निकोलस द्वितीय (1894–1917 ई.)
निकोलस द्वितीय (निकोलाई अलेक्ज़ान्द्रोविच रोमानोव) रूसी साम्राज्य का अंतिम सम्राट था तथा उसके पदत्याग के साथ लगभग तीन शताब्दियों से शासन कर रहे रोमानोव वंश का अंत हो गया। उसकी शिक्षा निजी शिक्षकों के निर्देशन में हुई तथा उसे मुख्यतः सैन्य प्रशिक्षण दिया गया था, किंतु शासन-प्रशासन की जटिल समस्याओं से निपटने के लिए उसका प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं सिद्ध हुआ। निकोलस द्वितीय के शासनकाल में रूस ने एक ओर औद्योगिक विकास, रेलवे विस्तार तथा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उल्लेखनीय प्रगति की, वहीं दूसरी ओर देश गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकटों से भी जूझता रहा। वह निरंकुश राजसत्ता का प्रबल समर्थक था और संवैधानिक शासन की माँगों का लगातार विरोध करता रहा। 1905 की रूसी क्रांति के दबाव में उसने ड्यूमा (संसद) की स्थापना स्वीकार की, किंतु उसकी शक्तियों को सीमित रखा और वास्तविक सत्ता अपने हाथों में बनाए रखी। इस कारण उदारवादियों, समाजवादियों तथा अन्य राजनीतिक समूहों में उसके प्रति असंतोष निरंतर बढ़ता गया 1904–05 ई. के रूस-जापान युद्ध में रूस की पराजय ने निकोलस द्वितीय की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया और 1905 ई. की क्रांति को जन्म दिया। यद्यपि उसने कुछ सीमित सुधार किए, फिर भी जनता का असंतोष समाप्त नहीं हुआ। प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918 ई.) के दौरान रूस को लगातार सैन्य पराजयों, आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी तथा प्रशासनिक अव्यवस्था का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों में जार शासन के प्रति जनता का विश्वास और अधिक कमजोर कर हो गयाऔर इसने व्यापक विरोध को जन्म दिया।
मार्च 1917 ई. में फरवरी क्रांति के परिणामस्वरूप निकोलस द्वितीय को सिंहासन त्यागने के लिए विवश होना पड़ा। इसके साथ ही रोमानोव वंश का लगभग 304 वर्षों का शासन समाप्त हो गया। पदत्याग के बाद उसे और उसके परिवार को पहले अंतरिम सरकार तथा बाद में बोल्शेविकों की हिरासत में रखा गया। 17 जुलाई 1918 ई. को येकातेरिनबर्ग में निकोलस द्वितीय की परिवार सहित हत्या कर दी गई।
सोवियत काल में उसे एक कठोर और अयोग्य निरंकुश शासक के रूप में चित्रित किया गया। किंतु सोवियत संघ के विघटन के बाद उसके व्यक्तित्व और शासन का पुनर्मूल्यांकन प्रारंभ हुआ। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि निकोलस द्वितीय व्यक्तिगत रूप से सदाशयी और धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, परंतु वह बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को समझने तथा प्रभावी नेतृत्व प्रदान करने में असफल रहा। 1998 ई. में उसके अवशेषों का पुनः अंतिम संस्कार किया गया और 2000 ई. में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने उसे तथा उसके परिवार को ‘पैशन बेयरर्स’ (मसीह की भाँति कष्ट सहने वाले संत) के रूप में मान्यता प्रदान की।
आरंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
निकोलस द्वितीय (निकोलाई अलेक्ज़ान्द्रोविच रोमानोव) का जन्म 18 मई 1868 ई. (पुरानी रूसी तिथि: 6 मई 1868 ई.) को सेंट पीटर्सबर्ग के दक्षिण में स्थित त्सार्स्कोये सेलो के अलेक्ज़ेंडर पैलेस में हुआ था। उस समय रूस का सम्राट उसका दादा अलेक्जेंडर द्वितीय था। उसके पिता अलेक्जेंडर अलेक्ज़ान्द्रोविच तत्कालीन ‘त्सेसारेविच’ (सिंहासन के उत्तराधिकारी) था, जो बाद में अलेक्जेंडर तृतीय के रूप में रूस के सम्राट हुआ। उसकी माता मारिया फ्योदोरोव्ना मूलतः डेनमार्क की राजकुमारी डैगमार थीं, जो डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन नवम और रानी लुईस की पुत्री थीं। इस प्रकार निकोलस का जन्म यूरोप के सबसे प्रतिष्ठित शाही परिवारों में हुआ था और वह जन्म से ही रूसी साम्राज्य का भावी उत्तराधिकारी माना जाता था।
निकोलस द्वितीय का नामकरण संस्कार 1 जून 1868 ई. (पुरानी रूसी तिथि के अनुसार 20 मई) को कैथरीन पैलेस के ‘चैपल ऑफ़ द रिज़रेक्शन’ में संपन्न हुआ। रोमानोव राजवंश की परंपरा के अनुसार उन्हें ‘निकोलस’ नाम दिया गया। परिवार और निकट संबंधियों के बीच उन्हें स्नेहपूर्वक ‘निकी’ कहकर पुकारा जाता था।
निकोलस द्वितीय का संबंध यूरोप के अनेक प्रमुख राजवंशों से था। उनकी माता मारिया फ्योदोरोव्ना, जो जन्म से डेनमार्क की राजकुमारी डैगमार थीं, के माध्यम से उनका संबंध डेनमार्क, ब्रिटेन, यूनान और अन्य यूरोपीय शाही परिवारों से स्थापित हुआ। उनके मामा डेनमार्क के राजा फ्रेडरिक अष्टम और यूनान के राजा जॉर्ज प्रथम थे, जबकि ब्रिटेन की महारानी एलेक्ज़ेण्ड्रा उनकी मौसी थीं। इस प्रकार निकोलस द्वितीय ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम, जर्मनी के सम्राट विल्हेम द्वितीय, नॉर्वे के राजा हाकोन सप्तम, डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन दशम और यूनान के राजा कॉन्स्टेंटाइन प्रथम जैसे शासकों के निकट संबंधी थे। इन पारिवारिक संबंधों ने उन्हें यूरोपीय राजनीति और कूटनीति में विशेष स्थान प्रदान किया।
बाल्यकाल और पारिवारिक जीवन
निकोलस द्वितीय का बचपन एक अनुशासित, धार्मिक और स्नेहपूर्ण पारिवारिक वातावरण में बीता। उनके पिता सम्राट अलेक्जेंडर तृतीय और माता महारानी मारिया फ्योदोरोव्ना ने उनके पालन-पोषण में राजकीय अनुशासन के साथ पारिवारिक मूल्यों को भी महत्त्व दिया। उनके पाँच छोटे भाई-बहन थे—अलेक्जेंडर (1869–1870 ई.), जॉर्ज (1871–1899 ई.), ज़ेनिया (1875–1960 ई.), माइकल (1878–1918 ई.) और ओल्गा (1882–1960 ई.)। निकोलस अपनी माता के अत्यंत निकट थे और अपने पिता के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था।
शाही परिवार से संबंधित होने के बावजूद निकोलस का जीवन अत्यधिक विलासितापूर्ण नहीं था। उसके दैनिक जीवन में सादगी, धार्मिक अनुशासन और शारीरिक प्रशिक्षण को महत्त्व दिया जाता था। उसे नियमित समय पर उठने, अध्ययन करने और सैन्य गतिविधियों में भाग लेने की आदत डाली गई। उसके निजी कक्ष में एक रत्नों से सुसज्जित धार्मिक चित्र (आइकॉन) प्रमुख स्थान पर था, जो उसकी गहरी धार्मिक आस्था को दर्शाता था।
बचपन में निकोलस अपने परिवार के साथ डेनमार्क की यात्राएँ करता था, जहाँ वह फ्रेडेन्सबोर्ग और बर्नस्टोर्फ़ महलों में समय बिताता था। इन यात्राओं के दौरान उसे यूरोप के विभिन्न राजपरिवारों से मिलने का अवसर मिला। 1873 ई. में उसने अपने माता-पिता और छोटे भाई जॉर्ज के साथ ब्रिटेन की यात्रा की, जहाँ उनका स्वागत ब्रिटिश राजपरिवार द्वारा किया गया। इन अनुभवों ने निकोलस को यूरोपीय राजपरंपराओं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से परिचित कराया।
शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण
निकोलस और उसके भाई जॉर्ज की शिक्षा समान शिक्षकों के मार्गदर्शन में हुई। भावी सम्राट के रूप में उसे इतिहास, कानून, विदेशी भाषाओं, प्रशासन और सैन्य प्रशिक्षण की शिक्षा दी गई। उसके प्रमुख शिक्षकों में जनरल ग्रेगरी डैनिलोविच और रूसी विचारक कॉन्स्टेंटिन पोबेदोनोस्त्सेव शामिल थे। अंग्रेजी शिक्षक चार्ल्स हीथ ने उसकी अंग्रेजी भाषा तथा खेलों में रुचि विकसित की।
निकोलस अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा में दक्ष था तथा जर्मन और डेनिश भाषाओं का भी ज्ञान रखता था। पोबेदोनोस्त्सेव के प्रभाव से उसमें निरंकुश राजतंत्र और रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के प्रति गहरी निष्ठा विकसित हुई। वह मानता था कि सम्राट का अधिकार ईश्वरीय व्यवस्था से प्राप्त होता है और राजतंत्र रूस की स्थिरता का आधार है।
यद्यपि उसकी शिक्षा उसे एक विशाल साम्राज्य के प्रभावी संचालन के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर सकी। उसकी रुचि प्रशासनिक समस्याओं की अपेक्षा सैन्य जीवन, पारिवारिक संबंधों और व्यक्तिगत गतिविधियों में अधिक थी। स्वभाव से वह शांत, विनम्र, संकोची और अंतर्मुखी व्यक्ति था। यही व्यक्तिगत गुण बाद में उसके शासनकाल की शक्तियों और कमजोरियों दोनों का कारण बने।
निकोलस का बचपन रूस में बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों के दौर में बीता। फरवरी 1880 ई. में नास्तिवादी (निहिलिज़्म) क्रांतिकारियों ने सेंट पीटर्सबर्ग स्थित विंटर पैलेस के भोजन कक्ष में बम विस्फोट किया। इस हमले से महल को क्षति पहुँची, किंतु शाही परिवार सुरक्षित बच गया। इसके बाद सम्राट अलेक्जेंडर तृतीय ने सुरक्षा कारणों से अपने परिवार का निवास येलागिन द्वीप स्थित येलागिन पैलेस में स्थानांतरित कर दिया। इन घटनाओं ने निकोलस को कम उम्र में ही रूसी राजशाही के सामने उपस्थित राजनीतिक असंतोष और सुरक्षा चुनौतियों से परिचित कराया।
त्सेसारेविच के रूप में निकोलस
1 मार्च 1881 ई. को क्रांतिकारी संगठन नारोदनाया वोल्या के सदस्यों ने सम्राट अलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या कर दी। इसके बाद निकोलस के पिता अलेक्जेंडर तृतीय रूस के सम्राट बने और निकोलस को उत्तराधिकारी (त्सेसारेविच) घोषित किया गया। इस समय से उन्हें भविष्य के सम्राट के रूप में विशेष प्रशिक्षण दिया जाने लगा।
अलेक्जेंडर तृतीय ने सुरक्षा कारणों से शाही परिवार का मुख्य निवास सेंट पीटर्सबर्ग से लगभग 48 किलोमीटर दूर स्थित गैचिना पैलेस में स्थानांतरित कर दिया। इसी काल में निकोलस ने अपनी निजी डायरी लिखना प्रारंभ किया, जो बाद में उनके जीवन और शासनकाल के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत बनी।
निकोलस अपना अधिकांश अवकाश डेनमार्क में बिताते थे और फिनलैंड के क्षेत्रों की यात्राएँ भी करते थे। गर्मियों में शाही परिवार त्सार्स्कोये सेलो स्थित अलेक्जेंडर पैलेस या क्रीमिया स्थित लिवडिया पैलेस में रहता था। इन यात्राओं और पारिवारिक वातावरण ने उसके व्यक्तित्व को प्रभावित किया।
युवावस्था और वैवाहिक संबंधों का आरंभ
1884 ई. में विंटर पैलेस में निकोलस के वयस्क होने का समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर उन्होंने अपने पिता सम्राट अलेक्जेंडर तृतीय के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए राज्य सेवा का संकल्प लिया। इसी वर्ष उनके चाचा ग्रैंड ड्यूक सर्गेई अलेक्ज़ेण्ड्रोविच का विवाह राजकुमारी एलिज़ाबेथ से हुआ। एलिज़ाबेथ हेसे के ग्रैंड ड्यूक लुई चतुर्थ और ब्रिटेन की राजकुमारी एलिस की पुत्री थीं तथा महारानी विक्टोरिया की पौत्री थीं।
इस विवाह समारोह के दौरान निकोलस की मुलाकात एलिज़ाबेथ की छोटी बहन राजकुमारी एलिक्स से हुई। उस समय निकोलस सोलह वर्ष और एलिक्स बारह वर्ष की थीं। पहली मुलाकात में ही निकोलस एलिक्स से प्रभावित हुए। 1889 ई. में जब एलिक्स पुनः रूस आईं, तब दोनों के बीच संबंध और अधिक घनिष्ठ हो गए। यह संबंध धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया और आगे चलकर निकोलस के व्यक्तिगत जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष बना।
एलिक्स जर्मन मूल की लूथरन थीं। रूसी शाही परिवार में विवाह के लिए उन्हें रूसी ऑर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार करना आवश्यक था। प्रारंभ में उन्होंने धर्म परिवर्तन को लेकर संकोच किया, किंतु बाद में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। विवाह के बाद वे महारानी अलेक्ज़ान्द्रा फ्योदोरोव्ना के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
विश्व यात्रा और विदेश अनुभव
अक्टूबर 1890 ई. में निकोलस ने अपने छोटे भाई ग्रैंड ड्यूक जॉर्ज और चचेरे भाई यूनान के राजकुमार जॉर्ज के साथ विश्व यात्रा प्रारंभ की। यह यात्रा क्रूजर ‘पामियात अज़ोवा’ से की गई थी। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझना तथा भावी सम्राट के रूप में निकोलस को अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्रदान करना था।
इस यात्रा के दौरान निकोलस भारत, मिस्र, सिंगापुर, सियाम (वर्तमान थाईलैंड) और अन्य देशों में गए। बॉम्बे पहुँचने के बाद उनके भाई जॉर्ज अस्वस्थ हो गए, जिसके कारण उन्हें रूस लौटना पड़ा, जबकि निकोलस ने अपनी यात्रा जारी रखी। विभिन्न देशों में उनका राजकीय अतिथि के रूप में स्वागत किया गया। इस यात्रा ने उन्हें यूरोपीय और एशियाई संस्कृतियों, विदेशी शासन प्रणालियों तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने का अवसर दिया।
1891 ई. में जापान यात्रा के दौरान निकोलस पर ओत्सु नगर में हमला हुआ। जापानी पुलिस अधिकारी त्सुदा संज़ो ने तलवार से उन पर प्रहार किया, जिससे उनके माथे पर लगभग 9 सेंटीमीटर लंबा घाव हुआ। इस घटना को ‘ओत्सु घटना’ कहा जाता है। हालांकि निकोलस इस हमले में बच गए, किंतु उनकी जापान यात्रा समाप्त कर दी गई। इस घटना ने उनके मन में जापान के प्रति कुछ हद तक अविश्वास भी उत्पन्न किया।
जापान से लौटने के बाद निकोलस व्लादिवोस्तोक पहुँचे, जहाँ उन्होंने ट्रांस-साइबेरियन रेलवे परियोजना के उद्घाटन समारोह में भाग लिया। यह परियोजना रूस के आर्थिक विस्तार और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी।
1893 ई. में निकोलस अपने माता-पिता के प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैंड गए। वहाँ उनके चचेरे भाई ड्यूक ऑफ यॉर्क (बाद में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम) का विवाह राजकुमारी मैरी ऑफ टेक से हुआ। इसी अवसर पर महारानी विक्टोरिया ने निकोलस और जॉर्ज पंचम के बीच अत्यधिक समानता को देखा। दोनों के चेहरे इतने मिलते-जुलते थे कि कई बार लोगों को उन्हें पहचानने में भ्रम होता था।
