जैन आचार-मीमांसा (Jain Ethics)

जैन परंपरा में आचार के स्तर पर श्रावक और श्रमण-ये दो श्रेणियाँ हैं। आध्यात्मिक विकास की पूर्णता हेतु श्रावक या गृहस्थधर्म (श्रावकाचार) पूर्वार्ध है और श्रमण या मुनिधर्म (श्रमणाचार) उत्तरार्ध।

श्रमण धर्म की नींव गृहस्थ धर्म पर मजबूत होती है। गृहस्थ धर्म की भूमिका इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि श्रावकाचार की भूमिका में एक सामान्य गृहस्थ त्याग और भोग-इन दोनों को समन्वयात्मक दृष्टि में रखकर आध्यात्मिक विकास में अग्रसर होता है।

श्रावकाचार पंचअणुव्रत

जैन आचारशास्त्र में श्रावक को व्रतधारी, गृहस्थ, उपासक, अणुव्रती, देशविरत, सागार आदि नामों से जाना जाता है। श्रावक गृहस्थ होता है, उसे जीवन के संघर्ष में हर प्रकार का कार्य करना पड़ता है। जीविकोपार्जन के साथ ही आत्मोत्थान एवं समाजोत्थान के कार्य करने पड़ते हैं। अतः उसे ऐसे ही आचारगत नियमों आदि के पालन का विधान किया गया, जो व्यवहार्य हों क्योंकि सिद्धान्तों की वास्तविकता क्रियात्मक जीवन में ही चरितार्थ हो सकती है। इसलिए श्रावकोचित आचार-विचार के प्रतिपादन और परिपालन का विधान श्रावकाचार की विशेषता है।

श्रावकाचार आदर्श जीवन के उत्तरोत्तर विकास की जीवन शैली प्रदान करता है। श्रावकाचार के परिपालन हेत श्रमण वर्ग सदा से श्रावकों का प्रेरणास्रोत रहा है। जैन धर्म में गृहस्थ अनुयायियों (श्रावकों) के लिए पंचअणुव्रतों का विधान मिलता है। पंचमहाव्रत का विधान क्लिष्टता के कारण केवल भिक्षुओं के लिए था।

वस्तुतः श्रमण साधु राग-द्वेष से परे समाज का संरक्षक होता है, वह समाज हित में श्रावकों को छोटे-छोटे स्वार्थों के त्याग करने एवं समता भाव की शिक्षा देता है।

श्रमण के अहिंसादि पाँच महाव्रतों की अपेक्षा लघु होने के कारण श्रावक के पाँच व्रत अणुव्रत अर्थात् लघुव्रत कहलाते हैं।

जिस प्रकार सर्वविरत श्रमण के लिए पाँच महाव्रत प्राणभूत हैं उसी प्रकार श्रावक के लिए पाँच अणुव्रत जीवनरूप हैं। इसीलिए अणुव्रतों को श्रावक का मूलगुण कहा गया है।

1. अहिंसाणुव्रत (स्थूल प्राणातिपात-विरमण)

महाव्रती मुनि प्राणातिपात अर्थात हिंसा का पूर्ण त्याग करता है, किंतु अणुव्रती श्रावक के लिए स्थूल हिंसा का त्याग करना होता है क्योंकि गृहस्थ होने के कारण उसे अनेक प्रकार से सूक्ष्म हिंसा तो करनी ही पड़ती है। इसीलिए श्रावक की स्थूल हिंसा-विरति देशविरति अर्थात् आंशिक विरति कही जाती है।

श्रावक केवल त्रस (द्वींद्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिंद्रिय एवं पंचेंद्रिय) प्राणियों की हिंसा से विरत रहता है। श्रावक को अहिंसाणुव्रत का पालन करते हुए निम्नलिखित पाँच अतिचारों- बन्ध, वध, छविच्छेद, अतिभार और अन्नपान-निरोध से बचना चाहिए।

2. सत्याणुव्रत (स्थूल मृषावाद)

श्रावक को स्थूल मृषावाद अर्थात झूठ से भी बचना चाहिए और सदा सत्य बोलना चाहिए। सावधानीपूर्वक स्थूल मृषावाद-विरमण व्रत का पालन करते हुए भी एतद्विषयक निम्न पाँच अतिचारों-दोषों की संभावना रहती है- 1. सहसा-अभ्याख्यान, 2. रहस्य-अभ्याख्यान, 3. स्वदार अथवा स्वपति मंत्रभेद, 4. मृष-उपदेश, 5. कूट-लेखकरण।

बिना सोचे समझे किसी के प्रति कोई धारण बना लेना, किसी की गुप्त बात किसी अन्य के सामने प्रकट करना, किसी को बहला कर कुमार्ग पर ले जाना, झूठे लेख या कूट-लेखरण आदि अतिचार से सावधान रहकर सत्य की आराधना करनी चाहिए।

3. अस्तेयाणुव्रत (स्थूल अदत्तादान)

अहिंसा और सत्य के सम्यक् आचरण के लिए अचैर्य आवश्यक है। श्रमण के लिए तो बिना अनुमति दन्तशोधनार्थ तृण उठाना भी वर्जित है। अदत्तादान का शब्दार्थ है- बिना दी हुई वस्तु (अदत्त) का ग्रहण (आदान)। श्रावक चोरी का त्याग भी साधारणतया दो करण व तीन योगपूर्वक ही करता है।

