रोमन साम्राज्य के पतन के कारण (Causes of the fall of the Roman Empire)

रोमन साम्राज्य के पतन के कारण (Causes of the fall of the Roman Empire)

रोमन साम्राज्य के पतन के कारण

प्रथम एवं द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिमी जगत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने वाला रोमन साम्राज्य पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के अंत तक पतन की स्थिति में पहुँच गया। यह साम्राज्य, जिसने यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के विशाल भू-भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया था, धीरे-धीरे आंतरिक दुर्बलताओं और बाहरी आक्रमणों के कारण कमजोर होता गया।

रोमन साम्राज्य के पतन के कारणों का निर्धारण करना इतिहासकारों के लिए अत्यंत कठिन कार्य रहा है। इतिहासकार जे. एस. रीड ने उचित ही कहा है कि ‘रोमन साम्राज्य के उत्थान का विवरण देना जितना जटिल है, उतना ही इसके पतन के कारणों को स्पष्ट करना भी कठिन है।’ इसी प्रकार प्रसिद्ध इतिहासकार विल ड्युरैंट ने लिखा है कि ‘रोमन साम्राज्य के पतन में जितना समय लगा, उतने समय में तो कुछ राष्ट्रों का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है।’ इस प्रकार रोम के पतन के पीछे कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं था, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सैनिक, नैतिक तथा प्रशासनिक अनेक कारणों के सम्मिलित प्रभाव से यह महान साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर हुआ।

नैतिक पतन

कुछ इतिहासकारों का मत है कि रोमन साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण रोमन समाज का नैतिक पतन था। एच. जी. वेल्स के अनुसार ‘संपत्ति ने रोमनों के पैर पृथ्वी से हटा दिए।’ प्रारंभिक काल के रोमन नागरिक अत्यंत परिश्रमी, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ थे, किंतु साम्राज्य विस्तार के साथ प्राप्त अपार धन-संपत्ति ने उनके जीवन में विलासिता, भोगवाद और आलस्य को बढ़ावा दिया। धीरे-धीरे रोमन समाज में भ्रष्टाचार, व्यभिचार, स्वार्थ, विश्वासघात, असंयम और नैतिक पतन की प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगीं। धनी वर्ग अत्यधिक विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगा, जिससे सामाजिक आदर्श कमजोर पड़ने लगे। यद्यपि सभी इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं। यह तर्क दिया जाता है कि सम्राट आगस्टस के समय भी नैतिक समस्याएँ मौजूद थीं, फिर भी वह काल रोमन इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है। इसलिए केवल नैतिक पतन को साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता। इतिहासकार आर. पी. त्रिपाठी ने भी कहा है कि नैतिकता की अवहेलना, धार्मिक अंधविश्वास, संपत्ति की वृद्धि अथवा यौन संबंधों की स्वतंत्रता आदि को रोम के पतन का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं है। इन कारणों में कुछ सत्यता अवश्य हो सकती है, परंतु इन्हें अत्यधिक महत्त्व देना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं है।

जनतंत्रात्मक व्यवस्था का पतन

कुछ विद्वानों ने रोमन साम्राज्य के पतन का कारण उसकी जनतंत्रात्मक संस्थाओं के पतन को माना है। प्रारंभ में रोम में सीनेट और जनता की संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था, लेकिन धीरे-धीरे सम्राटों की शक्ति बढ़ती गई और सीनेट का प्रभाव कम होता गया। शासन की शक्ति कुछ निरंकुश व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो गई। उन्होंने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता का शोषण करना प्रारंभ कर दिया। सामान्य नागरिकों के अधिकार सीमित होते गए और उनमें राज्य के प्रति सहयोग तथा निष्ठा की भावना कमजोर होने लगी। किंतु केवल जनतंत्र के पतन को रोम के पतन का पूर्ण कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि किसी भी शासन व्यवस्था की स्थिरता केवल राजनीतिक संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती। जब आर्थिक, सामाजिक और सैनिक समस्याएँ गंभीर हो जाएँ तो मजबूत शासन व्यवस्था भी साम्राज्य को बचाने में असमर्थ हो सकती है।

