जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)
जैन परंपरा में लोक और ईश्वर परिचय जैन परंपरा में ‘लोक’ (ब्रह्मांड) और ‘ईश्वर’ (परमात्मा) […]

Table of Contents

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर

परिचय

जैन परंपरा में ‘लोक’ (ब्रह्मांड) और ‘ईश्वर’ (परमात्मा) की अवधारणा सृष्टिकर्ता ईश्वर को माननेवाले दर्शनों से भिन्न है। जैन दर्शन के अनुसार लोक अनादि, अनंत और स्वयं-संचालित है; इसकी रचना, पालन या विनाश किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर द्वारा नहीं किया गया है। लोक छह शाश्वत द्रव्यों — जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल — से बना है, जिनमें निरंतर अवस्थागत परिवर्तन होते रहते हैं। जैन धर्म में ईश्वर किसी एक सृष्टिकर्ता या नियंत्रक सत्ता का नाम नहीं, बल्कि कर्मबंधन से पूर्णतः मुक्त, शुद्ध और वीतराग आत्मा को परमात्मा या सिद्ध कहा जाता है। ऐसी आत्मा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और पूर्ण आनंद को प्राप्त करती है तथा राग, द्वेष, क्रोध और अहंकार से मुक्त होती है। इसलिए जैन परंपरा में अनेक मुक्त आत्माओं को परमात्मा माना जाता है, जबकि तीर्थंकर — जैसे प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और चौबीसवें व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर (लगभग छठी शताब्दी ई.पू.) — भी अपने पुरुषार्थ से इसी परम पद को प्राप्त महान आत्माएँ हैं। इस प्रकार जैन दर्शन में सृष्टि अनादि है और मोक्ष प्राप्त जीव ही ईश्वरत्व का स्वरूप है, न कि कोई सृष्टि का कर्ता।

जैन परंपरा में लोक की अवधारणा

विश्व, जगत् अथवा संसार के लिए जैन परंपरा में सामान्यरूप से ‘लोक’ शब्द का व्यवहार हुआ है। जैन साहित्य में ‘लोक’ के दो रूप मिलते हैं — कहीं पर ‘पंचास्तिकाय’ को ‘लोक’ कहा गया है तो कहीं पर ‘षड्द्रव्य’ को ‘लोक’ माना गया है। ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ (भगवतीसूत्र, जो द्वादशांगी के पाँचवें अंग-आगम के रूप में जैन आगम-साहित्य का एक अत्यंत विस्तृत और प्रश्नोत्तर-शैली में रचित ग्रंथ है) में एक स्थान पर बताया गया है कि ‘लोक’ पंचास्तिकायरूप है। पंचास्तिकाय हैं- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय। आचार्य कुंदकुंद (लगभग प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई., दिगंबर परंपरा के प्रमुख आध्यात्मिक आचार्य) कृत ‘प्रवचनसार’ में ‘लोक’ का स्वरूप बताते हुए कहा गया है कि ‘जो आकाश, पुद्गल और जीव से संयुक्त है तथा धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और काल से भरा हुआ है, वह लोक है।’

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)
जैन परंपरा में लोक

जैन दर्शन में छह प्रमुख तत्त्व (षड्द्रव्य)

सामान्यतः ‘लोक’ में छह तत्त्व हैं- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल। इस प्रकार लोक इन छह तत्त्वों का समुच्चय है। इनके अतिरिक्त लोक कुछ नहीं है। ये छह तत्त्व अनादि-अनंत हैं। ये छह तत्त्व स्वतः सत् हैं। इनको न किसी ने बनाया है और न कोई मिटा सकता है। ये हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे। इनमें सदैव परिवर्तन होते रहते हैं, किंतु ये सर्वथा नष्ट नहीं होते। इनकी न एकदम नई उत्पत्ति ही होती है और न सर्वथा विनाश ही। अपनी उत्पत्ति, विनाश और स्थिरता के लिए ये स्वयं उत्तरदायी हैं, अन्य कोई शक्ति नहीं। जैन तत्त्वज्ञान में जीव और पुद्गल को छोड़कर शेष चार द्रव्यों (धर्म, अधर्म, आकाश, काल) को एक-एक द्रव्य के रूप में तथा जीव और पुद्गल को अनंत संख्या में माना गया है, जो जैन दर्शन की तत्त्वमीमांसा की एक विशिष्ट देन है।

