बोलशेविक क्रांति के पूर्व रूस की स्थिति (1815 से 1917 ई. तक)
नेपोलियन बोनापार्ट के पतन में निर्णायक भूमिका निभाने के कारण वियना कांग्रेस (1814–15 ई.) के बाद रूस यूरोप की सबसे प्रभावशाली महाशक्तियों में उभरकर सामने आया। पहली बार उसने यूरोपीय राजनीति के नेतृत्व में केंद्रीय स्थान प्राप्त किया। रूस की बढ़ती शक्ति और प्रभाव से इंग्लैंड तथा ऑस्ट्रिया जैसी शक्तियाँ चिंतित थीं। ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्री मैटरनिख अपनी रूढ़िवादी नीतियों को सफल बनाने के लिए रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम के सहयोग पर निर्भर था। इसलिए उसने जार को अपने राजनीतिक सिद्धांतों और उद्देश्यों के अनुरूप बनाए रखने का निरंतर प्रयास किया। वियना कांग्रेस के समय अलेक्जेंडर प्रथम यूरोप के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिना जाता था। 1850 ई. तक महाशक्तियों के सामूहिक हस्तक्षेप से जुड़े अधिकांश यूरोपीय विवादों के समाधान में रूस की भूमिका निर्णायक रही। विशेष रूप से पूर्वी प्रश्न पर उसका अत्यधिक प्रभाव था। साथ ही, बाल्कन क्षेत्र की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों और शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने में भी रूस ने महत्त्वपूर्ण एवं सक्रिय भूमिका निभाई।
रूस की सामाजिक स्थिति
उन्नीसवीं शताब्दी में रूस यूरोप की प्रमुख महाशक्तियों में सम्मिलित हो चुका था, किंतु आंतरिक विकास की दृष्टि से वह अत्यंत पिछड़ा हुआ देश बना रहा। उसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाएँ आधुनिक युग की अपेक्षाओं के अनुरूप विकसित नहीं हो सकी थीं तथा उनका स्वरूप अब भी मध्ययुगीन था। पीटर महान और कैथरीन द्वितीय ने रूस में पाश्चात्य संस्कृति और प्रशासन के कुछ बाहरी तत्वों को अपनाया, किंतु इन सुधारों का लाभ मुख्यतः शासक वर्ग तक ही सीमित रहा। सामान्य जनता का जीवन निर्धनता, अशिक्षा और शोषण से ग्रस्त था।
रूसी समाज मुख्यतः दो वर्गों—कुलीन (नोबिलिटी) और कृषि-दासों (सर्फ़ों)—में विभाजित था। यद्यपि पादरी वर्ग और अल्पसंख्यक मध्यवर्ग भी विद्यमान थे, फिर भी उनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव नगण्य था। कुलीन वर्ग अनेक विशेषाधिकारों का उपभोग करता था, किंतु राज्य और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का समुचित निर्वाह नहीं करता था। यह स्थिति 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति से पूर्व के फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था से मिलती-जुलती थी।
कृषि-दासों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे भूमि से बँधे होते थे और भू-स्वामी उन्हें खरीद-बेच सकता था, शारीरिक दंड दे सकता था, अथवा साइबेरिया निर्वासित करा सकता था। व्यवहार में उन्हें भू-स्वामी की संपत्ति के समान माना जाता था। जार निकोलस प्रथम (1825–1855 ई.) इस सामंती व्यवस्था का समर्थक था। यद्यपि उसने कृषकों की दशा सुधारने के कुछ सीमित प्रयास किए, किंतु वे प्रभावी सिद्ध नहीं हुए। परिणामस्वरूप कृषि-दास प्रथा उन्नीसवीं शताब्दी के रूस की सबसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या बनी रही।
रूस की प्रशासनिक व्यवस्था
उन्नीसवीं शताब्दी में रूस की प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः निरंकुश और केंद्रीकृत थी। सामान्य जनता को किसी प्रकार के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव था। जार को दैवी अधिकार के सिद्धांत के आधार पर सर्वोच्च शासक माना जाता था और उसकी इच्छा ही शासन का आधार थी। वह अपने द्वारा नियुक्त मंत्रिपरिषद् की सहायता से शासन चलाता था, जो केवल उसी के प्रति उत्तरदायी होती थी। जार द्वारा जारी किए गए उकास अर्थात् शाही आदेश ही कानून का स्वरूप ग्रहण कर लेते थे, चाहे वे मंत्रियों के परामर्श से जारी किए गए हों या बिना परामर्श के। रूस में न तो संसद थी, न प्रेस की स्वतंत्रता और न ही स्वतंत्र न्यायपालिका। प्रशासन का संचालन विशाल नौकरशाही तंत्र के माध्यम से किया जाता था, जिसके अधिकारी सीधे जार के प्रति उत्तरदायी थे। साम्राज्यिक पुलिस प्रशासन को नियंत्रित रखने तथा विरोधी गतिविधियों का दमन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इस प्रकार रूस की प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः निरंकुश, केंद्रीकृत और दमनकारी थी।
अलेक्जेंडर प्रथम (1801–1825 ई.)
रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम ने स्विस शिक्षक ला हार्प से शिक्षा प्राप्त की थी। अपने गुरु के प्रभाव से उसने फ्रांसीसी क्रांति के उदारवादी सिद्धांतों—स्वतंत्रता, संवैधानिक शासन और सुधारवाद—को अपनाया। वह आदर्शवादी, धार्मिक तथा स्वप्नदर्शी शासक था और स्वयं को यूरोप में शांति तथा न्याय की स्थापना के लिए ईश्वर द्वारा नियुक्त मानता था। किंतु उसका व्यक्तित्व अत्यंत विरोधाभासी और अस्थिर था। वह परिस्थितियों तथा व्यक्तियों के प्रभाव में शीघ्र आ जाता था, जिसके कारण उसकी नीतियों में निरंतर परिवर्तन दिखाई देता है।
उदारवादी सुधार और साम्राज्यवादी नीति
अलेक्जेंडर प्रथम सुधारों का समर्थक था और संवैधानिक शासन की माँग के प्रति सहानुभूति रखता था। इसी कारण उसने पोलैंड को संविधान प्रदान किया तथा रूस के अधीन आए फिनलैंड के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया। उसने रूस के उत्तरी प्रांतों में कृषि-दासों को मुक्त किया और दासता-उन्मूलन के विचार का समर्थन किया। नेपोलियन युद्धों के बाद यूरोप में शांति और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से उसने ‘पवित्र मैत्री’ की स्थापना की। इसके बावजूद उसका उदारवाद उसकी साम्राज्यवादी नीति में बाधक नहीं बना। उसने फिनलैंड पर अधिकार किया तथा नेपोलियन के साथ मिलकर तुर्की साम्राज्य के विभाजन की योजना का भी समर्थन किया।
वियना कांग्रेस (1814–1815 ई.) के समय अलेक्जेंडर प्रथम को उदारवादी शासकों में गिना जाता था, किंतु बाद में वह ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्री मैटरनिख के प्रभाव में आ गया। मैटरनिख ने उसे यूरोप में संभावित क्रांतियों के प्रति इतना भयभीत कर दिया कि उसने प्रतिक्रियावादी नीतियाँ अपना लीं। परिणामस्वरूप वह नेपल्स, जर्मनी और स्पेन के उदारवादी विद्रोहों के दमन का समर्थक बन गया। मैटरनिख के परामर्श पर उसने अलेक्जेंडर इप्सिलांटिस के नेतृत्व में प्रारंभ हुए यूनानी स्वतंत्रता संग्राम का भी समर्थन नहीं किया, जबकि रूस की जनता यूनानी विद्रोहियों के पक्ष में थी।
अलेक्जेंडर प्रथम के प्रतिक्रियावादी परिवर्तन से रूस के उदारवादी वर्ग में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ और अनेक गुप्त क्रांतिकारी समितियों का गठन हुआ। 1825 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसका व्यक्तित्व विरोधाभासों का अनूठा उदाहरण था, जिसमें उदारवाद, धार्मिक रहस्यवाद, साम्राज्यवाद और निरंकुशतावाद का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। इसी कारण वह रूसी इतिहास के सबसे जटिल और बहुआयामी शासकों में गिना जाता है।
निकोलस प्रथम (1825–1855 ई.)
दिसंबरवादी विद्रोह
1825 ई. में जार अलेक्जेंडर प्रथम की मृत्यु के बाद रूस में उत्तराधिकार को लेकर कुछ समय तक राजनीतिक अस्थिरता रही। अलेक्जेंडर के बड़े भाई कॉन्स्टैन्टिन ने पहले ही सिंहासन त्याग दिया था, किंतु यह तथ्य सार्वजनिक नहीं था। परिणामस्वरूप जब छोटे भाई निकोलस प्रथम को जार घोषित किया गया, तब सेना के अनेक अधिकारियों तथा उदारवादी गुप्त समितियों ने इसका विरोध किया। दिसंबर 1825 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग में हुए इस सशस्त्र विद्रोह के कारण विद्रोहियों को दिसंबरवादी कहा गया।
इन विद्रोहियों का उद्देश्य रूस में निरंकुश शासन का अंत कर संवैधानिक शासन की स्थापना करना था। यद्यपि विद्रोह का नेतृत्व शिक्षित सैन्य अधिकारियों ने किया, फिर भी सामान्य सैनिकों में राजनीतिक चेतना अत्यंत सीमित थी। प्रसिद्ध है कि अनेक सैनिक यह समझते थे कि ‘संविधान’ कॉन्स्टैन्टिन की पत्नी का नाम है। इससे उस समय रूस में उदारवादी विचारों की सीमित पहुँच का पता चलता है। निकोलस प्रथम ने विद्रोह का कठोर दमन किया, अनेक नेताओं को मृत्युदंड दिया गया तथा अन्य को साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया।
प्रतिक्रियावादी शासन और निरंकुशता
दिसंबरवादी विद्रोह ने निकोलस प्रथम को यह विश्वास दिला दिया कि उदारवाद और क्रांतिकारी विचार रूस की स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इसलिए उसने अपने पूरे शासनकाल में निरंकुश राजसत्ता, रूढ़िवाद और राजभक्ति को शासन का आधार बनाया। उसका प्रसिद्ध सिद्धांत था—‘रूढ़िवादिता, निरंकुशता और राष्ट्रीयता’।
निकोलस स्वयं को दैवी अधिकार से नियुक्त शासक तथा कानून और व्यवस्था का संरक्षक मानता था। उसका विश्वास था कि रूस को पाश्चात्य उदारवादी विचारों का अनुकरण नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी परंपराओं के अनुरूप विकास करना चाहिए। परिणामस्वरूप उसने संविधान, लोकतंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की सभी माँगों का विरोध किया।
दमनकारी आंतरिक नीतियाँ
निकोलस प्रथम ने रूस में विचारों की स्वतंत्रता पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया। विदेशी पुस्तकों और समाचार-पत्रों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए गए तथा प्रेस पर कड़ा सेंसर लागू किया गया। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, अध्यापकों की नियुक्ति और विद्यार्थियों की गतिविधियों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। विदेश यात्रा पर भी कठोर प्रतिबंध लगाए गए ताकि रूसी नागरिक यूरोप के उदारवादी और राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित न हो सकें।
सरकार ने विरोधी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए व्यापक गुप्तचर व्यवस्था विकसित की। थर्ड सेक्शन नामक गुप्त पुलिस विभाग पूरे साम्राज्य में राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखता था। संदेहास्पद व्यक्तियों को बिना मुकदमे के गिरफ्तार करना, साइबेरिया भेजना या कठोर दंड देना सामान्य बात थी। इस प्रकार रूस लगभग एक पुलिस-राज्य में परिवर्तित हो गया।
पोलैंड के विद्रोह का दमन
1830–31 ई. में पोलैंड में रूसी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय विद्रोह हुआ। निकोलस प्रथम ने इस आंदोलन का अत्यंत कठोरता से दमन किया। विद्रोह के बाद अलेक्जेंडर प्रथम द्वारा पोलैंड को दिया गया संविधान समाप्त कर दिया गया तथा पोलैंड की स्वायत्तता का अंत करके उसे व्यावहारिक रूप से रूसी साम्राज्य में मिला लिया गया। इस नीति ने रूस की प्रतिक्रियावादी छवि को और अधिक मजबूत किया।
तुर्की के प्रति विदेश नीति
निकोलस प्रथम ने विदेश नीति में कैथरीन द्वितीय की विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। विशेष रूप से उसका ध्यान ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य पर केंद्रित था। अलेक्जेंडर प्रथम के विपरीत उसने यूनानी स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया। इंग्लैंड और फ्रांस के साथ मिलकर उसने तुर्की पर यूनान को स्वायत्तता देने का दबाव डाला।
जब तुर्की ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, तब 1827 ई. के नावारिनो के युद्ध में संयुक्त बेड़े ने तुर्की और मिस्र की नौसेना को नष्ट कर दिया। इसके बाद रूस ने अकेले तुर्की के विरुद्ध युद्ध जारी रखा और उसे पराजित करके 1829 ई. की एड्रियानोपल की संधि करने के लिए बाध्य किया। इस संधि के परिणामस्वरूप यूनान की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ तथा काला सागर और बाल्कन क्षेत्र में रूस का प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ गया।
अनकियार-स्केलेसी की संधि
1833 ई. में जब मिस्र के शासक मुहम्मद अली ने ओटोमन साम्राज्य को गंभीर संकट में डाल दिया, तब निकोलस प्रथम ने तुर्की को सैन्य सहायता प्रदान की। इसके बदले दोनों देशों के बीच अनकियार-स्केलेसी की संधि हुई। इस संधि ने रूस को काला सागर और तुर्की जलडमरूमध्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान किया तथा बाल्कन में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी।
यूरोप में प्रतिक्रियावादी हस्तक्षेप
निकोलस प्रथम स्वयं को यूरोप में निरंकुश राजतंत्र का संरक्षक मानता था। 1833 ई. में उसने ऑस्ट्रिया और प्रशा के साथ घनिष्ठ सहयोग स्थापित किया, जिसका उद्देश्य यूरोप में उदारवादी और राष्ट्रवादी आंदोलनों का दमन करना था। इस सहयोग ने पवित्र मैत्री की भावना को पुनर्जीवित किया और रूस को यूरोपीय राजनीति का प्रमुख केंद्र बना दिया। 1849 ई. में उसने ऑस्ट्रिया के सम्राट फ्रांसिस जोज़ेफ के अनुरोध पर हंगरी के राष्ट्रीय विद्रोह को कुचलने के लिए विशाल रूसी सेना भेजी। इसी प्रकार उसने जर्मनी के राष्ट्रवादी आंदोलन का भी विरोध किया और सशस्त्र हस्तक्षेप की धमकी दी। उसके दबाव के कारण प्रशा के राजा फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ ने फ्रैंकफर्ट संसद द्वारा प्रस्तावित जर्मन सम्राट का मुकुट स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार निकोलस प्रथम यूरोप में प्रतिक्रियावाद का सबसे प्रभावशाली समर्थक बन गया।
पूर्वी प्रश्न और क्रीमिया युद्ध
निकोलस प्रथम की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य ओटोमन साम्राज्य पर रूस का प्रभुत्व स्थापित करना था। प्रारंभ में वह तुर्की को समाप्त करने के बजाय उसे रूसी प्रभाव में रखना चाहता था, किंतु इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पामर्स्टन की कूटनीति ने उसकी योजनाओं को विफल कर दिया। इसके बाद उसने ओटोमन साम्राज्य के विभाजन की नीति अपनाई और तुर्की को ‘यूरोप का बीमार व्यक्ति’ बताया।
इस नीति से इंग्लैंड और फ्रांस दोनों चिंतित हो गए। परिणामस्वरूप 1853–1856 ई. का क्रीमिया युद्ध प्रारंभ हुआ। इस युद्ध में इंग्लैंड, फ्रांस और सार्डीनिया ने तुर्की का समर्थन किया। रूस की पराजय ने उसकी सैन्य और प्रशासनिक कमजोरियों को उजागर कर दिया तथा यूरोप में उसकी प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा।
इस प्रकार निकोलस प्रथम का शासन रूसी इतिहास में निरंकुशता और प्रतिक्रियावाद का चरम था। उसने उदारवाद, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक आंदोलनों का कठोर दमन किया तथा रूस को एक केंद्रीकृत पुलिस-राज्य में परिवर्तित कर दिया। विदेश नीति में उसने प्रारंभिक सफलताएँ अवश्य प्राप्त कीं और रूस के प्रभाव का विस्तार किया, किंतु ओटोमन साम्राज्य के प्रति उसकी आक्रामक नीति अंततः क्रीमिया युद्ध का कारण बनी। 1855 ई. में युद्ध के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके शासन ने रूस की आंतरिक कमजोरियों को उजागर किया, जिससे उसके उत्तराधिकारी अलेक्जेंडर द्वितीय को व्यापक सुधारों का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित होना पड़ा।
अलेक्जेंडर द्वितीय (1855–1881 ई.)