साम्राज्यवाद की नीति

इतिहासकार ई. एम. बर्न्स के अनुसार रोम के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसकी साम्राज्यवादी नीति थी। रोमन शासक निरंतर विजय और विस्तार की नीति अपनाते रहे। उन्होंने नए क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिए युद्ध, हिंसा, लूट और कठोर दमन का सहारा लिया। इटली पर अधिकार स्थापित करने के बाद रोमनों ने भूमध्यसागर पर प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद उनका साम्राज्य स्पेन से पश्चिमी एशिया तक, ब्रिटेन से डेन्यूब नदी तक और भूमध्यसागर के दोनों तटों तक फैल गया। इतने विशाल क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखना अत्यंत कठिन था। डेन्यूब नदी के पार, काला सागर के क्षेत्रों तथा दजला-फरात नदियों के पार रहने वाली युद्धप्रिय जातियों से रोम को लगातार संघर्ष करना पड़ा।

रोमन विजयों के कारण गुलामों की संख्या में वृद्धि हुई। युद्धबंदियों को दास बना लिया जाता था और विजित प्रदेशों से धन, कला-वस्तुएँ तथा संपत्ति रोम लाई जाती थी। इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी और एक शोषित वर्ग तैयार हुआ। लगातार युद्धों के कारण कृषि, व्यापार और आर्थिक विकास प्रभावित हुआ। साथ ही, रोमन साम्राज्य की आक्रामक नीति ने अन्य जातियों में शत्रुता उत्पन्न की, जिसके परिणामस्वरूप बाद में रोम को बाहरी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। इस प्रकार साम्राज्यवाद ने जहाँ रोम को महान बनाया, वहीं उसने उसके पतन की नींव भी तैयार कर दी।

निरंकुश शासन

रोमन सम्राट धीरे-धीरे निरंकुश और स्वेच्छाचारी होते गए। इससे नागरिक स्वतंत्रता समाप्त होने लगी और लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ गईं। स्थानीय शासन में योग्य व्यक्तियों की भूमिका घट गई। प्रशासनिक अधिकारी भी सम्राट के सामने स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने से डरने लगे। इससे जनता और शासन के बीच दूरी बढ़ती गई। करों में लगातार वृद्धि की गई। व्यापारी, बुद्धिजीवी, कृषक और उद्योगपति सभी भारी करों से परेशान होने लगे। मनमाने कानून बनाकर जनता पर थोपे जाते थे। सम्राट कान्स्टैन्टाइन के समय व्यक्ति को अपना पारंपरिक पारिवारिक व्यवसाय छोड़ने की स्वतंत्रता भी नहीं थी। ऐसी परिस्थितियों में जनता में असंतोष और शासन के प्रति उदासीनता बढ़ती गई।

साम्राज्य की विशालता

इतिहासकार ट्रेवर के अनुसार रोमन साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार उसके पतन का एक प्रमुख कारण था। विशाल भू-भाग पर शासन करना कठिन होता गया। साम्राज्य-विस्तार के कारण रोम में अपार धन और गुलाम आए। इससे शासक वर्ग विलासिता में डूब गया। गणतांत्रिक आदर्शों का स्थान राजतंत्र ने ले लिया।

इतने विशाल साम्राज्य को एक केंद्रीय सत्ता के अधीन बनाए रखना कठिन था। दूरस्थ प्रांतों में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। साम्राज्य विस्तार के कारण व्यापारिक परिस्थितियों में भी परिवर्तन आया। प्रांतों में उद्योग विकसित होने लगे और रोम के कारीगर वहाँ जाने लगे। इससे इटली के उद्योगों को नुकसान पहुँचा और व्यापार कमजोर हुआ।

