अठारहवीं शताब्दी में बंगाल की राजनीतिक स्थिति
अठारहवीं शताब्दी का प्रारंभ भारतीय इतिहास में गहन राजनीतिक परिवर्तन का काल था। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगल साम्राज्य के पतन का युग आरंभ हो गया। यद्यपि मुगल साम्राज्य भौगोलिक दृष्टि से विशाल था, परंतु उसकी प्रशासनिक और सैन्य शक्ति निरंतर क्षीण हो रही थी। औरंगजेब की दीर्घकालीन दक्कन नीति, निरंतर युद्धों, धार्मिक असहिष्णुता तथा अत्यधिक सैन्य व्यय ने साम्राज्य की आर्थिक एवं प्रशासनिक नींव को कमजोर कर दिया था। उसके पश्चात् आने वाले सम्राट न तो सक्षम नेतृत्व प्रदान कर सके और न ही विशाल साम्राज्य को एकसूत्र में बाँध सके। परिणामस्वरूप केंद्रीय सत्ता का प्रभाव तेजी से घटने लगा तथा प्रांतों के सूबेदार, सामंत और स्थानीय शासक स्वतंत्र होने लगे।
मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता का पतन
औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। फलस्वरूप प्रत्येक सम्राट की मृत्यु के बाद राजकुमारों के बीच रक्तरंजित उत्तराधिकार युद्ध छिड़ जाते थे। इन संघर्षों ने न केवल शाही परिवार को कमजोर किया, बल्कि सेना और प्रशासन की शक्ति को भी क्षीण कर दिया। बहादुर शाह प्रथम, जहाँदार शाह, फर्रुखसियर, रफी-उद्-दर्जात, रफी-उद्-दौला तथा मुहम्मद शाह जैसे सम्राट प्रभावी शासन स्थापित करने में असफल रहे। दरबार में तूरानी, ईरानी, हिंदुस्तानी तथा अन्य गुटों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहा। इन गुटों ने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए सम्राटों को कठपुतली बनाकर शासन चलाने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप केंद्रीय प्रशासन शिथिल होता गया और प्रांतीय अधिकारियों ने स्वायत्त व्यवहार प्रारंभ कर दिया।
सैयद बंधुओं का प्रभुत्व और दरबारी राजनीति
फर्रुखसियर (1713–1719 ई.) सैयद अब्दुल्ला खाँ और सैयद हुसैन अली खाँ के समर्थन से सिंहासन पर बैठा। दोनों भाई इतने प्रभावशाली हो गए कि उन्हें ‘किंगमेकर’ (सम्राट-निर्माता) कहा जाने लगा। वे सम्राटों की नियुक्ति, पदाधिकारियों के चयन तथा प्रशासनिक निर्णयों पर नियंत्रण रखते थे। इससे मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा और अधिकार दोनों कमजोर हुए। 1720 ई. में मुहम्मद शाह ने सैयद बंधुओं का प्रभाव समाप्त कर दिया, किंतु तब तक मुगल साम्राज्य की राजनीतिक एकता गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी थी। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट तथा सैन्य दुर्बलता निरंतर बढ़ती गई।
नादिरशाह का आक्रमण और मुगल प्रतिष्ठा का पतन
1739 ई. में ईरान के शासक नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। करनाल के युद्ध में मुगल सेना पराजित हुई और नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर व्यापक लूटपाट की। कोहिनूर हीरा तथा मयूर सिंहासन सहित अपार धन-संपत्ति ईरान ले जाई गई। इस घटना ने पूरे भारत में यह स्पष्ट कर दिया कि मुगल साम्राज्य अब अपनी रक्षा करने में भी सक्षम नहीं रहा है। नादिरशाह के आक्रमण के बाद मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा पूरी तरह धूमिल हो गई। अनेक प्रांतीय शासकों ने औपचारिक अधीनता बनाए रखते हुए भी व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र शासन प्रारंभ कर दिया। इसके कुछ दशकों बाद अहमदशाह अब्दाली के बार-बार होने वाले आक्रमणों ने भी मुगल सत्ता को और अधिक कमजोर कर दिया।
