस अवसर पर दिल्ली नगर को भव्य रूप से सजाया गया तथा राजदूतों का अत्यंत सम्मान के साथ स्वागत किया गया। खलीफा द्वारा भेजी गई खिलअतें इल्तुतमिश के पुत्रों, अमीरों तथा प्रमुख अधिकारियों को भी प्रदान की गईं।
इस मान्यता के बाद इल्तुतमिश की सत्ता को संपूर्ण इस्लामी जगत में वैधानिक स्वीकृति प्राप्त हुई। उसके सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित किया जाने लगा तथा खुत्बा में भी खलीफा का नाम पढ़ा जाने लगा। इससे दिल्ली सल्तनत को दारुल-इस्लाम का अभिन्न अंग माना गया और यह स्पष्ट हुआ कि दिल्ली का सुल्तान इस्लामी राजनीतिक परंपरा के अनुसार खलीफा का वैध प्रतिनिधि है।
बगदाद के पतन के बाद खिलाफत की समस्या
1258 ईस्वी में मंगोल शासक हलाकू ख़ान ने बगदाद पर आक्रमण कर अब्बासी खलीफा अल-मुस्तासिम बिल्लाह की हत्या कर दी। इसके साथ ही बगदाद स्थित अब्बासी खिलाफत का अंत हो गया। इस घटना ने समस्त इस्लामी जगत के समक्ष एक गंभीर वैधानिक संकट उत्पन्न कर दिया, क्योंकि अब ऐसा कोई खलीफा नहीं रहा जिसकी सर्वोच्चता स्वीकार की जा सके।
दिल्ली सल्तनत के विधिवेत्ताओं ने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया। उन्होंने यह निर्णय लिया कि यद्यपि खलीफा अल-मुस्तासिम का निधन हो चुका है, फिर भी उनके नाम का प्रयोग खुत्बा तथा सिक्कों पर पूर्ववत् जारी रखा जाए। इसका उद्देश्य इस्लामी राजनीतिक परंपरा की निरंतरता बनाए रखना था। कई दशकों तक दिल्ली के सुल्तानों ने मृत खलीफा का नाम ही सिक्कों एवं खुत्बा में बनाए रखा। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय धार्मिक वैधता का प्रतीक स्वयं खिलाफत की संस्था थी, न कि केवल जीवित खलीफा का अस्तित्व।
बलबन और खिलाफत के प्रति निष्ठा
ग़ियासुद्दीन बलबन भली-भाँति जानता था कि बगदाद की खिलाफत समाप्त हो चुकी है और मिस्र में पुनर्स्थापित अब्बासी खलीफाओं की वास्तविक राजनीतिक शक्ति अत्यंत सीमित है। इसके बावजूद उसने खिलाफत की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। उसने अपने पुत्र बुगरा ख़ाँ को भी परामर्श दिया कि अवसर मिलने पर अब्बासी खलीफा से वैधानिक मान्यता प्राप्त करने का प्रयास करे। इससे स्पष्ट होता है कि बलबन धार्मिक वैधता के महत्त्व को भली-भाँति समझता था।
खिलजी शासक और खलीफा की सर्वोच्चता
जलालुद्दीन फ़िरोज़ ख़िलजी के शासनकाल (1290–1296 ई.) तक दिवंगत खलीफा अल-मुस्तासिम का नाम सिक्कों पर अंकित किया जाता रहा, जबकि उनकी मृत्यु को लगभग चालीस वर्ष बीत चुके थे। जलालुद्दीन ने मृत खलीफा का नाम सिक्कों और खुत्बा से हटाने का विरोध किया, जिससे स्पष्ट है कि वह धार्मिक परंपराओं के प्रति अत्यंत सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण रखता था।
उसके उत्तराधिकारी रुक्नुद्दीन इब्राहीम ने स्वयं को केवल ‘नासिर अमीर-उल-मोमिनीन’ (ईमान वालों के नेता का सहायक) कहलाना पर्याप्त समझा। बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी उपाधि में ‘यमीन-उल-खिलाफत’ (खिलाफत का दाहिना हाथ) भी जोड़ लिया। इन उपाधियों से स्पष्ट है कि अलाउद्दीन ने स्वयं को कभी खलीफा घोषित नहीं किया, बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के साथ धार्मिक वैधता का संतुलन बनाए रखा।