1855 ई. में निकोलस प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलेक्जेंडर द्वितीय रूस का जार बना। उसका शासनकाल (1855–1881 ई.) रूसी इतिहास में ‘महान सुधारों का युग’ माना जाता है। विशेष रूप से 1861 ई. में कृषि-दास प्रथा के उन्मूलन के कारण उसे ‘मुक्तिदाता जार’ की उपाधि प्राप्त हुई। उसने रूस के सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, न्यायिक तथा शैक्षिक क्षेत्रों में व्यापक सुधार आरंभ किए, जिनका उद्देश्य देश को आधुनिक यूरोपीय राष्ट्रों की पंक्ति में लाना था। यद्यपि वह सुधारवादी शासक था, फिर भी उसके व्यक्तित्व में उदारवाद और निरंकुशता का मिश्रण विद्यमान था। यही कारण था कि उसके अनेक सुधार आधे-अधूरे रह गए और राजनीतिक क्षेत्र में निरंकुश शासन की मूल संरचना बनी रही।
राजनीतिक दृष्टिकोण
अलेक्जेंडर द्वितीय अपने पिता निकोलस प्रथम की कठोर निरंकुश शासन-व्यवस्था और विशाल नौकरशाही तंत्र का उत्तराधिकारी था। उसकी कोई निश्चित राजनीतिक विचारधारा नहीं थी। वह परिस्थितियों के अनुसार कभी उदारवादी तो कभी प्रतिक्रियावादी नीति अपनाता था। उसमें अलेक्जेंडर प्रथम का आदर्शवाद तथा निकोलस प्रथम की निरंकुश प्रवृत्ति दोनों का प्रभाव दिखाई देता है। वह रूस का आधुनिकीकरण तो चाहता था, किंतु जार की सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने के पक्ष में नहीं था। इसलिए उसके सुधार सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्रों तक सीमित रहे तथा राजनीतिक लोकतंत्रीकरण का मार्ग नहीं खुल सका।
सुधारों की आवश्यकता
अलेक्जेंडर द्वितीय के शासन का प्रारंभ क्रीमिया युद्ध (1853–1856 ई.) की पराजय के साथ हुआ। इस युद्ध ने रूस की सैन्य, प्रशासनिक और आर्थिक कमजोरियों को स्पष्ट कर दिया। निकोलस प्रथम की नौकरशाही भ्रष्ट और अक्षम सिद्ध हुई तथा रूसी सेना आधुनिक यूरोपीय सेनाओं की तुलना में पिछड़ी हुई थी। परिवहन, उद्योग और संचार व्यवस्था भी अत्यंत अविकसित थी। इस पराजय से रूस की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा और यह स्पष्ट हो गया कि यदि व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो रूस यूरोप की प्रमुख शक्तियों से पीछे रह जाएगा।
देश में भी कृषि-दास प्रथा, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता के कारण असंतोष बढ़ रहा था। अलेक्जेंडर द्वितीय ने समझ लिया कि रूस की कमजोरी का मुख्य कारण उसकी पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था है। इसलिए उसने शासन संभालते ही सुधारों की नीति अपनाई। दिसंबरवादी विद्रोह के जीवित निर्वासितों को क्षमा प्रदान की गई तथा प्रशासन की कठोरता को कुछ हद तक कम किया गया।
शिक्षा एवं प्रेस संबंधी सुधार
अलेक्जेंडर द्वितीय ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। 1855 से 1861 ई. के बीच विश्वविद्यालयों पर लगाए गए कठोर प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए। रूसी विद्वानों को विदेशों में अध्ययन और अनुसंधान की अनुमति दी गई तथा दर्शनशास्त्र और संवैधानिक विधि जैसे विषयों की पुनः शिक्षा प्रारंभ हुई। विद्यार्थियों पर लगाए गए अनेक अनुशासनात्मक प्रतिबंध भी समाप्त कर दिए गए, जिससे बौद्धिक वातावरण अधिक स्वतंत्र हो गया।
महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। 1869 से 1871 ई. के बीच मास्को सहित अनेक नगरों में महिलाओं के लिए अर्द्ध-सरकारी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई तथा माध्यमिक शिक्षा का विस्तार हुआ। इससे शिक्षित मध्यमवर्ग का विकास हुआ।
प्रेस संबंधी नीति भी पहले की अपेक्षा अधिक उदार बनाई गई। दिसंबर 1855 ई. में बुतुर्लिन समिति समाप्त कर दी गई, जो प्रेस पर कठोर नियंत्रण रखती थी। समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के प्रकाशन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कुछ विस्तार हुआ। यद्यपि 1865 के प्रेस कानून ने सेंसरशिप को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, फिर भी यह निकोलस प्रथम की कठोर नीति की तुलना में अधिक उदार था।
आर्थिक सुधार
अलेक्जेंडर द्वितीय ने आर्थिक आधुनिकीकरण को भी प्राथमिकता दी। उसने उद्योगों, व्यापार तथा निजी निवेश को प्रोत्साहित किया। आधुनिक रेलवे नेटवर्क का तीव्र विस्तार किया गया, जिससे रूस के विशाल भूभाग के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ा। रेलवे के विकास ने व्यापार, उद्योग और प्रशासन को नई गति प्रदान की। इसके साथ ही बैंकिंग व्यवस्था, संचार और परिवहन के विकास पर भी बल दिया गया। इन प्रयासों ने आगे चलकर रूस में औद्योगीकरण की मजबूत आधारशिला रखी।
कृषि-दासों की मुक्ति
अलेक्जेंडर द्वितीय की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कृषि-दास प्रथा का उन्मूलन थी। उस समय रूस की लगभग नौ-दसवाँ कृषि भूमि शाही परिवार तथा लगभग 1,40,000 कुलीन भू-स्वामियों के अधिकार में थी। लगभग 4 करोड़ 50 लाख कृषि-दास इन्हीं की भूमि पर खेती करते थे। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित थे तथा भू-स्वामियों द्वारा खरीदे-बेचे जा सकते थे। उन्हें कठोर दंड दिए जाते थे और वे स्वामी की अनुमति के बिना कहीं नहीं जा सकते थे। कृषकों के लगातार विद्रोहों ने इस व्यवस्था की अस्थिरता को स्पष्ट कर दिया था।
1858 ई. में अलेक्जेंडर द्वितीय ने सबसे पहले शाही भूमि पर कार्यरत लगभग 23 लाख कृषि-दासों को मुक्त किया। इसके बाद कुलीन भू-स्वामियों से समझौता करके 3 मार्च 1861 ई. को ऐतिहासिक मुक्ति राजाज्ञा जारी की। इसके अंतर्गत कृषि-दासों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रदान की गई, भू-स्वामियों का उन पर कानूनी अधिकार समाप्त कर दिया गया तथा उन्हें खेती योग्य भूमि का एक भाग उपलब्ध कराया गया। सरकार ने भूमि भू-स्वामियों से खरीदकर कृषकों को दी और उसका मूल्य लगभग चालीस वर्षों में किस्तों द्वारा चुकाने की व्यवस्था की। भूमि व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय ‘मीर’ अथवा ग्राम-समुदाय के अधीन रखी गई, जो भूमि का वितरण और ऋण की वसूली करता था।
कृषि-दासों की मुक्ति के परिणाम
1861 ई. की मुक्ति राजाज्ञा रूस के इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक घटनाओं में से एक थी। यद्यपि कृषकों को कानूनी स्वतंत्रता मिल गई, फिर भी प्रारंभिक वर्षों में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें पर्याप्त भूमि नहीं मिली तथा भूमि के बदले भारी ऋणमोचन राशि चुकानी पड़ी। अनेक स्थानों पर मीर भी कठोर सिद्ध हुआ और कृषकों को अपेक्षित आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिल सकी। इसलिए अनेक किसानों को लगा कि वे केवल भू-स्वामियों की दासता से निकलकर राज्य के ऋणी बन गए हैं।
फिर भी इस सुधार का दीर्घकालीन प्रभाव अत्यंत व्यापक था। सामंती व्यवस्था की जड़ें कमजोर हुईं, कुलीन वर्ग का सामाजिक प्रभुत्व घटा और कृषकों की कानूनी स्थिति में सुधार हुआ। इससे स्वतंत्र श्रमिक वर्ग का विकास हुआ, जिसने आगे चलकर औद्योगिक विकास और नगरीकरण को गति प्रदान की।
स्थानीय स्वशासन (जेम्स्त्वो सुधार)
1864 ई. में अलेक्जेंडर द्वितीय ने स्थानीय प्रशासन में सुधार करते हुए जेम्स्त्वो नामक निर्वाचित स्थानीय परिषदों की स्थापना की। इन परिषदों में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे। उनका कार्य सड़क एवं पुल निर्माण, प्राथमिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना था।
यद्यपि प्रांतीय राज्यपालों को इन परिषदों पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त था और इनके अधिकार सीमित थे, फिर भी इन संस्थाओं ने स्थानीय स्वशासन की भावना को विकसित किया। साथ ही शिक्षित मध्यमवर्ग को प्रशासनिक अनुभव प्राप्त हुआ और भविष्य के लोकतांत्रिक नेतृत्व के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ।
न्यायिक सुधार
1864 ई. के न्यायिक सुधार अलेक्जेंडर द्वितीय की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में गिने जाते हैं। पहले न्यायपालिका भ्रष्ट, पक्षपातपूर्ण तथा प्रशासन के नियंत्रण में थी। नए सुधारों के अंतर्गत न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक किया गया तथा न्यायालयों की कार्यवाही सार्वजनिक कर दी गई। कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समानता स्वीकार की गई और जूरी प्रणाली लागू की गई। छोटे मामलों के निपटारे के लिए निर्वाचित शांति न्यायाधीश नियुक्त किए गए तथा प्रशिक्षित अधिवक्ताओं को न्यायिक प्रक्रिया में मान्यता प्रदान की गई। इन सुधारों ने रूस की न्याय-व्यवस्था को आधुनिक यूरोपीय मानकों के अधिक निकट पहुँचा दिया।
पोलैंड में विद्रोह (1863–64 ई.)