स्थूल अदत्तादान व्रत के पाँच मुख्य अतिचार हैं- 1. तेनाहत् अर्थात्  चोरी का माल लेना, 2. तस्कर प्रयोग अर्थात् चोरी करने की प्रेरणा, चोर की सहायता, शरण, शस्त्रास्त्र आदि द्वारा लुटेरों की सहायता करना, 3. राज्यादिविरुद्ध कर्म अर्थात् प्रजाहित में बने राज्य के नियमों को भंग करना, 4. कूट-तौल-कूटमान् अर्थात् लेनदेन में न्यूनाधिकता का प्रयोग तथा 5. तत्प्रतिरूपक व्यवहार अर्थात् बहुमूल्य वस्तु में अल्पमूल्य वस्तु मिलाना और इस प्रकार अनुचित लाभ उठाना श्रावक के लिए अनुचित है।

4. ब्रह्मचर्याणुव्रत (स्वदार-संतोष)

अपनी भार्या के सिवाय शेष समस्त स्त्रियों के साथ मैथुनसेवन का मन, वचन व कायपूर्वक त्याग करना स्वदार-संतोष व्रत कहलाता है। जिस प्रकार श्रावक के लिए स्वदार-सन्तोष का विधान है, उसी प्रकार श्राविका के लिए स्वपति-सन्तोष का नियम है।

इस प्रकार जहाँ श्रमण-श्रमणी के लिए मैथुन का सर्वथा त्याग विहित है, वहीं श्रावक-श्राविका हेतु मैथुन की मर्यादा निश्चित कर दी गई है। जब श्रावक स्वदार मैथुन-सेवन की मर्यादा निश्चित करता है, तो उसमें परदारत्याग, वेश्यात्याग, कुमारिकात्याग आदि स्वतः आ जाते हैं।

जाने-अनजाने यह व्रतभंग न हो, इसलिए मैथुन-विरमण के पाँच अतिचारों से बचने का सुझाव दिया गया है- इत्वरिक-परिग्रहीता-गमन (अल्पकाल के लिए स्वीकार की हुई स्त्री के साथ कामभोग), अपरिग्रहीता-गमन (अस्वीकृत स्त्री के साथ कामभोग), अनंग क्रीडा (कामवर्धक प्रवृत्तियाँ), परविवाहकरण (रागादि के कारण दूसरों के लिए वर-कन्या ढूढ़ना) कामभोग-तीव्राभिलाषा (कामरूप व भोगरूप विषयों में आसक्ति)।

इन अतिचारों से सदाचार दूषित होता है। अतः श्रावक-श्राविका को इनसे बचना चाहिए।

5. अपरिग्रहाणुव्रत (इच्छा-परिमाण)

मानव की इच्छा आकाश के समान अनंत होती है। यदि इच्छा पर नियंत्रण न किया जाए तो वह कदापि तृप्त नहीं हो सकती। इच्छा-तृप्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है- इच्छा-नियंत्रण। चूंकि गष्हस्थ के लिए इच्छाओं का सर्वथा त्याग संभव नहीं है, इसलिए इच्छा-परिमाण के द्वारा इच्छाओं की मर्यादा बाँधी गई है। श्रावक को उतना ही उपार्जन अथवा संग्रह करना चाहिए जिसके द्वारा परिमित इच्छाओं की पूर्ति की जा सके। मर्यादा से अधिक परिग्रह की प्राप्ति होने पर उसका दानादि सत्कार्यों में सदुपयोग कर लेना चाहिए।

इस प्रकार साधक द्वारा अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रहाचर्य- इन पाँच प्रकार के व्रतों के पालन से आत्मा में कर्म-पुद्गलों का प्रवेश रुक जाता है।

श्रमणाचार (पंचमहाव्रत)

कुछ विद्वानों के अनुसार सम्यक् चरित्र के लिए पचंहाव्रत का पालन ही पर्याप्त है। इसकी महत्ता उपनिषद् तथा बौद्ध-दर्शन में भी बताई गई है और ईसाई धर्म के नियम भी इससे मिलते हैं। जैन धर्म में जिस कठोरता के साथ पचंहाव्रत का पालन किया जाता है, वैसी कठोरता अन्यत्र नहीं पाई जाती है।

जैन धर्म में भिक्षु वर्ग के लिए निम्नलिखित पंचमहाव्रतों की व्यवस्था की गई है-

1. सर्व-प्रणातिपात-विरमण (अहिंसा

हिंसात्मक प्रवृत्ति का पूर्णतया परित्याग ही अहिंसा है। सभी प्रणियों पर समभावदृष्टि रखना ही अहिंसा है- ‘समया सव्व भूएसु’। प्रत्येक आत्मा चाहे वह पृथ्वी संबंधी हो, चाहे वह जलगत हो, चाहे उसका आश्रय कीट अथवा पतंग हो, चाहे वह पशु अथवा पक्षी में रहती हो, चाहे उसका निवास स्थान मानव हो, तात्त्विक दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है।

जैन दृष्टि का यह साम्यवाद भारतीय संस्कृति का गौरव है। इसी साम्यवाद के आधार पर जैन परंपरा ‘जीओ और जीने दो’ का उद्घोषणा करती है।

शरीर से किसी की हत्या करना तो पाप है ही, किंतु मन से तद्विषयक संकल्प करना भी पाप है। मनसा, वाचा और कर्मणा किसी जीव को सन्ताप न पहुँचाना, उसे पीड़ा न पहुँचाना, यही सच्ची अहिंसा है।

