वेस्पासियन (Vespasian)

वेस्पासियन (Vespasian)

रोमन सम्राट वेस्पासियन (17 नवंबर 9– 23 जून 79 ईस्वी)

वेस्पासियन रोमन साम्राज्य का नौवाँ सम्राट था। उसने नीरो की मृत्यु के बाद रोमन साम्राज्य में व्याप्त राजनीतिक अराजकता एवं गृहयुद्ध को समाप्त कर न केवल साम्राज्य में राजनीतिक स्थिरता की पुनर्स्थापना की, बल्कि वित्तीय सुधार लागू किए और व्यापक निर्माण-कार्यों की शुरुआत की। वह ‘चार सम्राटों के वर्ष’ (69 ई.) का अंतिम विजेता तथा फ्लेवियन राजवंश का संस्थापक था। इस वंश ने 69 से 96 ईस्वी तक लगभग 27 वर्षों तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया।

वेस्पासियन का सीनेट के साथ सामान्यतः सौहार्दपूर्ण संबंध था। उसने अपेक्षाकृत सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया तथा एक व्यावहारिक, कुशल और यथार्थवादी शासक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की। रोमन इतिहासकार टैसिटस ने उसके विषय में टिप्पणी करते हुए लिखा कि वह ऐसा पहला व्यक्ति था, जो सम्राट बनने के बाद और अधिक श्रेष्ठ सिद्ध हुआ।

वेस्पासियन (Vespasian)
वेस्पासियन
प्रारंभिक जीवन

वेस्पासियन का पूरा नाम टाइटस फ्लावियस वेस्पासियानुस था। उसका जन्म 17 नवंबर 9 ईस्वी को रोम के उत्तर-पूर्व में स्थित फलाक्रिने नामक गाँव में हुआ था। उसका परिवार रोमन अभिजात वर्ग से संबंधित नहीं था, क्योंकि उसका पिता टाइटस फ्लावियस सबिनुस एक कर-संग्राहक तथा वित्तीय कार्यों से संबद्ध था, जबकि उसकी माता वेस्पासिया पोला अश्वारोही परिवार से संबंधित थी।

वेस्पासियन का अधिकांश बाल्यकाल इटली के कोसा क्षेत्र में उसकी दादी के संरक्षण में व्यतीत हुआ। वह अपने बचपन के स्थानों से अत्यधिक लगाव रखता था और सम्राट बनने के बाद भी समय-समय पर वहाँ जाता रहा। अपने बड़े भाई टाइटस फ्लावियस सबिनुस की तुलना में उसने सार्वजनिक जीवन में अपेक्षाकृत विलंब से प्रवेश किया, क्योंकि उसका भाई पहले ही प्रशासनिक और सैन्य पदों पर प्रतिष्ठा अर्जित कर चुका था।

सैन्य जीवन

वेस्पासियन ने थ्रेस में सैन्य सेवा, बीस सदस्यीय मजिस्ट्रेट-मंडल (विजिन्टिविरेट) में कनिष्ठ मजिस्ट्रेट तथा क्रेट में क्वेस्टर के रूप में कार्य करने के पश्चात् 39 ईस्वी में प्रेटर का पद प्राप्त किया। संभवतः उसकी उन्नति में एंटोनिया माइनर की विश्वस्त सचिव एंटोनिया कैनिस के साथ उसके संबंधों की भी कुछ भूमिका थी।

41 ईस्वी में क्लॉडियस के सम्राट बनने के बाद वेस्पासियन को प्रभावशाली मुक्तदास नार्सिसस के समर्थन से द्वितीय ऑगस्टा सेना (लेजियो II ऑगस्टा) का सेनानायक नियुक्त किया गया। उसने 43 ईस्वी में ब्रिटेन पर रोमन आक्रमण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और मेडवे तथा थेम्स नदियों के निकट हुई लड़ाइयों में अपनी सैन्य कुशलता का परिचय दिया। इसके बाद उसने ब्रिटेन के दक्षिण-पश्चिमी भागों में अभियान चलाकर अनेक स्थानीय जनजातियों को पराजित किया तथा लगभग बीस दुर्गों और बस्तियों पर अधिकार स्थापित किया। उसने वेक्टिस (आइल ऑफ वाइट) पर भी विजय प्राप्त की और इस्का डुम्नोनियोरम (एक्सेटर) में एक प्रमुख सैन्य मुख्यालय स्थापित किया।

