कार्कोट राजवंश (लगभग 625–855 ई.)
कार्कोट (कर्कोट) राजवंश कश्मीर का एक शक्तिशाली और प्रतिष्ठित वंश था, जिसने सातवीं शताब्दी के मध्य से लेकर नौवीं शताब्दी के मध्य तक कश्मीर घाटी तथा उसके आसपास के उत्तरी क्षेत्रों पर शासन किया। इस काल को कश्मीर के इतिहास में राजनीतिक विस्तार, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक उत्कर्ष के कारण ‘स्वर्णयुग’ माना जाता है।
कार्कोट राजवंश का संस्थापक दुर्लभवर्धन था, जिसके शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने कश्मीर का दौरा किया। दुर्लभवर्धन के उत्तराधिकारियों ने भी राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को बनाए रखा। चंद्रापीड के शासनकाल में कश्मीर को उत्तर-पश्चिम से बढ़ते अरब प्रभाव की चुनौती का सामना करना पड़ा, किंतु वह अपने राज्य की स्वतंत्रता और सुरक्षा करने में सफल रहा।
आठवीं शताब्दी में ललितादित्य मुक्तापीड के शासनकाल में कार्कोट साम्राज्य अपनी शक्ति और वैभव के चरम पर पहुँचा। उसके सैन्य अभियानों और कूटनीतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप कश्मीर का प्रभाव उत्तर-पश्चिम में मध्य एशिया और अफ़गानिस्तान के क्षेत्रों से लेकर दक्षिण और पूर्व में गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक फैल गया। उसके शासनकाल में कश्मीर और चीन के तांग साम्राज्य के बीच राजनयिक संबंध भी सुदृढ़ हुए तथा कश्मीरी दूत तांग दरबार तक पहुँचे।
कार्कोट काल केवल राजनीतिक उपलब्धियों के कारण ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कश्मीरी पहचान, धर्म, साहित्य, कला, वास्तुकला और बौद्धिक परंपराओं के विकास में भी इसका विशेष योगदान रहा है। इस युग में कश्मीर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया। शासकों ने विद्वानों, कवियों, दार्शनिकों और कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप कश्मीरी संस्कृति का सर्वांगीण विकास हुआ।
कार्कोट शासक मुख्यतः वैष्णव परंपरा से जुड़े थे, किंतु उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिसके कारण शैव, वैष्णव और बौद्ध परंपराओं का साथ-साथ विकास हुआ। कश्मीर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त स्तूपों, विहारों और मंदिरों के अवशेष इस धार्मिक समन्वय के प्रमाण हैं।
स्थापत्य कला के क्षेत्र में कार्कोट शासकों का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने अनेक मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और नगरों का निर्माण कराया। ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर तत्कालीन भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्ट उदाहरण है। अपनी भव्यता, कलात्मक उत्कृष्टता और स्थापत्य योजना के कारण यह मंदिर आज भी प्राचीन कश्मीर की सांस्कृतिक गौरव-गाथा का प्रतीक है।
नौवीं शताब्दी के मध्य तक कार्कोट वंश की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी। उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सामंती शक्तियों के बढ़ते प्रभाव ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया। अंततः 855 ईस्वी के लगभग अवंतिवर्मन के उदय के साथ उत्पल वंश की स्थापना हुई और कार्कोट शासन का अंत हो गया।
यद्यपि कार्कोट राजवंश का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया, फिर भी कार्कोट काल कश्मीर के इतिहास में अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और कलात्मक उपलब्धियों के कारण आज भी समादृत है।
ऐतिहासिक स्रोत
कार्कोट वंश के इतिहास की जानकारी मुख्यतः साहित्यिक, पुरातात्त्विक तथा विदेशी स्रोतों से प्राप्त होती है।
साहित्यिक स्रोत
कार्कोट वंश के इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी है, जिसमें कश्मीर के राजवंशों का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। नीलमत पुराण कश्मीर की प्राचीन परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश डालता है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण तत्कालीन कला, स्थापत्य, संगीत और चित्रकला के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसके अतिरिक्त कथासरित्सागर, कुट्टनीमतम्, हरविजय तथा विक्रमांकदेवचरित से भी कार्कोटकालीन समाज और संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है।
पुरातात्त्विक स्रोत
मार्तंड सूर्य मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों के अवशेष, अभिलेख, मूर्तियाँ तथा अन्य पुरातात्त्विक सामग्री कार्कोट काल की राजनीतिक, धार्मिक और कलात्मक उपलब्धियों का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। कार्कोट शासकों द्वारा जारी ताँबे और चाँदी के सिक्कों से तत्कालीन अर्थव्यवस्था, व्यापार तथा राजकीय उपाधियों के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
विदेशी स्रोत
चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग, यीजिंग, वुकोंग और ह्येचो के यात्रा-वृत्तांतों से तत्कालीन कश्मीर की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक स्थिति का ज्ञान होता है। चीन के तांग राजवंश के इतिहास-ग्रंथ ‘तांगशु’ में कार्कोट शासकों, विशेषकर चंद्रापीड और ललितादित्य मुक्तापीड का उल्लेख मिलता है। इसके साथ ही अल-बिरूनी की किताब-उल-हिंद भी कश्मीर के इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
इन साहित्यिक, पुरातात्त्विक और विदेशी स्रोतों के आधार पर कार्कोट वंश के राजनीतिक इतिहास, सांस्कृतिक उपलब्धियों तथा सामाजिक जीवन का पुनर्निर्माण किया जाता है।
कर्कोट वंश की उत्पत्ति
