यशस्कर (Yashaskara, 939–948 AD)

यशस्कर (Yashaskara, 939–948 AD)

यशस्करदेव  (939–948 ई.)

यशस्कर मध्यकालीन कश्मीर के एक नए राजवंश का संस्थापक था। उत्पल वंश के पतन और राजनीतिक अराजकता के बाद 939 ई. में ब्राह्मणों एवं गणमान्य व्यक्तियों की एक सभा द्वारा उसे कश्मीर का राजा चुना गया। वह गोपालवर्मन के पूर्व कोषाध्यक्ष प्रभाकरदेव का पुत्र था। उत्पल वंश के अंतिम वर्षों में राजा उन्मत्तवर्मन (937–939 ई.) के क्रूर शासन तथा सेनापति कमलावर्धन के असफल सैन्य विद्रोह के बाद राज्य को एक योग्य शासक की आवश्यकता थी, जिसके परिणामस्वरूप यशस्कर को सिंहासन सौंपा गया।

गद्दी पर बैठने के बाद यशस्करदेव  ने पूर्व राजाओं द्वारा स्थापित प्रशासनिक नियमों और व्यवस्थाओं को पुनः लागू किया। उसने राज्य में कानून-व्यवस्था स्थापित की, लुटेरों और धोखेबाजों का दमन किया तथा भ्रष्ट अधिकारियों को कठोर दंड दिया। साथ ही उसने अस्थिरता फैलाने वाले सैन्य गुटों के प्रभाव को नियंत्रित कर शासन को सुदृढ़ बनाया।

यशस्कर की प्रशासनिक नीति का प्रमुख उद्देश्य जनकल्याण और आर्थिक स्थिरता था। उसने निष्पक्ष कर-वसूली सुनिश्चित करने के लिए ईमानदार अधिकारियों की नियुक्ति की, किसानों के हितों की रक्षा की तथा व्यापारिक गतिविधियों को पुनर्जीवित किया। उसके शासनकाल में राज्य में शांति और सुव्यवस्था की स्थापना हुई, जिससे जनता को बड़ी राहत मिली।

यशस्कर अपनी न्यायप्रियता और निष्पक्षता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। वह जटिल स्थानीय विवादों का निपटारा स्वयं करता था और न्याय प्रदान करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करता था। कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध कृति राजतरंगिणी में उसकी बुद्धिमत्ता, न्यायप्रियता और प्रशासनिक दक्षता की प्रशंसा की है।

शिक्षा और धर्म के क्षेत्र में भी यशस्कर का योगदान महत्त्वपूर्ण था। उसने अपने पिता प्रभाकरदेव की भूमि पर आर्यदेश के विद्यार्थियों के लिए एक विशाल मठ का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त, उसने वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे ब्राह्मणों के लिए 55 अग्रहार स्थापित कर उन्हें विभिन्न सुविधाएँ प्रदान की, जिससे शिक्षा, धर्म और ब्राह्मण समुदाय को विशेष प्रोत्साहन मिला।

यशस्कर ने लगभग नौ वर्षों तक (939–948 ई.) सफलतापूर्वक शासन किया। अपने शासन के अंतिम वर्षों में वह कुछ धूर्त दरबारियों के प्रभाव में आ गया, जिससे राजनीतिक परिस्थितियाँ पुनः जटिल होने लगीं। 948 ई. में बीमारी तथा विष दिए जाने से संबंधित षड्यंत्रों के कारण उसकी मृत्यु हो गई। किंतु मृत्यु से पूर्व उसने अपने अल्पवयस्क पुत्र संग्रामदेव के पक्ष में उत्तराधिकार सुनिश्चित कर दिया था। अतः उसके बाद संग्रामदेव (948–949 ई.) कश्मीर की गद्दी पर बैठा।

यशस्कर के उत्तराधिकारी (948-1003 AD)

संग्रामदेव,  पर्वगुप्त और क्षेमगुप्त (948–958 ई.)

