नर्वा-एंटोनाइन राजवंश (96–192 ई.)
डोमिटियन की हत्या के बाद सीनेट ने 96 ईस्वी में 61 वर्षीय नर्वा को रोमन सम्राट घोषित किया, जिससे नर्वा-एंटोनाइन राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश के सात सम्राटों ने 96 ईस्वी से 192 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। इनमें से प्रथम पाँच शासक- नर्वा, ट्राजन, हैड्रियन, एंटोनिनस पायस और मार्कस ऑरेलियस विश्व इतिहास में ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ (फाइव गुड एम्परर्स) के नाम से प्रसिद्ध हैं और उनका शासनकाल रोमन साम्राज्य का स्वर्णयुग माना जाता है।
नर्वा-एंटोनाइन राजवंश इतिहास में अपनी ‘दत्तक उत्तराधिकार प्रणाली’ के लिए प्रसिद्ध है, जिसके अंतर्गत सम्राट अपने जैविक पुत्रों के स्थान पर दत्तक ग्रहण (गोद लेने) की परंपरा के माध्यम से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते थे। रोमन विधि में दत्तक पुत्र को वास्तविक पुत्र के समान ही कानूनी अधिकार प्राप्त होते थे। अतः सम्राट योग्य उत्तराधिकारी को गोद लेकर शासन की स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करते थे।
रोमन अभिजात परिवारों में दत्तक ग्रहण की परंपरा पहले से ही प्रचलित थी। सम्राट ऑगस्टस ने टिबेरियस को तथा सम्राट क्लॉडियस ने नीरो को गोद लिया था। इसी प्रकार जूलियस सीज़र ने अपने प्रपौत्र-भतीजे गायस ऑक्टावियस को दत्तक ग्रहण किया, जो बाद में ऑगस्टस के नाम से रोम का प्रथम सम्राट बना।
नर्वा-एंटोनाइन वंश में भी उत्तराधिकार प्रायः इसी व्यवस्था के अनुसार संपन्न किया गया। नर्वा ने ट्राजन को, ट्राजन ने हैड्रियन को, हैड्रियन ने एंटोनिनस पायस को तथा एंटोनिनस पायस ने मार्कस ऑरेलियस और लूसियस वेरस को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। मार्कस ऑरेलियस द्वारा अपने पुत्र कॉमोडस को उत्तराधिकारी नियुक्त करना परवर्ती इतिहासकारों की दृष्टि में एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय माना जाता है, क्योंकि इसके साथ ही रोमन साम्राज्य के क्रमिक पतन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई।
नर्वा (96–98 ई.)
नर्वा सीनेट द्वारा चुने गए रोम के प्रसिद्ध ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ के क्रम में पहला था। यद्यपि उसका शासनकाल अल्पकालिक था, फिर भी उसने सेना, सीनेट और सामान्य जनता के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। उसने अपने पूर्ववर्ती डोमिटियन के निरंकुश शासन के दौरान छीनी गई स्वतंत्रता को बहाल किया, करों में कमी की और कृषि सुधार किए। सेना और प्रेटोरियन गार्ड के विद्रोहों से बचने के लिए उसने योग्य और लोकप्रिय सैन्य कमांडर ट्राजन को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी बनाया। जनवरी 98 ईस्वी में स्ट्रोक के कारण उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद ट्राजन रोम का सम्राट बना।
ट्राजन (98–117 ई.)