इसी अवधि में निकोलस का सेंट पीटर्सबर्ग की प्रसिद्ध बैले नर्तकी मथिल्डे क्शेसिंस्काया से संबंध स्थापित हुआ। यह संबंध कुछ समय तक चला, किंतु निकोलस के मन में राजकुमारी एलिक्स के प्रति प्रेम अधिक गहरा था। अंततः उन्होंने मथिल्डे को स्पष्ट कर दिया कि वे एलिक्स से विवाह करना चाहते हैं। इसके बाद दोनों का संबंध समाप्त हो गया।
प्रशासनिक अनुभव और उत्तराधिकार की तैयारी
निकोलस द्वितीय ने अपने पिता के शासनकाल में उत्तराधिकारी (त्सेसारेविच) के रूप में सीमित प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया। वे स्टेट काउंसिल की बैठकों में भाग लेते थे, किंतु उन्हें वास्तविक शासन संबंधी निर्णयों में अधिक भूमिका नहीं दी गई थी। अलेक्जेंडर तृतीय को विश्वास था कि उनके पास पुत्र को शासन के लिए तैयार करने के लिए पर्याप्त समय है, क्योंकि उस समय उनकी आयु लगभग चालीस वर्ष थी और निकोलस के सिंहासन संभालने में अभी कई वर्ष शेष समझे जाते थे।
हालाँकि, वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे का विचार इससे अलग था। उनका मानना था कि भावी सम्राट को केवल सैद्धांतिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशासनिक अनुभव भी प्राप्त करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि निकोलस को साइबेरियन रेलवे समिति जैसे महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों से जोड़ा जाए, ताकि वह आर्थिक और प्रशासनिक मामलों को निकट से समझ सके।
अलेक्जेंडर तृतीय अपने पुत्र के स्वभाव से परिचित थे। उनका मानना था कि निकोलस व्यक्तिगत रूप से अच्छा और विनम्र व्यक्ति है, किंतु उसमें कठोर राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता अपेक्षाकृत कम है। दूसरी ओर, विट्टे को विश्वास था कि अनुभव के अभाव में निकोलस को भविष्य में शासन संचालन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
अलेक्जेंडर तृतीय की यह धारणा कि उनके पास पुत्र को तैयार करने के लिए पर्याप्त समय है, गलत सिद्ध हुई। 1894 ई. तक उनका स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा और वे निकोलस को सम्राट बनने की जिम्मेदारियों के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं कर सके।
विवाह का निर्णय
अप्रैल 1894 ई. में निकोलस जर्मनी के कोबर्ग नगर गए, जहाँ हेसे के ग्रैंड ड्यूक अर्नेस्ट लुई के विवाह समारोह का आयोजन था। इस अवसर पर यूरोप के अनेक प्रमुख राजपरिवारों के सदस्य उपस्थित थे। इसी दौरान निकोलस ने राजकुमारी एलिक्स के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। प्रारंभ में एलिक्स ने इसे स्वीकार करने में संकोच किया, क्योंकि रूसी ऑर्थोडॉक्स धर्म अपनाने का निर्णय उनके लिए कठिन था।
परिवार और संबंधियों के समझाने के बाद एलिक्स ने विवाह के लिए सहमति प्रदान की। 20 अप्रैल 1894 ई. को निकोलस और एलिक्स की आधिकारिक सगाई हो गई। प्रारंभ में निकोलस के माता-पिता इस विवाह के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि रूस में एलिक्स को पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त नहीं थी और उनके विदेशी मूल के कारण राजनीतिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती थीं। किंतु अलेक्जेंडर तृतीय के गिरते स्वास्थ्य और निकोलस की इच्छा को देखते हुए उन्होंने अंततः इस संबंध को स्वीकार कर लिया।
इस प्रकार निकोलस द्वितीय और एलिक्स का विवाह केवल व्यक्तिगत प्रेम संबंध नहीं था, बल्कि यह रूसी शाही परिवार और यूरोपीय राजवंशों के बीच एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और पारिवारिक संबंध भी था। आगे चलकर यही विवाह निकोलस द्वितीय के शासनकाल और रोमानोव परिवार के इतिहास की प्रमुख घटनाओं से जुड़ गया।
निकोलस द्वितीय का सिंहासनारोहण
1894 ई. में निकोलस ने इंग्लैंड की यात्रा की, जहाँ उन्होंने राजकुमारी एलिक्स और महारानी विक्टोरिया से भेंट की। इसी दौरान ड्यूक और डचेस ऑफ यॉर्क के पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर ब्रिटेन के राजा एडवर्ड अष्टम बना। निकोलस और एलिक्स उनके नामकरण समारोह में शामिल हुए और उनके धार्मिक संरक्षक (गॉडपेरेंट्स) बने।
रूस लौटने के बाद निकोलस अपनी बहन ज़ेनिया के विवाह समारोह में शामिल हुए। इसी समय उनके पिता सम्राट अलेक्जेंडर तृतीय का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा। 1894 ई. के शरद ऋतु में चिकित्सकों ने स्पष्ट कर दिया कि उनका जीवन अधिक समय तक नहीं बच सकेगा। इसके बाद राजकुमारी एलिक्स को क्रीमिया स्थित लिवडिया पैलेस बुलाया गया, जहाँ वे 22 अक्टूबर को पहुँचीं।
मृत्यु से पहले अलेक्जेंडर तृतीय ने पूर्ण सैन्य वेशभूषा में निकोलस को शासन संबंधी महत्त्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने अपने पुत्र को अनुभवी अधिकारियों, विशेषकर वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे की सलाह लेने की आवश्यकता पर बल दिया। 20 अक्टूबर 1894 ई. को 49 वर्ष की आयु में अलेक्जेंडर तृतीय का निधन हो गया और उसी दिन निकोलस द्वितीय रूस के नए सम्राट बने। अगले दिन एलिक्स ने रूसी ऑर्थोडॉक्स धर्म स्वीकार कर लिया और उन्हें अलेक्ज़ेंड्रा फ्योदोरोव्ना नाम प्रदान किया गया।
निकोलस द्वितीय और अलेक्ज़ेंड्रा फ्योदोरोव्ना का विवाह
निकोलस द्वितीय और अलेक्ज़ेंड्रा फ्योदोरोव्ना का विवाह 26 नवंबर 1894 ई. को सेंट पीटर्सबर्ग स्थित विंटर पैलेस में हुआ। यह विवाह अलेक्जेंडर तृतीय की मृत्यु के लगभग एक महीने बाद ही संपन्न हुआ था, इसलिए शोक अवधि के कारण समारोह अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रखा गया।
इस विवाह को रूसी समाज के कुछ वर्गों ने आलोचनात्मक दृष्टि से देखा। उनका मानना था कि नई महारानी का आगमन शोक की अवधि के तुरंत बाद हुआ, जिससे राजपरिवार के प्रति कुछ लोगों में नकारात्मक भावना उत्पन्न हुई। इस प्रकार निकोलस द्वितीय का शासनकाल व्यक्तिगत दुख, नई राजनीतिक जिम्मेदारियों और बदलती परिस्थितियों के बीच प्रारंभ हुआ।
निकोलस द्वितीय और महारानी अलेक्ज़ेंड्रा फ्योदोरोव्ना की पाँच संतानें थीं। उनकी पहली पुत्री ओल्गा का जन्म 15 नवंबर 1895 ई. को हुआ। इसके बाद तात्याना का जन्म 10 जून 1897 ई., मारिया का 26 जून 1899 ई. और अनास्तासिया का 18 जून 1901 ई. को हुआ। 12 अगस्त 1904 ई. को उनके एकमात्र पुत्र एलेक्सी का जन्म हुआ, जिसे रूसी सिंहासन का उत्तराधिकारी (त्सारेविच) घोषित किया गया।
एलेक्सी हीमोफिलिया B नामक आनुवंशिक रक्त संबंधी बीमारी से पीड़ित था। यह रोग उसे अपनी माता अलेक्ज़ेंड्रा के माध्यम से प्राप्त हुआ, जिनका वंश ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से जुड़ा था। यह बीमारी यूरोप के कई राजपरिवारों में पाई गई थी और इसे “शाही बीमारी” के नाम से भी जाना जाता है। एलेक्सी की बीमारी ने शाही परिवार के व्यक्तिगत जीवन और बाद में रूसी राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया। आधुनिक आनुवंशिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि अनास्तासिया इस बीमारी की वाहक थीं, हालांकि उनमें इसके प्रत्यक्ष लक्षण दिखाई नहीं दिए।
एलेक्सी की बीमारी
निकोलस द्वितीय और महारानी अलेक्ज़ेंड्रा फ्योदोरोव्ना के एकमात्र पुत्र एलेक्सी रोमानोव का जन्म 12 अगस्त 1904 ई. को हुआ था। वह रूसी साम्राज्य का उत्तराधिकारी (त्सारेविच) था, किंतु जन्म से ही हीमोफिलिया B नामक वंशानुगत रक्तस्राव संबंधी रोग से पीड़ित था। यह बीमारी उसे अपनी माता अलेक्ज़ेंड्रा के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जो ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के वंश से संबंधित आनुवंशिक रोग की वाहक थीं। इस रोग के कारण एलेक्सी के रक्त में थक्का बनने की क्षमता कम थी, जिससे छोटी-सी चोट भी उसके जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती थी।
शाही परिवार ने एलेक्सी की बीमारी को लंबे समय तक गुप्त रखा, क्योंकि उत्तराधिकारी के स्वास्थ्य को लेकर जनता और राजनीतिक वर्ग में चिंता उत्पन्न हो सकती थी। 1912 ई. तक यह जानकारी केवल परिवार के कुछ निकट सदस्यों और विश्वसनीय लोगों तक सीमित थी। एलेक्सी की बीमारी ने महारानी अलेक्ज़ेंड्रा के जीवन को अत्यधिक प्रभावित किया। वह अपने पुत्र के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहती थीं और उसके उपचार के लिए चिकित्सकों के साथ-साथ धार्मिक व्यक्तियों की सहायता भी लेती थीं।
रासपुतिन का शाही परिवार में प्रभाव
इसी परिस्थिति में साइबेरिया के किसान और धार्मिक रहस्यवादी ग्रिगोरी रासपुतिन का शाही परिवार में प्रभाव बढ़ा। 1911 ई. के बाद वह विशेष रूप से महारानी अलेक्ज़ेंड्रा के निकट आ गया। महारानी को विश्वास था कि रासपुतिन में एलेक्सी के रक्तस्राव को नियंत्रित करने और उसकी पीड़ा कम करने की क्षमता है। जब भी एलेक्सी की स्थिति गंभीर होती थी, रासपुतिन की सलाह या उपस्थिति के बाद उसके स्वास्थ्य में सुधार दिखाई देता था, जिससे महारानी का विश्वास उस पर और अधिक मजबूत हो गया।
रासपुतिन के प्रति रूसी समाज की प्रतिक्रिया मिश्रित थी। कुछ लोग उसे आध्यात्मिक शक्ति वाला व्यक्ति मानते थे, जबकि अनेक अभिजात वर्ग, राजनेता और आलोचक उसे संदिग्ध चरित्र वाला व्यक्ति समझते थे। शाही परिवार पर उसके बढ़ते प्रभाव के कारण राजतंत्र की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची और यह धारणा बनने लगी कि महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर एक साधारण धार्मिक व्यक्ति का अत्यधिक प्रभाव है।
रासपुतिन की वास्तविक भूमिका इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय रही है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उसने मानसिक प्रभाव, प्रार्थना और शांत वातावरण के माध्यम से एलेक्सी की स्थिति में सुधार करने में सहायता की। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार भी तनाव में कमी और मानसिक शांति रोगी के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
कुछ विद्वानों का मत है कि रासपुतिन ने एलेक्सी को एस्पिरिन देने से रोककर अप्रत्यक्ष रूप से उसकी सहायता की। उस समय एस्पिरिन सामान्य दर्द निवारक दवा के रूप में प्रयोग होती थी, किंतु बाद में यह ज्ञात हुआ कि यह रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और हीमोफिलिया रोगियों में रक्तस्राव बढ़ा सकती है।
महारानी अलेक्ज़ेंड्रा के गहरे विश्वास के कारण निकोलस द्वितीय भी धीरे-धीरे रासपुतिन पर निर्भर होने लगे। परिणामस्वरूप रासपुतिन का प्रभाव केवल शाही परिवार के निजी जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने रूसी राजशाही की छवि और राजनीतिक परिस्थितियों को भी प्रभावित किया। आगे चलकर रासपुतिन का नाम रूसी साम्राज्य के पतन और 1917 ई. की क्रांति से जुड़े विवादों में प्रमुख रूप से सामने आया।
निरंकुश शासन
निकोलस द्वितीय ने 1894 ई. में रूस की सत्ता संभालने के बाद अपने पिता अलेक्जेंडर तृतीय की निरंकुश शासन नीति को जारी रखने का निर्णय लिया। यद्यपि 1893 ई. में ब्रिटेन यात्रा के दौरान उसने हाउस ऑफ कॉमन्स की कार्यवाही देखी थी और संवैधानिक राजशाही व्यवस्था से परिचित हुआ था, फिर भी वह रूस में निर्वाचित प्रतिनिधियों को वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं था। उसका विश्वास था कि रूस जैसे विशाल साम्राज्य के लिए सम्राट की पूर्ण सत्ता आवश्यक है।
सिंहासनारोहण के बाद जब विभिन्न नगरों की स्थानीय संस्थाओं (ज़ेमस्त्वो) के प्रतिनिधि विंटर पैलेस पहुँचे, तो उन्होंने ‘त्वेर एड्रेस’ के माध्यम से प्रशासनिक और सामाजिक सुधारों की माँग रखी। इन माँगों में संवैधानिक व्यवस्था की स्थापना, किसानों की स्थिति में सुधार तथा श्रमिकों को अधिक अधिकार देने जैसे सुझाव शामिल थे। यद्यपि प्रतिनिधियों ने सम्राट के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की थी, किंतु निकोलस द्वितीय ने इन प्रस्तावों को राजसत्ता के अधिकारों में हस्तक्षेप के रूप में देखा।
निकोलस ने इंपीरियल फ़ैमिली काउंसिल की सलाह की भी उपेक्षा करते हुए ज़ेमस्त्वो प्रतिनिधियों को स्पष्ट रूप से बताया कि वह रूस में निरंकुश शासन की परंपरा को बनाए रखने के लिए पूरी शक्ति लगाएगा। उसने अपने पिता अलेक्जेंडर तृतीय की नीतियों का अनुसरण करने की घोषणा की और शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक परिवर्तन की संभावनाओं को अस्वीकार कर दिया। यह दृष्टिकोण आगे चलकर उसके शासन और जनता के बीच बढ़ती दूरी का एक प्रमुख कारण बना।
राज्याभिषेक समारोह (1896 ई.)
26 मई 1896 ई. को मॉस्को के क्रेमलिन स्थित उस्पेंस्की कैथेड्रल में निकोलस द्वितीय का भव्य राज्याभिषेक समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर रूस के विभिन्न भागों से हजारों लोग मॉस्को पहुँचे। समारोह में रूसी अभिजात वर्ग के साथ-साथ अनेक विदेशी प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। फिनलैंड के भावी राष्ट्रपति कार्ल गुस्ताफ एमिल मैनरहेम भी उन अधिकारियों में शामिल थे जिन्हें राज्याभिषेक समारोह में सम्राट के साथ चलने का दायित्व दिया गया था।
निकोलस द्वितीय ने अपने शासन के आरंभिक वर्षों में अपनी राजकीय पहचान को रूसी परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया। उसने पश्चिमी शैली की ‘सम्राट’ उपाधि की अपेक्षा रूसी परंपरा से जुड़ी ‘ज़ार’ उपाधि को अधिक महत्त्व दिया। यह निर्णय उसकी पुरानी रूसी राजसत्ता और निरंकुश शासन व्यवस्था के प्रति निष्ठा को दर्शाता था।
खोडिंका मैदान की त्रासदी (1896 ई.)
