उत्पल वंश (लगभग 855-1003 ई.)
उत्पल वंश एक महत्त्वपूर्ण हिंदू राजवंश था, जिसने नौवीं शताब्दी के मध्य से दसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक कश्मीर पर शासन किया। इस वंश की स्थापना कर्कोट वंश के स्थान पर 855 ईस्वी में अवंतिवर्मन ने की थी। उसके शासनकाल में कश्मीर को राजनीतिक स्थिरता आई और लंबे समय से चली आ रही आंतरिक अव्यवस्था को नियंत्रित किया गया।
उत्पल शासकों ने प्रशासनिक सुधारों, कृषि विकास और लोककल्याणकारी कार्यों पर विशेष ध्यान दिया। अवंतिवर्मन के शासनकाल में प्रसिद्ध अभियंता सुय्य ने सिंचाई व्यवस्था में सुधार कर कृषि उत्पादन को प्रोत्साहन दिया, जिससे राज्य की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि हुई।
उत्पल काल सांस्कृतिक उपलब्धियों और एवं मंदिर वास्तुकला में महत्त्वपूर्ण प्रगति के लिए भी प्रसिद्ध है। इस काल में अवंतीपुर (अवंतीपोर) तथा सुयपुर (सोपोर) नगर बसाए गए और अवंतीश्वर तथा अवंतीस्वामी मंदिर बनवाए गए, जो कश्मीर की उत्कृष्ट स्थापत्य परंपरा के प्रतीक हैं। अपने उत्कृष्ट कला, साहित्य और जनहित के कार्यों के कारण इस काल की गणना कश्मीर के स्वर्णिम युगों में की जाति है।
यद्यपि उत्पल वंश के परवर्ती काल में राजनीतिक अस्थिरता और उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष बढ़ गए, फिर भी इस वंश ने कश्मीर के इतिहास में शांति, आर्थिक पुनरुत्थान और सांस्कृतिक उन्नति के एक महत्त्वपूर्ण अध्याय का सृजन किया। इस प्रकार कार्कोटों की साम्राज्यवादी परंपरा और लोहार वंश के उदय के बीच उत्पल वंश ने कश्मीर की राजनीतिक और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
ऐतिहासिक स्रोत
उत्पल वंश के इतिहास की जानकारी मुख्यतः साहित्यिक और पुरातात्त्विक स्रोतों से प्राप्त होती है, जिनमें ‘राजतरंगिणी’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
राजतरंगिणी
उत्पल वंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत कल्हण द्वारा 1148–1150 ईस्वी के बीच रचित संस्कृत ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ है। इस ग्रंथ की पाँचवीं तरंग में उत्पल वंश का विस्तृत विवरण मिलता है। कल्हण ने अपने इतिहास-लेखन में पूर्ववर्ती ऐतिहासिक ग्रंथों, राजवंशीय वंशावलियों, अभिलेखों, दानपत्रों तथा स्थानीय परंपराओं का उपयोग किया है।
यद्यपि राजतरंगिणी में पौराणिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और भौगोलिक कथाओं का मिश्रण है, फिर भी चौथी तरंग के बाद इसका विवरण अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
अभिलेख एवं पुरावशेष
उत्पल काल के मंदिरों, दानपत्रों तथा अन्य अभिलेखीय साक्ष्यों से भी तत्कालीन प्रशासन, धार्मिक जीवन और स्थापत्य कला की जानकारी प्राप्त होती है। अवंतिवर्मन द्वारा स्थापित अवंतिपुर नगर तथा वहाँ स्थित अवंतिस्वामिन् और अवंतीश्वर मंदिर इस काल की स्थापत्य उपलब्धियों के प्रमाण हैं।
सिक्के