प्रांतीय विद्रोह

रोमन साम्राज्य की विशालता के कारण इसे अनेक प्रांतों में विभाजित किया गया था। जब तक केंद्र मजबूत रहा, प्रांत सम्राट की आज्ञा मानते रहे, लेकिन कमजोर शासकों के समय उन्होंने स्वतंत्र होने का प्रयास किया। टाइबेरियस के समय पन्नोनिया और जर्मनी में विद्रोह हुए। नीरो के समय स्पेन और ब्रिटेन ने विद्रोह किया। कई बार सेना के सेनापतियों ने भी स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। वलेरियन के शासनकाल में फारस के शासक शापुर ने रोमन सम्राट को पराजित कर बंदी बना लिया। यह घटना रोमन साम्राज्य की दुर्बलता का प्रतीक थी। साम्राज्य को बचाने के लिए उसे चार भागों में बाँटा गया, लेकिन यह विभाजन भी लाभकारी सिद्ध होने के बजाय गृहयुद्ध और संघर्ष का कारण बन गया।

सैनिक पतन

रोमन साम्राज्य की शक्ति का मुख्य आधार उसकी सेना थी, किंतु बाद में सेना कमजोर होती गई। सम्राट गैलेनियस ने सीनेट के प्रभाव को कम करने के लिए सीनेटरों की सेना में भर्ती पर रोक लगा दी। इसके बाद सेना में प्रांतीय और बर्बर जातियों के लोगों की संख्या बढ़ने लगी। ये सैनिक रोमन राज्य के प्रति उतने निष्ठावान नहीं थे। वे प्रायः धन और लूट के लिए युद्ध करते थे। कठिन परिस्थितियों में वे युद्ध से भाग भी जाते थे। प्रांतीय सेनाएँ कई बार अपने सेनापतियों के साथ मिलकर विद्रोह कर देती थीं। इससे केंद्रीय सत्ता कमजोर होती गई। इसके अतिरिक्त, रोम ने सैन्य तकनीक और रक्षा व्यवस्था के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। शक्तिशाली नौसेना और आधुनिक हथियारों के अभाव ने साम्राज्य को कमजोर बना दिया।

उत्तराधिकार के निश्चित नियम का अभाव

रोम में सम्राट के उत्तराधिकारी के लिए कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी। इसलिए प्रत्येक सम्राट की मृत्यु के बाद सत्ता-संघर्ष, षड्यंत्र और गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। राजपरिवार के सदस्य भी सत्ता प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध हो जाते थे। सेना भी इस संघर्ष में हस्तक्षेप करने लगी और जिसकी सेना मजबूत होती वही सम्राट बन जाता। 192 ई. से 284 ई. के बीच का काल विशेष रूप से राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और षड्यंत्रों से भरा हुआ था। इसका लाभ बाहरी शत्रुओं ने उठाया और साम्राज्य कमजोर होता गया।

सामाजिक कारण

रोमन समाज में प्रारंभ से ही पैट्रिशियन और प्लेबियन दो वर्ग थे। उच्च वर्ग के पास अधिकार और संपत्ति थी, जबकि निम्न वर्ग अधिकारों से वंचित था। साम्राज्य काल में सामाजिक संरचना में परिवर्तन आया। बाहरी प्रदेशों के लोग रोम में बसने लगे और उन्हें नागरिकता भी प्राप्त हुई। इससे पारंपरिक रोमन सामाजिक व्यवस्था बदल गई। धन और विलासिता के कारण उच्च वर्ग में नैतिक पतन बढ़ा। मनोरंजन के लिए हिंसक खेल आयोजित किए जाते थे। व्यभिचार, तलाक, अनैतिक संबंध और पारिवारिक मूल्यों का पतन बढ़ने लगा। विवाह संस्था कमजोर हुई और जनसंख्या वृद्धि में कमी आई। इससे रोमन समाज की आंतरिक शक्ति कमजोर हो गई।

