रायपुर की कलचुररियों की लहुरी शाखा का इतिहास छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। जिस प्रकार प्रशासनिक उद्देश्यों से त्रिपुरी की एक शाखा तुम्माण में स्थापित की गई थी, उसी प्रकार तुम्माण की एक शाखा खल्लारी में स्थापित की गई, जिसकी राजधानी रायपुर बनी।
पृष्ठभूमि
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरि राजवंश का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कलचुरियों की सबसे प्राचीन शाखा महिष्मती में शासन करती थी, जिसकी स्थापना कृष्णराज कृष्णराज (550-575 ई.) ने की थी। बाद में, कलचुरियों ने कालिंजर, त्रिपुरी और उत्तर प्रदेश के सरयूपार क्षेत्रों में गोंडा, बहराइच, बस्ती, संतकबीरनगर, गोरखपुर, देवरिया और कुशीनगर के क्षेत्रों पर शासन किया। कलचुरियों की त्रिपुरी शाखा सबसे शक्तिशाली थी, जिसके संस्थापक कोकल्ल प्रथम (845-890 ई.) माने जाते हैं।
छत्तीसगढ़ में कलचुरियों के शासन की नींव कोकल्ल प्रथम (845-890 ई.) के पुत्र शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’ (890-910 ई.) के शासनकाल में पड़ी, जब प्रसिद्धधवल ‘मुग्धतुंग’ ने पाली के क्षेत्रों को जीतकर अपने भाई को तुम्माण का मंडलाधिपति नियुक्त किया।
लेकिन छत्तीसगढ़ में कलचुरियों की वास्तविक सत्ता का संस्थापक त्रिपुरी के कलचुरी शासक कोकल्ल द्वितीय (990-1015 ई.) का पुत्र कलिंगराज था, जिसने 995 ई. में सोमवंशी शासकों को पराजित कर तुम्माण को अपनी राजधानी बनाया। बाद में, तुम्माण के कलचुरी रतनपुर को राजधानी बनाकर शासन करने लगे, जिसके कारण उन्हें ‘रतनपुर के कलचुरी’ कहा जाता है।
14वीं शताब्दी में रतनपुर की कलचुरी शाखा का विभाजन हो गया, जिसके परिणामस्वरूप रायपुर की कलचुरी शाखा की स्थापना हुई, जो इतिहास में रायपुर की (लहुरी) शाखा के नाम से प्रसिद्ध है।
इस प्रकार छत्तीसगढ़ में कलचुरियों की दो शाखाएं थीं- एक रतनपुर शाखा और दूसरी रायपुर की लहुरी शाखा।
छत्तीसगढ़ पर कलचुरियों ने लगभग नौ सदियों तक (1000-1741 ई.) शासन किया। 18वीं के मध्य में मराठा आक्रमण के कारण हैहयवंशी कलचुरियों का अंत हो गया।
रायपुर की कलचुरी (लहुरी) शाखा
14वीं शताब्दी के अंतिम चरण में रतनपुर की कलचुरी शाखा के विभाजन के परिणामस्वरूप रायपुर (लहुरी) शाखा का उदय हुआ। यह विभाजन संभवतः लक्ष्मीदेव के बाद उनके पुत्र सिंहण के शासनकाल में हुआ।
एक कलचुरी शिलालेख से पता चलता है कि 14वीं शताब्दी ईस्वी के अंतिम चरण में रतनपुर के राजा ने अपने एक संबंधी लक्ष्मीदेव को प्रतिनिधि के रूप में खल्लारी (खल्लवाटिका) भेजा, जो वहीं जाकर बस गया। लक्ष्मीदेव के पुत्र सिंहण ने शत्रुओं के 18 गढ़ जीत लिये और रतनपुर नरेश की प्रभुसत्ता मानने से इनकार कर दिया। संभवतः सिंघण के बाद ही रायपुर की कलुचरी शाखा की स्थापना हुई।
रायपुर शाखा के कलचुरियों की जानकारी मुख्य रूप से ब्रह्मदेव के रायपुर और खल्लारी शिलालेखों से होती है। विक्रम संवत् 1458 (1401 ई.) का रायपुर शिलालेख हाटकेश्वर मंदिर से मिला है, जबकि विक्रम संवत 1470 (1413 ई.) का खल्लारी शिलालेख नारायण मंदिर से प्राप्त हुआ है।
ब्रह्मदेव के शिलालेखों से रायपुर के चार कलचुरी राजाओं की वंशावली ज्ञात होती है- लक्ष्मीदेव, सिंघण, रामचंद्र और ब्रह्मदेव। इनमें से लक्ष्मीदेव और सिंघण के नाम रतनपुर की वंशावली में भी मिलते हैं, जो वहाँ के राजा बाहरेंद्र के पूर्वज थे। इससे पता चलता है कि राजा सिंघण के डंधीर और रामचंद्र नामक दो पुत्रों में से बडे़ पुत्र डंधीर को रतनपुर की सत्ता और छोटे रामचंद्र को रायपुर की सत्ता सौंपी गई।
रायपुर के आरंभिक कलचुरी शासक
लक्ष्मीदेव (1300-1340 ई.)