इस प्रकार आचार-विषयक अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परंपरा की विश्व को विशिष्ट देन है जो आज भी अधिकांश भारतीयों के जीवन में विद्यमान है। किसी भी प्राणी की हिंसा न करना ही ज्ञानी होने का सार है।

सर्व-प्रणातिपात-विरमण के लिए पाँच भावनाओं का पालन करना आवश्यक है- 1. ईर्यासमिति अर्थात् गमनागमन सम्बन्धी सावधानी, 2. भाषा समिति अर्थात् वचन की अपापकता, 3. एषणा समिति अर्थात् खान-पान सम्बन्धी सचेतता, 4. आदान-प्रेक्षा समिति अर्थात् पात्रादि उपकरण सम्बन्धी सावधानी, 5. व्युत्त्सर्ग समिति अर्थात् मानसिक विकार रहितता। इन तथा इसी प्रकार की अन्य प्रशस्त भावनाएँ अहिंसाव्रत को सुदृढ़ करती हैं।

2. सर्व-मृषावाद-विरमण (सत्य)

जिस प्रकार सर्वविरत श्रमण जीवकाय की हिंसा का सर्वथा त्याग करता है, उसी प्रकार वह मृषावाद से भी विरत रहता है। मिथ्या वचन का परित्याग ही सत्य है और सत्य का आदर्श सूनृत है। सूनृत से तात्पर्य ऐसे सत्य से है जो सभी के लिए प्रिय एवं हितकारी हो- ‘प्रिय पथ्यं वचस्तथ्यं सूनृत व्रतमुच्यते’। सत्य होने पर भी अवज्ञासूचक शब्दों का प्रयोग न करें किंतु सम्मानसूचक शब्द प्रयोग में लें।

इस व्रत का पालन भी मन, वचन और कर्म से करना चाहिए, ‘जिसकी अन्तरात्मा सदा सत्य भावों से संपन्न है, उसे विश्व के प्राणिमात्र के साथ मित्रता रखनी चाहिए।’

अमृषावाद के लिए भी पाँच उपनियम बताये गये हैं- 1. वाणीविवेक अर्थात् सोच-समझ कर भाषा का प्रयोग करना, 2. लोभत्याग अर्थात् लालच में न फँसना, 3. क्रोधत्याग अर्थात् गुस्सा न करना, 4. हास्यत्याग अर्थात् हँसी-मजाक न करना तथा 5. भयत्याग अर्थात् निर्भीक रहना।

इस प्रकार की अन्य प्रशस्त भावनाओं से सत्यव्रत की रक्षा होती है। इस प्रकार श्रमण को क्रोधादि कषायों का त्याग कर, समभाव धारण कर व विवेकपूर्वक संयमित सत्याचरण करना चाहिए।

3. सर्व-अदत्तादान-विरमण (अस्तेय)

अदत्तादान से सर्वथा निवष्त्ति लेने वाला श्रमण कोई भी बिना दी हुई वस्तु ग्रहण नहीं करता। वह बिना अनुमति के एक तिनका उठाना भी स्तेय अर्थात् चोरी समझता है।

जिस प्रकार वह स्वयं अदत्तादान का सेवन नहीं करता, उसी प्रकार किसी से करवाता भी नहीं और करनेवालों का समर्थन भी नहीं करता है।

अस्तेयव्रत की दृढ़ता एवं सुरक्षा के लिए भी पाँच निर्देश दिए गए हैं- 1. सोच-विचार कर वस्तु की याचना करना, 2. आचार्य आदि की आज्ञा से भोजन ग्रहण करना, 3. परिमित पदार्थ स्वीकार करना, 4. पुनः-पुनः पदार्थों की मर्यादा करना तथा 5. सहधार्मिक से परिमित वस्तुओं की याचना करना।

4. सर्व-बहिद्धादान-विरमण (ब्रह्मचर्य)

श्रमण के लिए मैथुन का पूर्ण त्याग अनिवार्य है। उसके मैथुनत्याग को सर्व मैथुन-विरमण कहा जाता है। उसके लिए मन, वचन एवं काय से मैथुन का सेवन करने, करवाने तथा अनुमोदन करने का निषेध है। इसे नवकोटि ब्रह्मचर्य अथवा नवकोटि-शील कहते हैं।

मैथुन अधर्म का मूल और हिंसादि दोषों, कलह-संघर्ष-विग्रह का कारक है। इसीलिए निर्ग्रंथ मुनि मैथुन का सर्वथा त्याग करते हैं।

वासनाओं का पूर्ण परित्याग ही ब्रह्मचर्य है। वही ऋषि है, वही मुनि है, वही संयत है और वही भिक्षु है जो शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करता है।

ब्रह्मचर्यव्रत के पालन के लिए निम्नोक्त पाँच भावनाओं का निर्देश दिया गया है- 1. किसी स्त्री से बात न करें, 2. स्त्री के अंगों का अवलोकन न करें, 3. पूर्वानुभूत नारी-संसर्ग का ध्यान न करें, 4. मात्रा का अतिक्रमण कर भोजन न करें तथा 5. स्त्री आदि से सम्बद्ध स्थान में न रहें।

5. सर्वपरिग्रह-विरमण (अपरिग्रह)