स्वतंत्र राज्यों का उदय
मुगल साम्राज्य के विघटन के साथ भारत के विभिन्न भागों में अनेक शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों ने स्थानीय प्रशासन को सुदृढ़ किया, किंतु राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक एकता समाप्त हो गई। दक्षिण में निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह ने हैदराबाद राज्य की स्थापना की। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में नवाबों ने स्वतंत्र शासन स्थापित किया। अवध में सआदत खाँ और उसके उत्तराधिकारियों ने शक्तिशाली राज्य का निर्माण किया। फर्रुखाबाद में मुहम्मद खाँ बंगश, रुहेलखंड में अली मुहम्मद खाँ रोहिला तथा भरतपुर में जाट शासकों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। इसी समय मराठों ने मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड तथा दक्कन में अपना प्रभाव अत्यधिक बढ़ा लिया, जबकि पंजाब में सिख शक्ति निरंतर संगठित होती गई। राजपूत राज्यों ने भी मुगल नियंत्रण से मुक्त होकर अपनी स्वायत्तता पुनः प्राप्त कर ली। यद्यपि ये सभी राज्य औपचारिक रूप से मुगल सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार करते थे, परंतु वास्तविक शासन पूरी तरह उनके हाथों में था। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक भारत राजनीतिक रूप से अनेक स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो चुका था।
यूरोपीय कंपनियों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ
भारत की राजनीतिक विखंडन की स्थिति ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी तथा फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए हस्तक्षेप के अवसर उत्पन्न किए। प्रारंभ में दोनों कंपनियाँ केवल व्यापार तक सीमित थीं, किंतु प्रांतीय शासकों के पारस्परिक संघर्षों और केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर उन्होंने राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया। दक्षिण भारत का कर्नाटक तथा पूर्वी भारत का बंगाल इन दोनों यूरोपीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के प्रमुख केंद्र बने। यहीं से भारत में यूरोपीय साम्राज्यवाद की वास्तविक शुरुआत हुई।
बंगाल में स्वायत्त नवाबी सत्ता का उदय
अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल मुगल साम्राज्य का सबसे समृद्ध प्रांत था। इसकी उपजाऊ भूमि, विकसित कृषि, उत्कृष्ट सूती एवं रेशमी वस्त्र उद्योग, समुद्री व्यापार तथा समृद्ध बंदरगाहों ने इसे भारत का आर्थिक केंद्र बना दिया था। मुगल केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने पर बंगाल के सूबेदारों ने धीरे-धीरे स्वतंत्र शासन की नीति अपनाई। 1717 ई. में मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल को व्यावहारिक रूप से स्वायत्त राज्य के रूप में संगठित किया। उसने राजस्व व्यवस्था में व्यापक सुधार किए, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित किया तथा प्रशासन को सुदृढ़ बनाया। उसके शासन में बंगाल की आर्थिक समृद्धि और अधिक बढ़ी। मुर्शिद कुली खाँ के बाद शुजा-उद्दीन मुहम्मद खाँ तथा फिर अलीवर्दी खाँ ने बंगाल की स्वायत्त नवाबी सत्ता को और मजबूत किया। इन शासकों ने मुगल सम्राट के प्रति केवल औपचारिक निष्ठा बनाए रखी, जबकि प्रशासन, वित्त और सैन्य व्यवस्था पर उनका पूर्ण नियंत्रण था।
अलीवर्दी खाँ का शासन (1740–1756 ई.)