लोक का आकार और परिमाण

विश्व का आकार नियत एवं अपरिवर्तनीय है। इसके नाप के लिए ‘रज्जु’ का आधार लिया जाता है- रज्जु एक काल्पनिक दूरी-मापक इकाई है, जिसकी परिभाषा जैन ब्रह्मांडशास्त्र में देवगति की गति के आधार पर की गई है। विश्व की ऊँचाई चौदह (14) ‘रज्जुप्रमाण’ है। चौड़ाई उत्तर-दक्षिण में सात रज्जु है। पूर्व-पश्चिम में सबसे नीचे सात रज्जु है, फिर क्रमशः घटते-घटते ठीक मध्य भाग में अर्थात् सात रज्जु की ऊँचाई पर एक रज्जु रह जाती है। फिर धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते शेष अर्धभाग के मध्य में पाँच रज्जु हो जाती है, फिर क्रमशः घटते-घटते सबसे ऊपर एक रज्जु रह जाती है। विश्व का घनाकार नाप तीन सौ तैंतालिस (343) रज्जुप्रमाण है — यह दिगंबर मत है। श्वेतांबर मत के अनुसार उत्तर-दक्षिण व पूर्व-पश्चिम दोनों ओर की चौड़ाई क्रमशः घटती-बढ़ती है, किंतु विश्व का घनाकार नाप तीन सौ तैंतालिस (343) रज्जुप्रमाण ही रहता है। इस प्रकार जैन ब्रह्मांडशास्त्र में लोक की आकृति को प्रायः कमर पर हाथ रखकर तथा पैर फैलाकर खड़े हुए एक पुरुष के आकार (‘लोकपुरुष’) से उपमित किया जाता है।

लोक के तीन विभाग: अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक

‘लोक’ तीन भागों में विभक्त है- अधः, मध्य और ऊर्ध्व। ‘अधोभाग’ मेरुपर्वत के समतल से नौ सौ योजन नीचे से प्रारंभ होता है। समतल से नौ सौ योजन ऊँचे से ‘ऊर्ध्वभाग’ शुरू होता है। ऊर्ध्वलोक से नीचे और अधोलोक से ऊपर ‘अठारह सौ योजन’ का ‘मध्यभाग’ अर्थात् ‘मध्यलोक’ स्थित है। ऊर्ध्वलोक आकार में ‘पखावज’ (मृदंग जैसे एक वाद्ययंत्र) के समान है।

अधोलोक का आकार औंधे किए हुए शराव (मिट्टी के दीये जैसे पात्र) के समान है, अर्थात् नीचे-नीचे विस्तीर्ण है। ‘मध्यलोक’ थाली के समान गोलाकार है, अर्थात् समान लंबाई-चौड़ाई वाला है। ‘अधोलोक’ में सात नरक-भूमियों के अंतर्गत नारकियों का निवासस्थान है, जबकि ‘मध्यलोक’ में मानव, तिर्यंच (पशु-पक्षी) तथा भवनवासी-व्यंतर देव रहते हैं। मध्यलोक के केंद्र में जंबूद्वीप स्थित है, जिसके ठीक मध्य में मेरु पर्वत तथा भरतक्षेत्र (जिसमें वर्तमान भारतवर्ष की स्थिति मानी जाती है) अवस्थित है। ‘ऊर्ध्वलोक’ में वैमानिक देव रहते हैं, जो कल्पोपन्न (बारह देवलोकों में निवास करनेवाले) और कल्पातीत (ग्रैवेयक, अनुत्तर विमानों तथा सर्वोच्च स्थान सिद्धशिला में निवास करनेवाले) होते हैं। ऊर्ध्वलोक के शिखर पर स्थित ‘सिद्धशिला’ वह स्थान है, जहाँ मुक्त आत्माएँ (सिद्ध) सदा के लिए निवास करती हैं और यही जैन परंपरा में मोक्ष-प्राप्ति का चरम गंतव्य माना जाता है।