उत्पल वंश के प्रमुख शासकों द्वारा जारी किए गए ताँबे और चाँदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इन सिक्कों से तत्कालीन अर्थव्यवस्था, व्यापार, राजकीय उपाधियों तथा धार्मिक प्रतीकों के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। साथ ही, इनसे उत्पल शासकों के शासनक्रम और राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में भी सहायता मिलती है।
उत्पल वंश की स्थापना की पृष्ठभूमि
कर्कोट वंश के अंतिम महत्त्वपूर्ण शासक सिप्पतजयापीड की लगभग 840 ई. में हत्या के बाद उसके पाँचों मामाओं- पद्म, उत्पल, कल्याण, मम्मा और धर्म के बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो गया। इस बीच कर्कोट वंश के कई कठपुतली राजा बनाए और हटाए गए, किंतु अराजकता को समाप्त नहीं कर सके।
सिप्पतजयापीड की मौत के तुरंत बाद उत्पल ने त्रिभुवनपीड के बेटे अजीतपीड को राज्य बनाया। कुछ साल बाद मम्मा ने उत्पल के विरुद्ध विद्रोह किया और अनंगपीड को गद्दी पर बैठाया। तीन साल बाद उत्पल के बेटे सुखवर्मन ने विद्रोह करके अजीतपीड के बेटे उत्पलपीड को राजा बनाया। कुछ ही वर्ष बाद सुखवर्मन ने स्वयं गद्दी सँभालने का प्रयत्न किया, किंतु एक संबंधी ने उसकी हत्या कर दी। अंत में, सुखवर्मन के पुत्र अवंतिवर्मन ने उत्पलपीड को गद्दी से हटा दिया और मंत्री सुर की सहायता से लगभग 855 ई. में स्वयं कश्मीर की गद्दी पर बैठा। इस प्रकार अवंतिवर्मन ने उत्पल वंश की स्थापना की और कश्मीर में पुनः राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई।
उत्पल वंश के प्रमुख शासक और इतिहास
अवंतिवर्मन (855–883 ई.)
अवंतिवर्मन उत्पल के मंत्री सूर की सहायता से 855 ईस्वी में कश्मीर के सिंहासन पर बैठा और उत्पल वंश की स्थापना की। उत्पल के पौत्र अवंतिवर्मन का शासनकाल कश्मीर के इतिहास में शांति, समृद्धि और सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से ‘स्वर्णयुग’ माना जाता है।
राजतरंगिणी में अवंतिवर्मन के किसी सैन्य अभियान का विवरण नहीं मिलता है, किंतु वह एक योग्य, दूरदर्शी तथा प्रजाहितैषी शासक था। पिछले चालीस वर्षों में गृहयुद्ध के कारण देश की स्थिति बिगड़ चुकी थी। अवंतिवर्मन ने प्रशासन को सुदृढ़ करने, आंतरिक सुरक्षा स्थापित करने, देश की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और संसाधनों के पुनर्वास के लिए कई कदम उठाए। उसने ग्रामीण अभिजात वर्ग के उपद्रवी ‘डामरों’ की शक्ति को नियंत्रित किया और झेलम नदी पर बाँध बनवाकर जल-प्रबंधन और कृषि क्षेत्र में सुधार किए।
उसने सुय्य (सूर्य) नामक एक अभियंता को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया और उसके सहयोग से अवंतिवर्मन ने वितस्ता (झेलम) के बहाव के अवरोधों को हटाया तथा भूस्खलन को रोकने के लिए नदी के तटों पर बाँध बनवाया। उसने वितस्ता नदी के बहाव का मार्ग भी बदल दिया और उसकी धारा को व्यवस्थित करके जल-निकासी की समस्या का समाधान किया, जिससे आसपास की भूमि कृषि योग्य हो गई और कृषि-उत्पादन में वृद्धि हुई।