1740 ई. में अलीवर्दी खाँ ने गिरिया के युद्ध में सरफराज खाँ को पराजित कर बंगाल, बिहार और उड़ीसा का नवाब बन गया। वह एक योग्य, कुशल तथा दूरदर्शी प्रशासक था। उसने प्रशासन को संगठित किया, राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया।
उसके शासनकाल की सबसे बड़ी चुनौती मराठों के बार-बार होने वाले आक्रमण थे, जिन्हें “बर्गी आक्रमण” भी कहा जाता है। इन आक्रमणों से बंगाल की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। लंबे संघर्ष के बाद 1751 ई. में अलीवर्दी खाँ ने मराठों के साथ संधि की, जिसके अंतर्गत उन्हें उड़ीसा पर अधिकार तथा चौथ स्वीकार करनी पड़ी। इसके बाद बंगाल में अपेक्षाकृत शांति स्थापित हुई। अलीवर्दी खाँ ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों दोनों को केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित रखने का प्रयास किया। उसने किसी भी यूरोपीय कंपनी को किलेबंदी बढ़ाने अथवा राजनीतिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी। उसकी यह नीति बंगाल की स्वतंत्रता और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी।
सिराजुद्दौला का उत्तराधिकार
अलीवर्दी खाँ की कोई पुत्र संतान नहीं थी। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री आमीना बेगम के पुत्र सिराजुद्दौला को उत्तराधिकारी घोषित किया। किंतु इस निर्णय का दरबार के अनेक प्रभावशाली सरदारों, उच्च अधिकारियों तथा उसके कुछ संबंधियों ने विरोध किया। परिणामस्वरूप नवाबी दरबार षड्यंत्रों और गुटबाजी का केंद्र बन गया।
सिराजुद्दौला का शासन और प्रारंभिक कठिनाइयाँ
9 अप्रैल 1756 ई. को अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर बैठा, लेकिन आरंभ से ही उसे अनेक आंतरिक और बाहरी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उसके विरोधियों में उसकी बड़ी मौसी घसीटी बेगम, पूर्णिया के शासक शौकत जंग और उसके समर्थक दीवान राजवल्लभ प्रमुख थे। घसीटी बेगम अत्यंत धनी और प्रभावशाली महिला थी तथा वह अपने समर्थक शौकत जंग को बंगाल की गद्दी पर बैठाना चाहती थी।
इसके अतिरिक्त, बंगाल के शक्तिशाली व्यापारी वर्ग के कुछ लोग भी सिराजुद्दौला के विरोधी थे। इनमें जगत सेठ जैसे प्रसिद्ध बैंकर और कलकत्ता के व्यापारी अमीचंद का नाम उल्लेखनीय है। इस प्रकार नवाब को अपने ही दरबार के प्रभावशाली व्यक्तियों के विरोध का सामना करना पड़ा। किंतु इन सभी समस्याओं से अधिक गंभीर चुनौती अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियाँ थीं।
अंग्रेजों के षड्यंत्र और बंगाल की स्थिति
अलीवर्दी खाँ के शासनकाल से ही अंग्रेजों की दृष्टि बंगाल की संपन्नता पर थी। बंगाल अपनी कृषि संपन्नता, कपड़ा उद्योग और व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय कंपनियों के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र था। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे व्यापारिक सुविधाओं का उपयोग राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए करने लगी थी।
अंग्रेजों ने मुगल सम्राटों द्वारा दिए गए फरमानों का गलत लाभ उठाना प्रारंभ कर दिया था। कंपनी के व्यापारी बिना चुंगी दिए व्यापार करते थे, जिससे नवाब के राजस्व को भारी नुकसान होता था। अंग्रेज अपनी दस्तक प्रणाली का दुरुपयोग करते हुए न केवल स्वयं कर-मुक्त व्यापार करते थे, बल्कि भारतीय व्यापारियों को भी इसका लाभ देकर स्थानीय व्यापार व्यवस्था को प्रभावित करते थे। इससे बंगाल सरकार की आय में कमी आने लगी।
अंग्रेज बंगाल के दरबार में चल रहे उत्तराधिकार संबंधी विवादों में भी हस्तक्षेप करने लगे थे। वे ऐसे व्यक्ति को सत्ता में लाना चाहते थे जो उनके हितों के अनुकूल हो। कलकत्ता के कुछ प्रभावशाली व्यापारियों और दरबारियों की सहायता से अंग्रेजों ने नवाब विरोधी गुटों को प्रोत्साहित किया। ओमिचंद जैसे व्यापारियों ने भी इन षड्यंत्रों में अंग्रेजों का साथ दिया।