मुबारक शाह खिलजी का खलीफा बनने का प्रयास
अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक शाह ने अपने पूर्ववर्तियों से भिन्न नीति अपनाई। उसने स्वयं को ना केवल ‘इमाम-ए-आज़म’, ‘खलीफा-ए-रब्बुल आलमीन’, ‘अमीर-उल-मोमिनीन’ तथा इस्लाम का संरक्षक घोषित किया, बल्कि ‘अबुल मुज़फ्फर मुबारक शाह’ की उपाधि धारण की और इन उपाधियों को अपने सिक्कों पर भी अंकित कराया। दिल्ली सल्तनत के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि जब किसी सुल्तान ने स्वयं को खलीफा के समान प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया।
किंतु मुबारक शाह का यह प्रयोग सफल नहीं हुआ और इन उपाधियों से उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा या लोकप्रियता में कोई वृद्धि नहीं हुई। इसके बाद शीघ्र ही खिलजी वंश का पतन हो गया और नासिरुद्दीन ख़ुसरो शाह ने सत्ता प्राप्त करने के बाद केवल ‘मुसलमानों के नेता का मित्र’ जैसी अपेक्षाकृत विनम्र उपाधि धारण की।
तुगलक सुल्तान और खिलाफत
ग़ियासुद्दीन तुगलक ने भी पूर्ववर्ती परंपरा का पालन करते हुए स्वयं को केवल ‘नासिर अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि तक सीमित रखा। उसके समय तक दिल्ली के मुस्लिम विधिवेत्ताओं के मध्य यह विवाद चलता रहा कि दिवंगत खलीफा अल-मुस्तासिम का नाम कब तक सिक्कों और खुत्बा में प्रयुक्त किया जाए। अनेक विधिवेत्ता इस काल्पनिक स्थिति से संतुष्ट नहीं थे कि दिल्ली का सुल्तान किसी मृत अथवा अज्ञात खलीफा का प्रतिनिधि माना जाए।
मुहम्मद बिन तुगलक और खिलाफत की पुनः स्वीकृति
मुहम्मद बिन तुगलक ने प्रारंभ में दिल्ली सल्तनत को पूर्णतः स्वतंत्र राज्य मानते हुए सिक्कों से खलीफा का नाम हटवा दिया। उसने सिक्कों पर कलमा, कुरआन की आयतें तथा प्रथम चार राशिदून खलीफाओं—अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली के नाम अंकित कराए। उसका विचार था कि जब प्रभावशाली खिलाफत का अस्तित्व नहीं रह गया है, तब प्रारंभिक इस्लामी आदर्शों को सम्मान देना अधिक उपयुक्त होगा।
किंतु शासनकाल में लगातार उत्पन्न कठिनाइयों तथा धार्मिक वर्ग के दबाव के कारण उसने पुनः खिलाफत से संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। इस बीच मिस्र में मामलूक सुल्तानों के संरक्षण में अब्बासी खिलाफत का पुनर्गठन हो चुका था। परिणामस्वरूप मुहम्मद बिन तुगलक ने मिस्र स्थित अब्बासी खलीफा से संपर्क स्थापित किया। खलीफा के दूत दिल्ली आए और वे सुल्तान के लिए मानपत्र, खिलअत तथा राजचिह्न लेकर पहुँचे। इस अवसर पर दिल्ली को भव्य रूप से सजाया गया, उत्सव मनाया गया तथा खलीफा का नाम पुनः खुत्बा में पढ़ा जाने लगा। इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक ने पुनः खिलाफत की धार्मिक सर्वोच्चता को औपचारिक रूप से स्वीकार किया।
फ़िरोज़ तुगलक और खिलाफत का सम्मान
फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अपने ग्रंथ फ़ुतूहात-ए-फ़िरोज़शाही में उल्लेख किया है कि उसे खलीफा द्वारा अपना प्रतिनिधि स्वीकार किए जाने का सम्मान प्राप्त हुआ था। समकालीन इतिहासकार शम्स-ए-सिराज अफीफ़ के अनुसार खलीफा ने फ़िरोज़ शाह को खिलअतें, ध्वज तथा अन्य राजचिह्न भेजे थे। फ़िरोज़ शाह ने इनका अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वागत किया, खलीफा को उपहार भेजे तथा अपने सिक्कों और खुत्बा में खलीफाओं के नाम अंकित कराए। इससे स्पष्ट होता है कि उसके शासनकाल में खिलाफत की प्रतिष्ठा को विशेष महत्त्व दिया गया था।
सैय्यद और लोदी काल में खिलाफत का महत्त्व
तैमूर के आक्रमण के पश्चात् खिज्र ख़ाँ ने सैय्यद वंश की स्थापना की। उसने स्वयं को सुल्तान कहने के स्थान पर केवल ‘नायब-ए-अमीर-उल-मोमिनीन’ अथवा अमीर-उल-मोमिनीन का प्रतिनिधि कहलाना उचित समझा। उसके उत्तराधिकारियों ने भी यही परंपरा अपनाई। लोदी शासकों के समय भी खलीफा के प्रति निष्ठा प्रकट करने की परंपरा औपचारिक रूप से जारी रही, यद्यपि इसका राजनीतिक महत्त्व अत्यंत सीमित रह गया था।
1517 ईस्वी में सेलिम प्रथम ने मिस्र पर अधिकार कर वहाँ की अब्बासी खिलाफत का अंत कर दिया। इसके पश्चात् उस्मानी (ऑटोमन) सुल्तानों ने स्वयं को खलीफा घोषित किया और इस प्रकार इस्लामी जगत में खिलाफत की परंपरा एक नए स्वरूप में आगे बढ़ी।
दिल्ली सल्तनत के राज्य की प्रकृति
दिल्ली सल्तनत के अधिकांश शासकों ने, कुछ अपवादों को छोड़कर, पहले बगदाद और बाद में मिस्र स्थित अब्बासी खलीफाओं के प्रति अपनी औपचारिक निष्ठा व्यक्त की थी। इस निष्ठा का उद्देश्य अपनी सत्ता को धार्मिक एवं वैधानिक मान्यता प्रदान करना था। यद्यपि व्यवहार में वे पूर्णतः स्वतंत्र शासक थे, फिर भी इस्लामी राजनीतिक परंपरा के अनुसार वे स्वयं को खलीफा का प्रतिनिधि मानते थे। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत की शासन-व्यवस्था में धार्मिक वैधता और राजनीतिक स्वतंत्रता का एक विशिष्ट समन्वय था। मुस्लिम समाज के समक्ष यह संदेश दिया जाता था कि सुल्तान की सत्ता इस्लामी राजनीतिक व्यवस्था का ही अंग है तथा उसका शासन शरीअत के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित हो रहा है।
राज्य की प्रकृति पर इतिहासकारों के विचार
दिल्ली सल्तनत के राज्य-स्वरूप को लेकर इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद के अनुसार मुस्लिम राज्य की प्रकृति मूलतः धर्मप्रधान थी। उनके अनुसार राज्य का प्रमुख उद्देश्य इस्लाम की रक्षा तथा ईश्वर की इच्छा के अनुरूप शासन करना था। शासन-व्यवस्था पर धार्मिक सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था और उलमा वर्ग शरीअत की व्याख्या कर प्रशासन को दिशा प्रदान करता था। उनके मत में इस्लामी राज्य का आदर्श दारुल-हरब को दारुल-इस्लाम में परिवर्तित करना तथा इस्लामी व्यवस्था की स्थापना करना था। इसी कारण अनेक मुस्लिम इतिहासकार उन शासकों की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने स्वयं को इस्लाम के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