रायपुर कलचुरी राजवंश के प्रथम शासक के रूप में लक्ष्मीदेव का नाम मिलता है। एक कलचुरी शिलालेख के अनुसार 14वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में रतनपुर के राजा के एक संबंधी लक्ष्मीदेव प्रतिनिधि के रूप में खल्लारी (रायपुर) भेजे गये थे। उन्होंने खल्लारी (खल्लवाटिका) को केंद्र बनाकर रायपुर की कलचुरी शाखा की नींव डाली। यही कारण है कि लक्ष्मीदेव को रायपुर के हैहयवशी राजवंश का संस्थापक बताया जाता है।
सिंघणदेव (1380-1400 ई.)
रायपुर के कलचुरी शासकों में सिंघणदेव (1380-1400 ई.) का उल्लेख मिलता है, जो लक्ष्मीदेव का पुत्र था। उसने शत्रओं के 18 गढों को़ जीत लिये और मतभेद होने के कारण रतनपुर की अधीनता मानने से इनकार कर दिया। सिंहण के समय में रतनपुर की कलचुरी शाखा विभाजित हो गई और कलचुरियों की रायपुर की लहुरी शाखा का उदय हुआ। इस विभाजन का कारण संभवतः उत्तराधिकार विवाद या प्रशासनिक असुविधा थी।
सिंघणदेव के बाद उसके पुत्र रामचंद्र रतनपुर के सिंहासन पर बैठे। इस प्रकार रायपुर में कलचुरी राजवंश के प्रथम शासक के रूप में रामचंद्र ने सत्ता स्थापित की।
रामचंद्रदेव (1380-1400 ई.)
रामचंद्रदेव रायपुर (लहुरी) की कलचुरी शाखा के एक महत्त्वपूर्ण शासक थे, जो सिंघण के छोटे पुत्र थे। रामचंद्रदेव को रायपुर शिलालेख में ‘रामचंद्र’ और खल्लारी शिलालेख में ‘रामदेव’ कहा गया है।
ब्रह्मदेव के खल्लारी लेख के अनुसार रामचंद्र ने फणी (नाग) वंश के राजा भोणिगदेव को पराजित किया था। रामचंद्र के समय में छत्तीसगढ़ में कवर्धा और बस्तर में दो अलग-अलग नागवंशी राजाओं का राज्य था, किंतु भोणिगदेव किस वंश से थे, यह स्पष्ट नही है।
रामचंद्रदेव ने अपने पुत्र ब्रह्मदेव ‘राय’ के नाम पर रायपुर नगर बसाया और उसे एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया। चूंकि बाहरेंद्र के पूर्ववती रतनपुर के कलचुरी शासकों की सूची में रामचंद्र का भी नाम मिलता है, जिससे लगता है कि रामचंद्र (1380-1400 ई.) के समय तक तक रतनपुर राज्य का औपचारिक विभाजन नहीं हुआ था।
ब्रह्मदेवराय (1400-1420 ई.)
रायपुर शाखा के हैहयवंशी शासक रामचंद्र के बाद उनके पुत्र ब्रह्मदेव (1400-1420 ई.) रायपुर की गद्दी पर बैठे, जिन्हें ‘राय’ की उपाधि प्राप्त थी। ब्रह्मदेव के दो शिलालेख रायपुर और खल्लारी से प्राप्त हुए हैं।
खल्लारी लेख के अनुसार ब्रह्मदेव ने संभवतः 1409 ई. में राजधानी को खल्लारी से रायपुर स्थानांतरित किया, जहाँ 1415 ई. में देवपाल नामक एक मोची ने नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसमें नारायण की मूर्ति स्थापित है। एक मोची द्वारा नारायण मंदिर का निर्माण करवाया जाना छत्तीसगढ़ में सामाजिक समरसता का परिचायक है।
ब्रह्मदेव के रायपुर शिलालेख से पता चलता है कि 1402 ई. में नायक हाजिराज ने रायपुर में खारून नदी के महादेव घाट पर हाटकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था। शिलालेख में ब्रह्मदेव के प्रधान ठाकुर का नाम त्रिपुरारिदेव और पुरोहित का नाम महादेव मिलता है। इसी महादेव के नाम पर ही खारून नदी के घाट का नाम महादेव घाट रखा गया था।
रायपुर (लहुरी) शाखा के कलचुरी शासक
ब्रह्मदेव के पश्चात् रायपुर के कलचुरियों से संबंधित अधिकृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्थानीय परंपरा के अनुसार रायपुर शाखा के संस्थापक केशवदेव थे, जो कलचुरियों की अनुश्रुतिगम्य वंशावती के उल्लेखित सैंतीसवें राजा वीरसिंह के छोटे भाई थे। चूंकि ऐतिहासिक साक्ष्यों से ब्रह्मदेव नामक राजा की जानकारी उपलब्ध है। इसलिए् केशवदेव का काल 1420 ई. माना जा सकता है।
केशवदेव (1420-1438 ई.) और अंतिम राजा अमरसिंहदेव (1741-1753 ई.) के मध्य निम्नलिखित राजाओं की सूची मिलती है-
भुवनेश्वरदेव (1438-1463 ई.)