द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की दृष्टि से लोक का विश्लेषण

लोक चार प्रकार से जाना जाता है- द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से और भाव से। द्रव्य की अपेक्षा से ‘लोक’ एक है और सांत है। क्षेत्र की अपेक्षा से ‘लोक’ असंख्यात योजन कोटि-कोटि विस्तार और असंख्यात योजन कोटि-कोटि परिक्षेप प्रमाण है, इसलिए क्षेत्र की अपेक्षा से भी लोक सांत है। काल की अपेक्षा से कोई काल ऐसा नहीं जब ‘लोक’ न हो, अतः ‘लोक’ ध्रुव है, नित्य है, शाश्वत है, अक्षय है, अव्यय है, अवस्थित है। भाव की अपेक्षा से ‘लोक’ के अनंत वर्णपर्याय, गंधपर्याय, रसपर्याय, स्पर्शपर्याय हैं। अनंत संस्थानपर्याय हैं, अनंत गुरुलघुपर्याय हैं, अनंत अगुरुलघुपर्याय हैं।

इस प्रकार ‘लोक’ द्रव्यदृष्टि से सांत है, क्योंकि द्रव्य संख्या में एक है; क्षेत्रदृष्टि से भी लोक सांत है, क्योंकि सकल आकाश के कुछ क्षेत्र में ही ‘लोक’ है (शेष अनंत आकाश ‘अलोक’ कहलाता है, जहाँ केवल आकाशद्रव्य की सत्ता है)। कालदृष्टि से ‘लोक’ अनंत है, क्योंकि वर्तमान, भूत और भविष्यत् का कोई ऐसा क्षण नहीं जिसमें ‘लोक’ का अस्तित्व न हो। भावदृष्टि से भी ‘लोक’ अनंत है, क्योंकि एक लोक के अनंत पर्याय हैं। जैन काल-गणना के अनुसार सृष्टि उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दो कालचक्रों में चक्रीय रूप से गतिमान रहती है, जो लोक की अनादि-अनंतता की इस अवधारणा को और पुष्ट करता है।

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)
जैन परंपरा में तत्त्व

जैन परंपरा में ईश्वर की अवधारणा

कहा जाता है कि ‘ईश्वर’ से तात्पर्य परमात्मा, गॉड या खुदा से है, जिसके विभिन्न हज़ारों नाम हैं और जिसे प्रायः सभी धर्म-दर्शनों में आराध्य या उपास्य स्वीकार किया गया है। ईश्वर के संबंध में बहुसंख्यक लोगों की मान्यता है कि वह इस जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता है, और बहुत लोगों के अनुसार उसे इसी अर्थ में सृजनहार, पालनहार और विध्वंसक कहा जाता है।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है, कुछ भी कर सकता है, पल भर में राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है। संपूर्ण जगत् का कण-कण उसी की इच्छानुसार परिवर्तन करता है, वही एक सबका भला-बुरा करनेवाला है, सबको सुख-दुख की सामग्री देनेवाला है अथवा जैसा चाहे वैसा करनेवाला है- इत्यादि सामान्य ईश्वरवादी मान्यताएँ प्रचलित हैं।

अधिकांश धर्म और दर्शन ईश्वर को सृष्टि एवं जीवों का उत्पन्न करनेवाला, उनका पालन करनेवाला एवं उनके भाग्य का निर्धारण करनेवाला मानते हैं। कर्तावादी संप्रदाय भी पदार्थ का तथा उसके परिवर्तन का कर्ता ईश्वर को ही मानते हैं। इस विचारधारा के दार्शनिकों ने ईश्वर की परिकल्पना संपूर्ण ब्रह्मांड की परमशक्ति के रूप में की है, जो समस्त प्राणियों के भाग्य का विधाता है।