यशस्कर की 948 ई. में मृत्यु के पश्चात् उसका अल्पवयस्क पुत्र संग्रामदेव राजा बनाया गया, किंतु एक वर्ष के भीतर ही उसके मंत्री पर्वगुप्त ने उसकी हत्या कर स्वयं गद्दी पर अधिकार कर लिया। किंतु पर्वगुप्त (948-950 ई.) भी अधिक समय तक जीवित नहीं रहा और लगभग डेढ़ वर्ष के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई।

पर्वगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र क्षेमगुप्त (950–958 ई.) कश्मीर का राजा हुआ, जो एक कमजोर शासक था और अधिकांश समय जुए तथा शिकार में बिताता था। इस स्थिति में उसकी लोहरवंशी रानी दिद्दा को राजकाज का काम सँभालना पड़ा और धीरे-धीरे वह इतनी शक्तिशाली हो गईं  कि महाराजा को ‘दिद्दाक्षेम’ कहा जाने लगा। इसकी पुष्टि क्षेमगुप्त के उन सिक्कों से भी होती है, जिन पर क्षेमगुप्त के नाम के साथ ‘दिद्दा’ का नामोलेख भी मिलता है।

महारानी दिद्दा (958-1003 ई.)

कश्मीर की महारानी दिद्दा का व्यक्तित्व अनेक दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली था, जिसे ‘कश्मीर की कैथरीन’ के नाम से भी जाना जाता है। पहले उसने 958 से 980 ई. तक अपने पुत्रों और कई पौत्रों की संरक्षिका (रीजेंट) के रूप में कार्य किया और 980 ई. से एकमात्र शासक और सम्राट के रूप में। उसके संबंध में अधिकांश जानकारी बारहवीं शताब्दी में कल्हण द्वारा लिखित कृति ‘राजतरंगिणी’ से प्राप्त होती है।

दिद्दा लोहर के राजा सिंहराज (सिम्हाराज) की पुत्री और काबुल के हिंदू शाही शासकों में से एक भीमदेव शाही की पौत्री (नातिन) थी। लोहर राज्य पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला में पश्चिमी पंजाब और कश्मीर के बीच एक व्यापार मार्ग पर स्थित था।

दिद्दा  का विवाह 26 वर्ष की आयु में कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त से हुआ, जिससे लोहर राज्य कश्मीर के राज्य के साथ एकीकृत हो गया। क्षेमगुप्त के काल में दिद्दा का शासन-सत्ता पर इतना प्रभाव था कि महाराजा को ‘दिद्दाक्षेम’ कहा जाने लगा था और ऐसे सिक्के भी मिले हैं, जिनपर उसका नाम और क्षेमगुप्त का नाम के साथ अंकित है।

महारानी दिद्दा (958-1003 ई.)
महारानी दिद्दा (958-1003 ई.)
संरक्षक के रूप में (958-980 ई.)

958 ई. के लगभग महाराज क्षेमगुप्त की शिकार के बाद बुखार से मृत्यु हो गई। परंपरा के अनुसार दिद्दा को सती होने के लिए कहा गया, लेकिन उसने इनकार कर दिया। क्षेमगुप्त के बाद वह अपने अल्पवयस्क पुत्र अभिमन्यु (958–972 ई.) को गद्दी पर बिठाकर उसके संरक्षिका के रूप में राज्य की शासिका बन गई। अन्य समाजों की तुलना में तत्कालीन कश्मीर में महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता था।

संरक्षक के रूप मे प्रारंभ में दिद्दा को पति के समय के फल्गुण जैसे प्रभावशाली मंत्रियों और स्थानीय सरदारों के विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु दिद्दा ने फल्गुण सहित अनेक विरोधी मंत्रियों और सामंतों को पदच्युत् कर दिया। उसने विद्रोहियों के विरुद्ध समर्थन पाने के लिए रिश्वत देकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया और पकड़े गए विद्रोहियों को ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों को भी मौत के घाट उतार दिया। वास्तव में दिद्दा अपने विरोधियों का दमन करने के लिए किसी भी उपाय को अपनाने में संकोच नहीं करती थी।

972 ई. में अभिमन्यु की मृत्यु के बाद उसके अल्पव्यस्क पुत्र नंदिगुप्त (972-973 ई.) को गद्दी पर बैठाया गया, जिससे सामंती जमींदार डामरों में अशांति फैल गई। दिद्दा ने  973 ई. में नंदिगुप्त को गद्दी से उतार दिया और फिर 975 ई. में उसके छोटे भाई त्रिभुवनगुप्त के साथ भी ऐसा ही किया। कल्हण के अनुसार दिद्दा को जादू-टोने में विश्वास था और उसने सत्ता के लिए अपने दो पौत्र राजाओं—नंदिगुप्त तथा त्रिभुवनगुप्त को मरवा दिया।

