भारत में इस्लाम का आगमन
भारत के मध्यकालीन इतिहास का आरंभ सामान्यतः इस्लाम के आगमन तथा मुस्लिम सत्ता की स्थापना से माना जाता है। इस्लाम केवल एक धर्म ही नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और नैतिक व्यवस्था भी है, जिसने विश्व इतिहास को गहराई से प्रभावित किया है। इस्लाम धर्म के अनुयायी मुसलमान कहलाते हैं। आज इस्लाम विश्व का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है तथा इसके अनुयायी लगभग दो अरब हैं, जो एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका तथा विश्व के लगभग सभी देशों में निवास करते हैं।
इस्लाम धर्म का उद्भव सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब प्रायद्वीप के मक्का नगर में हुआ। उस समय अरब समाज सामाजिक असमानता, जनजातीय संघर्ष, मूर्तिपूजा तथा अनेक धार्मिक एवं सामाजिक कुरीतियों से ग्रस्त था। ऐसे समय में हजरत मुहम्मद ने अल्लाह के एकेश्वरवाद, मानव समानता, न्याय, करुणा, भाईचारे तथा नैतिक जीवन का संदेश दिया। इस्लामी परंपरा के अनुसार वे अल्लाह के अंतिम पैगंबर हैं, जिन पर अल्लाह का पवित्र संदेश कुरआन के रूप में अवतरित हुआ। मुसलमानों की मान्यता है कि कुरआन मानव जीवन के लिए संपूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ है, जो व्यक्ति को नैतिकता, मानवता, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा ईश्वर के प्रति समर्पण का मार्ग दिखाता है।
इस्लाम इब्राहीमी धर्मों की परंपरा से संबंधित है और यह आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, दाऊद, सुलैमान तथा ईसा जैसे पूर्ववर्ती पैगंबरों की शिक्षाओं की निरंतरता एवं पुनर्स्थापना का संदेश देता है। इस्लाम की धार्मिक शिक्षाओं का आधार केवल कुरआन ही नहीं, बल्कि हदीस, सीरत-उन-नबी तथा शरीयत भी हैं, जो मुसलमानों के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। इस्लाम में ईश्वर की एकता (तौहीद), नमाज़, रोज़ा, ज़कात तथा हज को विशेष महत्त्व प्राप्त है और इन्हें इस्लाम के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।
समय के साथ इस्लाम का तीव्र विस्तार हुआ और यह अरब से निकलकर एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप के अनेक क्षेत्रों तक पहुँच गया। व्यापार, सांस्कृतिक संपर्क, सूफी संतों के उपदेश तथा विभिन्न मुस्लिम राजवंशों के माध्यम से इस्लाम का प्रसार भारत सहित अनेक देशों में फैल गया। भारत में इस्लाम का प्रवेश केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं था, बल्कि अरब व्यापारियों, सूफी संतों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भी इसके प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि भारतीय समाज, संस्कृति, कला, स्थापत्य, भाषा तथा साहित्य पर इस्लाम का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है।
इस्लाम के भीतर समय के साथ विभिन्न धार्मिक समुदाय विकसित हुए, जिनमें सुन्नी और शिया प्रमुख हैं, जबकि सूफी परंपरा ने प्रेम, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता के माध्यम से समाज में विशेष स्थान बनाया। मस्जिद इस्लाम का प्रमुख उपासना स्थल है, जहाँ सामूहिक प्रार्थना और धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न होती हैं।
इस प्रकार इस्लाम धर्म का उद्भव केवल एक धार्मिक घटना नहीं था, बल्कि यह विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसने मानव सभ्यता के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विकास को नई दिशा प्रदान की।
पैगंबर मुहम्मद और इस्लाम धर्म की स्थापना