आर्थिक कारण

प्रारंभिक काल में समृद्ध रोम आर्थिक दृष्टि से उत्तरकाल में कमजोर हो गया। लगातार युद्धों के कारण किसानों को सेना में भर्ती होना पड़ता था, जिससे कृषि व्यवस्था प्रभावित हुई। बड़े भू-स्वामियों ने छोटे किसानों की भूमि खरीद ली और खेती का नियंत्रण दासों के हाथों में चला गया। इससे स्वतंत्र कृषक वर्ग कमजोर हुआ। उद्योग और व्यापार में भी गिरावट आई। व्यवसाय बदलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई। रोम का आयात अधिक और निर्यात कम होता गया। विलासिता की वस्तुओं के लिए धन बाहर जाने लगा। मुद्रा व्यवस्था भी खराब हो गई और सिक्कों में घटिया धातुओं का प्रयोग बढ़ गया। आर्थिक संकट के कारण बेरोजगारी, निर्धनता और जनता में असंतोष बढ़ गया।

तकनीकी पतन

कुछ इतिहासकारों के अनुसार रोम के पतन का एक कारण तकनीकी पिछड़ापन भी था। रोम ने विशाल साम्राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सैन्य तकनीक और यातायात साधनों का पर्याप्त विकास नहीं किया। पुराने सैन्य तरीकों पर निर्भरता बनी रही। समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे और संचार व्यवस्था भी सीमित थी। इस कारण इतने विशाल साम्राज्य का प्रशासन और रक्षा करना कठिन हो गया।

पौर्वात्य आदर्शों के प्रति आकर्षण

कुछ इतिहासकारों का मत है कि रोम साम्राज्य के पतन का एक कारण उसका पौर्वात्य (पूर्वी) आदर्शों और परंपराओं की ओर अत्यधिक आकर्षित होना भी था। उनके अनुसार रोम ने अपनी मौलिक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को छोड़कर पूर्वी देशों की अनेक व्यवस्थाओं को अपना लिया, जिससे उसकी पुरानी शक्ति और जीवंतता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। पूर्वी देशों, विशेषकर एशियाई राज्यों की परंपरा के प्रभाव में रोम में श्रमिकों से कृषि कार्य करवाने की प्रवृत्ति बढ़ी। इसी प्रकार पैतृक व्यवसाय को अनिवार्य बनाने की व्यवस्था लागू की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार व्यवसाय का चयन नहीं कर सकता था। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त होने लगी और समाज में गतिशीलता का अभाव उत्पन्न हुआ। रोम ने पूर्वी निरंकुश राजतंत्र की परंपराओं को भी अपनाना प्रारंभ कर दिया। सम्राट डिओक्लीशियन और कान्स्टैन्टाइन के दरबारों की व्यवस्थाएँ पारसीक (फारसी) राजदरबारों से प्रभावित थीं। सम्राटों को अत्यधिक सम्मान दिया जाने लगा और वे स्वयं को सामान्य मनुष्यों से ऊपर समझने लगे।

साहित्य के क्षेत्र में भी रोमन मौलिकता कमजोर पड़ने लगी। यूनानी साहित्यिक परंपराओं का इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि रोमन साहित्य अपनी स्वतंत्र पहचान खोने लगा। इसी प्रकार कला के क्षेत्र में भी यूनानी कला-शैली का प्रभुत्व बढ़ गया और रोमन कला की मौलिकता कम होती गई। दार्शनिक क्षेत्र में भी पौर्वात्य विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ा। रोमन समाज में तर्कवादी दृष्टिकोण कमजोर होकर रहस्यवादी विचारों का प्रभाव बढ़ने लगा। स्टोइक दर्शन और नियो-प्लेटोनिक दर्शन जैसी विचारधाराएँ लोकप्रिय हुईं। मेसोपोटामिया के प्रभाव से ज्योतिष, जादू-टोना और अभिचार जैसी मान्यताओं में विश्वास बढ़ने लगा। इन पौर्वात्य प्रभावों के कारण रोमन समाज में पारलौकिक जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ा और सांसारिक कर्तव्यों के प्रति उदासीनता उत्पन्न होने लगी। इससे रोम के पुराने आदर्श—कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, साहस और राष्ट्रभक्ति कमजोर पड़ गए। परिणामस्वरूप रोमन साम्राज्य आंतरिक रूप से दुर्बल होता गया।