कहा जाता है कि प्रधानमंत्री सुय्य ने बंजर भूमि के एक बड़े हिस्से को सुखाकर उपजाऊ बनावाया और प्रत्येक गाँव की आवश्यकता के अनुसार पानी के वितरण की स्थायी व्यवस्था की। कल्हण ने लिखा है कि सुय्य ने संचित धार्मिक पुण्य प्राप्त किया और उसने एक ही जन्म में वह पवित्र कार्य पूरा किया, जो विष्णु ने चार अवतारों में पूरा किया। जम्मू और कश्मीर के बारामूला जिले में स्थित सुय्यपुर (सोपोर) का नाम उसके निर्माता सुय्य के नाम पर ही रखा गया है।
अवंतिवर्मन एक निर्माता और कला तथा साहित्य का संरक्षक भी था। अवंतिवर्मन ने पुलवामा के अवंतिपुर (अवंतीपोर) तथा सुय्यपुर (सोपोर) नामक नगर की स्थापना की और अनेक मंदिरों तथा सार्वजनिक भवनों का निर्माण करवाया। उसने विष्णु और शिव को समर्पित कई हिंदू मंदिरों के साथ-साथ बौद्ध मठों को भी बनवाया, जिनमें अवंतिपुर में शिव और विष्णु को समर्पित अवंतीश्वर और अवंतीस्वामी मंदिर उल्लेखनीय हैं।
उसके दरबार में प्रसिद्ध कवि रत्नाकर और आनंदवर्धन निवास करते थे। रत्नाकर ने हरविजय महाकाव्य की रचना की, जबकि आनंदवर्धन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ध्वन्यालोक में ध्वनि सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
अवंतिवर्मन ने लगभग 855 से 883 तक सत्ताईस वर्ष तक शासन किया।
मृत्यु और उत्तराधिकार
अवंतिवर्मन की 883 ईस्वी में मृत्यु के बाद उत्पल के वंशजों के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया। उसके पुत्र और उत्तराधिकारी शंकरवर्मन को सबसे पहले अपने चचेरे भाई सुखवर्मन और दूसरे विरोधियों से गद्दी के लिए लड़ना पड़ा। अंततः 885 ई. में मंत्री रत्नवर्धन की सहायता से शंकरवर्मन कश्मीर के सिंहासन पर बैठा।
शंकरवर्मन (885-902 ई.)
शंकरवर्मन एक शक्तिशाली एवं महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसका शासनकाल आक्रामक विदेश नीति तथा सैन्य अभियानों के लिए प्रसिद्ध है। कल्हण ने काव्यात्मक भाषा में इसका वर्णन ‘दुनिया को जीतने की परंपरा को फिर से जीवित करने’ के रूप में किया है। राजतरंगिणी से ज्ञात होता है कि शंकरवर्मन की सेना में ‘नौ लाख पैदल सैनिक, तीन सौ हाथी और एक लाख घुड़सवार’ शामिल थे। उसने अपनी विशाल सेना के साथ अपने साम्राज्य के दक्षिण और उत्तर में कई विजय अभियान संचालित किया।
सैनिक उपलब्धियाँ
शंकरवर्मन ने सबसे पहले पश्चिमोत्तर भारत की ओर सैन्य अभियान संचालित किया और पंजाब में झेलम और चिनाब के बीच के क्षेत्र दार्वाभिसार को अपने अधीन किया। उसकी सेना के आगे बढ़ने पर त्रिगर्त (मौजूदा कांगड़ा) के राजा पृथ्वीचंद्र ने शंकरवर्मन की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली। यद्यपि कांगड़ा पर आरंभिक समय से शासन करने वाले कटोच राजाओं की वंशावली में पृथ्वीचंद्र का नाम नहीं मिलता है, किंतु उसका नामंत ‘चंद्र’ कटोच परिवार के नामों से मेल खाता है। कल्हण के अनुसार उसने गुजरात के स्थानीय शासक अलखान को पराजित कर उससे तक्क (टक्क) प्रदेश उपहार में प्राप्त किया। ‘टक्क’ नाम से चिनाब नदी के पूर्व तथा निचली पहाड़ियों से लगे क्षेत्र का बोध होता है।