इस्लाम धर्म के संस्थापक एवं प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद थे, जिनका जन्म 570 ई. में अरब के नगर मक्का में कुरैश कबीले के प्रतिष्ठित हाशिमी वंश में हुआ था। उनके पिता अब्दुल्ला का निधन उनके जन्म से पूर्व ही हो गया था, जबकि उनकी माता का नाम आमिना था। बाल्यावस्था में उनका पालन-पोषण पहले उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब तथा उनके निधन के बाद उनके चाचा अबू तालिब ने किया। अबू तालिब एक व्यापारी थे, इसलिए मुहम्मद भी उनके साथ व्यापारिक यात्राओं पर जाते थे। इसी क्रम में उन्होंने सीरिया की यात्रा भी की, जिससे उन्हें विभिन्न समाजों और धार्मिक परंपराओं का ज्ञान प्राप्त हुआ।
पच्चीस वर्ष की आयु में उनका विवाह मक्का की समृद्ध विधवा व्यापारी ख़दीजा से हुआ। विवाह के पश्चात भी उनकी रुचि सांसारिक वैभव की अपेक्षा आध्यात्मिक चिंतन में अधिक रही। वे प्रायः रमज़ान के महीने में मक्का के निकट स्थित हिरा की गुफा में एकांतवास कर ध्यान और मनन किया करते थे। लगभग चालीस वर्ष की आयु में 610 ईस्वी के आसपास उन्हें यहीं ईश्वर (अल्लाह) की ओर से प्रथम ‘दैवीय प्रकाशना’ (वह्य) प्राप्त हुई। उन्होंने घोषणा की कि ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई अन्य ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसके रसूल (पैगंबर) हैं।’ सर्वप्रथम उनकी पत्नी ख़दीजा ने उनके संदेश को स्वीकार किया और इस्लाम की पहली अनुयायी बनीं।

मुहम्मद साहब की शिक्षाएँ
उस समय अरब समाज अनेक कबीलों में विभाजित था और समाज में मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, रक्त-प्रतिशोध, सामाजिक असमानता तथा स्त्रियों की उपेक्षा जैसी कुरीतियाँ व्याप्त थीं। मुहम्मद साहब का उद्देश्य इन बुराइयों का उन्मूलन कर समाज में नैतिकता, समानता, भाईचारे और एकेश्वरवाद की स्थापना करना था। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि समस्त मानव जाति एक ही ईश्वर की संतान है और सभी मनुष्य उसके समक्ष समान हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, अंधविश्वास तथा सामाजिक अन्याय का विरोध किया और सत्य, करुणा, दान, न्याय तथा सदाचार का उपदेश दिया।
उनकी शिक्षाओं का मक्का के अनेक प्रभावशाली लोगों, विशेषकर कुरैश सरदारों ने विरोध किया, क्योंकि इससे उनके सामाजिक और आर्थिक हित प्रभावित हो रहे थे। परिणामस्वरूप 622 ईस्वी में मुहम्मद साहब को मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा। इस घटना को ‘हिजरत’ कहा जाता है और इसी वर्ष से इस्लामी हिजरी संवत् का प्रारंभ माना जाता है। मदीना में उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने विभिन्न कबीलों को संगठित कर एक सुदृढ़ धार्मिक एवं राजनीतिक समुदाय का निर्माण किया। धीरे-धीरे इस्लाम का प्रभाव बढ़ता गया और 630 ईस्वी में उन्होंने बिना व्यापक रक्तपात के मक्का पर अधिकार कर लिया। इसके बाद अरब के अधिकांश कबीलों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। 632 ईस्वी में 63 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, किंतु तब तक इस्लाम संपूर्ण अरब में एक सशक्त धार्मिक एवं सामाजिक शक्ति बन चुका था।
कुरआन और इस्लाम के मूल सिद्धांत
मुहम्मद साहब पर अवतरित दैवी संदेशों का संकलन बाद में ‘कुरआन’ के रूप में किया गया, जो इस्लाम का सर्वोच्च एवं पवित्र धर्मग्रंथ है। कुरआन के अनुसार केवल एक ही ईश्वर (अल्लाह) है, जो संपूर्ण सृष्टि का रचयिता, पालनकर्ता, न्यायाधीश तथा सर्वशक्तिमान है। वह दयालु, कृपालु और सर्वज्ञ है। उसके अतिरिक्त कोई अन्य ईश्वर नहीं है तथा मुहम्मद उसके अंतिम पैगंबर हैं। इस्लाम में ईश्वर की पूर्ण एकता (तौहीद), नैतिक जीवन, न्याय, करुणा तथा उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण पर विशेष बल दिया गया है।