ईश्वर की कर्तृत्व-शक्ति पर जैन दृष्टिकोण

भारतीय आत्मवादी दर्शनों में ईश्वर-कर्तृत्व को मान्यता प्रदान की गई है, जैसे न्याय-वैशेषिक दर्शन ईश्वर को जगत् का निमित्त-कारण मानता है। किंतु जैन धर्म ईश्वर के इस प्रकार के अस्तित्व को नहीं स्वीकार करता। वह ईश्वर को सृष्टिकर्ता भी नहीं मानता। इसका कारण यह है कि ऐसा मानने से उसे संसार के पापों और कुकर्मों का भी कर्ता मानना पड़ेगा।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में भी ऐसा कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर या भगवान् संभव नहीं है, क्योंकि यह संपूर्ण जगत् एक निश्चित कारण-कार्य व्यवस्था के अनुसार संचालित है, तथा उस कारण-कार्य व्यवस्था के विरुद्ध कुछ भी उल्टा-सीधा कार्य कभी भी कोई नहीं कर सकता। सृष्टि के समस्त कार्य एक सुनिश्चित कार्य-कारण व्यवस्था के अनुसार स्वयमेव संचालित हो रहे हैं, उन्हें कोई ईश्वर या परमात्मा संचालित करनेवाला नहीं है तथा उन कार्यों को कभी कोई ईश्वर उल्टा-सीधा परिणाम नहीं दे सकता।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस संपूर्ण विश्व में जितने पदार्थ प्रारंभ से थे, उतने ही आज हैं और भविष्य में भी अनंतकाल तक उतने ही बने रहेंगे। ऊर्जा-संरक्षण और द्रव्यमान-संरक्षण के भौतिक नियमों के अनुसार भी उनमें से कभी किसी पदार्थ को मूलतः न तो पैदा किया जा सकता है और न ही सर्वथा नष्ट किया जा सकता है। मात्र पदार्थों का अवस्था-परिवर्तन होता है। जैन दर्शन के ‘द्रव्य-नित्यता, पर्याय-परिवर्तनशीलता’ सिद्धांत से इसकी उल्लेखनीय समानता देखी जा सकती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता कोई ईश्वर सिद्ध नहीं होता। इसी प्रकार सभी जीवों का सुखी-दुखी होना भी अपने-अपने कर्मों और भावों पर निर्भर करता है। उसमें भी किसी ईश्वर जैसे अन्य तत्त्व की कोई आवश्यकता नहीं है।

स्तुति से प्रसन्न होकर भला करनेवाला और निंदा से नाराज होकर बुरा करनेवाला ईश्वर वैज्ञानिक दृष्टि से भी न्याय-संपन्न परमपूज्य सिद्ध नहीं होता। सांख्य, मीमांसा आदि अनेक प्राचीन भारतीय दर्शनों में भी ईश्वर या परमात्मा को आरंभतः जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं माना गया है, और इस प्रकार की सृष्टिकर्तृत्ववादी धारणा बहुत परवर्ती मानी जाती है। विश्व की सृष्टि किसी की इच्छा का परिणाम नहीं है। यह भौतिक द्रव्य या पदार्थ के अविनाश-सिद्धांत की पुष्टि करता है, जिसके अनुसार भौतिक द्रव्य का कभी विनाश नहीं होता, केवल उसका रूपांतर होता है।

समकालीन अस्तित्ववादी दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। साम्यवादी दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है। यह विचार भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर मनुष्य का सृष्टा नहीं है, अपितु मनुष्य ही ईश्वर की अवधारणा का सृष्टा है, इसीलिए भारत में हज़ारों वर्ष पूर्व प्रवर्तित श्रमण परंपरा (जिसमें जैन और बौद्ध धर्म सम्मिलित हैं) ने भी ईश्वर-कर्तृत्व को मान्यता नहीं दी।

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)
जैन परंपरा में ईश्वर

आस्तिक-नास्तिक विवाद और जैन दर्शन

दर्शन का आधार तर्क होता है, परंतु यह विडंबना है कि अनेक भारतीय दार्शनिक और उनकी कृतियाँ अंधानुकरण कर तमाम अवधारणाएँ ढोती चली आ रही हैं। श्रमण दर्शनों को नास्तिक मानना ऐसी ही एक अवधारणा है। सामान्यतः लोग समझते हैं कि भारतीय दर्शन की आस्तिक-नास्तिक दो शाखाएँ हैं- वैदिक दर्शन को आस्तिक और जैन-बौद्ध जैसे अवैदिक दर्शनों को नास्तिक कहा जाता है। यह वर्गीकरण निराधार और दुराग्रहपूर्ण है।

