क्लॉडियस (1 अगस्त 10 ई.पू.–13 अक्टूबर 54 ई.)
क्लॉडियस, जिसका आधिकारिक नाम टाइबेरियस क्लॉडियस सीज़र ऑगस्टस जर्मेनिकस (Tiberius Claudius Caesar Augustus Germanicus) था, जूलियो-क्लॉडियन वंश का चौथा रोमन सम्राट था। उसने 41 ईस्वी से 54 ईस्वी तक शासन किया। 41 ईस्वी में रोमन सम्राट गायस जूलियस सीज़र (कैलिगुला) की मृत्यु के बाद प्रेटोरियन गार्ड ने क्लॉडियस को रोमन सम्राट घोषित किया। यद्यपि उसका सम्राट बनना अप्रत्याशित था, फिर भी उसने अपनी प्रशासनिक दक्षता, दूरदर्शिता और परिश्रम के बल पर स्वयं को एक सफल तथा प्रभावशाली शासक सिद्ध किया।
क्लॉडियस के शासनकाल में रोमन साम्राज्य ने उल्लेखनीय प्रशासनिक तथा सैन्य उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। उसने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और 43 ईस्वी में ब्रिटेन (ब्रिटानिया) पर सफल आक्रमण कर उसके एक बड़े भाग को रोमन साम्राज्य का आधिकारिक प्रांत बना दिया। उसने केंद्रीय प्रशासन का पुनर्गठन किया, अनेक प्रांतों के निवासियों को रोमन नागरिकता प्रदान की तथा मुक्तदासों को प्रशासन में महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व प्रदान किया। इसके अतिरिक्त, उसने कैलिगुला के शासनकाल में बिगड़ी हुई आर्थिक व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया और अनेक सड़कों, नहरों, पुलों तथा जलसेतुओं का निर्माण कराया। उसने पोर्टस नामक विशाल कृत्रिम बंदरगाह का निर्माण भी करवाया।
रोमन परंपरा के अनुसार क्लॉडियस का नाम उसके जीवन के विभिन्न चरणों में परिवर्तित होता रहा। जन्म के समय उसका नाम टाइबेरियस क्लॉडियस ड्रूसस था। ‘ड्रूसस’ नाम उसे अपने पिता नीरो क्लॉडियस ड्रूसस से प्राप्त हुआ था। 41 ईस्वी में सम्राट बनने के बाद उसने शाही उपाधियाँ धारण कीं और उसका आधिकारिक नाम ‘टाइबेरियस क्लॉडियस सीज़र ऑगस्टस जर्मेनिकस’ हो गया। वह स्वयं को अपने पिता ड्रूसस तथा अपने बड़े भाई जर्मेनिकस की वीर परंपरा का उत्तराधिकारी मानता था। इसी कारण उसने अपने अनेक अभिलेखों में ‘ड्रूसस का पुत्र’ (फिलियस ड्रूसी) शब्दों का प्रयोग किया।
प्राचीन रोमन इतिहासकारों ने क्लॉडियस का चित्रण प्रायः एक दुर्बल, संकोची तथा दूसरों के प्रभाव में रहने वाले शासक के रूप में किया है। इसके विपरीत, आधुनिक इतिहासकार उसे एक परिश्रमी, व्यावहारिक, दूरदर्शी तथा योग्य प्रशासक मानते हैं।
प्रारंभिक जीवन
क्लॉडियस का जन्म 1 अगस्त 10 ईसा पूर्व में लुग्डुनम (ल्योन, फ्रांस) में हुआ था, जहाँ उसके पिता नीरो क्लॉडियस ड्रूसस रोमन सेना के सेनानायक के रूप में तैनात थे। इस प्रकार क्लॉडियस इटली के बाहर जन्म लेने वाला प्रथम रोमन सम्राट था। उसकी माता छोटी एंटोनिया (एंटोनिया माइनर) थी, उसका बड़े भाई जर्मैनिकस और बड़ी बहन लिविल्ला थी।
क्लॉडियस रोम के सबसे प्रतिष्ठित परिवार से संबंधित था क्योंकि उसके नाना प्रसिद्ध रोमन सेनापति मार्क एंटनी तथा नानी ऑक्टेविया माइनर थी, जो सम्राट ऑगस्टस की बहन थी। उसके दादा टाइबेरियस क्लॉडियस नीरो तथा दादी लिविया ड्रुसिला थी, जो बाद में सम्राट ऑगस्टस की रानी बनी।
9 ईसा पूर्व में जर्मनी के सैन्य अभियान के दौरान घोड़े से गिरने के कारण उसके पिता ड्रूसस की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी माता एंटोनिया ने उसका पालन-पोषण किया और जीवन भर पुनर्विवाह नहीं किया।
क्लॉडियस बचपन में दुर्बल स्वास्थ्य, शारीरिक विकलांगता, कम आकर्षक व्यक्तित्व तथा असामान्य व्यवहार के कारण उसे सार्वजनिक जीवन के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था और शाही परिवार उसे प्रायः उपेक्षा की दृष्टि से देखता था। उसकी शारीरिक दुर्बलता के कारण उसकी माता उसे मूर्ख और अयोग्य समझती थीं तथा कभी-कभी उसे ‘प्रकृति की अधूरी रचना’ तक कहती थी। उसकी दादी लिविया भी उसके प्रति विशेष स्नेह नहीं रखती थी। वास्तव में, परिवार के अधिकांश सदस्य यह मानते थे कि उसकी शारीरिक समस्याएँ आलस्य अथवा इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम हैं।
आयु बढ़ने के साथ क्लॉडियस की शारीरिक समस्याएँ कुछ कम हुईं। इसके बाद परिवार ने उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता को पहचानना आरंभ किया। 7 ईस्वी में प्रसिद्ध इतिहासकार लिवी ने उसकी विद्वत्ता और इतिहास के प्रति उसकी गहरी रुचि को पहचानकर उसे प्रोत्साहित किया। उसने विद्वान सुल्पिसियस फ्लेवस तथा दार्शनिक एथेनोडोरस से भी अध्ययन किया। इतिहास, साहित्य, दर्शन तथा वक्तृत्व-कला में उसने उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त की। सम्राट ऑगस्टस भी उसकी स्पष्ट एवं प्रभावशाली वक्तृत्व शैली से प्रभावित था।
क्लॉडियस ने प्रारंभ में इतिहास-लेखन को अपना प्रमुख कार्य बनाया। उसने रोमन गृहयुद्धों का इतिहास लिखना आरंभ किया, किंतु उसमें प्रस्तुत विचार तत्कालीन शासक ऑगस्टस को पसंद नहीं आए। उसकी माता और दादी ने भी उसे इस विषय पर लिखने से रोक दिया। बाद में जब उसने अपने इतिहास का पुनर्लेखन किया, तब उसने द्वितीय त्रिमूर्व (सेकेंड ट्रायम्विरेट) के गृहयुद्धों का उल्लेख लगभग छोड़ दिया। इसके बावजूद उसे लंबे समय तक सार्वजनिक पदों से दूर रखा गया और किसी महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर नियुक्त नहीं किया गया। 8 ईस्वी में इटली के पाविया में स्थित विजय-द्वार पर जूलियो-क्लॉडियन परिवार के सदस्यों के अंकित नामों में क्लॉडियस का नाम गौण स्थान पर रखा गया, जिससे स्पष्ट होता है कि शाही परिवार में उसकी स्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं थी।
14 ईस्वी में ऑगस्टस की मृत्यु के बाद क्लॉडियस ने अपने चाचा एवं नए सम्राट टाइबेरियस से सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति की अनुमति माँगी। किंतु टाइबेरियस ने उसे केवल कौंसल के सम्मानसूचक अलंकरण प्रदान किया और वास्तविक प्रशासनिक पद देने से इनकार कर दिया, जिससे निराश होकर क्लॉडियस पुनः अध्ययन एवं लेखन में लग गया।
यद्यपि शाही परिवार क्लॉडियस की उपेक्षा करता था, परंतु रोमन जनता उसके प्रति सम्मान रखती थी। रोमन अश्वारोही वर्ग ने उसे अपने प्रतिनिधिमंडल का नेता चुना। जब उसका निवास अग्निकांड में नष्ट हो गया, तब सीनेट ने सार्वजनिक धन से उसके पुनर्निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा। साथ ही यह भी प्रस्तावित किया कि उसे सीनेट में वाद-विवाद करने का अधिकार दिया जाए, किंतु टाइबेरियस ने दोनों प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
टाइबेरियस के पुत्र ड्रूसस द यंगर की मृत्यु के पश्चात कुछ लोग क्लॉडियस को संभावित उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किए, परंतु प्रेटोरियन गार्ड के प्रमुख सेजानुस के प्रभाव के कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका।
सार्वजनिक जीवन
37 ईस्वी में जब उसका भतीजा गायस (कैलिगुला) सम्राट बना, तो उसने क्लॉडियस को अपना सह-कौंसल नियुक्त किया, जो उसका पहला प्रमुख सार्वजनिक पद था। किंतु दोनों के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे, क्योंकि कैलिगुला अपने चाचा का निरंतर उपहास उड़ाता, उससे भारी धनराशि वसूलता, सार्वजनिक रूप से उनका अपमान करता तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था। यह विडंबना ही है कि यही उपेक्षित एवं तिरस्कृत व्यक्ति 41 ईस्वी में कैलिगुला की हत्या के बाद रोमन साम्राज्य का सम्राट बन गया और उसने अपने प्रशासनिक कौशल से यह सिद्ध कर दिया कि वह रोमन इतिहास के सबसे सफल शासकों में से एक था।
कैलिगुला की हत्या
एक सुव्यवस्थित षड्यंत्र के तहत 24 जनवरी 41 ईस्वी को रोमन सम्राट कैलिगुला की हत्या कर दी गई। इस षड्यंत्र का नेतृत्व प्रेटोरियन गार्ड के सैन्य ट्रिब्यून कैसियस कैरेआ ने किया, जिसमें कुछ असंतुष्ट सीनेटर भी सम्मिलित थे। इस षड्यंत्र में क्लॉडियस की प्रत्यक्ष संलिप्तता का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। यद्यपि कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि संभवतः उसे षड्यंत्र की पूर्व जानकारी थी, क्योंकि हत्या से कुछ समय पहले वह घटनास्थल पर मौजूद था। कैलिगुला की हत्या के बाद उसकी चौथी और अंतिम पत्नी कैसोनिया तथा उसकी पुत्री जूलिया ड्रुसिला की भी हत्या कर दी गई। इससे स्पष्ट है कि षड्यंत्रकारियों का उद्देश्य केवल कैलिगुला को हटाना नहीं, बल्कि संपूर्ण शाही परिवार का अंत करना था।
क्लॉडियस रोमन सम्राट (41-54 ई.)
