गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ
प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी वन में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रमुख थे और माता महामाया थीं। जन्म के सात दिन बाद माता का निधन हो गया और उनका लालन-पालन मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। राजमहल के वैभव में पले-बढ़े सिद्धार्थ ने जब पहली बार वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के दृश्य देखे, तो उनका मन संसार की असारता से भर गया। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल का मोह त्यागकर गृहत्याग किया, जिसे बौद्ध परंपरा में “महाभिनिष्क्रमण” कहा जाता है।
गृहत्याग के पश्चात् सिद्धार्थ ने पहले आलार कालाम और फिर उद्दक रामपुत्त जैसे तत्कालीन प्रसिद्ध गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की, किंतु उनसे संतुष्ट न होकर उन्होंने स्वयं सत्य की खोज का निश्चय किया। वे गया के निकट उरुवेला वन में पहुँचे और वहाँ पाँच साथियों के साथ अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। लगभग छह वर्षों की घोर तपस्या के बाद भी जब उन्हें सत्य का बोध नहीं हुआ, तो उन्होंने अनुभव किया कि अति-कठोर तपस्या भी उतनी ही व्यर्थ है जितना अति-भोग। इसी अनुभव से उन्होंने “मध्यम मार्ग” की संकल्पना को आत्मसात किया। अंततः बोधगया में पीपल वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा को उन्हें संबोधि (सम्यक् ज्ञान) की प्राप्ति हुई और वे “बुद्ध” अर्थात् जागृत या प्रबुद्ध कहलाए।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध ने सारनाथ (ऋषिपत्तन/मृगदाव) में अपने उन पाँच पूर्व-साथी भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया, जिसे बौद्ध परंपरा में “धर्मचक्रप्रवर्तन” कहा जाता है। यह घटना बौद्ध इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से बौद्ध धर्म के त्रिरत्न- बुद्ध, धम्म और संघ की स्थापना हुई। इसके पश्चात् 45 वर्षों तक बुद्ध ने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विचरण करते हुए अपनी शिक्षाओं का प्रचार किया। 80 वर्ष की आयु में 483 ई.पू. में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य यह है कि बुद्ध ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा और न ही अपने शिष्यों को अपने उपदेश किसी विशेष प्रमाणभूत भाषा में स्मरण रखने के लिए कहा। उन्होंने तत्कालीन प्रचलित मागधी भाषा में उपदेश दिए और भिक्षुओं को यह स्वतंत्रता दी कि वे अपनी-अपनी बोलियों में उन्हें स्मरण रखें। उनके महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद पहली बौद्ध संगीति 483 ई.पू. में राजगृह में हुई, जहाँ उनके उपदेशों को संकलित किया गया। बुद्ध की शिक्षाओं का प्रामाणिक ज्ञान मुख्यतः “पालि त्रिपिटक” से प्राप्त होता है, जिसमें सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक सम्मिलित हैं।
चार आर्य सत्य
बुद्ध ने सारनाथ में धर्मचक्र प्रवर्तित करते हुए चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया। ये चार सत्य हैं- दुःख, दुःख-समुदय, दुःख-निरोध और दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा। ये समस्त बौद्ध दर्शन और शिक्षाओं के मूल आधार हैं और बुद्ध ने इन्हीं के आधार पर अपना पूरा धर्म-दर्शन खड़ा किया।
दुःख सत्य
बुद्ध के अनुसार जीवन दुःखों से परिपूर्ण है। सभी वस्तुएँ जो उत्पन्न हुई हैं, वे दुःख, अनित्य और अनात्म-रूप हैं। जन्म दुःख है, जरा (वृद्धावस्था) दुःख है, व्याधि दुःख है, मरण दुःख है। प्रिय व्यक्ति और वस्तु से वियोग दुःख है, अप्रिय से मिलन दुःख है और जो इच्छा है उसकी पूर्ति न होना भी दुःख है। संक्षेप में, संसार की सभी वस्तुएँ दुःखमय हैं- “सब्बं दुखं।”
यह प्रथम आर्य सत्य कोई निराशावादी दृष्टिकोण नहीं है, अपितु यह जीवन की वास्तविकता का एक तटस्थ, सत्यपरक निरीक्षण है। बुद्ध का उद्देश्य मनुष्य को इस वास्तविकता से अवगत कराना था ताकि वह उसके कारण खोज सके और उससे मुक्ति का मार्ग अपना सके। दुःख को स्वीकार करना ही उससे मुक्ति की पहली शर्त है।
दुःख-समुदय सत्य
बुद्ध के अनुसार प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, इसलिए दुःख का भी कारण है। प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम के अनुसार दुःख की उत्पत्ति का एक नहीं, बल्कि कारणों की एक लंबी शृंखला है। इस शृंखला में जरा-मरण से लेकर अविद्या तक बारह कड़ियाँ हैं और इन सबका मूल कारण अविद्या (अज्ञान) है। तृष्णा इस शृंखला की सबसे प्रबल कड़ी है- भोग की तृष्णा, अस्तित्व की तृष्णा और नाश की तृष्णा।
मनुष्य अज्ञानवश यह नहीं समझ पाता कि जिन वस्तुओं और संबंधों से वह सुख पाना चाहता है, वे सभी अनित्य हैं। इस अनित्य से आसक्ति और तृष्णा ही दुःख का मूल स्रोत बन जाती है। जब तक अविद्या और तृष्णा का नाश नहीं होता, तब तक दुःख का चक्र चलता रहता है और मनुष्य जन्म-मरण के बंधन में बँधा रहता है।
दुःख-निरोध सत्य
तृतीय आर्य सत्य यह है कि दुःखों का निरोध संभव है। बुद्ध का दर्शन यहाँ अत्यंत आशावादी हो जाता है। उनके अनुसार कारण की सत्ता पर ही कार्य की सत्ता अवलंबित होती है। यदि कारण-परंपरा का निरोध कर दिया जाए तो कार्य का निरोध स्वतः हो जाएगा। दुःखों का मूल कारण अविद्या है, इसलिए विद्या (सम्यक् ज्ञान) द्वारा अविद्या का उच्छेद करने पर दुःख का निरोध हो जाता है। इसी अवस्था को “निर्वाण” कहा गया है।
निर्वाण का शाब्दिक अर्थ है “बुझ जाना” अर्थात् तृष्णा और अज्ञान की अग्नि का बुझ जाना। यह जीवन का विनाश नहीं, दुःखों का विनाश है। बुद्ध के अनुसार निर्वाण इसी जीवनकाल में प्राप्त हो सकता है और यही जीवन का चरम लक्ष्य है। बुद्ध ने स्वयं इसे “वर्णनातीत अवस्था” कहा, जो शब्दों से परे है।
दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख-निरोध का मार्ग)
चतुर्थ आर्य सत्य वह व्यावहारिक मार्ग है जिसके माध्यम से दुःख के कारणों को नष्ट किया जा सकता है। बुद्ध ने इस मार्ग को “आर्य अष्टांगिक मार्ग” का नाम दिया। जिस प्रकार गंगा, यमुना, अचिरवती, सरयू और मही नदियाँ पूर्व की ओर बहती हुई अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार आर्य अष्टांगिक मार्ग का अभ्यास करने वाला साधक अंततः निर्वाण को प्राप्त करता है।
आर्य अष्टांगिक मार्ग
आर्य अष्टांगिक मार्ग बुद्ध के उपदेशों का व्यावहारिक पक्ष है। इसमें आठ अंग हैं जो मनुष्य को नैतिक आचरण, मानसिक अनुशासन और प्रज्ञा की ओर ले जाते हैं। इन्हें तीन भागों- शील, समाधि और प्रज्ञा में वर्गीकृत किया जा सकता है।
