पूर्वीय समस्या
तुर्की साम्राज्य के पतन के परिणामस्वरूप यूरोपीय इतिहास में जिस जटिल राजनीतिक समस्या का जन्म हुआ, उसे ‘पूर्वीय समस्या’ के नाम से जाना जाता है। यह समस्या मुख्यतः इस प्रश्न से संबंधित थी कि कमजोर पड़ते ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य के विघटन के बाद उसके विशाल क्षेत्रों और राजनीतिक विरासत पर किस शक्ति का अधिकार होगा।
तुर्की साम्राज्य की स्थापना इस्लामी साम्राज्यवादी विस्तार की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण भाग थी। जब इस्लामी साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो रहा था, तब मध्य एशिया के सलजूक तुर्कों ने कुछ समय के लिए इस्लाम की राजनीतिक शक्ति को पुनर्जीवित किया। ग्यारहवीं शताब्दी में इस्लाम धर्म स्वीकार करने के पश्चात् उन्होंने पश्चिम की ओर विस्तार आरंभ किया। 1071 ई. में मंजिकर्ट के युद्ध में उन्होंने पूर्वी रोमन साम्राज्य को पराजित कर यूरोप के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न की। इसके बाद 1453 ई. में कुस्तुन्तुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) पर अधिकार कर उन्होंने पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत कर दिया। बाल्कन प्रायद्वीप का विशाल भाग तुर्की साम्राज्य में सम्मिलित हो गया और तुर्की शक्ति यूरोप के भीतर तक फैल गई।
1683 ई. में तुर्क सेनाओं ने वियना पर भी आक्रमण किया, किंतु यह प्रयास असफल रहा। हॉब्सबर्ग शासकों ने उनका दृढ़तापूर्वक सामना किया और इसके बाद तुर्कों का यूरोप में विस्तार रुक गया।
तलवार के बल पर स्थापित तुर्की साम्राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से यूरोप में रूसी साम्राज्य के बाद दूसरा सबसे बड़ा साम्राज्य था। बोस्निया, हर्जेगोविना, सर्बिया, यूनान, रूमानिया तथा अल्बेनिया जैसे प्रदेश इसके अधीन थे। साम्राज्य के यूरोपीय भाग में अनेक भिन्न-भिन्न जातियों के लोग निवास करते थे, जिनकी भाषा, संस्कृति और धर्म तुर्क शासकों से अलग थे। इनमें अधिकांश लोग स्लाव जाति के और ग्रीक कैथोलिक चर्च के अनुयायी ईसाई थे। तुर्की शासन मुख्यतः सैन्य शक्ति पर आधारित था और ईसाई जनता का राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक दृष्टि से शोषण किया जाता था।
यूरोप का मरीज
प्रारंभिक काल में तुर्की साम्राज्य अत्यंत शक्तिशाली था, किंतु अठारहवीं शताब्दी में उसके पतन के लक्षण स्पष्ट होने लगे। वास्तव में, तुर्की साम्राज्य की दीर्घकालिक स्थिरता का प्रमुख कारण उसकी आंतरिक शक्ति नहीं, बल्कि उसके पड़ोसी यूरोपीय राज्यों की दुर्बलता और पारस्परिक ईर्ष्या थी। 1789 ई. में फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् यूरोप में राष्ट्रीयता और जनतंत्र की भावनाओं का तीव्र प्रसार हुआ, जिससे तुर्की साम्राज्य का पतन लगभग अनिवार्य प्रतीत होने लगा।
1815 ई. के बाद तुर्की की शक्ति तीव्र गति से क्षीण होने लगी। तलवार के बल पर विशाल साम्राज्य को बनाए रखना कठिन हो गया। यह राष्ट्रीयता और प्रजातांत्रिक चेतना का युग था। फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव से बाल्कन प्रायद्वीप के अधीनस्थ राष्ट्रों में भी स्वतंत्रता की भावना जागृत हुई। वे राष्ट्रीयता के आधार पर अपनी स्वतंत्रता की माँग करने लगे। पूर्वीय समस्या का यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष था।
