दक्षिण भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता  (Anglo-French Rivalry in South India)

दक्षिण भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता  (Anglo-French Rivalry in South India)

कर्नाटक के युद्ध

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अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भारत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो चुकी थी। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया और केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे निर्बल होती गई। परिणामस्वरूप भारत अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। इस राजनीतिक विघटन का लाभ यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने उठाया। प्रारंभ में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य उद्देश्य केवल व्यापार करना था, लेकिन मुगल सत्ता की कमजोरी और भारतीय राज्यों की आपसी प्रतिद्वंद्विता ने उन्हें भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया।

दोनों कंपनियाँ भारत के व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती थीं। यूरोप में भी इंग्लैंड और फ्रांस लंबे समय से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे। अतः जब यूरोप में दोनों देशों के बीच युद्ध होता था, तो उसका प्रभाव भारत में भी दिखाई देता था। भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष का प्रारंभ दक्षिण भारत के कर्नाटक क्षेत्र से हुआ, जो इतिहास में कर्नाटक के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध हैं। कर्नाटक उस समय हैदराबाद के निजाम के अधीन एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था, जहाँ अंग्रेजों का प्रमुख केंद्र मद्रास और फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र पांडिचेरी था।

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748 ई.)

प्रथम कर्नाटक युद्ध का प्रमुख कारण भारत में अंग्रेजी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के बीच बढ़ती व्यापारिक प्रतिस्पर्धा थी। सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी में भारत वस्त्र, रेशम, मसाले, नील और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के कारण विश्व व्यापार का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। दोनों यूरोपीय कंपनियाँ इन वस्तुओं के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहती थीं। प्रारंभ में उनका उद्देश्य केवल व्यापारिक लाभ प्राप्त करना था, किंतु समय के साथ यह प्रतिस्पर्धा राजनीतिक और सामरिक प्रभुत्व की आकांक्षा में बदल गई। परिणामस्वरूप दोनों कंपनियाँ अपने-अपने व्यापारिक केंद्रों की रक्षा करने तथा प्रतिद्वंद्वी शक्ति के प्रभाव को समाप्त करने के लिए संघर्षरत हो गईं। यही प्रतिस्पर्धा आगे चलकर प्रथम कर्नाटक युद्ध का आधार बनी।

ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध का प्रभाव

1740 ई. में यूरोप में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध प्रारंभ हुआ, जिसमें इंग्लैंड और फ्रांस एक-दूसरे के विरोधी पक्षों में थे। यूरोप में आरंभ हुआ यह संघर्ष शीघ्र ही एशिया और अमेरिका तक फैल गया। भारत में भी अंग्रेजी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियाँ अपने-अपने देशों की शत्रुता के कारण युद्ध में उतर आईं। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर ने कहा था कि ‘यूरोप में दागे गए युद्ध के गोले ने एशिया और अमेरिका तक संघर्ष की आग पहुँचा दी।’ इससे स्पष्ट होता है कि भारत में कर्नाटक युद्ध केवल स्थानीय कारणों का परिणाम नहीं था, बल्कि यूरोपीय राजनीति का प्रत्यक्ष प्रभाव भी था।

डूप्ले की कूटनीति

उस समय पांडिचेरी का फ्रांसीसी गवर्नर जोसेफ फ्रांस्वा डूप्ले था। वह एक दूरदर्शी, महत्त्वाकांक्षी और कुशल राजनीतिज्ञ था। उसने प्रारंभ में भारत को यूरोपीय युद्ध से अलग रखने का प्रयास किया और मद्रास के अंग्रेज गवर्नर निकोलस मोर्स को तटस्थ रहने का प्रस्ताव भेजा, किंतु अंग्रेजों ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद डूप्ले ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन खान से भी दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच शांति बनाए रखने का अनुरोध किया। कुछ समय तक स्थिति शांत रही, परंतु यूरोप की परिस्थितियों ने अंततः भारत में भी युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी।