सम्यक् दृष्टि का अर्थ है वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को जानना। इसका आशय यह है कि मनुष्य को चार आर्य सत्यों को सही रूप से समझना चाहिए और संसार को वैसा देखना चाहिए जैसा वह वास्तव में है- अनित्य, दुःखमय और अनात्म। यह सम्यक् दृष्टि ही समस्त साधना का प्रारंभ बिंदु है।
सम्यक् संकल्प का आशय है आसक्ति, द्वेष और हिंसा से मुक्त विचार रखना। मनुष्य के मन में जो संकल्प उठते हैं वे यदि भोग, क्रोध और हिंसा से युक्त हों तो वे दुःख का कारण बनते हैं। इसलिए त्याग, मैत्री और अहिंसा के संकल्प ही सम्यक् हैं।
सम्यक् वाक् का अर्थ है सदा सत्य और मृदु वाणी का प्रयोग करना। मिथ्या भाषण, कठोर वाणी, चुगली और व्यर्थ बातों से बचना सम्यक् वाक् का सार है। वाणी में सत्यता, मधुरता और उद्देश्यपूर्णता होनी चाहिए।
सम्यक् कर्मांत का आशय अच्छे कर्मों में संलग्न होने और बुरे कर्मों का परित्याग करने से है। इसके अंतर्गत अहिंसा, चोरी न करना और इंद्रिय-संयम का पालन करना आता है। व्यक्ति के शारीरिक कार्य नैतिकता के अनुकूल होने चाहिए।
सम्यक् आजीव का अर्थ है विशुद्ध सदाचार से जीवन-यापन करना। अपनी आजीविका के लिए ऐसे साधन नहीं अपनाने चाहिए जो किसी को कष्ट पहुँचाएँ या जो अनैतिक हों। हथियार, मांस, मदिरा, विष और पशुओं का व्यापार सम्यक् आजीव के विरुद्ध माना गया है।
सम्यक् व्यायाम का अर्थ है अकुशल धर्मों (बुरी प्रवृत्तियों) का त्याग और कुशल धर्मों (अच्छी प्रवृत्तियों) का अनुसरण। इसमें चार प्रयास सम्मिलित हैं- उत्पन्न बुराइयों को दूर करना, नई बुराइयों को उत्पन्न न होने देना, अच्छाइयों को विकसित करना और उत्पन्न अच्छाइयों को बनाए रखना।
सम्यक् स्मृति का अर्थ है वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप के संबंध में सदैव जागरूक रहना। इसमें शरीर, भावनाओं, मन और धर्म-तत्त्वों के प्रति सतत सचेत रहना आवश्यक है। यह जागरूकता साधक को वर्तमान क्षण में रखती है और मोह-जाल से बचाती है।
सम्यक् समाधि का अर्थ है चित्त की समुचित एकाग्रता। इसमें चार ध्यान-अवस्थाएँ (झान) क्रमशः प्राप्त की जाती हैं। सम्यक् समाधि से प्रज्ञा का उदय होता है और अंततः निर्वाण की प्राप्ति होती है। यह अष्टांगिक मार्ग का अंतिम और सर्वोच्च अंग है।
शील, समाधि और प्रज्ञा
प्राचीन बौद्ध साहित्य में अष्टांगिक मार्ग को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है- शील, समाधि और प्रज्ञा। ये तीनों मिलकर एक संपूर्ण आध्यात्मिक साधना का निर्माण करते हैं।
शील का अर्थ है सम्यक् आचरण। इसके अंतर्गत सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मांत और सम्यक् आजीव आते हैं। शील व्यक्ति के बाह्य आचरण को नैतिकता की दिशा में प्रशिक्षित करता है और समाज में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए आधार तैयार करता है।
समाधि का अर्थ है सम्यक् ध्यान। इसके अंतर्गत सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि आते हैं। समाधि के माध्यम से मन को एकाग्र और अनुशासित बनाया जाता है, जो प्रज्ञा के उदय के लिए अनिवार्य शर्त है।
प्रज्ञा का अर्थ है सम्यक् ज्ञान। इसके अंतर्गत सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प आते हैं। प्रज्ञा के माध्यम से मनुष्य अनित्यता, दुःख और अनात्म के सत्य को सीधे अनुभव करता है और अविद्या का नाश होकर निर्वाण का द्वार खुलता है।
मध्यम मार्ग
बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर दिया। राजकुमार के रूप में उन्होंने जीवन के समस्त भोग-विलास भोगे और संन्यासी बनने के बाद उन्होंने अत्यंत कठोर तपस्या की। दोनों अनुभवों से उन्होंने अनुभव किया कि न अति-भोग और न अति-तपस्या, कोई भी सत्य तक नहीं पहुँचा सकती।
मध्यम मार्ग का सिद्धांत यह बताता है कि भोग-विलास में लिप्त रहने से मन मलिन होता है और घोर तपस्या से शरीर और मन दोनों दुर्बल हो जाते हैं। सत्य की खोज के लिए संतुलित जीवन आवश्यक है- न बहुत ढीली और न बहुत कसी हुई वीणा की तार, तभी सुर निकलता है। बुद्ध ने यही सादृश्य अपने शिष्यों को समझाते हुए मध्यम मार्ग का महत्त्व बताया।
मध्यम मार्ग केवल जीवनशैली तक सीमित नहीं है, यह दार्शनिक स्तर पर भी दो अतिवादी विचारधाराओं- शाश्वतवाद (सब कुछ सदा रहता है) और उच्छेदवाद (मृत्यु के साथ सब समाप्त हो जाता है) का मध्यम मार्ग है। बुद्ध का मत इन दोनों अतिवादों से परे है।
निरीश्वरवाद
बौद्ध धर्म मूलतः निरीश्वरवादी है। बुद्ध के अनुसार विश्व “प्रतीत्यसमुत्पाद” के नियमों से संचालित होता है और इसके संचालन के लिए ईश्वर नामक किसी बाह्य सत्ता की आवश्यकता नहीं है। जगत् उत्पत्ति और विनाश के प्राकृतिक नियमों में आबद्ध है। इसीलिए उन्होंने भिक्षुओं को “अप्पदीपो भव” (अपना प्रकाश स्वयं बनो) का उपदेश दिया।
बुद्ध का कहना था कि निर्वाण प्राप्त करना व्यक्ति का स्वयं का उत्तरदायित्व है। कोई बाह्य शक्ति, ईश्वर या देवता उसे मोक्ष नहीं दिला सकते। अपने सुख-दुःख के लिए प्राणी स्वयं उत्तरदायी है। उन्होंने सदाचार और नैतिक जीवन पर अत्यधिक बल दिया और इसके आधार पर दशों नैतिक नियम- दश शील प्रतिपादित किए।
दश शील इस प्रकार हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह, व्यभिचार न करना, मद्य-सेवन न करना, असमय भोजन न करना, सुखप्रद बिस्तर पर न सोना, धन-संचय न करना और स्त्रियों से संसर्ग न करना। ये दश शील मुख्यतः भिक्षुओं के लिए थे, जबकि गृहस्थों के लिए पंचशील का विधान था।
प्रतीत्यसमुत्पाद
प्रतीत्यसमुत्पाद बुद्ध के समस्त उपदेशों का सार है और बौद्ध दर्शन की आधारशिला है। इसका अर्थ है- सापेक्ष कारणवाद, अर्थात् “किसी एक वस्तु की उपस्थिति में दूसरी वस्तु उत्पन्न होती है।” इस नियम को बुद्ध ने इस प्रकार व्यक्त किया- “इसके होने पर यह होता है; इसके उत्पाद से यह उत्पन्न होता है; इसके न होने पर यह नहीं होता; इसके विरोध से यह निरुद्ध होता है।”
प्रतीत्यसमुत्पाद का एक पारमार्थिक पक्ष है जो परमार्थ को सत् और असत् से परे बताता है, और एक व्यावहारिक पक्ष है जो संसार में कार्य-कारण-नियम का प्रतिपादन करता है। सापेक्षवादी दृष्टि से देखा जाए तो प्रतीत्यसमुत्पाद ही संसार (दुःख) है, और वास्तविकता की दृष्टि से यही निर्वाण (दुःख-निरोध) है। बुद्ध ने स्वयं इसे अत्यधिक महत्त्व दिया और कहा- “जो प्रतीत्यसमुत्पाद को देखता है, वह धर्म को देखता है।”
संसार की प्रत्येक वस्तु सापेक्ष होने के कारण न तो पूर्ण सत्य है और न पूर्ण असत्य। पूर्ण सत्य इसलिए नहीं कि यह जरा-मरण के अधीन है, और पूर्ण असत्य इसलिए नहीं कि इसका अस्तित्व दिखाई देता है। यही बुद्ध का दार्शनिक मध्यम मार्ग है जो शाश्वतवाद और उच्छेदवाद दोनों का निषेध करता है।
द्वादश निदान (भवचक्र)