आस्तिक, नास्तिक शब्द ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः’ इस पाणिनि-सूत्र (अष्टाध्यायी 4.4.60) के अनुसार बने हैं। पाणिनीय व्याकरण के इस सूत्र पर ‘काशिका’ तथा ‘महाभाष्य’ लिखनेवाले क्रमशः वामन-जयादित्य तथा पतंजलि पर टीका करनेवाले आचार्य कैयट (ग्यारहवीं शताब्दी ई.) ने इसका अर्थ किया है कि ‘जो परलोक, कर्मफल को मानता है वह आस्तिक है और जो उसे नहीं मानता वह नास्तिक है।’

कैयट की इस परिभाषा के आधार पर यदि आस्तिक और नास्तिक को परिभाषित किया जाए, तो जैन और बौद्ध भी आस्तिक दर्शन ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि इन दोनों दर्शनों में स्पष्टतया परलोक, पुनर्जन्म और उसके जनक शुभ-अशुभ कर्मों को स्वीकार किया गया है। इस परिभाषा का मौलिक अर्थ यही है कि जो परलोक की सत्ता मानता है वह आस्तिक है, और जो नहीं मानता, वह नास्तिक है। इस अर्थ में जैन-बौद्ध को नास्तिक नहीं कहा जा सकता।

श्रमण धारा वैदिक परंपरा को न मानकर भी आत्मा, जड़-भिन्न ज्ञान-संतान, पुण्य-पाप, परलोक, निर्वाण आदि में विश्वास रखती है, अतः पाणिनि की परिभाषा के अनुसार वह आस्तिक ही है। वेद को या ईश्वर को जगत्-कर्ता न मानने के कारण श्रमण धारा को नास्तिक कहना उचित नहीं है, क्योंकि अपनी अमुक परंपरा को न मानने के कारण यदि श्रमण को नास्तिक कहा जाए, तो श्रमण-परंपरा को न माननेवाले वैदिकों को भी मिथ्यादृष्टि आदि विशेषणों से पुकारा जा सकता है, जो कि तर्कसंगत नहीं है।

जैन दर्शन उतना ही आस्तिक या नास्तिक है, जितना हिंदुओं का कोई भी दर्शन। जैन परंपरा सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करती है। जैनों की भाँति बौद्ध भी ईश्वर की सत्ता का खंडन करते हैं, इसलिए दोनों धर्मों (जैन और बौद्ध) को सामान्यतः ‘अनीश्वरवादी’ धर्म कहा जाता है। यद्यपि वे दोनों ‘नास्तिक’ के परंपरागत लांछन से मुक्त होकर, कर्म-सिद्धांत और परलोक जैसी आस्तिक मान्यताओं के दृढ़ समर्थक हैं।

जब आत्मा अनादि-अनंत है और भौतिक द्रव्य/पदार्थ भी अनादि-अनंत हैं, तब सृष्टि के कर्ता-धर्ता तथा जीवात्माओं के शरीर, इंद्रिय और मन के कारण तथा उनके भाग्य-विधाता के रूप में ईश्वर की सत्ता मानने का कोई औचित्य नहीं है। यदि ईश्वर नियंता, निर्माता और भाग्यविधाता है, और वह जीव को बिना कर्म के स्वेच्छा से फल प्रदान कर सकता है, तो फिर मनुष्य के धर्म, आचरण, त्याग, तपस्या का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

जीव या आत्मा स्वेच्छानुसार एवं सामर्थ्यानुकूल कर्म करने में स्वतंत्र है। उसमें ईश्वर के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं है। वह अपने ही कर्मों का फल भोगता है, फल-प्रदाता कोई दूसरा नहीं है। इसलिए उत्पत्ति एवं विनाश के हेतु किसी परमशक्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है।

तात्त्विक दृष्टि से ईश्वर को फल-प्रदाता मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। कारण-कार्य के सिद्धांत के आधार पर भी विश्व की समस्त घटनाओं की तार्किक व्याख्या करना संभव है। विश्व जिन जीवों (चेतनाओं) एवं पुद्गल (पदार्थों) का समुच्चय है, वे तत्त्वतः अविनाशी एवं आंतरिक हैं। इसलिए जगत् को मिथ्या, स्वप्नवत् या शून्य भी नहीं माना जा सकता।