इन सफलताओं के फलस्वरूप रोम लौटने पर उसे विजय-अलंकरण (ऑर्नामेंटा ट्रायुम्फालिया) से सम्मानित किया गया। वह 51 ईस्वी में कौंसल बना और इसके बाद कुछ समय तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहा, क्योंकि सम्राट क्लॉडियस की पत्नी एग्रीपिना द यंगर उससे अप्रसन्न थी।

लगभग 63 ईस्वी में उसे अफ्रीका प्रांत का प्रोकौंसल (गवर्नर) नियुक्त किया गया। अफ्रीका में उसके प्रशासन के संबंध में प्राचीन स्रोतों में विरोधाभासी मत मिलते हैं। इतिहासकार टैसिटस ने उसके शासन को अलोकप्रिय बताया है, जबकि सुएटोनियस ने उसे ईमानदार और सम्माननीय प्रशासक कहा है। वास्तव में, अफ्रीका में उसने धन-संचय की अपेक्षा राजनीतिक संबंधों और मित्रता को अधिक महत्त्व दिया, जिसके कारण उसे आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए उसने खच्चरों के व्यापार में निवेश किया, जिसके कारण उसे व्यंग्यपूर्वक ‘मुलियो’ (खच्चर-व्यापारी) कहा जाने लगा। बाद में वेस्पासियन रोमन सम्राट नीरो का विश्वसनीय सहयोगी बन गया।

बाद में वह सम्राट नीरो के साथ यूनान गया। कुछ स्रोतों के अनुसार लगभग 66–67 ईस्वी में वेस्पासियन कुछ समय के लिए नीरो की अप्रसन्नता का भी शिकार हुआ, क्योंकि उसने सम्राट के वीणा-वादन में पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई थी। फिर भी, यह अप्रसन्नता अस्थायी सिद्ध हुई, क्योंकि कुछ ही समय बाद नीरो ने उसे जूडिया में भड़के यहूदी विद्रोह के दमन के लिए सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया।

जूडिया अभियान

66 ईस्वी में जूडिया प्रांत में रोमन शासन के विरुद्ध व्यापक यहूदी विद्रोह भड़क उठा। सीरिया का गवर्नर सेस्टियस गैलुस भी इस विद्रोह को दबाने में असफल रहा। परिणामस्वरूप सम्राट नीरो ने यहूदी विद्रोह को दबाने का दायित्व वेस्पासियन को सौंपा और उसे तीन रोमन सेनाओं, आठ अश्वारोही दस्तों तथा दस सहायक सैन्य टुकड़ियों के साथ जूडिया भेजा। उसका ज्येष्ठ पुत्र टाइटस भी अलेक्ज़ान्ड्रिया से एक अतिरिक्त सेना लेकर अभियान में शामिल हुआ। 67 और 68 ईस्वी के अभियानों में उसने यरूशलेम को छोड़कर जूडिया के अधिकांश भाग पर पुनः रोमन नियंत्रण स्थापित कर लिया।

इसी अभियान के दौरान वेस्पासियन का संपर्क यहूदी इतिहासकार फ्लावियस जोसेफस से हुआ, जो योडफात की घेराबंदी के समय रोमन सेना द्वारा बंदी बना लिया गया था। बाद में जोसेफस ने रोमन संरक्षण में यहूदियों के इतिहास और युद्ध का विस्तृत विवरण लिखा। उसने अपनी कृति ‘एंटिक्विटीज़ ऑफ द ज्यूज़’ में वेस्पासियन को अपेक्षाकृत न्यायप्रिय और उदार प्रशासक के रूप में चित्रित किया है। उसने यह भी उल्लेख किया कि यहूदी परंपरा में प्रचलित एक भविष्यवाणी को अनेक लोगों ने वेस्पासियन के सम्राट बनने से जोड़ा था। रोमन इतिहासकार टैसिटस ने भी इस भविष्यवाणी का उल्लेख किया है।