कैलिगुला की हत्या के बाद रोम में भारी अराजकता फैल गई। जर्मनिक अंगरक्षकों ने कई ऐसे कुलीनों की भी हत्या कर दी, जिनका इस षड्यंत्र से कोई लेना-देना नहीं था। इस विषम परिस्थिति में क्लॉडियस अपनी जान बचाने के लिए राजमहल के एक कोने में छिप गया। प्रेटोरियन गार्ड (शाही अंगरक्षक सेना) के एक सैनिक ग्राटस ने महल के एक पर्दे के पीछे काँपते हुए क्लॉडियस को देख लिया और उसे 25 जनवरी 41 ईस्वी को सम्राट (प्रिंसेप्स) घोषित कर दिया। इसके बाद प्रेटोरियन सैनिक उसे सुरक्षित रूप से अपने शिविर में ले गए और उसकी सुरक्षा की व्यवस्था किए।
कैलिगुला की मृत्यु के बाद सीनेट की बैठक बुलाई गई। प्रारंभ में अनेक सीनेटर गणतांत्रिक शासन की पुनर्स्थापना के पक्षधर थे, जबकि कुछ नए सम्राट के चुनाव के पक्ष में थे। किंतु जब उन्हें ज्ञात हुआ कि प्रेटोरियन गार्ड क्लॉडियस को सम्राट घोषित कर चुका है, तब उन्होंने क्लॉडियस को सीनेट के समक्ष प्रस्तुत करने की माँग की। संभवतः जूडिया के राजा हेरोड एग्रीपा प्रथम की मध्यस्थता से क्लॉडियस तथा सीनेट के बीच समझौता हो गया और अंततः सीनेट ने क्लॉडियस को वैध रोमन सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया।
सम्राट बनने के बाद क्लॉडियस ने अधिकांश षड्यंत्रकारियों को क्षमादान दे दिया, किंतु प्रमुख हत्यारों—कैसियस कैरिया तथा जूलियस लूपस को मृत्युदंड दिया। इस कठोर कार्रवाई का उद्देश्य अपनी सत्ता को सुरक्षित करना तथा भविष्य के षड्यंत्रकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी देना था
प्रेटोरियन गार्ड और सैन्य पुरस्कार
क्लॉडियस रोमन इतिहास का पहला ऐसा सम्राट था, जिसे सीनेट ने नहीं, बल्कि प्रेटोरियन गार्ड ने सम्राट घोषित किया था। यही कारण है कि अनेक प्राचीन लेखकों, विशेषकर सेनेका ने उसकी आलोचना की और उस पर गंभीर आरोप लगाया है कि उसने सेना की निष्ठा खरीदने के लिए सैनिकों को धनराशि प्रदान की थी।
वास्तव में, क्लॉडियस ने प्रत्येक प्रेटोरियन सैनिक को 15,000 सेस्टर्स का विशेष पुरस्कार (डोनैटिव) प्रदान किया। यद्यपि बाद के कुछ लेखकों ने इसे रिश्वत की संज्ञा दी, किंतु रोमन परंपरा में नए सम्राट द्वारा सेना को दान या पुरस्कार देना कोई असामान्य बात नहीं थी। ऑगस्टस तथा टाइबेरियस भी अपनी वसीयतों में सैनिकों के लिए धनराशि छोड़ गए थे और कैलिगुला की मृत्यु के बाद भी सैनिकों को ऐसे पुरस्कार की अपेक्षा थी।
प्रेटोरियन गार्ड के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए क्लॉडियस ने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में विशेष सिक्के भी जारी करवाए, जिन पर उसके सम्राट बनने में प्रेटोरियन गार्ड की भूमिका का उल्लेख किया गया था।
सम्राट के रूप में क्लॉडियस
सम्राट बनने के पश्चात् क्लॉडियस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपने शासन की वैधता स्थापित करना थी। उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वह जूलियो-क्लॉडियन राजवंश का वैध उत्तराधिकारी है और उसका शासन केवल प्रेटोरियन गार्ड के समर्थन पर आधारित नहीं है। इसी उद्देश्य से उसने अपने राजकीय नाम के साथ ‘सीज़र’ तथा ‘ऑगस्टस’ जैसी शाही उपाधियाँ धारण कीं। साथ ही, अपने पिता और बड़े भाई की सैन्य कीर्ति से स्वयं को संबद्ध रखने के लिए उसने ‘जर्मेनिकस’ की उपाधि भी यथावत् बनाए रखी।
अपने अभिलेखों तथा राजकीय घोषणाओं में वह अनेक बार स्वयं को ‘फिलियुस ड्रूसी’ (ड्रूसस का पुत्र) कहता था, जिससे उसकी प्रजा के मन में उसके विख्यात पिता की स्मृति बनी रहे। क्लॉडियस ने यह धारणा भी प्रचारित कराई कि उसके पिता ड्रूसस वास्तव में ऑगस्टस के जैविक पुत्र थे। यद्यपि इस दावे के समर्थन में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तथापि इसके माध्यम से वह अपने शासन की वैधता को और अधिक सुदृढ़ करना चाहता था।
क्लॉडियस ने मिस्र के शासक के रूप में वहाँ के फ़राओओं की परंपरागत राजकीय उपाधियाँ भी धारण कीं, ताकि मिस्र की प्रजा के मध्य उसके शासन की वैधता तथा स्वीकृति स्थापित हो सके।
सीनेट के साथ संबंध
क्लॉडियस भली-भाँति जानता था कि उसका राज्यारोहण असाधारण परिस्थितियों में हुआ था। पारिवारिक परंपरा के अनुसार उसने अपने शासन के प्रारंभ से ही सीनेट के साथ सहयोगपूर्ण और सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। वह नियमित रूप से सीनेट की बैठकों में उपस्थित होता था तथा अन्य सदस्यों के समान बैठकर विचार-विमर्श में भाग लेता था। विधेयकों पर चर्चा के समय भी वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहता और सीनेटरों के विचार ध्यानपूर्वक सुनता था। उसने यह स्पष्ट किया कि सीनेट केवल एक औपचारिक संस्था न रहकर स्वतंत्र रूप से अपने विचार व्यक्त करे।
एक अवसर पर उसने सीनेटरों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे किसी प्रस्ताव से सहमत हों तो उसका स्पष्ट समर्थन करें और यदि असहमत हों तो उसका उपयुक्त विकल्प प्रस्तुत करें। उसके मत में सीनेट की गरिमा तभी अक्षुण्ण रह सकती है, जब उसके सदस्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपने विचार व्यक्त करें।
यद्यपि क्लॉडियस सीनेटरों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखता था, तथापि उसके वास्तविक समर्थक सैनिक और दरबारी थे। इसके अतिरिक्त, वे मुक्तदास भी उसके विश्वस्त सहयोगी थे, जिन्होंने उपेक्षा के दिनों में उसका साथ दिया था। प्रारंभ में सीनेट का रवैया स्पष्ट नहीं था, क्योंकि 42 ईस्वी में अनेक सीनेटरों ने डेल्मेटिया के गवर्नर के असफल विद्रोह का समर्थन किया था। इसके बाद भी क्लॉडियस की हत्या के अनेक षड्यंत्रों में सीनेटरों तथा अश्वारोही वर्ग (इक्वेस्ट्रियन वर्ग) के सदस्य सम्मिलित थे।
सेंसर के रूप में सुधार
47 ईस्वी में क्लॉडियस ने लूसियस विटेलियस के साथ सेंसर का पद ग्रहण किया और अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार लागू किए। उसने अपने पूर्वज एपियस क्लॉडियस कैकस को आदर्श मानते हुए इस पद की पारंपरिक शक्तियों का सक्रिय उपयोग किया। इस पद पर रहते हुए उसने सीनेट की सदस्यता की व्यापक समीक्षा की, अयोग्य सीनेटरों तथा अश्वारोही (इक्वेस्ट्रियन) वर्ग के सदस्यों को पद से हटा दिया और योग्य व्यक्तियों को उसमें सम्मिलित किया। वास्तव में, क्लॉडियस का उद्देश्य केवल अयोग्य सदस्यों को हटाना ही नहीं था, बल्कि सीनेट को अधिक प्रतिनिधिक और सक्षम संस्था बनाना भी था। इसी उद्देश्य से उसने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के योग्य एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी सीनेट की सदस्यता प्रदान करने का समर्थन किया।
गॉल के निवासियों को सीनेट में स्थान