मद्रास पर फ्रांसीसियों का अधिकार

1746 ई. में मॉरीशस के फ्रांसीसी गवर्नर ला बोर्दोने एक शक्तिशाली नौसैनिक बेड़े के साथ भारत पहुँचा। उसने समुद्र में अंग्रेजी नौसेना को पराजित कर सितंबर 1746 ई. में मद्रास पर अधिकार कर लिया। यह प्रथम कर्नाटक युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद डूप्ले और ला बोर्दोने के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। ला बोर्दोने मद्रास को क्षतिपूर्ति लेकर अंग्रेजों को लौटाना चाहता था, जबकि डूप्ले उसे स्थायी रूप से फ्रांसीसी नियंत्रण में रखना चाहता था। अंततः डूप्ले की नीति प्रभावी रही और मद्रास पर फ्रांसीसी अधिकार बना रहा।

अडियार (सेंट थोमे) का युद्ध

मद्रास पर अधिकार के बाद कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन खान ने हस्तक्षेप किया। डूप्ले द्वारा वचन न निभाने से क्रोधित होकर नवाब ने अपने पुत्र महफूज खान के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। अक्टूबर 1746 ई. में अडियार नदी के निकट हुए युद्ध में फ्रांसीसी सेना ने नवाब की विशाल सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि आधुनिक हथियारों, अनुशासित प्रशिक्षण और संगठित नेतृत्व से युक्त यूरोपीय सेनाएँ संख्या में अधिक भारतीय सेनाओं को भी परास्त कर सकती थीं। इस विजय से डूप्ले की प्रतिष्ठा बढ़ी और भारतीय शासकों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।

फोर्ट सेंट डेविड और पांडिचेरी का संघर्ष

मद्रास की विजय के बाद फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों के प्रमुख दुर्ग फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार करने का प्रयास किया, किंतु वे सफल नहीं हो सके। इसके विपरीत, इंग्लैंड से सहायता मिलने के बाद अंग्रेजों ने 1748 ई. में पांडिचेरी पर आक्रमण किया, परंतु डूप्ले की प्रभावशाली रक्षा व्यवस्था के कारण उन्हें असफल होकर लौटना पड़ा। इस प्रकार दोनों पक्षों में कोई निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हो सकी।

एक्स-ला-शापेल की संधि (1748 ई.)

1748 ई. में यूरोप में एक्स-ला-शापेल की संधि संपन्न हुई, जिससे ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया। इसके साथ ही भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच युद्ध समाप्त कर दिया गया। संधि के अनुसार मद्रास अंग्रेजों को लौटा दिया गया, जबकि फ्रांस को उत्तरी अमेरिका में स्थित लुईसबर्ग वापस प्राप्त हुआ। यद्यपि भारत में कोई स्थायी क्षेत्रीय परिवर्तन नहीं हुआ, फिर भी इस युद्ध ने भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से प्रभावित किया।

प्रथम कर्नाटक युद्ध भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इस युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि यूरोपीय कंपनियाँ केवल व्यापारिक संस्थाएँ नहीं रहीं, बल्कि वे भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप कर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहती थीं। अडियार के युद्ध ने भारतीय सैन्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया तथा आधुनिक यूरोपीय सैन्य संगठन की श्रेष्ठता सिद्ध की। डूप्ले द्वारा भारतीय उत्तराधिकार संघर्षों में हस्तक्षेप की नीति ने आगे चलकर अंग्रेजों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया। यही कारण है कि प्रथम कर्नाटक युद्ध ने द्वितीय और तृतीय कर्नाटक युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार की तथा अंततः भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना और फ्रांसीसी शक्ति के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1748–1754 ई.)

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748 ई.) के समाप्त होने के बाद भी भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं हुई। यद्यपि 1748 ई. की एक्स-ला-शापेल की संधि के परिणामस्वरूप दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच अस्थायी शांति स्थापित हो गई थी, किंतु दोनों ईस्ट इंडिया कंपनियाँ भारत में व्यापारिक हितों के साथ-साथ राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहीं। प्रथम युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय राज्यों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करके यूरोपीय शक्तियाँ अपने प्रभाव का तीव्र विस्तार कर सकती हैं। इसी कारण 1748 से 1754 ई. के मध्य पुनः संघर्ष प्रारंभ हुआ, जिसे द्वितीय कर्नाटक युद्ध कहा जाता है।