मानसिंहदेव (1463-1478 ई.)
संतोषसिंहदेव (1478-1498 ई.)
सूरतसिंहदेव (1498-1518 ई.)
सम्मानसिंहदेव (1518-1528 ई.)
चामुंडसिंहदेव (1528-1563 ई.)
वंशीसिंहदेव (1563-1582 ई.)
धनसिंहदेव (1582-1604 ई.)
जैतसिंहदेव (1604-1615 ई.)
फत्तेसिंहदेव (1615-1636 ई.)
यादसिंहदेव (1636-1650 ई.)
सोमदत्तसिंहदेव (1650-1663 ई.)
बलदेवसिंहदेव (1663-1685 ई.)
उम्मेदसिंहदेव या मेरसिंहदेव (1685-1705 ई.)
बनबीरसिंहदेव या बरियारसिंहदेव (1705-1741 ई.)
गजेटियर में सूरतसिंहदेव का नाम छोड़ दिया गया है। बाबू रेवाराम ने उनका नाम सम्मानसिंहदेव लिखा है। अतः बाबू रेवाराम द्वारा दी गई सूचना अधिक प्रामाणिक लगती है।
केशवदेव (1420-1438 ई.)
रायपुर की कलचुरी शाखा का संस्थापक केशवदेव (1420-1438 ई.) को माना जाता है। इसके अलावा, केशवदेव के शासनकाल की किसी उल्लेखनीय घटना का विवरण नही मिलता है।
भुवनेश्वरदेव (1438-1463 ई.)
केशवदेव के पुत्र और उत्तराधिकारी भुवनेश्वरदेव (1438-1463 ई.) का शासनकाल कुछ घटनाओं के कारण महत्त्वपूर्ण है। भुवनेश्वरदेव ने 1460 ई. में रायपुर किले का निर्माण करवाया, जिसे बुढ़ा तालाब के किले के नाम से जाना जाता है। इसके लिए रतनपुर के कलचुरी शासक शंकरसहाय ने भी आर्थिक सहायता दी थी।
भुवनेश्वरदेव के शासनकाल में नंदपुर (जयपुर, कोरापुर) के राजा विनायकदेव के राज्य में विद्रोह हो गया। उन्होंने विद्रोहियों के दमन में सहयोग के लिए रायपुर जाकर भुवनेश्वरदेव से सैन्य सहायता माँगी। भुवनेश्वर ने शस्त्र और सेना देकर विनायकदेव की सहायता की। जयपुर की एक राजकुमारी रतनपुर के राजा शंकरसहाय से ब्याही गई थी। इस रिश्तेदारी के कारण भी भुवनेश्वरदेव को विनायकदेव की सहायता करनी ही थी।
भुवनेश्वरदेव (1438-1463 ई.) के बाद से सोमदत्तसिंहदेव तक शासकों के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है। सोमदत्तसिंहदेव (1650-1663 ई.) के समय दूधाधारी महाराज तुरतुरिया तपस्थली से रायपुर आये। उन्होंने दूधाधारी महाराज को महाराजबंद के पास निवास के लिए स्थान दिया।
बलदेवसिंहदेव (1663-1685 ई.)
बलदेवसिंहदेव (1663-1685 ई.) ने बाबू रेवाराम के अनुसार ‘नया रायपुर‘ बसाया, जिसका आशय संभवतः ‘नयापारा‘ से है।
उम्मेदसिंहदेव अथवा मेरसिंहदेव (1685-1705 ई.)