पूर्वीय समस्या केवल तुर्की के आंतरिक पतन का प्रश्न नहीं थी, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या भी बन चुकी थी। तुर्की साम्राज्य ऐसा क्षेत्र था, जहाँ यूरोप की प्रमुख शक्तियों, विशेषकर रूस और ऑस्ट्रिया के हित आपस में टकरा रहे थे। दोनों लंबे समय से तुर्की साम्राज्य के भविष्य में रुचि रखते थे और उसके प्रदेशों पर अधिकार करना चाहते थे। प्रारंभ में उनकी पारस्परिक प्रतिस्पर्धा ने उन्हें सफल नहीं होने दिया, किंतु अठारहवीं शताब्दी में दोनों शक्तियाँ कभी अलग-अलग और कभी मिलकर तुर्की के विरुद्ध युद्ध करने लगीं। परिणामस्वरूप तुर्की की सैन्य शक्ति कमजोर पड़ती गई और उसका साम्राज्य धीरे-धीरे विघटित होने लगा। इसी कारण यूरोप में तुर्की को ‘यूरोप का मरीज’ कहा जाने लगा।
जब तुर्की साम्राज्य इस संकटपूर्ण स्थिति से गुजर रहा था, तब यूरोप के सामने यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि उसके पतन के बाद उसके विशाल प्रदेशों का क्या होगा? इतिहास में इससे पहले भी कई दुर्बल राज्यों का विभाजन शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा किया जा चुका था। अतः यह स्पष्ट था कि तुर्की के यूरोपीय प्रदेशों पर भी यूरोपीय शक्तियों की दृष्टि लगी हुई थी। वियना कांग्रेस (1815 ई.) के बाद यह संभावना और अधिक स्पष्ट हो गई। एक ओर बाल्कन के ईसाई राष्ट्र राष्ट्रीयता के प्रभाव से स्वतंत्रता की माँग कर रहे थे, दूसरी ओर रूस और ऑस्ट्रिया जैसी शक्तियाँ तुर्की साम्राज्य के विघटन से लाभ उठाने की प्रतीक्षा कर रही थीं।
यूनान का स्वातंत्र्य संग्राम
दक्षिण-पूर्वी यूरोप में स्थित बाल्कन प्रायद्वीप में अनेक जातियाँ निवास करती थीं, जो भाषा, धर्म और संस्कृति की दृष्टि से तुर्कों से भिन्न थीं। तुर्क शासकों द्वारा इन जातियों पर व्यापक अत्याचार किए जाते थे। जब तक तुर्की साम्राज्य शक्तिशाली रहा, तब तक ये जातियाँ उसके अधीन रहीं; किंतु जैसे-जैसे साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा, वैसे-वैसे उनमें स्वतंत्रता की भावना जागृत होने लगी। फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन के प्रभाव से यूरोप में राष्ट्रीयता और जनतंत्र की जो भावना फैली, उसका प्रभाव बाल्कन प्रदेशों पर भी पड़ा। वियना कांग्रेस के बाद इन क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलनों का विस्तार होने लगा।
1804 ई. में सर्बिया के लोगों ने कारा जॉर्ज के नेतृत्व में तुर्की शासन के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कुछ स्थानीय अधिकार प्राप्त हुए। इससे अन्य बाल्कन राज्यों को भी प्रेरणा मिली। इस पृष्ठभूमि में यूनान का स्वातंत्र्य संग्राम बाल्कन राष्ट्रीयता की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में सामने आया।

यूनान में राष्ट्रीयता की जागृति
यूनान यूरोप की प्राचीन सभ्यता का केंद्र था। प्राचीन यूनानी संस्कृति ने विश्व सभ्यता को अमूल्य योगदान दिया था, किंतु बाद में यूनान तुर्की साम्राज्य का एक अंग बन गया। 1815 ई. के बाद राष्ट्रीयता की भावना ने यूनानियों को अपने गौरवपूर्ण अतीत के प्रति पुनः जागृत किया। इस समय यूनानी भाषा और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए एक बौद्धिक आंदोलन चल रहा था, जिससे राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