अलेक्जेंडर द्वितीय के शासन के प्रारंभिक वर्षों में रूस में व्यापक सुधार लागू किए गए, किंतु लगभग एक दशक बाद उसके सुधारवादी उत्साह में स्पष्ट कमी आने लगी। वस्तुतः वह स्वभाव से पूर्णतः उदारवादी या लोकतांत्रिक शासक नहीं था। उसके अधिकांश सुधार किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण नहीं, बल्कि क्रीमिया युद्ध के बाद उत्पन्न व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किए गए थे। जब उसे लगा कि तत्कालीन संकट टल गया है, तब उसने सुधारों की गति धीमी कर दी। इस परिवर्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण 1863 ई. का पोलैंड विद्रोह था।
शासन के आरंभ में अलेक्जेंडर द्वितीय ने पोलैंड के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई थी। उसने निकोलस प्रथम की कठोर दमनकारी नीतियों में कुछ शिथिलता लाई, किंतु पोलिश राष्ट्रवादियों ने इसे रूसी शासन की कमजोरी समझा। इटली के राष्ट्रीय एकीकरण की सफलता तथा रूस में कृषि-दासों की मुक्ति से प्रेरित होकर पोलिश नेताओं ने स्वतंत्रता की माँग को और अधिक तीव्र कर दिया। वे केवल स्वतंत्र पोलैंड की स्थापना ही नहीं चाहते थे, बल्कि 1772 ई. के प्रथम विभाजन से पूर्व के सभी पोलिश प्रदेशों को पुनः एकीकृत करने की माँग भी करने लगे।
जब रूसी सरकार ने इन गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया, तब 1863 ई. में सशस्त्र विद्रोह आरंभ हो गया। पोल विद्रोहियों के पास नियमित सेना नहीं थी, इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे दलों में संगठित होकर जंगलों से छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। उन्होंने फ्रांस से सहायता की भी अपेक्षा की। इंग्लैंड और फ्रांस ने रूस की कठोर नीति की आलोचना की, किंतु प्रशा के चांसलर ओटो फ़ॉन बिस्मार्क ने अपने राजनीतिक हितों के कारण रूस का समर्थन किया। परिणामस्वरूप पोलैंड को कोई प्रभावी विदेशी सहायता नहीं मिली और 1864 ई. तक विद्रोह का निर्ममता से दमन कर दिया गया।
विद्रोह के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने पोलैंड के प्रति कठोर ‘रूसीकरण’ की नीति अपनाई। पोलैंड की स्वायत्तता समाप्त कर दी गई, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पोलिश भाषा के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा प्रशासन से पोल अधिकारियों को हटाकर उनकी जगह रूसी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। रोमन कैथोलिक चर्च के विशेषाधिकार सीमित कर दिए गए और पोलिश कुलीन वर्ग का कठोर दमन किया गया। दूसरी ओर, कृषकों के साथ अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करके कुलीनों के प्रभाव को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
पोलैंड के विद्रोह ने अलेक्जेंडर द्वितीय की सुधारवादी नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। उसने उदारवादी रुख त्यागकर पुनः प्रतिक्रियावादी नीति अपनाई। प्रेस पर पुनः कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया, गुप्त पुलिस को सशक्त बनाया गया, शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया तथा विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों पर कड़ी निगरानी रखी गई। इस प्रकार 1863–64 ई. का पोलैंड विद्रोह रूस में उदार सुधारों की गति को रोकने वाला एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।
विदेश नीति
अलेक्जेंडर द्वितीय ने अपने पिता निकोलस प्रथम की आक्रामक एवं हस्तक्षेपवादी विदेश नीति से भिन्न मार्ग अपनाया। क्रीमिया युद्ध (1853–1856 ई.) में रूस की पराजय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि निरंतर युद्ध और यूरोपीय मामलों में हस्तक्षेप की नीति रूस के हित में नहीं है। इसलिए उसने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में यूरोप की जटिल राजनीतिक समस्याओं से यथासंभव दूर रहने का प्रयास किया और देश के आंतरिक सुधारों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। यद्यपि उसने फ्रांस से दूरी बना ली, क्योंकि नेपोलियन तृतीय ने 1863 ई. के पोलैंड विद्रोह के समय पोल राष्ट्रवादियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की थी। इसके विपरीत उसने प्रशा के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। प्रशा के प्रधानमंत्री ओटो फ़ॉन बिस्मार्क ने भी रूस के साथ घनिष्ठ सहयोग की नीति अपनाई। यह रूस-प्रशा मैत्री दोनों देशों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। रूस ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध प्रशा का अप्रत्यक्ष समर्थन किया, जबकि प्रशा ने रूस को क्रीमिया युद्ध के बाद खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करने में सहायता दी। 1870 ई. में प्रशा के समर्थन से रूस ने पेरिस की संधि (1856 ई.) के उन प्रावधानों को अस्वीकार कर दिया, जिनके अंतर्गत काला सागर में उसकी नौसैनिक शक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध की पराजय से उत्पन्न राष्ट्रीय अपमान काफी हद तक समाप्त हो गया।
बाल्कन नीति और तुर्की के साथ युद्ध
अलेक्जेंडर द्वितीय की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र में रूस के पारंपरिक प्रभाव को पुनः स्थापित करना था। रूस स्वयं को बाल्कन के स्लाव तथा रूढ़िवादी ईसाई समुदायों का संरक्षक मानता था। जब ओटोमन साम्राज्य के अधीन बाल्कन में विद्रोह आरंभ हुए और तुर्की द्वारा उनका कठोर दमन किया गया, तब रूस ने स्वयं को हस्तक्षेप के लिए नैतिक एवं राजनीतिक रूप से उचित समझा। 1877 ई. में उसने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध में रूस को उल्लेखनीय सफलता मिली और 1878 ई. की सैन स्टेफानो संधि के माध्यम से उसे पर्याप्त राजनीतिक एवं सामरिक लाभ प्राप्त हुए। इस संधि से बुल्गारिया का एक विशाल राज्य स्थापित हुआ, जिस पर रूस का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
किंतु रूस की इस सफलता से इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया अत्यंत चिंतित हो गए। यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क ने बर्लिन कांग्रेस (1878 ई.) का आयोजन किया। यद्यपि रूस को आशा थी कि बिस्मार्क उसका समर्थन करेगा, परंतु उसने स्वयं को ‘ईमानदार मध्यस्थ’ घोषित करते हुए ऑस्ट्रिया और अन्य यूरोपीय शक्तियों के हितों को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप सैन स्टेफानो संधि में रूस को प्राप्त अनेक लाभ सीमित कर दिए गए। इस घटना से रूस और जर्मनी के संबंधों में कड़ुवाहट आ गई तथा बाल्कन क्षेत्र में रूस की महत्त्वाकांक्षाओं को आंशिक झटका लगा।
एशिया में रूस का विस्तार
यूरोप में सीमित सफलता मिलने के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने एशिया में साम्राज्य-विस्तार की नीति को अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया। मध्य एशिया में रूस ने क्रमिक सैन्य अभियानों के माध्यम से ताशकंद, समरकंद, खिवा और कोकंद जैसे क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया तथा अपना अधिकार क्षेत्र मर्व तक विस्तारित कर लिया। इसके परिणामस्वरूप रूसी सीमाएँ फारस (ईरान) और अफगानिस्तान के निकट पहुँच गईं। मध्य एशिया में रूस की इस तीव्र प्रगति से ब्रिटेन अत्यंत चिंतित हो गया, क्योंकि उसे आशंका थी कि रूस भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। यही प्रतिस्पर्धा आगे चलकर मध्य एशिया में रूस और ब्रिटेन के बीच प्रसिद्ध ‘ग्रेट गेम’ का आधार सिद्ध हुई।
पूर्वी एशिया में भी रूस ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। चीन के साथ 1858 ई. की ऐगुन संधि तथा 1860 ई. के पेकिंग समझौते के परिणामस्वरूप रूस ने अमूर नदी के उत्तर का विशाल क्षेत्र तथा उस्सूरी प्रदेश प्राप्त किया। इसी प्रक्रिया में व्लादिवोस्तोक बंदरगाह रूस के अधिकार में आया, जो आगे चलकर प्रशांत महासागर पर रूस का प्रमुख नौसैनिक एवं व्यापारिक केंद्र बना। बाद में यही नगर ट्रांस-साइबेरियन रेलवे का अंतिम स्टेशन भी बना। दक्षिण में रूस ने काकेशस पर्वतीय क्षेत्र पर भी अपना नियंत्रण सुदृढ़ कर लिया। इस प्रकार अलेक्जेंडर द्वितीय के शासनकाल में एशिया में रूस का साम्राज्य अभूतपूर्व रूप से विस्तृत हुआ।
क्रांतिकारी आंदोलनों का विकास
अलेक्जेंडर द्वितीय के सुधारों ने प्रारंभ में रूस के शिक्षित वर्ग में नई आशाएँ उत्पन्न कीं। शिक्षा, प्रेस और न्याय व्यवस्था में हुए परिवर्तनों से बुद्धिजीवियों को लगा कि रूस धीरे-धीरे उदार एवं आधुनिक राज्य की दिशा में अग्रसर होगा। किंतु 1863 ई. के पोलैंड विद्रोह के बाद जार ने पुनः प्रतिक्रियावादी नीति अपनाई। प्रेस पर नियंत्रण बढ़ाया गया, शिक्षा पर निगरानी स्थापित की गई और राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए गए। इससे शिक्षित वर्ग में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।
रूस में लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव था और राजनीतिक विरोध के लिए कोई वैधानिक मंच उपलब्ध नहीं था। परिणामस्वरूप असंतुष्ट बुद्धिजीवी, विद्यार्थी और युवा वर्ग भूमिगत संगठनों में संगठित होने लगे। जो कार्य लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल करते थे, वही कार्य रूस में गुप्त क्रांतिकारी समितियाँ करने लगीं। सरकार की कठोर गुप्तचर व्यवस्था और दमनकारी नीतियों ने इन संगठनों को और अधिक उग्र बना दिया। धीरे-धीरे शांतिपूर्ण सुधारों की आशा समाप्त होने लगी और अनेक क्रांतिकारियों ने आतंकवादी उपायों तथा राजनीतिक हत्याओं को परिवर्तन का साधन मान लिया। इसके प्रत्युत्तर में सरकार ने भी गिरफ्तारियों, साइबेरिया निर्वासन और मृत्युदंड जैसे कठोर दमनकारी उपाय अपनाए। इस प्रकार रूस का राजनीतिक वातावरण निरंतर तनावपूर्ण और हिंसात्मक बनता गया।
नास्तिवाद (निहिलिज़्म) का विकास
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रूस के क्रांतिकारी आंदोलनों में नास्तिवाद (निहिलिज़्म) सबसे प्रभावशाली विचारधाराओं में से एक था। ‘नास्तिवाद’ का शाब्दिक अर्थ है—पुरानी व्यवस्था का पूर्ण निषेध या उन्मूलन। इसके अनुयायी मुख्यतः विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, चिकित्सक तथा शिक्षित युवा वर्ग के सदस्य थे। उनका विश्वास था कि रूस की सभी पुरानी संस्थाएँ—निरंकुश राजसत्ता, चर्च, सामंती व्यवस्था और रूढ़ सामाजिक परंपराएँ—प्रगति में बाधक हैं और उन्हें समाप्त कर देना चाहिए।
नास्तिवादी पाश्चात्य यूरोप के वैज्ञानिक एवं समाजवादी विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। वे प्रत्येक संस्था और परंपरा को तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टि से परखते थे तथा जो व्यवस्था उन्हें अव्यावहारिक या अन्यायपूर्ण प्रतीत होती थी, उसका विरोध करते थे। प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार इवान तुर्गनेव ने नास्तिवादी को ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है, ‘जो किसी भी सत्ता के समक्ष नहीं झुकता और किसी भी अप्रमाणित सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता।’ प्रारंभ में यह आंदोलन बौद्धिक एवं शैक्षिक था। इसका प्रसिद्ध नारा था : ‘जनता के बीच जाओ’। इसके अनुयायी गाँवों और नगरों में जाकर किसानों तथा श्रमिकों को सामाजिक और राजनीतिक चेतना देने का प्रयास करते थे।
किंतु जब सरकार ने इन गतिविधियों का कठोर दमन किया, तब आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा। अनेक नास्तिवादी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि निरंकुश शासन को केवल हिंसात्मक उपायों से ही समाप्त किया जा सकता है। परिणामस्वरूप गुप्त संगठन बने, षड्यंत्र रचे गए और उच्च सरकारी अधिकारियों की हत्या के प्रयास आरंभ हुए। आगे चलकर यही उग्र प्रवृत्तियाँ ‘नरोदनाया वोल्या’ जैसे आतंकवादी संगठनों के उदय का आधार बनीं।
जार पर लगातार आक्रमण और मृत्यु
सरकारी दमन और क्रांतिकारी हिंसा के इस संघर्ष ने रूस को अस्थिर बना दिया। अप्रैल 1879 ई. में सोलोवीयोव नामक एक शिक्षक ने अलेक्जेंडर द्वितीय पर पाँच गोलियाँ चलाईं, किंतु वह बच गया। उसी वर्ष दिसंबर में जार की विशेष रेलगाड़ी को विस्फोट से उड़ाने का प्रयास किया गया, परंतु संयोगवश वह दूसरी रेलगाड़ी से यात्रा कर रहा था। फरवरी 1880 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग स्थित शीत महल में डायनामाइट विस्फोट किया गया, फिर भी जार सुरक्षित बच निकला।
इन घटनाओं के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने काउंट लोरिस-मेलिकोव को व्यापक अधिकार देकर प्रशासनिक सुधारों की नई योजना तैयार करने का दायित्व सौंपा। अनेक राजनीतिक बंदियों को मुक्त किया गया तथा सीमित राजनीतिक भागीदारी की दिशा में भी विचार किया गया। उद्देश्य था कि जनता को शासन में कुछ स्थान देकर क्रांतिकारी असंतोष को कम किया जाए।
अंततः 13 मार्च 1881 ई. को अलेक्जेंडर द्वितीय ने नए सुधारों की दिशा में महत्त्वपूर्ण राजाज्ञा पर हस्ताक्षर किए। किंतु उसी दिन सेंट पीटर्सबर्ग में नरोदनाया वोल्या के क्रांतिकारियों द्वारा किए गए बम विस्फोट में उसकी मृत्यु हो गई। विडंबना यह थी कि जिस शासक ने रूस में सबसे व्यापक सुधारों का आरंभ किया और “मुक्तिदाता जार” के रूप में प्रसिद्ध हुआ, उसी का जीवन राजनीतिक आतंकवाद का शिकार बनकर समाप्त हुआ। उसकी मृत्यु के साथ रूस में उदार सुधारों का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ और उसके उत्तराधिकारी अलेक्जेंडर तृतीय ने पुनः कठोर निरंकुश एवं प्रतिक्रियावादी शासन की नीति अपनाई।
अलेक्जेंडर तृतीय (1881–1894 ई.)