शंकरवर्मन की सेना का सामना गुर्जर-प्रतिहारों से भी हुआ। कल्हण के अनुसार शंकरवर्मन ने गुर्जर-प्रतिहारों से कुछ क्षेत्र छीनकर अपने सामंत थक्कियक को प्रदान किया। संभवतः मिहिरभोज (836–885 ई.) अथवा उसके उत्तराधिकारी महेंद्रपाल (885–910 ई.) के शासनकाल में शंकरवर्मन ने पंजाब और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ ऐसे क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था, जो पूर्व में गुर्जर-प्रतिहारों के प्रभाव क्षेत्र में थे। किंतु शाही शासकों के विरुद्ध शंकरवर्मन को संभवतः सीमित सफलता ही मिल सकी।
प्रशासनिक सुधार
शंकरवर्मन ने प्रशासनिक सुधार की दृष्टि से कुछ कड़े कदम उठाए। राज्य की आय बढ़ाने के लिए उसने कराधान व्यवस्था का विस्तार किया तथा राजस्व-संग्रह के नए विभाग स्थापित किए, जिसके परिणामस्वरूप कायस्थ अधिकारियों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और प्रशासन पर उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया। कल्हण ने इन अधिकारियों पर ग्रामीण जनता का शोषण करने तथा राज्य की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने का आरोप लगाया है। इसी काल में बेगार (अनिवार्य श्रम) को संस्थागत रूप प्रदान किया गया तथा इससे इनकार करना दंडनीय अपराध बना दिया गया। अत्यधिक करों और कठोर नीतियों के कारण जनता में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ।
दमनकारी नीतियाँ
संभवतः शासन के उत्तरार्द्ध में शंकरवर्मन ने और अधिक दमनकारी नीति अपनाई। कल्हण ने उसे एक ऐसे शासक के रूप में चित्रित किया है, जिसने मंदिरों और धार्मिक संस्थानों की संपत्ति पर अधिकार किया तथा अनेक अग्रहारों को काम मुआवजा देकर राजकीय नियंत्रण में ले लिया। उसके शासनकाल में विद्वानों और साहित्यकारों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही। अनेक कवि और विद्वान् आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त थे, जबकि अकाल और अन्य संकटों के कारण सामान्य जनता का जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ।
शंकरवर्मन की कठोर और दमनकारी नीतियों के बावजूद उसके शासनकाल में राज्य की सैन्य शक्ति में वृद्धि हुई तथा राजस्व और व्यापार को प्रोत्साहन मिला। उसने शंकरपट्टन (वर्तमान पट्टन) नगर की स्थापना की और अपनी राजधानी में शंकरगौरीश्वर (सुगंधेश्वर) सहित अनेक धार्मिक तथा सार्वजनिक निर्माण कार्य कराए। इस प्रकार उसका शासन राजनीतिक सक्रियता, आर्थिक सुदृढ़ीकरण और सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
शंकरवर्मन का विवाह सुगंधा से हुआ था, जो बाद में कश्मीर की एक प्रभावशाली शासिका बनी। राजतरंगिणी में उसकी अन्य रानियों में सुरेंद्रवती का भी उल्लेख मिलता है।
अंततः 902 ईस्वी में एक सैन्य अभियान से लौटते समय तीर लगने से शंकरवर्मन की मृत्यु हो गई।
शंकरवर्मन के उत्तराधिकारी और उत्पल वंश का पतन
गोपालवर्मन (902–904 ई.)