इसके बाद उसके सबसे छोटे पौत्र भीमगुप्त (975–980 ई.) सिंहासन पर बैठाया गया और दिद्दा को पुनः संरक्षिका (रीजेंट) नियुक्त किया गया। इस बीच दिद्दा ने फल्गुण को पुनः मंत्री नियुक्त किया, किंतु कुछ ही समय बाद फल्गुण की मृत्यु हो गई और दिद्दा पूर्णतः स्वेच्छाचारिणी हो गई।

इस  दौरान दिद्दा का खस जाति के तुंग नामक एक साहसी से घनिष्ठ संबंध हो गया, जो मूलतः एक भैंस चराने वाला ग्वाला था और बाद में कश्मीर राज्य में संदेशवाहक के रूप में नियुक्त हुआ था। 980 ई. में दिद्दा ने अपने पौत्र भीमगुप्त को यातना देकर मरवा दिया और तुंग को अपना प्रधानमंत्री बनाकर कश्मीर की सत्ता हथिया ली।

शासक  के रूप में दिद्दा (980-1003 ई.)

शासक के रूप में दिद्दा ने 980 से लेकर 1003 ई. तक रानी के रूप में शासन किया। वह भारतीय इतिहास की उन गिनी-चुनी महिलाओं में थीं, जिन्होंने स्वयं संप्रभु शासक के रूप में शासन किया। दिद्दा के शासनकाल में तुंग का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया और दिद्दा अपनी राजनीतिक चतुराई, कूटनीति तथा धन के बल पर अपने विरुद्ध उठने वाली हर चुनौती का सामना करती रही। खुले विद्रोह, दरबारी षड्यंत्र और यहाँ तक कि ब्राह्मणों के उपवास एवं विरोध-प्रदर्शन भी उसे पराजित नहीं कर सके।

दिद्दा के शासनकाल की एक प्रमुख  विशेषता यह थी कि उसने किसी पड़ोसी राज्य के विरुद्ध आक्रामक सैन्य अभियान नहीं चलाया। उसकी मृत्यु के लगभग दस वर्ष बाद ही लगभग 1013 ई. में महमूद गजनवी ने कश्मीर की ओर अपना ध्यान दिया।

कल्हण के वर्णन में दिद्दा का चरित्र षड्यंत्री, कठोर और कुटिल प्रतीत होता है, फिर भी वह असाधारण राजनीतिक सूझ-बूझ, कूटनीतिक क्षमता और प्रशासनिक प्रतिभा से संपन्न महिला थी। अपने इन्हीं गुणों के कारण वह अनेक विद्रोहों और राजनीतिक संकटों के बावजूद लगभग पचास वर्षों (958-1003 ई.) तक तक सत्ता पर अधिकार बनाए रखने में सफल रही।

दिद्दा ने श्रीनगर में दिद्दामठ का निर्माण करवाया, जिसका संबंध आधुनिक दिदमार क्षेत्र से माना जाता है। राजनीतिक कुशलता, दृढ़ इच्छाशक्ति और दीर्घकालीन प्रभाव के कारण कभी-कभी दिद्दा की तुलना रूस की कैथरीन महान् से की जाती है।

महारानी दिद्दा ने अपने जीवनकाल में ही अपने मातृपक्ष के भाई उदयराज के पुत्र तथा अपने भतीजे संग्रामराज को युवराज एवं उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उदयराज दिद्दा का भतीजा तथा लोहर राजवंश का राजकुमार था, किंतु उत्तराधिकार-संघर्ष के दौरान विग्रहराज ने उसके माता-पिता की हत्या के बाद लोहर राज्य की सत्ता पर अधिकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप उदयराज को वहाँ से पलायन करना पड़ा। बाद में, दिद्दा ने उदयराज के ज्येष्ठ पुत्र संग्रामराज को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिससे कश्मीर में लोहर वंश की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1003 ई. में दिद्दा की मृत्यु के बाद संग्रामराज गद्दी पर बैठा और कश्मीर में लोहर वंश का शासन का आरंभ हुआ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top