प्रतीत्यसमुत्पाद के अंतर्गत जीवन-मरण के चक्र की व्याख्या द्वादश निदान के माध्यम से की गई है। इसे “भवचक्र” या “जीवन चक्र” भी कहा जाता है। इस कार्य-कारण-शृंखला की बारह कड़ियाँ इस प्रकार हैं- अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति और जरा-मरण।
इन बारह कारणों में से प्रथम दो पूर्व जन्म से संबंधित हैं, अंतिम दो भावी जीवन से संबंधित हैं और शेष आठ वर्तमान जीवन से संबंधित हैं। यह जीवन-मरण का चक्र मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता- मृत्यु तो एक नए जीवन के प्रारंभ का कारण मात्र बनती है। इस हेतु-चक्र का अंत करने के लिए अविद्या का अंत आवश्यक है और सम्यक् ज्ञान ही अविद्या का उच्छेद कर व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाने में समर्थ है।
कर्म और कर्मफल की परंपरा
बुद्ध के अनुसार कर्म और कर्मफल की एक अनादि और अविच्छिन्न परंपरा है। उन्होंने कर्म को “चेतना” कहा है। कर्म चूँकि चेतना है, इसलिए वह अपने फल को स्वयं अंगीकार कर लेता है- फल देने के लिए किसी ईश्वर या बाह्य शक्ति की आवश्यकता नहीं है। अपने सुख-दुःख के लिए प्राणी स्वयं ही उत्तरदायी है।
बुद्ध का यह कर्म-सिद्धांत मनुष्य को स्वावलंबन और आत्म-उत्तरदायित्व की शिक्षा देता है। उनके अनुसार अपने अज्ञान और मिथ्यादृष्टियों से मानव ने स्वयं ही अपने लिए दुःखों का निर्माण किया है, इसलिए कोई बाह्य शक्ति उसे मुक्त नहीं कर सकती। मुक्ति के लिए उसे स्वयं सम्यक् प्रयास करने होंगे। यह विचार बौद्ध धर्म को एक अत्यंत मानवीय और तर्कसंगत धर्म-दर्शन बनाता है।
अनित्यवाद (क्षणिकवाद)
बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार की समस्त वस्तुएँ अनित्य हैं, चाहे वे जड़ हों अथवा चेतन। प्रत्येक पदार्थ में लगातार परिवर्तन की एक प्रक्रिया चलती रहती है जिसमें एक अवस्था प्रतिक्षण नष्ट होती है और दूसरी अवस्था प्रतिक्षण निर्मित होती है। यही बुद्ध का अनित्यवाद या क्षणिकवाद है।
इस सिद्धांत की एक सुंदर व्याख्या दीपशिखा के माध्यम से दी गई है। दीपक की बाती के माध्यम से तेल की एक-एक बूँद ऊपर चढ़ती है और प्रत्येक बूँद का प्रज्वलन एक पृथक् लौ उत्पन्न करता है। इस प्रकार अनेक अनवरत लौ ही एक लौ के रूप में दिखाई देती है। जो लौ हम देखते हैं वह वस्तुतः एक ही लौ नहीं है, प्रतिक्षण एक लौ नष्ट होती है और दूसरी बनती है। उसी प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व भी प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है।
यद्यपि मानव किन्हीं दो क्षणों में एक जैसा नहीं बना रहता, तथापि वह पूर्णतः भिन्न भी नहीं हो जाता। यह मध्यमार्ग सृष्टि की प्रवाहमय स्थिरता की ओर संकेत करता है और सृष्टि के प्रति निर्लिप्त रहने का संदेश देता है। यह सिद्धांत शाश्वतवाद और उच्छेदवाद दोनों का खंडन करता है।
अनात्मवाद
बुद्ध अनात्मवादी हैं। वे आत्मा नामक किसी स्थायी और अपरिवर्तनशील तत्त्व में विश्वास नहीं करते। वे केवल क्षणिक संवेदनाओं और विचारों की सत्ता को स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार जिसे हम “आत्मा” या “मैं” कहते हैं, वह वास्तव में पाँच स्कंधों- रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान का एक अस्थायी संघात मात्र है।
बुद्ध ने इसे रथ के सादृश्य से समझाया — जिस प्रकार धुरी, पहिए, रस्सियों और अन्य भागों के संघात का नाम “रथ” है, उसी प्रकार पाँच स्कंधों के संघात के अतिरिक्त कोई अलग “आत्मा” नहीं है। ये पाँचों स्कंध सदैव परिवर्तनशील अर्थात् अनित्य हैं, इसलिए उनसे निर्मित आत्मा भी अनित्य है। बुद्ध ने कहा : “विश्व में न कोई आत्मा है और न आत्मा जैसी कोई अन्य वस्तु। शाश्वत आत्मा में विश्वास उसी प्रकार हास्यास्पद है जिस प्रकार काल्पनिक सुंदरी के प्रति अनुराग रखना।”
आत्मा की तरह भौतिक वस्तुएँ भी संघात ही हैं और उनके मूल में भी कोई एकता नहीं है। आत्मा और भूतद्रव्य दोनों जल की धारा या अग्नि की ज्वाला के समान निरंतर परिवर्तनशील हैं। यही बुद्ध का अनात्मवाद है जो उनके दर्शन को वैदिक और जैन परंपराओं से मौलिक रूप से अलग करता है।
पुनर्जन्म की व्याख्या
बुद्ध की विशेषता यह है कि उन्होंने नित्य-आत्मा का निषेध करते हुए भी पुनर्जन्म की व्याख्या की। यदि कर्ता के बिना कर्म हो सकता है, तो आत्मा के बिना पुनर्जन्म भी हो सकता है। बुद्ध के मतानुसार “पुनर्जन्म” का अर्थ है “विज्ञान-प्रवाह की अविच्छिन्नता।” जब एक विज्ञान-प्रवाह का अंतिम विज्ञान समाप्त होता है, तो एक नए शरीर में नए विज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
बुद्ध ने पुनर्जन्म की व्याख्या दीपक की लौ से की- एक दीपक की बुझती लौ से जब दूसरा दीपक जलाया जाता है, तो न तो वही पुरानी लौ दूसरे दीपक में जाती है और न ही दोनों लौ एक-दूसरे से सर्वथा अलग होती हैं। उसी प्रकार एक व्यक्ति के कर्म-संस्कार मृत्यु के पश्चात् एक नए व्यक्ति में संचारित हो जाते हैं। इस प्रकार “पुनर्जन्म किसी आत्मा का नहीं, चरित्र और संस्कारों का होता है।” पुनर्जन्म केवल मृत्यु के बाद नहीं, अपितु प्रतिक्षण होता रहता है।
निर्वाण
मानव जीवन का चरम लक्ष्य है- जरा-मरण के बंधन से मुक्ति, अर्थात् निर्वाण। “निर्वाण” का शाब्दिक अर्थ है “बुझ जाना” — तृष्णा, अज्ञान और अहंकार की अग्नि का बुझ जाना। सामान्यतः जन्म-मरण की परंपरा अविद्या, क्लेश और कर्म पर आश्रित है। विद्या से क्लेश क्षीण होता है और संसार-चक्र का निरोध होता है, इसी अवस्था को निर्वाण कहा गया है।
निर्वाण का सिद्धांत वैदिक धर्म के मोक्ष से भिन्न है। वैदिक परंपरा में आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, जबकि बौद्ध धर्म में कोई स्थायी आत्मा है ही नहीं। बौद्ध दर्शन में निर्वाण विनाश का सूचक नहीं है, जैसे आग का बुझना उसका नाश नहीं, बल्कि उसका अपने मूल स्रोत में विलीन होना है। बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जन्म में प्राप्त हो सकता है, किंतु महापरिनिर्वाण (पूर्ण मुक्ति) मृत्यु के पश्चात् ही संभव है।
मानव जाति की समानता
बुद्ध मानव-जाति की समानता के अनन्य समर्थक थे। उनका स्पष्ट मत था कि जन्म से कोई ब्राह्मण या अब्राह्मण नहीं होता- कर्म से ही जाति का निर्धारण होता है। जिस प्रकार अग्नि सभी प्रकार की लकड़ियों से प्रज्वलित हो सकती है, उसी प्रकार सभी जाति और वर्ण के लोग संन्यासी होकर जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
बुद्ध ने अपने धर्म और संघ का द्वार सभी जाति और वर्ण के लोगों के लिए खोल दिया। यह उस युग में एक क्रांतिकारी कदम था जब वैदिक परंपरा में जाति-व्यवस्था अत्यंत कठोर थी और शूद्रों व स्त्रियों को अनेक धार्मिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था। बुद्ध की इस समतावादी दृष्टि ने समाज के वंचित वर्गों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित किया।
यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्ध धर्म की सामाजिक परिकल्पना पूर्णतः वर्णव्यवस्था से मुक्त नहीं थी। बौद्ध ग्रंथों में ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर अधिक बल दिया गया है और संयुक्त निकाय में क्षत्रियों को मानव-मात्र में श्रेष्ठ बताया गया है। वस्तुतः उस काल में नवीन परिवर्तनों के कारण नए शक्तिशाली क्षत्रिय वर्ग को अधिक प्रतिष्ठा मिलना स्वाभाविक था।
प्रत्यक्षवाद
बुद्ध का धर्म एक आविष्कार है, एक खोज है, क्योंकि यह मनुष्य-जीवन और उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के गहन अध्ययन का परिणाम है। “आओ और देखो” (एहि पस्सिको), यही इसका प्रत्यक्षवाद है। बुद्ध ने अपने अनुयायियों से कहा कि मेरी बात को केवल इसलिए मत मानो कि यह बुद्ध ने कही है। मुझ पर भी संदेह करो, विविध परीक्षाओं द्वारा इन विचारों की परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो- यदि सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो।
यही कारण है कि बौद्ध धर्म रहस्य-आडंबरों से मुक्त, नितांत बौद्धिवादी और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत है। यह हृदय को सीधे स्पर्श करता है। बुद्ध के इस प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण ने उन्हें एक ऐसे धर्म-सुधारक के रूप में स्थापित किया जो अंधविश्वास और आस्था के स्थान पर अनुभव और तर्क को महत्त्व देता था।
बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय
मुख्य लेख : बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध संघ के सामने उनकी शिक्षाओं, विनय-नियमों और संघीय अनुशासन को सुरक्षित रखने की चुनौती उत्पन्न हुई। बुद्ध के जीवनकाल में उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व के कारण संघ संगठित रहा, किंतु उनके महापरिनिर्वाण के बाद उपदेशों की व्याख्या, विनय-नियमों और संघीय अनुशासन से जुड़े प्रश्नों पर मतभेद उभरने लगे। बौद्ध धर्म के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार के साथ भौगोलिक दूरी और स्थानीय परिस्थितियों ने भी अलग-अलग परंपराओं के विकास को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार संप्रदायों का विकास किसी एक घटना का परिणाम न होकर कई शताब्दियों की प्रक्रिया थी।

स्थविरवाद और महासांघिक
प्रारंभिक बौद्ध इतिहास में स्थविरवाद और महासांघिक दो प्रमुख निकाय-परंपराओं के रूप में सामने आए। परंपरागत बौद्ध स्रोतों के अनुसार, विनय और संघीय अनुशासन से जुड़े विवादों ने प्रारंभिक विभाजन को जन्म दिया। स्थविर परंपरा में संघीय अनुशासन और विनय के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया, जबकि महासांघिक एक व्यापक भिक्षु-समुदाय की परंपरा के रूप में विकसित हुआ। इनके विभाजन के समय और कारणों के संबंध में बौद्ध स्रोतों में भिन्न विवरण मिलते हैं।
प्रारंभिक निकायों का विस्तार
समय के साथ बौद्ध धर्म में अनेक निकाय और शाखाएँ विकसित हुईं। सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तक और सम्मितीय जैसी परंपराएँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थीं। इनके बीच केवल विनय और संघीय अनुशासन को लेकर ही मतभेद नहीं थे, बल्कि बुद्ध के स्वरूप, धर्मों की प्रकृति, अभिधर्म तथा मुक्ति के मार्ग जैसे दार्शनिक विषयों पर भी विभिन्न विचार विकसित हुए। इस प्रकार संप्रदाय-विभाजन ने बौद्ध चिंतन को विविध और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
थेरवाद परंपरा
थेरवाद वर्तमान समय तक जीवित प्रमुख बौद्ध परंपराओं में से एक है। इसका आधार बुद्ध की शिक्षाएँ, नैतिक अनुशासन, ध्यान और प्रज्ञा हैं। इसमें अर्हत् आदर्श को विशेष महत्त्व प्राप्त है। थेरवादी परंपरा का प्रमुख साहित्य पालि त्रिपिटक है, जिसमें विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक शामिल हैं। इसका प्रभाव विशेष रूप से श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस में रहा।
महायान बौद्ध धर्म
महायान का अर्थ ‘महान वाहन’ है। इसका विकास भारत में क्रमिक रूप से हुआ और प्रारंभिक शताब्दियों में इसकी विशिष्ट पहचान स्पष्ट हुई। महायान का उदय किसी एक घटना या संप्रदाय का परिणाम नहीं था, बल्कि विभिन्न बौद्ध समुदायों और दार्शनिक विचारों के दीर्घकालीन विकास से इसका स्वरूप निर्मित हुआ। बाद में इसका प्रसार चीन, कोरिया, जापान और वियतनाम तक हुआ।
महायान की प्रमुख विशेषता बोधिसत्त्व आदर्श है। इसमें साधक अपनी मुक्ति के साथ सभी प्राणियों के कल्याण को भी महत्त्व देता है। दान, शील, क्षांति, वीर्य, ध्यान और प्रज्ञा छह पारमिताएँ मानी गईं। महायान में अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और मैत्रेय जैसे बोधिसत्त्वों की अवधारणाएँ भी विकसित हुईं। इसके दार्शनिक विकास में माध्यमिक और योगाचार परंपराएँ विशेष महत्त्वपूर्ण थीं।
वज्रयान बौद्ध धर्म
वज्रयान का विकास मुख्यतः महायान की पृष्ठभूमि में हुआ। भारत में प्रारंभिक मध्यकाल में इसमें तांत्रिक साधना-पद्धतियों का समावेश हुआ। मंत्र, मुद्रा, मंडल, ध्यान और गुरु-परंपरा इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा-केंद्रों ने इसके बौद्धिक विकास में योगदान दिया। भारत से वज्रयान का प्रभाव तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों तक पहुँचा तथा आगे चलकर तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसका विशेष स्थान बना।
‘हीनयान’ शब्द का प्रयोग
‘हीनयान’ शब्द का प्रयोग मुख्यतः महायान साहित्य में उन बौद्ध मार्गों के लिए हुआ जिन्हें महायान अपने आदर्श से अलग मानता था। इसका शाब्दिक अर्थ ‘छोटा वाहन’ है। इसलिए आधुनिक इतिहासलेखन में इसे किसी एक विशिष्ट ऐतिहासिक संप्रदाय का नाम मानना उचित नहीं है और इसे सीधे थेरवाद का पर्याय भी नहीं माना जाना चाहिए। प्रारंभिक बौद्ध धर्म में अनेक स्वतंत्र निकाय विद्यमान थे।
बौद्ध संप्रदायों का विकास धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक परिवर्तन की दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम था। स्थविर और महासांघिक जैसी प्रारंभिक धाराओं से अनेक निकाय विकसित हुए, जिन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं की अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं। आगे चलकर थेरवाद, महायान और वज्रयान ने विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट स्वरूप ग्रहण किया। इस विविधता के कारण बौद्ध धर्म श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर चीन, जापान, तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों तक व्यापक रूप से फैल सका।