सर्वविरत श्रमण के लिए सर्वपरिग्रह-विरमण भी अनिवार्य है। किसी भी वस्तु का ममत्वपूर्वक संग्रह परिग्रह कहलाता है।

परिग्रह के साथ आत्म-विकास की घोर शत्रुता है। परिग्रह का दूसरा नाम ग्रंथि भी है। जितनी अधिक गाँठ बाँधी जाती है उतना ही अधिक परिग्रह बढ़ता है। यह गाँठ जब तक नहीं खुलती, तब तक विकास का द्वार बंद रहता है।

भगवान् महावीर ने ग्रंथि-भेदन पर अधिक भार दिया है, इसीलिए उनका नाम निर्ग्रंथ पड़ गया और उनकी परंपरा भी निर्ग्रंथ संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुई।

अपरिग्रह का मार्ग विश्वशांति का प्रशस्त मार्ग है। सर्वविरत श्रमण न तो संग्रह करता है, न करवाता है और न करने वालों का समर्थन करता है। यही नहीं, वह अपने शरीर पर भी ममत्व नहीं रखता। वस्तुतः जो ममत्व का त्याग कर सकता है, वही परिग्रह का त्याग कर सकता है।

संयम निर्वाह के लिए वह जो कुछ भी अल्पतम् वस्तुएँ अपने पास रखता है उन पर भी उसका ममत्व नहीं होता। जो साधु मर्यादा विरुद्ध कुछ भी संग्रह करना चाहता है, वह साधु नहीं है अपितु गृहस्थ ही है।

अपरिग्रहव्रत की पाँच भावनाएँ इस प्रकार हैं- 1. श्रौत्रेंद्रिय के विषय शब्द के प्रति अनासक्त भाव, 2. चक्षुरिंद्रिय के विषय रूप के प्रति अनासक्त भाव, 3. घ्राणेंद्रिय के विषय गंध के प्रति अनासक्त भाव, 4. रसनेंद्रिय के विषय रस के प्रति अनासक्त भाव और 5. स्पर्शनेंद्रिय के विषय स्पर्श के प्रति अनासक्त भाव।

इन कर्मों को अपनाने से नये कर्मों का आश्रव समाप्त हो जाता है, पुराने कर्मों का नाश हो जाता है जिसके फलस्वरूप जीव अपनी स्वाभाविक अवस्था अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।

मोक्ष से तात्पर्य केवल दुःखों का अंत ही नहीं अपितु आत्मा को अनंतचटुष्ट्य17 अर्थात् अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति, अनंत दर्शन तथा अनंत आनंद की प्राप्ति होती है।

जैनों ने इस प्रकार अभावात्मक तथा भावात्मक दोनों ही रूपों में मोक्ष की व्याख्या की है। जिस प्रकार मेघ के हटने से आकाश में सूर्य आलोकित होता है, उसी प्रकार आत्मा की परमपूर्णता को पुनः प्राप्त करना ही मोक्ष है।

तीन गुणव्रत

अणुव्रतों की भावनाओं की दृढ़ता के लिए जिन विशेष गुणों की आवश्यकता होती है उन्हें गुणव्रत कहा जाता है। अणुव्रतों की रक्षा तथा विकास के लिए जैन आचार-शास्त्र में तीन गुणव्रतों की व्यवस्था की गई है:

  1. दिशा-परिमाण व्रत- अपनी त्यागवृत्ति के अनुसार व्यवसायादि प्रवृत्तियों के निमित्त दिशाओं की मर्यादा निश्चित करना,
  2. उपभोग-परिभोग-परिमाण व्रत- उपभोग एवं परिभोग की मर्यादा निश्चित करना और
  3. अनर्थदंड-विरमण व्रत अर्थात् अपने अथवा अपने कुटुंब के जीवन निर्वाह के निमित्त होने वाले अनिवार्य हिंसापूर्ण व्यापार-व्यवसाय के अतिरिक्त समस्त पापपूर्ण प्रवृत्तियों से निवृत्त होना। गुणव्रत से प्रधानतया अहिंसा एवं अपरिग्रह का पोषण होता है।

शिक्षाव्रत

शिक्षा का अर्थ होता है अभ्यास। श्रावक (गृहस्थ) को कुछ व्रतों का बार-बार अभ्यास करना होता है। इसी अभ्यास के कारण इन व्रतों को शिक्षाव्रत कहा जाता है। अणुव्रत एवं गुणव्रत एक ही बार ग्रहण किये जाते हैं और जीवनभर के लिए होते हैं जबकि शिक्षाव्रत निश्चित समय के लिए होते हैं।

शिक्षाव्रत चार हैं 1. सामायिक व्रत अर्थात् मन, कर्म एवं वचन की पवित्रता-शुद्धता के साथ त्रस और स्थावर के प्रति समभाव का अभ्यास करना

  1. देशावकाशिक व्रत अर्थात् मर्यादित क्षेत्र के बाहर न आने जाने का अभ्यास करना,
  2. पौषधेपवास व्रत अर्थात् आत्म-तत्त्व के पोषण के लिए उपवासपूर्वक नियत समय व्यतीत करना और
  3. अतिथिसंविभाग व्रत अर्थात् अतिथि आदि के स्वागत के निमित्त अपनी आय का एक निश्चित विभाग करना ।