क्लॉडियस का सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार गॉल, विशेषकर गालिया कोमाता के नागरिकों को सीनेट की सदस्यता प्रदान करने का निर्णय था। इस विषय पर उसका प्रसिद्ध भाषण ‘ल्योन टैबलेट’ पर आज भी सुरक्षित है। अपने भाषण में उसने कहा कि रोमन राज्य की शक्ति सदैव नए और योग्य व्यक्तियों को अपनाने की नीति में निहित रही है। उसने यह भी स्मरण कराया कि अतीत में रोम ने इटली के बाहर के अनेक व्यक्तियों को भी उच्च पदों पर आसीन किया था। यद्यपि इस निर्णय का अनेक परंपरावादी सीनेटरों ने विरोध किया, तथापि क्लॉडियस अपने निर्णय पर अडिग रहा और उसने प्रांतीय अभिजात वर्ग को रोमन शासन में अधिक व्यापक भागीदारी प्रदान की।
प्रशासनिक सुधार और मुक्तदासों की भूमिका
क्लॉडियस के शासनकाल में सम्राट की शक्तियाँ अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई थीं। उसने अनुभव किया कि केवल सीनेट के माध्यम से विशाल रोमन साम्राज्य का प्रभावी एवं सुचारु प्रशासन संभव नहीं है। इसलिए उसने प्रशासन के विभिन्न विभागों का पुनर्गठन किया और साम्राज्य के वित्त, कर-व्यवस्था, न्याय तथा राजस्व से संबंधित अनेक विभागों का दायित्व प्रशिक्षित, अनुभवी तथा प्रशासनिक दृष्टि से दक्ष अधिकारियों और मुक्तदासों को सौंप दिया, जो सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी थे। इसी प्रकार ओस्टिया बंदरगाह के विकास के उपरांत उसका प्रशासन भी एक शाही प्रोक्यूरेटर के अधीन कर दिया गया।
नार्सिसस को राजकीय पत्राचार विभाग का प्रमुख नियुक्त किया गया। पैलास को राजकोष तथा वित्त विभाग का दायित्व सौंपा गया। कैलिस्टस को न्याय एवं विधिक मामलों का प्रधान बनाया गया, जबकि विविध प्रशासनिक कार्यों का दायित्व पॉलीबियस को दिया गया। बाद में राजद्रोह के आरोप में पॉलीबियस को मृत्युदंड दे दिया गया।
इन अधिकारियों को सम्राट की ओर से आदेश जारी करने तथा आवश्यकता पड़ने पर सार्वजनिक रूप से उसका प्रतिनिधित्व करने का अधिकार भी प्राप्त था। ब्रिटेन अभियान से पूर्व नार्सिसस ने क्लॉडियस की ओर से सैनिकों को संबोधित किया था। इससे स्पष्ट होता है कि शाही सचिवालय केवल एक औपचारिक संस्था न रहकर शासन-प्रशासन का अत्यंत प्रभावशाली अंग बन चुका था।
इन सुधारों के परिणामस्वरूप प्रशासन अधिक संगठित, प्रभावी और कार्यकुशल बन गया, किंतु मुक्तदासों को इतने महत्त्वपूर्ण पद दिए जाने से रोमन सीनेट तथा कुलीन वर्ग में असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था। अनेक सीनेटरों का आरोप था कि पूर्व दासों के हाथों में वित्त, न्याय तथा प्रशासन जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग सौंप दिए जाने से उनकी शक्ति अत्यधिक बढ़ गई है और वे भविष्य में सम्राट के लिए भी संकट का कारण बन सकते हैं। सीनेटरों का यही असंतोष कालांतर में क्लॉडियस के विरुद्ध राजनीतिक षड्यंत्रों का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुआ।
क्लॉडियस अपने सहयोगियों की सेवाओं का सम्मान करता था तथा अनेक प्रशासनिक निर्णयों का श्रेय भी उन्हें देता था। परंतु यदि कोई अधिकारी विश्वासघात करता, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था। इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण पॉलीबियस है। उपलब्ध प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मुक्तदास अधिकारियों ने अपने प्रभाव के कारण अत्यधिक धन-संपत्ति अर्जित की, फिर भी क्लॉडियस की नीतियों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ और प्रशासनिक व्यवस्था पर क्लॉडियस का अंतिम नियंत्रण बना रहा।
रोमन साम्राज्य का विस्तार
क्लॉडियस के शासनकाल में रोमन साम्राज्य का उल्लेखनीय विस्तार हुआ। 48 ईस्वी में कराई गई जनगणना के अनुसार लगभग 59,84,072 वयस्क पुरुष रोमन नागरिक थे। इस गणना में महिलाओं, बच्चों, दासों तथा गैर-नागरिकों को सम्मिलित नहीं किया गया था। ऑगस्टस के शासनकाल की तुलना में यह संख्या लगभग दस लाख अधिक थी, जो रोमन नागरिकता के निरंतर विस्तार तथा साम्राज्य की बढ़ती जनसंख्या का द्योतक है।
क्लॉडियस ने अनेक नए रोमन उपनिवेशों की स्थापना की और उनके निवासियों को पूर्ण रोमन नागरिकता प्रदान की। इनमें से अधिकांश उपनिवेश साम्राज्य की सीमाओं अथवा नव-विजित प्रदेशों में स्थापित किए गए थे। इससे एक ओर सीमाओं की सुरक्षा सुदृढ़ हुई, तो दूसरी ओर रोमन संस्कृति, प्रशासन तथा नागरिक संस्थाओं का तीव्र प्रसार भी संभव हुआ।
क्लॉडियस ने साम्राज्य की क्षेत्रीय सीमाओं का भी व्यापक विस्तार किया। उत्तरी अफ़्रीका में उसने 41–42 ईस्वी के दौरान मॉरिटानिया का पूर्ण विलय कर कैलिगुला के शासनकाल में आरंभ हुई इस प्रक्रिया को पूरा किया। इसके पश्चात् मॉरिटानिया को दो प्रांतों—मॉरिटानिया कैसारिएन्सिस तथा मॉरिटानिया टिंगिटाना में विभाजित कर दिया गया।
इसी प्रकार पश्चिमी एवं पूर्वी क्षेत्रों में भी अनेक प्रदेशों को रोमन साम्राज्य में सम्मिलित किया गया। एशिया माइनर का लिसिया (43 ईस्वी) तथा थ्रेस (46 ईस्वी) प्रत्यक्ष रूप से रोमन प्रशासन के अधीन लाए गए। यद्यपि क्लॉडियस ने हेरोद एग्रीपा प्रथम के राज्य का विस्तार किया, किंतु 44 ईस्वी में उसकी मृत्यु के उपरांत जूदिया को पुनः रोमन प्रांत बना दिया गया। 49 ईस्वी में इटुरिया (उत्तर-पूर्वी फिलिस्तीन) को भी सीरिया प्रांत में मिला दिया गया।
क्लॉडियस ने अपनी विदेश नीति में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया और साम्राज्य को जर्मनिक जनजातियों तथा पार्थियनों के साथ अनावश्यक एवं व्यापक युद्धों में उलझने से बचाए रखा। उसने आर्मेनिया पर रोमन प्रभाव बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु 52 ईस्वी में वहाँ रोम-समर्थक शासन के पतन के बाद भी पार्थिया के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के स्थान पर कूटनीतिक संयम को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप आर्मेनिया का प्रश्न उसके उत्तराधिकारी के लिए एक जटिल राजनीतिक चुनौती बन गया।
इस प्रकार क्लॉडियस के शासनकाल में मॉरिटानिया, थ्रेस, नोरिकम, लिसिया, जूदिया तथा इटुरिया जैसे अनेक क्षेत्र प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से रोमन प्रशासन के अधीन लाए गए। इन विजयों और प्रशासनिक पुनर्गठन ने न केवल रोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया, बल्कि उसकी प्रशासनिक एकता, सामरिक सुरक्षा तथा राजनीतिक स्थिरता को भी उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया।
ब्रिटेन की विजय
क्लॉडियस की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सैन्य उपलब्धि ब्रिटेन की विजय थी। 43 ईस्वी में एक मित्र-शासक की सहायता-याचना पर उसने सेनापति ऑलस प्लॉटियस के नेतृत्व में चार रोमन लीजनों को ब्रिटेन भेजा।