बौद्ध-संघ की स्थापना एवं संगठन
बौद्ध धर्म में संघ “त्रिरत्न” (बुद्ध, धम्म, संघ) का एक अनिवार्य अंग है। बुद्ध ने सारनाथ में धर्मोपदेश के पश्चात् पंचवर्गीय ब्राह्मण भिक्षुओं के साथ भिक्षु-संघ की स्थापना की थी। इसके बाद वाराणसी में ही यश नामक श्रेष्ठिपुत्र और उनके पचपन साथियों को भी संघ में सम्मिलित किया गया था। इन साठ भिक्षुओं से ही बुद्ध-संघ का वास्तविक आरंभ हुआ। उल्लेखनीय है कि बुद्ध के संघ की स्थापना से पूर्व आजीवकों और जैनियों के संघ पहले से विद्यमान थे।
संघ में शामिल होने वाले व्यक्ति को “भिक्षु” कहा जाता था, जो घर-परिवार से संबंध-विच्छेद कर संन्यासी के रूप में रहते थे, भिक्षाटन से जीवन-यापन करते थे और बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करते थे। भिक्षुओं को संघ के निश्चित नियमों का पालन करना पड़ता था और उल्लंघन पर दंड का भागी होना पड़ता था। संघ का द्वार सभी वर्ग और जाति के लोगों के लिए खुला था, किंतु शीघ्र ही बुद्ध ने अल्पवयस्कों, चोरों, हत्यारों, ऋणी व्यक्तियों, राज-सेवकों, दासों और रोगियों का संघ में प्रवेश वर्जित कर दिया।
आरंभ में स्त्रियों को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, किंतु बाद में अपनी मौसी महाप्रजापति गौतमी के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी भिक्षुणी के रूप में संघ में स्वीकार किया। बुद्ध गणतांत्रिक प्रणाली में विश्वास करते थे और उनका जन्म भी गणराज्य में हुआ था। उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति के आधार पर संघ का संगठन किया। संघ में न कोई बड़ा था, न कोई छोटा। बुद्ध ने अपना कोई उत्तराधिकारी भी नियुक्त नहीं किया, बल्कि धर्म और विनय को ही शास्ता बताया।
बौद्ध संगीतियाँ
मुख्य लेख : बौद्ध संगीतियाँ
बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण
छठी शताब्दी ईसा पूर्व का उत्तर भारत सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक परिवर्तन का काल था। लौह-तकनीक के प्रसार, कृषि के विस्तार, नगरों के विकास, व्यापार-वाणिज्य की वृद्धि और नए सामाजिक वर्गों के उदय ने तत्कालीन समाज को गहराई से प्रभावित किया। दूसरी ओर, वैदिक कर्मकांडों की जटिलता, यज्ञों में होने वाली पशुबलि, सामाजिक असमानता और ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते प्रभाव के कारण सामान्य जनमानस में एक सरल और व्यावहारिक धार्मिक मार्ग की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। ऐसी परिस्थितियों में गौतम बुद्ध ने मध्यम मार्ग, अहिंसा, सदाचार, करुणा और आत्मप्रयास पर आधारित धर्म का प्रचार किया। बौद्ध धर्म की व्यापक लोकप्रियता के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे।
नवीन अर्थव्यवस्था को समर्थन
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में लौह-तकनीक के व्यापक उपयोग से कृषि का विस्तार हुआ और उत्पादन में वृद्धि हुई। इसके साथ ही अनेक नए नगरों का विकास हुआ तथा व्यापार और वाणिज्य का तेजी से विस्तार हुआ। इस परिवर्तन से वैश्य तथा व्यापारी वर्ग की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। व्यापारियों को अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण, ब्याज, पूँजी और सुरक्षित व्यापारिक वातावरण की आवश्यकता थी।
तत्कालीन धार्मिक परंपराओं के कुछ वर्गों में ऋण और ब्याज की प्रथा के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पाया जाता था, जबकि बौद्ध धर्म ने ऐसी आर्थिक गतिविधियों को धार्मिक रूप से अस्वीकार्य घोषित नहीं किया। बौद्ध साहित्य में गृहस्थ जीवन, निजी संपत्ति तथा आर्थिक समृद्धि को पूर्णतः निषिद्ध नहीं माना गया। व्यापारियों और धनिकों द्वारा संघ को दान देने की परंपरा भी विकसित हुई। समुद्री व्यापार के प्रति भी बौद्ध परंपरा अपेक्षाकृत उदार थी। इसलिए नगरों में रहने वाले व्यापारी, श्रेष्ठी और वैश्य वर्ग बौद्ध धर्म के प्रमुख समर्थकों में शामिल हो गए।
अहिंसा और पशु-संरक्षण
कृषि के विस्तार के साथ पशुओं का आर्थिक महत्त्व बढ़ गया था। बैल खेती और परिवहन के लिए अत्यंत आवश्यक थे। ऐसी स्थिति में बड़े पैमाने पर पशुबलि आर्थिक दृष्टि से भी हानिकारक थी। बौद्ध धर्म ने अहिंसा और सभी जीवों के प्रति करुणा पर विशेष बल दिया तथा पशुहत्या का विरोध किया।
इससे कृषक और व्यापारी दोनों वर्गों को बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ अनुकूल लगीं। बौद्ध ग्रंथों में वैदिक यज्ञों में होने वाली पशुबलि की आलोचना के उदाहरण मिलते हैं। अहिंसा केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं रही, बल्कि बदलती कृषि और व्यापार-आधारित अर्थव्यवस्था के साथ भी उसका गहरा संबंध था।
बौद्ध धर्म के सरल और व्यावहारिक सिद्धांत
उस समय धार्मिक जीवन में जटिल कर्मकांडों, यज्ञों और पुरोहितों की भूमिका बढ़ गई थी। अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में पर्याप्त धन और संसाधनों की आवश्यकता होती थी, जिसके कारण सामान्य व्यक्ति उनसे आसानी से जुड़ नहीं पाता था। बुद्ध ने इसके स्थान पर ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया, जिसमें महंगे यज्ञ, पशुबलि अथवा जटिल कर्मकांड आवश्यक नहीं थे।
बुद्ध ने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग के माध्यम से दुःख से मुक्ति का व्यावहारिक मार्ग बताया। उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा दी, जो न तो अत्यधिक भोग-विलास का समर्थन करता था और न ही कठोर आत्मपीड़न का। व्यक्ति अपने आचरण, विचार और प्रयास के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति कर सकता था। इस सरलता और व्यावहारिकता ने बौद्ध धर्म को सामान्य जन के लिए आकर्षक बनाया।
बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्व
बौद्ध धर्म के प्रसार में स्वयं बुद्ध के व्यक्तित्व की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। राजवंश से संबंधित होने के बावजूद उन्होंने सांसारिक सुखों का त्याग किया और मानव जीवन के दुःखों का समाधान खोजने के लिए संन्यास ग्रहण किया। ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को धर्म का मार्ग समझाने में लगा दिया।
बुद्ध ने विद्वानों की कठिन भाषा के बजाय तत्कालीन जनभाषाओं में उपदेश दिए। उनकी शिक्षाएँ सरल, तर्कपूर्ण और जीवन की वास्तविक समस्याओं से जुड़ी थीं। वे दृष्टांतों, कथाओं, लोकोक्तियों और सरल उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात समझाते थे। उनके प्रेम, करुणा और मानवीय दृष्टिकोण का प्रभाव समाज के विभिन्न वर्गों पर पड़ा। परंपरा में अंगुलिमाल और आम्रपाली जैसे व्यक्तियों के बौद्ध धर्म से जुड़ने के उदाहरण इस व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं।