रोमन सम्राट ट्राजन की गणना प्राचीन रोम के सर्वश्रेष्ठ शासकों में की जाती है। उसने न केवल रोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, न्याय, सार्वजनिक निर्माण और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। यही कारण है कि उसका शासनकाल रोमन इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में से एक है।
ट्राजन का जन्म हिस्पानिया (स्पेन) में हुआ था। वह रोम का पहला ऐसा सम्राट था, जिसक जन्म इटली के बाहर किसी प्रांत में हुआ था। उसकी सैनिक प्रतिभा और प्रशासनिक योग्यता के कारण सम्राट नर्वा ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
98 ई. में नर्वा की मृत्यु के बाद ट्राजन रोम का सम्राट बना। सत्ता ग्रहण करते समय उसने सीनेट का सम्मान बनाए रखा और स्वयं को राज्य का सेवक बताया। इस विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा ने उसे जनता तथा अभिजात वर्ग दोनों का प्रिय बना दिया।
ट्राजन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी सैन्य विजयों में निहित है। डैन्यूब नदी के उत्तर में स्थित डेसिया (रोमानिया का क्षेत्र) रोमन साम्राज्य के लिए चुनौती बना हुआ था। ट्राजन ने 101–102 ई. तथा 105–106 ई. के अभियानों में डेसिया के शक्तिशाली शासक डेसेबलस को पराजित कर उस प्रदेश को रोम में मिला लिया। डेसिया की विजय से रोम को अपार धन, सोने-चाँदी की खदानें और नए संसाधन प्राप्त हुए, जिससे साम्राज्य की आर्थिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
डेसिया की विजय के पश्चात ट्राजन ने पूरब की ओर अरब के नबाताई राज्य को जीतकर रोमन साम्राज्य का प्रांत बनाया। इसके बाद पार्थिया के विरुद्ध अभियान चलाकर उसने अर्मीनिया, मेसोपोटामिया तथा असीरिया के विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। 116 ई. तक रोमन साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया।
ट्राजन केवल विजेता ही नहीं, बल्कि एक न्यायप्रिय और कुशल प्रशासक भी था। उसका सिद्धांत था कि किसी निर्दोष व्यक्ति को दंड नहीं मिलना चाहिए, भले ही इससे कुछ अपराधी बच जाएँ। वह अधिकारियों से ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और जनहित की अपेक्षा करता था। प्रांतीय प्रशासन पर उसकी विशेष दृष्टि रहती थी। जिन नगरों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी, वहाँ उसने योग्य अधिकारियों को भेजकर वित्तीय व्यवस्था सुधारने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से उसने प्रसिद्ध लेखक और प्रशासक कनिष्ठ प्लिनी (प्लिनी द यंगर) को बिथीनिया प्रांत में नियुक्त किया था।
ट्राजन के शासनकाल में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को विशेष प्रोत्साहन मिला। उसने सड़कों, पुलों, भवनों, मंदिरों और पुस्तकालयों का निर्माण कराया। यातायात और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अनेक राजमार्ग बनाए गए। रोम में निर्मित ‘ट्राजन फोरम’ तथा ‘ट्राजन स्तंभ’ उसकी उपलब्धियों के प्रतीक हैं। इन निर्माण कार्यों से न केवल साम्राज्य की भव्यता बढ़ी, बल्कि आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के अवसरों को भी प्रोत्साहन मिला।
आर्थिक क्षेत्र में भी ट्राजन ने संतुलित नीति अपनाई। उसने नए कर लगाने के बजाय प्रचलित करों में कमी करने का प्रयास किया और व्यापार तथा कृषि को बढ़ावा दिया। गरीब बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा के लिए उसने ‘अलिमेंटा’ नामक योजना चलाई, जिसके अंतर्गत राज्य की ओर से सहायता प्रदान की जाती थी। इससे समाज के कमजोर वर्गों को लाभ मिला और राज्य के प्रति जनता का विश्वास बढ़ा।
यद्यपि ट्राजन की विजयों ने रोम की शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया, फिर भी साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार भविष्य की समस्याओं का कारण बनने लगा। पूर्वी क्षेत्रों में विद्रोह होने लगे और पार्थिया के विरुद्ध संघर्ष जारी रहा। मेसोपोटामिया, मिस्र तथा सीरीन के यहूदियों ने भी विद्रोह कर दिया। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए ट्राजन ने अपने सेनापतियों को विभिन्न क्षेत्रों में भेजा, जबकि वह स्वयं स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करता रहा। 117 ई. में रोम लौटते समय सिलिसिया के सेलिनस नगर में 64 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। ट्राजन की मृत्यु के बाद उसकी अस्थियाँ रोम लाकर सम्मानपूर्वक स्थापित की गईं। उसके उत्तराधिकारी हैड्रियन ने उसकी स्मृति को आदरपूर्वक संरक्षित रखा।
इस प्रकार ट्राजन का शासनकाल रोमन इतिहास में साम्राज्यवादी विस्तार, सुशासन, न्यायप्रियता और लोककल्याण का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। उसकी सैन्य सफलताओं, प्रशासनिक दक्षता और जनहितकारी नीतियों ने उसे रोम के महानतम सम्राटों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। आज भी ट्राजन को उस शासक के रूप में स्मरण किया जाता है, जिसने रोमन साम्राज्य को उसकी सर्वाधिक शक्ति, समृद्धि और गौरव प्रदान किया।
पब्लियस ऐलियस हैड्रियन (117–138 ई.)