इस युद्ध का मूल कारण अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की राजनीतिक तथा व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता थी। मुगल साम्राज्य के पतन और प्रांतीय राज्यों में उत्तराधिकार संबंधी विवादों ने दोनों शक्तियों को भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप का अवसर प्रदान किया। परिणामस्वरूप यह युद्ध केवल दो यूरोपीय शक्तियों का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि भारतीय उत्तराधिकार विवादों में विदेशी हस्तक्षेप का भी प्रतीक बन गया।

हैदराबाद के उत्तराधिकार का विवाद

1748 ई. में हैदराबाद राज्य के संस्थापक निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हो गया। एक ओर उनका पुत्र नासिर जंग था, जबकि दूसरी ओर पौत्र मुजफ्फर जंग निजाम बनने का दावा कर रहा था। फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने मुजफ्फर जंग का समर्थन किया, जबकि अंग्रेजों ने नासिर जंग का पक्ष लिया। इस प्रकार हैदराबाद का उत्तराधिकार विवाद दोनों यूरोपीय शक्तियों के प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख कारण बन गया।

कर्नाटक के उत्तराधिकार का विवाद

इसी समय कर्नाटक में भी उत्तराधिकार का प्रश्न विवादास्पद हो गया। तत्कालीन नवाब अनवरुद्दीन खान था, जबकि पूर्व नवाब दोस्त अली के दामाद चंदा साहब ने नवाबी पर अपना दावा प्रस्तुत किया। चंदा साहब को फ्रांसीसियों का समर्थन प्राप्त था, जबकि अंग्रेजों ने अनवरुद्दीन तथा बाद में उसके पुत्र मुहम्मद अली का समर्थन किया। इस प्रकार हैदराबाद और कर्नाटक दोनों के उत्तराधिकार विवाद द्वितीय कर्नाटक युद्ध के प्रमुख आधार बने।

तंजावुर का प्रश्न

तंजावुर की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की प्रतिद्वंद्विता को तीव्र बना दिया। फ्रांसीसी गवर्नर ड्यूमा ने तंजावुर के शासक की सहायता के बदले कारीकल प्राप्त कर लिया था। इसके उत्तर में अंग्रेजों ने तंजावुर के विवाद में हस्तक्षेप कर देवीकोट्टई पर अधिकार कर लिया। इससे दोनों शक्तियों के बीच अविश्वास और संघर्ष की भावना और अधिक बढ़ गई।

अंबूर का युद्ध (1749 ई.)

द्वितीय कर्नाटक युद्ध की पहली निर्णायक घटना 3 अगस्त 1749 ई. को लड़ा गया अंबूर का युद्ध था। डूप्ले ने मुजफ्फर जंग और चंदा साहब के साथ मिलकर कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन खान पर आक्रमण किया। इस युद्ध में अनवरुद्दीन मारा गया और उसका पुत्र मुहम्मद अली त्रिचनापल्ली भाग गया।

अंबूर की विजय के बाद चंदा साहब कर्नाटक का नवाब बना। उसने अपनी सफलता के उपलक्ष्य में फ्रांसीसियों को अनेक भू-भाग तथा आर्थिक सुविधाएँ प्रदान कीं। इस विजय से दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव अपने चरम पर पहुँच गया।

हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव की स्थापना

अंग्रेजों ने फ्रांसीसी प्रभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से नासिर जंग का समर्थन किया। 1750 ई. में नासिर जंग ने सेना के साथ अभियान प्रारंभ किया, किंतु डूप्ले ने अपनी कूटनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए उसके कई प्रमुख सरदारों को अपनी ओर मिला लिया। परिणामस्वरूप दिसंबर 1750 ई. में नासिर जंग की हत्या कर दी गई और मुजफ्फर जंग को हैदराबाद का निजाम घोषित किया गया।

कुछ समय बाद मुजफ्फर जंग भी मारा गया, तब फ्रांसीसी सेनापति चार्ल्स जोसेफ बूसी ने सलाबत जंग को हैदराबाद के सिंहासन पर बैठाया। कृतज्ञतावश सलाबत जंग ने फ्रांसीसियों को उत्तरी सरकार के अनेक जिलों का अधिकार प्रदान किया। इससे हैदराबाद दरबार में फ्रांसीसी प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।