अलेक्जेंडर द्वितीय की 13 मार्च 1881 ई. को क्रांतिकारियों द्वारा बम विस्फोट में हत्या के साथ ही रूस में उदार सुधारों का युग समाप्त हो गया। इसके बाद सिंहासन पर उसका पुत्र अलेक्जेंडर तृतीय (1881–1894 ई.) बैठा, जिसने अपने पिता की सुधारवादी नीति का परित्याग कर निरंकुश शासन, रूढ़िवादिता और राष्ट्रवाद पर आधारित प्रतिक्रियावादी नीति अपनाई। उसके शासनकाल तथा उसके उत्तराधिकारी निकोलस द्वितीय के समय रूस का आंतरिक इतिहास मुख्यतः जारवादी शासन और उदारवादी तथा क्रांतिकारी शक्तियों के बीच संघर्ष का इतिहास बन गया। एक ओर क्रांतिकारी संगठन बम विस्फोटों और राजनीतिक हत्याओं का सहारा लेते रहे, तो दूसरी ओर सरकार ने कठोर दमन, मृत्युदंड, साइबेरिया निर्वासन और गुप्त पुलिस के माध्यम से उनका मुकाबला किया। यह संघर्ष अंततः 1917 ई. की रूसी क्रांति में जारशाही के पतन के साथ समाप्त हुआ।
राजनीतिक विचार
अलेक्जेंडर तृतीय सिंहासन पर बैठते समय लगभग 36 वर्ष का था। वह बलिष्ठ, प्रभावशाली और सैनिक अनुशासन से युक्त व्यक्ति था। उसे मुख्यतः सैन्य शिक्षा प्राप्त हुई थी, इसलिए उसका दृष्टिकोण कठोर और अनुशासनप्रिय था। अपने पिता के विपरीत उसमें उदारता और सहानुभूति की भावना कम थी। वह पश्चिमी उदारवाद, लोकतंत्र और संसदीय शासन का कट्टर विरोधी था तथा दैवी अधिकार पर आधारित निरंकुश राजसत्ता में अटूट विश्वास रखता था।
उसका विचार था कि रूस की शक्ति पश्चिमी यूरोप की राजनीतिक संस्थाओं को अपनाने में नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक व्यवस्था—रूढ़िवादी धर्म, निरंकुश शासन और रूसी राष्ट्रवाद को सुदृढ़ करने में निहित है। उसके शासन की वैचारिक आधारशिला प्रसिद्ध रूढ़िवादी विचारक कोन्स्टान्टिन पोब्येदोनोस्त्सेव ने तैयार की। वह पवित्र सिनॉड का ओबर-प्रोक्यूरेटर था और पश्चिमी लोकतंत्र, संसदीय व्यवस्था तथा औद्योगिक समाज का आलोचक था। उसका प्रसिद्ध आदर्श था—‘एक जार, एक चर्च और एक रूस।’ उसके अनुसार यही सिद्धांत रूस को अराजकता और पश्चिमी विचारों के प्रभाव से बचा सकता था।
प्रतिक्रियावादी शासन और दमन
सिंहासन ग्रहण करने के बाद अलेक्जेंडर तृतीय ने सबसे पहले क्रांतिकारी संगठनों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया। उसके पिता की हत्या में शामिल अनेक व्यक्तियों को मृत्युदंड दिया गया तथा अनेक अन्य क्रांतिकारियों को साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया। गुप्त पुलिस को अत्यधिक शक्तियाँ प्रदान की गईं और संदिग्ध व्यक्तियों पर निरंतर निगरानी रखी जाने लगी।
सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगाए। समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की सेंसरशिप को पुनः सख्त बना दिया गया। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों और प्राध्यापकों की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी गई तथा स्वतंत्र विचारों के प्रचार पर रोक लगा दी गई। स्थानीय स्वशासन संस्थाओं अर्थात् जेम्स्त्वो के अधिकार भी सीमित कर दिए गए, जिससे स्थानीय प्रशासन पर पुनः केंद्रीय सरकार का नियंत्रण बढ़ गया। इस प्रकार अलेक्जेंडर तृतीय ने रूस में निरंकुश शासन को पहले से अधिक सुदृढ़ बना दिया।
रूसीकरण की नीति
अलेक्जेंडर तृतीय की सबसे महत्त्वपूर्ण नीति रूसीकरण थी। उसका उद्देश्य विशाल रूसी साम्राज्य की विविध जातियों और संस्कृतियों को एक समान राजनीतिक एवं सांस्कृतिक ढाँचे में ढालना था। वह चाहता था कि पूरे साम्राज्य में एक भाषा, एक धर्म और एक प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो।
इस नीति के अंतर्गत पोलैंड, फिनलैंड, बाल्टिक प्रदेशों तथा अन्य गैर-रूसी क्षेत्रों के विशेषाधिकार समाप्त किए गए। प्रशासन, न्यायालयों और विद्यालयों में रूसी भाषा को अनिवार्य बनाया गया। स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को हतोत्साहित किया गया। पोलिश, फिन और बाल्टिक जर्मनों को सरकारी सेवाओं में सीमित अवसर दिए गए तथा उनके राजनीतिक अधिकारों में कटौती की गई। दक्षिणी रूस के प्रोटेस्टेंट स्तुंडिस्टों सहित अनेक धार्मिक समूहों पर भी कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। इस प्रकार रूसीकरण की नीति का उद्देश्य साम्राज्य को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से पूर्णतः रूसी स्वरूप प्रदान करना था।
यहूदियों का उत्पीड़न
अलेक्जेंडर तृतीय के शासनकाल में यहूदियों को सबसे अधिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। सरकार ने उन्हें साम्राज्य के सीमित क्षेत्रों में रहने के लिए बाध्य किया तथा अनेक नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बसने पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्हें स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में भाग लेने, कृषि भूमि खरीदने और स्वतंत्र रूप से संपत्ति रखने के अधिकारों से भी वंचित किया गया। उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए कठोर सीमाएँ निर्धारित की गईं।
इसी काल में यहूदियों के विरुद्ध हिंसक सामूहिक आक्रमण, जिन्हें ‘पोग्रोम्स’ कहा जाता है, व्यापक रूप से हुए। इन घटनाओं में उनकी संपत्ति लूटी गई, घरों को नष्ट किया गया और अनेक लोगों की हत्या की गई। यद्यपि सरकार प्रत्यक्ष रूप से इन हमलों में शामिल नहीं थी, फिर भी उसने अधिकांश मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं की। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में यहूदियों ने रूस छोड़कर विशेषतः संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोप की ओर प्रवास करना प्रारंभ किया।
औद्योगिक क्रांति और आर्थिक विकास
यद्यपि अलेक्जेंडर तृतीय का शासन राजनीतिक दृष्टि से प्रतिक्रियावादी था, फिर भी आर्थिक क्षेत्र में यह रूस के तीव्र औद्योगिक विकास का प्रारंभिक चरण सिद्ध हुआ। इस परिवर्तन का श्रेय मुख्यतः उसके प्रतिभाशाली वित्तमंत्री सर्गेई विट्टे को दिया जाता है, जो दूरदर्शी, व्यावहारिक और आधुनिक आर्थिक विकास का समर्थक था।
उसने विदेशी पूँजी निवेश को प्रोत्साहित किया, जिससे फ्रांस, बेल्जियम और अन्य यूरोपीय देशों के निवेशकों ने रूस के विशाल प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में रुचि दिखाई। कृषि-दास प्रथा के उन्मूलन के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध थे, जिससे उद्योगों के विकास को गति मिली। विट्टे ने लौह एवं इस्पात उद्योग, कोयला खनन, तेल उत्पादन तथा भारी उद्योगों के विकास को विशेष प्रोत्साहन दिया। साथ ही उसने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए उच्च आयात-शुल्क लागू किए, जिससे रूसी उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रह सके।
रेलवे का विस्तार और ट्रांस-साइबेरियन परियोजना
अलेक्जेंडर तृतीय के शासनकाल की सबसे उल्लेखनीय आर्थिक उपलब्धियों में रेलवे नेटवर्क का तीव्र विस्तार था। विट्टे के कार्यभार संभालने से पहले रूस में प्रतिवर्ष लगभग 400 मील रेलवे का निर्माण होता था, किंतु उसके प्रयासों से यह बढ़कर लगभग 1,400 मील प्रतिवर्ष हो गया। रेलवे के विकास ने विशाल रूसी साम्राज्य के विभिन्न भागों को जोड़ने, व्यापार को बढ़ाने और औद्योगिक उत्पादन को बाजार तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण परियोजना ट्रांस-साइबेरियन रेलवे थी, जिसने यूरोपीय रूस को साइबेरिया होते हुए प्रशांत महासागर के तट तक जोड़ने की आधारशिला रखी। इस विशाल परियोजना के लिए रूस ने विशेष रूप से फ्रांस से भारी ऋण प्राप्त किया। आगे चलकर यही रेलवे रूस के आर्थिक, सामरिक और प्रशासनिक विकास का आधार बनी।
फ्रांस-रूस मैत्री संधि (1894 ई.)
अलेक्जेंडर तृतीय व्यक्तिगत रूप से गणतंत्रवाद का विरोधी था, किंतु उसने विदेश नीति में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। जर्मनी, ऑस्ट्रिया और इटली के त्रिगुट के गठन के बाद रूस ने फ्रांस के साथ निकटता बढ़ाई। फ्रांस ने रूस के औद्योगिक विकास के लिए उदारतापूर्वक ऋण उपलब्ध कराए, जिससे दोनों देशों के संबंध मजबूत हुए। अंततः 1894 ई. में फ्रांस-रूस मैत्री संधि संपन्न हुई। यह संधि यूरोप की शक्ति-संतुलन की राजनीति में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई और आगे चलकर प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व बने दो प्रमुख गुटों के निर्माण की आधारशिला बनी।
इस प्रकार अलेक्जेंडर तृतीय का शासन विरोधाभासों से परिपूर्ण था। राजनीतिक क्षेत्र में उसने निरंकुशता, दमन और रूसीकरण की नीति अपनाकर उदार सुधारों को लगभग समाप्त कर दिया तथा क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने का प्रयास किया। किंतु आर्थिक क्षेत्र में उसके शासनकाल में रूस ने औद्योगिकीकरण, रेलवे विस्तार, विदेशी निवेश और आधुनिक आर्थिक विकास की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की। इस प्रकार उसका शासन राजनीतिक दृष्टि से प्रतिक्रियावादी, किंतु आर्थिक दृष्टि से आधुनिक रूस के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ। यद्यपि उसके दमनकारी उपायों ने जनता के असंतोष को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक गहरा कर दिया।
निकोलस द्वितीय (1894–1917 ई.)
1894 ई. में अलेक्जेंडर तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसका 26 वर्षीय पुत्र निकोलस द्वितीय रूस का जार बना। उसका शासनकाल रूसी इतिहास का अंतिम जारवादी शासन सिद्ध हुआ। उसने अपने पिता की कठोर प्रतिक्रियावादी और निरंकुश नीतियों को और अधिक दृढ़ता से अपनाया। निकोलस द्वितीय दैवी अधिकार के सिद्धांत में विश्वास करता था और किसी भी प्रकार की संवैधानिक अथवा लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था। उसका व्यक्तित्व दुर्बल, अनिर्णायक तथा दूसरों के प्रभाव में आने वाला था। उसकी पत्नी जारिना एलेक्ज़ेंड्रा तथा रहस्यवादी साधु रासपुटिन का उस पर अत्यधिक प्रभाव था, जिससे शासन की प्रतिष्ठा और अधिक कमजोर हुई। वह प्रतिक्रियावादी विचारक कॉन्स्टान्टिन पोब्येदोनोस्त्सेव तथा गृह मंत्री वॉन प्लेहवे जैसे कट्टर निरंकुशतावादियों के परामर्श पर शासन करता था।
निकोलस द्वितीय के शासन में प्रशासन अत्यंत दमनकारी बन गया। प्रेस की स्वतंत्रता पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया, उदारवादी विचारों का दमन किया गया तथा गुप्त पुलिस के माध्यम से विरोधियों पर निरंतर निगरानी रखी गई। बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों और सुधारवादियों को गिरफ्तार कर कारावास अथवा साइबेरिया निर्वासन का दंड दिया जाता था। यहूदियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण कानूनों को कठोरता से लागू किया गया और उसके विरुद्ध होने वाले पोग्रोम (संगठित हिंसक आक्रमण) बढ़ गए। 1899 ई. में फिनलैंड के संविधान को निरस्त कर वहाँ भी रूसीकरण की नीति लागू की गई।
यद्यपि सरकार ने दमन के माध्यम से व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया, फिर भी समाज में असंतोष निरंतर बढ़ता गया। शिक्षित वर्ग, मध्यमवर्ग, श्रमिक और कृषक सभी राजनीतिक अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता तथा उत्तरदायी शासन की माँग करने लगे। रूस की स्थानीय स्वशासन संस्थाओं जेम्स्त्वो ने भी अधिक अधिकारों और संवैधानिक सुधारों की माँग उठाई। वित्त मंत्री सेर्गेई विट्टे ने कृषक समितियों के माध्यम से सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया, किंतु उसके सुझावों को स्वीकार करने के बजाय उसे पद से हटा दिया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि जारशाही किसी भी प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थी।
इस प्रकार निकोलस द्वितीय का शासन निरंकुशता, दमन और राजनीतिक जड़ता का प्रतीक बन गया। जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की उपेक्षा तथा प्रशासन की कठोर नीतियों ने असंतोष को निरंतर बढ़ाया। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1905 की क्रांति और अंततः 1917 की रूसी क्रांति का आधार बनीं, जिसने रोमानोव वंश और जारशाही का अंत कर दिया।
रूस-जापान युद्ध (1904 ई.)
रूस-जापान युद्ध की पृष्ठभूमि रूस की आंतरिक तथा बाह्य परिस्थितियों से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी। आंतरिक मामलों के मंत्री वॉन प्लेहवे के समर्थन में किशिनेव में एक भीषण पोग्रोम आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में यहूदियों की नृशंस हत्या की गई। इसी समय फिनलैंड और आर्मेनिया में रूसीकरण की नीति का कठोर एवं दमनकारी ढंग से क्रियान्वयन किया जा रहा था। इन घटनाओं के कारण रूस में असंतोष और क्रांतिकारी भावना निरंतर प्रबल होती जा रही थी। प्लेहवे का विचार था कि यदि किसी छोटे विदेशी युद्ध में विजय प्राप्त कर ली जाए, तो जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं और बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से हटाया जा सकता है। इसी उद्देश्य से उसने युद्ध की नीति का समर्थन किया।
रूस की साम्राज्यवादी नीति
1860 ई. की पीकिंग संधि के पश्चात लगभग तीन दशकों तक रूस अपनी प्रशांत महासागर तक विस्तृत सीमाओं की सुरक्षा से संतुष्ट रहा। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में चीन की राजनीतिक दुर्बलता और उसके विघटन की प्रक्रिया ने रूस की साम्राज्यवादी तथा विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को नया प्रोत्साहन दिया। यद्यपि रूस की सैन्य स्थिति विशेष रूप से सुदूर पूर्व में अभी सुदृढ़ नहीं थी, फिर भी उसके प्रभावशाली मंत्री सेर्गेई विट्टे युद्ध से बचने के पक्षधर थे। उसका मत था कि रूस को आर्थिक और प्रशासनिक विकास पर ध्यान देना चाहिए, न कि अनावश्यक युद्ध में उलझना चाहिए।
मंचूरिया का महत्त्व
मंचूरिया सुदूर पूर्व का अत्यंत समृद्ध प्रदेश था। उसे उचित ही इस क्षेत्र का धान्यागार कहा जाता था। कृषि उत्पादन के अतिरिक्त वहाँ विशाल वन-संपदा तथा बहुमूल्य खनिज संसाधन उपलब्ध थे। यही कारण था कि यह क्षेत्र रूस और जापान दोनों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण बन गया। सुदूर पूर्व में दोनों साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थीं। रूस उत्तर से और जापान पूर्व एवं दक्षिण से अपने प्रभुत्व को बढ़ा रहे थे। फलतः दोनों के हित एक-दूसरे से टकराने लगे और संघर्ष की स्थिति लगभग अनिवार्य हो गई।
चीन-जापान युद्ध के बाद उत्पन्न विवाद
1894–95 ई. के चीन-जापान युद्ध में जापान की विजय के उपरांत उसे शिमोनोसेकी की संधि द्वारा अनेक क्षेत्रीय लाभ प्राप्त हुए थे। किंतु रूस ने स्वयं को चीन का संरक्षक घोषित करते हुए जापान को उसकी विजय के पूर्ण लाभों से वंचित कर दिया। इसके बाद रूस ने चीन से लियाओतुंग प्रायद्वीप तथा पोर्ट आर्थर बंदरगाह पट्टे पर प्राप्त कर लिया। उल्लेखनीय है कि यही क्षेत्र शिमोनोसेकी की संधि के अंतर्गत जापान को प्राप्त हुआ था। इस घटना से जापान में रूस के प्रति गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।
रूस ने इसके अतिरिक्त उत्तरी मंचूरिया से व्लादिवोस्तोक तक रेलवे निर्माण का अधिकार भी प्राप्त कर लिया। इस रेलमार्ग ने मंचूरिया में रूस की सामरिक और आर्थिक स्थिति को अत्यंत सुदृढ़ बना दिया। परिणामस्वरूप कोरिया में जापान के हितों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया।
कोरिया में रूस का हस्तक्षेप
रूस ने धीरे-धीरे कोरिया के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया। उसने यालू नदी क्षेत्र के बहुमूल्य वनों के दोहन का अधिकार भी प्राप्त कर लिया। रूस की इन गतिविधियों से जापान अत्यंत चिंतित और व्यग्र हो उठा। जापानी नेतृत्व का विश्वास था कि रूस योजनाबद्ध ढंग से कोरिया में उसके प्रभाव को समाप्त करना चाहता है। वस्तुतः जापान ने चीन के विरुद्ध युद्ध भी मुख्यतः कोरिया में अपने हितों की रक्षा के लिए ही लड़ा था।