यह सत्य है कि दिल्ली सल्तनत में जज़िया जैसे कर लगाए गए तथा गैर-मुस्लिम प्रजा की स्थिति इस्लामी विधि के अंतर्गत अलग श्रेणी में रखी गई, किंतु सभी सुल्तानों की नीतियाँ एक समान नहीं थीं। अनेक शासकों ने राजनीतिक परिस्थितियों, आर्थिक आवश्यकताओं तथा प्रशासनिक व्यावहारिकता के आधार पर अपेक्षाकृत उदार नीतियाँ भी अपनाईं। इसलिए संपूर्ण सल्तनत काल को एकरूप धार्मिक नीति वाला काल मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।
इश्तियाक हुसैन कुरैशी ने इस मत का विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि दिल्ली सल्तनत को धर्मतांत्रिक (थियोक्रेटिक) राज्य कहना उचित नहीं है। उनके अनुसार किसी भी धर्मतांत्रिक राज्य की मूल विशेषता यह होती है कि वहाँ संगठित पुरोहित वर्ग शासन की सर्वोच्च सत्ता का वास्तविक नियंत्रक होता है। दिल्ली सल्तनत में ऐसी कोई संस्था विद्यमान नहीं थी। उलमा वर्ग धार्मिक प्रतिष्ठा अवश्य रखता था, किंतु वह राज्यसत्ता का प्रत्यक्ष संचालक नहीं था। सुल्तान किसी भी धार्मिक संस्था का कठपुतली शासक नहीं था और न ही उलमा उसके प्रत्येक निर्णय को नियंत्रित करते थे।
इसी प्रकार प्रसिद्ध विद्वान हैमिल्टन अलेक्ज़ेंडर रॉसकीन गिब ने इस्लामी शासन-व्यवस्था को ‘केंद्रीकृत धार्मिक राजतंत्र’ के रूप में देखा है, जहाँ धर्म और राज्य परस्पर संबद्ध तो थे, किंतु शासन का संचालन पूर्णतः पुरोहित वर्ग द्वारा नहीं किया जाता था। इतिहासकार आर. पी. त्रिपाठी का मत भी यही है कि सुल्तान और उलमा अनेक विषयों में परस्पर सहयोग करते थे, परंतु दोनों अपने-अपने हितों और सीमाओं के भीतर कार्य करते थे। इसलिए दिल्ली सल्तनत को पूर्ण धर्मतांत्रिक राज्य कहना उचित नहीं है।
शरीअत की सर्वोच्चता और इस्लामी विधि
दिल्ली सल्तनत के शासन की वैचारिक आधारशिला शरीअत थी। इस्लामी परंपरा के अनुसार शरीअत ईश्वर की इच्छा का प्रतिरूप है, जिसकी अभिव्यक्ति पैगंबर मुहम्मद को हुई थी। पैगंबर स्वयं भी उसके मूल सिद्धांतों में परिवर्तन करने के अधिकारी नहीं थे; उन्होंने केवल उसकी व्याख्या और व्यावहारिक अनुप्रयोग का मार्ग बताया था। उनके कथनों एवं कार्यों का संकलन हदीस में हुआ, जबकि कुरआन इस्लामी जीवन का मूल आधार बना। इन्हीं दोनों स्रोतों से इस्लामी विधि का विकास हुआ।
समय के साथ मुस्लिम विधिवेत्ताओं ने समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार शरीअत की व्याख्या की तथा विभिन्न विधि-परंपराओं (फ़िक़्ह) का विकास किया। इस प्रकार शरीअत केवल धार्मिक संहिता न होकर सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक तथा राजनीतिक जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बन गई। इस्लामी दृष्टिकोण में कोई भी शासक शरीअत से ऊपर नहीं माना जाता था। यदि कोई शासक खुले रूप से शरीअत का उल्लंघन करता, तो उसके विरुद्ध असंतोष अथवा प्रतिरोध का वैचारिक आधार भी विद्यमान था। यही कारण था कि शरीअत की सर्वोच्चता संपूर्ण इस्लामी जगत में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती थी।
सुल्तान और खलीफा का संबंध