ट्राजन की मृत्यु के बाद 117 ई. में पब्लियस एलियस हैड्रियन रोम का सम्राट बना। उसके उत्तराधिकार को लेकर प्राचीन इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि ट्राजन ने स्वयं उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया था, जबकि अन्य के अनुसार ट्राजन की पत्नी पोम्पेया प्लोटिना ने उसकी उत्तराधिकार-प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
हैड्रियन का जन्म स्पेन के इटालिका नगर में हुआ था, जो ट्राजन का भी जन्मस्थान था। बाल्यावस्था में ही उसके पिता का निधन हो गया था, जिसके कारण उसका पालन-पोषण ट्राजन तथा सीलियस एट्टियानुस ने किया। उसकी पत्नी विबिया सबीना संभवतः ट्राजन की भांजी-नातिन थी।
हैड्रियन अत्यंत विद्वान, जिज्ञासु और बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। उसने साहित्य, दर्शन, संगीत, चिकित्सा, गणित, चित्रकला तथा मूर्तिकला का गहन अध्ययन किया था। उसे यूनानी संस्कृति से विशेष प्रेम था और वह स्वयं को यूनानी सभ्यता का प्रशंसक मानता था।
ट्राजन की तुलना में हैड्रियन का दृष्टिकोण अधिक शांतिपूर्ण था। वह निरंतर युद्धों और साम्राज्य-विस्तार की नीति का समर्थक नहीं था। उसका मानना था कि अत्यधिक विस्तार से साम्राज्य की शक्ति कमजोर हो सकती है। इसलिए सिंहासन ग्रहण करने के बाद उसने ट्राजन द्वारा विजित अर्मीनिया, असीरिया और मेसोपोटामिया जैसे क्षेत्रों से रोमन सेनाएँ वापस बुला लीं। अर्मीनिया को प्रत्यक्ष रोमन प्रांत बनाने के स्थान पर आश्रित राज्य का दर्जा दिया गया और फरात (यूफ्रेटीज़) नदी को साम्राज्य की पूर्वी सीमा स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार उसने विजय की अपेक्षा साम्राज्य के संगठन और स्थिरता पर अधिक ध्यान दिया।
हैड्रियन का शासन लगभग बीस वर्षों तक शांति और सुव्यवस्था का प्रतीक बना रहा। यद्यपि उसके शासन के प्रारंभ में कुछ सेनानायकों ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र किया, किंतु उनका प्रयास विफल रहा। इसके बाद उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों का व्यापक भ्रमण किया और प्रत्यक्ष रूप से प्रशासनिक व्यवस्था का निरीक्षण किया। वह उन विरले रोमन सम्राटों में था, जो राजधानी में बैठकर शासन करने के बजाय स्वयं प्रांतों का दौरा करते थे।
निर्माण कार्यों के क्षेत्र में हैड्रियन ने ब्रिटेन में टाइन नदी से सोलवे फर्थ तक प्रसिद्ध हैड्रियन दीवार का निर्माण करवाया, जिसका उद्देश्य रोमन क्षेत्रों को उत्तरी बर्बर जातियों के आक्रमणों से सुरक्षित करना था। एशिया माइनर, यूनान और रोम में उसने अनेक मंदिरों, स्नानागारों, नाट्यशालाओं और सार्वजनिक भवनों का निर्माण करवाया। विशेष रूप से एथेंस के प्रति उसका प्रेम प्रसिद्ध था, जहाँ उसने अनेक भव्य निर्माण कार्य करवाए।