जापान की दृष्टि में उसकी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक था कि मंचूरिया पर रूस का स्थायी प्रभुत्व स्थापित न हो। इसके विपरीत रूस का मुख्य उद्देश्य मंचूरिया को अपने प्रभाव-क्षेत्र में परिवर्तित करना था। उसने पोर्ट आर्थर जैसे वर्षभर खुले रहने वाले बर्फ़-मुक्त बंदरगाह पर अधिकार स्थापित कर लिया था, जिसकी उसे लंबे समय से आवश्यकता थी। साथ ही वह सुदूर पूर्व में अपना सबसे शक्तिशाली नौसैनिक अड्डा स्थापित करना चाहता था।
बॉक्सर विद्रोह और रूस की नीति
1900 ई. के बॉक्सर विद्रोह ने रूस को मंचूरिया में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर प्रदान किया। उसने रेलमार्गों की सुरक्षा तथा अपने नागरिकों की रक्षा के नाम पर बड़ी संख्या में सैनिक मंचूरिया भेज दिए। विद्रोह समाप्त हो जाने के बाद भी रूस ने अपनी सेना वापस नहीं बुलाई। जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरोध के बावजूद उसने वहाँ अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखी।
रूस वास्तव में मंचूरिया खाली करने का इच्छुक नहीं था। उसने यह भी घोषित किया कि मंचूरिया का प्रश्न केवल रूस और चीन का आंतरिक विषय है तथा जापान को उसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। साथ ही उसने चीन के साथ ऐसा समझौता करने का प्रयास किया जिससे मंचूरिया स्थायी रूप से रूस का सुरक्षित प्रभाव-क्षेत्र बन जाए। किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और जापान के कड़े विरोध के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका।
कूटनीतिक प्रयासों की विफलता
मंचूरिया में रूस के हितों तथा कोरिया में जापान की स्थिति को स्पष्ट करने के उद्देश्य से जापान ने रूस के समक्ष समझौते का प्रस्ताव रखा। उसने सुझाव दिया कि यदि रूस कोरिया में जापान के विशेष हितों को स्वीकार कर ले, तो जापान मंचूरिया में रूस के विशेष अधिकारों को मान्यता देने के लिए तैयार है। किंतु रूस का दृष्टिकोण पूर्णतः आक्रामक और अड़ियल था। उसने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मंचूरिया में जापान के किसी भी प्रकार के अधिकार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
रूस के इस व्यवहार से जापान को विश्वास हो गया कि मंचूरिया से रूस को हटाने का एकमात्र उपाय युद्ध ही है। इसलिए उसने संभावित संघर्ष की तैयारी आरंभ कर दी। जापान ने अपनी नौसेना को अधिक शक्तिशाली बनाया तथा इंग्लैंड के साथ मैत्री स्थापित करने के प्रयास तेज कर दिए।
इंग्लैंड-जापान मैत्री संधि
रूस के दक्षिण की ओर बढ़ते प्रभाव से इंग्लैंड भी अत्यधिक चिंतित था। उसे आशंका थी कि यदि रूस का प्रभाव पीकिंग और चीन के अन्य भागों तक फैल गया, तो ब्रिटिश हितों को गंभीर क्षति पहुँचेगी। दूसरी ओर, जापान को यह भी भय था कि फ्रांस, जो रूस का सहयोगी था, भविष्य में रूस का समर्थन कर सकता है। इन परिस्थितियों में इंग्लैंड और जापान के हित समान हो गए। परिणामस्वरूप 1902 ई. में इंग्लैंड-जापान मैत्री संधि संपन्न हुई। इस संधि ने जापान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुदृढ़ किया और रूस के लिए स्पष्ट चुनौती प्रस्तुत की।
मंचूरिया खाली करने का प्रश्न
इंग्लैंड-जापान संधि के बाद रूस ने संभावित संकट को देखते हुए मंचूरिया संबंधी अपनी नीति में कुछ परिवर्तन करने का संकेत दिया। उसने चीन के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए छह-छह माह के अंतराल में तीन चरणों में मंचूरिया खाली करने की सहमति व्यक्त की। किंतु इसके साथ उसने अनेक ऐसी शर्तें जोड़ दीं, जिनसे उसकी वास्तविक मंशा स्पष्ट हो गई।
रूस ने मंचूरिया खाली करने के प्रथम चरण में केवल सैनिकों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित किया। उसने सेना को यालू नदी के किनारे लकड़ी काटने के बहाने भेज दिया। यद्यपि लकड़ी काटने के अनुमति-पत्र की अवधि समाप्त हो चुकी थी, फिर भी रूस उसे पुनः वैध कराने पर बल देता रहा। इससे स्पष्ट था कि वह किसी भी प्रकार मंचूरिया से अपना प्रभाव समाप्त नहीं करना चाहता था।
युद्ध का आरंभ
जापान ने कोरिया की सीमा पर रूस की गतिविधियों का विरोध किया और यह आरोप लगाया कि रूस मंचूरिया से अपनी सेना हटाने के वचन का पालन नहीं कर रहा है। उसने पुनः समझौते का प्रस्ताव रखा कि यदि रूस कोरिया में जापान की विशेष स्थिति को स्वीकार कर ले, तो वह मंचूरिया में रूस के विशेष हितों को मान्यता देने के लिए तैयार है। किंतु रूस ने इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद जापान ने रूस के साथ अपने समस्त कूटनीतिक संबंध समाप्त कर दिए और फरवरी 1904 ई. में युद्ध आरंभ हो गया।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि मंचूरिया का प्रश्न ही रूस-जापान युद्ध का मुख्य कारण था। रूस ने मंचूरिया पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था और वहाँ से वह कोरिया में जापान के हितों के लिए निरंतर खतरा बना हुआ था। कोरिया के आंतरिक मामलों में रूस के बढ़ते हस्तक्षेप तथा चीन में उसकी आक्रामक गतिविधियों के संबंध में कोई संतोषजनक आश्वासन न मिलने के कारण जापान ने सशस्त्र संघर्ष का निश्चय कर लिया। जब रूस ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी और समझौते के स्थान पर टालमटोल तथा छल-कपट की नीति अपनाई, तब जापान ने उससे कूटनीतिक संबंध समाप्त कर फरवरी 1904 ई. में युद्ध प्रारंभ कर दिया।
रूस-जापान युद्ध
रूस-जापान युद्ध (1904–1905 ई.) एशिया की एक उभरती हुई शक्ति और यूरोप की एक महान् साम्राज्यवादी शक्ति के मध्य पहला महत्त्वपूर्ण सशस्त्र संघर्ष था। क्षेत्रफल, जनसंख्या, संसाधनों तथा सैन्य क्षमता की दृष्टि से रूस जापान की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और शक्तिशाली था। इसलिए समकालीन पर्यवेक्षकों ने इस युद्ध की तुलना एक दानव और एक बौने के संघर्ष से की। किंतु युद्ध के परिणाम ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया। अनुशासित, प्रशिक्षित और आधुनिक संगठन से युक्त जापानी सेना ने अपनी उत्कृष्ट सामरिक क्षमता, प्रभावी नेतृत्व तथा सैनिकों के अदम्य साहस और शौर्य के बल पर रूस को पराजित कर दिया।
युद्ध के आरंभ में जापान ने अपनी नौसैनिक शक्ति का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। एडमिरल टोगो हेइहाचिरो के नेतृत्व में जापानी नौसेना ने पोर्ट आर्थर बंदरगाह में स्थित रूसी नौसैनिक बेड़े को प्रभावी रूप से अवरुद्ध कर दिया। इसके परिणामस्वरूप समुद्र पर जापान का लगभग पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया। समुद्री प्रभुत्व प्राप्त होने से जापान अपनी सेना, हथियारों और रसद को बिना किसी बाधा के युद्धक्षेत्र तक पहुँचाने में सफल रहा, जबकि रूस की समुद्री गतिविधियाँ गंभीर रूप से सीमित हो गईं।
रूसी नौसैनिक बेड़े ने पोर्ट आर्थर से बाहर निकलकर जापानी नाकाबंदी तोड़ने का प्रयास किया, किंतु उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद व्लादिवोस्तोक से भेजे गए रूसी नौसैनिक बेड़े ने भी जापान की समुद्री शक्ति को चुनौती देने का प्रयास किया, परंतु वह भी असफल रहा। इसी अवधि में जापान ने पोर्ट आर्थर की घेराबंदी के लिए अपनी नियमित सेना नियुक्त कर दी, जिससे रूसी सेना पर निरंतर दबाव बना रहा।
समुद्र में सफलता प्राप्त करने के बाद जापान ने स्थल युद्ध में भी उल्लेखनीय विजय हासिल की। जापान की मुख्य सेना ने यालू नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित लियाओयांग तथा शा-हो के युद्धों में रूसी सेना को पराजित किया। इन विजयों ने मंचूरिया में रूस की सैन्य स्थिति को अत्यंत कमजोर कर दिया और जापान को रणनीतिक बढ़त प्रदान की।
उधर पोर्ट आर्थर पर भी लगातार भीषण बमबारी और घेराबंदी जारी रही। लगभग दस माह तक चले कठोर संघर्ष के पश्चात् वहाँ तैनात रूसी सैनिकों ने अंततः आत्मसमर्पण कर दिया। इस विजय के बाद घेराबंदी में लगी जापानी सेना मुख्य मोर्चे पर पहुँचकर मंचूरिया की राजधानी मुकदेन में युद्धरत अपनी सेना से जा मिली।
मुकदेन का युद्ध इस पूरे संघर्ष का सबसे विशाल और निर्णायक स्थल युद्ध सिद्ध हुआ। लगभग 140 मील चौड़े युद्धक्षेत्र में दोनों पक्षों के लगभग तीन लाख सैनिक आमने-सामने थे। भीषण युद्ध में प्रत्येक पक्ष के लगभग 60,000 सैनिक मारे गए अथवा घायल हुए। अंततः रूसी सेना को पराजय स्वीकार करनी पड़ी और उसे मुकदेन छोड़कर उत्तर की ओर पीछे हटना पड़ा। इस विजय ने मंचूरिया में जापान की सैन्य श्रेष्ठता को स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया।
त्सुशीमा का नौसैनिक युद्ध और पोर्ट्समाउथ की संधि
मुकदेन की विजय के बाद भी जापानी सेना अत्यधिक थक चुकी थी। दूसरी ओर रूस अपनी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने और युद्ध की दिशा बदलने के उद्देश्य से बाल्टिक सागर में स्थित अपने विशाल नौसैनिक बेड़े को सुदूर पूर्व भेजने का निर्णय लिया। हजारों किलोमीटर की लंबी समुद्री यात्रा के बाद जब यह बेड़ा व्लादिवोस्तोक की ओर बढ़ते हुए कोरिया और जापान के मध्य स्थित त्सुशीमा जलडमरूमध्य में पहुँचा, तब एडमिरल टोगो के नेतृत्व में जापानी नौसेना ने उस पर निर्णायक आक्रमण किया।
त्सुशीमा के युद्ध में जापानी नौसेना ने रूसी बेड़े को लगभग पूर्णतः नष्ट कर दिया। इसे आधुनिक नौसैनिक इतिहास की सबसे महान विजयों में से एक माना जाता है और ट्राफलगर के युद्ध के बाद यह सबसे महत्त्वपूर्ण नौसैनिक सफलता थी। इस विजय के साथ प्रशांत महासागर में जापान का प्रभुत्व सुनिश्चित हो गया तथा रूस की युद्ध जारी रखने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
लगातार संघर्ष से दोनों देश आर्थिक और सैन्य दृष्टि से थक चुके थे तथा शांति स्थापित करना चाहते थे। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट की मध्यस्थता से 1905 में पोर्ट्समाउथ की संधि संपन्न हुई। इस संधि के अंतर्गत रूस ने कोरिया में जापान के विशेष अधिकारों को स्वीकार किया, लियाओतुंग प्रायद्वीप का पट्टा जापान को सौंप दिया, सखालिन द्वीप का दक्षिणी भाग जापान को प्रदान किया तथा मंचूरिया खाली करने पर सहमति व्यक्त की।
रूस-जापान युद्ध के परिणाम
जापान और चीन पर प्रभाव
रूस-जापान युद्ध में जापान की विजय ने सुदूर पूर्व की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इस युद्ध ने यूरोपीय शक्तियों की अजेयता की धारणा को समाप्त कर दिया और आधुनिक इतिहास में पहली बार किसी एशियाई राष्ट्र ने एक शक्तिशाली यूरोपीय साम्राज्य को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय से जापान की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और वह विश्व की प्रमुख शक्तियों में सम्मिलित हो गया। साथ ही, इस सफलता ने जापान में राष्ट्रीय गौरव की भावना को प्रबल किया तथा उसे चीन में अपने साम्राज्यवादी विस्तार के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् जापान की प्रसिद्ध इक्कीस सूत्रीय माँगों में यही विस्तारवादी नीति स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
इस युद्ध का चीन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। चीनी जनता ने अनुभव किया कि विदेशी शक्तियों का प्रभावी प्रतिरोध केवल आधुनिक सैन्य संगठन, वैज्ञानिक शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से ही संभव है। जापान की सफलता ने चीन में पाश्चात्य ज्ञान, विज्ञान और आधुनिक संस्थाओं के प्रति व्यापक उत्साह उत्पन्न किया। बड़ी संख्या में चीनी युवक जापान, अमेरिका और यूरोप जाकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। जापानी प्रशिक्षकों के निर्देशन में चीन की सेना का पुनर्गठन किया गया तथा उसे यूरोपीय सैन्य पद्धतियों के अनुसार प्रशिक्षित किया गया। इसी काल में अफीम-सेवन के विरुद्ध देशव्यापी अभियान भी चलाया गया। इन सुधारवादी प्रयासों और राष्ट्रीय जागरण ने अंततः चीन में क्रांतिकारी आंदोलन को बल प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप मंचू वंश का शासन समाप्त हुआ और गणतांत्रिक शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यूरोपीय राजनीति और रूस पर प्रभाव
रूस-जापान युद्ध के परिणामों का प्रभाव केवल एशिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यूरोपीय तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। रूस की सैन्य दुर्बलता उजागर होने के कारण 1907 ई. के इंग्लैंड-रूस समझौते का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस समझौते के माध्यम से मध्य एशिया में दोनों देशों के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव, प्रतिस्पर्धा और वैमनस्य काफी हद तक समाप्त हो गया।
रूस की कमजोरी का लाभ उठाते हुए ऑस्ट्रिया ने बोस्निया और हर्जेगोविना का विलय कर लिया, जिससे रूस को पुनः बाल्कन क्षेत्र और पूर्वी प्रश्न पर अपना ध्यान केंद्रित करना पड़ा। दूसरी ओर, इस युद्ध ने रूस के भीतर भी गहरा राजनीतिक प्रभाव छोड़ा। रोमानोव वंश की प्रतिष्ठा और जारशाही की विश्वसनीयता को गंभीर आघात पहुँचा। जनता का शासन के प्रति असंतोष बढ़ गया और पहले से विद्यमान क्रांतिकारी भावना अधिक उग्र तथा संगठित हो गई। इस प्रकार रूस-जापान युद्ध ने न केवल रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को कमजोर किया, बल्कि उसके आंतरिक राजनीतिक संकट को भी तीव्र कर दिया।
1905 ई. का क्रांतिकारी आंदोलन
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक रूस की जनता निरंकुश शासन, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों तथा राजनीतिक दमन से अत्यंत असंतुष्ट हो चुकी थी। जन-असंतोष लगातार बढ़ रहा था और केवल किसी उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। 1904–1905 ई. के रूस-जापान युद्ध ने जनता को अपने आक्रोश को खुलकर व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया। युद्ध का संचालन अत्यंत अकुशल सिद्ध हुआ और प्रशासन की अयोग्यता तथा अधिकारियों के भ्रष्टाचार से संबंधित समाचारों ने जनभावनाओं को और अधिक उद्वेलित कर दिया। रूस की लगातार सैन्य पराजयों ने जनता के मन में जारवादी शासन के प्रति विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय असंतोष व्यापक विरोध में परिवर्तित हो गया।
निरंकुश शासन के विरुद्ध जनाक्रोश इतना तीव्र था कि आंतरिक मामलों के मंत्री प्लेहवे तथा उसके प्रमुख सहयोगियों की हत्या कर दी गई। इसी समय जेम्स्त्वो संस्थाओं ने उदारवादी राजनीतिक सुधारों की माँग उठाई। नगरों के औद्योगिक श्रमिक भी इस आंदोलन से जुड़ गए और मास्को सहित अनेक औद्योगिक नगरों में व्यापक हड़तालें आरंभ हो गईं। इसके बावजूद जार निकोलस द्वितीय ने अपनी दमनकारी नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया और विरोध को बलपूर्वक दबाने का प्रयास जारी रखा।
रक्तरंजित रविवार
1905 ई.में पादरी फादर गैपोन के नेतृत्व में हजारों श्रमिक अपनी माँगों का ज्ञापन जार को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से शांतिपूर्वक जुलूस निकालकर शीत महल की ओर जा रहे थे। मार्ग में सैनिकों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चला दीं, जिससे सैकड़ों श्रमिक मारे गए और अनेक घायल हो गए। यह घटना रविवार के दिन हुई थी, इसलिए इतिहास में यह ‘रक्तरंजित रविवार’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इस नरसंहार ने पूरे रूस में गहरा आक्रोश उत्पन्न कर दिया। देशभर में भय, असंतोष और अशांति का वातावरण फैल गया। कृषकों ने अनेक स्थानों पर भू-स्वामियों की संपत्तियों पर आक्रमण किए, उसके घरों को लूटा तथा पुलिस अधिकारियों पर हमले आरंभ कर दिए। मास्को में जार निकोलस द्वितीय के चाचा ग्रैंड ड्यूक सर्ज की हत्या कर दी गई। नौसेना में भी विद्रोह की घटनाएँ सामने आईं। इन घटनाओं ने जारवादी शासन की नींव को गंभीर रूप से हिला दिया और स्पष्ट कर दिया कि जन-असंतोष अब व्यापक क्रांतिकारी आंदोलन का रूप ले चुका है।
अक्टूबर घोषणा-पत्र (1905 ई.)