ब्रिटेन रोमन साम्राज्य के लिए आर्थिक एवं सामरिक—दोनों दृष्टियों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। वहाँ ताँबा, सीसा, टिन तथा अन्य धातुओं की प्रचुर खदानें थीं। साथ ही वह गॉल के विद्रोहियों का सुरक्षित आश्रय-स्थल भी बन चुका था। प्रारंभिक सफलताओं के पश्चात् स्वयं क्लॉडियस स्वयं अतिरिक्त सेना लेकर ब्रिटेन पहुँचा और अभियान का नेतृत्व किया।
क्लॉडियस ने ब्रिटेन के प्रमुख नगर कैमुलोडुनम (कोलचेस्टर) को रोमन उपनिवेश का दर्जा प्रदान किया तथा वहाँ सेवानिवृत्त सैनिकों की एक बस्ती बसाई। उसने प्रांत की सीमाओं की सुरक्षा के लिए अनेक सहयोगी राज्यों (क्लाइंट-किंगडम) की स्थापना की। यद्यपि ये राज्य प्रारंभ में रोमन शासन के लिए उपयोगी सिद्ध हुए, किंतु बाद में अनेक समस्याओं का कारण बने। 47 ईस्वी में आइसिनी जनजाति के सहयोगी राजा प्रसुतागस ने विद्रोह कर दिया तथा उसके पश्चात् उसकी पत्नी बौडिका के नेतृत्व में व्यापक जनविद्रोह भड़क उठा।
ब्रिटेन में लगभग सोलह दिन व्यतीत करने के पश्चात् क्लॉडियस रोम लौट आया। इस विजय के उपलक्ष्य में रोमन सीनेट ने उसे ‘विजय-यात्रा’ (ट्रायम्फ) का सर्वोच्च सैन्य सम्मान प्रदान किया। साथ ही उसे ‘ब्रिटैनिकस’ की सम्मानसूचक उपाधि भी प्रदान की गई। यद्यपि बाद में यह उपाधि उसके पुत्र ब्रिटैनिकस के साथ इतनी घनिष्ठ रूप से जुड़ गई कि इतिहास में वह इसी नाम से प्रसिद्ध हो गया।
50 ईस्वी में ब्रिटिश प्रतिरोध के प्रमुख नेता तथा कैटुवेलाउनी जनजातीय संघ के नायक काराटाकस को बंदी बनाकर रोम लाया गया। क्लॉडियस ने उसे क्षमादान प्रदान किया तथा रोमन संरक्षण में जीवन-यापन की अनुमति दी। किसी पराजित शत्रु सेनानायक के प्रति प्रदर्शित यह उदारता रोमन इतिहास का एक असाधारण उदाहरण है।
लोक-निर्माण एवं सार्वजनिक कल्याण
क्लॉडियस के शासनकाल में रोम में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को नई गति मिली। उसने सड़कों, जलसेतुओं, बंदरगाहों तथा अन्य सार्वजनिक भवनों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार पर विशेष ध्यान दिया। उसने रोम के लिए दो विशाल जलसेतुओं—एक्वा क्लाउडिया तथा एक्वा एनियो नोवुस का निर्माण पूर्ण कराया। इनमें से एक्वा क्लॉडिया का निर्माण सम्राट कैलिगुला के शासनकाल में आरंभ हुआ था, जिसे क्लॉडियस ने 52 ईस्वी में पूरा कराया। इसके अतिरिक्त उसने एक्वा विरगो का भी व्यापक जीर्णोद्धार कराया, जिससे राजधानी की जलापूर्ति और अधिक सुदृढ़ हुई।
क्लॉडियस ने परिवहन व्यवस्था के विकास को भी विशेष महत्त्व दिया। उसने इटली तथा विभिन्न प्रान्तों में अनेक सड़कों, नहरों और बंदरगाहों का निर्माण कराया। राइन नदी को समुद्र से जोड़ने वाली नहर तथा इटली और जर्मनी को जोड़ने वाले मार्ग का विकास भी इसी नीति का अंग था।
रोम की खाद्यान्न-समस्या के स्थायी समाधान के लिए उसने ओस्टिया के उत्तर में पोर्टस नामक एक विशाल कृत्रिम बंदरगाह का निर्माण कराया। इस बंदरगाह में दो विशाल जलरोधक बाँधों एवं एक प्रकाशस्तंभ का निर्माण किया गया, जिससे समुद्री व्यापार अधिक सुरक्षित, सुगम और नियमित हो गया तथा रोम को अनाज की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई।
अनाज की नियमित उपलब्धता बनाए रखने के उद्देश्य से क्लॉडियस ने समुद्री व्यापारियों को अनेक विशेष सुविधाएँ प्रदान कीं। उसने प्रतिकूल मौसम में मिस्र से अनाज लाने वाले जहाज़ों का राजकीय बीमा कराया, व्यापारियों को रोमन नागरिकता प्रदान की तथा उन पर लगाए गए कुछ करों को समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त, अकाल अथवा सूखे से प्रभावित क्षेत्रों को करों में विशेष रियायतें भी प्रदान की गईं।
इटली की कृषि-योग्य भूमि का विस्तार करने के उद्देश्य से क्लॉडियस ने फ्यूसीन झील का जल निकालने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना प्रारंभ की। इसके लिए झील से जल निकासी हेतु एक विशाल सुरंग का निर्माण कराया गया। यद्यपि तकनीकी कठिनाइयों के कारण यह योजना तत्काल सफल नहीं हो सकी और उद्घाटन समारोह के समय अप्रत्याशित रूप से बाढ़ आ गई, फिर भी यह प्राचीन रोम की सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी अभियांत्रिक परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। अंततः उन्नीसवीं शताब्दी में आधुनिक तकनीक की सहायता से इस योजना को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
धार्मिक नीति
क्लॉडियस धर्म तथा पारंपरिक रोमन आस्थाओं का प्रबल समर्थक था। उसने ऑगस्टस द्वारा किए गए धार्मिक सुधारों का गहन अध्ययन किया था और अपने शासनकाल में स्वयं भी अनेक धार्मिक सुधार लागू किए।
अलेक्ज़ान्द्रिया के यूनानियों द्वारा अपने सम्मान में मंदिर निर्माण के प्रस्ताव को उसने अस्वीकार कर दिया। उसका मत था कि किसी जीवित व्यक्ति की देवता के रूप में पूजा करना उचित नहीं है तथा किसी नए देवता की मान्यता केवल देवताओं की इच्छा से ही प्राप्त हो सकती है।
क्लॉडियस ने कैलिगुला द्वारा प्रारंभ किए गए अनेक अनावश्यक धार्मिक अनुष्ठानों को समाप्त कर दिया और प्राचीन रोमन धार्मिक परंपराओं के पुनरुद्धार का प्रयास किया। इसके साथ ही उसने प्राचीन लैटिन धार्मिक विधियों एवं वैदिक-स्वरूप के पारंपरिक अनुष्ठानों (रोमन संदर्भ में) को पुनः प्रतिष्ठित किया।
पूर्वी रहस्य-संप्रदायों के तीव्र प्रसार से क्लॉडियस चिंतित था। उसने यूनानी एल्यूसिनियन रहस्य-संप्रदाय को संरक्षण प्रदान किया, विदेशी ज्योतिषियों को रोम से निष्कासित किया तथा पारंपरिक रोमन भविष्यवक्ताओं की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की।
उसने विशेष रूप से ड्रुइड धर्म पर कठोर प्रतिबंध लगाए, क्योंकि उसके मत में यह रोमन राज्य-धर्म तथा साम्राज्य की राजनीतिक एकता के लिए हानिकारक था।
न्यायिक एवं विधिक सुधार
क्लॉडियस न्यायिक मामलों में विशेष रुचि लेता था और अनेक वादों की सुनवाई स्वयं करता था। यद्यपि कुछ प्राचीन इतिहासकारों ने उसके निर्णयों की आलोचना की है, तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि उसने न्याय-व्यवस्था को अधिक प्रभावी, व्यवस्थित तथा सुगम बनाने का प्रयास किया।
उसने न्यायालयों के कार्य-दिवसों की संख्या में वृद्धि की, जिससे वादों का शीघ्र निपटारा होने लगा। उसने यह भी अनिवार्य किया कि किसी वाद की सुनवाई के समय वादी की रोम में उपस्थिति आवश्यक होगी। साथ ही, जूरी के सदस्यों की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 25 वर्ष कर दी गई, जिससे अधिक परिपक्व एवं अनुभवी व्यक्तियों की नियुक्ति सुनिश्चित हो सके।
प्रांतों में भी उसने अनेक विवादों का समाधान किया। रोड्स को उसके सद्व्यवहार के पुरस्कारस्वरूप विशेष स्वायत्तता प्रदान की, जबकि इलियम (प्राचीन ट्रॉय) को करों से मुक्त कर दिया।