अयोग्य उत्तराधिकारी

रोमन साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण आगस्टस के बाद आने वाले अनेक अयोग्य और कमजोर शासक भी थे। आगस्टस के पश्चात अधिकांश सम्राटों में वह योग्यता, दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता नहीं थी, जिसके बल पर इतने विशाल साम्राज्य को संगठित और सुरक्षित रखा जा सके। ये शासक न तो शक्तिशाली प्रांतीय अधिकारियों पर नियंत्रण स्थापित कर सके और न ही राज्य में स्थायी शांति एवं व्यवस्था बनाए रख सके। जनता का विश्वास और समर्थन धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। राजदरबार षड्यंत्रों, स्वार्थ और आपसी संघर्षों का केंद्र बन गया।

आगस्टस की मृत्यु के बाद ही राजपरिवार और सामंतों में संघर्ष प्रारंभ हो गया। टाइबेरियस ने इन विद्रोहों को दबाने के लिए कठोर और निरंकुश नीति अपनाई, जिसके कारण वह जनता में लोकप्रिय नहीं रह गया। इसके बाद सम्राट कैलीगुला ने अत्यधिक क्रूर और विलासी शासन चलाया। उसकी नीतियों से सामंत वर्ग और जनता दोनों असंतुष्ट हो गए। अंततः षड्यंत्र करके उसकी हत्या कर दी गई। सम्राट नीरो रोमन इतिहास के सबसे कुख्यात शासकों में से एक था। वह अत्यधिक विलासी, कामुक और निर्दयी था। उसने अपनी पत्नी ऑक्टेविया से संबंध समाप्त कर पोपिया सबीना से विवाह किया। बाद में गर्भावस्था की अवस्था में उसकी भी हत्या कर दी। नीरो के शासनकाल में 64 ई. में रोम में भयंकर अग्निकांड हुआ। कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंशी बजाकर मनोरंजन कर रहा था। यद्यपि इस अग्निकांड के लिए निश्चित रूप से उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता, किंतु उसने अपनी छवि बचाने के लिए ईसाइयों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और उन पर अत्याचार किए। नीरो ने अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ-साथ महान दार्शनिक सेनेका और प्रसिद्ध कवि लूकन को भी मृत्युदंड दिया। अंततः चारों ओर फैली अशांति और विरोध से परेशान होकर उसने आत्महत्या कर ली।

नीरो के समान कमोडस और मैक्सिमिनस जैसे शासक भी भ्रष्ट, विलासी और अयोग्य थे। 192 ई. से 284 ई. तक का रोमन इतिहास गृहयुद्धों, षड्यंत्रों और राजनीतिक अस्थिरता से भरा हुआ था। इन अयोग्य उत्तराधिकारियों के कारण जनता में असंतोष बढ़ता गया।

बाहरी आक्रमण

रोमन साम्राज्य के पतन में बाहरी आक्रमणों ने अंतिम प्रहार का कार्य किया। जब साम्राज्य पहले से ही राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से कमजोर हो चुका था, तब विदेशी जातियों के आक्रमणों ने इसकी स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया। रोम पर आक्रमण करने वाली प्रमुख जातियों में फ्रैंक, गोथ, वैंडल और हूण उल्लेखनीय थे।

फ्रैंक जाति का आक्रमण

फ्रैंक जर्मनी की बर्बर जाति के लोग थे। वे शारीरिक रूप से शक्तिशाली, साहसी और युद्धप्रिय थे। कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों को सहने की उनमें विशेष क्षमता थी। लूट और युद्ध उनके जीवन का प्रमुख अंग बन चुके थे। इनके आक्रमण सम्राट अलेक्जेंडर सेवेरस के समय प्रारंभ हुए। जब रोमन शासक इन्हें रोकने में असफल रहे, तो उन्होंने इन्हें साम्राज्य की सीमाओं में बसने की अनुमति दे दी और कई लोगों को सेना में भर्ती कर लिया। कुछ फ्रैंक सैनिकों को उच्च पद भी दिए गए। यह रोमन शासकों की एक बड़ी भूल सिद्ध हुई, क्योंकि इससे रोमन सेना का अनुशासन और पारंपरिक चरित्र कमजोर पड़ गया।