प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक राजवंश स्वयं को सूर्यवंश या चंद्रवंश से जोड़ते थे, किंतु कार्कोट शासक अपनी उत्पत्ति नागों से मानते थे। ‘कार्कोट’ नाम ही पौराणिक नागराज ‘कर्कोटक’ से उनके संबंध की ओर संकेत करता है। इस दावे के पीछे संभवतः प्राचीन कश्मीर में नागपूजा की गहरी परंपरा तथा नागों की उच्च धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठा थी। अनेक इतिहासकारों का मत है कि ‘नाग’ वास्तव में कश्मीर की प्राचीन स्थानीय जनजातियाँ थीं, जो सर्पपूजा करती थीं और जिन्हें घाटी का मूल निवासी माना जा सकता है। इसकी पुष्टि नीलमत पुराण के आख्यानों से भी होती है।
कर्कोट वंश की स्थापना
कार्कोट वंश के संस्थापक दुर्लभवर्धन (621–662 ईस्वी) था, जो कश्मीर के तत्कालीन गोनंद वंश (द्वितीय) के अंतिम शासक बलादित्य का सामंत था। राजतरंगिणी में दुर्लभवर्धन को एक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति बताया गया है, यद्यपि वह एक नीची जाति में उत्पन्न हुआ था। बालादित्य के कोई पुत्र नहीं था; उसकी केवल एक पुत्री अनंगलेखा थी। वह नहीं चाहता था कि उसके दामाद के कुल के लोग उसके राज्य पर अधिकार कर लें। इसलिए उसने अपनी पुत्री अनंगलेखा का विवाह दुर्लभवर्धन से कर दिया। बालादित्य की मृत्यु के बाद दुर्लभवर्धन ने एक प्रभावशाली मंत्री की सहायता से सिंहासन पर अधिकार कर लिया और अपनी वैधता तथा दैवीय मान्यता को सुदृढ़ करने के लिए स्वयं को पौराणिक नागराज ‘कर्कोटक’ का वंशज घोषित किया। इस प्रकार पौराणिक नाग देवता ‘कर्कोटक’ के नाम पर दुर्लभवर्धन के वंश का नाम ‘कार्कोट’ पड़ा, जो नागकुल से संबंधित था।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि कश्मीर में हूण शासन के पतन के बाद कर्कोट वंश का उदय हुआ। आत्रेयी बिस्वास के अनुसार कार्कोट वंश का वास्तविक संस्थापक दुर्लभक ‘प्रतापादित्य’ था, जिसने कश्मीर के अंतिम हूण शासक को पराजित करने के बाद सत्ता प्राप्त की। बिस्वास के मतानुसार दुर्लभवर्धन संभवतः हूण शासक नरेंद्रादित्य अथवा अंतिम हूण शासक युधिष्ठिर का अधीनस्थ सामंत रहा होगा। जो भी हो, कल्हण की राजतरंगिणी में दुर्लभवर्धन को ही कार्कोट वंश का संस्थापक बताया गया है।
कर्कोट वंश के शासक
दुर्लभवर्धन (लगभग 625-661 ई.)
कार्कोट वंश की स्थापना लगभग 625 ईस्वी में दुर्लभवर्धन ने की थी, जो मूल रूप से गोनंद वंश के अंतिम शासक बालादित्य का सामंत था। उसने गोनंद राजकुमारी अनंगलेखा से विवाह करने के बाद अपनी वैधता स्थापित करने के लिए स्वयं को पौराणिक नागराज ‘कार्कोटक’ का वंशज घोषित किया और कश्मीर में कार्कोट राजवंश की शुरुआत की।
राजतरंगिणी के अनुसार दुर्लभवर्धन को ‘प्रज्ञानादित्य’ (प्रजानादित्य) के नाम से भी जाना जाता था। उसे चीनी वृत्तांतों में ‘तु-लो-पो’ कहा गया है। प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने उसके शासनकाल में कश्मीर की यात्रा की थी। यद्यपि ह्वेनत्सांग कश्मीर की आंतरिक राजनीतिक स्थिति का कोई विशेष विवरण नहीं देता है, तथापि वह बताता है कि सिंधु नदी के पूर्व स्थित तक्षशिला प्रदेश, उरशा (हजारा अथवा एबटाबाद), सिंहपुर, पूँछ तथा राजापुर (राजौरी) कश्मीर राज्य के अधीन थे।
दुर्लभवर्धन के समय कश्मीर राज्य का विस्तार वर्तमान कश्मीर, पंजाब तथा खैबर-पख्तूनख्वा के कुछ भागों तक था। चीनी स्रोतों के अनुसार चीन से कि-पिन (काबुल) तक जाने वाले मार्ग पर उसका नियंत्रण था।
कल्हण के अनुसार दुर्लभवर्धन ने लगभग 36 वर्षों तक शासन किया। उसका शासनकाल लगभग 627 से 649 ई. तक माना जाता है।
दुर्लभक प्रतापादित्य (लगभग 662-712 ई.)
दुर्लभवर्धन का उत्तराधिकारी दुर्लभक हुआ, जिसने लगभग पचास वर्ष तक शासन किया। कल्हण के अनुसार वह अनंगलेखा का दौहित्र था और उसने अपनी माता के नाना के वंश के आधार पर ‘प्रतापादित्य द्वितीय’ की उपाधि धारण की थी। कुछ आधुनिक इतिहासकार प्रतापादित्य (दुर्लभक) को कर्कोट वंश का संस्थापक मानते हैं, जिसने हूण सत्ता को समाप्त कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी।
प्रतापादित्य के शासनकाल में कश्मीर में व्यापार, खेती और कला का उल्लेखनीय विकास हुआ। उसके ‘श्री प्रताप’ नाम वाले सिक्के उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले तक से पाए गए हैं, जो तत्कालीन समृद्ध व्यापार-वाणिज्य के प्रमाण हैं। प्रतापादित्य के शासनकाल में ही कश्मीर में मूर्तिकला की ‘कार्कोट शैली’ का विकास हुआ, जिसमें ग्रीक, बैक्ट्रियन, तिब्बती और गुप्त कला शैलियों का एक अनूठा मिश्रण था।
प्रतापादित्य ने श्रीनगर के पश्चिम में प्रतापपुर (तापर) नामक एक नए नगर की स्थापना की और मल्हानस्वामी मंदिर का निर्माण कराया। 1940 के दशक में इस स्थल के किए गए उत्खनन से प्रतापादित्यकालीन विशाल मंदिरों और भवनों की जानकारी मिली है।
प्रतापादित्य का विवाह नरेंद्रप्रभा से हुआ था, जो पहले दुर्लभवर्धन की रानी थी। नरेंद्रप्रभा ने नरेंद्रेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।
प्रतापादित्य का शासनकाल सामान्यतः 662 ई. से 712 ई. तक माना जाता है।
प्रतापादित्य के उत्तराधिकारी
प्रतापादित्य की रानी नरेंद्रप्रभा से तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे— चंद्रापीड (वज्रादित्य प्रथम), तारापीड (उदयादित्य) और मुक्तापीड (ललितादित्य), जो प्रतापादित्य के पश्चात् क्रमशः कश्मीर के राजा बने। इनमें उसका सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध पुत्र ललितादित्य मुक्तापीड था, जिसे कश्मीर का सबसे महान शासक माना जाता है और जिसने प्रसिद्ध मार्तण्ड सूर्य मंदिर का निर्माण करावाया था।
चंद्रापीड वज्रादित्य (712-720 ई.)