इस्लामी राजनीतिक सिद्धांत के अनुसार मुसलमानों को शरीअत लागू कराने तथा समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक सर्वोच्च शासक की आवश्यकता होती है। प्रारंभिक इस्लामी काल में यह पद खलीफा का था, जो धार्मिक और राजनीतिक दोनों प्रकार की सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक था। भारत में दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों को औपचारिक रूप से खलीफा का प्रतिनिधि माना जाता था। वे अपनी सत्ता को वैध सिद्ध करने के लिए खलीफा के नाम का उपयोग करते थे, यद्यपि व्यवहार में वे पूर्णतः स्वतंत्र थे।
जब दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, उसी समय अब्बासी खिलाफत राजनीतिक रूप से दुर्बल हो रही थी। इसके बावजूद इस्लामी जगत की वैचारिक एकता बनाए रखने के लिए खिलाफत की संस्था को औपचारिक रूप से स्वीकार किया जाता रहा। दिल्ली के सुल्तानों ने भी इसी परंपरा का पालन किया और स्वयं को खलीफा का अधीनस्थ अथवा प्रतिनिधि बताकर अपनी वैधानिक स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखा।
शरीअत और सुल्तान की वास्तविक शक्तियाँ
सैद्धांतिक रूप से सुल्तान को शरीअत की व्याख्या करने तथा उसे लागू करने का अधिकार प्राप्त था, किंतु व्यवहार में उसकी स्वतंत्रता सीमित थी। वह स्थापित इस्लामी विधि की सर्वमान्य व्याख्या की उपेक्षा नहीं कर सकता था और न ही जनमत तथा प्रभावशाली धार्मिक वर्ग की पूर्ण अवहेलना कर सकता था। जिन विषयों पर मुस्लिम विधिवेत्ताओं में मतभेद होता, वहाँ सुल्तान अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता के साथ निर्णय ले सकता था।
ऐसी परिस्थितियों में आदर्श रूप से सुल्तान का विद्वान तथा शरीअत का ज्ञाता होना अपेक्षित था। यद्यपि अधिकांश सुल्तान स्वयं विधिवेत्ता नहीं थे, फिर भी वे योग्य क़ाज़ियों, मुफ़्तियों तथा उलमा की सलाह लेकर निर्णय करते थे। राज्यहित, लोककल्याण तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप वे नए नियम और प्रशासनिक आदेश भी जारी करते थे। इन नियमों को सामान्यतः शरीअत की मूल भावना के अनुकूल रखने का प्रयास किया जाता था।
दिल्ली सल्तनत का वास्तविक स्वरूप
यद्यपि सल्तनत काल में शरीअत को अत्यधिक सम्मान प्राप्त था और उलमा वर्ग प्रभावशाली था, फिर भी शासन की वास्तविक प्रकृति राजतांत्रिक थी। सुल्तान राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था और ऐसी कोई स्थायी संस्था नहीं थी जो उसे प्रत्येक निर्णय में बाध्य कर सके। उलमा की सलाह महत्त्वपूर्ण अवश्य थी, परंतु अंतिम निर्णय सुल्तान का ही होता था।
अनेक अवसरों पर सुल्तानों ने राजनीतिक, आर्थिक अथवा प्रशासनिक कारणों से ऐसे निर्णय लिए जो पारंपरिक धार्मिक दृष्टिकोण से भिन्न थे। उदाहरणस्वरूप अलाउद्दीन खिलजी ने स्पष्ट कहा था कि शासन केवल शरीअत के आधार पर नहीं, बल्कि राज्यहित (ज़वाबित) के आधार पर भी संचालित किया जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि सल्तनत की शासन-व्यवस्था में धर्म और राजनीति परस्पर जुड़े होने के बावजूद राज्यसत्ता का अंतिम केंद्र सुल्तान ही था।
सुल्तान की भूमिका