चारित्र

जैन दर्शन में बंधन से मुक्ति के लिए पाँच चारित्रों का भी विधान बताया हैं- 1. सामाजिक चारित्र अर्थात् समभाव में रहना, 2. छेदोपस्थापना अर्थात् गुरु के समीप अपने पूर्व दोषों को स्वीकार कर दीक्षा लेना, 3. परिहार विशुद्धि, 4. सूक्ष्म सम्पराय अर्थात् लोभ के अंश को छोड़कर क्रोध आदि कषायों का उदय न होना एवं 5. यथाख्यात् अर्थात् सभी कषायों का निरोध होना। चारित्र की प्राप्ति मन, वचन और काय के संयम से होती है।

अनुप्रेक्षाएँ

पाँचवें गुण स्थान में गृहस्थ सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् चारित्र्य का अंश रूप में पालन करता है। संन्यासी के लिए छठवें गुण स्थान से चैदहवें गुण स्थान तक आरोहण का विधान है। तेरहवाँ गुण स्थान संयोगीकेवली का है जब साधक घातिया कर्मों का पूर्णतया क्षय कर लेता है।

साधक अरहंत पद प्राप्त कर लेता है। चैदहवाँ स्थान अयोगकेवली का है। जैन धर्म सांख्य तथा अद्धैत वेदांत की भाँति जीवन्मुक्ति की संभावना को स्वीकार करता है। जब आत्मा समस्त कर्मों का क्षय कर सर्वथा विशुद्ध सिद्धि को पा लेती है, तब वह लोक के मस्तक पर स्थित होकर सदा के लिए सिद्ध हो जाती है।

जैन मत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह कत्र्तव्यों का निर्देश जातिवाद से ऊपर उठकर, केवल मनुष्यमात्र के लिए एक ही आचार-पद्धति का निर्देश देता है। जिस प्रकार बंधन का कारण आश्रव है, उसी प्रकार निर्जरा मोक्ष का कारण है। मुक्ति की चरम अवस्था में साधक लोकाकाश-आलोकाकाश के मध्य सिद्धशिला नामक पवित्र निवास-भूमि में पहुँच जाता है। यह मोक्ष परमात्मपद, स्वरूप-सिद्धि तथा निर्वाण है। कारण-परमात्मस्वरूप का कार्य-परमात्मस्वरूप हो जाना मोक्ष है।

मोक्षावस्था सर्वांगीण पूर्णता, अनंत ज्ञान, अनंत सुख आदि की अवस्था है। जिस प्रकार मेघ के हटने से आकाश में सूर्य प्रकाशित होता है, उसी प्रकार मोक्ष की अवस्था में आत्मा अपनी पूर्णताओं को पुनः प्राप्त कर लेता है।

लेश्याएँ

लेश्याएँ वे विभिन्न दशाएँ हैं जो जीव में विभिन्न कर्मों के प्रभाव से उत्पन्न होती हैं। इस कारण वे जीव की अपेक्षा उन कर्मों पर निर्भर करती हैं जो आत्मा से सम्पृक्त होते हैं और जीवात्मा पर कर्मों को प्रकट करते हैं।

छः वर्णों के आधार पर प्राणियों को वर्गीकृत करने के विचार को पाश्र्वनाथ के छः जीव-निकायों के सिद्धांतों में परिलक्षित होता है। महाभारत के जीव-षटवर्णः से स्पष्ट है कि लेश्या वर्ण-सूचक शब्द है। शुद्धि और अशुद्धि की दृष्टि से छः लेश्याओं का वर्णन सूत्रकृतांग और उत्तराध्ययन में मिलता है। कृष्ण, नील, कपोत, तेज, पद्म और शुक्ल- इन छः लेश्याओं का क्रमशः नाम हैं।

जैन धर्म में शुद्ध लेश्या को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। कृष्ण, नील और कपोत, ये तीनों अशुद्ध, अधर्म लेश्याएँ हैं जिनसे जीव दुर्गति में उत्पन्न होता है। तेज, पद्म और शुक्ल शुद्ध, धर्म-लेश्या कही जाती हैं जिनके द्वारा जीव सुगति में उत्पन्न होता है। इन छओं लेश्याओं के अनुक्रम से तीन, नौ, सत्ताईस, इक्यासी और तैंतालिस प्रकार के परिणाम होते हैं। आचार्य वीरसेन ने षट्खंडागम की धवला टीका में एवं आचार्य अकलंक देव ने लेश्याओं पर 16 प्रकारों से चिंतन किया है।

अठारह पाप

जैन धर्म में निम्न 18 पापों की कल्पना की गई है- प्राणातिपात (हिंसा), मष्शावाद (असत्य), अदत्तादान (चोरी), मैथुन (अब्रह्मचर्य ), परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान (मिथ्या आरोप लगाना), पैशुन्य (चुगली), परपरिवाद (निन्दा करना ), रति-अरति (असंयम में रूचि व संयम में अरुचि), माया-मृषा (माया सहित झूठ बोलना ), मिथ्यादर्शन शल्य (विपरीत दर्शन में श्रद्धा)।

इन पापों में भेद वास्तव में पाप-तत्व के अनुसार नहीं, किंतु जिन कारणों से पाप-कर्मों का बंध होता है, उन कारणों के अनुसार 18 भागों में बाँटे गये है।

कायाक्लेश

जीव के भौतिक तत्व का दमन करने के लिए कायाक्लेश आवश्यक है, जिसके लिए तपस्या, व्रत, आत्महत्या करने का विधान है। नग्नता: 23वें तीर्थंकर पाश्र्व ने अपने अनुयायियों को वस्त्र धारण करने की अनुमति दी थी, परंतु महावीर पूर्ण नग्नता के समर्थक थे।