सत्ता के लिए संघर्ष और सम्राट पद की प्राप्ति

जून 68 ईस्वी में सम्राट नीरो की मृत्यु के साथ ही जूलियो-क्लॉडियन राजवंश का अंत हो गया और रोमन साम्राज्य गंभीर राजनीतिक संकट में उलझ गया। अगले वर्ष 69 ईस्वी को रोमन इतिहास में ‘चार सम्राटों का वर्ष’ कहा जाता है, क्योंकि इस वर्ष गाल्बा, ओथो, विटेलियस और वेस्पासियन ने सम्राट पद के लिए दावेदारी की, जिनमें प्रत्येक को विभिन्न सैन्य दलों का समर्थन प्राप्त था। अंततः वेस्पासियन को सफलता मिली, किंतु इस संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि सम्राट की शक्ति मुख्यतः सेना के समर्थन पर आधारित थी।

गाल्बा की हत्या के बाद ओथो सम्राट बना, किंतु शीघ्र ही विटेलियस ने उसे पराजित कर दिया। वेस्पासियन को विशेष रूप से सीरिया के गवर्नर गायुस लिसिनियस म्यूशियानुस का समर्थन प्राप्त था। मई 69 ईस्वी में म्यूशियानुस ने उसे विटेलियस के विरुद्ध सम्राट पद का दावा प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया।

1 जुलाई 69 ईस्वी को मिस्र में तैनात रोमन सेनाओं ने वेस्पासियन के प्रति निष्ठा की शपथ ली और उसे सम्राट घोषित कर दिया। 3 जुलाई को जूडिया की सेनाओं तथा 15 जुलाई को सीरिया की सेनाओं ने भी उसका समर्थन किया। इसके पश्चात् मोएसिया, पैनोनिया और इलिरिकुम की सेनाएँ भी उसके पक्ष में हो गईं, जबकि विटेलियस को मुख्यतः राइन और गॉल की सेनाओं का समर्थन प्राप्त था। जब वेस्पासियन मिस्र में था, तब उसके समर्थक सेनापति मार्कुस एंटोनियुस प्राइमुस के नेतृत्व में रोमन सेनाएँ इटली में प्रवेश कर गईं। उन्होंने बेद्रियाकुम के द्वितीय युद्ध में विटेलियस की सेना को पराजित किया, क्रेमोना पर अधिकार कर लिया और रोम की ओर प्रयाण किया। रोम में हुए भीषण संघर्ष में विटेलियस तथा वेस्पासियन के भाई टाइटस फ्लावियस सबिनुस दोनों मारे गए। 20 दिसंबर 69 ईस्वी को प्राइमुस ने विटेलियस को पराजित कर रोम पर अधिकार कर लिया। 21 दिसंबर को रोमन सीनेट ने वेस्पासियन को आधिकारिक रूप से सम्राट घोषित कर दिया और इस प्रकार फ्लेवियन राजवंश की स्थापना हुई।

रोमन सम्राट (69–79 ईस्वी)

21 दिसंबर 69 ईस्वी को जब वेस्पासियन को औपचारिक रूप से रोमन सीनेट द्वारा सम्राट स्वीकार किया गया, उस समय वह मिस्र में था, इसलिए रोम में प्रशासन का संचालन म्यूशियानुस तथा उसके पुत्र डोमिटियन ने किया। इतिहासकार टैसिटस के अनुसार प्रतिकूल मौसम के कारण उसकी रोम-यात्रा में विलंब हुआ, जबकि आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि वह प्रस्थान से पूर्व मिस्र में अपना राजनीतिक आधार और अधिक सुदृढ़ कर रहा था।

द्वितीय बाटावियन विद्रोह (70 ई.)