अलेक्ज़ान्द्रिया में यूनानियों और यहूदियों के मध्य हुए संघर्ष के उपरांत क्लॉडियस ने प्रसिद्ध ‘अलेक्ज़ान्द्रिया के नागरिकों के नाम सम्राट क्लॉडियस का पत्र’ जारी किया। इस पत्र में यहूदियों के अधिकारों की पुष्टि की गई, साथ ही उन्हें सामाजिक शांति एवं सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश भी दिया गया।
इसी काल में रोम में उत्पन्न अशांति के कारण उसने यहूदियों के एक समूह को नगर से निष्कासित कर दिया। रोमन लेखक सुएटोनियस के अनुसार यह अशांति ‘क्रेस्टस’ के नाम पर उत्पन्न विवादों से संबंधित थी, जिसे अधिकांश आधुनिक इतिहासकार ईसाई धर्म के प्रारंभिक प्रचार-प्रसार से जोड़ते हैं।
क्लॉडियस ने रोमन नागरिकता से संबंधित नियमों को भी अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित बनाया। जिन्होंने रोमन नागरिकता का मिथ्या दावा किया, उनके लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया। दूसरी ओर, जिन व्यक्तियों की नागरिकता प्रशासनिक त्रुटियों के कारण संदिग्ध हो गई थी, उन्हें विशेष राजकीय आदेश द्वारा अपनी नागरिकता बनाए रखने की अनुमति प्रदान की गई।
क्लॉडियस ने दासों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी कुछ महत्त्वपूर्ण मानवीय सुधार किए। उसने व्यवस्था की कि यदि कोई स्वामी अपने बीमार दास को उपचार के बिना त्याग देता है और वह दास स्वस्थ हो जाता है, तो उसे स्वतः स्वतंत्र (मुक्त) माना जाएगा। इसके अतिरिक्त, यदि कोई स्वामी अपने दास की हत्या करता था, तो उसके विरुद्ध हत्या का अभियोग चलाया जा सकता था। प्राचीन रोमन दास-व्यवस्था में यह एक महत्त्वपूर्ण मानवीय एवं विधिक सुधार माना जाता है।
सार्वजनिक खेल एवं जन-मनोरंजन
क्लॉडियस को सार्वजनिक खेलों तथा जन-मनोरंजन में विशेष रुचि थी। रोमन इतिहासकार सुएटोनियस के अनुसार वह ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं का उत्साहपूर्वक अवलोकन करता था तथा विजयी योद्धाओं की खुले रूप से प्रशंसा करता था। यद्यपि प्राचीन लेखकों ने कभी-कभी उसके इस व्यवहार की आलोचना की है, तथापि यह स्पष्ट है कि क्लॉडियस सार्वजनिक आयोजनों को जनता से निकटता स्थापित करने का प्रभावी माध्यम मानता था।
सम्राट बनने के तुरंत बाद उसने अपने पिता नीरो क्लॉडियस ड्रूसस की स्मृति में प्रतिवर्ष खेलों के आयोजन की परंपरा प्रारंभ की। इसके अतिरिक्त, अपने राज्यारोहण की स्मृति में भी वह प्रति वर्ष प्रेटोरियन शिविर में विशेष उत्सवों एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन कराता था, क्योंकि वहीं उसे पहली बार सम्राट घोषित किया गया था।
48 ईस्वी में क्लॉडियस ने रोम की पारंपरिक स्थापना (753 ईसा पूर्व) के लगभग 800 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘शताब्दी खेल’ (लूदी सेकुलारेस) आयोजित कराए। यद्यपि सम्राट ऑगस्टस इससे पूर्व भी ऐसे खेलों का आयोजन करा चुका था, फिर भी क्लॉडियस ने अपने शासन की वैधता तथा रोमन परंपराओं के संरक्षण के उद्देश्य से इस समारोह को विशेष भव्यता प्रदान की।
फ्यूसीन झील की जल-निकासी परियोजना के उद्घाटन के अवसर पर उसने एक विशाल कृत्रिम नौसैनिक युद्ध (नौमाखिया) का आयोजन कराया, जिसमें हजारों योद्धाओं ने कृत्रिम झील में नौसैनिक युद्ध का प्रदर्शन किया। यह आयोजन प्राचीन रोम के सबसे विशाल सार्वजनिक मनोरंजन आयोजनों में से एक माना जाता है।
क्लॉडियस के शासनकाल में ओस्टिया के नवनिर्मित बंदरगाह में एक विशाल ऑर्का अथवा किलर व्हेल के फँस जाने की घटना भी उल्लेखनीय है। रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर के अनुसार सम्राट स्वयं प्रेटोरियन सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा था।
क्लॉडियस ने रोम के प्रमुख सार्वजनिक भवनों तथा मनोरंजन स्थलों का भी जीर्णोद्धार कराया। सर्कस मैक्सिमस में संगमरमर के नए प्रारंभिक द्वार तथा मोड़-स्तंभों का निर्माण कराया गया। इसके अतिरिक्त, बाढ़ से सुरक्षा के लिए आवश्यक निर्माण कार्य भी कराए गए। उसने सीनेटरों के लिए अग्रिम पंक्तियों में आरक्षित बैठने की व्यवस्था को भी पुनः सुदृढ़ किया।
क्लॉडियस के शासनकाल में आग से नष्ट हो चुके पॉम्पी के रंगमंच (थिएट्रम पोम्पेई) का भी पुनर्निर्माण कराया गया। इसके पुनः उद्घाटन के अवसर पर विशेष युद्धाभ्यास तथा ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिन्हें देखने के लिए क्लॉडियस ने स्वयं उपस्थित हुआ था।
क्लॉडियस का साहित्यिक योगदान
क्लॉडियस केवल एक सफल प्रशासक ही नहीं, बल्कि अत्यंत विद्वान, अध्ययनशील तथा बहुभाषी लेखक भी था। उसे इतिहास, भाषा, व्याकरण तथा प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में विशेष रुचि थी। आधुनिक इतिहासकार अर्नाल्डो मोमिग्लियानो के अनुसार टाइबेरियस के शासनकाल में क्लॉडियस का साहित्यिक जीवन अपने उत्कर्ष पर था।
उस समय रोमन गणराज्य के इतिहास पर स्वतंत्र रूप से लेखन करना राजनीतिक दृष्टि से सुरक्षित नहीं माना जाता था। अधिकांश इतिहासकार या तो समकालीन रोमन साम्राज्य का इतिहास लिखते थे अथवा प्राचीन एवं अपेक्षाकृत कम विवादास्पद विषयों का अध्ययन करते थे। क्लॉडियस उन विरले विद्वानों में था, जिसने दोनों प्रकार के विषयों पर लेखन किया।
उसने ऑगस्टस के शासनकाल तथा रोमन गृहयुद्धों पर एक विस्तृत इतिहास-ग्रंथ की रचना की। किंतु कहा जाता है कि उसमें कुछ घटनाओं का अत्यंत निष्पक्ष अथवा आलोचनात्मक वर्णन किया गया था, जिसके कारण ऑगस्टस तथा शाही परिवार के अन्य सदस्यों ने उसके प्रकाशन का विरोध किया। परिणामस्वरूप उस ग्रंथ का अधिकांश भाग नष्ट हो गया और आज उपलब्ध नहीं है।
क्लॉडियस की प्रमुख ऐतिहासिक कृतियों में ‘टाइर्रेनिका’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह एट्रस्कन सभ्यता और उसके इतिहास पर लगभग बीस पुस्तकों का एक विस्तृत ग्रंथ था। इसी प्रकार उसने ‘कार्थाजिनिका’ नामक आठ पुस्तकों का इतिहास-ग्रंथ भी लिखा, जिसमें कार्थेज के इतिहास का व्यवस्थित एवं विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया था।
इतिहास-लेखन के अतिरिक्त क्लॉडियस ने एट्रस्कन भाषा का एक शब्दकोश तथा व्याकरण संबंधी ग्रंथ भी तैयार किया। उसने मनोरंजन के रूप में खेले जाने वाले पासा-खेल पर भी एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना की, जिससे उसकी विद्वतापूर्ण रुचियों का परिचय मिलता है।
उसने महान रोमन वक्ता सिसरो का समर्थन करते हुए इतिहासकार असिनियस गैलस द्वारा की गई आलोचनाओं का भी खंडन किया। आधुनिक इतिहासकारों के लिए क्लॉडियस की रचनाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके आधार पर उसके राजनीतिक विचारों, इतिहास-दृष्टि तथा रोमन गणराज्य के प्रति उसके दृष्टिकोण का अनुमान लगाया जा सकता है।