गजेटियर में बलदेवसिंहदेव के पुत्र का नाम उम्मेदसिंहदेव (1685-1705 ई.) मिलता है, जबकि बाबू रेवाराम ने उनका नाम मेरसिंह दिया है। रतनपुर के शासक तखतसिंह ने 1689 ई. में रायपुर शाखा के राजा अपने छोटे भाई को ‘मेरसिंहदेव’ ही संबोधित किया है, उम्मेदसिंह नहीं। संभवतः उम्मेदसिंहदेव का मूल नाम मेरसिंह था।
संभवतः बलदेवसिंहदेव का कोई पुत्र नही था, इसलिए परांपरानुसार रतनपुर के कलचुरी शासक रणजीतसिंहदेव के समय तखतसिंह के छोटे भाई मेरसिंह को 1685 ई. के लगभग रायपुर की गद्दी पर बैठाया गया था। उम्मेदसिंहदेव ने ‘रजबंधा तालाब‘ का निर्माण करवाया था।
बनबीरसिंहदेव अथवा बरियारसिंहदेव (1705-1741 ई.)
उम्मेदसिंह (मेरसिंहदेव) के बाद उनके पुत्र बरियारसिंहदेव (1705-1741 ई.) रायपुर की गद्दी पर बैठे। गजेटियर में उम्मेदसिंह के पुत्र का नाम बनबीरसिंहदेव मिलता है। बरियारसिंहदेव ने राजा तालाब का निर्माण करवाया। उनके दीवान रामचंद्र कोका ने पुरानी बस्ती में एक तालाब का निर्माण करवाया, जो आजकल ‘खो-खो तालाब‘ के नाम से प्रसिद्ध है।
अमरसिंहदेव (1741-1753 ई.)
बरियारसिंहदेव के पश्चात् उनके पुत्र अमरसिंहदेव (1741-1753 ई.) रायपुर की कलचुरी शाखा के राजा हुए। लेकिन अमरसिंहदेव का एक ताम्रपत्र विक्रम संवत् 1792 (1735 ई.) का आरंग से प्राप्त हुआ है, जिससे स्पष्ट होता है कि वह 1735 ई. के आसपास राजा हुए थे। आरंग ताम्रपत्र के अनुसार राजा अमरसिंह ने नंदू ठाकुर और घासीराय को छींटा (सामान्य विवाह) बूंदा (विधवा विवाह, पुर्नविवाह), गयारि (परित्यक्ता स्त्री से विवाह) और मई मुआरि (परिवार में मृत व्यक्ति की संपत्ति) पर कर की छूट प्रदान की थी। इस प्रकार यह ताम्रपत्र छत्तीसगढ़ के तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
अमरसिंहदेव स्वयं अच्छे कवि थे और विद्धानों के आश्रयदाता भी थे। रतनपुर के महाकवि गोपाल मिश्र के पुत्र पिंगलाचार्य कवि माखन अमरसिंहदेव के राज्याश्रित कवि थे। कवि माखन ने छंदशास्त्र पर छंदविलास नामक ग्रंथ लिखा, जिन्हें डॉ. नगेन्द्र ने हिंदी के रीतिकाल के छह आचार्य कवियों में प्रमुख स्थान दिया है।
अमरसिंह रायपुर शाखा के अंतिम स्वतंत्र कलचुरी शासक थे। 1741 ई. में भोंसलों द्वारा छत्तीसगढ़ आक्रमण के समय रायपुर बचा रहा, लेकिन मराठो ने बिना किसी विरोध के 1750 ई. में अमरसिंहदेव को राज्यच्युत कर दिया और रायपुर की गद्दी छीन ली। अमरसिंह को 7000 रुपये वार्षिक टकोली (कर) पर रायपुर, राजिम व पाटन के परगने दे दिये गये।
शिवराजसिंहदेव (1753-1757 ई.)
अमरसिंह की मृत्यु (1753 ई.) के बाद उनके पुत्र शिवराजसिंहदेव (1753-1757 ई.) उत्तराधिकारी बने, किंतु भोंसलों ने उत्तराधिकार में प्राप्त उसकी जागीर छीन ली। 1757 ई. में बिंबाजी ने छत्तीसगढ़ में अपना प्रत्यक्ष शासन स्थापित किया, शिवराजसिंह को जीवन-यापन के लिए महासमुंद तहसील के अंतर्गत बड़गाँव सहित चार अन्य करमुक्त ग्राम दिये, साथ ही उन्हें रायपुर परगने के प्रत्येक गाँव से एक-एक रुपया कर (टिकोली) वसूल करने का अधिकार भी दिया। बाद में, 1822 ई. में मराठों ने शिवराजसिंह से बड़गाँव भी छीन लिया और इस प्रकार छत्तीसगढ़ के इतिहास से हैकयवंशी कलचुरियों की रही सही सत्ता भी समाप्त हो गई।