किसी भी नवीन पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती। पदार्थ में अपनी अवस्थाओं का रूपांतर होता रहता है। ब्रह्मांड के प्रत्येक मूल-तत्त्व की अपनी मूल-प्रकृति है। कार्य-कारण के नियम के आधार पर प्रत्येक मूल-तत्त्व अपने गुणानुसार बाह्य स्थितियों से प्रतिक्रिया करता है। इस कारण जगत् मिथ्या नहीं है। संसार के पदार्थ अविनाशी हैं, इसलिए विश्व स्वप्नवत् भी नहीं है। शून्य से किसी वस्तु का निर्माण नहीं होता। जैन दर्शन के अनुसार तात्त्विक दृष्टि से मुक्त आत्मा अथवा मुक्त जीव और परमात्मा में कोई भेद नहीं है-  स्वभाव की दृष्टि से सभी जीव समान हैं।

तीर्थंकर, पंचपरमेष्ठी और मुक्त आत्मा की अवधारणा

जैन धर्म ने ईश्वर की कर्तृत्व-शक्ति को सिद्धांत रूप से अस्वीकार किया है। जैन धर्म मूल्यों में आस्था रखता है। जैन धर्म में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह जैसे पंचमहाव्रतों की मीमांसा हुई है। प्रत्येक जैन इनका पालन सतर्कतापूर्वक करता है, तथा सम्यक् चरित्र को प्रमुख स्थान प्रदान करता है। मूल्यों की इसी प्रधानता के कारण जैन धर्म धर्म की कोटि में आता है। नैतिक मूल्यों के नियंत्रण के लिए ही जैन तीर्थंकरों में आस्था रखते हैं। यद्यपि तीर्थंकर जैन धर्म में ईश्वर के सदृश हैं, किंतु वे सृष्टि या पदार्थ के नियामक नहीं हैं। जैन धर्म ईश्वर में तो विश्वास नहीं करता, लेकिन देवत्व में विश्वास करता है।

वस्तुतः जैन धर्म प्रत्येक मुक्त जीव को देवता मानता है, और ऐसे देवताओं की संख्या में केवल वृद्धि ही हो सकती है, ह्रास नहीं। यदि हम ‘ईश्वर’ उस परमपुरुष को समझते हैं जो इस विश्व की सृष्टि करता है, तो जैन धर्म निश्चय ही इस अर्थ में नास्तिक है। वह तर्क से ईश्वर की इस धारणा को स्वविरोधी बताता है। यदि ईश्वर को विश्व की सृष्टि की आवश्यकता है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसमें कोई अपूर्णता है, जो कि उसके सर्वोच्च होने के नाते अनिवार्यतः पूर्ण माने जाने से संगति नहीं रखता। अतः जैन दृष्टि से कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं है और विश्व की कभी सृष्टि नहीं हुई। यद्यपि यह मत मनुष्य की सामान्य आस्था के विरुद्ध प्रतीत हो सकता है, पर यह तार्किक आधार से एकदम शून्य नहीं है।

ईश्वरवादी दर्शन प्रायः ईश्वर पर मानवत्व का आरोप कर देते हैं। वे ईश्वर को मनुष्य के स्तर पर ले आते हैं। इसके विपरीत, जैन धर्म प्राणिमात्र को ही तब ईश्वर के रूप में देखता है जब उसकी सहज शक्तियाँ पूर्ण विकास की अवस्था में होती हैं। यहाँ ‘ईश्वर’ जीव के सर्वोत्तम रूप के लिए ही प्रयुक्त एक दूसरा शब्द है। आदर्श मानव ही मानव का आदर्श है, और उसकी सिद्धि का एकमात्र उपाय यह है कि हम आदर्श मनुष्यों को उदाहरण के रूप में अपने सामने रखें तथा उसी तरह प्रयत्न करें जिस तरह अन्य मुक्तात्माओं ने किया था। ऐसा आदर्श हमें पूरी आशा और पूरा प्रोत्साहन देता है, क्योंकि जो एक व्यक्ति कर चुका है, उसे दूसरा भी कर सकता है।