दुर्लभक प्रतापादित्य के बाद उसका बड़ा पुत्र चंद्रापीड शासक बना, जिसे ‘वज्रादित्य’ प्रथम के नाम से भी जाना जाता था। वह अपने न्यायप्रिय, उदार और प्रजापालक स्वभाव के लिए प्रसिद्ध था। जयंत भट्ट के परदादा शक्तिस्वामी उनके मंत्रियों में से एक थे।
चंद्रापीड के शासनकाल में कश्मीर के कार्कोट राज्य को दो तरफ से खतरों का सामना करना पड़ा- पश्चिम में अरबों की बढ़ती शक्ति से और पूर्व में तिब्बतियों से।
चंद्रापीड के शासनकाल में 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम की सेनाओं ने सिंध पर आक्रमण किया और पूर्व की ओर विस्तार करने का प्रयास किया। संभवतः उसने कश्मीर पर भी आक्रमण करने का प्रयास किया था, किंतु इसकी पुष्टि किसी ठोस प्रमाण से नहीं होती है।
चंद्रापीड को तिब्बतियों की भी आक्रामक नीतियों का सामना करना पड़ा। बाल्टिस्तान और लद्दाख से होकर गुजरने वाले मार्ग तिब्बत, शिनजियांग और कश्मीर को जोड़ते थे, जो व्यापार और संचार की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे और उन पर नियंत्रण के लिए विभिन्न शक्तियों के बीच निरंतर विवाद होता रहता था। इनमें तिब्बत सबसे शक्तिशाली था, जिसने कई प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण कर लिया था।
चंद्रापीड ने अरबों और तिब्बतियों के विरुद्ध सहायता की तलाश में 713 ईस्वी और फिर 720 ईस्वी में चीन में सम्राट शुआनजोंग के पास प्रतिनिधिमंडल भेजा। चीन के तांग राजवंश के इतिहास में कश्मीर के राजा का नाम चेन-टो-लो-पी-II (चंद्रापीड) मिलता है। इसके उत्तर में 720 ईस्वी में चीनी सम्राट ने एक दूत भेजकर चंद्रापीड को विधिवत् ‘कश्मीर का राजा’ की उपाधि प्रदान की। संभवतः चंद्रापीड को चीन से कोई सैन्य सहायता नहीं मिली, फिर भी उसने आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया और अपने राज्य की रक्षा की।
कल्हण ने चंद्रापीड को एक गुणी और पुण्यात्मा शासक बताया गया है। राजतरंगिणी के अनुसार एक बार उसने त्रिभुवनस्वामी का मंदिर बनवाने का निश्चय किया। किंतु मंदिर के लिए चुने गए स्थान पर एक चर्मकार की कुटिया थी और उसने वह स्थान खाली करने से इनकार कर दिया। अंततः चंद्रापीड ने उसके घर जाकर निवेदन किया और उचित मूल्य देकर वह स्थान प्राप्त किया। यह कथा चंद्रापीड की न्यायप्रियता और विनम्रता का परिचायक है।
चंद्रापीड संस्कृत के महान् कवि बाणभट्ट की रचना ‘कादंबरी’ का नायक भी है। साहित्यिक प्रसंगों में अकसर उसे भगवान शिव के नाम या एक आदर्श राजकुमार और नायक के रूप में याद किया जाता है।
लगभग नौ वर्षों के शासन के बाद 720 ई. में चंद्रापीड अपने भाई छोटे भाई तारापीड के षड्यंत्र का शिकार हो गया। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार उसके तारापीड ने एक तांत्रिक (ब्राह्मण) की सहायता से तांत्रिक क्रिया अथवा जादू-टोने के द्वारा गुप्त रूप से उसकी हत्या करवा दी।
चंद्रापीड का शासनकाल लगभग 712 से 720 ई. माना जाता है।
तारापीड उदयादित्य (लगभग 720-724 ई.)
चंद्रापीड की मृत्यु के बाद उसका भाई तारापीड कश्मीर के कार्कोट राजवंश का राजा हुआ, जिसे ‘उदयादित्य’ भी कहा जाता था। राजतरंगिणी में उसके शासन के बारे में बहुत कम सूचना मिलती है, सिवाय इसके कि वह क्रूर शासक था और ब्राह्मणों पर अत्याचार करता था। कल्हण के शब्दों में, उसके शासनकाल में ‘शहर और कस्बे उत्पीड़ित निवासियों द्वारा छोड़ दिए गए थे, जो राजा और उसके साथियों के अत्याचारों से बचने के लिए जंगलों और पहाड़ियों में भाग गए थे।’
लगभग चार वर्षों तक कश्मीर पर शासन करने के बाद उसके अत्याचारों से त्रस्त ब्राह्मणों ने तांत्रिकों द्वारा जादू-टोने से उसकी हत्या करवा दी और फिर कार्कोट वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक ललितादित्य मुक्तापीड कश्मीर के सिंहासन पर आसीन हुआ।
तारापीड उदयादित्य का शासनकाल लगभग 720 से 724 ई. माना जा सकता है।
मुक्तापीड ललितादित्य (724-760 ई.)