गोथ जाति का आक्रमण

गोथों के आक्रमण रोम के लिए फ्रैंकों से भी अधिक विनाशकारी सिद्ध हुए। गोथ बाल्टिक सागर से लेकर काला सागर तक फैले हुए थे। 374 ई. में हूणों के दबाव के कारण गोथ रोमन साम्राज्य की सीमाओं में प्रवेश कर गए। उन्होंने पूर्वी रोमन सम्राट वेलेन्स को 378 ई. में एड्रियनोपल के युद्ध में पराजित किया। इस युद्ध में वेलेन्स की मृत्यु हो गई। इस घटना से रोमन साम्राज्य की प्रतिष्ठा को भारी आघात पहुँचा और अन्य बर्बर जातियों के साहस में वृद्धि हुई। सम्राट थिओडोसियस ने गोथों को शांत करने के लिए उन्हें साम्राज्य के भीतर बसाया और सेना में स्थान दिया। उन्हें सैनिक पद भी प्रदान किए गए, किंतु आगे चलकर यही नीति रोम के लिए घातक सिद्ध हुई। थिओडोसियस की मृत्यु के बाद गोथ नेता एलरिक ने इटली पर आक्रमण किया। 410 ई. में उसने रोम नगर पर अधिकार कर लिया। छह दिनों तक रोम में लूटपाट होती रही। विश्व के महानतम नगरों में से एक रोम की प्रतिष्ठा को इस घटना से गहरा आघात पहुँचा।

 वैंडल जाति का आक्रमण

वैंडल भी रोमन साम्राज्य के लिए गंभीर खतरा सिद्ध हुए। प्रारंभ में उन्होंने थिओडोसियस के पुत्रों के संघर्ष में भाग लिया। लगभग 425 ई. के आसपास वे स्पेन पहुँचे और वहाँ से जेनेरिक के नेतृत्व में उत्तरी अफ्रीका चले गए। 439 ई. में उन्होंने कार्थेज पर अधिकार कर लिया। 455 ई. में वैंडलों ने रोम पर आक्रमण किया और नगर को लूटा। धीरे-धीरे उन्होंने सिसिली, कोर्सिका, सार्डिनिया और पश्चिमी भूमध्यसागर के अनेक द्वीपों पर अधिकार कर लिया।

हूणों का आक्रमण

हूण मध्य एशिया से आने वाली अत्यंत शक्तिशाली और युद्धप्रिय जाति थी। यूरोप में उनका आगमन इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। पाँचवीं शताब्दी में हूणों के बीच अत्तिला नामक महान योद्धा का उदय हुआ। उसने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर रोमन साम्राज्य को चुनौती दी। अत्तिला ने बाल्कन क्षेत्र में अनेक नगरों को नष्ट कर दिया। रोमन सम्राट को उसे धन देकर शांत करने का प्रयास करना पड़ा। अत्तिला की मृत्यु के बाद उसका विशाल संगठन टूट गया, लेकिन उसके आक्रमणों ने पश्चिमी रोमन साम्राज्य को इतना कमजोर कर दिया कि उसका पतन लगभग निश्चित हो गया। अंततः 476 ई. में जर्मन जाति के नेता ओडोएसर ने पश्चिमी रोमन सम्राट रोमुलस ऑगस्टुलस को पराजित कर दिया। उसने घोषणा कर दी कि पश्चिम में अब कोई रोमन सम्राट नहीं है। इस घटना के साथ पश्चिमी रोमन साम्राज्य का राजनीतिक अंत हो गया।