जनवरी 70 ईस्वी में गॉल और जर्मानिया में एक बड़ा विद्रोह भड़क उठा, जिसे द्वितीय बाटावियन विद्रोह कहा जाता है। इसका नेतृत्व गायुस जूलियस सिविलिस तथा जूलियस सबिनुस ने किया। सबिनुस ने स्वयं को जूलियस सीज़र का वंशज बताते हुए ‘गॉल का सम्राट’ घोषित कर दिया। विद्रोहियों ने प्रारंभ में दो रोमन सेनाओं को अपने पक्ष में कर लिया, किंतु वर्ष के अंत तक वेस्पासियन के दामाद क्विंटस पेटिलियस सेरियालिस ने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन कर दिया।

वेस्पासियन ने अपने ज्येष्ठ पुत्र टाइटस को जूडिया में अभियान जारी रखने के लिए वहीं छोड़ दिया था। अंततः अगस्त 70 ईस्वी में टाइटस ने यरूशलेम पर अधिकार कर लिया और दूसरे यहूदी मंदिर को नष्ट कर दिया। यह विजय प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध का निर्णायक अंत सिद्ध हुई।

चौथी शताब्दी के इतिहासकार यूसेबियस के अनुसार इसके पश्चात् वेस्पासियन ने राजा दाऊद के वंशजों की खोज कराने का आदेश दिया। कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि वह संभावित मसीहाई दावेदारों को उभरने से रोकना चाहता था, क्योंकि उस समय जूडिया में एक महान शासक के आगमन संबंधी भविष्यवाणियाँ व्यापक रूप से प्रचलित थीं। 73 ईस्वी में मिस्र के लियोन्टोपोलिस स्थित यहूदी मंदिर को भी बंद कर दिया गया।

वेस्पासियन अक्टूबर 70 ईस्वी में रोम पहुँचा। रोम पहुँचने के बाद उसने अपनी सत्ता को स्थायी बनाने के लिए अनेक कदम उठाए। विटेलियस के समर्थक सैनिकों को सेना से निष्कासित या दंडित किया गया। सीनेट और अश्वारोही वर्ग का पुनर्गठन किया गया तथा प्रशासनिक पदों पर अपने विश्वस्त सहयोगियों को नियुक्त किया गया।

वेस्पासियन जूलियो-क्लॉडियन वंश से नहीं था, अतः उसने अपनी वैधता स्थापित करने के लिए व्यापक प्रचार अभियान चलाया। उसके शासनकाल में यह विचार विशेष रूप से प्रचारित किया गया कि सफल सैन्य विजय ही शासन का वैध आधार है। जूडिया में उसकी विजय को इस प्रचार का प्रमुख आधार बनाया गया। साम्राज्य भर में ऐसी कथाएँ भी प्रसारित की गईं कि देवताओं ने उसे शासन के लिए चुना है। उसके शासनकाल में ढाले गए अनेक सिक्कों पर विजय, शांति और समृद्धि के प्रतीक अंकित किए गए। रोम में निर्मित शांति मंदिर गृहयुद्ध की समाप्ति और पुनर्स्थापित स्थिरता का प्रतीक था।

प्रशासनिक और आर्थिक नीतियाँ

वेस्पासियन के शासनकाल के तीन प्रमुख उद्देश्य थे—नीरो की अपव्ययी नीतियों के कारण कमजोर हो चुके राजकोष को पुनः सुदृढ़ करना, गृहयुद्ध के बाद सेना में अनुशासन स्थापित करना तथा अपने पुत्र टाइटस के लिए उत्तराधिकार सुनिश्चित करना। संयोग से वह अपने इन तीनों उद्देश्यों में पूर्णतः सफल रहा।