यूनानियों को यह अनुभव होने लगा कि जिस राष्ट्र ने विश्व को महान सांस्कृतिक धरोहर प्रदान की, वही आज पराधीन है और तुर्क शासकों के अधीन अत्याचार सह रहा है। फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव से स्वतंत्रता की यह भावना और भी तीव्र हो गई। इंग्लैंड और रूस जैसे देशों से भी यूनानियों को सहानुभूति और प्रोत्साहन मिल रहा था।
तुर्की साम्राज्य में यूनानियों की स्थिति अन्य जातियों की अपेक्षा अपेक्षाकृत अच्छी थी। वे शिक्षित और सुसंस्कृत थे तथा प्रशासन और व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यूनानी नाविक समुद्री व्यापार में अग्रणी थे और आर्थिक दृष्टि से भी समृद्ध थे। उन्हें धार्मिक और स्थानीय स्वायत्तता भी प्राप्त थी। फिर भी वे पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे और तुर्की को दी जाने वाली वार्षिक कर-राशि को अपमानजनक मानते थे। धार्मिक एकता तथा राष्ट्रीय गौरव की भावना ने उनके स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक सशक्त बनाया।
यूनान में विद्रोह
1821 ई. में यूनानियों ने तुर्की शासन के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठा लिया। यह विद्रोह प्रारंभ में हिप्सिलांटी के नेतृत्व में मोल्डेविया में शुरू हुआ। विद्रोहियों को आशा थी कि रूस उनकी सहायता करेगा, किंतु उस समय रूस के जार अलेक्जेंडर पर मेटरनिख (1809 से 1848 ई.) का प्रभाव था और उसने यूनानी विद्रोहियों को सहायता देने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप तुर्की ने विद्रोह को कठोरता से दबा दिया और कुछ ही महीनों में मोल्डेविया का आंदोलन समाप्त हो गया।
किंतु यूनान में राष्ट्रीयता की जो भावना जाग चुकी थी, उसे दबाना संभव नहीं था। 1821 में मोल्डेविया और वलाकिया में विद्रोह की शुरुआत के पश्चात मोरिया (पेलोपोनीज़) तथा एजियन सागर के अनेक द्वीपों में यूनानियों ने ऑटोमन शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह छेड़ दिया। इस प्रकार यूनानी राष्ट्रीय आंदोलन तेजी से फैल गया और अंततः यह यूनान के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बना।
यूनानी अपनी स्वतंत्रता के लिए प्राणपण से संघर्ष कर रहे थे। उन्हें यूरोप की जनता की सहानुभूति प्राप्त थी। अनेक देशों से स्वयंसेवक उनकी सहायता के लिए आए। इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि लार्ड बायरन ने भी यूनानियों के समर्थन में भाग लिया। पूरे यूरोप में यूनान की सहायता के लिए धन और हथियार एकत्र किए गए।
उस्मानी सुल्तान महमूद द्वितीय के लिए यह विद्रोह अत्यंत गंभीर चुनौती था। यूनानी विद्रोह को दबाने के लिए उसने मिस्र के शासक मोहम्मद अली से सहायता माँगी। मोहम्मद अली ने अपने पुत्र इब्राहीम पाशा को आधुनिक सेना के साथ यूनान भेजा। इब्राहीम पाशा ने कठोर दमन के माध्यम से विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। यद्यपि यूरोप की जनता यूनानियों के प्रति सहानुभूति रखती थी, फिर भी मेटरनिख यूरोप में क्रांतिकारी आंदोलनों का विरोधी था। उसके प्रभाव के कारण यूरोपीय सरकारें प्रारंभ में यूनान की खुलकर सहायता नहीं कर सकीं और कुछ समय के लिए यूनानियों की पराजय निश्चित प्रतीत होने लगी।
यूरोप का रुख एवं यूनान की स्वतंत्रता