शंकरवर्मन की मृत्यु के बाद उसके अल्पव्यस्क पुत्र गोपालवर्मन को कश्मीर का राजा बनाया गया। उसके राज्यारोहण के बाद होने वाले उत्तराधिकार-युद्ध और दरबारी षड्यंत्र महाभारत की कथा के समान लगते हैं। गोपालवर्मन ने अपनी माता रानी सुगंधा के प्रभाव में लगभग दो वर्षों (902–904 ई.) तक शासन किया।
राजतरंगिणी के अनुसार लगभग 903 ईस्वी में गोपालवर्मन ने उदभंडपुर (उदभांड) के एक विद्रोही हिंदूशाही शासक के विरुद्ध अभियान चलाया और विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि इस अभियान से प्राप्त धन-संपत्ति का एक भाग तोरमाण-कमलुक को प्रदान किया गया। संभवतः विजय के बाद गोपालवर्मन का व्यवहार अधिक अहंकारी हो गया और राजदरबार सामान्य प्रजा की पहुँच से दूर होता चला गया।
राजतरंगिणी के अनुसार गोपालवर्मन एक सक्षम और ऊर्जावान शासक था, परंतु उसके शासनकाल में दरबार के प्रभावशाली गुटों और अधिकारियों का हस्तक्षेप बढ़ता गया। इस समय रानी सुगंधा के प्रिय तथा राजकोषाध्यक्ष प्रभाकरदेव का प्रभाव बढ़ गया। कल्हण के अनुसार जब प्रभाकरदेव पर राजकोष के धन के दुरुपयोग का आरोप लगा और उसके विरुद्ध जाँच प्रारंभ हुई, तब उसने अपने एक संबंधी रामदेव के साथ राजा के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। राजतरंगिणी के अनुसार 904 ई. में गोपालवर्मन की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। यद्यपि इस विवरण की ऐतिहासिकता संदिग्ध है, किंतु षड्यंत्र उजागर होने पर रामदेव ने आत्महत्या कर ली।
गोपालवर्मन की दो रानियों—नंदा और जयलक्ष्मी—का उल्लेख मिलता है। उसकी मृत्यु के समय उसका कोई जीवित उत्तराधिकारी नहीं था, यद्यपि दूसरी रानी जयलक्ष्मी गर्भवती थी। राजवंश की निरंतरता बनाए रखने के लिए संकटवर्मन (904 ई.) को सिंहासन पर बैठाया गया, किंतु वह केवल कुछ दिनों तक शासन कर सका और शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई।
सुगंधा (904-906 ई.)
संकटवर्मन के बाद सत्त- संघर्ष और दरबारी षड्यंत्रों का दौर आरंभ हुआ, जिसमें शंकरवर्मन की पत्नी रानी सुगंधा (904–906 ई.) ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और 904 ई. में सत्ता पर अधिकार कर लिया।
पार्थ और निर्जितवर्मन (906-922 ई.)
सुगंधा ने जब अपने एक संबंधी निर्जितवर्मन (पंगु) को सिंहासन पर बैठाने का प्रयास किया, तो मंत्रियों और तंत्रिनों के विरोध के कारण निर्जितवर्मन के अल्पायु पुत्र पार्थ (906–921 ई.) को राजा बनाया गया। उसके शासनकाल (906–921 ई.) में वास्तविक सत्ता उसके पिता निर्जितवर्मन तथा प्रभावशाली तंत्रिनों और मंत्रियों के हाथों में रही, जबकि सुगंधा भी राजनीति में सक्रिय रही।
राजतरंगिणी के अनुसार इस अवधि में प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ गया और जनता पर अत्यधिक करों तथा अन्य आर्थिक बोझों का दबाव पड़ा।
दरबार के प्रमुख मंत्रियों में शंकरवर्धन और सुगंधादित्य का विशेष प्रभाव था। कल्हण के अनुसार इन अधिकारियों तथा अन्य दरबारी समूहों ने राजकोष पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और निजी लाभ अर्जित किए।
914 ई. में रानी सुगंधा ने पुनः सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु तंत्रिनों ने उसके विद्रोह को विफल कर उसे बंदी बना लिया और बाद में उसकी हत्या कर दी।
917 ईस्वी में कश्मीर में भीषण बाढ़ और उसके बाद अकाल पड़ा। राजतरंगिणी के अनुसार इस संकट के दौरान कुछ प्रभावशाली दरबारियों ने अन्न का भंडारण कर ऊँचे मूल्य पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया, जिससे जनता की कठिनाइयाँ और बढ़ गईं।
पार्थ के शासनकाल में उत्तराधिकार को लेकर निरंतर संघर्ष चलता रहा। कल्हण के अनुसार उसके शासनकाल के उत्तरार्ध में उसकी उपपत्नी (रखैल) सांबवती ने दरबारी राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः 921 ईस्वी में तंत्रिनों ने पार्थ को पदच्युत् कर निर्जितवर्मन को राजा बनाया, जिसने मात्र दो वर्षों तक (921-922 ई.) शासन किया। उसके बाद उसके पुत्र चक्रवर्मन को सिंहासन पर बैठाया गया।
उत्तराधिकार-संघर्ष
चक्रवर्मन (922–933 ई.)