देश में निरंतर बढ़ती अव्यवस्था, हड़तालों और हिंसक घटनाओं से भयभीत होकर जार निकोलस द्वितीय ने विरोधी शक्तियों के साथ समझौते का मार्ग अपनाने का प्रयास किया। उसने यह घोषणा की कि भविष्य के सुधारों के संबंध में राष्ट्रीय विधान सभा अथवा ड्यूमा से परामर्श किया जाएगा। इसी उद्देश्य से ड्यूमा के अधिवेशन का आह्वान किया गया।
जार ने प्रतिक्रियावादी विचारक पोब्येदोनोस्त्सेव तथा अन्य कठोर मंत्रियों को पद से हटा दिया और सर्गेई विट्टे को पुनः शासन में बुलाया। उसके परामर्श पर अक्टूबर 1905 ई.में प्रसिद्ध ‘अक्टूबर घोषणा-पत्र’ जारी किया गया। इस घोषणा-पत्र में नागरिकों को विचार, भाषण और संगठन बनाने की स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया। साथ ही व्यापक मताधिकार के आधार पर ड्यूमा के निर्वाचन तथा उसे विधायी अधिकार प्रदान करने का वचन भी दिया गया। इस घोषणा से तत्कालीन राजनीतिक संकट को कुछ समय के लिए शांत करने का प्रयास किया गया।
प्रथम ड्यूमा की असफलता
मई 1906 ई.में अत्यंत उत्साहपूर्ण वातावरण में प्रथम ड्यूमा का अधिवेशन प्रारंभ हुआ। किंतु रूस में संवैधानिक शासन स्थापित करने का यह प्रथम प्रयास सफल नहीं हो सका। इसका प्रमुख कारण देश तथा ड्यूमा के भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों और उसके उद्देश्यों में एकता का अभाव था। क्रांतिकारी शक्तियाँ अनेक गुटों में विभाजित थीं और संवैधानिक व्यवस्था के स्वरूप पर उसके विचार एक-दूसरे से भिन्न थे।
अक्टूबरवादी अपेक्षाकृत उदार और नरमपंथी थे। वे अक्टूबर घोषणा-पत्र में प्रस्तावित सुधारों को पर्याप्त मानते थे तथा जार के साथ सहयोग पर आधारित संवैधानिक शासन के समर्थक थे। इसके विपरीत संवैधानिक लोकतांत्रिक दल (कैडेट्स) अधिक व्यापक राजनीतिक सुधार, उत्तरदायी मंत्रिमंडल तथा प्रतिनिधि शासन की स्थापना चाहता था। इसके अतिरिक्त समाजवादी दल भी सक्रिय थे। इन दलों के पारस्परिक मतभेदों ने उनकी सामूहिक शक्ति को कमजोर कर दिया, जिसका लाभ सरकार ने उठाया।
सरकार ने संसद का एक दूसरा सदन स्थापित किया, जिसमें अधिकांश सदस्य रूढ़िवादी विचारधारा के थे। साथ ही ‘मूलभूत कानून’ जारी किए गए, जिनके अंतर्गत जार को व्यापक निरंकुश अधिकार तथा सभी विधेयकों पर वीटो का अधिकार प्राप्त था। परिणामस्वरूप ड्यूमा की वास्तविक शक्तियाँ अत्यंत सीमित रह गईं। जब ड्यूमा ने मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, तो उस पर अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर उसे भंग कर दिया गया।
ड्यूमा के भंग होने के बाद कैडेट नेताओं ने फिनलैंड के वाइबोर्ग जाकर प्रसिद्ध ‘वाइबोर्ग घोषणा-पत्र’ प्रकाशित किया। इसमें जनता से करों का भुगतान न करने तथा ऐसी सरकार को सैन्य सेवा देने से इंकार करने का आह्वान किया गया, जिसने अपने वचनों का पालन नहीं किया था। किंतु तब तक क्रांतिकारी आंदोलन की तीव्रता कम हो चुकी थी, इसलिए इस घोषणा का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बाद सरकार ने और अधिक कठोर नीति अपनाई तथा घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले नेताओं और अन्य क्रांतिकारियों को कठोर दंड दिए।
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ ड्यूमा
मार्च 1907 ई.में द्वितीय ड्यूमा का अधिवेशन आरंभ हुआ, किंतु सरकार और ड्यूमा के बीच पूर्ववत् टकराव बना रहा। मंत्रिपरिषद् और प्रतिनिधियों के बीच सहयोग स्थापित नहीं हो सका, जिसके कारण लगभग चार महीने बाद ही इसे भी भंग कर दिया गया।
इसके पश्चात् निर्वाचन कानून में व्यापक परिवर्तन किए गए और मताधिकार को सीमित कर दिया गया। इन परिवर्तनों के आधार पर नवंबर 1907 ई.में तृतीय ड्यूमा का गठन किया गया। इसमें रूढ़िवादी और सरकार समर्थक सदस्यों का स्पष्ट बहुमत था। परिणामस्वरूप यह संस्था स्वतंत्र विधायिका के स्थान पर सरकार की परामर्शदात्री संस्था बनकर रह गई। तृतीय ड्यूमा ने 1912 ई.तक कार्य किया।
इसके बाद गठित चतुर्थ ड्यूमा का राजनीतिक स्वरूप भी लगभग वही रहा। यह पहले की अपेक्षा अधिक आज्ञापरायण थी और सरकार के विरुद्ध प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ रही। यद्यपि ड्यूमा जार की निरंकुश सत्ता को सीमित करने में सफल नहीं हो सकी, फिर भी वह धीरे-धीरे राष्ट्र की राजनीतिक भावनाओं और जनमत की अभिव्यक्ति का मंच बन गई। इसी में भविष्य के लोकतांत्रिक राजनीतिक विकास के बीज निहित थे। यही 1905 ई.की रूसी क्रांति की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।
स्टोलिपिन की नीति और प्रतिक्रिया का पुनरारंभ
1905 ई.की क्रांति अंततः अपने तात्कालिक उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रही और 1907 के बाद रूस में पुनः प्रतिक्रियावाद तथा निरंकुश शासन का प्रभाव बढ़ गया। 1906 ई.में स्टोलिपिन को रूस का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। उसे प्रायः ‘रूस का बिस्मार्क’ कहा जाता था। उसका उद्देश्य एक ओर जार की निरंकुश सत्ता को बनाए रखना था और दूसरी ओर ड्यूमा को सरकार का सहयोगी बनाकर राजनीतिक स्थिरता स्थापित करना था।
स्टोलिपिन ने अराजकता, हिंसा और क्रांतिकारी गतिविधियों का कठोर दमन किया, किंतु साथ ही कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार भी लागू किए। उसने कृषकों को मीर अथवा ग्राम-समुदाय से अलग होकर अपनी जोत की भूमि का व्यक्तिगत स्वामित्व प्राप्त करने की अनुमति दी। श्रमिक संगठनों को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई तथा श्रमिकों के लिए बीमा योजना का भी प्रारंभ किया गया। इन उपायों का उद्देश्य कृषकों और श्रमिकों को सरकार के प्रति अनुकूल बनाना था।
1911 ई.में स्टोलिपिन की हत्या कर दी गई, जिससे सरकार का सबसे प्रभावशाली प्रशासक समाप्त हो गया। इसके बाद रूस में पुनः राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और कुशासन का वातावरण उत्पन्न हो गया।
ग्रिगोरी रासपुतिन का प्रभाव और स्टोलिपिन का अंत
महारानी एलेक्जेंड्रा प्योत्र स्टोलिपिन से अत्यंत नाराज़ थी। उसका मानना था कि स्टोलिपिन ने उन परिस्थितियों को समाप्त कर दिया था, जिन पर उसके पुत्र एलेक्सी के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा निर्भर थी। विशेष रूप से ग्रिगोरी रासपुतिन के प्रभाव को सीमित करने के प्रयासों के कारण एलेक्जेंड्रा का विश्वास स्टोलिपिन से उठ गया था। मार्च 1911 ई. में राजनीतिक मतभेदों और शाही समर्थन में कमी महसूस करते हुए स्टोलिपिन ने अपने पद से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया। इससे पहले भी, जब उसने निकोलस द्वितीय के सामने इस्तीफे की इच्छा व्यक्त की थी, तो ज़ार ने उसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यह विश्वास या अविश्वास का प्रश्न नहीं है, बल्कि उसकी इच्छा और निर्णय का विषय है। निकोलस ने यह भी कहा था कि रूस की परिस्थितियाँ अन्य देशों से अलग हैं और वह उसके इस्तीफे पर विचार नहीं करेगा। किंतु सितंबर 1911 ई. में स्टोलिपिन की हत्या कर दी गई, जिससे रूसी राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण सुधारवादी नेतृत्व का अंत हो गया।
चौथी ड्यूमा और बढ़ता राजनीतिक संकट
1912 ई. में चौथी ड्यूमा के लिए चुनाव हुए। इसके अधिकांश सदस्य तीसरी ड्यूमा की राजनीतिक प्रवृत्तियों से मिलते-जुलते थे। निकोलस द्वितीय ने ब्रिटिश राजनयिक सर बर्नार्ड पेरेस से बातचीत में स्वीकार किया कि प्रारंभिक ड्यूमा बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी, किंतु अब वह अधिक धीमी, स्थिर और व्यवहारिक संस्था बन गई थी।
इसके बावजूद रूस की राजनीतिक स्थिति धीरे-धीरे खराब होती गई। प्रथम विश्व युद्ध ने साम्राज्य की आंतरिक समस्याओं को और गंभीर बना दिया। 1916 ई. के अंत तक रोमानोव राजवंश की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि निकोलस के चाचा ग्रैंड ड्यूक पॉल अलेक्जेंड्रोविच को उससे संवैधानिक सुधार लागू करने और ड्यूमा के प्रति उत्तरदायी सरकार बनाने का आग्रह करने के लिए भेजा गया।
निकोलस द्वितीय ने इस प्रस्ताव को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उसने अपने चाचा को यह कहते हुए फटकार लगाई कि वे उससे उस शपथ को तोड़ने के लिए कह रहे हैं, जो उसने राज्याभिषेक के समय ली थी। उस शपथ के अनुसार उसका कर्तव्य था कि वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए निरंकुश शासन व्यवस्था को बनाए रखे।
ड्यूमा में राजशाही विरोधी चेतावनी
2 दिसंबर 1916 ई. को ड्यूमा में राजशाही समर्थक और राष्ट्रवादी नेता व्लादिमीर पुरिश्केविच ने एक प्रभावशाली भाषण दिया। उसने राजसत्ता के आसपास मौजूद कथित भ्रष्ट प्रभावों और दरबार की कमजोरियों की कड़ी आलोचना की। लगभग दो घंटे तक चले उसके भाषण को सदस्यों का व्यापक समर्थन मिला।
पुरिश्केविच ने चेतावनी दी कि देश में क्रांति का खतरा तेजी से बढ़ रहा है और यदि शासन व्यवस्था में सुधार नहीं किए गए, तो रूस गंभीर संकट में फँस सकता है। उसका भाषण उस समय रूसी साम्राज्य में बढ़ते असंतोष और राजशाही के प्रति घटते विश्वास को दर्शाता था।
उत्तराधिकार का संकट और एलेक्सी का जन्म
निकोलस द्वितीय और महारानी एलेक्जेंड्रा के पारिवारिक जीवन में उत्तराधिकार का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण समस्या बना रहा। विवाह के बाद उसे चार पुत्रियाँ प्राप्त हुईं—ग्रैंड डचेस ओल्गा (1895 ई.), ग्रैंड डचेस तातियाना (1897 ई.), ग्रैंड डचेस मारिया (1899 ई.) और ग्रैंड डचेस अनास्तासिया (1901 ई.)। लंबे इंतजार के बाद 12 अगस्त 1904 ई. को उसके पुत्र एलेक्सी का जन्म हुआ, जो रूसी साम्राज्य का उत्तराधिकारी (त्सारेविच) बना।
एलेक्सी जन्म से ही हीमोफिलिया बी नामक आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित था। इस रोग में रक्त का थक्का बनने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे मामूली चोट भी जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकती थी। उस समय इस बीमारी का कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था और इससे पीड़ित लोगों की जीवन-प्रत्याशा सामान्यतः कम होती थी। एलेक्जेंड्रा को यह रोग उनकी नानी महारानी विक्टोरिया के वंश से प्राप्त हुआ था, जिसके कारण यूरोप के कई शाही परिवार भी प्रभावित हुए थे।
रासपुतिन और आध्यात्मिक विश्वास
एलेक्सी की बीमारी ने निकोलस और एलेक्जेंड्रा को गहरे मानसिक संकट में डाल दिया। रासपुतिन के प्रभाव में आने से पहले भी शाही परिवार अनेक रहस्यवादी साधुओं, धार्मिक व्यक्तियों और कथित चमत्कार करने वालों से सलाह लेता था। यह उस समय की रूसी धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक विश्वासों से जुड़ा हुआ था। शाही परिवार स्वयं को रूसी परंपरा और ऑर्थोडॉक्स धार्मिक विरासत का संरक्षक मानता था।
एलेक्सी की बीमारी को शाही प्रतिष्ठा और शासन की स्थिरता के लिए खतरा माना गया। इसलिए निकोलस और एलेक्जेंड्रा ने इसे जनता और अधिकांश दरबारियों से छिपाकर रखा। शाही परिवार के अनेक सदस्यों और अधिकारियों को भी उत्तराधिकारी की वास्तविक बीमारी की जानकारी नहीं थी। प्रारंभ में एलेक्जेंड्रा ने रूसी चिकित्सकों और विशेषज्ञों से उपचार कराने का प्रयास किया, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद उसका विश्वास धार्मिक साधुओं और आध्यात्मिक सलाहकारों में बढ़ने लगा।
इसी समय साइबेरिया के अशिक्षित किंतु प्रभावशाली धार्मिक व्यक्ति ग्रिगोरी रासपुतिन का शाही परिवार से संपर्क हुआ। उसने एलेक्सी की बीमारी के दौरान कुछ अवसरों पर ऐसा प्रभाव डाला कि महारानी एलेक्जेंड्रा का उस पर गहरा विश्वास स्थापित हो गया। धीरे-धीरे रासपुतिन का प्रभाव केवल महारानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह निकोलस द्वितीय के निकटवर्ती सलाहकारों में भी शामिल हो गया।
1912 ई. में एलेक्सी को लगी गंभीर चोट के बाद उसकी स्थिति अत्यंत खराब हो गई। लगातार रक्तस्राव के कारण चिकित्सक निराश हो गए और धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाने लगे। ऐसी स्थिति में एलेक्जेंड्रा ने रासपुतिन से सहायता माँगी। उसने उसे सांत्वना देते हुए विश्वास दिलाया कि एलेक्सी जीवित रहेगा और चिकित्सकों को उसे अधिक परेशान नहीं करना चाहिए। इस घटना के बाद शाही परिवार में रासपुतिन की प्रतिष्ठा और प्रभाव और अधिक बढ़ गया।
एंग्लो-रशियन कन्वेंशन और ट्रिपल एंटेंटे
1907 ई. में रूस और ब्रिटेन ने मध्य एशिया से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवादों को समाप्त करने के लिए एंग्लो-रशियन कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए। इससे ‘द ग्रेट गेम’ के कारण दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव में कमी आई। इससे पहले 1904 ई. में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच एंटेंटे कॉर्डियल समझौता हो चुका था। 1907 ई. के समझौते के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच ट्रिपल एंटेंटे का निर्माण हुआ, जिसने यूरोपीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया।