मुक्तापीड ललितादित्य कश्मीर के कार्कोट राजवंश का सबसे महान् और शक्तिशाली शासक था। चीन के तांग अभिलेखों में ललितादित्य मुक्तापीड को मु-तो-पी (मुक्तापीड) कहा गया है। उसके शासनकाल में कश्मीर ने अभूतपूर्व राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक विकास का साक्षात्कार किया। उसकी अजेय सैन्य क्षमता और विशाल साम्राज्य के कारण उसे ‘कश्मीर का सिकंदर’ और ‘कश्मीर का नपोलियन’ भी कहा जाता है।
ललितादित्य के शासनकाल को ‘कश्मीर का स्वर्णयुग’ माना जाता है, जब कला, वास्तुकला, संस्कृति और ज्ञान का सर्वांगीण विकास हुआ। मार्तंड स्थित सूर्य मंदिर के खंडहर और ‘पत्थरों का शहर’ परिहासपुर (परिहासपोर) कश्मीर के इस महानतम् राजा की विरासत के अवशेष मात्र हैं।
ललितादित्य के राज्यारोहण की तिथि के संबंध में मतभेद है। चीनी तथा कश्मीरी स्रोतों के आधार पर अधिकांश इतिहासकार ललितादित्य मुक्तापीड का राज्यारोहण लगभग 724 ई. के आसपास मानते हैं। राज्यारोहण के बाद उसने अपनी मान्यता के लिए चीनी सम्राट के दरबार में एक दूतमंडल भेजा था। उसके समय में कई ब्राह्मण अप्रवासी कश्मीर लाए गए थे, जिनमें अभिनवगुप्त के पूर्वज भी शामिल थे। इस प्रकार ललितादित्य मुक्तापीड ने लगभग 724 ईस्वी से 761 ईस्वी तक तक शासन किया।
सैन्य उपलब्धियाँ और साम्राज्य विस्तार
ललितादित्य मुक्तापीड को कल्हण ने राजतरंगिणी में ‘विश्व विजेता’ के रूप में वर्णित किया है और उसे भारत, अफ़गानिस्तान तथा मध्य एशिया के विस्तृत क्षेत्रों की विजय का श्रेय दिया है। संभवतः सिंधु-गंगा के मैदान में गुप्त साम्राज्य के पतन और मध्य एशिया में शक्ति-संतुलन के परिवर्तन ने उसे अपने साम्राज्य के व्यापक विस्तार का अवसर प्रदान किया। उसने कन्नौज के यशोवर्मन, तिब्बतियों, तुर्कों तथा अन्य उत्तर-पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध सफल अभियान चलाकर कार्कोट साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार किया।
ललितादित्य की सैन्य सफलताओं का एक कारण उसकी सेना का संगठन और नवीन युद्ध-तकनीकों का प्रयोग माना जाता है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि उसने अपनी सेना में बड़ी संख्या में भाड़े के चीनी सैनिकों और रणनीतिकारों को सम्मिलित किया था। उसका प्रमुख सेनापति और रणनीतिकार कान्कुन्य था, जो संभवतः चीनी मूल का था क्योंकि चीनी भाषा में ‘कैन-किउन’ का अर्थ ‘सेनापति’ होता है। इससे लगता है कि ललितादित्य ने चीनी सैन्य अनुभवों और तकनीकों का लाभ उठाया था।

कन्नौज के यशोवर्मन पर विजय
ललितादित्य ने सबसे प्रसिद्ध अभियान उत्तर भारत के शक्तिशाली शासक यशोवर्मन (700-740 ई.) के विरुद्ध किया। लगभग 733 ईस्वी के आसपास उसने कन्नौज के शक्तिशाली शासक यशोवर्मन को पराजित किया। यशोवर्मन की पराजय के बाद पंजाब, कांगड़ा और कन्नौज पर ललितादित्य का सीधा नियंत्रण स्थापित हो गया।
दक्षिणी और पूर्वी भारत में अभियान
राजतरंगिणी के अनुसार यशोवर्मन को पराजित करने के बाद ललितादित्य ने गौड़ (बंगाल) पर आक्रमण किया, जहाँ गौड़देश के शासक ने हाथियों की भेंट देकर उसकी अधीनता स्वीकार की। लगभग 735–736 ईस्वी में ललितादित्य दक्कन की ओर बढ़ा क्योंकि वह उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाले महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग ‘दक्षिणापथ’ पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता था।
कल्हण के अनुसार उसने राष्ट्रकूटों पर आक्रमण किया और कर्णाट देश की रानी रट्टा को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य करते हुए कावेरी नदी तक पहुँच गया। वहाँ से पश्चिम की ओर बढ़कर उसने सप्तकोंकणों को जीता और द्वारका तक अपना प्रभाव स्थापित किया। तत्पश्चात् वह अवंति के मार्ग से उत्तर की ओर लौट आया। यद्यपि दक्षिण भारत में वह स्थायी राजनीतिक नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका, फिर भी इन अभियानों से उसे पर्याप्त धन-संपदा और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
उत्तर-पश्चिम और मध्य एशिया में अभियान
ललितादित्य को सिंध की ओर से होने वाले अरब आक्रमणों को रोकने का श्रेय भी दिया जाता है। कल्हण के अनुसार काबुल के शाही राजकुमार उसके दरबार में सेवा करते थे। शाही शासक अरबों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित थे, इसलिए संभव है कि ललितादित्य ने सिंधु क्षेत्र की ओर बढ़कर अरबों के प्रभाव को रोकने का प्रयास किया हो।
कल्हण का दावा है कि ललितादित्य ने सैन्य अभियान चलाकर मध्य एशिया (तुर्किस्तान) तथा कैस्पियन सागर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया और ‘रेशम मार्ग’ पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। किंतु इस दावे का कोई और ठोस प्रमाण नहीं है।
तिब्बत के विरुद्ध अभियान
लगभग 747 ईस्वी में ललितादित्य को अपने पुराने शत्रु तिब्बतियों से निपटना पड़ा। तिब्बतियों ने एक विशाल सेना के साथ कश्मीर पर आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप उसे चीन के तांग सम्राट से सहायता माँगनी पड़ी। तांग राजवंश के इतिहास से ज्ञात होता है कि कश्मीर के राजा मो-तो-पी (ललितादित्य मुक्तापीड) के दूत तिब्बतियों के विरुद्ध सहयोग माँगने के लिए चीनी दरबार में पहुँचे थे। कहा जाता है कि उसने तिब्बत पर संयुक्त आक्रमण का प्रस्ताव भी रखा था, किंतु संभवतः उसे चीन से प्रत्यक्ष सैन्य सहायता नहीं मिल सकी। इसके बावजूद वह तिब्बतियों के विरुद्ध संघर्ष में सफल रहा। कल्हण के अनुसार चैत्र मास के दूसरे दिन कश्मीरियों ने तिब्बतियों पर विजय की स्मृति में विजय दिवस मनाया था।
अन्य विजयें