जैन धर्म ईश्वर के स्थान पर तीर्थंकरों को प्रतिष्ठित करता है। जैन परंपरा में कुल चौबीस तीर्थंकर मान्य हैं, जिनमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) तथा अंतिम व चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर हैं। ये तीर्थंकर मुक्त होते हैं, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य, अनंत आनंद-संपन्न होकर सिद्धशिला में निवास करते हैं। जैन धर्मानुयायी तीर्थंकरों और पंचपरमेष्ठी (अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा साधु) की आराधना करते हैं। इसी पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करनेवाला ‘णमोकार मंत्र’ (नमस्कार महामंत्र) जैन धर्म का सर्वाधिक पवित्र और मौलिक मंत्र माना जाता है। जैन अनुयायी इनके प्रति भक्ति रखते हुए इनकी पूजा करते हैं तथा मूर्तिपूजा का भी प्रतिपादन करते हैं, किंतु तीर्थंकर या पंचपरमेष्ठी ईश्वर नहीं हैं, अपितु आदर्श और पूर्णता के प्रतीक हैं।

जैनों का विश्वास है कि तीर्थंकर या पंचपरमेष्ठी के बताए हुए मार्ग पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है, इसलिए जैन धर्म आशावादी भी है। ईश्वर को, जो पहले से ही है, अस्वीकार करने में तथा साथ ही इस विश्वास को कि मोक्ष उसकी दया से प्राप्तव्य है, अस्वीकार करने में जैन धर्म और उसकी तरह के अन्य दर्शन यह मानते हैं कि समग्र अनुभव की व्याख्या के लिए कर्म-सिद्धांत स्वतः, बिना किसी ईश्वरीय शक्ति के हस्तक्षेप की अपेक्षा रखे, पर्याप्त है और इस प्रकार मनुष्य के अंदर यह धारणा पैदा करते हैं कि जो कुछ वह करता है, उसके लिए वह स्वयं ही पूर्णतः उत्तरदायी है।

जैन धर्म मनुष्य को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता देने में हर अन्य धर्म से बढ़कर है। जो कुछ कर्म हम करते हैं और उनके जो फल हैं, उसके बीच कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। एक बार कर लिए जाने के बाद कर्म हमारे प्रभु बन जाते हैं और उनके फल भोगने ही पड़ते हैं। जितनी बड़ी हमारी स्वतंत्रता है, उतना ही बड़ा हमारा दायित्व भी है। जैन दर्शन यह उद्घोष करता है कि धर्म की साधना करनेवाले साधक को देवता भी नमस्कार करते हैं।

जैन धर्म प्रतिपादित करता है कि कल्पित एवं सर्जित शक्तियों के पूजन से नहीं, अपितु त्रिरत्न (सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चरित्र) के द्वारा ही आत्म-साक्षात्कार संभव है, उच्चतम विकास संभव है, मुक्ति संभव है। मुक्ति दया का दान नहीं है, यह प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसके लिए ईश्वर या परमशक्ति की सत्ता में विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

धर्म एवं दर्शन की सामाजिक प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि धर्म से सदाचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म दिखावा नहीं, रूढ़ि नहीं, प्रदर्शन नहीं, किसी के प्रति घृणा नहीं, मानव और मानव के बीच भेदभाव नहीं, अपितु मानव में मानवीयता के गुणों की विकास-शक्ति है, सार्वभौम चेतना का सत्-संकल्प है।

इस प्रकार जैन परंपरा में लोक और ईश्वर की अवधारणाएँ भारतीय दर्शन-जगत् में एक अद्वितीय स्थान रखती हैं। जहाँ अधिकांश सृष्टिवादी दर्शन एक सृष्टिकर्ता ईश्वर की परिकल्पना करते हैं, वहीं जैन दर्शन लोक को अनादि, अनंत तथा स्वसंचालित छह द्रव्यों का समुच्चय मानते हुए किसी बाह्य नियंता की आवश्यकता को नकारता है। इसके साथ ही, ईश्वरत्व को किसी एक सृष्टिकर्ता तक सीमित न रखकर, जैन दर्शन इसे प्रत्येक आत्मा की अंतर्निहित संभावना के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे कर्मबंधन के पूर्ण क्षय द्वारा कोई भी जीव प्राप्त कर सकता है। यही दृष्टिकोण जैन धर्म को कर्म-सिद्धांत, आत्म-पुरुषार्थ और नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित एक विशिष्ट आशावादी तथा तार्किक जीवन-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

जैन परंपरा में लोक और ईश्वर से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: जैन दर्शन के अनुसार ‘लोक’ क्या है?