ब्रिटेन और रूस के संबंध
मई 1908 ई. में ब्रिटेन के राजा एडवर्ड सप्तम और महारानी एलेक्जेंड्रा ने रूस की राजकीय यात्रा की। यह ब्रिटिश शासक की रूस की पहली आधिकारिक यात्रा थी। वे रूसी धरती पर नहीं उतरे, बल्कि अपनी नौका पर ही रहे और आधुनिक तालिन के तट के निकट निकोलस द्वितीय और एलेक्जेंड्रा से मिले। इस तीन दिवसीय बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य सहयोग को मजबूत करना था। इस दौरान मैसेडोनिया और कमजोर होते ओटोमन साम्राज्य से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
बोस्नियाई संकट
1908 ई. में निकोलस द्वितीय को अपने विदेश मंत्री अलेक्जेंडर इज़वोल्स्की और ऑस्ट्रो-हंगेरियन विदेश मंत्री काउंट एहरेंथल के बीच हुए गुप्त समझौते की जानकारी मिली। इसके अनुसार रूस को जलडमरूमध्य तक नौसैनिक पहुँच के बदले बोस्निया और हर्जेगोविना पर ऑस्ट्रिया के अधिकार का विरोध नहीं करना था। जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इन क्षेत्रों का विलय किया, तो बोस्नियाई संकट उत्पन्न हुआ। रूस ने इसका विरोध किया, किंतु ऑस्ट्रिया ने गुप्त वार्ता सार्वजनिक करने की धमकी देकर दबाव बनाया।
जर्मनी और यूरोपीय राजनीति
1909 ई. में रूसी शाही परिवार ने ब्रिटेन की यात्रा की और आइल ऑफ वाइट पर आयोजित काउज़ वीक में भाग लिया। 1912 ई. में पाल्डिस्की में निकोलस द्वितीय और जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय के बीच बैठक हुई। दोनों नेताओं ने यूरोप की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की, किंतु उसके प्रयास बढ़ते तनाव और अंततः प्रथम विश्व युद्ध को रोकने में सफल नहीं हो सके।
बाल्कन राजनीति और यूरोपीय कूटनीति
1913 ई. में बाल्कन युद्धों के दौरान निकोलस द्वितीय ने सर्बिया और बुल्गारिया के बीच उत्पन्न विवाद को समाप्त करने के लिए व्यक्तिगत रूप से मध्यस्थता करने की पेशकश की। उसका उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र में शांति बनाए रखना और रूस के प्रभाव को स्थिर रखना था, किंतु बुल्गारिया ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
इसी वर्ष निकोलस द्वितीय ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन की यात्रा की। वह अपने परिवार की एक वैवाहिक घटना में शामिल होने गए थे, जहाँ कैसर विल्हेम द्वितीय की पुत्री राजकुमारी विक्टोरिया लुईस का विवाह निकोलस के रिश्तेदार ब्रंसविक के ड्यूक अर्नेस्ट ऑगस्टस से हुआ। इस अवसर पर उसके साथ ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी भी उपस्थित थे। यह यात्रा यूरोपीय शाही परिवारों के बीच संबंधों को बनाए रखने का एक प्रयास थी।
रोमानोव राजवंश की 300वीं वर्षगाँठ
फरवरी 1913 ई. में निकोलस द्वितीय ने रोमानोव राजवंश के शासन की 300वीं वर्षगाँठ के भव्य समारोहों का नेतृत्व किया। 21 फरवरी को कज़ान कैथेड्रल में ‘टे डेम’ नामक विशेष धन्यवाद प्रार्थना आयोजित की गई और विंटर पैलेस में राजकीय समारोह संपन्न हुआ। इन आयोजनों का उद्देश्य रोमानोव वंश की ऐतिहासिक वैधता और राजशाही के प्रति जनता की निष्ठा को प्रदर्शित करना था।
मई 1913 ई. में निकोलस और शाही परिवार ने पूरे रूसी साम्राज्य की धार्मिक यात्रा की। उसने वोल्गा नदी के उस ऐतिहासिक मार्ग का अनुसरण किया, जिसे 1613 ई. में माइकल रोमानोव ने कोस्ट्रोमा के इपाटीव मठ से मॉस्को तक तय किया था। इसी यात्रा के बाद माइकल रोमानोव को रूस का ज़ार बनने के लिए स्वीकार किया गया था। इस प्रकार यह यात्रा रोमानोव शासन की ऐतिहासिक निरंतरता को दर्शाने का प्रतीक बनी।
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व रूस की स्थिति
प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ से पहले रूस यूरोप का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश था। 17.5 करोड़ से अधिक लोगों के साथ उसका साम्राज्य विशाल मानव संसाधनों से संपन्न था। उसकी सेना में लगभग 13 लाख सक्रिय सैनिक थे और लगभग 50 लाख रिज़र्व सैनिक उपलब्ध थे। विशाल क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधनों और बढ़ते औद्योगिक विकास के कारण रूस को यूरोप की प्रमुख शक्तियों में गिना जाता था।
1860 से 1913 ई. के बीच रूस की औद्योगिक वृद्धि तेज रही। रेलवे नेटवर्क 1900 में लगभग 50,000 किलोमीटर से बढ़कर 1914 ई. तक 75,000 किलोमीटर हो गया। कोयला उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई और बाकू के तेल क्षेत्रों के कारण रूस विश्व में तेल उत्पादन के क्षेत्र में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया।
रूस की बढ़ती शक्ति ने यूरोपीय देशों की रणनीतिक सोच को प्रभावित किया। जर्मनी के सैन्य नेतृत्व का मानना था कि रूस की तेज प्रगति भविष्य में उसके लिए बड़ा खतरा बन सकती है। दूसरी ओर, फ्रांस को विश्वास था कि रूस की विशाल सेना जर्मनी के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
रूसी शक्ति की सीमाएँ
हालाँकि रूस की बाहरी शक्ति प्रभावशाली दिखाई देती थी, किंतु उसकी आर्थिक और औद्योगिक नींव पूरी तरह मजबूत नहीं थी। रूस का औद्योगिक उत्पादन विश्व में चौथे स्थान पर था, किंतु वह अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों से काफी पीछे था। सेना, रेलवे और उद्योगों का विकास बड़े पैमाने पर विदेशी ऋण, विदेशी पूंजी और तकनीकी सहायता पर निर्भर था।
विदेशी ऋणों पर अत्यधिक ब्याज का बोझ रूसी अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता था। 1914 ई. तक खनन, तेल, धातु उद्योग और रासायनिक उद्योगों में विदेशी कंपनियों का महत्त्वपूर्ण नियंत्रण था। इसके बावजूद रूसी उद्योग पर्याप्त प्रतिस्पर्धी नहीं बन सका और देश को अनेक औद्योगिक मशीनों का आयात करना पड़ता था। रूस का निर्यात मुख्य रूप से कृषि उत्पादों और लकड़ी पर आधारित था, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था औद्योगिक रूप से विकसित देशों की तुलना में कमजोर बनी रही।
प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि
28 जून 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की साराजेवो में हत्या कर दी गई। उनकी हत्या एक बोस्नियाई सर्ब राष्ट्रवादी ने की थी, जो बोस्निया-हर्जेगोविना पर ऑस्ट्रिया-हंगरी के नियंत्रण का विरोध करता था। यह घटना प्रथम विश्व युद्ध के तात्कालिक कारणों में से एक बनी। यद्यपि युद्ध को टाला जा सकता था, किंतु यूरोपीय शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, सैन्य तैयारियाँ और जटिल गठबंधन प्रणाली ने स्थिति को युद्ध की ओर धकेल दिया।
रूस और सर्बिया के बीच पैन-स्लाववाद तथा धार्मिक समानता के कारण गहरे संबंध थे। रूस स्वयं को स्लाव जातियों का संरक्षक मानता था और इसलिए सर्बिया के प्रति सहानुभूति रखता था। दूसरी ओर, जर्मनी और फ्रांस, तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी और सर्बिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादों ने यूरोप में विरोधी गुटों को जन्म दिया। युद्ध से पहले यूरोप दो प्रमुख गठबंधनों में विभाजित हो चुका था—ट्रिपल एंटेंट (रूस, फ्रांस और ब्रिटेन) तथा ट्रिपल एलायंस (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली)।
निकोलस द्वितीय की दुविधा
निकोलस द्वितीय इस संकट में कठिन स्थिति में थे। वे न तो सर्बिया को ऑस्ट्रिया-हंगरी के कठोर अल्टीमेटम के सामने अकेला छोड़ना चाहते थे और न ही यूरोप को व्यापक युद्ध में झोंकना चाहते थे। जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय के साथ उसके पत्राचार, जिसे “विली-निकी पत्राचार” कहा जाता है, में दोनों नेताओं ने शांति बनाए रखने की इच्छा व्यक्त की। निकोलस और विल्हेम एक-दूसरे को संयम बरतने तथा संघर्ष को सीमित रखने के लिए समझाते रहे।
निकोलस की इच्छा थी कि रूस केवल ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध सीमित सैन्य तैयारी करे, ताकि जर्मनी के साथ सीधे युद्ध से बचा जा सके। हालांकि, रूस की सैन्य योजनाएँ इस प्रकार की आंशिक लामबंदी के लिए तैयार नहीं थीं, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई।
रूस की लामबंदी और युद्ध की शुरुआत
25 जुलाई 1914 ई. को निकोलस ने मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद ऑस्ट्रिया-सर्बिया संकट में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया। उसने रूसी सेना को सतर्क रहने का आदेश दिया। यह पूर्ण लामबंदी नहीं थी, किंतु जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इसे युद्ध की तैयारी के रूप में देखा।
28 जुलाई 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके बाद 29 जुलाई को निकोलस द्वितीय ने विल्हेम द्वितीय को तार भेजकर सुझाव दिया कि विवाद को हेग सम्मेलन के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए। यद्यपि जर्मन सम्राट ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
रूसी राजनेता सर्गेई विट्टे ने फ्रांसीसी राजदूत को बताया कि रूस के लिए युद्ध एक विनाशकारी कदम होगा और इससे उसे कोई वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होगा। इसके बावजूद परिस्थितियाँ तेजी से बिगड़ती गईं। 30 जुलाई 1914 ई. को निकोलस द्वितीय ने रूस में सामान्य लामबंदी का आदेश जारी कर दिया। रूस ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि शांति वार्ता शुरू होती है तो वह आक्रामक कार्रवाई नहीं करेगा।
जर्मनी और रूस के बीच युद्ध
रूस की लामबंदी की खबर मिलने पर जर्मनी ने अपनी सैन्य तैयारियाँ तेज कर दीं और रूस से लामबंदी रोकने की मांग की। 1 अगस्त 1914 ई. को जर्मन राजदूत ने सेंट पीटर्सबर्ग में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई साज़ोनोव को युद्ध की घोषणा का आधिकारिक पत्र सौंपा। इसके साथ ही जर्मनी और रूस के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया।
जर्मनी ने 3 अगस्त को रूस के सहयोगी फ्रांस के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा की। इसके बाद 6 अगस्त 1914 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी के सम्राट फ्रांज जोसेफ प्रथम ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। इस प्रकार यूरोप का स्थानीय संकट एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदल गया।
प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ में रूस
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ (1914 ई.) में रूस ने अपनी विशाल सेना के बल पर विजय की आशा रखी थी। रूस और उसके सहयोगी उसकी सेना को एक शक्तिशाली शक्ति मानते थे, जिसे अक्सर ‘रूसी स्टीमरॉलर’ कहा जाता था। युद्ध से पहले रूसी सेना की नियमित संख्या लगभग 14 लाख सैनिकों की थी, जबकि लामबंदी के बाद लगभग 31 लाख रिज़र्व सैनिक इसमें शामिल हो गए। इसके अतिरिक्त लाखों सैनिक भविष्य की सैन्य आवश्यकताओं के लिए तैयार रखे गए थे।
हालाँकि, रूस की सैन्य शक्ति केवल संख्या के आधार पर मजबूत दिखाई देती थी। वास्तविकता में वह आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था। जर्मनी की तुलना में रूस का रेलवे नेटवर्क बहुत कमजोर था। जर्मनी में प्रति वर्ग मील रेलवे लाइन की संख्या रूस से लगभग दस गुना अधिक थी। रूसी सैनिकों को मोर्चे तक पहुँचने के लिए औसतन लगभग 1,290 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी, जबकि जर्मन सैनिकों को इससे बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती थी।
हथियारों और रसद की कमी
रूस का औद्योगिक विकास सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। उसके पास आधुनिक हथियारों, तोपों, गोला-बारूद, मोटर परिवहन साधनों और अन्य सैन्य सामग्री की भारी कमी थी। इसके विपरीत, जर्मन सेना आधुनिक हथियारों और बेहतर सैन्य उपकरणों से लैस थी। रूसी सैनिकों को कई बार आवश्यक वस्तुओं, यहाँ तक कि जूतों तक की कमी का सामना करना पड़ा।
समुद्री मार्गों की कठिनाइयों ने रूस की स्थिति को और कमजोर किया। जर्मन पनडुब्बियों के कारण बाल्टिक सागर का मार्ग बंद था और ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में डार्डानेल्स जलडमरूमध्य बंद होने से रूस को मित्र राष्ट्रों से सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हुई। प्रारंभ में उसे सहायता केवल आर्कान्जेल बंदरगाह या सुदूर स्थित व्लादिवोस्तोक के रास्ते मिल सकती थी। बाद में 1915 ई. में उत्तर की ओर रेलवे लाइन बनाकर मुरमान्स्क के बर्फ-मुक्त बंदरगाह को विकसित किया गया, जिससे सहायता प्राप्त करने की सुविधा बढ़ी।
रूसी नेतृत्व की कमजोरियाँ और प्रारंभिक पराजय
रूसी सैन्य नेतृत्व भी समस्याओं से घिरा हुआ था। युद्ध मंत्री व्लादिमीर सुखोमलिनोव और सेना के सर्वोच्च कमांडर ग्रैंड ड्यूक निकोलस निकोलायेविच के बीच आपसी मतभेदों के कारण सैन्य निर्णय प्रभावित हुए। इसके बावजूद रूसी नेतृत्व ने जर्मनी के पूर्वी प्रांत पूर्वी प्रशिया पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।