कल्हण ने ललितादित्य को कंबोज, तुखार, मुम्मुनि (संभवतः अरबों की किसी शाखा), भोट (तिब्बती), दरद, प्राग्ज्योतिष, स्त्रीराज्य तथा उत्तरकुरु पर भी की विजयों का श्रेय दिया है। यद्यपि इन अभियानों की ऐतिहासिकता को पूर्णतः स्वीकार करना कठिन है, फिर भी उन्हें पूरी तरह काल्पनिक नहीं माना जा सकता। कल्हण अन्य दरबारी कवियों की भाँति पूर्णतः अनैतिहासिक नहीं था और उसके अनेक विवरणों की पुष्टि अन्य स्रोतों से भी होती है। संभव है कि उसके कुछ वर्णनों में अतिशयोक्ति का समावेश हो, विशेषकर दक्षिण भारत और मध्य एशिया से संबंधित दूरवर्ती विजयों के संदर्भ में। फिर भी तुखारों (तुर्कों) पर उसकी विजय की स्मृतियाँ अलबेरूनी के समय तक कश्मीर में प्रचलित थीं।
साम्राज्य-विस्तार
अपनी व्यापक विजयों के कारण ललितादित्य अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली भारतीय शासक बन गया और पहली बार कश्मीर को उत्तरी भारत की एक सर्वोच्च और अपराजेय शक्ति होने का गौरव मिला। उसके शासनकाल में कार्कोट साम्राज्य की सीमाएँ कश्मीर घाटी से निकलकर उत्तर-पश्चिम के पर्वतीय क्षेत्रों, तिब्बत तथा उत्तरी और मध्य भारत के विशाल भूभाग तक फैल गईं। उसका प्रभाव बंगाल, कलिंग तथा दक्षिण में कावेरी नदी तक विस्तृत हो गया। राजतरंगिणी से स्पष्ट होता है कि उसने कश्मीरी जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा और उसकी वीरता तथा दिग्विजयों से संबंधित अनेक अनुश्रुतियाँ लंबे समय तक प्रचलित रहीं। इसी कारण अनेक इतिहासकारों ने ललितादित्य को ‘कश्मीर का सिकंदर’ और ‘कश्मीर का नेपोलियन’ कहा है।
ऐसा प्रतीत होता है कि अपार भौतिक एवं राजनीतिक शक्ति ने ललितादित्य को कुछ सीमा तक मदांध बना दिया था। मंत्रियों तथा अधिकारियों का उस पर पूर्ववत् नियंत्रण नहीं रह गया था। मद्यपान के प्रभाव में प्रवरपुर नगर को जलाने की आज्ञा देना और गौड़देश के राजा को कश्मीर बुलाकर विश्वासघातपूर्वक उसकी हत्या करवा देना उसकी उपलब्धियों पर कलंक हैं।
वास्तुकला और कला को संरक्षण
ललितादित्य एक महान् विजेता होने के साथ-साथ प्रजापालक, महान् निर्माता और कला तथा संस्कृति का संरक्षक भी था। कहा जाता है कि उसने कश्मीर घाटी की दलदली भूमि को सुखाकर उसे उपजाऊ बनाया था। उसने कृषि और सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक नहरों का निर्माण कराया। राजतरंगिणी के अनुसार, जल-सिंचन के उद्देश्य से जल-चक्रों की स्थापना भी कराई गई, जिससे कृषि क्षेत्र का विस्तार हुआ और राज्य की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि हुई।
ललितादित्य एक महान् निर्माता और शिक्षा-साहित्य का संरक्षक भी था। उसने अपने विदेशी अभियानों की स्मृति में सुनीश्चात्पुर और दर्पितापुर जैसे अनेक नगरों की स्थापना की, यद्यपि आज इन नगरों के कोई अवशेष नहीं मिलते हैं। उसे जम्मू-कश्मीर में पुलवामा के पास ललितपुर (लेतापुर) नगर की स्थापना का श्रेय भी दिया जाता है, जहाँ उसने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। हुश्कापुर (उश्कुर) में उसने एक विशाल विहार और एक बौद्ध मंदिर बनवाया था।
कल्हण ने ललितादित्य के द्वारा निर्मित अनेक महलों, भवनों और मंदिरों का उल्लेख किया है। उसने राजनिवास ‘मुस्कानों का नगर’ परिहासपुर (परिहासपोर) स्थानांतरित किया और वहाँ एक महल, मंदिर और एक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया। परिहासपुर की भव्यता का वर्णन करते हुए कल्हण ने लिखा है कि यह ‘भगवान इंद्र’ की राजधानी के समकक्ष थी। उसका दावा है कि वहाँ अन्य मूर्तियों के साथ-साथ 36 टन चाँदी की विष्णु प्रतिमा और 62 टन ताँबे की बुद्ध प्रतिमा भी थीं।
ललितादित्य ने अनंतनाग से कुछ दूर झेलम नदी के किनारे एक पठार पर मार्तंड का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर बनवाया, जो भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इस मंदिर में एक मुख्य गर्भगृह था, जिसके चारों ओर 84 छोटे-छोटे गर्भगृह थे। इसमें गांधार, गुप्त, चीनी, रोमन और यहाँ तक कि ग्रीक जैसी स्थापत्य शैलियों का मिश्रण है।

उसने बौद्ध भिक्षुओं तथा बौद्ध संस्थानों के प्रति भी उदार था और भवभूति तथा वाक्पतिराज जैसे विद्वानों को कश्मीर आमंत्रित किया, जिससे संस्कृत साहित्य और शिक्षा का अभूतपूर्व विकास हुआ। वास्तव में, उसका शासनकाल कश्मीर के इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ था।
ललितादित्य की मृत्यु के विषय में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी पर्वतीय प्रदेश में सैन्य-अभियान के दौरान वह अपनी सेना से बिछुड़ गया और हिमाच्छादित क्षेत्र में फँसकर शीत के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
ललितादित्य मुक्तापीड ने लगभग 724 ई. से 760 ई. तक लगभग सैंतीस वर्ष तक शासन किया।
ललितादित्य के उत्तराधिकारी
ललितादित्य मुक्तापीड की कम-से-कम दो प्रमुख रानियाँ- कमलादेवी और चक्रमर्दिका थीं, जिनसे उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे- पहली रानी कमलादेवी से कुवलयापीड और दूसरी रानी चक्रमर्दिका से वज्रादित्य (बप्पियाक)।
कुवलयापीड (लगभग 760-761 ई.)
ललितादित्य मुक्तापीड के बाद उसकी पहली रानी कमलादेवी का ज्येष्ठ पुत्र कुवलयापीड लगभग (760-761 ई.) कश्मीर की गद्दी पर बैठा, जो शांत स्वभाव और धर्म-कर्म में लीन रहने वाला राजा था। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार कुवलयापीड का मन सांसारिक और राजनीतिक मामलों में कम, बल्कि आध्यात्मिक और वैराग्य की ओर अधिक था। केवल एक वर्ष शासन करने के बाद उसने राजगद्दी त्यागकर संन्यास धारण कर लिया। संभवतः सौतेले छोटे भाई वज्रादित्य (संग्रामपीड) के षड्यंत्रों और गृहयुद्ध से बचने के लिए उसने संन्यास ग्रहण किया था। कुवलयापीड के पश्चात् वज्रादित्य (बप्पियाक) राजा बना।
वज्रादित्य बप्पियाक (लगभग 760- 767 ई.)