राज्याभिषेक समारोह के कुछ दिनों बाद मॉस्को के निकट खोडिंका मैदान में जनता के लिए एक विशाल उत्सव आयोजित किया गया। इस अवसर पर लोगों को भोजन, बीयर और स्मृति-चिह्न के रूप में कप वितरित किए जाने थे। खोडिंका मैदान का चयन इसलिए किया गया था क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने की सुविधा थी, किंतु यह क्षेत्र मूल रूप से सैन्य प्रशिक्षण स्थल था और इसकी भूमि असमतल थी।
उत्सव शुरू होने से पहले यह अफवाह फैल गई कि उपहार और भोजन सभी लोगों के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। इसके कारण भीड़ में अफरा-तफरी मच गई और हजारों लोग तेजी से आगे बढ़ने लगे। अत्यधिक दबाव के कारण अनेक लोग गिर गए और कुचल गए। इस दुर्घटना में लगभग 1,389 लोगों की मृत्यु हुई तथा लगभग 1,300 लोग घायल हुए।
इस घटना ने निकोलस द्वितीय के शासन की शुरुआत पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला। जनता के एक वर्ग ने इसे नए ज़ार के शासन का अशुभ संकेत माना। दुर्घटना के बाद उसी रात फ्रांसीसी राजदूत द्वारा आयोजित समारोह में निकोलस की उपस्थिति को लेकर भी आलोचना हुई। यद्यपि निकोलस मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त करना चाहता था, किंतु उसके सलाहकारों ने फ्रांस के साथ संबंधों और 1894 ई. के फ्रांको-रूसी गठबंधन को ध्यान में रखते हुए समारोह में उपस्थित रहने की सलाह दी। इससे जनता में यह धारणा बनी कि ज़ार जनभावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं है।
प्रारंभिक शासन
राज्याभिषेक के बाद निकोलस द्वितीय और महारानी एलेक्जेंड्रा ने यूरोप की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रिया-हंगरी के सम्राट, जर्मनी के कैसर विल्हेम द्वितीय और डेनमार्क के शाही परिवार से मुलाकात की। इसके बाद वे शाही जहाज़ ‘स्टैंडार्ट’ से स्कॉटलैंड पहुँचे, जहाँ उन्होंने महारानी विक्टोरिया से भेंट की।
एलेक्जेंड्रा अपनी दादी महारानी विक्टोरिया से मिलकर प्रसन्न थीं, किंतु निकोलस इस यात्रा से विशेष प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने अपनी माता को लिखे पत्र में यात्रा की कठिनाइयों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का उल्लेख किया था।
निकोलस द्वितीय के शासन संभालने के समय उसके पास प्रशासनिक अनुभव सीमित था। प्रारंभिक वर्षों में उसने अपनी माता मारिया फ्योदोरोव्ना के अनुभव और सलाह पर निर्भरता रखी। उसकी पत्नी महारानी एलेक्जेंड्रा फ्योदोरोव्ना का भी धीरे-धीरे राजकीय मामलों में प्रभाव बढ़ने लगा। निकोलस व्यक्तिगत रूप से निर्णय लेने में संकोची था, किंतु निरंकुश सत्ता में विश्वास रखता था।
इतिहासकारों के अनुसार शासन के शुरुआती वर्षों में निकोलस अपने चाचाओं, विशेषकर ग्रैंड ड्यूक एलेक्सी अलेक्जेंड्रोविच के प्रभाव में रहा। शाही परिवार का जीवन मुख्यतः निजी गतिविधियों तक सीमित था। वे प्रायः फ़िनलैंड के तटों और द्वीपों पर समय बिताते थे तथा शाही नौका ‘स्टैंडार्ट’ से यात्राएँ करते थे। इस प्रकार निकोलस का प्रारंभिक शासन व्यक्तिगत रुचियों, पारिवारिक प्रभावों और निरंकुश राजसत्ता को बनाए रखने के प्रयासों के बीच आगे बढ़ा।
निरंकुश शासन की नीति
निकोलस द्वितीय ने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में मानवीय मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय शांति के विचारों में रुचि दिखाई। उसने 1893 ई. में आयोजित प्रथम हेग सम्मेलन में भाग लिया, जिसका उद्देश्य देशों के बीच उत्पन्न विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और युद्ध की संभावना को कम करना था। हालांकि, शासन संबंधी अनुभव की कमी, सीमित राजनीतिक समझ और जनता से प्रत्यक्ष संपर्क के अभाव के कारण वह धीरे-धीरे अपने रूढ़िवादी सलाहकारों के प्रभाव में आ गया।
निकोलस द्वितीय की राजनीतिक विचारधारा का मुख्य आधार पूर्ण निरंकुश शासन व्यवस्था थी। वह मानता था कि रूस में ज़ार की सत्ता ईश्वर द्वारा प्रदत्त अधिकार है और इसे किसी भी प्रकार से सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसी कारण वह संवैधानिक सुधारों, निर्वाचित प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार देने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विस्तार के विचारों का विरोध करता था। वह अपने पिता अलेक्जेंडर तृतीय की तरह रूसी राजसत्ता की पारंपरिक निरंकुश व्यवस्था को बनाए रखने का समर्थक था।
निकोलस द्वितीय का व्यक्तित्व विरोधाभासी था। व्यक्तिगत जीवन में वह शांत, विनम्र, धार्मिक और परिवार के प्रति अत्यंत समर्पित व्यक्ति था, किंतु एक विशाल साम्राज्य के शासक के रूप में उसमें आवश्यक राजनीतिक दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव था। वह एक कुशल प्रशासक की अपेक्षा एक अच्छे पति और पिता के रूप में अधिक सफल माना जाता है। उसका स्वभाव संकोची और विवादों से बचने वाला था। वह कठिन राजनीतिक निर्णयों को लेने में अक्सर हिचकिचाता था और अपने सलाहकारों पर निर्भर रहता था। अपने पिता की भाँति वह भी रूढ़िवादी विचारों का समर्थक था और रूस की पारंपरिक संस्थाओं, राजशाही तथा रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च की भूमिका को बनाए रखना चाहता था। निकोलस ने पश्चिमी राजनीतिक प्रभावों की अपेक्षा रूसी परंपराओं को अधिक महत्त्व दिया। इसी भावना के कारण उसने ‘सम्राट’ की उपाधि के स्थान पर ‘ज़ार’ की उपाधि को अधिक पसंद किया, क्योंकि यह रूसी इतिहास और राजकीय परंपराओं से अधिक जुड़ी हुई थी।
शासन के अनेक मामलों में निकोलस द्वितीय ने अपनी पत्नी महारानी एलेक्जेंड्रा फ्योदोरोव्ना को प्रभाव डालने का अवसर दिया। विशेष रूप से अधिकारियों की नियुक्ति और दरबार से जुड़े विषयों में महारानी की भूमिका बढ़ती गई। अपने पुत्र एलेक्सी की बीमारी और उत्तराधिकार संबंधी चिंताओं के कारण भी निकोलस कई बार ऐसे निर्णयों से बचता रहा, जिनसे शाही परिवार की स्थिति प्रभावित हो सकती थी।
आर्थिक एवं औद्योगिक विकास
निकोलस द्वितीय के शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसके पिता अलेक्जेंडर तृतीय की आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाया गया। उसके शासनकाल में रूस के औद्योगिक विकास को गति मिली और आर्थिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। 1896 ई. में आयोजित ‘ऑल-रूस प्रदर्शनी’ को सरकार का समर्थन प्राप्त हुआ, जिसने रूसी उद्योग और तकनीकी प्रगति को प्रदर्शित किया।
1897 ई. में वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे ने स्वर्ण मानक लागू किया। इस सुधार से रूसी मुद्रा व्यवस्था को स्थिरता मिली और विदेशी निवेश को आकर्षित करने में सहायता मिली। यह आर्थिक नीति रूस को आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास थी।
इसी अवधि में ट्रांस-साइबेरियन रेलवे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाया गया। यह रेलवे रूस के पश्चिमी भागों को सुदूर पूर्व से जोड़ने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। इससे व्यापार, संचार और सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा मिला। 1902 ई. तक इसका अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका था, यद्यपि परियोजना का पूर्ण विकास आगे भी जारी रहा।
सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन
निकोलस द्वितीय के शासन के प्रारंभिक दशक में रूस में महत्त्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हुए। कृषि प्रधान रूसी समाज धीरे-धीरे औद्योगिक समाज में बदलने लगा। औद्योगिक विकास की नींव अलेक्जेंडर तृतीय के शासनकाल में रखी गई थी, किंतु निकोलस के समय में यह प्रक्रिया और तेज हुई। 1880 से 1910 ई. के बीच रूस की आर्थिक वृद्धि दर उल्लेखनीय रही।
औद्योगिक विकास के साथ अनेक सामाजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि की समस्या, 1861 ई. में कृषि दास प्रथा समाप्त होने के बाद किसानों की कठिनाइयाँ और शहरों में बढ़ता श्रमिक वर्ग असंतोष के प्रमुख कारण बने। श्रमिकों की खराब परिस्थितियाँ, कम मजदूरी और सीमित राजनीतिक अधिकारों ने सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ाया।
इन सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का लाभ समाजवादी क्रांतिकारी दलों तथा मार्क्सवादी समूहों ने उठाया। उन्होंने जनता के असंतोष को संगठित किया और रूसी शासन व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन को मजबूत किया। इस प्रकार निकोलस द्वितीय के शासनकाल में आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता भी लगातार बढ़ती गई।
आंतरिक राजनीति
राजसत्ता और व्यक्तिगत विचारधारा
निकोलस द्वितीय के शासनकाल में रूस की आंतरिक राजनीति पर उसकी व्यक्तिगत मान्यताओं और निरंकुश शासन की विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा। वह यह विश्वास करता था कि सम्राट की सत्ता ईश्वर द्वारा प्रदत्त है और वह केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है। इसी कारण वह राजकीय अधिकारों को सीमित करने या जनता को व्यापक राजनीतिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं था। उसके लिए पूर्ण निरंकुश शासन व्यवस्था को बनाए रखना केवल राजनीतिक नीति नहीं, बल्कि सम्राट के रूप में उसका पवित्र दायित्व था।
हालाँकि, निकोलस द्वितीय में इस विशाल साम्राज्य का प्रभावी संचालन करने के लिए आवश्यक राजनीतिक क्षमता और दृढ़ निर्णय शक्ति का अभाव था। वह अक्सर कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने में संकोच करता था और बदलती हुई सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियाँ बनाने में असफल रहा। उसकी निरंकुश व्यवस्था के प्रति निष्ठा दृढ़ थी, किंतु वह रूस में उत्पन्न हो रही नई राजनीतिक चेतना और जनता की बढ़ती माँगों को समझने में सक्षम नहीं हो सका।
दरबारी प्रभाव और रासपुतिन की भूमिका
निकोलस द्वितीय अपने मंत्रियों पर पूरी तरह विश्वास नहीं करता था। उसे आशंका रहती थी कि शक्तिशाली मंत्री उसकी सत्ता और अधिकारों को चुनौती दे सकते हैं। इसके विपरीत, वह कई बार ऐसे व्यक्तियों के प्रभाव में आ गया जिनकी प्रशासनिक योग्यता और राजनीतिक समझ संदिग्ध थी। इससे सम्राट और वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों के बीच दूरी बढ़ती गई।
महारानी एलेक्जेंड्रा फ्योदोरोव्ना पर साइबेरियाई धार्मिक रहस्यवादी ग्रिगोरी रासपुतिन का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था। रासपुतिन के माध्यम से शाही दरबार में ऐसे लोगों का प्रभाव बढ़ा जो निरंकुश शासन के समर्थक थे। शाही परिवार का जीवन मुख्य रूप से अलेक्जेंडर पैलेस तक सीमित हो गया था, जिसके कारण वे आम जनता की समस्याओं और बढ़ते असंतोष से दूर होते गए। निकोलस द्वितीय ने अधिकांशतः अपने पिता अलेक्जेंडर तृतीय की रूढ़िवादी नीतियों को ही जारी रखने का प्रयास किया।
रूसीकरण की नीति और राजनीतिक सुधार
निकोलस द्वितीय की आंतरिक नीति में रूसीकरण का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसका उद्देश्य साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में रूसी भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करना था। विशेष रूप से फ़िनलैंड में इस नीति को कठोर रूप से लागू किया गया, जिससे वहाँ राजनीतिक असंतोष बढ़ा। सरकार ने स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं को सीमित करने और रूसी प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
1905 ई. की रूसी क्रांति ने निकोलस द्वितीय को कुछ राजनीतिक सुधार करने के लिए बाध्य किया। प्रधानमंत्री सर्गेई विट्टे के प्रयासों से अक्टूबर घोषणा-पत्र जारी किया गया। इसके अंतर्गत रूस में ड्यूमा नामक प्रतिनिधि संस्था की स्थापना की गई और नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान किए गए। इनमें भाषण की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और सभा करने का अधिकार प्रमुख थे।
ड्यूमा और निरंकुशता की पुनर्स्थापना
यद्यपि ड्यूमा की स्थापना से रूस में संवैधानिक शासन की दिशा में कुछ प्रगति हुई, किंतु निकोलस द्वितीय ने अपने निरंकुश अधिकारों को समाप्त नहीं किया। उसे ड्यूमा द्वारा पारित कानूनों को अस्वीकार करने और संसद को भंग करने का अधिकार प्राप्त था। उसने 1906 ई. और 1907 ई. में इस अधिकार का प्रयोग करते हुए ड्यूमा को समाप्त कर दिया।
समय के साथ सरकार ने कई सुधारों को सीमित कर दिया और पुनः पुरानी निरंकुश व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया। ड्यूमा को वास्तविक राजनीतिक शक्ति नहीं मिली, जिसके कारण सम्राट और संसद के बीच लगातार संघर्ष बना रहा। इस स्थिति ने जनता में असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ावा दिया।
प्रधानमंत्री और प्रशासनिक समस्याएँ
सर्गेई विट्टे के बाद नियुक्त प्रधानमंत्री प्रभावी प्रशासनिक सुधार लागू करने में सफल नहीं हो सके। महारानी एलेक्जेंड्रा और शाही परिवार के निकटस्थ लोगों का मंत्रियों की नियुक्ति और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रभाव बढ़ता गया। इवान गोरेमिकिन जैसे प्रधानमंत्री कमजोर प्रशासन के लिए आलोचना के पात्र बने, जबकि प्योत्र स्टोलिपिन ने कृषि और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया।
प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ तक रूस में सामाजिक और राजनीतिक तनाव अत्यधिक बढ़ चुका था। श्रमिक वर्ग बेहतर अधिकारों की माँग कर रहा था, किसान भूमि संबंधी समस्याओं से परेशान थे और शिक्षित वर्ग राजनीतिक सुधारों की अपेक्षा कर रहा था। निकोलस द्वितीय की निरंकुश शासन व्यवस्था इन बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल स्थापित करने में असफल रही, जिसके परिणामस्वरूप राजसत्ता की लोकप्रियता लगातार कमजोर होती गई।
धार्मिक विश्वास और राजसत्ता की अवधारणा
निकोलस द्वितीय की शासन व्यवस्था पर उसके गहरे धार्मिक विश्वासों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। वह दृढ़तापूर्वक मानता था कि ईश्वर ने उसे रूस का ज़ार बनने के लिए नियुक्त किया है और उसकी सत्ता दैवी अधिकार पर आधारित है। इसी कारण वह अपनी राजकीय शक्ति को पवित्र और असीमित मानता था तथा संवैधानिक नियंत्रण या जनप्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार देने के पक्ष में नहीं था।
निकोलस को विश्वास था कि रूसी जनता अपने सम्राट के प्रति निष्ठावान और सम्मानपूर्ण भावना रखती है। जब वह सार्वजनिक अवसरों पर जनता के बीच जाता था और लोगों का उत्साह देखता था, तो वह इसे अपने शासन के प्रति समर्थन के रूप में समझता था। उसकी धार्मिक आस्था ने उसे परंपरावादी और दृढ़ विचारों वाला बनाया, किंतु इसी कारण वह राजनीतिक सुधारों और सीमित राजतंत्र की माँगों को स्वीकार करने में असमर्थ रहा।
उसकी धार्मिक और राजसत्तात्मक सोच ने उसे समाज के बदलते राजनीतिक विचारों से दूर कर दिया। रूसी अभिजात वर्ग में जहाँ संवैधानिक सुधारों की माँग बढ़ रही थी, वहीं निकोलस द्वितीय पुराने निरंकुश सिद्धांतों को बनाए रखने पर जोर देता रहा। इसके परिणामस्वरूप शासक वर्ग, चर्च और सामान्य जनता के बीच दूरी तथा अविश्वास बढ़ता गया।
सेराफिम ऑफ़ सरोव का संत
1903 ई. में निकोलस द्वितीय सेराफिम ऑफ़ सरोव को संत घोषित किए जाने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हुआ। उस समय यह विश्वास प्रचलित था कि सेराफिम को संत घोषित करने से शाही परिवार को पुत्र प्राप्त होगा, जो आगे चलकर रूसी सिंहासन का उत्तराधिकारी बनेगा।
जुलाई 1902 ई. में महारानी अलेक्ज़ेंड्रा फ़्योदोरोव्ना ने सेराफिम को शीघ्र संत घोषित करने की इच्छा व्यक्त की। निकोलस द्वितीय ने भी इस विचार का समर्थन किया और प्रक्रिया को जल्द पूरा करने का प्रयास किया। यद्यपि कुछ धार्मिक अधिकारियों ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई, फिर भी शाही परिवार के प्रभाव के कारण जनवरी 1903 ई. में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने सेराफिम ऑफ़ सरोव को संत घोषित करने की अनुमति प्रदान कर दी।
इसके बाद 1903 ई. की गर्मियों में निकोलस द्वितीय और शाही परिवार सरोव पहुँचे, जहाँ सेराफिम के संत घोषित किए जाने से संबंधित भव्य धार्मिक समारोह आयोजित किए गए। यह घटना निकोलस द्वितीय की धार्मिक आस्था और रूसी ऑर्थोडॉक्स परंपराओं के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता का परिचायक है।
विदेश नीति
निकोलस द्वितीय की विदेश नीति पर उसके व्यक्तिगत विचारों, राजनीतिक अनुभवों की सीमाओं और सलाहकारों के प्रभाव का गहरा प्रभाव पड़ा। उसके जीवनीकारों के अनुसार, वह कई बार ऐसे व्यक्तियों पर भी विश्वास कर लेता था, जिनकी योग्यता और विश्वसनीयता संदिग्ध थी। यही प्रवृत्ति उसकी विदेश नीति में भी दिखाई देती है। कई अवसरों पर उसके अनिश्चित निर्णयों और बदलते रुख के कारण उसके पारंपरिक सलाहकारों में चिंता उत्पन्न हुई।
उस समय रूस का विदेश मंत्रालय भी पहले की तुलना में उतना प्रभावशाली और विशेषज्ञता आधारित संस्थान नहीं रह गया था। राजनयिक अधिकारियों की नियुक्ति और पदोन्नति में योग्यता के स्थान पर व्यक्तिगत संबंधों और संरक्षण की भूमिका बढ़ गई थी। इसके परिणामस्वरूप रूस की विदेश नीति के संचालन में कई बार स्पष्टता और प्रभावशीलता का अभाव दिखाई दिया।
ऑस्ट्रिया-रूस संबंध और बाल्कन नीति
अप्रैल 1897 ई. में ऑस्ट्रिया-हंगरी के सम्राट फ्रांज जोसेफ प्रथम ने रूस की राजकीय यात्रा की। यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों के लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। इस अवसर पर बाल्कन क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने तथा यूरोपीय शक्ति-संतुलन को बनाए रखने के संबंध में दोनों देशों के बीच समझ विकसित हुई।
इसके अतिरिक्त कॉन्स्टेंटिनोपल और जलडमरूमध्य (स्ट्रेट्स) के प्रश्न पर भी दोनों देशों के बीच आपसी सहमति बनी। इस समझौते के कारण कुछ वर्षों तक यूरोप में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही। इस शांतिपूर्ण वातावरण ने रूस सहित यूरोपीय देशों को आर्थिक विकास और औद्योगिक विस्तार के अवसर प्रदान किए।
हेग शांति सम्मेलन और अंतर्राष्ट्रीय शांति प्रयास
निकोलस द्वितीय ने अपने पिता अलेक्जेंडर तृतीय की विदेश नीति को आगे बढ़ाते हुए फ्रांको-रूसी गठबंधन को मजबूत करने और यूरोप में शांति बनाए रखने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से उसने 1899 ई. में हेग शांति सम्मेलन आयोजित करने की पहल की।
इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हथियारों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना, युद्ध की संभावनाओं को कम करना तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए नियम स्थापित करना था। यद्यपि बड़ी शक्तियों के बीच आपसी अविश्वास और प्रतिस्पर्धा के कारण सम्मेलन अपने सभी उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी हेग सम्मेलन ने अंतर्राष्ट्रीय कानून और युद्ध संबंधी नियमों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
निकोलस द्वितीय को इस पहल के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति समर्थक शासक के रूप में पहचान मिली। 1901 ई. में हेग शांति प्रयासों में योगदान के लिए उसे तथा रूसी राजनयिक फ्रेडरिक मार्टेंस को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।
हालाँकि, कुछ इतिहासकारों का मत है कि हेग सम्मेलन के पीछे केवल मानवीय और शांतिवादी उद्देश्य ही नहीं थे। उनके अनुसार, रूस की आर्थिक और सैन्य परिस्थितियों ने भी इस पहल को प्रभावित किया। रूस हथियारों की दौड़ को सीमित करके अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करना चाहता था और यूरोप में अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहता था।
निकोलस द्वितीय की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य फ्रांस के साथ गठबंधन को मजबूत करना, यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखना, हथियारों की प्रतिस्पर्धा को सीमित करना और अंतर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण उपायों से करना थे। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने 1899 ई. के हेग सम्मेलन को सक्रिय समर्थन प्रदान किया।
रूस-जापान युद्ध (1904–1905 ई.)
बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक रूस और जापान के बीच पूर्वी एशिया में प्रभुत्व स्थापित करने को लेकर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी। रूस ने यूरोप में विस्तार की सीमित संभावनाओं के कारण अपनी साम्राज्यवादी नीति का केंद्र एशिया की ओर स्थानांतरित कर दिया था। विशेष रूप से मंचूरिया और कोरिया क्षेत्र रूस के लिए आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। दूसरी ओर, जापान भी मेइजी पुनर्स्थापन के बाद तीव्र गति से आधुनिक सैन्य और औद्योगिक शक्ति के रूप में उभर रहा था तथा पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था।
रूस की सुदूर पूर्व नीति और जापान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के कारण दोनों देशों के हितों में टकराव बढ़ने लगा। निकोलस द्वितीय ने मंचूरिया और कोरिया में रूसी प्रभाव विस्तार का समर्थन किया। उसने बेज़ोब्राज़ोव समूह की उन योजनाओं को भी प्रोत्साहित किया, जिनके अंतर्गत कोरिया में आर्थिक अधिकार और लकड़ी के व्यापार के माध्यम से रूस अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। जापान ने इसे अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखा।
1901 ई. में निकोलस द्वितीय ने अपने बहनोई प्रशिया के राजकुमार हेनरी से बातचीत में कहा था कि वह कोरिया पर प्रत्यक्ष अधिकार स्थापित करने के इच्छुक नहीं हैं, किंतु वह किसी भी परिस्थिति में जापान को वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाने की अनुमति नहीं देंगे। यह दृष्टिकोण रूस और जापान के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता था।
रूस और जापान के बीच बढ़ता हुआ तनाव अंततः फरवरी 1904 ई. में युद्ध में परिवर्तित हो गया। युद्ध की औपचारिक घोषणा से पहले ही जापान ने पोर्ट आर्थर में स्थित रूसी प्रशांत बेड़े पर अचानक हमला कर दिया। यह आक्रमण रूस के लिए अप्रत्याशित था और इससे जापान को प्रारंभिक रणनीतिक लाभ प्राप्त हुआ। पोर्ट आर्थर रूसी नौसैनिक शक्ति का प्रमुख केंद्र था। जापानी आक्रमण के बाद रूसी बेड़े को भारी क्षति पहुँची और वह प्रभावी रूप से घिर गया। इसके बाद रूस ने अपने बाल्टिक बेड़े को सहायता के लिए भेजने का निर्णय लिया। यह बेड़ा यूरोप से पूर्वी एशिया तक पहुँचने के लिए लगभग नौ महीने की लंबी यात्रा पर रवाना हुआ।
रास्ते में रूस को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ब्रिटेन, जो जापान का सहयोगी था, ने रूसी नौसेना को स्वेज नहर के उपयोग की अनुमति नहीं दी। इसके अतिरिक्त डॉगर बैंक घटना ने रूस और ब्रिटेन के संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया, जब रूसी बाल्टिक बेड़े ने भ्रमवश उत्तरी सागर में ब्रिटिश मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर गोलीबारी कर दी। मई 1905 ई. में त्सुशिमा के नौसैनिक युद्ध में जापान ने रूसी बाल्टिक बेड़े को लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। यह रूस की सबसे बड़ी सैन्य पराजयों में से एक थी और इससे जापान की आधुनिक सैन्य शक्ति का प्रदर्शन हुआ।
रूस की सैन्य और रसद संबंधी समस्याएँ
रूस-जापान युद्ध में रूस को केवल सैन्य पराजय ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक और रसद संबंधी कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। युद्ध क्षेत्र सेंट पीटर्सबर्ग से बहुत दूर पूर्वी एशिया में स्थित था। सैनिकों और युद्ध सामग्री की आपूर्ति के लिए रूस मुख्य रूप से ट्रांस-साइबेरियन रेलवे पर निर्भर था।
सेंट पीटर्सबर्ग से पोर्ट आर्थर तक लगभग 9,200 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन थी, किंतु इसका अधिकांश भाग एकल मार्ग वाला था। बैकाल झील के निकट रेलवे व्यवस्था भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी। इसके कारण सैनिकों, हथियारों और आवश्यक वस्तुओं को युद्ध क्षेत्र तक पहुँचाने में अत्यधिक समय लगता था।
रसद संबंधी इन समस्याओं के कारण रूसी सेना प्रभावी ढंग से युद्ध संचालन नहीं कर सकी। लगभग नौ महीने की घेराबंदी के बाद जापानी सेना ने पोर्ट आर्थर पर अधिकार कर लिया, जिससे रूस की स्थिति और कमजोर हो गई।
पोर्ट्समाउथ की संधि (1905 ई.)