चक्रवर्मन अल्पव्यस्क था, इसलिए उसने अपनी माता (बप्पता देवी) तथा बाद में अपनी दादी (क्षिल्लिका) के संरक्षण में पहली बार गद्दी सँभाली और कुल 10 वर्षों तक शासन किया। इस समय कश्मीर में तंत्रिनों का बहुत प्रभाव था। चक्रवर्मन को गद्दी पाने और उसे बचाने के लिए तंत्रिनों तथा डामरों पर निर्भर रहना पड़ा।
कुछ समय बाद संभवतः 933 ई. में तंत्रिनों ने शूरवर्मन प्रथम को सिंहासन पर बैठाया, जिसके परिणामस्वरूप चक्रवर्मन को राज्य छोड़ना पड़ा और वह निर्वासन में चला गया। किंतु शूरवर्मन प्रथम का शासन अल्पकालिक रहा और 934 ई. में पार्थ को दूसरी बार राजा बनाया गया। इस प्रकार तंत्रिनों ने प्रायः धन, उपहार तथा राजनीतिक समझौते के माध्यम से राजा बनाए और हटाए जाते रहे, जिससे केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई।
दसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में चक्रवर्मन ने संग्राम के नेतृत्व वाले डामरों (स्थानीय सामंतों) के साथ समझौता कर लिया और 936 ईस्वी में पद्मपुर (वर्तमान पंपोर) के निकट शंकरवर्धन (935-36 ई.) को पराजित कर पुनः कश्मीर का सिंहासन प्राप्त किया। राजतरंगिणी के अनुसार तंत्रिनों की ओर से युद्ध का नेतृत्व कर रहे शंकरवर्धन को स्वयं चक्रवर्मन ने युद्धभूमि में मार गिराया। कल्हण ने इस घटना को चक्रवर्मन के अद्वितीय साहस का प्रतीक बताया है। सत्ता में लौटने के बाद उसने शंभुवर्धन तथा उसके समर्थकों को बंदी बना लिया और अनेक तंत्रिनों को कठोर दंड दिया।
कल्हण के वर्णन के अनुसार चक्रवर्मन के शासन के उत्तरार्ध में विलासिता, पक्षपात और प्रशासनिक अव्यवस्था का बोलबाला रहा। उसने डोम्ब (डोम) समुदाय की एक गायिका रंगा को विशेष संरक्षण दिया और कहा जाता है कि उसकी पुत्रियाँ हम्सी और नागलता राजदरबार में प्रभावशाली हो गईं। यही नहीं, हम्सी को प्रमुख रानी का दर्जा मिल गया और उसके कारण डोम्ब समुदाय के अनेक व्यक्ति प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किए गए।
कहा जाता है कि उसने अपने मंत्रियों को अछूत महिलाओं के मासिक धर्म के दाग से सने हुए वस्त्र पहनने का आदेश दिया, जो उसके विचित्र और निरंकुश स्वभाव का परिचायक है। राजतरंगिणी के अनुसार 937 ईस्वी के लगभग डामरों के एक समूह ने रात्रि में चक्रवर्मन पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी। कल्हण ने इस घटना को डामरों का प्रतिशोध बताया है, जिससे लगता है कि बाद के वर्षों में चक्रवर्मन और डामरों के संबंध बिगड़ गए थे।
चक्रवर्मन की मृत्यु के साथ ही कश्मीर में उत्तराधिकार-संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता का एक नया चरण आरंभ हुआ।
उन्मत्तवर्मन (937–939 ई.)