आर्थिक क्षेत्र में भी हैड्रियन ने महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने कर-वसूली की प्रणाली को अधिक व्यवस्थित बनाया तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए राजकोषीय अधिकारियों की नियुक्ति की। किसानों की कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए उसने भूमि, लगान और श्रम-संबंधी समस्याओं पर विचार किया। उसके सुधारों का उद्देश्य किसानों तथा सामान्य जनता को राहत प्रदान करना था। उसने कई पुराने करों को समाप्त कर दिया, जिससे जनता को राहत मिली, किंतु राजकोष को भारी राजस्व-हानि उठानी पड़ी।
न्याय और प्रशासन के क्षेत्र में हैड्रियन ने योग्य व्यापारियों, सीनेटरों और विधिवेत्ताओं को सम्मिलित करके एक ‘परामर्श परिषद’ (कौंसिलियम) का गठन किया, जो शासन-नीति के निर्धारण में सहायता करती थी। उसने प्रसिद्ध विधिवेत्ता जूलियन से रोमन कानूनों का संहिताकरण करवाया। एक न्यायप्रिय शासक के रूप में हैड्रियन दुर्बलों, दासों, छोटे किसानों और सामान्य प्रजा के हितों की रक्षा करने का प्रयास करता था। उसके निर्णय प्रायः सामाजिक न्याय और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित होते थे।
हैड्रियन की नीतियों के परिणामस्वरूप रोमन साम्राज्य में शांति, समृद्धि और प्रशासनिक दक्षता अपने उच्च स्तर पर पहुँच गई। उसके शासनकाल में रोम केवल कर-संग्रह करने वाला राज्य नहीं रहा, बल्कि एक सुव्यवस्थित और उत्तरदायी साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ।
किंतु हैड्रियन के शासन के अंतिम वर्षों में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। 132–135 ई. के बीच यहूदियों ने रोमन शासन के विरुद्ध भीषण विद्रोह किया, जिसे ‘बार-कोखबा विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है। यद्यपि हैड्रियन ने कठोर सैन्य कार्रवाई द्वारा इस विद्रोह का दमन कर दिया, परंतु इस संघर्ष के दौरान वह क्षय तथा जलोदर जैसे गंभीर रोगों से पीड़ित हो गया।
उत्तराधिकार की समस्या को ध्यान में रखते हुए हैड्रियन ने सर्वप्रथम लूसियस सीओनियस कॉमोडस (लूसियस ऐलियस सीज़र) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। किंतु 138 ई. में उसकी अकाल मृत्यु हो जाने पर हैड्रियन ने टाइटस औरेलियस एंटोनिनस (एंटोनिनस पायस) को दत्तक ग्रहण कर अपना उत्तराधिकारी बनाया। साथ ही उसने एंटोनिनस पायस के समक्ष यह शर्त रखी कि वह मार्कस एन्नियस वेरस (मार्कस ऑरेलियस) तथा लूसियस ऐलियस के पुत्र लूसियस औरेलियस वेरस (लूसियस वेरस) को गोद लेकर उनको शासन-प्रशासन का प्रशिक्षण देगा। इस प्रकार हैड्रियन ने उत्तराधिकार की समस्या का समाधान करते हुए साम्राज्य के लिए योग्य उत्तराधिकारियों की व्यवस्था सुनिश्चित की। अंततः 138 ई. में लगभग इक्कीस वर्षों तक शासन करने के बाद 62 वर्ष की आयु में हैड्रियन की मृत्यु हो गई।
एंटोनिनस पायस (138–161 ई.)