त्रिचनापल्ली का संघर्ष एवं अर्काट की विजय

अंबूर की पराजय के बाद भी मुहम्मद अली ने संघर्ष जारी रखा और त्रिचनापल्ली में अंग्रेजों की सहायता की प्रतीक्षा करने लगा। 1751 ई. में मद्रास के गवर्नर थॉमस सॉन्डर्स ने उसकी सहायता के लिए सेना भेजी। इसी बीच अंग्रेज अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव ने एक साहसिक योजना प्रस्तुत की कि यदि कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अधिकार कर लिया जाए, तो चंदा साहब त्रिचनापल्ली का घेरा छोड़ने के लिए विवश हो जाएगा।

अगस्त 1751 ई. में क्लाइव ने लगभग 200 यूरोपीय सैनिकों और 300 भारतीय सिपाहियों के साथ अर्काट पर अधिकार कर लिया। इसके बाद राजा साहब ने विशाल सेना के साथ अर्काट का घेरा डाला, किंतु लगभग 53 दिनों तक क्लाइव ने अद्भुत साहस और नेतृत्व का परिचय देते हुए किले की सफल रक्षा की। अंततः अंग्रेजी सहायता पहुँचने पर राजा साहब को पीछे हटना पड़ा। अर्काट की विजय ने रॉबर्ट क्लाइव को एक कुशल सेनानायक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया और अंग्रेजों का मनोबल अत्यधिक बढ़ गया। 1752 ई. में त्रिचनापल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया तथा चंदा साहब की हत्या कर दी गई। इसके बाद मुहम्मद अली को कर्नाटक का वैध नवाब स्वीकार कर लिया गया।

डूप्ले की वापसी एवं पांडिचेरी की संधि

लगातार असफलताओं और आर्थिक संकट के कारण फ्रांसीसी सरकार डूप्ले की नीति से असंतुष्ट हो गई। परिणामस्वरूप 1754 ई. में उसे वापस बुला लिया गया और उसके स्थान पर चार्ल्स रॉबर्ट गोदेहू को भारत का गवर्नर नियुक्त किया गया। गोदेहू ने युद्ध के स्थान पर समझौते की नीति अपनाई।

1754 ई. में पांडिचेरी की संधि संपन्न हुई। इसके अनुसार दोनों कंपनियों ने भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया तथा अधिकांश विजित प्रदेश लौटाने पर सहमति व्यक्त की। यद्यपि यह संधि स्थायी सिद्ध नहीं हुई, क्योंकि 1756 ई. में सप्तवर्षीय युद्ध प्रारंभ होते ही दोनों शक्तियाँ पुनः आमने-सामने आ गईं

द्वितीय कर्नाटक युद्ध भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इस युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए भारतीय राज्यों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप आवश्यक माना जाने लगा था। प्रारंभिक चरण में डूप्ले ने उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं, किंतु अंततः अंग्रेज अधिक लाभ की स्थिति में रहे। रॉबर्ट क्लाइव की अर्काट विजय ने अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को अत्यधिक बढ़ाया, जबकि डूप्ले की वापसी ने भारत में फ्रांसीसी साम्राज्यवादी नीति को गंभीर आघात पहुँचाया।

इस युद्ध ने अंग्रेजों को यह विश्वास दिलाया कि सीमित संसाधनों, अनुशासित सेना, प्रभावी नेतृत्व और कूटनीतिक कौशल के आधार पर भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया जा सकता है। यही अनुभव आगे चलकर बंगाल तथा दक्षिण भारत में अंग्रेजी शक्ति के तीव्र विस्तार का आधार बना। इसलिए द्वितीय कर्नाटक युद्ध को भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना की दिशा में एक निर्णायक मोड़ तथा फ्रांसीसी शक्ति के क्रमिक पतन का प्रारंभ माना जाता है।

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756–1763 ई.)