प्रारंभिक अभियान में रूस को भारी असफलता मिली। जर्मन सेना ने टैनेनबर्ग के युद्ध (1914 ई.) में रूसी सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिसमें एक रूसी सेना लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई। यद्यपि रूस ने ऑस्ट्रिया-हंगरी और ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध कुछ सफलताएँ प्राप्त कीं, किंतु जर्मन सेना के विरुद्ध उसे लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
सितंबर 1914 ई. में फ्रांस पर जर्मन दबाव कम करने के लिए रूस ने गैलिसिया में ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध अपनी सफल कार्रवाई को रोककर सिलेसिया की ओर अभियान चलाने का प्रयास किया। इससे उसकी सैन्य स्थिति और जटिल हो गई।
पूर्वी मोर्चे पर संघर्ष और घरेलू संकट
इसके बाद पूर्वी मोर्चे पर लंबा और थकाऊ युद्ध शुरू हुआ। रूसी सेना को जर्मन और ऑस्ट्रो-हंगेरियन सेनाओं के विरुद्ध भारी जनहानि उठानी पड़ी। रूसी जनरल एंटोन डेनकिन ने युद्ध की स्थिति का वर्णन करते हुए बताया कि जर्मन भारी तोपखाने के सामने रूसी सैनिकों के पास पर्याप्त जवाबी साधन नहीं थे और लगातार संघर्ष के कारण सैनिकों की संख्या घटती जा रही थी।
1915 ई. में रूसी सेना के पीछे हटने के बाद वारसॉ पर जर्मनों का अधिकार हो गया। इस पराजय ने रूस में राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को बढ़ा दिया। प्रारंभ में जनता का गुस्सा रूस में रहने वाले जर्मन मूल के लोगों के विरुद्ध फूटा। उसके व्यापारिक प्रतिष्ठानों, घरों और संपत्तियों पर हमले किए गए।
धीरे-धीरे असंतोष सरकार और राजशाही के विरुद्ध बदल गया। जनता के एक वर्ग ने महारानी एलेक्जेंड्रा को हटाने, निकोलस द्वितीय के पद त्याग और रासपुतिन को दंडित करने की मांग उठाई। इस संकट के बीच ड्यूमा का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और युद्ध संचालन तथा राष्ट्रीय रक्षा के लिए एक विशेष परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई।
युद्धकालीन संकट और शांति प्रस्ताव
जुलाई 1915 ई. में डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन दशम, जो निकोलस द्वितीय के चचेरे भाई थे, ने हंस नील्स एंडरसन को मध्यस्थ के रूप में भेजने का प्रस्ताव रखा। एंडरसन ने लंदन, बर्लिन और पेट्रोग्राड के बीच संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया और जुलाई में महारानी मारिया फ्योदोरोव्ना से भी मुलाकात की। उसने रूस को जर्मनी और उसके सहयोगियों के साथ शांति समझौता करने की सलाह दी।
यद्यपि निकोलस द्वितीय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उसका मानना था कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे सहयोगी राष्ट्रों के युद्धरत रहते हुए केंद्रीय शक्तियों के साथ अलग से शांति संधि करना रूस के लिए विश्वासघात के समान होगा। वे मित्र राष्ट्रों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखना चाहते थे।
रूसी सेना की लगातार पराजयों के बीच जनरल अलेक्सी पोलिवानोव ने व्लादिमीर सुखोमलिनोव का स्थान युद्ध मंत्री के रूप में लिया, किंतु इससे सैन्य स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ। 1915 ई. में रूस को जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस पराजय के बाद सितंबर 1915 ई. में निकोलस द्वितीय ने अपने चचेरे भाई ग्रैंड ड्यूक निकोलस निकोलायेविच को हटाकर स्वयं रूसी सेना के सर्वोच्च सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) का पद ग्रहण कर लिया।
यह निर्णय राजनीतिक रूप से अत्यंत हानिकारक सिद्ध हुआ, क्योंकि अब सेना की असफलताओं की सीधी जिम्मेदारी सम्राट पर आने लगी। निकोलस द्वितीय मोर्चे के निकट मोगिलेव स्थित मुख्यालय में रहने लगे और राजधानी पेट्रोग्राद से दूर हो गए। यद्यपि सैन्य मामलों के वास्तविक निर्णय चीफ ऑफ स्टाफ जनरल मिखाइल अलेक्सेयेव लेते थे, फिर भी जनता की दृष्टि में युद्ध की असफलताओं का उत्तरदायित्व ज़ार पर ही था। निकोलस का अधिकांश समय सैनिकों का निरीक्षण करने, अस्पतालों का दौरा करने और सैन्य कार्यक्रमों में भाग लेने में व्यतीत होता था।
राजशाही की गिरती प्रतिष्ठा
युद्ध के दौरान ड्यूमा राजनीतिक सुधारों की मांग करती रही और देश में असंतोष बढ़ता गया। निकोलस द्वितीय जनता की भावनाओं और राजनीतिक परिस्थितियों से दूर होते गए। उसके मोर्चे पर रहने के कारण घरेलू प्रशासन की जिम्मेदारी महारानी एलेक्जेंड्रा के हाथों में आ गई।
एलेक्जेंड्रा के ग्रिगोरी रासपुतिन से निकट संबंध और उनकी जर्मन मूल की पृष्ठभूमि ने राजशाही की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँचाई। जनता और राजनीतिक वर्ग में रासपुतिन के प्रभाव को लेकर व्यापक असंतोष फैल गया। निकोलस को कई बार रासपुतिन के विरुद्ध चेतावनी दी गई, किंतु उसने उसे हटाने से इनकार कर दिया।
रासपुतिन की हत्या
एलेक्जेंड्रा और रासपुतिन के संबंधों को लेकर अनेक अफवाहें फैलने लगीं। कुछ लोगों ने महारानी पर जर्मनी के प्रति सहानुभूति रखने तक के आरोप लगाए। युद्ध में लगातार विफलताओं, आर्थिक संकट और राजशाही पर रासपुतिन के प्रभाव को लेकर बढ़ते आक्रोश के परिणामस्वरूप रूसी अभिजात वर्ग के एक समूह ने रासपुतिन की हत्या की योजना बनाई।
17 दिसंबर 1916 ई. (पुरानी शैली) या 30 दिसंबर 1916 ई. (नई शैली) को प्रिंस फ़ेलिक्स युसुपोव और ग्रैंड ड्यूक दिमित्री पावलोविच के नेतृत्व में कुछ रूसी रईसों ने ग्रिगोरी रासपुतिन की हत्या कर दी। यह घटना रूसी राजशाही के भीतर बढ़ते संकट और जन-असंतोष का प्रतीक बन गई।
रूसी साम्राज्य का पतन
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूसी सरकार की प्रशासनिक विफलताओं और आर्थिक संकट ने निकोलस द्वितीय के शासन को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। जब सरकार जनता को आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने में असफल रही, तो देश में असंतोष, दंगे और विद्रोह बढ़ने लगे। 1915 से 1916 ई. के बीच जब निकोलस द्वितीय स्वयं मोर्चे पर सेना का नेतृत्व कर रहे थे, तब राजधानी पेट्रोग्राद में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई। हड़तालों और सैनिक विद्रोहों के कारण शासन व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।
ब्रिटिश राजदूत सर जॉर्ज बुकानन ने निकोलस द्वितीय को चेतावनी दी कि क्रांति को रोकने के लिए संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता है, किंतु ज़ार ने उनकी सलाह को स्वीकार नहीं किया। वे राजधानी से लगभग 600 किलोमीटर दूर मोहिलेव स्थित सेना मुख्यालय (स्टाव्का) में ही बने रहे। इस दूरी के कारण वे राजधानी की वास्तविक स्थिति और जनता में बढ़ते असंतोष से कट गए, जिससे राजमहल षड्यंत्रों और विद्रोहों का केंद्र बन गया।
निकोलस द्वितीय को प्रारंभ में दक्षिणपंथी राजशाही समर्थकों का मजबूत समर्थन प्राप्त था। ये वर्ग निरंकुश शासन और पारंपरिक राजसत्ता के पक्ष में था। हालांकि, समय के साथ उसका समर्थन भी कमजोर होने लगा। इसका प्रमुख कारण 1905 ई. की क्रांति के बाद स्टोलिपिन के सुधारों को निकोलस द्वारा सीमित रूप से स्वीकार करना और बाद में ग्रिगोरी रासपुतिन को राजनीतिक प्रभाव देना था। रूढ़िवादी वर्ग को लगा कि रासपुतिन का बढ़ता प्रभाव राजशाही की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा रहा है।
युद्ध और आर्थिक संकट
1917 ई. तक रूस की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध में लगभग 17 लाख रूसी सैनिक मारे जा चुके थे और सेना तथा जनता का मनोबल टूटने लगा था। युद्ध के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ, क्योंकि लगभग 1.5 करोड़ लोगों को सेना में भर्ती कर लिया गया था। परिणामस्वरूप खाद्य पदार्थों की कमी बढ़ी और कीमतों में भारी वृद्धि हुई। 1914 ई. की तुलना में अंडों की कीमत लगभग चार गुना और मक्खन की कीमत पाँच गुना तक बढ़ गई।
कठोर सर्दी और युद्धकालीन दबाव के कारण रूस की रेलवे व्यवस्था भी चरमरा गई। जब रूस युद्ध में शामिल हुआ था, तब उसके पास लगभग 20,000 इंजन थे, किंतु 1917 ई. तक केवल लगभग 9,000 ही उपयोग योग्य रह गए। रेलवे वैगनों की संख्या भी भारी रूप से घट गई। कोयले और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा के कारण पेट्रोग्राद में आटा और ईंधन की भारी कमी हो गई। निकोलस द्वितीय ने युद्धकाल में देशभक्ति और उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से शराब पर प्रतिबंध लगाया था, किंतु इससे सरकार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई, क्योंकि शराब से मिलने वाला कर राजस्व समाप्त हो गया।
फरवरी क्रांति (1917 ई.)
23 फ़रवरी 1917 ई. (पुरानी रूसी तिथि; नई शैली के अनुसार 8 मार्च) को पेट्रोग्राद में खाद्यान्न संकट, महँगाई और कड़ाके की ठंड से त्रस्त जनता रोटी और आवश्यक वस्तुओं की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आई। शीघ्र ही ये प्रदर्शन राजनीतिक रूप धारण कर गए और प्रदर्शनकारियों ने युद्ध, सरकार तथा ज़ार के विरुद्ध नारे लगाने शुरू कर दिए। पुलिस की गोलीबारी से स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई। राजधानी में तैनात सैनिक पहले से ही युद्ध की कठिनाइयों और खराब परिस्थितियों से असंतुष्ट थे। जब कई सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और जनता का साथ देना शुरू कर दिया, तब राजशाही की स्थिति तेजी से कमजोर होने लगी।
ज़ार की वापसी में विफलता
क्रांति के समय निकोलस द्वितीय राजधानी से लगभग 800 किलोमीटर दूर मोगिलेव स्थित सैन्य मुख्यालय में थे। मंत्रिमंडल ने उन्हें तत्काल पेट्रोग्राद लौटने का आग्रह किया, किंतु गृह मंत्री अलेक्जेंडर प्रोटोपोपोव ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि स्थिति नियंत्रण में है। परिणामस्वरूप निकोलस ने विद्रोह को बलपूर्वक दबाने का आदेश दिया। परंतु राजधानी की सेना इस आदेश का पालन करने के लिए तैयार नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध में अनुभवी सैनिकों की भारी क्षति हो चुकी थी और उनकी जगह नए, अल्प-प्रशिक्षित ग्रामीण एवं श्रमिक युवकों की भर्ती की गई थी। ऐसे सैनिकों में सरकार के प्रति निष्ठा कम और असंतोष अधिक था।
सेना का विद्रोह और क्रांति का विस्तार
11 मार्च 1917 ई. को जनरल खाबालोव ने ज़ार के आदेश लागू करने का प्रयास किया, लेकिन भीड़ पर गोली चलाने के आदेश का कई सैनिकों ने विरोध किया। वोल्हिनियन रेजिमेंट ने विद्रोह कर दिया और शीघ्र ही सेमेनोव्स्की, इज़माइलोव्स्की, लिथुआनियन तथा प्रसिद्ध प्रेओब्राज़ेंस्की रेजिमेंट भी उसके साथ जुड़ गईं। विद्रोही सैनिकों ने शस्त्रागार, पुलिस मुख्यालय, गृह मंत्रालय तथा अन्य सरकारी भवनों पर अधिकार कर लिया। कई इमारतों में आग लगा दी गई और दिन समाप्त होते-होते पीटर एवं पॉल किले सहित राजधानी के अधिकांश महत्वपूर्ण स्थान क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गए। लगभग 60,000 सैनिक विद्रोह में शामिल हो चुके थे। इसी बीच ड्यूमा के अध्यक्ष मिखाइल रोडज़ियान्को ने निकोलस द्वितीय को राजधानी की गंभीर स्थिति से अवगत कराया, किंतु तब तक परिस्थितियाँ उसके नियंत्रण से बाहर हो चुकी थीं।
निकोलस द्वितीय का त्यागपत्र और रोमोनोव शासन का अंत
प्रथम विश्व युद्ध की लगातार पराजयों, आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी, महँगाई, श्रमिक हड़तालों और राजनीतिक असंतोष ने 1917 तक रूसी साम्राज्य की नींव को कमजोर कर दिया था। राजधानी में प्रशासन पूरी तरह विफल हो गया, प्रधानमंत्री निकोलाई गोलित्सिन ने इस्तीफ़ा दे दिया और ड्यूमा के नेताओं तथा पेट्रोग्राद सोवियत के प्रतिनिधियों ने अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया आरंभ की। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी देश में शांति स्थापित करने के लिए निकोलस द्वितीय के सिंहासन त्याग का समर्थन किया।
15 मार्च 1917 ई. (नई शैली; पुरानी शैली के अनुसार 2 मार्च) को प्स्कोव में निकोलस को ड्यूमा के अध्यक्ष मिखाइल रोडज़ियान्को और सेना के प्रमुख जनरल मिखाइल अलेक्सेयेव के संदेश प्राप्त हुए, जिनमें उससे त्यागपत्र देने का आग्रह किया गया था। प्रारंभ में उसने अपने पुत्र एलेक्सी के पक्ष में सिंहासन छोड़ने का विचार किया, किंतु एलेक्सी की हीमोफिलिया बीमारी को देखते हुए उसने अपने छोटे भाई ग्रैंड ड्यूक मिखाइल अलेक्जेंड्रोविच के पक्ष में त्यागपत्र दे दिया। मिखाइल ने भी बिना जनता की स्वीकृति के सम्राट बनने से इनकार कर दिया और निर्णय भावी संविधान सभा पर छोड़ दिया।
निकोलस द्वितीय के त्यागपत्र के साथ ही 1613 से शासन कर रहे रोमानोव वंश के लगभग तीन शताब्दियों पुराने शासन का अंत हो गया। इस प्रकार रूस में निरंकुश राजतंत्र समाप्त हुआ और अंतरिम सरकार के नेतृत्व में एक नई राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर रूसी इतिहास की दिशा बदल दी।
बोलशेविक क्रांति के पूर्व रूस