अंग्रेजों द्वारा किलेबंदी
सिराजुद्दौला के शासनकाल में यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.) की संभावना बढ़ रही थी। इस कारण अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने भारत में अपनी-अपनी बस्तियों की सुरक्षा के लिए किलेबंदी प्रारंभ कर दी। अंग्रेजों ने कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना शुरू किया, किंतु इसके लिए उन्होंने नवाब की अनुमति प्राप्त नहीं की। यह कार्य सिराजुद्दौला की संप्रभुता का उल्लंघन था।
नवाब ने अंग्रेजों को आदेश दिया कि वे बिना अनुमति की जा रही किलेबंदी बंद करें, लेकिन अंग्रेजों ने उसकी आज्ञा की अवहेलना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने नवाब के विरोधियों को अपने संरक्षण में रखा और उन्हें कलकत्ता में शरण दी। इससे सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो गए।
बंगाल की आर्थिक स्थिति
अठारहवीं शताब्दी में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध आर्थिक क्षेत्र था। यहाँ की उपजाऊ भूमि में चावल, गन्ना, रेशम और अन्य कृषि उत्पादों का व्यापक उत्पादन होता था। बंगाल का सूती और रेशमी वस्त्र उद्योग विश्व प्रसिद्ध था। ढाका की मलमल, मुर्शिदाबाद का रेशम और कासिम बाजार के वस्त्र यूरोप तक निर्यात किए जाते थे।
यूरोपीय कंपनियाँ बंगाल से वस्त्र, नमक, शोरा, रेशम और अन्य वस्तुओं का व्यापार करती थीं। अंग्रेज, फ्रांसीसी और डच कंपनियों ने यहाँ अपनी व्यापारिक फैक्ट्रियाँ स्थापित कर रखी थीं। किंतु यूरोपीय कंपनियों के बढ़ते हस्तक्षेप और कर-मुक्त व्यापार की नीति ने बंगाल की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया था।
इस प्रकार 18वीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल राजनीतिक रूप से आंतरिक षड्यंत्रों, उत्तराधिकार संघर्षों और विदेशी हस्तक्षेप से कमजोर हो चुका था। दूसरी ओर उसकी आर्थिक समृद्धि ने यूरोपीय शक्तियों को आकर्षित किया। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1757 ई. के प्लासी युद्ध का कारण बनीं, जिसने भारत में अंग्रेजी राजनीतिक प्रभुत्व की नींव रखी।
सिराजुद्दौला के कार्य एवं अंग्रेजों के साथ संघर्ष
अलीवर्दी खाँ की मृत्यु (9 अप्रैल 1756 ई.) के बाद उसका उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर बैठा। उस समय बंगाल की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल थी। एक ओर दरबार के प्रभावशाली व्यक्ति उसके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी शक्ति का विस्तार करने का प्रयास कर रही थी। सिराजुद्दौला ने प्रारंभ में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने और आंतरिक समस्याओं को समाप्त करने का प्रयास किया, किंतु परिस्थितियाँ धीरे-धीरे उसके नियंत्रण से बाहर होती चली गईं।
आंतरिक समस्याओं का समाधान
गद्दी पर बैठते ही सिराजुद्दौला ने सबसे पहले अपने विरोधियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उसकी सबसे बड़ी विरोधी उसकी बड़ी मौसी घसीटी बेगम थी, जो अत्यंत धनवान और प्रभावशाली महिला थी। वह सिराजुद्दौला के उत्तराधिकार से असंतुष्ट थी और उसके विरुद्ध दरबार में षड्यंत्रों को प्रोत्साहित कर रही थी। सिराजुद्दौला ने उसकी जागीर जब्त कर ली और उसे महल में नजरबंद कर दिया, जिससे उसके प्रभाव को सीमित किया जा सके।
इसके बाद उसने पूर्णिया के गवर्नर शौकत जंग की गतिविधियों पर ध्यान दिया। शौकत जंग स्वयं बंगाल की नवाबी का इच्छुक था और उसे घसीटी बेगम तथा उसके समर्थकों का सहयोग प्राप्त था। सिराजुद्दौला एक विशाल सेना लेकर उसके विरुद्ध राजमहल की ओर बढ़ा। सिराजुद्दौला की शक्ति देखकर शौकत जंग ने संघर्ष करने के बजाय उसे नवाब स्वीकार कर लिया और अनेक उपहार देकर उसे संतुष्ट करने का प्रयास किया।