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756–1763 ई.) भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच लड़े गए तीन कर्नाटक युद्धों का अंतिम तथा सबसे निर्णायक युद्ध था। इस युद्ध ने भारत में यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष का अंतिम निर्णय कर दिया। यह केवल दक्षिण भारत तक सीमित संघर्ष नहीं था, बल्कि यूरोप में चल रहे सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.) का भारतीय विस्तार था। इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजों का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हुआ तथा फ्रांसीसियों की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया।

1754 ई. की पांडिचेरी संधि के बाद अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच अस्थायी शांति स्थापित हुई थी, किंतु यह अधिक समय तक नहीं टिक सकी। 1756 ई. में इंग्लैंड और फ्रांस के बीच पुनः युद्ध छिड़ गया, जिसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा। दोनों देशों की ईस्ट इंडिया कंपनियाँ भारत में व्यापारिक और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए फिर आमने-सामने आ गईं।

उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति भी यूरोपीय हस्तक्षेप के लिए अनुकूल थी। मुगल साम्राज्य का केंद्रीय नियंत्रण कमजोर पड़ चुका था और अनेक भारतीय शासक अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए यूरोपीय शक्तियों की सहायता लेते थे। अंग्रेज बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर चुके थे, जबकि फ्रांसीसी अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करना चाहते थे। यही परिस्थितियाँ तृतीय कर्नाटक युद्ध का प्रमुख कारण बनीं।

बंगाल में अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति

1757 ई. के प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला को पराजित कर बंगाल पर अंग्रेजी प्रभाव स्थापित कर लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने चंद्रनगर स्थित फ्रांसीसी व्यापारिक केंद्र पर भी अधिकार कर लिया। बंगाल की अपार संपत्ति और राजस्व ने अंग्रेजों को पर्याप्त आर्थिक संसाधन, सैनिक शक्ति तथा नौसैनिक सहायता प्रदान की। इसके विपरीत, फ्रांसीसी कंपनी आर्थिक संकट से जूझ रही थी। उसे फ्रांस से पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही थी, जिससे उसकी सैन्य और आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई। यही कारण था कि आगे चलकर अंग्रेजों को निर्णायक बढ़त मिली।

काउंट डी लाली का भारत आगमन

फ्रांसीसी सरकार ने भारत में अपनी शक्ति पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से काउंट थॉमस आर्थर डी लाली को 1758 ई. में भारत भेजा। लाली साहसी और योग्य सैनिक था, किंतु उसे भारतीय राजनीति का अनुभव नहीं था। उसका कठोर स्वभाव भी उसके लिए बाधक बना। वह भारत में कार्यरत फ्रांसीसी अधिकारियों और व्यापारियों का विश्वास प्राप्त नहीं कर सका। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी नेतृत्व में एकता का अभाव बना रहा और अंग्रेजों ने इसका पूरा लाभ उठाया।

फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार

भारत पहुँचने के बाद लाली ने अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रामक अभियान प्रारंभ किया। जून 1758 ई. में उसने अंग्रेजों के महत्त्वपूर्ण दुर्ग फोर्ट सेंट डेविड पर अधिकार कर लिया। यह फ्रांसीसियों की अंतिम बड़ी सफलता थी।

इसके बाद लाली ने तंजावुर के शासक से कंपनी का बकाया धन प्राप्त करने के उद्देश्य से तंजावुर पर आक्रमण किया, किंतु यह अभियान असफल रहा। लंबा घेरा, धन की कमी और अंग्रेजों की बढ़ती सैन्य सहायता के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। इस असफलता से फ्रांसीसी प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँची।

मद्रास का घेरा

तंजावुर में असफल होने के बाद लाली ने अंग्रेजों के प्रमुख केंद्र मद्रास पर अधिकार करने का प्रयास किया। उसने हैदराबाद से प्रसिद्ध सेनापति चार्ल्स जोसेफ बूसी को भी वापस बुला लिया, जिससे हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त होने लगा और अंग्रेजों ने वहाँ अपना प्रभाव बढ़ा लिया।

दिसंबर 1758 ई. में लाली ने मद्रास का घेरा डाला, किंतु धन, रसद और नौसैनिक सहायता के अभाव में वह सफलता प्राप्त नहीं कर सका। दूसरी ओर अंग्रेजों को समुद्री मार्ग से लगातार सहायता मिलती रही। अंततः फरवरी 1759 ई. में लाली को घेरा हटाना पड़ा। यह असफलता फ्रांसीसियों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई।

वांडिवाश का युद्ध (1760 ई.)