समानता का सिद्धांत
बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसका अपेक्षाकृत समतावादी दृष्टिकोण था। बुद्ध ने आध्यात्मिक मुक्ति को जन्म अथवा जाति पर निर्भर नहीं माना। उन्होंने व्यक्ति के कर्म और आचरण को महत्त्व दिया। इससे उन सामाजिक वर्गों को विशेष आकर्षण मिला जिन्हें तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में अपेक्षाकृत निम्न स्थान प्राप्त था।
बौद्ध संघ में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश की व्यवस्था थी। स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश दिया गया। इस प्रकार बौद्ध धर्म ने धार्मिक क्षेत्र में जन्म-आधारित श्रेष्ठता की धारणा को चुनौती दी। यह दृष्टिकोण उस समय के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण और आकर्षक था।
राजकीय संरक्षण
बौद्ध धर्म के प्रसार में शासकों के संरक्षण ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। बुद्ध के जीवनकाल में मगध के बिंबिसार और कोशल के प्रसेनजित जैसे शासकों ने उनका समर्थन किया। बाद में मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को व्यापक संरक्षण दिया। उसने स्तूपों, विहारों और धर्म-प्रचार की व्यवस्था को प्रोत्साहित किया तथा बौद्ध धर्म के संदेश को भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भारत के बाहर तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद के काल में कनिष्क, हर्षवर्धन तथा पाल शासकों ने भी बौद्ध संस्थाओं और शिक्षा-केंद्रों को संरक्षण दिया। राजकीय समर्थन के कारण बौद्ध विहारों और शिक्षा-केंद्रों का विकास हुआ तथा धर्म का प्रभाव दूर-दूर तक फैला।
संघ और बौद्ध संगीतियों की भूमिका
बुद्ध ने अपने अनुयायियों को संगठित करने के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की। संघ के भिक्षु विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण करके बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार करते थे। संघ ने बौद्ध धर्म को एक संगठित और अनुशासित संस्था का रूप दिया। भिक्षुओं के लिए विहार स्थापित हुए, जो धार्मिक शिक्षा, प्रचार और बौद्ध चिंतन के केंद्र बन गए।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद आयोजित बौद्ध संगीतियों ने उनकी शिक्षाओं को संकलित, व्यवस्थित और संरक्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर बौद्ध विद्वानों ने इसके दर्शन को समृद्ध किया और विभिन्न बौद्ध संप्रदायों तथा दार्शनिक परंपराओं का विकास हुआ। इस प्रकार संघ और बौद्ध संस्थाओं ने धर्म की निरंतरता तथा व्यापक प्रसार सुनिश्चित किया।
इस प्रकार बौद्ध धर्म की लोकप्रियता किसी एक कारण का परिणाम नहीं थी। नई कृषि और व्यापारिक अर्थव्यवस्था, वैश्य वर्ग का उदय, अहिंसा, सरल धार्मिक सिद्धांत, जातिगत असमानता के प्रति चुनौती, बुद्ध का प्रभावशाली व्यक्तित्व, संघ की संगठनात्मक क्षमता और शक्तिशाली शासकों का संरक्षण—इन सभी ने मिलकर बौद्ध धर्म को व्यापक जनसमर्थन प्रदान किया। यही कारण था कि यह धर्म शीघ्र ही भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर श्रीलंका, मध्य एशिया, चीन, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक क्षेत्रों तक फैल गया।
बौद्ध धर्म का योगदान
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध धर्म का उदय भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। गौतम बुद्ध ने ऐसे समय में अपने विचारों का प्रचार किया, जब समाज में धार्मिक कर्मकांडों की जटिलता, सामाजिक असमानता और रूढ़ियों का प्रभाव बढ़ रहा था। बुद्ध ने चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग, अहिंसा, करुणा और सदाचार पर आधारित जीवन-पद्धति प्रस्तुत की। बौद्ध धर्म केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं रहा, बल्कि उसने भारतीय समाज, राजनीति, दर्शन, शिक्षा, साहित्य, कला और स्थापत्य को भी गहराई से प्रभावित किया। इसके प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं-
धार्मिक क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने तत्कालीन धार्मिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। बुद्ध ने वेदों की सर्वोच्चता, पुरोहितों के धार्मिक वर्चस्व तथा जटिल यज्ञ-कर्मकांडों को मुक्ति का अनिवार्य साधन मानने से इनकार किया। उन्होंने बताया कि मनुष्य अपने सदाचार, सही विचार और आत्मप्रयास के माध्यम से दुःख से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार धार्मिक जीवन में व्यक्ति के आचरण को जन्म और कर्मकांड की अपेक्षा अधिक महत्त्व मिला।
बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया, जो अत्यधिक भोग-विलास और कठोर तपस्या दोनों से बचने की शिक्षा देता था। इससे धर्म को अधिक व्यावहारिक और जनसुलभ स्वरूप मिला। बौद्ध धर्म ने अहिंसा, करुणा और सभी जीवों के प्रति दया पर बल दिया। इससे पशुबलि जैसी प्रथाओं को चुनौती मिली और पशु-संरक्षण की भावना को प्रोत्साहन मिला। अहिंसा का विचार कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी था, क्योंकि पशु कृषि और परिवहन के महत्त्वपूर्ण साधन थे।
सामाजिक क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान सामाजिक समानता की दिशा में था। बुद्ध ने व्यक्ति की श्रेष्ठता को उसके जन्म के बजाय उसके कर्म और चरित्र से जोड़कर देखा। इससे जन्म-आधारित ऊँच-नीच की धारणा को चुनौती मिली। बौद्ध संघ में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश की परंपरा ने इस विचार को व्यावहारिक रूप प्रदान किया।
बौद्ध धर्म ने स्त्रियों को भी आध्यात्मिक उन्नति का अधिकार प्रदान किया। प्रारंभिक संकोच के बाद बुद्ध ने भिक्षुणी संघ की स्थापना को स्वीकार किया और महिलाओं को संघ में प्रवेश का अवसर मिला। इससे स्त्रियों के धार्मिक जीवन में सक्रिय भागीदारी का मार्ग खुला।
बौद्ध संघ ने अनुशासित सामुदायिक जीवन की स्थापना की। भिक्षुओं के लिए भोजन, वस्त्र, निवास, आचरण और पारस्परिक व्यवहार से संबंधित नियम बनाए गए। संघ में व्यक्तिगत संपत्ति के स्थान पर सामुदायिक जीवन को महत्त्व दिया जाता था। यद्यपि इसे आधुनिक अर्थ में समाजवादी व्यवस्था कहना उचित नहीं है, फिर भी इसमें सामूहिक जीवन, सीमित व्यक्तिगत संपत्ति और पारस्परिक सहयोग की उल्लेखनीय भावना दिखाई देती है।
राजनीतिक क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने भारतीय राजनीतिक चिंतन को भी प्रभावित किया। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण मौर्य सम्राट अशोक है। कलिंग युद्ध की भीषण हिंसा से प्रभावित होकर अशोक ने आक्रामक विजय की नीति से दूरी बनाई और धम्म-विजय को महत्त्व दिया। उसने प्रजा के नैतिक एवं भौतिक कल्याण, धार्मिक सहिष्णुता, अहिंसा और मानवीय व्यवहार पर बल दिया।