रूस की लगातार सैन्य पराजयों के बाद देश में युद्ध समाप्त करने की माँग बढ़ने लगी। निकोलस द्वितीय की माता और उसके चचेरे भाई जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय ने भी उसे शांति वार्ता प्रारंभ करने की सलाह दी। हालांकि, निकोलस द्वितीय लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के पक्ष में रहा और उसे विश्वास था कि रूस अंततः विजय प्राप्त करेगा।
त्सुशिमा की पराजय के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं और निकोलस द्वितीय को शांति वार्ता के लिए तैयार होना पड़ा। उसने अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट की मध्यस्थता स्वीकार की और वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे को रूस का मुख्य प्रतिनिधि नियुक्त किया। 1905 ई. में पोर्ट्समाउथ की संधि के माध्यम से रूस-जापान युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि के अंतर्गत रूस को दक्षिणी सखालिन जापान को सौंपना पड़ा और पूर्वी एशिया में जापान की बढ़ती शक्ति को स्वीकार करना पड़ा।
निकोलस द्वितीय का युद्ध संबंधी दृष्टिकोण
निकोलस द्वितीय का युद्ध के प्रति दृष्टिकोण वास्तविक परिस्थितियों से काफी अलग था। वह रूस की सैन्य शक्ति को अत्यधिक मजबूत मानता था और विश्वास करता था कि युद्ध से देश में राष्ट्रवादी भावना को बल मिलेगा। उसने जापान की सैन्य क्षमता और आधुनिक नौसेना को कम आँका।
1891 ई. में जापान यात्रा के दौरान ओत्सु घटना में एक जापानी पुलिसकर्मी द्वारा उस पर हमला किए जाने के बाद निकोलस के मन में जापान के प्रति नकारात्मक धारणा विकसित हो गई थी। इस कारण उसने जापान की सैन्य तैयारियों से संबंधित कई सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लिया।
युद्ध के दौरान भी निकोलस द्वितीय वास्तविक सैन्य स्थिति से अनभिज्ञ रहा। उसके सलाहकारों ने कई बार उसे पूरी जानकारी नहीं दी और वह लगातार रूस की विजय की आशा करता रहा। त्सुशिमा की विनाशकारी पराजय के बाद ही उसने शांति वार्ता स्वीकार की।
शांति वार्ता के समय निकोलस द्वितीय किसी बड़े समझौते के पक्ष में नहीं था। वह युद्ध क्षतिपूर्ति देने और अधिक क्षेत्रीय हानि स्वीकार करने के विरुद्ध था। अंततः सर्गेई विट्टे ने दक्षिणी सखालिन को जापान को सौंपने की शर्त स्वीकार की और पोर्ट्समाउथ की संधि द्वारा युद्ध का औपचारिक अंत हुआ।
1903–1906 ई. के यहूदी-विरोधी दंगे (पोग्रोम)
1903 से 1906 ई. के बीच रूसी साम्राज्य में यहूदी समुदाय के विरुद्ध अनेक हिंसक दंगे हुए, जिन्हें पोग्रोम कहा जाता है। इनमें 1903 ई. का किशिनेव पोग्रोम सबसे प्रसिद्ध और गंभीर घटनाओं में से एक था। बेसाराबिया के किशिनेव नगर में प्रकाशित समाचार पत्र बेसाराबेट्स में लगातार यहूदी-विरोधी लेख और प्रचार सामग्री प्रकाशित की जाती थी। इस पत्र को तत्कालीन गृह मंत्री व्याचेस्लाव प्लेहवे से आर्थिक समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार के प्रचार ने स्थानीय जनता में यहूदियों के प्रति घृणा और हिंसा की भावना को बढ़ाने में भूमिका निभाई।
किशिनेव पोग्रोम के बाद निकोलस द्वितीय की सरकार ने आधिकारिक रूप से इन घटनाओं की निंदा की। दंगों के लिए उत्तरदायी अधिकारियों पर कार्रवाई की गई, क्षेत्रीय गवर्नर को पद से हटा दिया गया तथा हिंसा में शामिल कई व्यक्तियों को गिरफ्तार कर न्यायालय के माध्यम से दंडित किया गया। रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के उच्च नेतृत्व ने भी यहूदी-विरोधी हिंसा का विरोध किया और विभिन्न चर्चों से जनता को शांति बनाए रखने तथा ऐसी घटनाओं की निंदा करने की अपील की।
हालाँकि, निकोलस द्वितीय के व्यक्तिगत विचार इस विषय में अधिक जटिल थे। कुछ अवसरों पर वह यहूदी-विरोधी भावना को जनता को सरकार के समर्थन में संगठित करने के साधन के रूप में देखते थे। फिर भी बाद के वर्षों में, विशेष रूप से 1911 ई. में जब यहूदी क्रांतिकारी दिमित्री बोग्रोव ने प्रधानमंत्री प्योत्र स्टोलिपिन की हत्या की, तब निकोलस ने यहूदी-विरोधी हिंसा को नियंत्रित करने के सरकारी प्रयासों का समर्थन किया।
फ़िनलैंड का रूसीकरण
निकोलस द्वितीय के शासनकाल में फ़िनलैंड में रूसीकरण की नीति अपनाई गई, जिसका उद्देश्य वहाँ रूसी प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करना था। 1899 ई. में जारी फ़रवरी घोषणापत्र के माध्यम से फ़िनलैंड की पारंपरिक स्वायत्तता को सीमित कर दिया गया। इसके बाद सेंसरशिप बढ़ाई गई, राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण लगाया गया और फ़िनलैंड के प्रशासनिक अधिकारों में कटौती की गई।
रूसीकरण की इस नीति के विरोध में फ़िनलैंड की जनता ने एक विशाल याचिका तैयार की, जिस पर पाँच लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर थे। लगभग 500 प्रतिनिधियों का एक दल यह याचिका लेकर सेंट पीटर्सबर्ग पहुँचा, किंतु निकोलस द्वितीय ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। इस घटना से फ़िनलैंड में रूसी शासन के प्रति असंतोष और अधिक बढ़ गया।
1905 ई. की रूसी क्रांति के बाद कुछ समय के लिए फ़िनलैंड में रूसीकरण की नीति को रोक दिया गया, किंतु 1908 ई. में इसे पुनः लागू किया गया। 10 मार्च 1915 ई. को निकोलस द्वितीय ने पहली और अंतिम बार हेलसिंकी की यात्रा की, किंतु वहाँ की जनता ने उसका गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया। इस ठंडे व्यवहार ने फ़िनलैंड और रूसी साम्राज्य के बीच बढ़ती दूरी को स्पष्ट किया।
खूनी रविवार (1905 ई.)
1905 ई. की रूसी क्रांति की शुरुआत में ‘खूनी रविवार’ की घटना ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह घटना 9 जनवरी 1905 ई. (रूसी कैलेंडर के अनुसार 22 जनवरी) को सेंट पीटर्सबर्ग में हुई। इससे कुछ दिन पहले पादरी और श्रमिक नेता जॉर्जी गैपोन ने सरकार को सूचित किया था कि मजदूर अपनी माँगों का ज्ञापन प्रस्तुत करने के लिए विंटर पैलेस तक शांतिपूर्ण जुलूस निकालेंगे।
8 जनवरी 1905 ई. को मंत्रियों ने इस स्थिति पर विचार किया, किंतु किसी ने यह नहीं सोचा कि जार निकोलस द्वितीय स्वयं मजदूरों से मिलेंगे। निकोलस पहले ही राजधानी छोड़कर त्सार्स्कोये सेलो चले गए थे। मंत्रियों ने यह सुझाव भी अस्वीकार कर दिया कि शाही परिवार का कोई अन्य सदस्य मजदूरों की याचिका स्वीकार कर सकता है।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए गृह मंत्री प्रिंस स्वियातोपोल्क-मिर्स्की ने राजधानी में अतिरिक्त सैनिकों को बुलाने का निर्णय लिया। निकोलस ने अपनी डायरी में लिखा कि गैरीसन को मजबूत करने के लिए बाहरी क्षेत्रों से सैनिक बुलाए गए हैं और मजदूरों की संख्या लगभग 1,20,000 बताई गई है। उसने यह भी उल्लेख किया कि मजदूरों का नेतृत्व समाजवादी पादरी गैपोन कर रहे थे।
9 जनवरी 1905 ई. को गैपोन के नेतृत्व में मजदूरों का विशाल जुलूस प्रारंभ हुआ। मजदूर शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहे थे। वे धार्मिक चित्र, बैनर, राष्ट्रीय ध्वज और जार निकोलस द्वितीय के चित्र लेकर चल रहे थे। वे धार्मिक गीत और ‘गॉड सेव द ज़ार’ गाते हुए विंटर पैलेस की ओर बढ़े।
सरकार ने जुलूस को रोकने के लिए सैनिकों की तैनाती कर दी थी। शहर की प्रमुख सड़कों और पुलों पर पैदल सैनिकों की कतारें खड़ी थीं तथा उसके पीछे कोसाक और हुसार सैनिक तैनात थे। जब भीड़ आगे बढ़ी, तो सैनिकों ने गोली चलाना प्रारंभ कर दिया। इस गोलीबारी में अनेक लोग मारे गए और घायल हुए।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार इस घटना में लगभग 92 लोगों की मृत्यु हुई और कई सौ लोग घायल हुए। यद्यपि वास्तविक संख्या इससे अधिक थी। गैपोन घटना के बाद छिप गए और जुलूस के कई अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जब सैनिकों की गोलियों से धार्मिक प्रतीक, बैनर और जार के चित्र क्षतिग्रस्त हुए, तो लोगों में यह भावना उत्पन्न हुई कि जार उनकी सहायता नहीं करेगा।
1905 ई. की खूनी रविवार की घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी आलोचना हुई। ब्रिटेन के भविष्य के प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने निकोलस द्वितीय की नीतियों की कठोर आलोचना करते हुए इस घटना की निंदा की। इस घटना ने रूसी जनता और जारशाही शासन के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा कर दिया तथा सम्राट की लोकप्रियता को गंभीर क्षति पहुँचाई। निकोलस द्वितीय ने अपनी व्यक्तिगत डायरी में इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा कि सेंट पीटर्सबर्ग में मजदूरों के विंटर पैलेस की ओर बढ़ने के प्रयास से गंभीर अशांति उत्पन्न हो गई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सैनिकों को कई स्थानों पर गोली चलानी पड़ी, जिसके परिणामस्वरूप अनेक लोग मारे गए और घायल हुए। उसने इस घटना को अत्यंत दुखद और पीड़ादायक बताया।
शाही परिवार के कुछ सदस्यों का मानना था कि यदि निकोलस द्वितीय स्वयं मजदूरों के प्रतिनिधिमंडल से मिलते और उनकी याचिका स्वीकार करते, तो संभवतः रक्तपात को रोका जा सकता था। उसकी बहन ग्रैंड डचेस ओल्गा अलेक्जेंड्रोव्ना के अनुसार कुछ राजपरिवार के सदस्य चाहते थे कि सम्राट जनता के सामने उपस्थित हों। किंतु मंत्रियों और सुरक्षा अधिकारियों की सलाह पर निकोलस ने राजधानी से दूर रहना उचित समझा। बाद में घटना के परिणामों को जानकर उसे इस निर्णय पर पछतावा हुआ। खूनी रविवार के बाद पादरी जॉर्जी गैपोन ने अपने छिपने के स्थान से एक पत्र जारी किया। इस पत्र में उसने निकोलस द्वितीय की कड़ी आलोचना करते हुए उसे मजदूरों, महिलाओं और बच्चों के रक्तपात के लिए उत्तरदायी ठहराया। गैपोन ने कहा कि इस घटना ने जार और रूसी जनता के बीच विश्वास का संबंध समाप्त कर दिया है। उसने समाजवादी संगठनों से एकजुट होकर जारशाही शासन के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्वान किया।
1905 ई. की रूसी क्रांति
1905 ई. की रूसी क्रांति निकोलस द्वितीय के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती थी। बढ़ते जन असंतोष, रूस-जापान युद्ध में पराजय और निरंकुश शासन के प्रति विरोध के कारण देश में क्रांतिकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थीं। विरोध को शांत करने के उद्देश्य से निकोलस द्वितीय ने 25 दिसंबर 1904 ई. को कुछ अस्पष्ट सुधारों का आदेश जारी किया। यह आदेश वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे और गृह मंत्री प्रिंस स्वियातोपोल्क-मिर्स्की की सलाह के बाद जारी किया गया था, किंतु इससे जनता की असंतुष्टि कम नहीं हुई।
जनवरी 1905 ई. में ‘खूनी रविवार’ की घटना ने क्रांति को तीव्र कर दिया। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर सैनिकों द्वारा गोली चलाए जाने से जनता में जारशाही के प्रति गहरा आक्रोश फैल गया। सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाने के लिए दिमित्री फ्योदोरोविच ट्रेपोव को कठोर कार्रवाई करने का आदेश दिया। फरवरी 1905 में मॉस्को में क्रेमलिन से निकलते समय एक क्रांतिकारी द्वारा किए गए बम हमले में निकोलस द्वितीय के चाचा ग्रैंड ड्यूक सर्गेई अलेक्जेंड्रोविच की हत्या कर दी गई। इसके बाद जार ने 3 मार्च 1905 ई. को क्रांतिकारियों की निंदा की।
रूस-जापान युद्ध और राजनीतिक संकट
1905 ई. की क्रांति के दौरान रूस-जापान युद्ध भी समाप्ति की ओर बढ़ रहा था। अगस्त और सितंबर 1905 ई. में सर्गेई विट्टे ने जापान के साथ शांति स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता प्राप्त की। इसके बाद उसने निकोलस द्वितीय को पत्र लिखकर राजनीतिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उसका विचार था कि यदि शासन व्यवस्था में परिवर्तन नहीं किया गया, तो रूस गंभीर संकट में पड़ सकता है।
निकोलस द्वितीय तत्काल सुधारों के पक्ष में नहीं थे। रूस-जापान युद्ध में एक एशियाई शक्ति जापान से पराजय ने रूसी निरंकुश शासन की प्रतिष्ठा को बहुत नुकसान पहुँचाया। देश में हड़तालें, विरोध प्रदर्शन और विद्रोह लगातार बढ़ रहे थे। निकोलस द्वितीय ने अपनी माता को लिखे पत्र में देश की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विद्यालयों और कारखानों में हड़तालें हो रही हैं, पुलिस, कोसाक और सैनिकों की हत्या की जा रही है तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है।
आम हड़ताल और अक्टूबर घोषणापत्र
अक्टूबर 1905 ई. में रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल धीरे-धीरे पूरे देश की आम हड़ताल में बदल गई। इसका प्रभाव इतना व्यापक था कि अनेक शहरों में जनजीवन ठप हो गया। इस स्थिति को देखकर सर्गेई विट्टे ने निकोलस द्वितीय को चेतावनी दी कि रूस विनाशकारी क्रांति के कगार पर पहुँच चुका है।
गंभीर संकट को देखते हुए निकोलस द्वितीय ने सुधारों की योजना को स्वीकार किया। विट्टे और अन्य नेताओं के सुझावों के आधार पर तैयार किए गए प्रस्तावों के बाद 17 अक्टूबर 1905 ई. को प्रसिद्ध ‘अक्टूबर घोषणापत्र’ जारी किया गया। इसके अंतर्गत रूस में इंपीरियल ड्यूमा (संसद) की स्थापना का वचन दिया गया और नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान किए गए। इनमें भाषण की स्वतंत्रता, सभा करने की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता शामिल थीं।
अक्टूबर घोषणापत्र के कारण जार की निरंकुश सत्ता पर कुछ सीमाएँ लग गईं। हालांकि, धार्मिक स्वतंत्रता के प्रावधान से रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च असंतुष्ट हुआ, क्योंकि इससे अन्य धार्मिक मतों, विशेषकर इवेंजेलिकल प्रोटेस्टेंट संप्रदायों के प्रसार की संभावना बढ़ गई थी।
विट्टे सरकार और रासपुतिन का प्रभाव
अक्टूबर घोषणापत्र के बाद सर्गेई विट्टे लगभग छह महीने तक प्रधानमंत्री रहे। किंतु उनकी सरकार को प्रारंभ से ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। प्रशासनिक अस्थिरता और दरबार के भीतर मतभेदों के कारण सरकार प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर सकी। 8 नवंबर 1905 ई. को निकोलस द्वितीय ने दिमित्री फ्योदोरोविच ट्रेपोव को महल का प्रमुख नियुक्त किया। यह नियुक्ति विट्टे से परामर्श किए बिना की गई थी। ट्रेपोव का सम्राट से नियमित संपर्क था और धीरे-धीरे दरबार में उसका प्रभाव बढ़ने लगा।