दुर्भाग्यवश, क्लॉडियस की अधिकांश मौलिक रचनाएँ कालक्रम में नष्ट हो गईं। आज उनकी केवल कुछ उद्धृत सामग्री तथा प्राचीन लेखकों द्वारा किए गए उल्लेख ही उपलब्ध हैं। फिर भी उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि वह जूलियो-क्लॉडियन सम्राटों में सर्वाधिक विद्वान, अध्ययनशील तथा साहित्य-प्रेमी शासकों में से एक था।
क्लॉडियन अक्षर एवं भाषा-सुधार
क्लॉडियस केवल एक सफल प्रशासक ही नहीं, बल्कि भाषा और व्याकरण का गंभीर अध्येता भी था। उसे लैटिन भाषा के विकास में विशेष रुचि थी। जिस प्रकार परंपरा के अनुसार कैकस ने लैटिन वर्णमाला में ‘R’ अक्षर के प्रयोग को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया था, उसी प्रकार क्लॉडियस ने भी तीन नए अक्षरों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा। उसका उद्देश्य उन ध्वनियों के लिए पृथक् अक्षर उपलब्ध कराना था, जिनका तत्कालीन लैटिन वर्णमाला में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं था।
47–48 ईस्वी में सेंसर का पद ग्रहण करने के बाद उसने इन नए अक्षरों को राजकीय अभिलेखों तथा शिलालेखों में आधिकारिक रूप से लागू कराया। कुछ सिक्कों और अभिलेखों पर इन अक्षरों का प्रयोग भी प्राप्त होता है। किंतु 54 ईस्वी में उसकी मृत्यु के पश्चात् यह सुधार अधिक समय तक स्थायी नहीं रह सका और शीघ्र ही ये नए अक्षर प्रचलन से बाहर हो गए, जिसके परिणामस्वरूप लैटिन वर्णमाला पुनः अपने पूर्ववर्ती स्वरूप में लौट आई।
क्लॉडियस ने लेखन-पद्धति में भी सुधार का प्रयास किया। प्राचीन लैटिन में शब्दों के बीच रिक्त स्थान (स्पेसिंग) देने की परंपरा नहीं थी, जिससे लंबे वाक्यों का पठन कठिन हो जाता था। उसने प्राचीन काल में प्रचलित इंटरपंक्ट अर्थात् शब्दों के बीच बिंदु (·) लगाने की पद्धति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, ताकि लेखन अधिक स्पष्ट और पठनीय बन सके। यद्यपि यह प्रयास भी स्थायी रूप से सफल नहीं हुआ, फिर भी यह उसके भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
आत्मकथा एवं अन्य साहित्यिक कृतियाँ
क्लॉडियस ने अपने जीवन पर आधारित आठ खंडों में एक आत्मकथा भी लिखी थी। रोमन इतिहासकार सुएटोनियस ने उसकी शैली को अत्यधिक प्रभावशाली नहीं माना और उसे कुछ नीरस बताया है। किंतु आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यह ग्रंथ तत्कालीन रोमन राजनीति तथा जूलियो-क्लॉडियन राजवंश के इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत रहा होगा।
अपने अधिकांश साहित्यिक कार्यों में क्लॉडियस ने अपने पूर्ववर्ती शासकों तथा राजपरिवार के अनेक सदस्यों की नीतियों की स्पष्ट आलोचना भी की थी। वह इतिहास-लेखन में अपेक्षाकृत निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करता था, जिसके कारण उसके कुछ ग्रंथ समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों में अप्रिय सिद्ध हुए।
क्लॉडियस ने यूनानी (ग्रीक) भाषा में एट्रस्कैन इतिहास पर 20 पुस्तकों तथा कार्थाजियन इतिहास पर 8 पुस्तकों की रचना की। दुर्भाग्यवश क्लॉडियस की कोई भी मौलिक रचना आज उपलब्ध नहीं है। उसके सभी ग्रंथ कालक्रम में नष्ट हो गए। फिर भी सुएटोनियस, टैसिटस, प्लिनी तथा अन्य प्राचीन लेखकों ने अनेक स्थानों पर उसकी रचनाओं का उल्लेख किया है और उनसे उद्धरण भी दिए हैं। इन्हीं उद्धरणों के आधार पर आधुनिक इतिहासकार क्लॉडियस की इतिहास-दृष्टि तथा राजनीतिक विचारों का पुनर्निर्माण करते हैं।
सुएटोनियस ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द ट्वेल्व सीज़र्स’ में क्लॉडियस की आत्मकथा का अनेक बार उपयोग किया है। इसी प्रकार टैसिटस ने लैटिन वर्तनी तथा भाषा-सुधार से संबंधित अपने विवरणों में क्लॉडियस के तर्कों का सहारा लिया है। प्राकृतिक इतिहासकार प्लिनी द एल्डर ने भी अपनी प्रसिद्ध कृति ‘नेचुरल हिस्ट्री’ (नातुरालिस हिस्टोरिया) के अनेक अंशों में क्लॉडियस की रचनाओं को स्रोत के रूप में उद्धृत किया है।
इतिहास-दृष्टि एवं प्रशासन
क्लॉडियस की ऐतिहासिक शिक्षा और विद्वत्ता का प्रभाव उसके शासन पर स्पष्ट दिखाई देता है। अपने सार्वजनिक भाषणों में वह प्राचीन रोमन इतिहास के उदाहरण प्रस्तुत करता था। उदाहरणार्थ, गॉल के प्रतिनिधियों को सीनेट की सदस्यता प्रदान करने के समर्थन में दिए गए अपने प्रसिद्ध भाषण में उसने रोम की स्थापना का वही विवरण प्रस्तुत किया, जिसका वर्णन उसके गुरु लिवी ने अपने इतिहास-ग्रंथ में किया था।
उसकी अनेक प्रशासनिक तथा निर्माण संबंधी योजनाएँ पूर्ववर्ती शासक जूलियस सीज़र की अधूरी योजनाओं से प्रेरित थीं। आधुनिक इतिहासकार बारबरा लेविक का मत है कि क्लॉडियस ने जूलियस सीज़र की प्रशासनिक नीतियों को आगे बढ़ाने का सचेत प्रयास किया तथा साम्राज्य के संगठन और प्रांतीय प्रशासन में उसी परंपरा का अनुसरण किया।
षड्यंत्र एवं विद्रोह
क्लॉडियस का संपूर्ण शासनकाल षड्यंत्रों और विद्रोहों से प्रभावित रहा। विशेष रूप से रोमन अभिजात वर्ग का एक बड़ा भाग उसे कभी पूर्णतः स्वीकार नहीं कर सका। परिणामस्वरूप उसके विरुद्ध समय-समय पर अनेक राजनीतिक षड्यंत्र रचे गए।
शासन के प्रारंभिक वर्षों में ही एप्पियस सिलानस को राजद्रोह के संदेह में मृत्युदंड दिया गया। इसके कुछ समय बाद सीनेटर विनिसियानुस तथा डाल्मेटिया के गवर्नर फ्यूरियस कैमिलस स्क्रिबोनियानुस ने विद्रोह का प्रयास किया। किंतु यह विद्रोह असफल हो गया और स्क्रिबोनियानुस सहित प्रमुख षड्यंत्रकारियों ने आत्महत्या कर ली।
इसके पश्चात् भी अनेक षड्यंत्रों का पता चला। क्लॉडियस के दामाद ग्नियस पॉम्पियस मैग्नस तथा उनके पिता मार्कस लिसिनियस क्रैसस फ्रूगी पर भी षड्यंत्र में सम्मिलित होने का आरोप लगाया गया और उन्हें मृत्युदंड दिया गया। इसी प्रकार लूसियस सैटर्निनस, कॉर्नेलियस लूपस तथा पॉम्पियस पेडो जैसे उच्च पदस्थ व्यक्तियों के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई की गई।
46 ईस्वी में असिनियस गैलस तथा टाइटस स्टैटिलियस टॉरस कोरविनस को राजद्रोह के आरोप में निर्वासित कर दिया गया। प्रसिद्ध रोमन कुलीन वैलेरियस एशियाटिकस को बिना सार्वजनिक मुकदमे के मृत्युदंड दिया गया। यद्यपि प्राचीन लेखकों ने इस घटना को व्यक्तिगत षड्यंत्रों से जोड़ा है, आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उन पर केवल व्यभिचार का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का भी संदेह था।
48 ईस्वी में क्लॉडियस की तीसरी पत्नी मेसालिना तथा उसके प्रेमी गायस सिलियस ने सत्ता हथियाने के उद्देश्य से सबसे गंभीर षड्यंत्र रचा। इस षड्यंत्र का भंडाफोड़ होने पर मेसालिना तथा उसके प्रमुख समर्थकों को मृत्युदंड दे दिया गया।