अशोक की धम्म-नीति ने शासन को केवल राजनीतिक शक्ति का माध्यम न मानकर नैतिक दायित्व से भी जोड़ा। उसने मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के प्रति भी दया और संरक्षण की भावना को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार बौद्ध विचारों ने भारतीय शासन-व्यवस्था में नैतिकता, सहिष्णुता और लोककल्याण के आदर्शों को बल प्रदान किया।
दर्शन के क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने भारतीय दर्शन को अनेक मौलिक अवधारणाएँ प्रदान कीं। इनमें अनात्मवाद, प्रतीत्यसमुत्पाद, क्षणिकवाद और कर्म-पुनर्जन्म की अवधारणाएँ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। बुद्ध ने स्थायी आत्मा की धारणा को स्वीकार नहीं किया और बताया कि अस्तित्व विभिन्न परिस्थितियों एवं कारणों के परस्पर संबंध से निर्मित होता है।
प्रतीत्यसमुत्पाद बौद्ध दर्शन की केंद्रीय अवधारणा है। इसके अनुसार प्रत्येक घटना अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होती है; कोई भी वस्तु या घटना पूर्णतः स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं आती। इस सिद्धांत ने भारतीय दार्शनिक चिंतन में कारण-कार्य संबंध और परिवर्तन की समस्या को एक नया आयाम दिया।
बौद्ध चिंतकों ने आगे चलकर तर्क, ज्ञानमीमांसा और शून्यवाद जैसे विषयों पर भी गंभीर चिंतन किया। नागार्जुन जैसे दार्शनिकों ने बौद्ध दर्शन को अत्यंत विकसित दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया। इस प्रकार बौद्ध धर्म भारतीय दर्शन की विविध और समृद्ध परंपरा का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध विहार केवल धार्मिक संस्थाएँ नहीं थे, बल्कि वे शिक्षा, अध्ययन, वाद-विवाद और बौद्धिक गतिविधियों के केंद्र भी बन गए। समय के साथ नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और ओदंतपुरी जैसे प्रसिद्ध शिक्षा-केंद्र विकसित हुए।
नालंदा और विक्रमशिला की ख्याति भारत के बाहर तक फैली। चीन, कोरिया, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्यार्थी तथा विद्वान यहाँ अध्ययन के लिए आते थे। इससे भारत और एशिया के अन्य क्षेत्रों के बीच बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संबंध मजबूत हुए।
साहित्य और भाषा के क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने जनभाषाओं के विकास को भी प्रोत्साहित किया। बुद्ध ने सामान्य लोगों तक अपनी शिक्षाएँ पहुँचाने के लिए सरल भाषा का प्रयोग किया। आगे चलकर उनकी शिक्षाओं का विशाल साहित्य पालि में विकसित हुआ। त्रिपिटक बौद्ध साहित्य की प्रमुख आधारभूत रचना है।
इसके अतिरिक्त संस्कृत में भी विशाल बौद्ध साहित्य की रचना हुई। जातक कथाओं ने बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाओं के माध्यम से नैतिक और सामाजिक शिक्षाओं को लोकप्रिय बनाया। बौद्ध साहित्य के कारण भारत की कथा, दर्शन, इतिहास और नैतिक साहित्य की परंपरा को समृद्धि मिली।
कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में योगदान
बौद्ध धर्म ने भारतीय कला और स्थापत्य को नई दिशा प्रदान की। बौद्ध उपासना और संघ-जीवन के लिए स्तूप, चैत्य और विहार विकसित हुए। साँची, भरहुत और अमरावती के स्तूप भारतीय बौद्ध स्थापत्य की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं। स्तूपों पर उत्कीर्ण मूर्तियों और कथात्मक दृश्यों ने भारतीय मूर्तिकला को भी समृद्ध किया।
पश्चिमी भारत में अजंता, एलोरा और नासिक की गुफाओं में चैत्य और विहार निर्मित किए गए। अजंता की भित्तिचित्र कला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इन चित्रों में बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन का सुंदर चित्रण मिलता है।
बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ बुद्ध की प्रतिमा-परंपरा भी विकसित हुई। गांधार और मथुरा कला-शैलियों में बुद्ध की प्रभावशाली प्रतिमाएँ निर्मित की गईं। गांधार कला में यूनानी-रोमन प्रभाव तथा मथुरा कला में भारतीय परंपरा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
बौद्ध धर्म का भारत से बाहर प्रसार
बौद्ध धर्म का उदय छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत में हुआ, लेकिन कुछ ही शताब्दियों में यह भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं से बाहर निकलकर एशिया के विशाल भू-भाग में फैल गया। इसके प्रसार में भिक्षु-संघ, व्यापारिक मार्ग, राजकीय संरक्षण, बौद्ध विहारों और विभिन्न देशों के साथ स्थापित सांस्कृतिक संपर्कों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। श्रीलंका, मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, नेपाल तथा दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार ने भारतीय संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को भी व्यापक बनाया।
श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रसार
सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रसार को विशेष गति मिली। तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन परंपरागत रूप से पाटलिपुत्र में लगभग 250 ईसा पूर्व माना जाता है। इसके बाद बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए विभिन्न क्षेत्रों में भिक्षु भेजे गए। इनमें श्रीलंका के लिए भेजे गए मिशन का विशेष महत्त्व था।
परंपरा के अनुसार, अशोक के पुत्र महेंद्र (महिंदा) श्रीलंका गए और वहाँ के राजा देवानामपिय तिस्स के शासनकाल में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। बाद में अशोक की पुत्री संघमित्रा (संघमित्त) श्रीलंका पहुँचीं। वे बोधगया के मूल बोधिवृक्ष की एक शाखा लेकर गई थीं, जिसे अनुराधापुर में रोपा गया। इस घटना ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म को संस्थागत आधार प्रदान किया। आगे चलकर श्रीलंका थेरवाद बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र बन गया और पालि साहित्य तथा बौद्ध परंपरा के संरक्षण में उसकी विशेष भूमिका रही।
मध्य एशिया में प्रसार
मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म उत्तर-पश्चिमी भारत से मध्य एशिया की ओर बढ़ा। इस प्रसार में व्यापारिक मार्गों, विशेषकर रेशम मार्ग, की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। भारतीय भिक्षु, व्यापारी और यात्री इन मार्गों के माध्यम से मध्य एशिया के विभिन्न नगरों तक पहुँचे। कुषाण साम्राज्य के विस्तार ने भी भारत, मध्य एशिया और चीन के बीच संपर्क को मजबूत किया।
कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध धर्म को विशेष राजकीय संरक्षण मिला। यद्यपि कनिष्क से संबंधित चतुर्थ बौद्ध संगीति की तिथि, स्थान और स्वरूप के बारे में स्रोतों में मतभेद हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि कुषाण काल में उत्तर-पश्चिमी भारत, गांधार और मध्य एशिया में बौद्ध धर्म का प्रभाव व्यापक हुआ। इसी क्षेत्र से बौद्ध धर्म आगे चीन की ओर बढ़ा।
चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार
बौद्ध धर्म चीन में मुख्यतः मध्य एशिया के मार्ग से पहुँचा। इसके आगमन का प्रारंभिक काल सामान्यतः पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास माना जाता है। प्रारंभ में मध्य एशियाई भिक्षुओं और अनुवादकों ने बौद्ध ग्रंथों को चीनी भाषा में उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में भारतीय तथा मध्य एशियाई आचार्यों ने चीन में बौद्ध दर्शन और मठ-परंपरा के विकास में योगदान दिया।
चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार केवल धार्मिक स्तर तक सीमित नहीं रहा। भारतीय दर्शन, साहित्य, चिकित्सा, कला और स्थापत्य के अनेक तत्व चीनी संस्कृति से जुड़े। चीन से अनेक बौद्ध तीर्थयात्री भारत आए और उन्होंने यहाँ के विहारों तथा शिक्षा-केंद्रों में अध्ययन किया। इनमें फाहियान और ह्वेनसांग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ह्वेनसांग ने नालंदा में अध्ययन किया और भारत के अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। उनके यात्रा-वृत्तांत तत्कालीन भारत के इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
तिब्बत में बौद्ध धर्म
तिब्बत में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार अपेक्षाकृत बाद में हुआ। सातवीं शताब्दी ईस्वी में राजा सोंगत्सेन गम्पो के समय बौद्ध धर्म को तिब्बत में प्रवेश मिला। बाद में भारतीय आचार्यों शांतिरक्षित और पद्मसंभव ने तिब्बत में बौद्ध धर्म की स्थापना और विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आगे चलकर भारतीय बौद्ध विद्वानों और तिब्बती अनुवादकों के बीच व्यापक बौद्धिक संपर्क स्थापित हुआ। भारत से अनेक ग्रंथ तिब्बती भाषा में अनूदित किए गए। अतीश दीपंकर जैसे भारतीय आचार्य ने भी तिब्बत में बौद्ध धर्म के पुनर्गठन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार तिब्बत भारतीय बौद्ध दर्शन और साहित्य के संरक्षण का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
नेपाल में बौद्ध धर्म
नेपाल, विशेषकर काठमांडू घाटी, बौद्ध धर्म के प्राचीन केंद्रों में रहा। लुंबिनी, जहाँ परंपरा के अनुसार गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, वर्तमान नेपाल में स्थित है। नेपाल में बौद्ध और हिंदू परंपराओं के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक समन्वय दिखाई देता है। यहाँ बौद्ध स्तूप, विहार और मठ भारतीय बौद्ध परंपरा के प्रसार और संरक्षण के महत्त्वपूर्ण केंद्र बने।
दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया में प्रसार
बौद्ध धर्म दक्षिण-पूर्वी एशिया में व्यापारिक और समुद्री मार्गों के माध्यम से पहुँचा। म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम में बौद्ध धर्म की विभिन्न परंपराओं का विकास हुआ। श्रीलंका से थेरवाद परंपरा के प्रसार ने विशेष रूप से म्यांमार और थाईलैंड में प्रभाव डाला। दूसरी ओर, चीन के माध्यम से महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव वियतनाम सहित पूर्वी एशिया के कुछ क्षेत्रों में पहुँचा।
चीन से बौद्ध धर्म कोरिया और वहाँ से जापान पहुँचा। जापान में छठी शताब्दी ईस्वी से बौद्ध धर्म को राजकीय और अभिजात संरक्षण मिलने लगा। वहाँ बौद्ध धर्म ने स्थानीय धार्मिक परंपराओं के साथ समन्वय स्थापित किया और जापानी कला, वास्तुकला, साहित्य तथा दर्शन को गहराई से प्रभावित किया।
सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों का विकास
बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ भारत और एशिया के विभिन्न क्षेत्रों के बीच केवल धार्मिक संबंध ही नहीं, बल्कि व्यापारिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संबंध भी विकसित हुए। व्यापारी बौद्ध भिक्षुओं के साथ लंबी यात्राएँ करते थे और व्यापारिक मार्गों के किनारे बौद्ध विहार तथा विश्राम-केंद्र विकसित हुए। इन विहारों ने यात्रियों और व्यापारियों को आश्रय देने के साथ-साथ विभिन्न संस्कृतियों के बीच संपर्क का माध्यम भी प्रदान किया।
भारत के नालंदा जैसे शिक्षा-केंद्रों में विदेशों से विद्यार्थी आते थे। फाहियान, ह्वेनसांग और बाद के काल में धर्मस्वामी जैसे यात्रियों ने भारत की यात्रा की। तारानाथ स्वयं मध्यकालीन तिब्बती बौद्ध इतिहासकार थे, भारत-यात्री के रूप में फाहियान या ह्वेनसांग के समान नहीं; इसलिए उन्हें विदेशी यात्री के रूप में रखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। उनकी रचना ‘भारत में बौद्ध धर्म का इतिहास’ भारतीय बौद्ध परंपराओं के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
कला और स्थापत्य पर प्रभाव
बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ भारतीय कला और स्थापत्य के अनेक रूप भी एशिया के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचे। गांधार कला ने मध्य एशिया और आगे चीन की बौद्ध कला को प्रभावित किया। मध्य एशिया में बौद्ध गुफाओं, भित्तिचित्रों और मूर्तियों का विकास हुआ। अफगानिस्तान के बामियान में निर्मित विशाल बुद्ध प्रतिमाएँ इस व्यापक बौद्ध सांस्कृतिक परंपरा की असाधारण उपलब्धि थीं। ये प्रतिमाएँ अब विद्यमान नहीं हैं, क्योंकि उन्हें 2001 में नष्ट कर दिया गया था।
इसी प्रकार चीन, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्तूप, विहार, मंदिर, बुद्ध प्रतिमाएँ और बौद्ध भित्तिचित्र स्थानीय कलात्मक परंपराओं के साथ विकसित हुए। इस प्रक्रिया में भारतीय बौद्ध कला ने स्थानीय शैलियों के साथ समन्वय स्थापित किया और एक व्यापक एशियाई बौद्ध कला-परंपरा के निर्माण में योगदान दिया।
इस प्रकार बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार किसी एक शासक या घटना का परिणाम नहीं था। अशोक के मिशन, व्यापारिक मार्गों, भिक्षु-संघ, कुषाणकालीन संपर्क, बौद्ध शिक्षा-केंद्रों तथा विभिन्न देशों के शासकों के संरक्षण ने इसके विस्तार को गति दी। श्रीलंका से लेकर चीन, तिब्बत, मध्य एशिया, नेपाल, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्वी एशिया तक बौद्ध धर्म के प्रसार ने भारत को एक व्यापक एशियाई सांस्कृतिक नेटवर्क से जोड़ा। इस प्रक्रिया में धर्म के साथ भारतीय दर्शन, साहित्य, शिक्षा, कला और स्थापत्य का भी दूर-दूर तक प्रभाव पहुँचा।