हैड्रियन के बाद उसका उत्तराधिकारी एंटोनिनस पायस 138 ई. में रोमन साम्राज्य का सम्राट बना। उसका पूरा नाम कैसर टाइटस एलियस हैड्रियनस एंटोनिनस ऑगस्टस पायस था। उसका जन्म 19 सितंबर 86 ई. को लैटियम के लैनुवियम नगर में एक संपन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वह रोमन सम्राट हैड्रियन का विश्वसनीय सलाहकार था और 138 ई. में हैड्रियन ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। सम्राट बनने के बाद उसने हैड्रियन को देवता घोषित किया, जो उसकी स्वामिभक्ति और निष्ठा का प्रमाण है।
एंटोनिनस का लगभग तेईस वर्षों का शासनकाल रोमन इतिहास के सबसे शांतिपूर्ण और स्थिर कालों में गिना जाता है। उसने ब्रिटेन तथा अन्य प्रांतों में हुए विद्रोहों को सफलतापूर्वक दमन किया और उत्तरी ब्रिटेन में साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एंटोनाइन दीवार का निर्माण करवाया।
एंटोनिनस न्यायप्रिय उदार और कुशल प्रशासक था। उसने अनेक ऐसे कानून बनाए जिनसे दासों, अनाथों और निर्धनों की स्थिति में सुधार हुआ। उसने प्रजा के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया और प्रशासन को मानवीय बनाने का प्रयास करता था। उसकी कर्तव्यपरायणता के कारण उसे ‘पायस’ (धर्मनिष्ठ या कर्तव्यपरायण) की उपाधि मिली थी।
आर्थिक दृष्टि से भी हैड्रियन का शासनकाल अत्यंत सफल रहा। व्यापार, कृषि और उद्योग निरंतर उन्नति करते रहे। राजस्व व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रही, जिससे राजकोष निरंतर समृद्ध होता रहा और साम्राज्य की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ हुई। कहा जाता है कि उसकी मृत्यु के समय रोमन कोषागार में लगभग 2.7 अरब सेस्टर्स की धनराशि सुरक्षित थी।
एंटोनिनस की 7 मार्च 161 ई. को लगभग चौहत्तर वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। उसके साथ रोम के स्वर्णिम और शांतिपूर्ण युग का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
रोमन सम्राट एंटोनिनस पायस की मृत्यु के बाद मार्कस ऑरेलियस (161-180 ई.) और लूसियस वेरस (161-169 ई.) संयुक्त रूप से सम्राट बने। मार्कस ऑरेलियस ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ में से एक था और वह इतिहास का अंतिम महान दार्शनिक सम्राट माना जाता है, जिसने स्टोइक दार्शन पर ‘मेडिटेशंस’ जैसी प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
मार्कस ऑरेलियस के दत्तक भाई तथा सहशासक लूसियस वेरस की 169 ईस्वी में बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु हो गई। इसके बाद मार्कस ऑरेलियस ने अपने पुत्र कॉमोडस को 177 ईस्वी में सहशासक घोषित किया। तत्पश्चात मार्कस ऑरेलियस ने 180 ईस्वी में अपनी मृत्यु तक शासन किया।
कॉमोडस (180–192 ई.)