वज्रादित्य (बप्पियाक) ललितादित्य मुक्तापीड (प्रथम) की दूसरी रानी चक्रमर्दिका का पुत्र था, जिसे ‘ललितादित्य द्वितीय’ भी कहा जाता है।
ऐतिहासिक ग्रंथों में वज्रादित्य को एक क्रूर और दुराचारी शासक के रूप में वर्णित किया गया है। उसने अपने पिता ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा बनवाए गए परिहासपुर शहर के कई निर्माणों और संपत्तियों को नष्ट करके लूटा। उसके शासनकाल के दौरान जनता को बहुत धार्मिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। राजतरंगिणी के अनुसार उसके शासन में कश्मीर में ‘म्लेच्छों’ (विदेशी आक्रमणकारियों) की कुरीतियाँ आईं। अपने अनैतिक और विलासी जीवन के कारण वह क्षय रोग का शिकार हो गया और सात वर्ष शासन करने के बाद लगभग 767 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
वज्रादित्य की कम से कम चार रानियाँ थीं- मेघावली, अमृतप्रभा, मंजरिका और मम्मा। उसके चार पुत्र थे- मेघावली से त्रिभुवनपीड, अमृतप्रभा से जयापीड, मंजरिका से पृथ्वीपीड प्रथम और मम्मा से संग्रामपीड प्रथम। चूंकि त्रिभुवनपीड सबसे बड़े होने के बावजूद राजगद्दी छोड़ चुके थे, इसलिए पृथिव्यापीड, संग्रामपीड (प्रथम) तथा जयापीड क्रमशः कश्मीर की गद्दी पर बैठे।
कल्हण के अनुसार पृथ्वीपीड ने चार साल और एक महीने तक राज किया। पृथ्वीपीड को संग्रामपीड प्रथम ने गद्दी से हटा दिया, किंतु वह मात्र सात दिनों तक शासन कर सका। इन शासकों के संबंध मे कोई और प्रमाण नहीं मिलता है।
मुस्लिम इतिहासकार अल-बलाधुरी के अनुसार खलीफा के सिंध-स्थित गवर्नर हिशाम (768–772 ई.) ने कश्मीर पर आक्रमण कर अनेक लोगों को बंदी लिया और गुलामों का व्यापार शुरू किया। संभवतः यह आक्रमण कार्कोट वंश के इन्हीं दुर्बल शासकों में से के शासनकाल में हुआ था। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ‘कश्मीर’ से अभिप्राय पंजाब के उस उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र से है, जो मुल्तान के ऊपर स्थित था और जिस पर अरबों ने क्रमशः अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।
जयापीड विनयादित्य (लगभग 770-801 ई.)
जयापीड अपने पिता और भाइयों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और प्रतापी शासक था, जो ‘विनयादित्य’ के नाम से जाना जाता था। उसने ललितादित्य मुक्तापीड की शक्ति और प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। संभवतः यही कारण है कि कल्हण ने उसकी तुलना उसके दादा ललितादित्य मुक्तापीड से की है। उसके अनेक सिक्के कश्मीर के विभिन्न भागों से प्राप्त हुए हैं, जो उसके ऐतिहासिक अस्तित्व और राजनीतिक महत्त्व की पुष्टि करते हैं।

कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार जयापीड एक कुशल सेनानायक था। राज्यारोहण के कुछ समय बाद ही वह दिग्विजय के लिए निकल पड़ा और उसने पूर्व में पंचगौड़ों को पराजित किया और नेपाल के राजा अरमुडि के साथ युद्ध किया।
राजधानी से जयापीड की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसके साले जज्ज ने कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि जज्ज का प्रभाव जयापीड की सेना पर भी पड़ा, जिसके कारण उसके अनेक सैनिक धीरे-धीरे उसका साथ छोड़कर जज्ज के पक्ष में चले गए। इस परिस्थिति में जयापीड को अपनी पहचान छिपाकर गंगा के तटवर्ती मार्ग से होते हुए पुंड्रवर्धन (उत्तरी बंगाल) तक जाना पड़ा। वहाँ उसने कूच बिहार के राजा जयंत की बेटी कल्याणदेवी से विवाह किया और जयंत के राजनीतिक समर्थन से अपनी खोई हुई सत्ता पुनः प्राप्त करने की योजना बनाई।
कश्मीर लौटते समय उसके कुछ पुराने और निष्ठावान सैनिक पुनः उसके साथ आ मिले, जिससे उसकी सैन्य शक्ति में बढ़ गई। मार्ग में उसने संभवतः कन्नौज के राजा वज्रायुध (वज्रादित्य) को पराजित किया। इसके बाद उसने कश्मीर पहुँचकर जज्ज को युद्ध में हराया और पुनः सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
कल्हण के विवरण से यह संकेत मिलता है कि जयापीड अपनी प्रथम दिग्विजय यात्रा में कन्नौज के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य पर विजय प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका था और जज्ज के विद्रोह के कारण उसे अपने अभियानों को बीच में ही छोड़कर कश्मीर लौटना पड़ा था।
कल्हण ने जयापीड की दूसरी दिग्विजय यात्रा का भी वर्णन किया है और दावा है कि जयापीड ने उत्तर भारत के प्रयाग (इलाहाबाद) तक के सभी राज्यों को अपने अधीन कर लिया था और वहाँ उसने पुरोहितों को 10,000 घोड़े दान में दिए थे। किंतु इसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि उसके द्वारा पराजित बताए गए राजाओं की पहचान स्पष्ट रूप से नहीं की जा सकी है।
कल्हण का दावा है कि जयापीड कला और साहित्य का महान् संरक्षक था। उसने कई नगरों का निर्माण करवाया, जिनमें वुलर झील के पास जयपुर और झेलम नदी के बाएं किनारे पर स्थित मलहनपुर (वर्तमान मालूर) शामिल हैं। जयापीड ने बौद्ध विहारों और बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण करवाया तथा जयापुर (अंद्रकोट) नामक नई राजधानी बसाई। उसकी दो रानियों कल्याणदेवी और कमलादेवी ने क्रमशः कल्याणपुर (वर्तमान कलामपुर) और कमलापुर की स्थापना की थी। जयापीड के शासनकाल में उसकी रखैल जयादेवी के पाँच भाइयों ने जयेश्वर नामक शिवमंदिर का निर्माण करवाया था।
जयापीड ने विदेशों से विद्वानों को आमंत्रित किया और मनोरथ, शंखदंत, चातक और समधिमत जैसे कवि और लेखक उसके दरबार की शोभा थे। उसके मंत्रियों में वामन भी था, जो पाणिनी के व्याकरण पर लिखी गई प्रसिद्ध टीका काशिकावृत्ति के दो लेखकों में से एक था। दामोदरगुप्त ने अपने प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक काव्य कुट्टनीमतम् की रचना जयापीड के दरबार में ही की थी। जयापीड के संरक्षण में ही कवि रत्नाकर ने संस्कृत महाकाव्य हरविजय की रचना की थी।
कल्हण के अनुसार जयापीड ने अनेक अच्छे कार्य किए, किंतु अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वह धनलोलुपऔर अत्याचारी हो गया। उसने राज्य की आय बढ़ाने के लिए लगातार तीन वर्षों तक किसानों से भारी कर वसूल किया, जिससे त्रस्त होकर बड़ी संख्या में किसान कश्मीर घाटी छोड़कर जाने लगे। अग्रहारों को खत्म करने और ब्राह्मणों पर कर लगाने को लेकर उसका ब्राह्मणों के साथ विवाद हुआ और तुलमूल गाँव के एक ब्राह्मण ने उसे मृत्यु का श्राप दिया। कुछ दिनों बाद एक खंभा गिरने से जयापीड गंभीर रूप से घायल हो गया और कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।
जयापीड का शासनकाल सामान्यतया 770 से 801 ई. तक माना जाता है।
जयापीड के उत्तराधिकारी और कार्कोट वंश का अवसान
जयापीड के दो पुत्र थे—रानी दुर्गा से ललितापीड और कल्याणदेवी से संग्रामपीड द्वितीय। किंतु उसके उत्तराधिकारी कमजोर और अयोग्य सिद्ध हुए, जिससे कार्कोट वंश की शक्ति निरंतर क्षीण होती गई।
ललितापीड (801-813 ई.)