रोमन इतिहासकार सुएटोनियस के अनुसार क्लॉडियस के शासनकाल में लगभग 35 सीनेटरों तथा 300 अश्वारोहियों को विभिन्न अपराधों अथवा षड्यंत्रों के आरोप में मृत्युदंड दिया गया। यद्यपि इन संख्याओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती, तथापि इससे यह स्पष्ट होता है कि क्लॉडियस का शासनकाल निरंतर राजनीतिक षड्यंत्रों और सत्ता-संघर्षों से घिरा रहा।
वैवाहिक जीवन एवं उत्तराधिकार की राजनीति
प्राचीन इतिहासकारों, विशेषकर सुएटोनियस, टैसिटस और कैसियस डियो ने क्लॉडियस को अपनी पत्नियों के प्रभाव में रहने वाला शासक बताया है। आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों को कुछ सीमा तक अतिरंजित मानते हैं, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि उसके वैवाहिक जीवन ने रोमन राजनीति तथा उत्तराधिकार के प्रश्न को गहराई से प्रभावित किया।
क्लॉडियस ने चार विवाह किए, जबकि दो बार उसकी सगाई विवाह से पूर्व ही समाप्त हो गई। उसका पहला विवाह प्लॉटिया उरगुलानिला से हुआ, जो लिविया की घनिष्ठ सखी उरगुलानिया की पौत्री थी। इस विवाह से एक पुत्र क्लॉडियस ड्रूसस उत्पन्न हुआ, जिसकी किशोरावस्था में ही मृत्यु हो गई। बाद में उरगुलानिला पर व्यभिचार तथा अपनी भाभी एप्रोनिया की हत्या का आरोप लगा, जिसके कारण क्लॉडियस ने उसे तलाक दे दिया। तलाक के पश्चात् उरगुलानिला ने एक पुत्री क्लॉडिया को जन्म दिया, किंतु क्लॉडियस ने उसे अपनी संतान मानने से इनकार कर दिया।
उरगुलानिला से तलाक के बाद क्लॉडियस ने एलिया पैटिना से विवाह किया। इस विवाह से उनकी एक पुत्री क्लॉडिया एंटोनिया का जन्म हुआ। बाद में राजनीतिक कारणों से क्लॉडियस ने एलिया पैटिना को भी तलाक दे दिया।
38 अथवा 39 ईस्वी में क्लॉडियस ने अपनी दूर की संबंधी वैलेरिया मेसालिना से विवाह किया। इस विवाह से दो संतानें उत्पन्न हुईं—क्लॉडिया ऑक्टाविया तथा ब्रिटैनिकस। ब्रिटैनिकस का जन्म क्लॉडियस के सम्राट बनने के तुरंत बाद हुआ और प्रारंभ में वही उसका वैध उत्तराधिकारी माना जाता था।
प्राचीन स्रोतों में मेसालिना को अत्यंत महत्त्वाकांक्षी तथा चरित्रहीन महिला बताया गया है। 48 ईस्वी में जब क्लॉडियस ओस्टिया में था, उसने रोमन कुलीन गायस सिलियस के साथ राजनीतिक गठबंधन किया और उसी समय उसने सिलियस के साथ सार्वजनिक रूप से विवाह कर लिया। क्लॉडियस के विश्वस्त मुक्तदास नार्सिसस ने उसे इस घटना की सूचना दी। इसके पश्चात् मेसालिना, सिलियस तथा उनके प्रमुख समर्थक मृत्युदंड के शिकार हुए।
मेसालिना की मृत्यु के बाद क्लॉडियस ने अपनी भतीजी एग्रीपिना द यंगर से विवाह किया। रोमन परंपरा में चाचा और भतीजी का विवाह सामान्यतः निषिद्ध था; अतः इस विवाह को वैध बनाने के लिए सीनेट से विशेष अनुमति प्राप्त की गई।
ग्रीपिना राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थी और अपने पुत्र लूसियस डोमिटियस एहेनोबार्बस (भावी सम्राट नीरो) को जूलियो-क्लॉडियन वंश का प्रमुख उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। उसके प्रभाव में क्लॉडियस ने 50 ईस्वी में नीरो को विधिवत् गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जबकि उसका जैविक पुत्र ब्रिटैनिकस उस समय जीवित था। गोद लिए जाने के पश्चात् उसका नाम नीरो क्लॉडियस सीज़र ड्रूसस जर्मेनिकस रखा गया और उसे उत्तराधिकार की पंक्ति में ब्रिटैनिकस के समकक्ष स्थान प्राप्त हुआ। बाद में, क्लॉडियस ने अपनी पुत्री ऑक्टाविया का विवाह भी नीरो से करा दिया, जिससे उत्तराधिकार पर उसकी स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
13 अक्टूबर 54 ईस्वी को 63 वर्ष की आयु में क्लॉडियस की मृत्यु हो गई। प्राचीन स्रोतों के अनुसार संभवतः उसकी चौथी पत्नी एग्रीपिना द यंगर ने उसे विष देकर मरवा दिया था, यद्यपि इस विषय में इतिहासकारों के बीच पूर्ण सहमति नहीं है। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका दत्तक पुत्र नीरो रोमन सम्राट बना।
क्लॉडियस का व्यक्तित्व
रोमन इतिहासकार सुएटोनियस ने क्लॉडियस की शारीरिक अवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुसार क्लॉडियस के घुटने दुर्बल थे, जिसके कारण चलते समय उसका संतुलन डगमगा जाता था। उसका सिर अनियंत्रित रूप से हिलता रहता था तथा वह हकलाकर बोलता था। उत्तेजित अथवा क्रोधित होने पर उसके मुख से लार टपकने लगती थी और नाक बहने लगती थी। स्टोइक दार्शनिक सेनेका ने अपनी व्यंग्यात्मक रचना ‘एपोकोलोसिंटोसिस’ में उसकी वाणी का उपहास करते हुए लिखा है कि उसकी आवाज़ किसी भी सामान्य मनुष्य जैसी नहीं थी तथा उसके हाथ भी दुर्बल थे।
यद्यपि क्लॉडियस अनेक शारीरिक समस्याओं से ग्रस्त था, फिर भी उसके शरीर में किसी प्रकार की स्थायी विकृति नहीं थी। सुएटोनियस के अनुसार जब वह शांत भाव से बैठा रहता था, तब उसका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली, ऊँचा और गरिमामय प्रतीत होता था। किंतु तनाव, क्रोध अथवा तीव्र उत्तेजना की अवस्था में उसके रोग के लक्षण अधिक स्पष्ट हो जाते थे।
क्लॉडियस ने स्वयं स्वीकार किया था कि युवावस्था में उसने अपनी शारीरिक दुर्बलताओं को जानबूझकर कुछ अधिक प्रदर्शित किया, जिससे उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उसे महत्त्वहीन समझें और उसका जीवन सुरक्षित रहे। आधुनिक इतिहासकारों का भी मत है कि सम्राट बनने के बाद आत्मविश्वास बढ़ने के कारण उसके अनेक लक्षण पहले की अपेक्षा कम दिखाई देने लगे।
क्लॉडियस की बीमारी के संबंध में आधुनिक विद्वानों में मतभेद है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अधिकांश इतिहासकार उसकी बीमारी को पोलियो मानते थे। बाद में आधुनिक विशेषज्ञों ने यह मत व्यक्त किया कि वह संभवतः सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित था। कुछ विद्वानों ने टूरेट सिंड्रोम की संभावना भी व्यक्त की है। इस विषय में आज भी इतिहासकारों और चिकित्सकों के बीच पूर्ण सहमति नहीं है।
मृत्यु
क्लॉडियस की मृत्यु 13 अक्टूबर 54 ईस्वी को हुई। उसकी मृत्यु के कारणों के संबंध में प्राचीन स्रोतों में मतभेद मिलता है। टैसिटस, सुएटोनियस तथा कैसियस डियो जैसे अधिकांश प्राचीन इतिहासकारों का मत है कि उसे विष देकर मार दिया गया था। अनेक विवरणों के अनुसार उसे विषैले मशरूम खिलाए गए अथवा बाद में उल्टी कराने के बहाने उसके गले में डाले गए पंख पर विष लगाया गया था।
इन प्राचीन लेखकों के अनुसार इस षड्यंत्र के पीछे उसकी चौथी पत्नी एग्रीपिना द यंगर का हाथ था। उस समय क्लॉडियस और एग्रीपिना के संबंध तनावपूर्ण हो चुके थे। क्लॉडियस अपने जैविक पुत्र ब्रिटैनिकस को पुनः उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा व्यक्त करने लगा था, जबकि एग्रीपिना अपने पुत्र नीरो को सिंहासन पर बैठाना चाहती थी। इसी कारण अनेक प्राचीन स्रोत एग्रीपिना को क्लॉडियस की मृत्यु का प्रमुख षड्यंत्रकारी मानते हैं। कुछ विवरणों में सम्राट के भोजन-परीक्षक हैलोटस, राजवैद्य ज़ेनोफ़ोन तथा प्रसिद्ध विषकन्या लोकुस्टा का भी उल्लेख मिलता है। किंतु इन कथाओं की ऐतिहासिक प्रामाणिकता निश्चित नहीं है।