मार्कस ऑरेलियस की मृत्यु (180 ई.) के बाद उसका पुत्र और सहशासक कॉमोडस 180 ई. में रोमन सम्राट बना, जो रोमन साम्राज्य के इतिहास में अपने क्रूर, विचित्र और आत्म-केंद्रित कृत्यों के लिए जाना जाता है।
कॉमोडस ने साम्राज्य को सँभालने के बजाय अपना अधिकांश समय मनोरंजन, शिकार और हरम में बिताया, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर होने लगी। 182 ईस्वी में उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा गया, परंतु वह असफल रहा। इसके बाद वह अत्यधिक शक्की और क्रूर बन गया। जिस किसी पर भी उसे संदेह होता, उसे दंडित करता या मृत्युदंड दिलवा देता था। उसके क्रूर और विक्षिप्त शासन ने 84 वर्षों की शांति एवं समृद्धि के युग (पैक्स रोमाना) का अंत कर दिया।
कॉमोडस ने रोम शहर का नाम बदलकर अपने नाम पर ‘कोलोनिया कॉमोडियाना’ रखा और स्वयं को पौराणिक वीर हरक्युलिस का अवतार घोषित किया। जब राजकोष का धन सार्वजनिक कल्याण के स्थान पर प्रदर्शन, खेलों और व्यक्तिगत विलासिता पर व्यय किया जाने लगा, तो जनता और अभिजात वर्ग दोनों असंतुष्ट हो गए। अंततः 192 ई. में उसकी प्रेयसी मर्सिया, राजमहल के अधिकारी इक्लेक्टस तथा प्रायटोरियन प्रीफेक्ट लीटस ने षड्यंत्र रचकर मल्लयोद्धा नरसिसस के माध्यम से 31 दिसंबर 192 ई. को उसकी हत्या करवा दी। कॉमोडस की मृत्यु के साथ ही एंटोनाइन राजवंश का अंत हो गया।
पाँच सम्राटों का वर्ष (193 ई.)
रोमन इतिहास में 193 ईस्वी को ‘पाँच सम्राटों का वर्ष’ कहा जाता है। दिसंबर 192 ईस्वी में सम्राट कॉमोडस की हत्या के बाद उत्तराधिकार का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया, जिसके परिणामस्वरूप पर्टिनैक्स, डिडियस जूलियनस, पेस्केनियस निगर, क्लोदियस अल्बिनस तथा सेप्टिमियस सेवेरस ने विभिन्न समयों पर रोमन सम्राट होने का दावा किया। जनवरी 193 ई. में पर्टिनैक्स सम्राट बना, किंतु प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधारों के प्रयासों से असंतुष्ट प्रेटोरियन गार्ड ने लगभग तीन माह बाद उसकी हत्या कर दी। इसके पश्चात प्रेटोरियन गार्ड ने सम्राट पद की खुले रूप से नीलामी कर दी और सर्वाधिक धनराशि देने वाले डिडियस जूलियनस को सम्राट घोषित किया। किंतु जनता, सीनेट और सेना का व्यापक समर्थन प्राप्त न होने के कारण उसका शासन अत्यंत अल्पकालिक सिद्ध हुआ।
इस राजनीतिक अराजकता का लाभ उठाकर सीरिया के गवर्नर पेस्केनियस निगर तथा ब्रिटेन के गवर्नर क्लोदियस अल्बिनस ने भी सम्राट पद का दावा प्रस्तुत किया। दूसरी ओर, शक्तिशाली सेनानायक सेप्टिमियस सेवेरस ने अपनी सेना के समर्थन से रोम की ओर कूच किया, डिडियस जूलियनस को पदच्युत कराया और क्रमशः अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया। पेस्केनियस निगर गृहयुद्ध में मारा गया, जबकि क्लोदियस अल्बिनस 197 ईस्वी में लुगडुनम (ल्योन) के युद्ध में पराजित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। अंततः सेप्टिमियस सेवेरस रोमन साम्राज्य का निर्विवाद सम्राट बना और उसने सेवेरन वंश की स्थापना की। इस प्रकार 193 ईस्वी का ‘पाँच सम्राटों का वर्ष’ रोमन इतिहास में उत्तराधिकार-संघर्ष, गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक माना जाता है।