इस्लामी परंपरा में आध्यात्मिक उन्नति के लिए शरीयत (धार्मिक आचरण), तरीक़त (आध्यात्मिक साधना) और हक़ीक़त (सत्य का बोध) जैसे सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है। इनका उद्देश्य मनुष्य के बाह्य एवं आंतरिक जीवन को धर्मानुकूल बनाना है। यद्यपि इन अवधारणाओं का व्यवस्थित विकास आगे चलकर विशेषतः सूफी परंपरा में हुआ, फिर भी इनका आधार इस्लामी आध्यात्मिक विचारधारा में निहित है।
इस्लाम के पाँच अनिवार्य कर्तव्य
इस्लाम धर्म में प्रत्येक मुसलमान के लिए पाँच मूलभूत धार्मिक कर्तव्यों का पालन आवश्यक माना गया है। पहला है कलिमा, अर्थात् यह विश्वास करना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसके पैगंबर हैं। दूसरा है नमाज़, जिसे दिन में पाँच बार—फज्र, ज़ुहर, अस्र, मगरिब और ईशा—अदा करना अनिवार्य माना गया है। तीसरा है ज़कात, जिसके अंतर्गत अपनी आय या संपत्ति का निर्धारित भाग निर्धनों और जरूरतमंदों को दान देना आवश्यक है। चौथा है रोज़ा, जिसे रमज़ान के पवित्र महीने में रखा जाता है। पाँचवाँ है हज, अर्थात् जीवन में सामर्थ्य होने पर कम-से-कम एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करना। ये पाँचों कर्तव्य इस्लामी जीवन-पद्धति के आधार स्तंभ माने जाते हैं और अनुयायियों में अनुशासन, समानता, सेवा तथा आध्यात्मिकता की भावना विकसित करते हैं।

उत्तराधिकार का प्रश्न और सुन्नी-शिया विभाजन
मुहम्मद साहब के निधन के पश्चात उनके उत्तराधिकारी के चयन का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गया। इसी विषय पर मुस्लिम समुदाय में मतभेद उत्पन्न हुए। एक समूह का मत था कि समुदाय द्वारा योग्य व्यक्ति का चयन किया जाना चाहिए। इस मत के आधार पर पैगंबर के निकट सहयोगी और ससुर अबू बक्र को प्रथम खलीफा चुना गया। उनके पश्चात क्रमशः उमर, उस्मान और अली खलीफा बने। इन चारों को इस्लामी इतिहास में ‘राशिदून खलीफा’ अर्थात् ‘सही मार्गदर्शक खलीफा’ कहा जाता है।
दूसरा समूह यह मानता था कि पैगंबर के उत्तराधिकारी उनके निकटतम पारिवारिक सदस्य होने चाहिए। इस कारण उन्होंने पैगंबर के दामाद एवं चचेरे भाई अली को ही वैध उत्तराधिकारी स्वीकार किया। यही मत आगे चलकर शिया संप्रदाय का आधार बना, जबकि अबू बक्र तथा अन्य प्रारंभिक खलीफाओं को स्वीकार करने वाले सुन्नी कहलाए। इस प्रकार उत्तराधिकार के प्रश्न से प्रारंभ हुआ मतभेद धीरे-धीरे धार्मिक एवं राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर गया। यद्यपि दोनों संप्रदायों के बीच उत्तराधिकार तथा कुछ धार्मिक परंपराओं को लेकर मतभेद रहे, फिर भी दोनों का मूल विश्वास इस्लाम, कुरआन तथा पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं में समान रूप से अटूट बना रहा।
भारत में इस्लाम का प्रारंभिक प्रवेश
पैगंबर मुहम्मद के जीवनकाल में ही इस्लाम का प्रसार अरब प्रायद्वीप से बाहर प्रारंभ हो गया था। भारत के साथ अरबों के व्यापारिक संबंध प्राचीन काल से विद्यमान थे। अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाहों, जैसे कोंकण, गुजरात और मालाबार, में नियमित रूप से व्यापार करते थे। समय के साथ अनेक अरब व्यापारी इन क्षेत्रों में स्थायी रूप से बस गए और स्थानीय समाज के साथ उनके घनिष्ठ आर्थिक एवं सांस्कृतिक संबंध स्थापित हुए। इस प्रकार भारत में इस्लाम का प्रारंभिक प्रवेश सैन्य विजय से पहले व्यापार और समुद्री संपर्कों के माध्यम से हुआ।
सिंध विजय और अरबों का राजनीतिक प्रवेश