जैन दर्शन के अनुसार लोक अनादि, अनंत और शाश्वत है। इसकी रचना किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर ने नहीं की है, बल्कि यह स्वयं-संचालित तथा स्वतः अस्तित्वमान है।

प्रश्न 2: जैन दर्शन में लोक किन द्रव्यों से बना है?

लोक छह द्रव्यों से बना है- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। ये सभी द्रव्य अनादि, अनंत और स्वतः सत् हैं।

प्रश्न 3: क्या जैन धर्म सृष्टिकर्ता ईश्वर को मानता है?

नहीं। जैन धर्म ऐसे ईश्वर को स्वीकार नहीं करता जो सृष्टि की रचना, पालन या विनाश करता हो। संसार अपने स्वाभाविक कार्य-कारण नियमों के अनुसार संचालित होता है।

प्रश्न 4: जैन धर्म में ईश्वर किसे कहा जाता है?

जो जीव कर्मबंधन से पूर्णतः मुक्त होकर अनंत ज्ञान और दर्शन प्राप्त करता है, उसे सिद्ध या परमात्मा कहा जाता है। ऐसी मुक्त आत्मा ही जैन परंपरा में ईश्वरत्व का स्वरूप है, और वह सिद्धशिला में निवास करती है।

प्रश्न 5: जैन धर्म में ईश्वर की अवधारणा की प्रमुख विशेषता क्या है?

जैन धर्म में एक सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा के बजाय अनंत मुक्त आत्माओं को परमात्मा माना जाता है। तीर्थंकर भी अपने पुरुषार्थ से कर्मों का क्षय कर परम पद प्राप्त करनेवाली महान आत्माएँ हैं, न कि जन्मजात ईश्वरीय सत्ताएँ।

प्रश्न 6: क्या जैन और बौद्ध धर्म वास्तव में ‘नास्तिक’ दर्शन हैं?

पाणिनि की परिभाषा (‘जो परलोक और कर्मफल को मानता है, वह आस्तिक है’) के अनुसार जैन और बौद्ध दोनों आस्तिक दर्शन सिद्ध होते हैं, क्योंकि दोनों परलोक, पुनर्जन्म और कर्म-सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। इन्हें केवल इसलिए नास्तिक कहा जाता है क्योंकि ये वेद-प्रामाण्य और सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं मानते; अधिक सटीक शब्द ‘अनीश्वरवादी’ है।

प्रश्न 7: तीर्थंकर और सिद्ध में क्या अंतर है?

तीर्थंकर वे विशिष्ट मुक्त आत्माएँ हैं जो तीर्थ (धर्म-संघ) की स्थापना करती हैं और अपने उपदेशों से जन-कल्याण करती हैं, जैसे ऋषभदेव और महावीर। सिद्ध सामान्य रूप से वे सभी मुक्त आत्माएँ हैं जिन्होंने कर्मबंधन का पूर्ण क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया है। सभी तीर्थंकर अंततः सिद्ध बनते हैं, किंतु सभी सिद्ध तीर्थंकर नहीं होते।

प्रश्न 8: जैन धर्म में लोक के कितने भाग हैं और उनमें कौन निवास करता है?

जैन दर्शन में लोक को तीन भागों में बाँटा गया है- अधोलोक (जहाँ नारकी जीव रहते हैं), मध्यलोक (जहाँ मनुष्य और तिर्यंच रहते हैं) तथा ऊर्ध्वलोक (जहाँ वैमानिक देव रहते हैं और शिखर पर सिद्धशिला स्थित है, जहाँ मुक्त आत्माएँ निवास करती हैं)।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks