कश्मीर का प्रथम लोहर (लोहरा राजवंश)
लोहर राजवंश ने 1003 ई. से लगभग 1175 ई. के बीच कश्मीर और भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के आस-पास के इलाकों पर शासन किया। इस राजवंश के आरंभिक इतिहास का वर्णन बारहवीं सदी के मध्य में कल्हण द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ (राजाओं का इतिहास) में मिलता है। बाद के समय की जानकारी जोनराज और श्रीवर के लेखों से मिलती है।
इस राजवंश के बाद के शासक दुर्बल थे और उनके शासनकाल में आंतरिक संघर्ष और भ्रष्टाचार का बोलबाला था, यद्यपि बीच-बीच में कुछ समय के लिए शांति भी रही। इन कारणों से यह राजवंश इस क्षेत्र में इस्लामी विजय अभियानों के विस्तार का प्रभावी प्रतिरोध करने में असमर्थ हो गया।
राजतरंगिणी के अनुसार लोहर के सरदारों का परिवार खस जनजाति से संबंधित था और इस वंश का मूल केंद्र लोहरकोट (लोहरकोट्ट) नामक एक पर्वतीय दुर्ग था, जो पीर पंजाल पर्वतमाला में पश्चिमी पंजाब और कश्मीर के मध्य स्थित एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर अवस्थित था। इस प्रकार लोहर राज्य कश्मीर घाटी के भीतर नहीं, बल्कि उसके दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक पृथक पर्वतीय घाटी में केंद्रित था, जिसमें अनेक बड़े गाँव सम्मिलित थे। इन गाँवों के समूह को सामूहिक रूप से ‘लोहरिन’ कहा जाता था, जो संभवतः आस-पास की घाटियों तक फैला हुआ था।
लोहर राजवंश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लोहर के राजा सिंहराज (सिम्हराज) की पुत्री दिद्दा का विवाह कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त से हुआ था, जिससे दोनों राज्यों का एकीकरण हो गया। उस समय के अन्य समाजों की तुलना में, कश्मीर में महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता था। 958 ई. में क्षेमगुप्त की मृत्यु के बाद दिद्दा ने अपने अल्पवयस्क पुत्र अभिमन्यु द्वितीय की संरक्षिका (रीजेंट) के रूप में शासन की बागडोर सँभाली। 972 ई. में अभिमन्यु की मृत्यु के बाद उसने क्रमशः अपने पौत्रों—नंदिगुप्त, त्रिभुवनगुप्त और भीमगुप्त के संरक्षिका के रूप में प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग किया। 980 ई. में भीमगुप्त की मृत्यु के बाद अंततः दिद्दा कश्मीर की वास्तविक शासिका बन गई।
बाद में, दिद्दा ने अपने भतीजे संग्रामराज को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जबकि लोहर राज्य का शासन विग्रहराज को सौंप दिया, जो संभवतः उसका दूसरा भतीजा था या भाई था। इसी व्यवस्था के परिणामस्वरूप कश्मीर में लोहर वंश की स्थापना हुई।
लोहर वंश के शासनकाल में कश्मीर की राजनीति लंबे समय तक अस्थिर बनी रही। इस राजवंश के इतिहास में दरबारी षड्यंत्रों, बार- विद्रोहों, सामंतों के संघर्षों तथा अन्य आंतरिक अशांतियों का उल्लेख मिलता है, जिसके कारण लगभग तीन शताब्दियों तक राज्य में निरंतर राजनीतिक उथल-पुथल चलता रहा।
लोहर राजवंश के शासक एवं उपलब्धियाँ
संग्रामराज (1003–1028 ई.)
संग्रामराज कश्मीर में लोहर वंश का संस्थापक माना जाता है, जिसने 1003 से 1028 ई. तक शासन किया। राजतरंगिणी के अनुसार संग्रामराज का जन्म लोहर राजवंश में हुआ था, जो खस मूल का था। संग्रामराज को उसकी चाची दिद्दा ने गोद लिया और अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया थासडजस । 1003 ई. में दिद्दा की मृत्यु के बाद वह कश्मीर का शासक बना। संग्रामराज की रानी श्रीलेखा थी, जो एक प्रतिभाशाली महिला थी।
गजनवी आक्रमण का प्रतिरोध
संग्रामराज के शासनकाल में महमूद गजनवी ने उत्तर-पश्चिम भारत पर बार-बार आक्रमण किया। यद्यपि कश्मीर पर उसका कोई स्थायी अधिकार स्थापित नहीं हो सका, फिर भी कश्मीर अप्रत्यक्ष रूप से इन घटनाओं से प्रभावित हुआ। महमूद ने संभवतः 1014 ई. में पंजाब (उद्भांडपुर) के काबुल शाही राज्य पर आक्रमण किया। हिंदूशाही शासक त्रिलोचनपाल ने महमूद के विरुद्ध संघर्ष में कश्मीर से सहायता माँगी। इसके फलस्वरूप तुंग के नेतृत्व में कश्मीरी सेना ने भी इस युद्ध में भाग लिया। किंतु तुंग और त्रिलोचनपाल दोनों को महमूद (हम्मीर) के हाथों पराजित होना पड़ा।
संग्रामराज द्वारा त्रिलोचनपाल की सहायता से क्रोधित होकर महमूद ने दो बार कश्मीर पर आक्रमण करने का प्रयास किया, किंतु दोनों ही बार उसे मुँह की कहनी पड़ी और पीछे हटना पड़ा। उसने गजनवी हमलों के विरुद्ध गांधार के शाहियों का भी समर्थन किया।
पहली बार महमूद गजनवी ने 1015 ई. में उत्तर भारत तथा कश्मीर की ओर अपना अभियान प्रारंभ किया। उसने टोही नदी घाटी के साथ आगे बढ़ते हुए कश्मीर में प्रवेश किया और लोहकोट (लोहरकोट) दुर्ग पर आक्रमण किया, किंतु दुर्ग की दुर्गमता, सुदृढ़ रक्षा, प्रतिकूल मौसम तथा कश्मीर की दुर्गम पर्वतीय भौगोलिक स्थितिके कारण उसे एक महीने तक किले की घेराबंदी करने के बाद भी पीछे हटना पड़ा। यद्यपि इस अभियान का उल्लेख राजतरंगिणी में नहीं मिलता है, किंतु कुछ मुस्लिम स्रोतों से इसकी सूचना मिलती है।
महमूद ने 1021 ई. में पुनः कश्मीर पर आक्रमण करने का प्रयास किया, किंतु भारी हिमपात के कारण वह फिर लोहरकोट किले से आगे नहीं बढ़ सका। इन दो असफल आक्रमणों के बाद उसने फिर कभी कश्मीर पर आक्रमण करने का प्रयास नहीं किया।
संग्रामराज बुद्धिमान होते हुए भी अपेक्षाकृत निर्बल शासक था। उसके शासनकाल में कई वर्षों तक वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री तुंग के हाथों में केंद्रित रही, जो दिद्दा का प्रेमी और प्रधानमंत्री रहा था। संग्रामराज के समय में भी उसने अपनी शक्ति का प्रयोग करके प्रशासन में भद्रेश्वर जैसे अनेक भ्रष्ट अधिकारियों की नियुक्ति की, जिन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए प्रजा का शोषण किया और अवैध रूप से धन अर्जित किया। इन मनमानी नियुक्तियों और अव्यावहारिक कार्यों से तुंग के राजदरबार तथा राज्य के अनेक वर्ग असंतुष्ट थे।
संग्रामराज तुंग की शक्ति और प्रभाव से सतर्क था, इसलिए उसने वर्षों तक उसे व्यापक अधिकारों के साथ कार्य करने दिया। एक ओर समय के साथ विरोधियों का सामना करने की तुंग की क्षमता कमजोर पड़ गई, दूसरी ओर संग्रामराज ने भी तुंग से छुटकारा पाने का प्रयास किया। अंततः तुंग दरबारी षड्यंत्रों का शिकार हो गया और अपने पुत्र सहित मार डाला गया।
तुंग की मृत्यु के बाद भी न तो राजदरबार की स्थिति में कोई विशेष सुधार आया और न ही प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरूप राज्य की प्रशासनिक समस्याएँ और भ्रष्टाचार यथावत् बने रहे।
हरिराज और अनंत (1028-1063 ई.)
संग्रामराज के पश्चात् उसका पुत्र हरिराज (1028 ई.) सिंहासन पर बैठा, किंतु वह केवल 22 दिनों तक ही शासन कर सका और फिर उसकी मृत्यु हो गई। संभवतः हरिराज की हत्या उसकी माता श्रीलखा ने करवाई थी, जो स्वयं सत्ता पर अधिकार करना चाहती थी, किंतु इस मत की पुष्टि समकालीन स्रोतों से नहीं होती।
हरिराज के बाद उसका भाई अनंत राजा बना। लगभग इसी समय विग्रहराज ने फिर से कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास किया और श्रीनगर में अपनी सेना के साथ पहुँच गया, किंतु वह पराजित हुआ और मारा गया।
अनंत का शासनकाल मुख्यतः आर्थिक अव्यवस्था और अपव्ययता के लिए प्रसिद्ध है। उसने इतना अधिक ऋण ले लिया था कि राजमुकुट तक को गिरवी रखना पड़ा। उसकी पत्नी रानी सूर्यमती की सूझबूझ और कुशल प्रशासनिक क्षमता के कारण स्थिति में सुधार हुआ। सूर्यमती ने अपने निजी संसाधनों से राज्य का ऋण चुकाकर राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार किया तथा योग्य मंत्रियों की नियुक्ति कर प्रशासन को सुदृढ़ किया
लगभग 1063 ई. में सूर्यमती के दबाव में अनंत ने अपने पुत्र कलश के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया। यह संभवतः राजवंश को संरक्षित करने के लिए था, क्योंकि औपचारिक रूप से कलश के राजा बनने के बाद भी लंबे समय तक वास्तविक सत्ता अनंत के हाथों में ही बनी रही।
कलश (1063–1089 ई.)
कलश दुर्बल इच्छाशक्ति वाला शासक सिद्ध हुआ। वह राजकार्य की अपेक्षा विलासिता में अधिक रुचि लेता था और दरबारियों के प्रभाव में रहता था। कहा जाता है कि उसने अपनी ही पुत्री के साथ अनैतिक संबंध बनाया था। 1076 ई. में उसने अपने पिता के प्रभाव से स्वयं को मुक्त कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप अनंत और कई विश्वासपात्र दरबारियों को राजधानी छोड़कर विजयेश्वर में शरण लेनी पड़ी बाद में कलश ने नए निवास स्थान विजयेश्वर की भी घेराबंदी की, तो निराश होकर अनंत ने 1081 ई. में आत्महत्या कर ली।
इसके पश्चात् कलश के अनैतिक आचरण में कुछ सुधार आया और उसने अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण शासन करना शुरू किया। उसने पड़ोसी पहाड़ी जनजातियों के साथ संबंधों को सुदृढ़ किया, जिससे कश्मीर राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ी।
कलश को अपने सबसे बड़े बेटे हर्ष के षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा, क्योंकि पिता द्वारा दी गई धनराशि से उसका खर्च नहीं चल पता था। हर्ष ने कलश की हत्या की साजिश रची, किंतु उसका भेद खुल गया और उसे बंदी बना लिया गया। अब सिंहासन का उत्तराधिकारी हर्ष के स्थान पर उसके छोटे भाई उत्कर्ष को बनाया गया, जो पहले से ही लोहर का शासक था।
अपने पुत्र हर्ष की गतिविधियों के कारण कलश अपनी पूर्व अनैतिक जीवनशैली में लौट आया, जो 1089 ई. में उसकी मृत्यु का कारण बना।
उत्कर्ष (1089 ई.)
कलश के उत्तराधिकार को लेकर मतभेद है क्योंकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि हर्ष को उत्तराधिकारी पद से हटाए जाने के बावजूद उसने तुरंत अपने पिता का स्थान ग्रहण कर लिया, जबकि अधिकांश विद्वान मानते हैं कि उत्कर्ष ने सिंहासन ग्रहण किया और हर्ष कैद में ही रहा।
कश्मीर के सिंहासन पर उत्कर्ष के आरूढ़ होने के साथ ही कश्मीर और लोहर का पुनर्मिलन हुआ तथा लोहरकोट दुर्ग को राजवंश की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
इतिहासकारों के अनुसार उत्कर्ष को पसंद नहीं किया जाता था और अंततः 1089 ई. में उसे पदच्युत् कर हर्ष राजा बना, जिसमें उत्कर्ष के सौतेले भाई विजयमल्ल ने भी हर्ष का समर्थन किया और राजा के विरुद्ध विद्रोह में सबसे आगे रहा। इसके बाद उत्कर्ष को बंदी लिया गया, बाद में उसने आत्महत्या कर ली।
हर्ष (1089–1101 ई.)
उत्कर्ष को पदच्युत् कर हर्ष 1089 ई. में कश्मीर के सिंहासन पर बैठा। उसकी गणना कश्मीर के इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली, किंतु सर्वाधिक विवादास्पद शासकों में की जाती है। वह विद्वान्, कवि, कलाप्रेमी और बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, किंतु उसके व्यक्तित्व में कई परस्पर विरोधी गुण एक साथ विद्यमान थे। हर्ष निःसंदेह कश्मीर के उत्तरकालीन हिंदू शासकों में सबसे अधिक प्रभावशाली और विशिष्ट व्यक्तित्व था। वह कभी उदार और दयालु दिखाई देता था, तो कभी अत्यंत क्रूर और स्वेच्छाचारी। 23 Stein (1900), Vol. 1, p. 112. वह भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही कुछ विशेष लोगों के प्रभाव में आकर और भ्रष्ट, क्रूर और व्यभिचारी बन गया और अपने सगे-संबंधियों के साथ यौन संबंध बनाया।
प्रारंभ में हर्ष के राज्य की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी, जिसका प्रमाण उसके द्वारा जारी किए गए सोने और चाँदी के सिक्के हैं। किंतु बाद के वर्षों में उसकी विलासितापूर्ण जीवनशैली और असफल सैन्य अभियानों के कारण राजकोष खाली हो गया उसने जनता पर भारी कर लगाया और मंदिरों तक की संपत्ति जब्त करनी आरंभ कर दी यही नहीं कि मानव मल पर भी कर लगाया गया। उसके शासनकाल में बुद्ध की दो प्रतिमाओं को छोड़कर बाकी सभी मूर्तियाँ नष्ट कर दी गईं।
लगभग 1099 ई. के आसपास जब कश्मीर राज्य प्लेग, बाढ़ और अकाल जैसी विपत्तियों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर अराजकता से ग्रस्त था, तब भी हर्ष की कठोर नीतियाँ समाप्त नहीं हुईं और उसने कर-वसूली तथा संपत्ति की जब्ती जारी रखी। संभवतः यही कारण है कि कल्हण ने हर्ष के अनेक कार्यों की तुलना तुर्क आक्रमणकारियों से की है।
हर्ष को अपने शासनकाल में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए उसने अपने कई संबंधियों की हत्या करवाई और पूर्वी कश्मीर के शक्तिशाली सामंती ज़मींदारों ‘डामरों’ से भूमि का नियंत्रण वापस लेने के लिए अभियान चलाया। उसकी इन नीतियों के कारण डामरों ने राजपरिवार के एक सदस्य उच्छल के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। यद्यपि प्रारंभ में उच्छल को सफलता नहीं मिली, किंतु बाद में उसने अपने भाई सुस्सल के विद्रोह का लाभ उठाकर हर्ष की सेनाओं को पराजित कर दिया। इसके पश्चात हिरण्यपुर (रणीयल) में ब्राह्मणों ने उच्छल का विधिवत् राज्याभिषेक किया।
इस समय हर्ष के दरबार में अविश्वास, षड्यंत्र और भय का वातावरण व्याप्त था। उसके अत्याचारपूर्ण कार्यो से त्रस्त होकर उच्छल और सुस्सल ने विद्रोह कर क्रमशः उत्तर और दक्षिण दिशाओं से श्रीनगर पर आक्रमण किया। विद्रोहियों ने हर्ष के राजमहल को जला दिया और उसको अपना प्राण बचाने के लिए भागना पड़ा। अंततः 1101 ई. में विद्रोही डामरों ने हर्ष की हत्या कर दी।
इस प्रकार जिस हर्ष का शासन प्रारंभ में ‘सुदृढ़ और शांति का काल’ प्रतीत होता था, वही बाद में आत्मघाती प्रवृत्तियों का शिकार हो गया। यही कारण है कि हर्ष को ‘कश्मीर का नीरो’ भी कहा जाता है। हर्ष की मृत्यु के साथ प्रथम लोहर वंश का अंत हो गया और उच्छल तथा सुस्सल के नेतृत्व में द्वितीय लोहर वंश की स्थापना हुई।