अन्य कारण

रोम साम्राज्य के पतन के कारणों की खोज करते समय इतिहासकारों ने उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारणों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। यद्यपि ये कारण अकेले रोम के पतन के लिए उत्तरदायी नहीं थे, फिर भी इन्होंने साम्राज्य की आंतरिक शक्ति को कमजोर करने और उसके विघटन की प्रक्रिया को तेज करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सतत युद्धों का दुष्प्रभाव

रोम के एक छोटे नगर से विश्व के विशाल साम्राज्य में परिवर्तित होने के पीछे उसकी युद्धप्रिय नीति और सैन्य शक्ति की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। रोमन शासकों ने लगातार युद्धों के माध्यम से अपने राज्य का विस्तार किया और भूमध्यसागर के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया। परंतु यही युद्ध-नीति आगे चलकर रोम के पतन का कारण भी बनी। लगातार युद्धों के कारण रोम को अपार धन और जनशक्ति की हानि उठानी पड़ी। अनेक वीर सैनिक युद्धों में मारे गए और सामान्य जनता भी युद्धों की विभीषिका से बच नहीं सकी। लंबे समय तक सेना के लिए लोगों की भर्ती होती रही, जिससे कृषि और आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हुई। किसानों को खेती छोड़कर सेना में जाना पड़ता था, जिसके कारण कृषि उत्पादन में कमी आने लगी। इसके अतिरिक्त रोम को समय-समय पर भयंकर महामारियों का भी सामना करना पड़ा। 260 से 265 ई. के मध्य फैली प्लेग की महामारी इतनी भयानक थी कि लगभग कोई भी परिवार इससे अछूता नहीं रहा। कहा जाता है कि केवल रोम नगर में कई सप्ताह तक प्रतिदिन लगभग 5,000 लोगों की मृत्यु होती थी। लैटियम और ट्यूस्कैनी जैसे क्षेत्रों में मलेरिया का भी व्यापक प्रकोप था। इन महामारियों के कारण जनसंख्या में भारी कमी आई।

जनसंख्या की इस कमी को और बढ़ाने वाले सामाजिक कारण भी थे। विवाह के प्रति उदासीनता, गर्भनिरोध, संतानहीनता और अत्यधिक विलासपूर्ण जीवन-शैली ने जन्मदर को प्रभावित किया। कुछ इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि रोमन समाज में ऐसी विकृत प्रवृत्तियाँ विकसित हो गई थीं, जिनसे जनसँख्या वृद्धि रुक गई। उदाहरण के लिए, प्रेटोरियन प्रीफेक्ट प्लैन्टियनस द्वारा अपनी पुत्री के विवाह उपहार के रूप में सौ बालकों को नपुंसक बनाए जाने की घटना का उल्लेख मिलता है। रोमन शासकों ने विदेशी समुदायों, विशेषकर यहूदियों, के सहयोग का भी पर्याप्त उपयोग नहीं किया, जबकि उनकी बढ़ती संख्या और प्रभाव को राज्य के हित में प्रयोग किया जा सकता था। रोम की शक्ति का आधार उसका अभिजात वर्ग था, जो प्रशासन, संस्कृति और राजनीति का संचालन करता था। जब यह वर्ग कमजोर हुआ तो रोमन राज्य और संस्कृति दोनों प्रभावित हुए।

चौथी शताब्दी ई. तक कुछ क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता घटने लगी। इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन कम हुआ और किसान अन्य स्थानों की ओर पलायन करने लगे। सम्राट सेप्टिमियस सेवेरस के एक कानून में भी जनसँख्या की कमी का उल्लेख मिलता है, जिसे लैटिन में ‘पेनुरिया होमिनुम’ कहा गया है। इसी प्रकार सिकंदरिया जैसे बड़े नगरों की जनसंख्या में भी भारी गिरावट आई। इस प्रकार लगातार युद्ध, महामारियाँ, जनसंख्या में कमी, सामाजिक विकृतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ मिलकर रोमन साम्राज्य की शक्ति को कमजोर करती चली गईं। इसके परिणामस्वरूप जब बर्बर जातियों ने आक्रमण किए, तब रोम उनका प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर सका।