14 नवंबर 1905 ई. को मोंटेनेग्रो की राजकुमारी मिलिका ने पीटरहॉफ पैलेस में ग्रिगोरी रासपुतिन का परिचय निकोलस द्वितीय और महारानी एलेक्जेंड्रा से कराया। रासपुतिन का शाही परिवार से संबंध विशेष रूप से इसलिए मजबूत हुआ क्योंकि युवराज एलेक्सी हीमोफिलिया नामक वंशानुगत बीमारी से पीड़ित थे। एलेक्जेंड्रा को विश्वास था कि रासपुतिन युवराज की बीमारी में सहायता कर सकता है। इस प्रकार 1905 ई. की क्रांति के बाद रूसी राजनीति में रासपुतिन का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
ड्यूमा और निकोलस द्वितीय
1905 ई. की रूसी क्रांति के दबाव के कारण निकोलस द्वितीय को राजनीतिक सुधारों की दिशा में कुछ कदम उठाने पड़े। 5 अगस्त 1905 को उसने स्टेट ड्यूमा के गठन से संबंधित एक घोषणापत्र जारी किया, जिसे सामान्यतः ‘बुलिगिन ड्यूमा’ के नाम से जाना जाता है। प्रारंभ में इसे केवल एक सलाहकार संस्था के रूप में स्थापित करने की योजना थी, जिसके पास वास्तविक विधायी अधिकार नहीं थे। किंतु अक्टूबर 1905 ई. के बढ़ते जनआंदोलन और राजनीतिक संकट के कारण निकोलस को ‘अक्टूबर घोषणापत्र’ जारी करना पड़ा। इसके अंतर्गत नागरिक स्वतंत्रताओं—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता—का आश्वासन दिया गया तथा स्टेट ड्यूमा को कानून निर्माण और प्रशासनिक निगरानी की सीमित शक्तियाँ प्रदान की गईं।
निकोलस द्वितीय अपनी निरंकुश सत्ता को बनाए रखने के प्रति दृढ़ थे। 1906 ई. के मूल कानूनों में यह स्पष्ट किया गया कि सम्राट सर्वोच्च निरंकुश शासक है और उसके पास व्यापक कार्यकारी अधिकार सुरक्षित हैं। मंत्रिपरिषद के सदस्य केवल ज़ार के प्रति उत्तरदायी थे और उसे एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप करने या सामूहिक रूप से निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं थी। इस प्रकार, ड्यूमा की स्थापना के बावजूद वास्तविक सत्ता सम्राट के हाथों में ही केंद्रित रही।
पहली ड्यूमा और ज़ार के बीच टकराव
निकोलस द्वितीय और ड्यूमा के बीच संबंध प्रारंभ से ही तनावपूर्ण रहे। 1906 ई. में गठित पहली ड्यूमा में उदारवादी कैडेट दल का प्रभाव अधिक था। ड्यूमा के सदस्यों ने टॉराइड पैलेस में बैठने के तुरंत बाद ‘सिंहासन के लिए संबोधन’ तैयार किया। इसमें सार्वभौमिक मताधिकार, भूमि सुधार, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और मंत्रियों को ड्यूमा के प्रति उत्तरदायी बनाने जैसी माँगें रखी गईं।
इन माँगों को निकोलस द्वितीय ने अपनी शाही सत्ता के लिए चुनौती माना। उनकी बहन ग्रैंड डचेस ओल्गा अलेक्जेंड्रोव्ना ने बाद में उस समय के वातावरण का वर्णन करते हुए लिखा कि शाही परिवार में गहरी चिंता और असंतोष का वातावरण था। उसे ड्यूमा में उपस्थित किसानों और श्रमिक प्रतिनिधियों के चेहरे पर असंतोष और राजशाही के प्रति अविश्वास दिखाई देता था। विशेष रूप से श्रमिक प्रतिनिधियों के व्यवहार से शाही परिवार को लगा कि जनता और राजसत्ता के बीच दूरी बढ़ चुकी है।
दरबार के कई अधिकारियों की दृष्टि भी ड्यूमा के प्रति अत्यंत नकारात्मक थी। कोर्ट मंत्री काउंट व्लादिमीर फ्रेडरिक्स ने ड्यूमा सदस्यों को कट्टर विरोधी और राजशाही के लिए खतरा बताया। वहीं, महारानी मारिया फ्योदोरोव्ना ने भी राजनीतिक वातावरण में बढ़ती कटुता और शाही परिवार के प्रति विरोध को महसूस किया।
प्रारंभ में निकोलस द्वितीय और प्रधानमंत्री सर्गेई विट्टे के संबंध अपेक्षाकृत अच्छे थे, क्योंकि विट्टे ने 1905 ई. के संकट को नियंत्रित करने और अक्टूबर घोषणापत्र तैयार कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। किंतु बाद में दोनों के संबंधों में मतभेद उत्पन्न हो गए। महारानी एलेक्जेंड्रा को विट्टे पर विश्वास नहीं था, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि उसने ग्रिगोरी रासपुतिन के प्रभाव की जाँच कराने का प्रयास किया था। राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने के साथ निकोलस ने पहली ड्यूमा को भंग कर दिया। ड्यूमा के कई सदस्य अधिक व्यापक राजनीतिक और सामाजिक सुधारों की माँग कर रहे थे, जिनमें भूमि व्यवस्था में बड़े परिवर्तन और निजी संपत्ति के अधिकारों में संशोधन जैसी माँगें भी शामिल थीं। निकोलस और राजशाही इन माँगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। 14 अप्रैल 1906 ई. को सर्गेई विट्टे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उसके इस्तीफे के कारणों में राजनीतिक मतभेद और सुधारों की दिशा को लेकर असहमति प्रमुख थी। यद्यपि कुछ स्रोतों के अनुसार उसे पद छोड़ने के लिए बाध्य किया गया था, फिर भी निकोलस ने उसके साथ व्यक्तिगत रूप से कठोर व्यवहार नहीं किया। 22 अप्रैल 1906 ई. को एक शाही आदेश द्वारा विट्टे को ‘ऑर्डर ऑफ़ सेंट अलेक्जेंडर नेवस्की विद डायमंड्स’ से सम्मानित किया गया। इस आदेश के साथ निकोलस ने अपने हाथों से लिखा कि वे विट्टे के प्रति सदैव सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखते हैं।
दूसरी ड्यूमा और निकोलस द्वितीय के साथ तनाव
फरवरी 1907 ई. में दूसरी स्टेट ड्यूमा की पहली बैठक आयोजित हुई। पहली ड्यूमा का बहिष्कार करने वाली वामपंथी पार्टियों—जिनमें सोशल डेमोक्रेट्स और सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरीज़ प्रमुख थीं—ने इस बार चुनाव में भाग लिया और लगभग 200 सीटें प्राप्त कीं। यह संख्या कुल सदस्यों की एक-तिहाई से भी अधिक थी। वामपंथी दलों की मजबूत उपस्थिति से निकोलस द्वितीय अत्यंत चिंतित हो गए और वे ड्यूमा को समाप्त करने के अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। उसने अपनी माता, महारानी मारिया फ्योदोरोव्ना को लिखे पत्रों में ड्यूमा के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की। एक पत्र में उसने इंग्लैंड से आने वाले एक प्रतिनिधिमंडल का उल्लेख किया, जो ड्यूमा के उदारवादी सदस्यों से मिलने वाला था। निकोलस ने ब्रिटिश राजनीतिक स्वतंत्रता की आलोचना करते हुए लिखा कि यदि रूस की ओर से कोई प्रतिनिधिमंडल आयरलैंड के लोगों को उनकी सरकार के विरुद्ध संघर्ष में समर्थन देने जाता, तो ब्रिटेन इसे स्वीकार नहीं करता। उसके विचारों से स्पष्ट था कि वे संवैधानिक स्वतंत्रताओं को राजशाही के लिए संभावित खतरे के रूप में देखते थे।
दूसरे पत्र में निकोलस ने ड्यूमा की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त किया। उसका मानना था कि यदि ड्यूमा में होने वाली चर्चाएँ केवल उसकी चारदीवारी तक सीमित रहतीं तो समस्या नहीं होती, किंतु समाचार पत्रों में उसके प्रकाशित होने से जनता में असंतोष फैलता था। विशेष रूप से भूमि सुधार के प्रश्न पर किसानों की बढ़ती अपेक्षाओं से वे चिंतित थे। उसे विभिन्न स्थानों से ड्यूमा को भंग करने की अपीलें मिल रही थीं, किंतु वे तत्काल ऐसा कदम उठाने के पक्ष में नहीं थे। उसका विचार था कि ड्यूमा को ऐसा कोई गंभीर राजनीतिक या संवैधानिक संकट उत्पन्न करने देना चाहिए, जिसके बाद उसे समाप्त करना उचित ठहराया जा सके।
स्टोलिपिन और चुनावी सुधार
दूसरी ड्यूमा में भी सरकार और प्रतिनिधियों के बीच टकराव जारी रहा। इस परिस्थिति में नए प्रधानमंत्री प्योत्र स्टोलिपिन ने हस्तक्षेप किया और दूसरी ड्यूमा को भंग कर दिया। इसके साथ ही उसने चुनावी कानूनों में परिवर्तन किए, ताकि भविष्य की ड्यूमा में अधिक रूढ़िवादी और राजशाही समर्थक प्रतिनिधि चुने जाएँ। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अलेक्जेंडर गुचकोव के नेतृत्व वाली उदार-रूढ़िवादी ऑक्टोबरिस्ट पार्टी को अधिक प्रभाव प्राप्त हुआ।
स्टोलिपिन केवल दमनकारी नीतियों का समर्थक नहीं था, बल्कि उसके पास व्यापक सुधारों की योजना भी थी। उसका उद्देश्य किसानों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना था, जो निजी भूमि स्वामित्व के माध्यम से आर्थिक रूप से मजबूत हो और राजशाही के प्रति वफादार रहे। इसके लिए उसने किसानों को भूमि खरीदने हेतु ऋण उपलब्ध कराने जैसी योजनाएँ प्रस्तुत कीं।
जब ड्यूमा सरकार की नीतियों का विरोध करती रही, तो स्टोलिपिन ने 1906 ई. के मूल कानूनों के अनुच्छेद 87 का उपयोग किया। इस प्रावधान के अंतर्गत ज़ार को ड्यूमा के अवकाश के समय ‘तात्कालिक और असाधारण’ परिस्थितियों में आपातकालीन आदेश जारी करने का अधिकार था। किसानों के भूमि स्वामित्व से संबंधित स्टोलिपिन के प्रमुख सुधार इसी अधिकार के आधार पर लागू किए गए।
तीसरी ड्यूमा और सहयोग की शुरुआत
तीसरी ड्यूमा का गठन अपेक्षाकृत अधिक स्थिर राजनीतिक वातावरण में हुआ। इस बार ड्यूमा के सदस्यों ने सीधे टकराव की नीति अपनाने के बजाय संस्था को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। उसने ब्रिटिश संसद की परंपरा के अनुरूप वित्तीय अधिकारों का उपयोग करके अपनी भूमिका बढ़ाने का प्रयास किया। ड्यूमा को सरकारी बजट और प्रस्तावित खर्चों की समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त था। इसके सदस्य मंत्रियों से उसके खर्चों और नीतियों के संबंध में बंद बैठकों में प्रश्न पूछ सकते थे। स्टोलिपिन के समर्थन से ड्यूमा के ये सत्र धीरे-धीरे अधिक रचनात्मक होते गए और दोनों पक्षों के बीच प्रारंभिक विरोध की जगह सीमित सहयोग और पारस्परिक सम्मान विकसित होने लगा।
सैन्य मामलों में भी ड्यूमा ने सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। यद्यपि ‘अक्टूबर घोषणापत्र’ के अनुसार रक्षा और सेना से संबंधित अंतिम निर्णय का अधिकार सम्राट के पास था, फिर भी ड्यूमा की एक समिति ने सैन्य खर्चों और सुधारों पर विचार करना आरंभ किया। इस समिति के सदस्य रूसी सेना की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना चाहते थे और कई बार सरकार द्वारा प्रस्तावित राशि से भी अधिक सैन्य व्यय की अनुशंसा करते थे। इस प्रकार तीसरी ड्यूमा ने राजशाही और प्रतिनिधि संस्था के बीच सीमित सहयोग की संभावना को जन्म दिया।
निकोलस द्वितीय और स्टोलिपिन के संबंध
समय के साथ निकोलस द्वितीय के दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन आया और वह ड्यूमा के प्रति पहले की तुलना में अधिक सहनशील होने लगा। 1909 ई. में उसने प्रधानमंत्री प्योत्र स्टोलिपिन से कहा कि ड्यूमा पर सत्ता हथियाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता और उसके साथ अनावश्यक संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है। इससे लगता है कि निकोलस धीरे-धीरे संवैधानिक संस्था के साथ सीमित सहयोग की आवश्यकता को समझने लगा था ।
शाही दरबार के रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी तत्त्व स्टोलिपिन के सुधारों के विरोधी बने रहे। प्रारंभ में निकोलस ने स्टोलिपिन का समर्थन किया था, किंतु समय बीतने के साथ वह दरबार के उन लोगों के प्रभाव में आने लगा, जो स्टोलिपिन की नीतियों को राजशाही के लिए खतरा मानते थे। प्रिंस व्लादिमीर निकोलायेविच ओर्लोव जैसे प्रतिक्रियावादी दरबारियों का तर्क था कि ड्यूमा का अस्तित्व ही निरंकुश शासन की प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। उसने गुप्त रूप से ज़ार को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि स्टोलिपिन एक विश्वासघाती है, जो ड्यूमा के साथ मिलकर सम्राट के दैवी अधिकारों को सीमित करने की साजिश कर रहा है।
सर्गेई विट्टे भी स्टोलिपिन के विरोधियों में शामिल था और उसके विरुद्ध राजनीतिक प्रयास करता रहा। विट्टे के पद से हटने के बाद भी उसने कई समस्याओं के लिए स्टोलिपिन को जिम्मेदार ठहराया। दूसरी ओर, स्टोलिपिन ने राजपरिवार के भीतर भी विरोध उत्पन्न कर लिया था। विशेष रूप से महारानी एलेक्जेंड्रा उससे नाराज़ हो गईं, क्योंकि उसने ग्रिगोरी रास्पुतिन के प्रभाव और गतिविधियों की जाँच करवाने का आदेश दिया था।
रास्पुतिन विवाद और स्टोलिपिन
स्टोलिपिन ने रास्पुतिन से संबंधित जाँच रिपोर्ट निकोलस द्वितीय को प्रस्तुत की। ज़ार ने रिपोर्ट को पढ़ा, किंतु उस पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं की। बाद में स्टोलिपिन ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए रास्पुतिन को सेंट पीटर्सबर्ग छोड़ने का आदेश दिया। महारानी एलेक्जेंड्रा ने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उसे रास्पुतिन पर अपने पुत्र एलेक्सी के स्वास्थ्य के संबंध में विश्वास था। इसके बावजूद निकोलस ने अपने प्रधानमंत्री के निर्णय को तुरंत रद्द नहीं किया, क्योंकि उस समय शासन संबंधी मामलों में स्टोलिपिन का प्रभाव था।
सितंबर 1911 ई. में स्टोलिपिन की हत्या के समय तक वह अपने पद की जिम्मेदारियों और लगातार राजनीतिक संघर्षों से अत्यंत थक चुका था। एक दृढ़ और व्यावहारिक प्रशासक के लिए ऐसे शासक के साथ काम करना कठिन था, जो निर्णय लेते समय तर्क के साथ-साथ भाग्य और धार्मिक विश्वासों को भी अत्यधिक महत्त्व देता था।
निकोलस की निर्णय प्रक्रिया
निकोलस द्वितीय के व्यक्तित्व में धार्मिक विश्वास और व्यक्तिगत अंतःकरण की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। कई अवसरों पर वह कठिन निर्णय लेने से पहले अपनी अंतरात्मा और ईश्वरीय इच्छा को प्राथमिकता देता था। एक उदाहरण में उसने एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने से इनकार करते हुए लिखा कि यद्यपि उस निर्णय के पक्ष में मजबूत तर्क मौजूद हैं, फिर भी उसकी अंतरात्मा उसे इसकी जिम्मेदारी लेने से रोक रही है। उसने यह विश्वास व्यक्त किया कि सम्राट का हृदय ईश्वर के नियंत्रण में होता है और शासन द्वारा लिए गए प्रत्येक निर्णय के लिए उसे ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी होना पड़ेगा। यह धार्मिक दृष्टिकोण उसके शासनकाल में कई महत्त्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करता रहा।
स्टोलिपिन का अंत (सितंबर 1911 ई.)
महारानी एलेक्जेंड्रा प्योत्र स्टोलिपिन से अत्यंत नाराज़ थी। उसका मानना था कि स्टोलिपिन ने उन परिस्थितियों को समाप्त कर दिया था, जिन पर उसके पुत्र एलेक्सी के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा निर्भर थी। विशेष रूप से ग्रिगोरी रासपुतिन के प्रभाव को सीमित करने के प्रयासों के कारण एलेक्जेंड्रा का विश्वास स्टोलिपिन से उठ गया था। मार्च 1911 ई. में राजनीतिक मतभेदों और शाही समर्थन में कमी महसूस करते हुए स्टोलिपिन ने अपने पद से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया। इससे पहले भी, जब उसने निकोलस द्वितीय के सामने इस्तीफे की इच्छा व्यक्त की थी, तो ज़ार ने उसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यह विश्वास या अविश्वास का प्रश्न नहीं है, बल्कि उसकी इच्छा और निर्णय का विषय है। निकोलस ने यह भी कहा था कि रूस की परिस्थितियाँ अन्य देशों से अलग हैं और वह उसके इस्तीफे पर विचार नहीं करेगा। किंतु सितंबर 1911 ई. में स्टोलिपिन की हत्या कर दी गई, जिससे रूसी राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण सुधारवादी नेतृत्व का अंत हो गया।
चौथी ड्यूमा और बढ़ता राजनीतिक संकट
1912 ई. में चौथी ड्यूमा के लिए चुनाव हुए। इसके अधिकांश सदस्य तीसरी ड्यूमा की राजनीतिक प्रवृत्तियों से मिलते-जुलते थे। निकोलस द्वितीय ने ब्रिटिश राजनयिक सर बर्नार्ड पेरेस से बातचीत में स्वीकार किया कि प्रारंभिक ड्यूमा बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी, किंतु अब वह अधिक धीमी, स्थिर और व्यवहारिक संस्था बन गई थी।
इसके बावजूद रूस की राजनीतिक स्थिति धीरे-धीरे खराब होती गई। प्रथम विश्व युद्ध ने साम्राज्य की आंतरिक समस्याओं को और गंभीर बना दिया। 1916 ई. के अंत तक रोमानोव राजवंश की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि निकोलस के चाचा ग्रैंड ड्यूक पॉल अलेक्जेंड्रोविच को उससे संवैधानिक सुधार लागू करने और ड्यूमा के प्रति उत्तरदायी सरकार बनाने का आग्रह करने के लिए भेजा गया।
निकोलस द्वितीय ने इस प्रस्ताव को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उसने अपने चाचा को यह कहते हुए फटकार लगाई कि वे उससे उस शपथ को तोड़ने के लिए कह रहे हैं, जो उसने राज्याभिषेक के समय ली थी। उस शपथ के अनुसार उसका कर्तव्य था कि वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए निरंकुश शासन व्यवस्था को बनाए रखे।
ड्यूमा में राजशाही विरोधी चेतावनी
2 दिसंबर 1916 ई. को ड्यूमा में राजशाही समर्थक और राष्ट्रवादी नेता व्लादिमीर पुरिश्केविच ने एक प्रभावशाली भाषण दिया। उसने राजसत्ता के आसपास मौजूद कथित भ्रष्ट प्रभावों और दरबार की कमजोरियों की कड़ी आलोचना की। लगभग दो घंटे तक चले उसके भाषण को सदस्यों का व्यापक समर्थन मिला।
पुरिश्केविच ने चेतावनी दी कि देश में क्रांति का खतरा तेजी से बढ़ रहा है और यदि शासन व्यवस्था में सुधार नहीं किए गए, तो रूस गंभीर संकट में फँस सकता है। उसका भाषण उस समय रूसी साम्राज्य में बढ़ते असंतोष और राजशाही के प्रति घटते विश्वास को दर्शाता था।
उत्तराधिकार का संकट और एलेक्सी का जन्म
निकोलस द्वितीय और महारानी एलेक्जेंड्रा के पारिवारिक जीवन में उत्तराधिकार का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण समस्या बना रहा। विवाह के बाद उसे चार पुत्रियाँ प्राप्त हुईं—ग्रैंड डचेस ओल्गा (1895 ई.), ग्रैंड डचेस तातियाना (1897 ई.), ग्रैंड डचेस मारिया (1899 ई.) और ग्रैंड डचेस अनास्तासिया (1901 ई.)। लंबे इंतजार के बाद 12 अगस्त 1904 ई. को उसके पुत्र एलेक्सी का जन्म हुआ, जो रूसी साम्राज्य का उत्तराधिकारी (त्सारेविच) बना।
एलेक्सी जन्म से ही हीमोफिलिया बी नामक आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित था। इस रोग में रक्त का थक्का बनने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मामूली चोट भी जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती थी। उस समय इस बीमारी का कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था और इससे पीड़ित लोगों की जीवन-प्रत्याशा सामान्यतः कम होती थी। एलेक्जेंड्रा को यह रोग उनकी नानी महारानी विक्टोरिया के वंश से प्राप्त हुआ था, जिसके कारण यूरोप के कई शाही परिवार भी प्रभावित हुए थे।
एलेक्सी की बीमारी ने निकोलस और एलेक्जेंड्रा को गहरे मानसिक संकट में डाल दिया। रासपुतिन के प्रभाव में आने से पहले भी शाही परिवार अनेक रहस्यवादी साधुओं, धार्मिक व्यक्तियों और कथित चमत्कार करने वालों से सलाह लेता था। यह उस समय की रूसी धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक विश्वासों से जुड़ा हुआ था। शाही परिवार स्वयं को रूसी परंपरा और ऑर्थोडॉक्स धार्मिक विरासत का संरक्षक मानता था। एलेक्सी की बीमारी को शाही प्रतिष्ठा और शासन की स्थिरता के लिए खतरा माना गया। इसलिए निकोलस और एलेक्जेंड्रा ने इसे जनता और अधिकांश दरबारियों से छिपाकर रखा। शाही परिवार के अनेक सदस्यों और अधिकारियों को भी उत्तराधिकारी की वास्तविक बीमारी की जानकारी नहीं थी। प्रारंभ में एलेक्जेंड्रा ने रूसी चिकित्सकों और विशेषज्ञों से उपचार कराने का प्रयास किया, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद उसका विश्वास धार्मिक साधुओं और आध्यात्मिक सलाहकारों में बढ़ने लगा। इसी समय साइबेरिया के अशिक्षित किंतु प्रभावशाली धार्मिक व्यक्ति ग्रिगोरी रासपुतिन का शाही परिवार से संपर्क हुआ। उसने एलेक्सी की बीमारी के दौरान कुछ अवसरों पर ऐसा प्रभाव डाला कि महारानी एलेक्जेंड्रा का उस पर गहरा विश्वास स्थापित हो गया। धीरे-धीरे रासपुतिन का प्रभाव केवल महारानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह निकोलस द्वितीय के निकटवर्ती सलाहकारों में भी शामिल हो गया। 1912 ई. में एलेक्सी को लगी गंभीर चोट के बाद उसकी स्थिति अत्यंत खराब हो गई। लगातार रक्तस्राव के कारण चिकित्सक निराश हो गए और धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाने लगे। ऐसी स्थिति में एलेक्जेंड्रा ने रासपुतिन से सहायता माँगी। उसने उसे सांत्वना देते हुए विश्वास दिलाया कि एलेक्सी जीवित रहेगा और चिकित्सकों को उसे अधिक परेशान नहीं करना चाहिए। इस घटना के बाद शाही परिवार में रासपुतिन की प्रतिष्ठा और प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
एंग्लो-रशियन कन्वेंशन और ट्रिपल एंटेंटे
1907 ई. में रूस और ब्रिटेन ने मध्य एशिया से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवादों को समाप्त करने के लिए एंग्लो-रशियन कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए। इससे ‘द ग्रेट गेम’ के कारण दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव में कमी आई। इससे पहले 1904 ई. में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच एंटेंटे कॉर्डियल समझौता हो चुका था। 1907 ई. के समझौते के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच ट्रिपल एंटेंटे का निर्माण हुआ, जिसने यूरोपीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया।
ब्रिटेन और रूस के संबंध
मई 1908 ई. में ब्रिटेन के राजा एडवर्ड सप्तम और महारानी एलेक्जेंड्रा ने रूस की राजकीय यात्रा की। यह ब्रिटिश शासक की रूस की पहली आधिकारिक यात्रा थी। वे रूसी धरती पर नहीं उतरे, बल्कि अपनी नौका पर ही रहे और आधुनिक तालिन के तट के निकट निकोलस द्वितीय और एलेक्जेंड्रा से मिले। इस तीन दिवसीय बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य सहयोग को मजबूत करना था। इस दौरान मैसेडोनिया और कमजोर होते ओटोमन साम्राज्य से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
बोस्नियाई संकट
1908 ई. में निकोलस द्वितीय को अपने विदेश मंत्री अलेक्जेंडर इज़वोल्स्की और ऑस्ट्रो-हंगेरियन विदेश मंत्री काउंट एहरेंथल के बीच हुए गुप्त समझौते की जानकारी मिली। इसके अनुसार रूस को जलडमरूमध्य तक नौसैनिक पहुँच के बदले बोस्निया और हर्जेगोविना पर ऑस्ट्रिया के अधिकार का विरोध नहीं करना था। जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इन क्षेत्रों का विलय किया, तो बोस्नियाई संकट उत्पन्न हुआ। रूस ने इसका विरोध किया, किंतु ऑस्ट्रिया ने गुप्त वार्ता सार्वजनिक करने की धमकी देकर दबाव बनाया।
जर्मनी और यूरोपीय राजनीति
1909 ई. में रूसी शाही परिवार ने ब्रिटेन की यात्रा की और आइल ऑफ वाइट पर आयोजित काउज़ वीक में भाग लिया। 1912 ई. में पाल्डिस्की में निकोलस द्वितीय और जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय के बीच बैठक हुई। दोनों नेताओं ने यूरोप की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की, किंतु उसके प्रयास बढ़ते तनाव और अंततः प्रथम विश्व युद्ध को रोकने में सफल नहीं हो सके। 1913 ई. में बाल्कन युद्धों के दौरान निकोलस द्वितीय ने सर्बिया और बुल्गारिया के बीच उत्पन्न विवाद को समाप्त करने के लिए व्यक्तिगत रूप से मध्यस्थता करने की पेशकश की। उसका उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र में शांति बनाए रखना और रूस के प्रभाव को स्थिर रखना था, किंतु बुल्गारिया ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसी वर्ष निकोलस द्वितीय ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन की यात्रा की। वह अपने परिवार की एक वैवाहिक घटना में शामिल होने गए थे, जहाँ कैसर विल्हेम द्वितीय की पुत्री राजकुमारी विक्टोरिया लुईस का विवाह निकोलस के रिश्तेदार ब्रंसविक के ड्यूक अर्नेस्ट ऑगस्टस से हुआ। इस अवसर पर उसके साथ ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी भी उपस्थित थे। यह यात्रा यूरोपीय शाही परिवारों के बीच संबंधों को बनाए रखने का एक प्रयास थी।
रोमानोव राजवंश की 300वीं वर्षगाँठ
फरवरी 1913 ई. में निकोलस द्वितीय ने रोमानोव राजवंश के शासन की 300वीं वर्षगाँठ के भव्य समारोहों का नेतृत्व किया। 21 फरवरी को कज़ान कैथेड्रल में ‘टे डेम’ नामक विशेष धन्यवाद प्रार्थना आयोजित की गई और विंटर पैलेस में राजकीय समारोह संपन्न हुआ। इन आयोजनों का उद्देश्य रोमानोव वंश की ऐतिहासिक वैधता और राजशाही के प्रति जनता की निष्ठा को प्रदर्शित करना था।
मई 1913 ई. में निकोलस और शाही परिवार ने पूरे रूसी साम्राज्य की धार्मिक यात्रा की। उसने वोल्गा नदी के उस ऐतिहासिक मार्ग का अनुसरण किया, जिसे 1613 ई. में माइकल रोमानोव ने कोस्ट्रोमा के इपाटीव मठ से मॉस्को तक तय किया था। इसी यात्रा के बाद माइकल रोमानोव को रूस का ज़ार बनने के लिए स्वीकार किया गया था। इस प्रकार यह यात्रा रोमानोव शासन की ऐतिहासिक निरंतरता को दर्शाने का प्रतीक बनी।
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व रूस की स्थिति
प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ से पहले रूस यूरोप का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश था। 17.5 करोड़ से अधिक लोगों के साथ उसका साम्राज्य विशाल मानव संसाधनों से संपन्न था। उसकी सेना में लगभग 13 लाख सक्रिय सैनिक थे और लगभग 50 लाख रिज़र्व सैनिक उपलब्ध थे। विशाल क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों और बढ़ते औद्योगिक विकास के कारण रूस को यूरोप की प्रमुख शक्तियों में गिना जाता था।
1860 से 1913 ई. के बीच रूस की औद्योगिक वृद्धि तेज रही। रेलवे नेटवर्क 1900 में लगभग 50,000 किलोमीटर से बढ़कर 1914 ई. तक 75,000 किलोमीटर हो गया। कोयला उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई और बाकू के तेल क्षेत्रों के कारण रूस विश्व में तेल उत्पादन के क्षेत्र में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया।
रूस की बढ़ती शक्ति ने यूरोपीय देशों की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया। जर्मनी के सैन्य नेतृत्व का मानना था कि रूस की तेज प्रगति भविष्य में उसके लिए बड़ा खतरा बन सकती है। दूसरी ओर, फ्रांस को विश्वास था कि रूस की विशाल सेना जर्मनी के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
रूसी शक्ति की सीमाएँ
हालाँकि रूस की बाहरी शक्ति प्रभावशाली दिखाई देती थी, किंतु उसकी आर्थिक और औद्योगिक नींव पूरी तरह मजबूत नहीं थी। रूस का औद्योगिक उत्पादन विश्व में चौथे स्थान पर था, किंतु वह अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों से काफी पीछे था। सेना, रेलवे और उद्योगों का विकास बड़े पैमाने पर विदेशी ऋण, विदेशी पूंजी और तकनीकी सहायता पर निर्भर था।
विदेशी ऋणों पर अत्यधिक ब्याज का बोझ रूसी अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता था। 1914 ई. तक खनन, तेल, धातु उद्योग और रासायनिक उद्योगों में विदेशी कंपनियों का महत्त्वपूर्ण नियंत्रण था। इसके बावजूद रूसी उद्योग पर्याप्त प्रतिस्पर्धी नहीं बन सका और देश को अनेक औद्योगिक मशीनों का आयात करना पड़ता था। रूस का निर्यात मुख्य रूप से कृषि उत्पादों और लकड़ी पर आधारित था, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था औद्योगिक रूप से विकसित देशों की तुलना में कमजोर बनी रही।
प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि
28 जून 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की साराजेवो में हत्या कर दी गई। उनकी हत्या एक बोस्नियाई सर्ब राष्ट्रवादी ने की थी, जो बोस्निया-हर्जेगोविना पर ऑस्ट्रिया-हंगरी के नियंत्रण का विरोध करता था। यह घटना प्रथम विश्व युद्ध के तात्कालिक कारणों में से एक बनी। यद्यपि युद्ध को टाला जा सकता था, किंतु यूरोपीय शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, सैन्य तैयारियाँ और जटिल गठबंधन प्रणाली ने स्थिति को युद्ध की ओर धकेल दिया।
रूस और सर्बिया के बीच पैन-स्लाववाद तथा धार्मिक समानता के कारण गहरे संबंध थे। रूस स्वयं को स्लाव जातियों का संरक्षक मानता था और इसलिए सर्बिया के प्रति सहानुभूति रखता था। दूसरी ओर, जर्मनी और फ्रांस, तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी और सर्बिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादों ने यूरोप में विरोधी गुटों को जन्म दिया। युद्ध से पहले यूरोप दो प्रमुख गठबंधनों में विभाजित हो चुका था—ट्रिपल एंटेंट (रूस, फ्रांस और ब्रिटेन) तथा ट्रिपल एलायंस (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली)।
निकोलस द्वितीय इस संकट में कठिन स्थिति में थे। वे न तो सर्बिया को ऑस्ट्रिया-हंगरी के कठोर अल्टीमेटम के सामने अकेला छोड़ना चाहते थे और न ही यूरोप को व्यापक युद्ध में झोंकना चाहते थे। जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय के साथ उसके पत्राचार, जिसे “विली-निकी पत्राचार” कहा जाता है, में दोनों नेताओं ने शांति बनाए रखने की इच्छा व्यक्त की। निकोलस और विल्हेम एक-दूसरे को संयम बरतने तथा संघर्ष को सीमित रखने के लिए समझाते रहे। निकोलस की इच्छा थी कि रूस केवल ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध सीमित सैन्य तैयारी करे, ताकि जर्मनी के साथ सीधे युद्ध से बचा जा सके। हालांकि, रूस की सैन्य योजनाएँ इस प्रकार की आंशिक लामबंदी के लिए तैयार नहीं थीं, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई।
रूस की लामबंदी और युद्ध की शुरुआत
25 जुलाई 1914 ई. को निकोलस ने मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद ऑस्ट्रिया-सर्बिया संकट में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया। उसने रूसी सेना को सतर्क रहने का आदेश दिया। यह पूर्ण लामबंदी नहीं थी, किंतु जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इसे युद्ध की तैयारी के रूप में देखा।
28 जुलाई 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके बाद 29 जुलाई को निकोलस द्वितीय ने विल्हेम द्वितीय को तार भेजकर सुझाव दिया कि विवाद को हेग सम्मेलन के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए। हालांकि, जर्मन सम्राट ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
रूसी राजनेता सर्गेई विट्टे ने फ्रांसीसी राजदूत को बताया कि रूस के लिए युद्ध एक विनाशकारी कदम होगा और इससे उसे कोई वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होगा। इसके बावजूद परिस्थितियाँ तेजी से बिगड़ती गईं। 30 जुलाई 1914 ई. को निकोलस द्वितीय ने रूस में सामान्य लामबंदी का आदेश जारी कर दिया। रूस ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि शांति वार्ता शुरू होती है तो वह आक्रामक कार्रवाई नहीं करेगा।
जर्मनी और रूस के बीच युद्ध
रूस की लामबंदी की खबर मिलने पर जर्मनी ने अपनी सैन्य तैयारियाँ तेज कर दीं और रूस से लामबंदी रोकने की मांग की। 1 अगस्त 1914 ई. को जर्मन राजदूत ने सेंट पीटर्सबर्ग में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई साज़ोनोव को युद्ध की घोषणा का आधिकारिक पत्र सौंपा। इसके साथ ही जर्मनी और रूस के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया।
जर्मनी ने 3 अगस्त को रूस के सहयोगी फ्रांस के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा की। इसके बाद 6 अगस्त 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी के सम्राट फ्रांज जोसेफ प्रथम ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। इस प्रकार यूरोप का स्थानीय संकट एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदल गया।