जयापीड के पुत्र ललितापीड (801-813 ई.) ने अपना अधिकांश समय अपने पिता द्वारा अर्जित संपत्ति के अपव्यय में व्यतीत कर दिया, जिससे केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगी। कल्हण ने भी ललितापीड को एक अपव्ययी शासक बताया है, जिसका दरबार वेश्याओं, रखैलों तथा विदूषकों से भरा था।
ललितापीड ने 801 ई. से लेकर 813 ई. तक लगभग बारह वर्षों तक शासन किया।
संग्रामपीड द्वितीय (813-821 ई.)
कल्हण के अनुसार ललितापिड के बाद उसका सौतेला भाई संग्रामपीड द्वितीय कश्मीर का राजा हुआ, जिसे ‘पृथ्वीपीड द्वितीय’ के नाम से भी जाना जाता है। संग्रामपीड ने लगभग 813 ई. से 821 ई.तक आठ वर्षों तक शासन किया।
संग्रामपीड द्वितीय के बाद अल्पव्यस्क पुत्र चिपटजयापीड (वृहस्पति) को 837-38 में राजा बनाया गया, जो ललितापीड की रखैल रानी जयादेवी से उत्पन्न हुआ था।
चिपटजयापीड (वृहस्पति) के अल्पायु होने के कारण जयादेवी के पाँच प्रभावशाली भाइयों- पद्म, उत्पल, कल्याण, मम्म और धर्म ने शासन पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। लगभग 840 ईस्वी में चिपटजयापीड के मामाओं ने उसकी हत्या कर दी और उत्पल ने भुवनपीड के पुत्र अजीतपीड को राजा बनाया।
कुछ वर्ष बाद मम्मा ने उत्पल के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और अजीतपीड को हटाकर अनंगपीड को सिंहासन पर स्थापित किया। तीन वर्ष बाद उत्पल के बेटे सुखवर्मन ने विद्रोह किया और अनंगपीड को पदच्युत कर अजीतपीड के बेटे उत्पलपीड को राजा बनाया।
कई वर्षों की राजनीतिक उथल-पुथल और अराजकता के बाद लगभग 855–856 ई. में शूर नामक शक्तिशाली प्रधानमंत्री ने उत्पलपीड को गद्दी से हटाकर अवंतिवर्मन नामक एक शक्तिशाली स्थानीय गवर्नर को कश्मीर का राजा बनाया, जिसने उत्पल वंश की स्थापना की। इस प्रकार अवंतिवर्मन द्वारा उत्पल वंश की स्थापना के साथ कार्कोट वंश के शासन का अंत हो गया।
कार्कोट राजवंश का पतन
ललितादित्य मुक्तापीड और जयापीड जैसे शक्तिशाली शासकों के शासनकाल के बाद कार्कोट साम्राज्य का क्रमिक पतन आरंभ हुआ। सिंहासन के उत्तराधिकार को लेकर लगातार होने वाले संघर्षों ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया। उत्तरवर्ती शासकों में प्रायः सुदृढ़ नेतृत्व का अभाव था, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ी और केंद्रीय नियंत्रण शिथिल होता गया।
दरबारी गुटों, सामंतों तथा प्रभावशाली मंत्रियों का राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप बढ़ने लगा, जिससे राजसत्ता का अधिकार निरंतर क्षीण होता गया। केंद्रीय शासन की पकड़ कमजोर पड़ते ही दूरस्थ क्षेत्रों ने अधिक स्वायत्तता प्राप्त कर ली और राज्य की एकता प्रभावित हुई। इसी समय दरदों तथा तिब्बतियों जैसी पड़ोसी शक्तियों के आक्रमणों और दबावों ने भी कश्मीर की राजनीतिक स्थिति को अस्थिर बनाया।
राज्य के भीतर प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा अपने समर्थक शासकों को सिंहासन पर बैठाने के प्रयासों से राजसत्ता निरंतर संकटग्रस्त रही। कई शासकों को षड्यंत्रों के माध्यम से पदच्युत कर दिया गया अथवा उनकी हत्या कर दी गई।
अंततः लगभग 855 ईस्वी में अवंतिवर्मन ने अंतिम कार्कोट शासक को अपदस्थ कर उत्पल वंश की स्थापना की। इसके साथ ही कश्मीर में कार्कोट वंश का शासन समाप्त हो गया। इस प्रकार आंतरिक कलह, उत्तराधिकार संबंधी विवादों, प्रशासनिक दुर्बलता तथा बाहरी दबावों के संयुक्त प्रभाव से कार्कोट साम्राज्य का पतन हुआ।
कार्कोट राजवंश का प्रशासन
कार्कोट राजवंश ने केंद्रीय प्राधिकरण, क्षेत्रीय शासन, कराधान तंत्र और सैन्य संगठन को मिलाकर एक व्यवस्थित प्रशासनिक प्रणाली विकसित की। कार्कोट प्रशासन में राजा सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह राजनीतिक, सैन्य और न्यायिक शक्तियों को नियंत्रित करता था और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार माना जाता था। यद्यपि मंत्रिपरिषद् का उल्लेख नहीं मिलता है, किंतु शासक की सहायता के लिए ‘अमात्य’ नामक मंत्रियों की नियुक्ति की जाती थी, जो वित्त, सैन्य मामलों, न्याय और धार्मिक प्रशासन जैसे महत्त्वपूर्ण विभागों की निगरानी करते थे।
कार्कोट राज्य प्रांतों में विभाजित थे, जिनका शासन ‘देशाधिपति’ या ‘विषयापति’ नामक अधिकारी संचालित करते थे। इन अधिकारियों का प्रमुख कार्य राजस्व वसूली, कानून प्रवर्तन और स्थानीय प्रशासन की देखरेख करना था।
कार्कोट सेना में पैदल सेना, घुड़सवार सेना और हस्ति सेना सम्मलित थी। पहाड़ी युद्ध में पहाड़ी कबीले की जनजातियाँ भी सहायक सेना के रूप में काम करती थीं। ललितादित्य मुक्तापीड ने अपने सैन्य अभियानों के द्वारा उत्तरी भारत, अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया में अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया।