यूनान के विद्रोह का प्रश्न यूरोपीय राजनीति के सामने लाइबाख कांग्रेस में प्रमुख रूप से उपस्थित हुआ। ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख का मत था कि यूनान के मामले में किसी प्रकार का विदेशी हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। इंग्लैंड भी प्रारंभ में हस्तक्षेप का विरोधी था। उसकी दृष्टि में यूनानियों की सफलता का अर्थ तुर्की साम्राज्य की दुर्बलता और विघटन था, जबकि ब्रिटेन की विदेश नीति का एक प्रमुख उद्देश्य तुर्की साम्राज्य की अखंडता बनाए रखना था। इंग्लैंड को भय था कि तुर्की के कमजोर होने से रूस भूमध्यसागर की ओर बढ़ेगा, जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों को खतरा उत्पन्न हो सकता था। इस प्रकार ऑस्ट्रिया और इंग्लैंड दोनों ही यूनानी विद्रोहियों को सहायता देने अथवा विदेशी हस्तक्षेप के विरोधी थे।
किंतु यूनानियों की पराजय की संभावना से रूस में असंतोष फैलने लगा। रूस लंबे समय से तुर्की साम्राज्य के पतन की नीति का समर्थक था। दक्षिण-पश्चिम दिशा में विस्तार करना उसकी विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य था और यूनान का संघर्ष उसके लिए एक उपयुक्त अवसर प्रतीत हो रहा था। इसके अतिरिक्त, रूस का जार ग्रीक चर्च का संरक्षक माना जाता था और यूनानी भी इसी शाखा के ईसाई थे। इसलिए धार्मिक तथा राजनीतिक दोनों दृष्टियों से रूस यूनानियों की सहायता करने के लिए बाध्य था।
युद्ध के दौरान कुछ ऐसी घटनाएँ भी हुईं जिनसे रूस अत्यंत नाराज हो गया। उसने तुर्की से अपने कूटनीतिक संबंध समाप्त कर लिए और युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी। यद्यपि इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया के प्रयासों से रूस कुछ समय के लिए शांत हो गया, फिर भी उसकी नीति में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया।
यूरोपीय हस्तक्षेप की शुरुआत
विदेशी हस्तक्षेप की आशंका से तुर्की को प्रोत्साहन मिला और इब्राहीम पाशा ने यूनानियों के विरुद्ध अपना दमनचक्र और तीव्र कर दिया। उसने क्रीट पर अधिकार स्थापित किया तथा एथेंस और अन्य क्षेत्रों में यूनानियों पर भीषण अत्याचार किए। इन अत्याचारों से समस्त यूरोप के ईसाइयों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हो गया। यूरोपीय जनता अपनी-अपनी सरकारों पर यूनानियों की सहायता करने के लिए दबाव डालने लगी।
इसी समय दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने यूरोपीय राजनीति की दिशा बदल दी। पहला, 1822 ई. में कैसलरे के स्थान पर जॉर्ज कैनिंग इंग्लैंड के विदेश मंत्री के रूप में नियुक्ति और दूसरा, नेवारिनो का युद्ध। यद्यपि वह भी प्रारंभ में अहस्तक्षेप की नीति का समर्थक थे, किंतु परिस्थितियों ने उन्हें अपनी नीति बदलने के लिए बाध्य कर दिया। यूनानी अब भी संघर्षरत थे और समुद्र पर उनका प्रभाव बना हुआ था। इसके कारण इंग्लैंड के व्यापारिक जहाजों को भारी क्षति पहुँच रही थी। इस स्थिति में इंग्लैंड ने यूनान को एक “युद्धरत राष्ट्र” के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया। इससे पहले यूनानी केवल समुद्री लुटेरे माने जाते थे, किंतु कैनिंग ने यह स्वीकार किया कि इतने बड़े राष्ट्र को केवल विद्रोही या डाकू मानना अनुचित है। इंग्लैंड की इस नीति-परिवर्तन से यूनानियों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई।
इंग्लैंड के इस कदम का अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्वरूप रूस और ऑस्ट्रिया को भी अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। अब यूरोपीय शक्तियाँ किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप आवश्यक समझने लगीं, यद्यपि हस्तक्षेप के स्वरूप को लेकर उनमें मतभेद बने रहे। इसी बीच रूस के जार अलेक्जेंडर प्रथम की मृत्यु हो गई और निकोलस प्रथम रूस के सिंहासन पर बैठे। निकोलस प्रथम यूनानियों के समर्थन में अधिक सक्रिय थे और तुर्की के विरुद्ध हस्तक्षेप करने के पक्ष में थे।
1826 ई. में इंग्लैंड और रूस ने तुर्की के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह यूनान को तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त राज्य के रूप में स्वीकार कर ले, किंतु सुल्तान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। दूसरी ओर, यूरोप की जनता यूनानियों पर हो रहे अत्याचारों से अत्यंत क्षुब्ध थी। फलस्वरूप रूस, इंग्लैंड और फ्रांस ने संयुक्त रूप से तुर्की के सुल्तान को चेतावनी दी कि यूरोप में शांति बनाए रखने के लिए यूनान को स्वतंत्रता प्रदान की जाए। किंतु ऑस्ट्रिया और प्रशा ने इस नीति का समर्थन नहीं किया।
नेवारिनो का युद्ध (20 अक्टूबर 1827 ई.)
1827 ई. मे जब तीनों शक्तियों—रूस, इंग्लैंड और फ्रांस ने संयुक्त संदेश तुर्की के सुल्तान को भेजा, उसी समय इंग्लैंड और फ्रांस ने अपने नौसैनिक बेड़ों को भूमध्यसागर में सतर्क रहने का आदेश दिया। नेवारिनो (Navarino) के बंदरगाह पर तुर्की और मिस्र के संयुक्त जहाजी बेड़े भी उपस्थित थे। तनावपूर्ण स्थिति दोनों पक्षों के जहाजी बेड़ों के बीच 20 अक्टूबर 1827 ई. को एक छोटी-सी मुठभेड़ हुई, जो शीघ्र ही यूनान (ग्रीस) के स्वतंत्रता संग्राम में परिवर्तित हो गया। इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस की संयुक्त नौसेना ने उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य और मिस्र के संयुक्त बेड़े को पराजित कर पूर्णतः नष्ट कर दिया। नेवारिनो का युद्ध (1827) ग्रीक स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक नौसैनिक युद्ध था, जिसने ग्रीस की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया और ऑटोमन साम्राज्य के पतन को गति दी।
यूनान की स्वतंत्रता (14 सितंबर 1829 ई.)
नेवारिनो के युद्ध (1827) के बाद इंग्लैंड और फ्रांस कुछ हद तक पीछे हट गए, किंतु रूस ने अवसर का लाभ उठाते हुए तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। तुर्की रूस की शक्ति का सामना नहीं कर सका और अंततः उसे 14 सितंबर 1829 ई. को एड्रियानोपल की संधि करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस संधि के परिणामस्वरूप यूनान को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। बाद में यूनानियों ने बवेरिया के राजकुमार ओटो को अपना राजा चुना और यूनान में वैध राजसत्ता की स्थापना की गई।
यूनान की स्वतंत्रता वियना कांग्रेस के बाद यूरोपीय इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। यह राष्ट्रीयता के सिद्धांत की पहली बड़ी विजय थी। उस समय यूरोप में मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति का प्रभाव था, जो राष्ट्रीय आंदोलनों और उदारवादी विचारों का विरोध करती थी। ऐसे वातावरण में यूनान की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रीयता की भावना को लंबे समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता।