गृहयुद्ध के कारण रोमन राजकोष लगभग रिक्त हो चुका था। राजकोष को सुदृढ़ करने के लिए वेस्पासियन ने कठोर वित्तीय नीतियाँ अपनाईं और कर-व्यवस्था को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने के लिए अनेक वित्तीय सुधार लागू किए। नीरो द्वारा यूनानियों को प्रदान की गई कर-मुक्ति समाप्त कर पुराने कर पुनः लागू किए गए, नए कर लगाए गए तथा प्रांतीय कर-व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया। इसी संदर्भ में वेस्पासियन का नाम एक प्रसिद्ध कर से जुड़ा हुआ है—मूत्र कर। सार्वजनिक शौचालयों से एकत्रित मूत्र का उपयोग चमड़ा उद्योग तथा वस्त्र-धुलाई में किया जाता था। इस पर लगाए गए कर को वेस्पासियन ने पुनः लागू किया। इसी घटना से प्रसिद्ध लैटिन कहावत ‘धन में दुर्गंध नहीं होती’ (पेकूनिया नोन ओलेट) प्रचलित हुई।

वेस्पासियन ने सेना में पुनः अनुशासन स्थापित किया, सीमावर्ती प्रांतों की सुरक्षा को मजबूत किया तथा जर्मानिया और ब्रिटेन में रोमन प्रभाव का विस्तार किया। उसके शासनकाल में ब्रिटेन के उत्तरी भागों में रोमन विजय अभियान आगे बढ़ा और साम्राज्य की सीमाएँ अधिक सुरक्षित हो गईं।

73 ईस्वी में वेस्पासियन और उसके पुत्र टाइटस ने सेंसर का पद ग्रहण किया। इस अवधि में उसने सीनेट का पुनर्गठन किया और अनेक योग्य प्रांतीय व्यक्तियों को सीनेट में स्थान दिया। उसने स्पेन के नगरों को व्यापक रूप से लैटिन अधिकार प्रदान किए, जिससे रोमन नागरिकता का विस्तार हुआ। उसने अपने पुत्र टाइटस को शासन-कार्य में सक्रिय रूप से सम्मिलित कर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया और इस प्रकार राजवंशीय उत्तराधिकार को सुदृढ़ किया।

वेस्पासियन के शासनकाल में ब्रिटेन में रोमन विस्तार जारी रहा। ग्नेयस जूलियस एग्रीकोला ने उत्तरी ब्रिटेन में सफल सैन्य अभियान चलाकर रोमन नियंत्रण को सुदृढ़ किया। उसके अभियानों ने आगे चलकर स्कॉटलैंड तक रोमन प्रभाव के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

निर्माण कार्य

वेस्पासियन ने रोम के पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण के लिए अनेक सार्वजनिक निर्माण-कार्य कराए, जिनमें शांति मंदिर, क्लॉडियस के मंदिर का पुनर्निर्माण, अपोलो की विशाल प्रतिमा की स्थापना, मार्सेलस रंगमंच का पुनरुद्धार और सर्वाधिक प्रसिद्ध फ्लेवियन एम्फीथिएटर (कोलोसियम) के निर्माण का शुभारंभ शामिल था, जिसे बाद में उसके पुत्र टाइटस ने पूरा किया। कोलोसियम के निर्माण में प्रयुक्त धन का एक बड़ा भाग यरूशलेम की विजय से प्राप्त हुआ था। उसके शासनकाल में मिस्र के अनेक मंदिरों को भी शाही संरक्षण प्राप्त हुआ, जिनमें दाखला ओएसिस, एस्ना, कोम ओम्बो, मेडिनेट हाबू तथा सिलसिला के मंदिर उल्लेखनीय हैं।

फ्लेवियन एम्फीथिएटर (रोमन कोलोसियम)
फ्लेवियन एम्फीथिएटर (रोमन कोलोसियम)