मद्रास की असफलता के बाद युद्ध निर्णायक चरण में पहुँच गया। अंग्रेजों ने सर आयर कूट के नेतृत्व में फ्रांसीसियों के विरुद्ध अभियान चलाया। 22 जनवरी 1760 ई. को वांडिवाश के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

इस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी सेना को पूरी तरह पराजित कर दिया। प्रसिद्ध फ्रांसीसी सेनापति बूसी बंदी बना लिया गया और लाली को पीछे हटना पड़ा। इतिहासकार जी. बी. मालेसन के अनुसार ‘वांडिवाश की विजय ने उस भवन को ध्वस्त कर दिया जिसकी नींव फ्रांसिस मार्टिन, ड्यूमा और डूप्ले ने रखी थी।’ यह युद्ध भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक शक्ति के अंत का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

पांडिचेरी का पतन

वांडिवाश की विजय के बाद अंग्रेजों ने फ्रांसीसी ठिकानों पर क्रमशः अधिकार करना प्रारंभ किया। उन्होंने करैकल, जिन्जी और माहे जैसे प्रमुख केंद्रों पर कब्जा कर लिया। अंततः जनवरी 1761 ई. में अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया, जो भारत में फ्रांसीसी सत्ता का मुख्य केंद्र था।

पांडिचेरी के पतन के साथ ही भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य स्थापित करने की सभी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और फ्रांसीसी केवल कुछ व्यापारिक बस्तियों तक सीमित रह गए।

पेरिस की संधि (1763 ई.)

1763 ई. में इंग्लैंड और फ्रांस के बीच पेरिस की संधि हुई, जिससे सप्तवर्षीय युद्ध समाप्त हो गया। इस संधि के अनुसार पांडिचेरी, चंद्रनगर, करैकल, माहे और यानम जैसी फ्रांसीसी बस्तियाँ उन्हें वापस कर दी गईं, किंतु उन्हें वहाँ किलेबंदी करने या बड़ी सेना रखने की अनुमति नहीं दी गई। उन्हें केवल व्यापार करने का अधिकार मिला। इस प्रकार भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अंत हो गया

तृतीय कर्नाटक युद्ध भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण युद्ध था। इसके परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच लंबे समय से चल रहे संघर्ष का अंतिम निर्णय हो गया। अंग्रेज भारत की सबसे शक्तिशाली यूरोपीय शक्ति बनकर उभरे, जबकि फ्रांसीसी केवल व्यापारिक शक्ति तक सीमित रह गए।

इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि समुद्री शक्ति, आर्थिक संसाधन और संगठित प्रशासन किसी भी औपनिवेशिक शक्ति की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। बंगाल की संपत्ति, अंग्रेजी नौसेना की श्रेष्ठता तथा कंपनी की आर्थिक मजबूती ने अंग्रेजों को निर्णायक सफलता दिलाई। इसके विपरीत फ्रांसीसी सरकार की उदासीनता, आर्थिक संकट, नौसैनिक कमजोरी और अधिकारियों के मतभेद उनकी पराजय के प्रमुख कारण सिद्ध हुए।

तृतीय कर्नाटक युद्ध केवल अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच अंतिम संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद अंग्रेजों के सामने कोई शक्तिशाली यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी नहीं रह गया। पेरिस की संधि के बाद अंग्रेजों का राजनीतिक प्रभाव निरंतर बढ़ता गया और आगे चलकर उन्होंने संपूर्ण भारत में अपने औपनिवेशिक शासन की मजबूत नींव रखी।

भारत में अंग्रेजों की सफलता तथा फ्रांसीसियों की असफलता के कारण

अठारहवीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच राजनीतिक तथा व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए संघर्ष हुआ, जिसे मुख्यतः ‘कर्नाटक के तीन युद्धों’ के रूप में जाना जाता है। इन युद्धों का परिणाम अंग्रेजों की निर्णायक विजय और फ्रांसीसियों की राजनीतिक पराजय के रूप में सामने आया। यद्यपि प्रारंभ में डूप्ले जैसे कुशल फ्रांसीसी अधिकारियों ने उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की, फिर भी अंततः अंग्रेजों ने भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इसके पीछे अनेक आर्थिक, सैन्य, राजनीतिक और प्रशासनिक कारण थे।