भवितव्यता का सिद्धांत

कुछ इतिहासकारों ने रोम साम्राज्य के पतन को इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा है। प्रसिद्ध इतिहासकार ऑस्वाल्ड स्पेंग्लर के अनुसार प्रत्येक सभ्यता और संस्था का जन्म होता है, उसका विकास होता है, वह अपने उत्कर्ष पर पहुँचती है और अंततः उसका पतन हो जाता है। यह प्रकृति का सामान्य नियम है। इस दृष्टिकोण के अनुसार रोम साम्राज्य भी अपने विकास की चरम सीमा तक पहुँच चुका था। जब कोई सभ्यता अपनी सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर लेती है और उसमें नवीन ऊर्जा तथा नवीन विचारों का अभाव हो जाता है, तब उसका पतन स्वाभाविक हो जाता है। इस प्रकार रोम का पतन भी इतिहास की इसी प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम था। यद्यपि यह सिद्धांत रोम के पतन की पूर्ण व्याख्या नहीं करता, क्योंकि किसी भी साम्राज्य का पतन केवल भाग्य या नियति के कारण नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सैन्य कारण कार्य करते हैं।

उन्नति की पराकाष्ठा

कुछ विद्वानों का मत है कि रोम अपनी सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में इतनी अधिक उन्नति कर चुका था कि उसके आगे विकास की संभावनाएँ सीमित हो गई थीं। रोम ने वास्तुकला, मूर्तिकला, प्रशासन, कानून और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, किंतु विज्ञान और मौलिक चिंतन के क्षेत्र में वह कोई नवीन दिशा प्रदान नहीं कर सका।

रोमन कला और साहित्य पर यूनानी प्रभाव बहुत अधिक था। रोमन साहित्य में मौलिकता की अपेक्षा यूनानी परंपराओं का अनुकरण अधिक दिखाई देता है। दर्शन के क्षेत्र में भी रोमन विचारक यूनानी दार्शनिकों से प्रभावित रहे। उन्होंने व्यावहारिक जीवन से संबंधित विषयों में तो दक्षता दिखाई, लेकिन तत्त्वमीमांसा और गहन दार्शनिक चिंतन में उनकी विशेष प्रगति नहीं हुई। रोमन साहित्य मुख्यतः काव्य, वक्तृत्व-कला और ऐतिहासिक लेखन तक सीमित रहा। इसी प्रकार कला के क्षेत्र में भी एक निश्चित स्तर तक पहुँचने के बाद विकास की गति धीमी पड़ गई। नई परिस्थितियों के अनुरूप नवीन विचारधारा और नई रचनात्मक शक्ति का अभाव दिखाई देने लगा। इस प्रकार सांस्कृतिक क्षेत्र में एक सीमा तक पहुँचने के बाद रोम की प्रगति रुक गई। नवीन दृष्टिकोण के अभाव में यह महान सभ्यता धीरे-धीरे अधोगति की ओर बढ़ने लगी और अंततः उसका साम्राज्य भी कमजोर होकर समाप्त हो गया।

कुल मिलाकर रोमन साम्राज्य का पतन किसी एक कारण का परिणाम नहीं था। नैतिक पतन, राजनीतिक अस्थिरता, निरंकुश शासन, आर्थिक संकट, सामाजिक विघटन, सैनिक कमजोरी और अत्यधिक विस्तार जैसे अनेक कारणों ने मिलकर इस महान साम्राज्य को कमजोर किया। अंततः आंतरिक दुर्बलताओं और बाहरी आक्रमणों के सम्मिलित प्रभाव से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में पश्चिमी रोमन साम्राज्य का पतन हो गया। फिर भी रोमन सभ्यता की उपलब्धियाँ—कानून, प्रशासन, कला, साहित्य और संस्कृति विश्व इतिहास में आज भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

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