इसी समय घसीटी बेगम के दीवान राजवल्लभ का पुत्र कृष्णवल्लभ सरकारी धन लेकर कलकत्ता भाग गया और अंग्रेजों की शरण में चला गया। सिराजुद्दौला ने कलकत्ता के अंग्रेज अधिकारियों से मांग की कि कृष्णवल्लभ को उसके हवाले किया जाए, लेकिन अंग्रेजों ने उसकी मांग को अस्वीकार कर दिया। इससे नवाब और अंग्रेजों के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया।
उधर शौकत जंग ने मुगल सम्राट से बंगाल की नवाबी की मान्यता प्राप्त करने का प्रयास किया। उसने कुछ प्रभावशाली दरबारियों, जिनमें मीरजाफर और जगत सेठ जैसे लोग भी शामिल थे, से संपर्क स्थापित किया। किंतु सिराजुद्दौला को इसकी सूचना मिल गई। उसके सेनापति मीरजाफर ने समय रहते शौकत जंग पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में शौकत जंग पराजित हुआ और मारा गया। इस प्रकार सिराजुद्दौला ने अपने तत्कालीन आंतरिक विरोधियों को नियंत्रित कर लिया और अब उसका ध्यान अंग्रेजों की ओर गया।
सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के संबंध
सिराजुद्दौला अंग्रेजों की गतिविधियों से पहले से ही परिचित था। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल फरमानों द्वारा व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, लेकिन कंपनी के व्यापारी इन सुविधाओं का दुरुपयोग कर रहे थे। अंग्रेज व्यापारी अपने माल को चुंगी से मुक्त कराने के लिए प्राप्त दस्तक का गलत प्रयोग करते थे। वे भारतीय व्यापारियों से धन लेकर उन्हें भी अपने नाम की पर्चियाँ प्रदान करते थे, जिसके कारण बंगाल सरकार को भारी राजस्व हानि होती थी।
यह समस्या अलीवर्दी खाँ के समय से चली आ रही थी और सिराजुद्दौला इसे समाप्त करना चाहता था। उसका उद्देश्य अंग्रेजों को बंगाल के कानूनों का पालन करने और सामान्य व्यापारियों की तरह कर देने के लिए बाध्य करना था। दूसरी ओर अंग्रेज व्यापारी अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।
इसी समय यूरोप में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.) की संभावना बढ़ रही थी। दोनों यूरोपीय शक्तियों ने भारत में अपनी-अपनी बस्तियों की सुरक्षा के लिए किलेबंदी और सैनिक तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं। सिराजुद्दौला की दृष्टि में यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन था। उसने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों दोनों को किलेबंदी रोकने का आदेश दिया। फ्रांसीसियों ने उसकी आज्ञा स्वीकार कर ली, किंतु अंग्रेजों ने उसकी अवहेलना की और कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम की किलेबंदी जारी रखी।
सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष
जब सिराजुद्दौला शौकत जंग के विरुद्ध अभियान पर था, तभी उसे सूचना मिली कि अंग्रेज उसके आदेशों की उपेक्षा कर रहे हैं। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ और तुरंत मुर्शिदाबाद लौट आया। उसने अंग्रेजों को अपनी शक्ति का परिचय देने का निर्णय लिया।
24 जून 1756 ई. को सिराजुद्दौला ने अपनी सेना को कासिम बाजार की अंग्रेजी फैक्टरी पर अधिकार करने के लिए भेजा। अंग्रेज अधिकारी वाट्स नवाब की सेना का सामना नहीं कर सके और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद सिराजुद्दौला ने कलकत्ता की ओर प्रस्थान किया।
कलकत्ता में स्थित अंग्रेज अधिकारी भी नवाब की विशाल सेना का सामना करने में असफल रहे। फोर्ट विलियम की रक्षा व्यवस्था कमजोर थी। कई अंग्रेज अधिकारी और व्यापारी कलकत्ता छोड़कर भाग गए, जबकि कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया। अंततः जून 1756 ई. में कलकत्ता पर सिराजुद्दौला का अधिकार स्थापित हो गया।
काली कोठरी की दुर्घटना (ब्लैक होल त्रासदी)
कलकत्ता विजय से संबंधित एक घटना को अंग्रेज इतिहासकारों ने ‘काली कोठरी की घटना’ के नाम से प्रसिद्ध किया। अंग्रेज अधिकारी जॉन ज़ेफ़ानिया होल्वेल के अनुसार 20 जून 1756 ई. की रात नवाब सिराजुद्दौला की सेना ने फोर्ट विलियम पर अधिकार करने के बाद 146 अंग्रेज बंदियों को लगभग 18 फीट लंबी और 14 फीट 10 इंच चौड़ी एक छोटी कोठरी में बंद कर दिया। होल्वेल के अनुसार उस बंद कमरे में अत्यधिक गर्मी और घुटन के कारण अगली सुबह केवल 23 व्यक्ति जीवित बचे, जबकि 123 बंदियों की मृत्यु हो गई।