निवृत्तिमार्ग

जैन धर्म भी बौद्ध धर्म के समान निवृत्तिमार्गी है। संसार के समस्त सुख दुःखमूलक हैं। मनुष्य आजीवन तृष्णाओं के पीछे भागता रहता है। वास्तव में यह मानव शरीर ही क्षणभंगुर है। जैन धर्म इन दुःखों से छुटकारा पाने हेतु तृष्णाओं के त्याग पर बल देता है। वह मनुष्यों को संपत्ति, संसार, परिवार आदि सब का त्याग करके भिक्षु बनकर इतस्ततः परिभ्रमण करने पर बल देता है। दूसरे शब्दों में, जैन धर्म मूलतः एक भिक्षु धर्म ही है।

दसलक्षण धर्म

जैनग्रंथ समवायांग में भी श्रमणों के दस गुणों का वर्णन है। राग-द्वेष रहित आत्मा का सहज स्वभाव क्षमा, मृदुता, सरलता, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, औदासीन्य (आकिंचन्य) तथा ब्रह्मचर्य है। जैनों के अनुसार धर्म के इन दस लक्षणों एवं अंगों का पालन अति आवश्यक है। इनके पालन से आत्मा में कर्म का प्रवेश रुकता है।

क्रोध, मान, माया, लोभ ये चारों अन्तरात्मा के भयंकर दोष हैं। क्रोध को क्षमा से, मान को मार्दव से, माया को आर्जव से तथा लोभ को संतोष से जीतने का विधान है। प्राणी मात्र के कल्याण और सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से इन उत्तम धर्मों की सामाजिक प्रासंगिकता भी है।

क्षमा धर्म

क्रोध एक कषाय है, जो व्यक्ति को अपनी स्थिति से विचलित कर देती है। इस कषाय के आवेग में व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है और हिताहित का विवेक खोकर कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। क्रोध कषाय के स्वरूप को समझ लेना और उस पर विजय पा लेना ही क्षमा धर्म है।

उत्तम क्षमा को धारण करने से जीवन की समस्त कुटिलताएँ समाप्त हो जाती हैं तथा मानव का समस्त प्राणी जगत से एक अनन्य मैत्रीभाव जागृत हो जाता है।  मनीषियों ने कहा है कि क्रोध अज्ञानता से शुरू होता है और पश्चाताप से विचलित नहीं होना ही क्षमा धर्म है। क्षमाशील व्यक्ति व्यक्ति कंपरहित होकर क्रोधादि कषाय को नष्ट कर देता है।

भगवान् महावीर का कहना है कि मैं सभी से क्षमा-याचना करता हूँ। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत् हैं। मेरा किसी से भी बैर नहीं है। शत्रु-मित्र, उपकारक और अपकारक दोनों के प्रति जो समता भाव रखा जाता है वही साधक और सज्जन पुरुषों का आभूषण है।

शांति और समता आत्मा का स्वाभाविक धर्म है, जो कभी नष्ट नहीं हो सकता। यह बात अलग है कि कषाय का आवेग उसके स्वभाव को ढ़क देता है। पानी कितना भी गरम क्यों न हो, पर अंततः अपने स्वभाव के अनुरूप किसी न किसी अग्नि को बुझा ही देता है।

अज्ञानी प्राणी अपने इस धर्म को समझ नहीं पाता। कषायों के वशीभूत होकर संसार में भटकता रहता है। इसलिए अपने जीवन में क्षमा को धारण करना चाहिए और नित्य यह भावना रखनी चाहिए।

मार्दव धर्म

क्षमा के परिपाक एवं विकास के लिए ‘मार्दव’ का महत्व है। ‘मृदुता’ से समस्त जीवों पर मैत्री-भाव रखने एवं समस्त संसार के जीवों को समभाव से दखने की दृष्टि विकसित होती है। समस्त संसार (सभी जीवों) को समभाव से देखें। किसी को प्रिय और किसी को अप्रिय न बनावें।

मार्दव धर्म अपनाने से मान व अहंकार का मर्दन हो जाता है और व्यक्ति सच्ची विनयशीलता को प्राप्त करता है। जैसे फलों-फूलों से लदा हुआ पेड़, सहज ही झुक जाता है। वैसे ही गुणों के भार से आत्मा विनम्र होती है, झुक जाती है।

वस्तुतः ‘मार्दव’ से व्यक्ति के अंतःकरण के उस गुण का बोध होता है जिसमें वह किसी भी प्राणी के दुःख को देखकर सहजरूप से करुणा से अभिभूत हो जाता है, प्रत्येक प्राणी को वह आत्मतुल्य एवं समभाव की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त हो जाता है।

अध्यात्म-यात्रा की सबसे बड़ी रुकावट ‘मैं’ की है। भगवान् महावीर ने कहा है कि जिसे तू मारना चाहता है वह तू ही है, जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है; जिसे तू परिताप देना चाहता है, वह तू ही है। अहंकार से हम फूल तो सकते हैं, पर फैल नहीं सकते।

दया मार्दव धर्म का मूल है। यह सर्वहितकारी है, सब गुणों का सार है। इसलिए जहाँ मादर्व धर्म नहीं है, मृदुता नहीं है, वहाँ न संयम है, न कोई व्रत है।