मुस्लिम राजनीतिक चिंतन में सुल्तान को प्रजा का संरक्षक और न्याय का स्रोत माना गया है। यह विश्वास था कि न्याय के दिन उसे ईश्वर के समक्ष अपने शासन, न्याय और अन्याय का उत्तर देना होगा। इसी कारण न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल शासक को ईश्वर की छाया (ज़िल्लुल्लाह) अथवा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि जैसी सम्मानसूचक उपाधियों से विभूषित किया जाता था। उसका प्रमुख दायित्व राज्य में शांति, सुरक्षा तथा न्याय की स्थापना करना था।
यह भी माना जाता था कि यदि राज्य में सशक्त शासक न हो तो समाज में अराजकता, हिंसा और असुरक्षा फैल जाएगी। इसलिए सुल्तान की सत्ता को सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य समझा जाता था। उसकी शक्ति का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजा की रक्षा करना और राज्य की स्थिरता सुनिश्चित करना भी था।
सुल्तान के प्रमुख कर्तव्य
मुस्लिम विधिवेत्ताओं ने सुल्तान के अनेक प्रमुख दायित्व निर्धारित किए थे। उसे इस्लाम और शरीअत की रक्षा करनी चाहिए, न्याय प्रदान करना चाहिए, राज्य की सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए तथा आंतरिक शांति बनाए रखनी चाहिए। यात्रियों और व्यापारियों के लिए मार्गों को सुरक्षित रखना, अपराधियों को दंडित करना, कर एवं राजस्व की उचित व्यवस्था करना तथा राजकोष से निर्धनों, अनाथों और असहाय व्यक्तियों की सहायता करना भी उसके उत्तरदायित्वों में सम्मिलित था।
इसके अतिरिक्त योग्य अधिकारियों की नियुक्ति करना, प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण रखना, सेना का संगठन करना, बाहरी आक्रमणों से राज्य की रक्षा करना तथा आवश्यकता पड़ने पर इस्लामी राज्य के शत्रुओं के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाना भी सुल्तान के कर्तव्यों में शामिल था। उसे प्रजा के साथ संपर्क बनाए रखना तथा उनकी समस्याओं का समाधान करना अपेक्षित था। समकालीन इतिहासकारों के विवरणों से स्पष्ट होता है कि अधिकांश सुल्तानों ने इन दायित्वों के निर्वहन का प्रयास किया, यद्यपि उनकी सफलता परिस्थितियों और व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करती थी।
राजसत्ता के प्रतीक और शाही गौरव
सल्तनत काल में सुल्तान की प्रतिष्ठा केवल उसकी सैन्य शक्ति से ही नहीं, बल्कि राजकीय प्रतीकों और औपचारिकताओं से भी व्यक्त होती थी। वह छत्र, ध्वज, शाही पताका, नगाड़े तथा अन्य राजचिह्न धारण करता था। उसके नाम से खुत्बा पढ़ा जाता था और उसके नाम के सिक्के जारी किए जाते थे, जो उसकी संप्रभुता के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक थे।
सुल्तान नियमित रूप से दरबार आयोजित करता था, जहाँ अमीर, उमरा और उच्चाधिकारी उपस्थित होकर राजकीय सम्मान प्रकट करते थे। वह अनेक गौरवपूर्ण उपाधियाँ धारण करता था, जिनका उद्देश्य उसकी शक्ति, वैभव, प्रतिष्ठा तथा वैधानिक अधिकार को प्रदर्शित करना था। इन सभी राजकीय परंपराओं ने दिल्ली सल्तनत में सुल्तान की सर्वोच्च राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया तथा उसकी सत्ता को वैध और प्रभावशाली बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।