वेस्पासियन 79 ईस्वी में कैम्पानिया में बीमार पड़ गया। बाद में वह आक्वाए कुटिलिए चला गया, जहाँ वह प्रायः ग्रीष्म ऋतु बिताता था। वहाँ उसकी बीमारी गंभीर हो गई और उसे तीव्र अतिसार हो गया। सुएटोनियस के अनुसार मृत्यु से पूर्व उसने हास्यपूर्ण ढंग से कहा : ‘अरे! मुझे लगता है कि मैं देवता बन रहा हूँ’ (वाए, पूतो देउस फियो!)। अपने अंतिम समय में उसने यह भी कहा कि ‘सम्राट को खड़े-खड़े मरना चाहिए।’ इसके बाद उठने का प्रयास करते हुए 23 जून 79 ईस्वी को 69 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।

वेस्पासियन के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र टाइटस रोमन सम्राट बना। इस प्रकार पहली बार किसी रोमन सम्राट के बाद उसका जैविक पुत्र शांतिपूर्वक उत्तराधिकारी बना और फ्लेवियन राजवंश की सत्ता और अधिक सुदृढ़ हो गई।

वेस्पासियन की व्यक्तिगत विशेषताएँ

वेस्पासियन का व्यक्तित्व उसके मूर्तिचित्रों (बस्टों) में दिखाई देने वाले दृढ़, व्यावहारिक और स्पष्टवादी स्वभाव के अनुरूप था। वह अपने साधारण पारिवारिक मूल को कभी नहीं छिपाता था, बल्कि उसका उल्लेख गर्व के साथ करता था। उसका व्यवहार कभी-कभी कठोर प्रतीत होता था, किंतु उसकी सादगी, ईमानदारी और स्पष्टवादिता ने उसे जनता के बीच लोकप्रिय बनाया। वह अत्यंत परिश्रमी था और सादा जीवन व्यतीत करता था। साथ ही वह बुद्धिमान, महत्त्वाकांक्षी तथा राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत व्यावहारिक शासक था। उसने अपने समर्थकों का एक सशक्त समूह तैयार किया और शासन के प्रारंभिक वर्षों में अनेक नियुक्तियाँ अपने पुराने सहयोगियों तथा विश्वासपात्र व्यक्तियों को पुरस्कृत करने के उद्देश्य से कीं।

यद्यपि उसकी नीतियाँ विवेकपूर्ण और प्रभावी थीं, फिर भी उसमें बाद के सम्राटों, जैसे ट्राजन और हैड्रियन, जैसी कल्पनाशीलता या दूरगामी विस्तारवादी दृष्टि नहीं थी। इसके बावजूद वेस्पासियन ने गृहयुद्ध की विभीषिका को समाप्त कर साम्राज्य को विघटन से बचाया। इसी कारण उसके सिक्कों पर ‘पैक्स’ (शांति) का चित्रण प्रमुखता से मिलता है।

वेस्पासियन ने फ्लाविया डोमिटिल्ला से विवाह किया था, जिससे उसके दो पुत्र—टाइटस और डोमिटियन तथा एक पुत्री फ्लाविया डोमिटिल्ला उत्पन्न हुई। सम्राट बनने से पूर्व ही उसकी पत्नी और पुत्री का निधन हो चुका था। इसके बाद वह कैनीस के साथ रहने लगा, जो एंटोनिया माइनर की मुक्तदासी और विश्वस्त सचिव रह चुकी थी।

इस प्रकार वेस्पासियन एक व्यावहारिक, कुशल और दूरदर्शी शासक था, जिसने गृहयुद्ध और राजनीतिक अराजकता का अंत कर रोमन साम्राज्य में स्थिरता स्थापित की। उसने शांति स्थापना के साथ-साथ साम्राज्य की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ किया, प्रशासनिक व्यवस्था को पुनर्गठित किया और रोम के प्रसिद्ध फ्लेवियन एम्फीथिएटर (कोलोसियम) के निर्माण का शुभारंभ करवाया।

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