मार्दव धर्म सब व्रतों का और संयम का आधार है। मार्दव धर्म आत्मा का परिणाम है तथा सम्यक दर्शन का अंग है।

आर्जव

क्रोध और मान के पश्चात् तीसरी कषाय है- माया। माया के विरुद्ध है आर्जव धर्म। आर्जव अर्थात् माया का अभाव। ‘आर्जव’ आत्म-संशोधन की भूमिका का निर्माण करता है, व्यक्ति के चरित्र एवं व्यवहार को निष्कपट बनाता है, कषायों के बंधनों को ऋजु कर विवेक की भूमिका प्रदान करता है तथा मिथ्या माया का आवरण हटा आत्मानुसंधान के रहस्य-द्वार के कपाट को थपथपाता है।

माया के विषय में भगवान् महावीर ने कहा है कि माया मित्रता को नष्ट कर देती है। ऋजुता से हृदय को पवित्र एवं शुद्ध किया जा सकता है और माया को जीत लेने से ऋजुता प्राप्त होती है। मनसा, वाचा, कर्मणा की एकरूपता ही इस धर्म की भाव, भाषा है। जैसे-जैसे मन का विकास होता है मन माया से आच्छादित होता जाता है और वही आच्छादित मन मारीच की माया का रूप लेता जाता है, किंतु सभी जानते हैं कि मारीच की माया ज्यादा टिकती नहीं है।

मन का मारीच यदि किसी मायाजाल को बुनता है तो अंत में उसे उसी में फँसकर मकड़ी की तरह प्राण गँवाना पड़ता है। आज पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परस्पर मैत्रीभाव उत्पन्न करने के लिए आर्जव गुण के सतत् अभ्यास की आवश्यकता असंदिग्ध है।

सत्य धर्म

मृदुता से समस्त जीवों पर मैत्री-भाव रखने एवं समस्त संसार के जीवों को समभाव से दखने की दृष्टि विकसित होती है। समस्त संसार (सभी जीवों) को समभाव से देखें। किसी को प्रिय और किसी को अप्रिय न बनावें। जब व्यक्ति क्रोध, अहंकार, माया-चारी एवं लोभ को नियंत्रित कर लेता है, तो सहज ही उसके जीवन में सत्य का अवतरण होता है।

सत्य को धारण करनेवाला हमेशा अपराजित, सम्मानीय एवं श्रद्धेय होता है। दुनिया का सारा वैभव उसके चरण चूमता है। फिर उसकी ऊर्जा कभी भी क्रोध आदि के रूप में विघ्वंसक रूप धारण नहीं करती। सत्य एवं ‘शौच’ का परस्पर अन्योन्याश्रित संबंध है। सत्य से शौच का मार्ग प्रशस्त होता है।

शौच धर्म

शौच धर्म पवित्रता का प्रतीक है। यह पवित्रता संतोष के माध्यम से आती है। जिस व्यक्ति ने अपने मन को निर्लोभी बना लिया है, सन्तोष धारण कर लिया है, उसका जीवन परमशांति को उपलब्ध हो जाता है।

भगवान् महावीर की घोषणा है कि धर्म के ही पवित्र अनुष्ठान से आत्मा का शुद्धिकरण होता है। शुद्धात्मा में ही धर्म स्थित रह सकता हैं। लोभ से इच्छा और इच्छा से तृष्णा बढ़ती है जिसकी पूर्ति कर पाना कभी संभव नहीं है। शौच का अर्थ शरीर के धरातल पर ‘स्वच्छता’, मन के धरातल पर ‘पवित्रता’ तथा आध्यात्मिक धरातल पर ‘आत्मशुद्धि’ है।

जो व्यक्ति समता भाव और संतोषरूपी जल से तृष्णा और लोभरूपी मल को धोता है, वही निर्मल शौच का धारक है, यह उत्तम शौच धर्म सुख के मार्ग का सहायक है। मोक्षपद का दायक है।

संयम धर्म

आध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा का गुण है, इसलिए आत्मानुशासन संयम है। इंद्रिय को वश में रखना इंद्रिय संयम है। जिस मनुष्य ने अपने जीवन में संयम धारण कर लिया है, उसका मनुष्य जीवन सार्थक है तथा सफल है।

संयमी व्यक्ति अपनी इच्छाओं, मनोविकारों एवं प्रवृत्तियों को नियंत्रित रखते हैं।  अनुत्तर योगी महावीर ने ‘अहिंसा संजमों तवो’ कहकर अहिंसा, संयम और तप को धर्म का मूलाधार माना है।

बुद्ध ने संयम के लिए अप्रमाद शब्द का प्रयोग किया है और प्रमाद को समस्त अधःपतन का मूल कारण बताया है।

भिक्षु को संयम का अभ्यास करना चाहिए। प्राज्ञ-पुरुष उद्योग, अप्रमाद, संयम और नियन्त्रण द्वारा ऐसा द्वीप बनाएँ, जिसे बड़ी बाढ़ भी न डुबो सके। संयम से जीव आश्रवों का निरोध करता है। उसी के पश्चात् पापों की निर्जरा कर पाता है। नाव में जब छेद हो जाता है तो उसमें पानी भरने लगता है। नाव को डूबने से बचाने के लिए पहले हम नाव का छेद बंद करते हैं। जल का प्रवेश होना बंद हो जाता है। इसके बाद आये हुए जल को नाव से बाहर निकालते हैं।