मजबूत आर्थिक स्थिति

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक स्थिति फ्रांसीसी कंपनी की तुलना में अधिक सुदृढ़ थी। उसका व्यापार व्यापक और लाभदायक था, जिससे उसे युद्धों के लिए पर्याप्त धन प्राप्त होता था। दूसरी ओर, फ्रांसीसी कंपनी आर्थिक संकट से जूझती रही और संसाधनों के अभाव में सैनिकों, हथियारों तथा युद्ध सामग्री की व्यवस्था प्रभावी ढंग से नहीं कर सकी।

बंगाल की संपत्ति का लाभ

1757 ई. के प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजों को बंगाल की अपार संपत्ति, नियमित राजस्व और सैनिक सहायता प्राप्त हुई। इन संसाधनों का उपयोग उन्होंने दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के विरुद्ध युद्धों में किया। बंगाल की आर्थिक शक्ति ने अंग्रेजों को निर्णायक बढ़त प्रदान की।

अंग्रेजी कंपनी का निजी स्वरूप

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी संस्था थी, जिसके अधिकारी लाभ और सफलता के प्रति अधिक उत्तरदायी थे। उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी प्राप्त थी। इसके विपरीत फ्रांसीसी कंपनी पर सरकार का नियंत्रण था, जिसके कारण निर्णयों में विलंब होता था और कार्यकुशलता प्रभावित होती थी।

अंग्रेजी सरकार एवं नौसेना का सहयोग

आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी सरकार ने कंपनी को सैनिक, आर्थिक और नौसैनिक सहायता प्रदान की। ब्रिटिश नौसेना विश्व की सबसे शक्तिशाली नौसेनाओं में थी, जिसके कारण अंग्रेज समुद्री मार्गों से सैनिक, हथियार और रसद आसानी से भारत पहुँचा सके। इसके विपरीत फ्रांसीसी नौसेना अपेक्षाकृत कमजोर थी।

योग्य एवं संगठित नेतृत्व

अंग्रेजों को रॉबर्ट क्लाइव, स्ट्रिंगर लॉरेंस और सर आयर कूट जैसे कुशल सेनानायक मिले। उनके बीच समन्वय, अनुशासन और संगठन था। दूसरी ओर, फ्रांसीसी अधिकारियों—डूप्ले, ला बोर्दोने, बूसी और डी लाली—के बीच लगातार मतभेद रहे, जिससे उनकी शक्ति कमजोर हुई।

डूप्ले की वापसी और लाली की त्रुटियाँ

1754 ई. में डूप्ले को वापस बुलाना फ्रांस की बड़ी राजनीतिक भूल थी। उसके बाद काउंट डी लाली भारत आया, किंतु वह भारतीय परिस्थितियों से अपरिचित था। उसने बूसी को हैदराबाद से वापस बुलाकर फ्रांसीसी प्रभाव को कमजोर कर दिया तथा मद्रास और तंजावुर अभियानों में भी असफल रहा।

यूरोपीय राजनीति का प्रभाव

सप्तवर्षीय युद्ध के दौरान फ्रांस यूरोप और अन्य उपनिवेशों में युद्धों में व्यस्त रहा, इसलिए भारत को पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकी। इसके विपरीत इंग्लैंड ने अपनी समुद्री शक्ति और वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क के बल पर भारत में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की।

भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता अनेक कारणों का संयुक्त परिणाम थी। अंग्रेजों की आर्थिक मजबूती, बंगाल की संपत्ति, शक्तिशाली नौसेना, सक्षम नेतृत्व, निजी कंपनी की कार्यकुशलता और सरकार का सहयोग उनकी विजय के प्रमुख आधार बने। दूसरी ओर, फ्रांसीसी कंपनी की आर्थिक कमजोरी, सरकारी नियंत्रण, अधिकारियों के मतभेद, डूप्ले की वापसी, डी लाली की रणनीतिक भूलें तथा यूरोप में फ्रांस की व्यस्तता उनकी पराजय के मुख्य कारण बने। परिणामस्वरूप भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की सबसे प्रभावशाली यूरोपीय शक्ति के रूप में उत्थान हुआ।

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