प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ में रूस
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ (1914 ई.) में रूस ने अपनी विशाल सेना के बल पर विजय की आशा रखी थी। रूस और उसके सहयोगी उसकी सेना को एक शक्तिशाली शक्ति मानते थे, जिसे अक्सर ‘रूसी स्टीमरॉलर’ कहा जाता था। युद्ध से पहले रूसी सेना की नियमित संख्या लगभग 14 लाख सैनिकों की थी, जबकि लामबंदी के बाद लगभग 31 लाख रिज़र्व सैनिक इसमें शामिल हो गए। इसके अतिरिक्त लाखों सैनिक भविष्य की सैन्य आवश्यकताओं के लिए तैयार रखे गए थे।
हालाँकि, रूस की सैन्य शक्ति केवल संख्या के आधार पर मजबूत दिखाई देती थी। वास्तविकता में वह आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था। जर्मनी की तुलना में रूस का रेलवे नेटवर्क बहुत कमजोर था। जर्मनी में प्रति वर्ग मील रेलवे लाइन की संख्या रूस से लगभग दस गुना अधिक थी। रूसी सैनिकों को मोर्चे तक पहुँचने के लिए औसतन लगभग 1,290 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी, जबकि जर्मन सैनिकों को इससे बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती थी।
हथियारों और रसद की कमी
रूस का औद्योगिक विकास सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। उसके पास आधुनिक हथियारों, तोपों, गोला-बारूद, मोटर परिवहन साधनों और अन्य सैन्य सामग्री की भारी कमी थी। इसके विपरीत, जर्मन सेना आधुनिक हथियारों और बेहतर सैन्य उपकरणों से लैस थी। रूसी सैनिकों को कई बार आवश्यक वस्तुओं, यहाँ तक कि जूतों तक की कमी का सामना करना पड़ा।
समुद्री मार्गों की कठिनाइयों ने रूस की स्थिति को और कमजोर किया। जर्मन पनडुब्बियों के कारण बाल्टिक सागर का मार्ग बंद था और ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में डार्डानेल्स जलडमरूमध्य बंद होने से रूस को मित्र राष्ट्रों से सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हुई। प्रारंभ में उसे सहायता केवल आर्कान्जेल बंदरगाह या सुदूर स्थित व्लादिवोस्तोक के रास्ते मिल सकती थी। बाद में 1915 ई. में उत्तर की ओर रेलवे लाइन बनाकर मुरमान्स्क के बर्फ-मुक्त बंदरगाह को विकसित किया गया, जिससे सहायता प्राप्त करने की सुविधा बढ़ी।
रूसी नेतृत्व की कमजोरियाँ और प्रारंभिक पराजय
रूसी सैन्य नेतृत्व भी समस्याओं से घिरा हुआ था। युद्ध मंत्री व्लादिमीर सुखोमलिनोव और सेना के सर्वोच्च कमांडर ग्रैंड ड्यूक निकोलस निकोलायेविच के बीच आपसी मतभेदों के कारण सैन्य निर्णय प्रभावित हुए। इसके बावजूद रूसी नेतृत्व ने जर्मनी के पूर्वी प्रांत पूर्वी प्रशिया पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।
प्रारंभिक अभियान में रूस को भारी असफलता मिली। जर्मन सेना ने टैनेनबर्ग के युद्ध (1914 ई.) में रूसी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिसमें एक रूसी सेना लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई। यद्यपि रूस ने ऑस्ट्रिया-हंगरी और ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध कुछ सफलताएँ प्राप्त कीं, किंतु जर्मन सेना के विरुद्ध उसे लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
सितंबर 1914 ई. में फ्रांस पर जर्मन दबाव कम करने के लिए रूस ने गैलिसिया में ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध अपनी सफल कार्रवाई को रोककर सिलेसिया की ओर अभियान चलाने का प्रयास किया। इससे उसकी सैन्य स्थिति और जटिल हो गई।
पूर्वी मोर्चे पर संघर्ष और घरेलू संकट
इसके बाद पूर्वी मोर्चे पर लंबा और थकाऊ युद्ध शुरू हुआ। रूसी सेना को जर्मन और ऑस्ट्रो-हंगेरियन सेनाओं के विरुद्ध भारी जनहानि उठानी पड़ी। रूसी जनरल एंटोन डेनकिन ने युद्ध की स्थिति का वर्णन करते हुए बताया कि जर्मन भारी तोपखाने के सामने रूसी सैनिकों के पास पर्याप्त जवाबी साधन नहीं थे और लगातार संघर्ष के कारण सैनिकों की संख्या घटती जा रही थी।
1915 ई. में रूसी सेना के पीछे हटने के बाद वारसॉ पर जर्मनों का अधिकार हो गया। इस पराजय ने रूस में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को बढ़ा दिया। प्रारंभ में जनता का गुस्सा रूस में रहने वाले जर्मन मूल के लोगों के विरुद्ध फूटा। उसके व्यापारिक प्रतिष्ठानों, घरों और संपत्तियों पर हमले किए गए।
धीरे-धीरे असंतोष सरकार और राजशाही के विरुद्ध बदल गया। जनता के एक वर्ग ने महारानी एलेक्जेंड्रा को हटाने, निकोलस द्वितीय के पद त्याग और रासपुतिन को दंडित करने की मांग उठाई। इस संकट के बीच ड्यूमा का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और युद्ध संचालन तथा राष्ट्रीय रक्षा के लिए एक विशेष परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई।
युद्धकालीन संकट और शांति प्रस्ताव
जुलाई 1915 ई. में डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन दशम, जो निकोलस द्वितीय के चचेरे भाई थे, ने हंस नील्स एंडरसन को मध्यस्थ के रूप में भेजने का प्रस्ताव रखा। एंडरसन ने लंदन, बर्लिन और पेट्रोग्राड के बीच संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया और जुलाई में महारानी मारिया फ्योदोरोव्ना से भी मुलाकात की। उसने रूस को जर्मनी और उसके सहयोगियों के साथ शांति समझौता करने की सलाह दी।
यद्यपि निकोलस द्वितीय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उसका मानना था कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे सहयोगी राष्ट्रों के युद्धरत रहते हुए केंद्रीय शक्तियों के साथ अलग से शांति संधि करना रूस के लिए विश्वासघात के समान होगा। वे मित्र राष्ट्रों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखना चाहते थे।
सेना का नेतृत्व संभालना और उसके परिणाम
रूसी सेना की लगातार पराजयों के बीच जनरल अलेक्सी पोलिवानोव ने व्लादिमीर सुखोमलिनोव का स्थान युद्ध मंत्री के रूप में लिया, किंतु इससे सैन्य स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ। 1915 ई. में रूस को जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस पराजय के बाद सितंबर 1915 ई. में निकोलस द्वितीय ने अपने चचेरे भाई ग्रैंड ड्यूक निकोलस निकोलायेविच को हटाकर स्वयं रूसी सेना के सर्वोच्च सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) का पद ग्रहण कर लिया।
यह निर्णय राजनीतिक रूप से अत्यंत हानिकारक सिद्ध हुआ, क्योंकि अब सेना की असफलताओं की सीधी जिम्मेदारी सम्राट पर आने लगी। निकोलस द्वितीय मोर्चे के निकट मोगिलेव स्थित मुख्यालय में रहने लगे और राजधानी पेट्रोग्राद से दूर हो गए। यद्यपि सैन्य मामलों के वास्तविक निर्णय चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मिखाइल अलेक्सेयेव लेते थे, फिर भी जनता की दृष्टि में युद्ध की असफलताओं का उत्तरदायित्व ज़ार पर ही था। निकोलस का अधिकांश समय सैनिकों का निरीक्षण करने, अस्पतालों का दौरा करने और सैन्य कार्यक्रमों में भाग लेने में व्यतीत होता था।
राजशाही की गिरती प्रतिष्ठा
युद्ध के दौरान ड्यूमा राजनीतिक सुधारों की मांग करती रही और देश में असंतोष बढ़ता गया। निकोलस द्वितीय जनता की भावनाओं और राजनीतिक परिस्थितियों से दूर होते गए। उसके मोर्चे पर रहने के कारण घरेलू प्रशासन की जिम्मेदारी महारानी एलेक्जेंड्रा के हाथों में आ गई।
एलेक्जेंड्रा के ग्रिगोरी रासपुतिन से निकट संबंध और उनकी जर्मन मूल की पृष्ठभूमि ने राजशाही की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँचाई। जनता और राजनीतिक वर्ग में रासपुतिन के प्रभाव को लेकर व्यापक असंतोष फैल गया। निकोलस को कई बार रासपुतिन के विरुद्ध चेतावनी दी गई, किंतु उसने उसे हटाने से इनकार कर दिया।
रासपुतिन की हत्या
एलेक्जेंड्रा और रासपुतिन के संबंधों को लेकर अनेक अफवाहें फैलने लगीं। कुछ लोगों ने महारानी पर जर्मनी के प्रति सहानुभूति रखने तक के आरोप लगाए। युद्ध में लगातार विफलताओं, आर्थिक संकट और राजशाही पर रासपुतिन के प्रभाव को लेकर बढ़ते आक्रोश के परिणामस्वरूप रूसी अभिजात वर्ग के एक समूह ने रासपुतिन की हत्या की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1916 ई. (पुरानी शैली) या 30 दिसंबर 1916 ई. (नई शैली) को प्रिंस फ़ेलिक्स युसुपोव और ग्रैंड ड्यूक दिमित्री पावलोविच के नेतृत्व में कुछ रूसी रईसों ने ग्रिगोरी रासपुतिन की हत्या कर दी। यह घटना रूसी राजशाही के भीतर बढ़ते संकट और जन-असंतोष का प्रतीक बन गई।
पतन की ओर बढ़ता रूसी साम्राज्य
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूसी सरकार की प्रशासनिक विफलताओं और आर्थिक संकट ने निकोलस द्वितीय के शासन को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। जब सरकार जनता को आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने में असफल रही, तो देश में असंतोष, दंगे और विद्रोह बढ़ने लगे। 1915 से 1916 ई. के बीच जब निकोलस द्वितीय स्वयं मोर्चे पर सेना का नेतृत्व कर रहे थे, तब राजधानी पेट्रोग्राद में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई। हड़तालों और सैनिक विद्रोहों के कारण शासन व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
ब्रिटिश राजदूत सर जॉर्ज बुकानन ने निकोलस द्वितीय को चेतावनी दी कि क्रांति को रोकने के लिए संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है, किंतु ज़ार ने उनकी सलाह को स्वीकार नहीं किया। वे राजधानी से लगभग 600 किलोमीटर दूर मोहिलेव स्थित सेना मुख्यालय (स्टाव्का) में ही बने रहे। इस दूरी के कारण वे राजधानी की वास्तविक स्थिति और जनता में बढ़ते असंतोष से कट गए, जिससे राजमहल षड्यंत्रों और विद्रोहों का केंद्र बन गया।
राजशाही समर्थकों का कमजोर होता विश्वास
निकोलस द्वितीय को प्रारंभ में दक्षिणपंथी राजशाही समर्थकों का मजबूत समर्थन प्राप्त था। ये वर्ग निरंकुश शासन और पारंपरिक राजसत्ता के पक्ष में था। हालांकि, समय के साथ उसका समर्थन भी कमजोर होने लगा। इसका प्रमुख कारण 1905 ई. की क्रांति के बाद स्टोलिपिन के सुधारों को निकोलस द्वारा सीमित रूप से स्वीकार करना और बाद में ग्रिगोरी रासपुतिन को राजनीतिक प्रभाव देना था। रूढ़िवादी वर्ग को लगा कि रासपुतिन का बढ़ता प्रभाव राजशाही की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा रहा है।
युद्ध और आर्थिक संकट
1917 ई. तक रूस की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध में लगभग 17 लाख रूसी सैनिक मारे जा चुके थे और सेना तथा जनता का मनोबल टूटने लगा था। युद्ध के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ, क्योंकि लगभग 1.5 करोड़ लोगों को सेना में भर्ती कर लिया गया था। परिणामस्वरूप खाद्य पदार्थों की कमी बढ़ी और कीमतों में भारी वृद्धि हुई। 1914 ई. की तुलना में अंडों की कीमत लगभग चार गुना और मक्खन की कीमत पाँच गुना तक बढ़ गई।
कठोर सर्दी और युद्धकालीन दबाव के कारण रूस की रेलवे व्यवस्था भी चरमरा गई। जब रूस युद्ध में शामिल हुआ था, तब उसके पास लगभग 20,000 इंजन थे, किंतु 1917 ई. तक केवल लगभग 9,000 ही उपयोग योग्य रह गए। रेलवे वैगनों की संख्या भी भारी रूप से घट गई। कोयले और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा के कारण पेट्रोग्राद में आटा और ईंधन की भारी कमी हो गई।
निकोलस द्वितीय ने युद्धकाल में देशभक्ति और उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से शराब पर प्रतिबंध लगाया था, किंतु इससे सरकार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई, क्योंकि शराब से मिलने वाला कर राजस्व समाप्त हो गया।
फरवरी क्रांति की शुरुआत
23 फरवरी 1917 ई. को पेट्रोग्राद में खाद्य संकट और कड़ाके की ठंड के कारण जनता सड़कों पर उतर आई। लोग रोटी और आवश्यक वस्तुओं की मांग को लेकर दुकानों और बेकरी के सामने एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों ने लाल झंडे उठाए और सरकार, युद्ध तथा ज़ार के विरुद्ध नारे लगाए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो गई। राजधानी में तैनात सैनिकों का मनोबल पहले ही गिर चुका था और वे सरकार के प्रति पूरी तरह निष्ठावान नहीं रह गए थे। इसके विपरीत, सैनिकों में भी असंतोष और क्रांतिकारी भावना बढ़ रही थी। अंततः पेट्रोग्राद के सैनिक जनता के साथ मिल गए, जिससे रूसी राजशाही के पतन की प्रक्रिया तेज हो गई।

ज़ार की वापसी में असफलता और प्रशासनिक संकट
फरवरी क्रांति के समय रूसी शासन व्यवस्था पूरी तरह अस्थिर हो चुकी थी। ज़ार की कैबिनेट ने निकोलस द्वितीय से तुरंत राजधानी लौटने का आग्रह किया और आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक इस्तीफ़ा देने की भी पेशकश की। किंतु निकोलस, जो उस समय राजधानी से लगभग 800 किलोमीटर दूर थे, को गृह मंत्री अलेक्जेंडर प्रोटोपोपोव ने गलत जानकारी दी कि स्थिति नियंत्रण में है। इस कारण ज़ार ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने का आदेश दे दिया।
हालाँकि, पेट्रोग्राद की सेना इस प्रकार की कार्रवाई के लिए तैयार नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध में रूसी सेना के अनुभवी और प्रशिक्षित सैनिकों का अधिकांश भाग पोलैंड तथा गैलिसिया के मोर्चों पर मारा जा चुका था। राजधानी में लगभग 1,70,000 सैनिक तैनात थे, जिनमें अधिकांश नए भर्ती किए गए ग्रामीण युवक या श्रमिक वर्ग के लोग थे। इन सैनिकों का नेतृत्व अनुभवी अधिकारियों के स्थान पर मोर्चे से बाहर रहे अधिकारी और सैन्य अकादमी के प्रशिक्षु कैडेट कर रहे थे। राजधानी में मौजूद कई यूनिटें केवल नाम मात्र के लिए प्रसिद्ध इंपीरियल गार्ड रेजिमेंट थीं, क्योंकि उनकी वास्तविक नियमित टुकड़ियाँ युद्धक्षेत्र में भेजी जा चुकी थीं। अनेक सैनिकों के पास पर्याप्त प्रशिक्षण, हथियार और नेतृत्व का अभाव था।
सेना का विद्रोह और क्रांति का विस्तार
जनरल खाबालोव ने 11 मार्च 1917 ई. को ज़ार के आदेशों को लागू करने का प्रयास किया। सरकार ने लोगों को सड़कों पर एकत्र न होने की चेतावनी दी, किंतु इसके बावजूद भारी संख्या में प्रदर्शनकारी राजधानी की सड़कों पर उतर आए। सेना की गोलीबारी में लगभग 200 लोग मारे गए, जिसके बाद भीड़ को हटाया गया। हालांकि, कुछ सैनिक टुकड़ियों ने जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। वोल्हिनियन रेजिमेंट की एक कंपनी ने भीड़ पर गोली चलाने के बजाय हवा में फायर किया, जबकि पावलोव्स्की लाइफ़ गार्ड्स की एक टुकड़ी ने गोली चलाने का आदेश देने वाले अधिकारी का ही विरोध किया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ड्यूमा के अध्यक्ष मिखाइल रोडज़ियान्को ने निकोलस को राजधानी की स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद ज़ार ने अतिरिक्त सैनिक भेजने और ड्यूमा को स्थगित करने का आदेश दिया, किंतु तब तक परिस्थितियाँ उसके नियंत्रण से बाहर हो चुकी थीं।
12 मार्च को वोल्हिनियन रेजिमेंट ने खुले रूप से विद्रोह कर दिया। शीघ्र ही सेमेनोव्स्की, इज़माइलोव्स्की, लिथुआनियन और प्रसिद्ध प्रेओब्राज़ेंस्की रेजिमेंट भी उसके साथ शामिल हो गईं। यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था क्योंकि प्रेओब्राज़ेंस्की रेजिमेंट को पीटर महान द्वारा स्थापित सबसे पुरानी और राजशाही की सबसे विश्वसनीय सैन्य इकाइयों में गिना जाता था।
विद्रोहियों ने शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया और गृह मंत्रालय, सैन्य प्रशासनिक भवन, पुलिस मुख्यालय तथा अन्य सरकारी संस्थानों पर हमला किया। कई इमारतों में आग लगा दी गई। दिन समाप्त होने तक पीटर और पॉल किले पर भी विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित हो गया और लगभग 60,000 सैनिक क्रांति में शामिल हो चुके थे।
निकोलस द्वितीय का त्यागपत्र
राजधानी में कानून-व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई। प्रधानमंत्री निकोलाई गोलित्सिन ने इस्तीफ़ा दे दिया। ड्यूमा और सोवियत के प्रतिनिधियों ने स्थिति को संभालने के लिए एक अंतरिम सरकार का गठन किया। इस सरकार ने निकोलस द्वितीय से सिंहासन त्यागने की मांग की। ज़ार के अपने सेनापतियों ने भी इस मांग का समर्थन किया। उसके पास न तो पर्याप्त वफादार सैनिक बचे थे, न ही परिवार पर उसका नियंत्रण था, क्योंकि शाही परिवार अंतरिम सरकार की निगरानी में आ चुका था। इसके अतिरिक्त गृहयुद्ध और जर्मन आक्रमण की आशंका ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। इन परिस्थितियों में निकोलस द्वितीय को अंततः सिंहासन त्यागने के लिए विवश होना पड़ा।
प्रथम विश्व युद्ध में रूस की लगातार सैन्य पराजयों, आर्थिक संकट, खाद्य सामग्री की कमी, मजदूरों की हड़तालों और राजनीतिक असंतोष ने 1917 ई. तक रूसी साम्राज्य की नींव को कमजोर कर दिया था। मार्च 1917 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग (पेट्रोग्राद) में फरवरी क्रांति का आरंभ हुआ। जब राजधानी में तैनात सैनिकों और कोसैक टुकड़ियों ने भी क्रांतिकारियों का समर्थन करना शुरू कर दिया, तब निकोलस द्वितीय के पास सत्ता बनाए रखने का कोई प्रभावी साधन नहीं बचा। 15 मार्च 1917 ई. को जब निकोलस द्वितीय मोगिलेव स्थित स्टाव्का मुख्यालय से ट्रेन द्वारा लौट रहे थे, तब उसे प्स्कोव में ड्यूमा के अध्यक्ष मिखाइल रोडज़ियान्को और सेना के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मिखाइल अलेक्सेयेव के तार प्राप्त हुए। इन संदेशों में उसे देश की गंभीर स्थिति को देखते हुए अपने पुत्र एलेक्सी के पक्ष में सिंहासन त्यागने का सुझाव दिया गया था। परिस्थितियों का आकलन करने के बाद निकोलस ने माना कि रूस और राजवंश के हित में गद्दी छोड़ना ही उचित होगा।