संयम के द्वारा आत्मा की नाव में इंद्रिय-सुखों की कामना रूपी जल को आने से रोकते हैं। पुनः तप द्वारा पूर्व-संचित जल रूपी कर्मों को जलाते हंै। आत्मा तपकर स्वर्ण की भाँति निखर उठती है।

तप धर्म

संसार में दो तरह के मार्ग हैं- एक साधनों का मार्ग है और एक साधना का मार्ग है। साधनों का मार्ग सुख सुविधा का मार्ग है और साधना का मार्ग स्वतंत्र स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है।

शास्त्रों में वर्णित बारह प्रकार के तप से जो मानव अपने तन मन जीवन को परिमार्जिन या शुद्ध करता है, उसके समस्त जन्मों के कर्म नष्ट हो जाते हैं।

‘तप’ ज्ञान एवं विवेक के साथ करना चाहिए। ज्ञान एवं विवेक से लक्ष्य का बोध होता है, साधक ‘तप’ द्वारा करोड़ों जन्मों के संचित कर्माें को नष्ट कर देता है।  तप व्यक्ति को भाग्यवादी नहीं बनाता, अपितु उसके पुरुषार्थ को जागृत करता है। तपस्वी-साधक अनुग्रह, अनुकंपा तथा दया की भीख नहीं माँगता। वह अपने ही पुरुषार्थ के बल पर उच्चतम् आध्यात्मिक विकास करता है।

तप आत्मशोधन का परम साधन है। अग्नि में तपने पर ही स्वर्ण में शुद्धता प्रकट होती है। धूप में फल पकते हैं तो उनमें मिठास आ जाती है, आँच में पकने पर भोजन स्वादिष्ट हो जाता है, अग्नि में पका हुआ कुंभ गर्मी में सबकी प्यास तो बुझाता ही है, सिर पर धारण किये जाने पर महान् सम्मान को भी पाता है। काले कोयले को स्वच्छ धवल बनाने का तरीका सिर्फ एक ही है कि उसे आँच में तपाया-जलाया जाए।

त्याग धर्म

त्यागना प्राणी का नैसर्गिक नियम है। वृक्ष में पत्ते, फल, फूल और वृक्ष उनका त्याग कर देता है। गाय जब तक अपने दूध का परित्याग नहीं कर देती उसे बेचैनी रहती है। संग्रह का विमोचन करने पर ही स्वस्थता और ताजगी आती है। यदि हमारे आगमन का द्वार खुला रहे और निकासी न हो तो रुका हुआ पानी सूख जाता है, सड़ जाता है।

जो वृक्ष अपने फलों को लुटाते हैं उनमें बार-बार फल आते हैं और जो अपने फलों को छिपाते हैं, वे समूल नष्ट हो जाते हैं। यह सारे प्रकृति के उदाहरण हमें त्याग करने की प्रेरणा देते हैं।  उत्तम त्याग करनेवाले व्यक्ति को मुक्ति सुंदरी स्वयंमेव वरण करती है तथा देवता भी उसे नमस्कार करते हैं। कहते हैं कि लोभ सद्गुणों का नाश कर देता है- ‘लोभो सव्व विणासण’।

जैनशास्त्रों में कहा गया है कि जो मुनि समताभाव और सन्तोषरूपी जल से तृष्णा और लोभ रूपी मल के पुंज को धोता है तथा भोजन में लालची नहीं होता, उसके निर्मल शौच-धर्म होता है।

संग्रह ही जीवन को दुखदायी बना देता है, जबकि त्याग जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाता है। जल का दान करनेवाले मेघ सदैव ही ऊपर रहते हैं और संग्रह करनेवाला समुद्र सदा ही नीचे रहता है।

ब्रह्मचर्य धर्म

ब्रह्मचर्य धर्म के पालनेवाले को मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति अवश्य ही होती है। क्षमा आदि-आठ धर्म-साधन रूप धर्म होते हैं, जिनके अंगीकार करने पर साध्य रूप धर्म ब्रह्मचर्य की उपलब्धि स्वयंमेव हो जाती है।  जब कोई साधक क्रोध, मान, माया, लोभ एवं पर-पदार्थों का त्याग आदि करते हैं और पर-पदार्थों से सम्बन्ध टूट जाने से जीव का अपनी आत्मा (जिसे ब्रह्म कहा जाता है) में ही रमण होने लगता है, इसे ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म कहा जाता है।

अंकिचन धर्म

आकिचन्य धर्म आत्मा की उस दशा का नाम है जहाँ पर बाहरी सब छूट जाता है किंतु आंतरिक संकल्प विकल्पों की परिणति को भी विश्राम मिल जाता है। जिस व्यक्ति ने अंदर बाहर 24 प्रकार के परिग्रहों का त्याग कर दिया है, वो ही परम समाधि अर्थात् मोक्ष सुख पाने का हकदार है। परिग्रह का परित्याग कर परिणामों को आत्मकेंद्रित करना ही अकिंचन धर्म की भावधारा है।

जैन धर्म के दसलक्षण धर्मों को अपने जीवन में अवतरित कर आत्मप्रक्षालन तथा पाप विमोचनकर मानव मुक्ति-पथ का पावन मार्ग प्रशक्तकर अपने जीवन का उद्धार कर सकता है तथा अजर-अमर पद निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है।