चक्रवर्मन की मृत्यु के बाद लगभग 937 ईस्वी में उसका पुत्र उन्मत्तवर्मन, जिसे ‘उन्मत्तवंति’ के नाम से भी जाना जाता है, मंत्री सर्वत तथा अन्य प्रभावशाली दरबारियों के सहयोग से कश्मीर के सिंहासन पर बैठा। इतिहास में वह अत्यंत क्रूर, असामाजिक और पागल शासक के रूप में जाना जाता है। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार उसका शासनकाल अत्यधिक हिंसा, अत्याचार और अराजकता से भरा हुआ था।
भ्रष्ट मंत्रियों ने उन्मत्तवर्मन को इस शर्त पर गद्दी पर बिठाया था कि वह मात्र एक कठपुतली शासक बनकर रहेगा। यद्यपि उन्मत्तवर्मन राजा था, किंतु राज्य की वास्तविक शक्ति मंत्रियों और दरबारी गुटों के हाथों में थी, जिनमें पर्वगुप्त नामक मंत्री विशेष प्रभावशाली था।
राजतरंगिणी के अनुसार उन्मत्तवर्मन के शासनकाल में कायस्थ अधिकारियों का प्रभाव बढ़ गया तथा प्रशासन में अनेक नए कायस्थों को महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए गए। उसने संग्राम के परिवार से संबंधित ब्राह्मण रक्का को उच्च प्रशासनिक पद पर नियुक्त किया।
राजतरंगिणी से पता चलता है कि उन्मत्तवर्मन अपने नाम के अनुरूप उग्र और अत्याचारी था। उसने पर्वगुप्त के प्रभाव में आकर अपने कुछ संबंधियों को मृत्युदंड दिया और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाया।
उन्मत्तवर्मन के शासनकाल के ताँबे के सिक्के (दिन्नारा) उत्खनन में मिले हैं, जिन पर एक ओर देवी लक्ष्मी की आकृति और दूसरी ओर यज्ञवेदी के पास राजा का चित्रण है।
उन्मत्तवर्मन ने बहुत कम समय तक शासन किया और 939 ईस्वी के लगभग एक गंभीर रोग से उसकी मृत्यु हो गई। किंतु अपनी मृत्यु से पूर्व उसने अपने उत्तराधिकारी शूरवर्मन द्वितीय का राज्याभिषेक करवा दिया था।
शूरवर्मन द्वितीय (939 ई.)
उन्मत्तवर्मन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शूरवर्मन द्वितीय कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया गया। किंतु उसका शासन अत्यंत अल्पकालिक था। राजतरंगिणी के अनुसार कुछ ही दिनों बाद उसके सेनापति कमलवर्धन ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया और नए शासक के चयन के लिए ब्राह्मणों और गणमान्यों की एक सभा बुलाई। कहा जाता है कि सभा ने न तो कमलवर्धन का समर्थन किया और न ही शूरवर्मन द्वितीय की माता के अनुरोध को स्वीकार किया। अंततः प्रभाकरदेव के पुत्र यशस्करदेव को 939–948 ई. को कश्मीर का राजा चुना गया।
यशस्कर के सिंहासनारोहण के साथ ही उत्पल वंश के शासन का अंत हो गया और एक नए ब्राह्मण राजवंश की स्थापना हुई।
उत्पलकलीन धर्म, कला-स्थापत्य और साहित्य
उत्पल वंश के दौरान कश्मीर में अद्भुत राजनीतिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान हुआ। अवंतिवर्मन द्वारा स्थापित इस राजवंश ने शांति, आर्थिक समृद्धि और रचनात्मकता का एक नया युग प्रारंभ किया, जिसके प्रमाण धर्म, कला और साहित्य में आज भी देखे जा सकते हैं।
धर्म
उत्पल वंश के शासक मुख्यतः वैष्णव परंपरा से संबंधित थे, किंतु उन्होंने शैव धर्म सहित अन्य धार्मिक परंपराओं को भी संरक्षण प्रदान किया। अवंतिवर्मन व्यक्तिगत रूप से वैष्णव धर्म का अनुयायी था, परंतु उसने विष्णु के साथ-साथ शिव मंदिरों तथा शैव संस्थानों को भी उदारतापूर्वक संरक्षण दिया। इस काल में वैकुंठ चतुर्मूर्ति की उपासना विशेष रूप से प्रतिष्ठित थी, जो उत्पल वंश के कुलदेवता थे।