आधुनिक इतिहासकार इस विवरण की सत्यता पर संदेह व्यक्त करते हैं। उनका मत है कि इस घटना का मुख्य स्रोत स्वयं होल्वेल का विवरण है, जबकि समकालीन भारतीय स्रोतों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। इतने अधिक व्यक्तियों को इतने छोटे कमरे में बंद किए जाने की बात भी ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध है। यदि ऐसी कोई घटना हुई भी थी, तो इसके लिए सीधे तौर पर सिराजुद्दौला को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह प्रमाणित नहीं है कि यह कार्य उसके आदेश पर किया गया था। इसलिए आधुनिक इतिहासकार इसे अतिरंजित या विवादास्पद घटना मानते हैं।
कलकत्ता पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार
कलकत्ता पर अधिकार खोने के बाद अंग्रेजों ने इसे वापस प्राप्त करने की योजना बनाई। उन्होंने नवाब को भ्रमित करने के लिए मित्रतापूर्ण पत्र भेजे और व्यापारिक संबंध पुनः स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की, किंतु यह केवल समय प्राप्त करने की रणनीति थी। मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल चार्ल्स वॉटसन के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना बंगाल पहुँची। इस संयुक्त स्थल और नौसैनिक सेना ने कलकत्ता पर आक्रमण किया। कलकत्ता की रक्षा का दायित्व मानिकचंद के पास था, किंतु उसके अंग्रेजों से गुप्त संबंध थे। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने शीघ्र ही कलकत्ता और हुगली पर अधिकार कर लिया।
अलीनगर की संधि (9 फरवरी 1757 ई.)
इस परिस्थिति में सिराजुद्दौला को अंग्रेजों के साथ 9 फरवरी 1757 ई. को अलीनगर की संधि करनी पड़ी। इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को उनकी पुरानी व्यापारिक सुविधाएँ वापस मिल गईं और उन्हें क्षतिपूर्ति के रूप में बड़ी धनराशि प्राप्त हुई। सिराजुद्दौला ने यह संधि कई कारणों से स्वीकार की थी। पहला, उसे अपने दरबार में चल रहे षड्यंत्रों और विश्वासघात की जानकारी हो चुकी थी। दूसरा, वह तत्काल अंग्रेजों से युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। इस संधि से अंग्रेजों की शक्ति और अधिक बढ़ गई तथा उन्हें बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल गया।
चंद्रनगर पर अंग्रेजों का अधिकार
अलीनगर की संधि के बाद यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध प्रारंभ हो गया। अंग्रेजों ने बंगाल में फ्रांसीसी शक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से चंद्रनगर पर आक्रमण किया। इस समय सिराजुद्दौला के सामने कठिन स्थिति थी। यदि वह फ्रांसीसियों की सहायता करता तो अंग्रेजों का विरोध कर सकता था, लेकिन वह स्पष्ट नीति अपनाने में असफल रहा। रॉबर्ट क्लाइव ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए चंद्रनगर पर अधिकार कर लिया। यह घटना सिराजुद्दौला की राजनीतिक कमजोरी और अंग्रेजों की कूटनीतिक सफलता का परिणाम थी। चंद्रनगर की विजय से बंगाल में अंग्रेजों की सबसे बड़ी यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी शक्ति फ्रांसीसी कमजोर हो गई और सिराजुद्दौला संभावित सहायता से वंचित हो गया।
इस प्रकार सिराजुद्दौला ने प्रारंभ में अपनी आंतरिक समस्याओं को नियंत्रित करने और अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति को रोकने का प्रयास किया, किंतु दरबारी षड्यंत्रों, राजनीतिक अनुभव की कमी और अंग्रेजों की कूटनीति के कारण वह सफल नहीं हो सका। इन घटनाओं ने अंततः 1757 ई. के प्लासी युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की, जिसने भारत में अंग्रेजी राजनीतिक प्रभुत्व की नींव रख दी।