दूसरी ओर, दार्शनिक सेनेका ने क्लॉडियस की मृत्यु को स्वाभाविक बताया है, जबकि इतिहासकार जोसेफस ने केवल विष दिए जाने की अफवाहों का उल्लेख किया है। आधुनिक इतिहासकार इस विषय में एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि क्लॉडियस पहले से ही अनेक गंभीर रोगों से पीड़ित था और वृद्धावस्था तथा अस्वस्थ जीवनशैली के कारण उसकी स्वाभाविक मृत्यु हुई। कुछ विशेषज्ञों ने यह संभावना भी व्यक्त की है कि उसने अनजाने में विषैले मशरूम का सेवन कर लिया हो। वहीं, अन्य आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि प्राचीन स्रोतों में विषप्रयोग का उल्लेख इतने व्यापक रूप में मिलता है कि हत्या की संभावना को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्लॉडियस का अंतिम संस्कार अत्यंत राजकीय सम्मान के साथ किया गया। 24 अक्टूबर 54 ईस्वी को उसकी अस्थियाँ ऑगस्टस के समाधि-स्थल में स्थापित की गईं। उसका अंतिम संस्कार लगभग उसी वैभव के साथ संपन्न हुआ, जैसा लगभग चार दशक पूर्व सम्राट ऑगस्टस का हुआ था।
दैवीकरण
क्लॉडियस को उसके जीवनकाल में ही रोमन साम्राज्य के अनेक भागों में देवतुल्य शासक के रूप में सम्मान दिया जाने लगा था। विशेष रूप से ब्रिटेन के कैमुलोडुनम में उसके सम्मान में एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया, जहाँ उसकी विधिवत पूजा की जाती थी। उसकी मृत्यु के तुरंत बाद सम्राट नीरो तथा रोमन सीनेट ने उसे आधिकारिक रूप से देवता घोषित कर दिया। इस प्रकार वह उन रोमन सम्राटों की परंपरा में सम्मिलित हो गया, जिनका मरणोपरांत दैवीकरण किया जाता था।
क्लॉडियस की स्मृति
क्लॉडियस की मृत्यु के तुरंत बाद एग्रीपिना ने उसके प्रभावशाली मुक्तदास नार्सिसस का अंत करा दिया। नीरो के शासनकाल में क्लॉडियस की अनेक नीतियों की उपेक्षा की गई। कुछ प्रशासनिक आदेशों को यह कहकर निरस्त कर दिया गया कि वृद्धावस्था में उसकी मानसिक क्षमता क्षीण हो गई थी।
दार्शनिक सेनेका ने अपनी प्रसिद्ध व्यंग्य रचना ‘एपोकोलोसिंटोसिस’ में क्लॉडियस के दैवीकरण का उपहास करते हुए उसे एक मूर्ख और हास्यास्पद शासक के रूप में चित्रित किया। यह रचना वस्तुतः नीरो के शासनकाल की आधिकारिक राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
नीरो ने बाद में अपने दत्तक पिता का उल्लेख करना भी लगभग बंद कर दिया। क्लॉडियस के सम्मान में आरंभ किए गए मंदिर का निर्माण भी अधूरा छोड़ दिया गया और उसी क्षेत्र में बाद में नीरो ने अपना भव्य डोमुस ऑरिया (स्वर्ण महल) बनवाया।
69 ईस्वी में फ्लेवियन वंश के सत्ता में आने के बाद क्लॉडियस के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। सम्राट वेस्पासियन, टाइटस तथा डोमिशियन ने स्वयं को नीरो से भिन्न और अधिक उत्तरदायी शासक सिद्ध करने के लिए क्लॉडियस की स्मृति को पुनः सम्मान देना प्रारंभ किया।
क्लॉडियस तथा उसके पुत्र ब्रिटैनिकस की स्मृति में सिक्के जारी किए गए और उसके मंदिर का निर्माण भी अंततः पूर्ण कराया गया। किंतु जब फ्लेवियन वंश की सत्ता पूर्णतः सुदृढ़ हो गई, तब उन्होंने भी क्लॉडियस के नाम का राजनीतिक उपयोग सीमित कर दिया।
क्लॉडियस का मूल्यांकन
क्लॉडियस के विषय में उपलब्ध अधिकांश जानकारी टैसिटस, सुएटोनियस तथा कैसियस डियो जैसे प्राचीन इतिहासकारों के लेखन से प्राप्त होती है। ये तीनों लेखक रोमन अभिजात वर्ग से संबंधित थे और सामान्यतः सीनेट के दृष्टिकोण का समर्थन करते थे। इसलिए क्लॉडियस के संबंध में उनके विवरणों में कुछ सीमा तक अभिजात वर्ग के पूर्वाग्रह और पक्षपात का प्रभाव परिलक्षित होता है।
प्राचीन इतिहासकारों ने क्लॉडियस के व्यक्तित्व का मिश्रित चित्र प्रस्तुत किया है। एक ओर उसे सरल, उदार, न्यायप्रिय तथा सामान्य नागरिकों के प्रति सहानुभूतिशील शासक बताया गया है। कहा जाता है कि वह प्रायः साधारण नागरिकों के साथ भोजन कर लेता था तथा न्यायिक मामलों में व्यक्तिगत रुचि लेकर स्वयं उनकी सुनवाई करता था। दूसरी ओर, सुएटोनियस और कैसियस डियो ने उसे ग्लैडिएटर प्रतियोगिताओं तथा मृत्युदंड के दृश्यों में विशेष रुचि रखने वाला शासक बताया है। उनके अनुसार वह शीघ्र क्रोधित हो जाता था, किंतु क्रोध शांत होने पर अपने कठोर व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से खेद भी व्यक्त करता था।
प्राचीन लेखकों ने यह भी आरोप लगाया है कि क्लॉडियस अत्यधिक विश्वास करने वाला व्यक्ति था और उसकी पत्नियाँ तथा मुक्तदास अनेक अवसरों पर उसके निर्णयों को प्रभावित करने में सफल रहते थे। साथ ही, उसे संशयी, निर्णय लेने में विलंब करने वाला तथा दूसरों के प्रभाव में आने वाला शासक भी चित्रित किया गया है। सुएटोनियस ने उसे दुर्बल एवं हास्यास्पद व्यक्तित्व वाला सम्राट बताया तथा उसकी सफलताओं का श्रेय प्रायः उसके मुक्तदासों और सहयोगियों को दिया। टैसिटस ने भी अनेक प्रसंगों में उसे दूसरों के प्रभाव में कार्य करने वाला शासक बताया। यद्यपि कैसियस डियो का विवरण अपेक्षाकृत संतुलित है, फिर भी उन्होंने भी पूर्ववर्ती लेखकों के मतों का पर्याप्त अनुसरण किया। परिणामस्वरूप अनेक शताब्दियों तक क्लॉडियस की छवि एक दुर्बल, अनिर्णायक तथा दूसरों के प्रभाव में रहने वाले सम्राट के रूप में बनी रही।
आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों को पूर्णतः स्वीकार नहीं करते। उनका मत है कि अधिकांश प्राचीन लेखक रोमन सीनेट के अभिजात वर्ग से संबंधित थे और क्लॉडियस की प्रशासनिक नीतियों, विशेषकर मुक्तदासों को उच्च प्रशासनिक पद प्रदान करने तथा प्रांतीय अभिजात वर्ग को शासन में सम्मिलित करने की उसकी नीति से असंतुष्ट थे। इसलिए उसके व्यक्तित्व और शासन का मूल्यांकन करते समय इन स्रोतों की संभावित पक्षपातपूर्ण प्रवृत्ति को ध्यान में रखना आवश्यक है।
अभिलेखों, सिक्कों, शिलालेखों तथा अन्य प्रशासनिक साक्ष्यों के आधार पर आधुनिक इतिहासकारों ने क्लॉडियस की पारंपरिक छवि का पुनर्मूल्यांकन किया है। विशेष रूप से ल्योन टैबलेट पर सुरक्षित उसका भाषण यह सिद्ध करता है कि वह एक कुशल वक्ता, विद्वान तथा दूरदर्शी राजनीतिज्ञ था। उसके शासनकाल में किए गए प्रशासनिक सुधार, न्यायिक व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण, सार्वजनिक निर्माण कार्य तथा ब्रिटेन की विजय उसके प्रभावशाली नेतृत्व के प्रमाण हैं। इसलिए आज अधिकांश विद्वानों का मत है कि क्लॉडियस वास्तव में एक सक्षम प्रशासक, न्यायप्रिय शासक तथा सुधारवादी सम्राट था, जिसकी ऐतिहासिक छवि पर प्राचीन अभिजात इतिहासकारों के पूर्वाग्रह का गहरा प्रभाव पड़ा।