खलीफा उमर (634–644 ई.) के शासनकाल में अरब साम्राज्य का विस्तार मकरान और सीस्तान तक हो गया। इसी काल में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित थाना पर अरबों ने आक्रमण किया, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। बाद में इराक के शक्तिशाली गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने अपने युवा सेनापति और संबंधी मुहम्मद बिन कासिम को सिंध विजय के लिए भेजा। 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के शासक राजा दाहिर को पराजित कर वहाँ अरब शासन की स्थापना की। सिंध विजय भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के राजनीतिक प्रवेश की महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके परिणामस्वरूप अरबों के लिए भारत के साथ राजनीतिक, व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संपर्कों के नए मार्ग खुल गए।
मुसलमानों का आगमन और सांस्कृतिक प्रभाव
आठवीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक जब उत्तरी भारत में तुर्क सत्ता की स्थापना हुई, तब तक इस्लामी संसार के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक लोग भारत आए। इनमें सैनिक, व्यापारी, विद्वान, शिक्षक, साहित्यकार, कलाकार, सूफी संत तथा शिल्पकार सम्मिलित थे। इन लोगों ने भारत के विभिन्न भागों में बसकर स्थानीय समाज के साथ व्यापक संपर्क स्थापित किए। उनके आगमन से भारतीय राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और भारत तथा इस्लामी जगत के बीच विचारों एवं परंपराओं का आदान-प्रदान हुआ।
पश्चिमी भारत में मुस्लिम बस्तियों का विकास
सिंध विजय के बाद अगले तीन शताब्दियों में मुसलमान केवल सिंध और मुल्तान तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि गुजरात, काठियावाड़, कोंकण तथा पश्चिमी समुद्री तटीय क्षेत्रों में भी उनकी बस्तियाँ स्थापित हुईं। कुछ मुस्लिम व्यापारी और यात्री मालवा तथा कन्नौज तक पहुँचे। काबुल, भड़ौच (भरूच), खंभात, चौल तथा अन्य व्यापारिक केंद्रों में मस्जिदों का निर्माण हुआ और मुस्लिम समुदाय संगठित रूप से बसने लगा। अनेक भारतीय शासकों ने व्यापारिक हितों तथा सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से मुसलमानों के प्रति उदार नीति अपनाई। गुजरात के चालुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह (1094–1143 ई.) के विषय में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने एक क्षतिग्रस्त मस्जिद के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की। अनेक हिंदू शासकों ने मुस्लिम सैनिकों और अधिकारियों को अपनी सेनाओं में भी स्थान दिया।
सूफी संतों का आगमन और इस्लाम का प्रसार
ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में अनेक सूफी संत भारत आए, जिन्होंने प्रेम, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता के माध्यम से इस्लाम के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध सूफी संत अली हुजवेरी (दाता गंज बख्श) गजनी से लाहौर आए और वहीं रहकर अपनी प्रसिद्ध कृति ‘कश्फ़-उल-महजूब’ की रचना की। इसी प्रकार शेख इस्माइल बुखारी तथा अन्य सूफी संतों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया। 1192 ईस्वी के आसपास ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेर पहुँचे और चिश्ती सिलसिले के माध्यम से भारतीय समाज में प्रेम, सेवा और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश फैलाया। सूफी आंदोलन ने भारतीय समाज में हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय को प्रोत्साहित किया तथा इस्लाम के शांतिपूर्ण प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।