यद्यपि राजा मुख्य रूप से हिंदू थे, फिर भी बौद्ध धर्म और भिक्षुओं को पर्याप्त राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। इस काल में कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) की परंपरा का पल्लवन और पुष्पन हुआ। इस प्रकार धार्मिक सहिष्णुता और विभिन्न संप्रदायों के प्रति सम्मान उत्पल शासन की प्रमुख विशेषता थी।
कला और स्थापत्य
उत्पल काल को कश्मीर की स्थापत्य कला के उत्कर्ष का युग माना जाता है। इस काल में अनेक भव्य मंदिरों, मठों और नगरों का निर्माण हुआ, जिनमें कश्मीरी स्थापत्य की विशिष्ट शैली, उत्कृष्ट शिल्पकला और धार्मिक आस्था का सुंदर समन्वय परिलक्षित होता है। अवंतिवर्मन ने अपने मंत्री सुय्य के सहयोग से अवंतीपुर (वर्तमान अवंतीपोर) और सुय्यपुर (सोपोर) नगर बसवाए और अवंतिस्वामिन् (विष्णु) तथा अवंतीश्वर (शिव) मंदिरों का निर्माण कराया, जो आज भी कश्मीर की प्राचीन स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। भगवान विष्णु को समर्पित अवंतीस्वामी मंदिर ‘पंचरत्न’ (पाँच शिखरोंवाले) शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी दीवारों पर गंगा-यमुना और शाही परिवारों के दुर्लभ चित्र उत्कीर्ण हैं।
शंकरवर्मन ने शंकरपुर (पट्टन) और सुगंधा के साथ मिलकर शंकरगौरीश्वर तथा सुगंधेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया। फत्तेगढ़ प्राचीन शिव मंदिर भी सामान्यतः इसी काल का माना जाता है।
सुगंधा ने सुगंधापुर और गोपालपुर नगर बसाए और गोपालकेशव विष्णु मंदिर तथा गोपालमठ का निर्माण करवाया। इसी प्रकार गोपालवर्मन की रानी नंदा ने नंदकेशव मंदिर तथा नंदमठ की स्थापना करवाई। राजा पार्थ के शासनकाल में उसके मंत्री मेरुवर्धन ने पुराणाधिष्ठान (पंड्रेथन) में मेरुवर्धनस्वामी नामक विष्णु मंदिर का निर्माण कराया। सांबेश्वर शिव मंदिर भी इस काल की धार्मिक एवं स्थापत्य गतिविधियों का प्रमाण है, किंतु यह निश्चित नहीं है कि इसका निर्माण पार्थ की रानी सांबवती ने करवाया था।
साहित्य
उत्पल काल में कश्मीर संस्कृत भाषा एवं साहित्यिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। अवंतिवर्मन के दरबार में रत्नाकर और आनंदवर्धन जैसे प्रतिष्ठित विद्वान् रहते थे। रत्नाकर ने हरविजय महाकाव्य की रचना की, जबकि आनंदवर्धन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ध्वन्यालोक में ध्वनि सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
इस प्रकार उत्पल वंश कश्मीर के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण राजवंश था, जिसने कार्कोट वंश के पतन के बाद राज्य में राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने का प्रयत्न किया। अवंतिवर्मन ने कश्मीर को दीर्घकालीन अशांति से बचाकर कृषि, सिंचाई, व्यापार और प्रशासन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार किया, जिससे राज्य में समृद्धि आई।
उत्पल काल में मंदिर-निर्माण, नगर-स्थापना, साहित्य और दर्शन का भी विकास हुआ। आनंदवर्धन जैसे आचार्यों और रत्नाकर जैसे कवियों ने कश्मीर को भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया। अवंतिस्वामिन्, अवंतीश्वर, शंकरगौरीश्वर और अन्य मंदिर इस काल की स्थापत्य उपलब्धियों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन उपलब्धियों के कारण कश्मीर के इतिहास में उत्पल काल की गणना एक रचनात्मक और परिवर्तनकारी युग के रूप में की जाती है।