सिंहासन त्यागने से कुछ दिन पहले निकोलस द्वितीय को हृदय संबंधी समस्या (कोरोनरी ऑक्लूज़न) का सामना करना पड़ा था। फरवरी क्रांति के समाप्त होने पर उसने 2 मार्च 1917 ई. को औपचारिक रूप से रूसी सिंहासन छोड़ने का निर्णय लिया। प्रारंभ में निकोलस ने अपने पुत्र एलेक्सी को उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया था, किंतु बाद में चिकित्सकों की सलाह पर उसने अपना निर्णय बदल दिया। इस कारण निकोलस ने अपने छोटे भाई ग्रैंड ड्यूक मिखाइल अलेक्जेंड्रोविच के पक्ष में सिंहासन त्यागने का निर्णय लिया। उसने एक नया घोषणापत्र तैयार किया, जिसमें मिखाइल को रूस का अगला सम्राट घोषित किया गया। किंतु इस घोषणा को अंतरिम सरकार ने सार्वजनिक रूप से प्रभावी नहीं होने दिया।
रोमानोव राजवंश का अंत
ग्रैंड ड्यूक मिखाइल अलेक्जेंड्रोविच ने तत्काल सिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि रूस के भविष्य का निर्णय संविधान सभा द्वारा किया जाना चाहिए, जो यह तय करे कि देश में राजशाही बनी रहेगी या गणतंत्र स्थापित होगा। निकोलस द्वितीय के त्यागपत्र और मिखाइल के निर्णय में देरी के साथ ही रोमानोव राजवंश के लगभग तीन सौ वर्षों के शासन का अंत हो गया। 1613 में स्थापित यह राजवंश अब रूस की सत्ता से बाहर हो चुका था। ज़ार की निरंकुश शासन व्यवस्था के पतन का स्वागत ब्रिटेन और फ्रांस के उदारवादी तथा समाजवादी वर्गों ने किया।
संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरिम सरकार को मान्यता देने वाली पहली विदेशी शक्ति थी। रूस के भीतर निकोलस द्वितीय के सिंहासन त्याग की घोषणा पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ एक समान नहीं थीं। कुछ लोगों ने इसे स्वतंत्रता और परिवर्तन की शुरुआत के रूप में देखा, जबकि अन्य लोगों में भविष्य को लेकर भय, क्रोध, राहत और अनिश्चितता की भावनाएँ थीं।
देश निकाला की संभावना
ब्रिटेन में शरण देने का प्रस्ताव
15 मार्च 1917 ई. को निकोलस द्वितीय द्वारा रूसी सिंहासन त्यागने के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह था कि रोमानोव शाही परिवार का भविष्य क्या होगा। रूस की अंतरिम सरकार और स्वयं निकोलस द्वितीय दोनों की इच्छा थी कि पूर्व सम्राट और उसका परिवार रूस से बाहर किसी सुरक्षित देश में भेज दिया जाए, ताकि उन्हें क्रांतिकारी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता से बचाया जा सके। इस उद्देश्य के लिए ब्रिटेन को सबसे उपयुक्त विकल्प माना गया, क्योंकि ब्रिटिश शाही परिवार और रोमानोव राजवंश के बीच घनिष्ठ पारिवारिक संबंध थे। निकोलस द्वितीय और ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम आपस में चचेरे भाई थे तथा दोनों राजवंशों के बीच लंबे समय से पारिवारिक संबंध स्थापित थे। इसलिए प्रारंभिक रूप से यह आशा की गई कि ब्रिटेन रोमानोव परिवार को राजनीतिक शरण प्रदान करेगा।
19 मार्च 1917 ई. को ब्रिटिश सरकार ने अनिच्छा के बावजूद रोमानोव परिवार को शरण देने का प्रस्ताव रखा। यद्यपि ब्रिटिश अधिकारियों ने यह भी सुझाव दिया कि किसी तटस्थ देश में जाना उनके लिए अधिक सुरक्षित हो सकता है। ब्रिटेन में इस निर्णय को लेकर शीघ्र ही राजनीतिक विवाद उत्पन्न हो गया। लेबर पार्टी और कई उदारवादी नेताओं ने पूर्व रूसी सम्राट को शरण देने का विरोध किया।
विरोधियों का तर्क था कि निकोलस द्वितीय की ब्रिटेन में उपस्थिति वहाँ की जनता में राजशाही विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दे सकती है। रूस में ब्रिटिश राजदूत जॉर्ज बुकानन ने भी ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि कट्टरपंथी वामपंथी समूह इस मुद्दे का उपयोग ब्रिटिश राजतंत्र और सरकार के विरुद्ध प्रचार के लिए कर सकते हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज भी इस विषय में सावधानी बरतने के पक्ष में थे। उनका विचार था कि रोमानोव परिवार को शरण देने का निर्णय रूस की अंतरिम सरकार के औपचारिक अनुरोध और व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। अप्रैल 1917 ई. में ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम की आपत्तियों के बाद ब्रिटिश सरकार ने रोमानोव परिवार को शरण देने का प्रस्ताव वापस ले लिया। 1917 ई. की गर्मियों में रूस की ओर से पुनः ब्रिटेन से संपर्क किया गया, किंतु ब्रिटिश सरकार ने अपनी आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए शरण देने से इनकार कर दिया।
फ्रांस द्वारा शरण देने से इनकार
ब्रिटेन के अतिरिक्त फ्रांस को भी रोमानोव परिवार के संभावित आश्रय स्थल के रूप में देखा गया। किंतु फ्रांसीसी सरकार ने भी उन्हें स्वीकार करने में रुचि नहीं दिखाई। इसका मुख्य कारण प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थितियाँ और फ्रांस की घरेलू राजनीति थी। महारानी एलेक्जेंड्रा जर्मन मूल की थीं, इसलिए फ्रांस में उनके प्रति संदेह की भावना थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी फ्रांस का प्रमुख शत्रु था, इसलिए फ्रांसीसी जनता और राजनीतिक वर्ग के कुछ हिस्से एलेक्जेंड्रा की उपस्थिति को लेकर असहज थे।
पेरिस स्थित ब्रिटिश राजदूत फ्रांसिस बर्टी ने भी ब्रिटिश विदेश मंत्रालय को सूचित किया था कि फ्रांस में रोमानोव परिवार का स्वागत होने की संभावना बहुत कम है। इस प्रकार निकोलस द्वितीय और उसके परिवार के लिए विदेश में सुरक्षित आश्रय प्राप्त करने के प्रयास असफल होते गए।
रूस से बाहर भेजने की कठिनाइयाँ
यदि किसी देश में शरण की व्यवस्था हो भी जाती, तब भी रोमानोव परिवार को रूस से सुरक्षित बाहर निकालना अत्यंत कठिन था। 1917 ई. में अंतरिम सरकार स्वयं कमजोर स्थिति में थी और उसे पेट्रोग्राद सोवियत के साथ सत्ता साझा करनी पड़ रही थी। इस स्थिति को इतिहास में ‘दोहरी सत्ता’ कहा जाता है।
प्रारंभिक योजना के अनुसार रोमानोव परिवार को उत्तरी बंदरगाह मुरमान्स्क के रास्ते रूस से बाहर भेजने का विचार था। किंतु यह योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि रेलवे कर्मचारी और सुरक्षा बल पेट्रोग्राद सोवियत के प्रभाव में थे और वे पूर्व ज़ार को देश छोड़ने देने के पक्ष में नहीं थे। इसके बाद फिनलैंड के रास्ते बाल्टिक सागर के किसी तटस्थ बंदरगाह तक पहुँचाने की योजना बनाई गई, किंतु राजनीतिक विरोध और सुरक्षा संबंधी समस्याओं के कारण यह प्रयास भी असफल रहा।
रोमानोव परिवार की कैद
गद्दी त्यागने के बाद अंतरिम सरकार ने रोमानोव परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली। 20 मार्च 1917 ई. को सरकार ने आदेश दिया कि निकोलस द्वितीय और उसके परिवार को ज़ारस्कोये सेलो स्थित अलेक्जेंडर पैलेस में नजरबंद रखा जाए। दो दिन बाद निकोलस द्वितीय भी मोगिलेव स्थित सैन्य मुख्यालय से वहाँ पहुँच गए। सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी कर्नल यूजीन कोबिलिंस्की को दी गई, जिन्हें सैनिक समितियों और सोवियत प्रतिनिधियों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता था।
टोबोल्स्क स्थानांतरण
1917 ई. में रूसी सेना की असफलताओं और जुलाई दिवसों के बाद अंतरिम सरकार को आशंका हुई कि ज़ारस्कोये सेलो में रहने वाला शाही परिवार खतरे में पड़ सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर केरेन्स्की ने पश्चिमी साइबेरिया के टोबोल्स्क नगर भेजने का निर्णय लिया गया। 13 अगस्त 1917 ई. को निकोलस और उसका परिवार अलेक्जेंडर पैलेस से रवाना हुआ। वे पहले ट्युमेन पहुँचे और फिर नदी मार्ग से यात्रा करते हुए 19 अगस्त को टोबोल्स्क पहुँचे।
टोबोल्स्क में उन्हें पूर्व गवर्नर के निवास में रखा गया। निकोलस इस अवधि में अध्ययन, धार्मिक कार्यों और परिवार के साथ समय बिताने में व्यस्त रहा। उसे विशेष रूप से लकड़ी काटने का कार्य पसंद था। 1918 ई. की शुरुआत से टोबोल्स्क में शाही परिवार की स्थिति कठिन होने लगी। सैनिक समिति ने उनकी गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण लगा दिया।
मार्च 1918 ई. में बोल्शेविक सरकार ने वासिली याकोवलेव को विशेष कमिश्नर नियुक्त किया, जिसका उद्देश्य रोमानोव परिवार को येकातेरिनबर्ग ले जाना था। 30 अप्रैल 1918 ई. को रोमानोव परिवार येकातेरिनबर्ग पहुँचा, जहाँ उसे इपातिव हाउस में रखा गया। बोल्शेविकों ने इसे ‘विशेष उद्देश्य वाला घर’ कहा। यहाँ परिस्थितियाँ अत्यंत कठोर थीं। खिड़कियाँ बंद कर दी गईं, ऊँची बाड़ लगा दी गई और बाहरी संपर्क पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। बाद में चेका अधिकारी याकोव यूरोव्स्की को सुरक्षा प्रमुख बनाया गया। जून 1918 ई. में चेकोस्लोवाक लीजन के विद्रोह और विरोधी सेनाओं की प्रगति से बोल्शेविक नेतृत्व चिंतित हो गया। उन्हें भय था कि यदि येकातेरिनबर्ग पर विरोधी सेनाओं का अधिकार हो गया तो निकोलस द्वितीय को मुक्त कराया जा सकता है। फलतः 17 जुलाई 1918 ई. की रात निकोलस द्वितीय, महारानी एलेक्जेंड्रा, उनके पाँचों बच्चों और कुछ विश्वस्त सेवकों को एक कमरे में ले जाया गया और इसके बाद सैनिकों ने गोलीबारी कर सभी की हत्या कर दी।
हत्या के बाद शवों को जंगल में ले जाकर नष्ट करने का प्रयास किया गया। उन्हें जलाने, एसिड से नष्ट करने और गुप्त रूप से दफनाने की कोशिश की गई। कई दशकों बाद इन अवशेषों की खोज और डीएनए परीक्षणों द्वारा पहचान की पुष्टि हुई। रोमानोव परिवार की हत्या रूसी क्रांति की सबसे दुखद घटनाओं में से एक थी। इसने न केवल तीन शताब्दियों पुराने रोमानोव राजवंश का अंत हो गया, बल्कि बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक इतिहास पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
पुनर्वास, अंतिम संस्कार और धार्मिक मान्यता
रोमानोव परिवार की हत्या के दशकों बाद रूस में इस घटना के कानूनी और ऐतिहासिक मूल्यांकन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। सोवियत शासन के दौरान निकोलस द्वितीय और उसके परिवार की हत्या को एक क्रांतिकारी कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया था, किंतु सोवियत संघ के पतन के बाद इस घटना के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ। 1 अक्टूबर 2008 ई. को रूस के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि निकोलस द्वितीय और उसके परिवार के सदस्य राजनीतिक उत्पीड़न के शिकार थे। न्यायालय ने उन्हें आधिकारिक रूप से पुनर्वासित करते हुए माना कि उनकी हत्या बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की गई थी और वे राज्य दमन के पीड़ित थे।
रोमानोव परिवार की हत्या के आदेश को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से मतभेद रहे हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि येकातेरिनबर्ग में हत्या का निर्णय स्थानीय बोल्शेविक नेताओं द्वारा लिया गया था, किंतु मॉस्को स्थित केंद्रीय नेतृत्व का तर्क है कि इतनी महत्त्वपूर्ण राजनीतिक कार्रवाई केंद्रीय नेतृत्व की सहमति के बिना संभव नहीं थी। इसके विपरीत, आधिकारिक रूसी जाँचों में ऐसा कोई प्रत्यक्ष दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह सिद्ध हो सके कि लेनिन या स्वेर्दलोव ने व्यक्तिगत रूप से निकोलस द्वितीय की हत्या का आदेश दिया था। 2000 के दशक में रूसी अधिकारियों ने इस मामले की पुनः जाँच प्रारंभ की, जो 2011 ई. में समाप्त हुई। जाँचकर्ताओं को हत्या के आदेश से संबंधित कोई निर्णायक प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ। इस कारण यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच बहस का विषय बना हुआ है।
2015 ई. में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के अनुरोध पर निकोलस द्वितीय और महारानी एलेक्जेंड्रा के अवशेषों की पुनः डीएनए जाँच की गई। इन वैज्ञानिक परीक्षणों ने पुष्टि कर दी कि प्राप्त अस्थियाँ वास्तव में अंतिम रूसी सम्राट और उनकी पत्नी के अवशेष थे, जिससे पहचान संबंधी विवादों का काफी हद तक समाधान हो गया।
अंतिम संस्कार और पुनः दफन
अवशेषों की पहचान की पुष्टि के बाद रोमानोव परिवार के सदस्यों को सम्मानपूर्वक पुनः दफनाने का निर्णय लिया गया। 17 जुलाई 1998 ई. को निकोलस द्वितीय और उसके परिवार की हत्या की 80वीं वर्षगाँठ के अवसर पर उनके अवशेषों को सेंट पीटर्सबर्ग स्थित सेंट पीटर और पॉल कैथेड्रल में पुनः दफन किया गया। यह स्थान रूसी सम्राटों का पारंपरिक समाधि स्थल था, जहाँ रोमानोव वंश के अनेक शासकों को दफनाया गया था।
इस समारोह में रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन उपस्थित थे। उन्होंने इसे रूस के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण क्षण बताया और कहा कि देश को अपने अतीत की दुखद घटनाओं को स्वीकार करना चाहिए। ब्रिटिश राजपरिवार की ओर से प्रिंस माइकल ऑफ केंट ने समारोह में भाग लिया। इसके अतिरिक्त अनेक विदेशी राजदूतों और धार्मिक प्रतिनिधियों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
संत का दर्जा और धार्मिक मान्यता
निकोलस द्वितीय और उसके परिवार को धार्मिक सम्मान प्रदान करने की प्रक्रिया कई दशकों तक चली। रोमानोव परिवार की हत्या के बाद राजशाही समर्थकों और रूसी ऑर्थोडॉक्स समुदाय के एक वर्ग में यह धारणा बनी कि वे राजनीतिक हिंसा के शिकार धार्मिक व्यक्तित्व थे। 1981 ई. में रूस के बाहर स्थित रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च अब्रॉड ने निकोलस द्वितीय, महारानी एलेक्जेंड्रा, उनके पाँचों बच्चों और कुछ अन्य मृत रोमानोव सदस्यों को शहीद संत के रूप में मान्यता दी। चर्च के अनुसार उन्होंने मृत्यु के समय ईसाई धैर्य, क्षमा और विश्वास का प्रदर्शन किया।
इसके बाद रूस स्थित रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने 14 अगस्त 2000 ई. को धर्मसभा के निर्णय द्वारा निकोलस द्वितीय और उसके परिवार को संत घोषित किया। उन्हें पारंपरिक अर्थों में ‘शहीद’ नहीं, बल्कि ‘पैशन बेयरर’ की उपाधि दी गई।
आलोचकों के अनुसार निकोलस द्वितीय व्यक्तिगत रूप से धार्मिक और दयालु व्यक्ति हो सकता था, किंतु एक शासक के रूप में वह रूस की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान करने में असफल रहा। 1905 ई. की क्रांति, खूनी रविवार की घटना, प्रथम विश्व युद्ध की असफलताएँ और 1917 ई. की क्रांति उसकी शासन व्यवस्था की कमजोरियों से जुड़ी थीं।
कुछ विद्वानों का मत था कि चूँकि निकोलस द्वितीय की हत्या राजनीतिक कारणों से हुई थी, इसलिए उसे धार्मिक शहीद की श्रेणी में रखना उचित नहीं माना गया। वहीं, समर्थकों का तर्क था कि संत घोषित करने का आधार उसका शासन नहीं, बल्कि उसका व्यक्तिगत जीवन, धार्मिक आस्था और मृत्यु के समय प्रदर्शित धैर्य होना चाहिए। उनके अनुसार, निकोलस एक समर्पित पति, पिता और आस्थावान ईसाई था जिसने कठिन परिस्थितियों में भी अपने विश्वास को नहीं छोड़ा।
निकोलस द्वितीय का मूल्यांकन
निकोलस द्वितीय की ऐतिहासिक विरासत अत्यंत विवादास्पद रही है। कुछ इतिहासकारों ने उसे शांत, विनम्र, धार्मिक और परिवार के प्रति समर्पित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि अन्य ने उसे कमजोर इच्छाशक्ति वाला और असफल शासक माना है। उसका शासनकाल रूस के इतिहास में गहरे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का दौर था, जिसमें पुरानी निरंकुश व्यवस्था और आधुनिक राजनीतिक शक्तियों के बीच संघर्ष तेज हो गया था।
सोवियत काल के इतिहासलेखन में निकोलस द्वितीय को निरंकुश और दमनकारी शासक के रूप में चित्रित किया गया। 1896 ई. की खोडिंका मैदान त्रासदी, 1905 ई. की क्रांति के दमन और प्रथम विश्व युद्ध में रूस की असफलताओं के कारण उसके आलोचकों ने उसे “खूनी निकोलस” कहा। उनके अनुसार, उसकी कमजोर राजनीतिक समझ और सुधारों के प्रति अनिच्छा ने रूसी साम्राज्य के पतन को तेज किया।
हालाँकि आधुनिक इतिहासकार निकोलस द्वितीय का मूल्यांकन अधिक संतुलित दृष्टिकोण से करते हैं। उसे न तो केवल अत्याचारी शासक माना जाता है और न ही पूरी तरह निर्दोष व्यक्ति। वह व्यक्तिगत रूप से ईमानदार, धार्मिक और परिवार-प्रेमी था, किंतु एक विशाल और संकटग्रस्त साम्राज्य का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक राजनीतिक दूरदृष्टि, निर्णायक क्षमता और प्रशासनिक कौशल उसमें पर्याप्त नहीं था।
इतिहासकारों का मत है कि निकोलस द्वितीय का मूल्यांकन केवल उसके निजी गुणों के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक सम्राट के रूप में उसके निर्णयों का प्रभाव पूरे राष्ट्र पर पड़ा। वह आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण और सामाजिक परिवर्तन के युग में शासन कर रहा था, किंतु बदलती परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी राजनीतिक सुधार लागू करने में असफल रहा। इस प्रकार निकोलस द्वितीय का जीवन एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विरोधाभास प्रस्तुत करता है—वह एक अच्छा व्यक्ति हो सकता था, किंतु एक सफल शासक सिद्ध नहीं हो सका।