कार्कोट अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार भूमि-राजस्व था। कश्मीर घाटी में चावल, केसर और फलों जैसी उपजाऊ फसलें उगाने वाले किसानों से कृषिकर वसूल किए जाते थे। शहरी क्षेत्रों में व्यापार, शिल्प और वाणिज्य का पर्याप्त विकास हुआ, जिससे कश्मीर की आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक उन्नति को बल मिला। राज्य को मध्य एशिया, पंजाब और उत्तरी भारत से जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों की देखरेख करनी पड़ती थी। सीमा शुल्क और बाज़ार करों से भी राज्य की आय होती थी।
राज्य द्वारा विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे, जिनमें सीमा-शुल्क, बाज़ार कर, वेश्यावृत्ति कर और व्यापार शुल्क जैसे विशेष कर शामिल थे। कार्कोट प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार पर दामोदरगुप्त ने अपने ग्रंथ में व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ की हैं।
कार्कोट शासकों द्वारा जारी किए गए धातु के सिक्के बड़े पैमाने पर प्रचलन में थे। इस काल में धातु के सिक्कों के साथ-साथ ताँबे की कौड़ियों या ताँबे के टोकनों का भी मुद्रा के रूप में उपयोग किया जाता था। स्थानीय बाज़ारों में दैनिक लेन-देन में कौड़ियों का भी प्रयोग होता था।
कार्कोटकालीन सांस्कृतिक जीवन
कार्कोट राजवंश ने धर्म, कला, शिक्षा, सामाजिक परंपराओं और बौद्धिक गतिविधियों प्रोत्साहित करके एक जीवंत एवं समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया। इस काल में कश्मीर राजनीतिक शक्ति के साथ-साथ ज्ञान, दर्शन, साहित्य और धार्मिक सहिष्णुता का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
धार्मिक जीवन
कार्कोट वंश के कम-से-कम प्रारंभिक शासकों ने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना का प्रयास किया और शैव तथा वैष्णव धर्म की परंपराओं को संरक्षण दिए। इसके बावजूद उन्होंने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप कश्मीर में धार्मिक सहिष्णुता और सहअस्तित्व का वातावरण विकसित हुआ।
कार्कोट काल में विभिन्न धार्मिक समुदायों को अपने-अपने विश्वासों और परंपराओं के अनुसार जीवन यापन करने की स्वतंत्रता प्राप्त थी। इस काल में बौद्ध मठ, स्तूप और विहार हिंदू मंदिरों के साथ-साथ विद्यमान थे, जो विभिन्न धार्मिक परंपराओं के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के परिचायक हैं। कश्मीर के विद्वानों और भिक्षुओं ने मध्य एशिया तथा पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म-दर्शन का प्रसार किया, जिससे कश्मीर अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपर्कों का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

कलात्मक उपलब्धियाँ
मंदिर और नगर
कार्कोट काल में कश्मीर में अनेक भव्य मंदिरों और नगरों का निर्माण कराए गए। दुर्लभवर्धन ने श्रीनगर में भगवान विष्णु को समर्पित दुर्लभस्वामी मंदिर का निर्माण करवाया, जबकि उसकी रानी ने अनंगभवन नामक एक बौद्ध विहार की स्थापना की। उसके काल में गुप्तोत्तर स्थापत्य परंपराओं को अपनाते हुए कश्मीर में एक विशिष्ट स्थापत्य शैली का विकास प्रारंभ हुआ, जिसमें आयताकार आँगन, पत्थर के खंभे और पिरामिड जैसी छतें शामिल थीं, जो गांधार और गुप्त परंपराओं से प्रभावित थीं। दुर्लभक ने प्रतापपुर नगर (तापर) की स्थापना की और मल्हानस्वामी मंदिर का निर्माण करवाया। उसकी रानी नरेंद्रप्रभा नरेंद्रेश्वर मंदिर बनवाया था। चंद्रापीड ने अनेक विष्णु मंदिरों का निर्माण कराया। जयापीड ने बौद्ध विहारों और बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण करवाया तथा जयापुर (अंद्रकोट) नामक नई राजधानी बसाई।
ललितादित्य मुक्तापीड के समय में कश्मीर में अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराए गए, जिनमें अनंतनाग के निकट स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है। मार्तंड सूर्य मंदिर की मूर्तिकला और स्थापत्य कश्मीरी कला की श्रेष्ठ उपलब्धियों में गिने जाते हैं। इसकी सबसे विशिष्ट विशेषता तिकोनी मेहराब है, जो कश्मीर की ब्राह्मणीय मंदिर वास्तुकला की पहचान बन गई। उसने अनेक बौद्ध स्थापत्य संरचनाओं का भी निर्माण करवाया तथा परिहासपुर (परिहासपोर) को अपनी नई राजधानी के रूप में विकसित किया।

जयापीड ने जयपुर और मलहनपुर (वर्तमान मालूर) नगर बसाया और जयापुर (अंद्रकोट) नामक नई राजधानी बसाई। उसकी दो रानियों कल्याणदेवी और कमलादेवी ने क्रमशः कल्याणपुर (वर्तमान कलामपुर) और कमलापुर की स्थापना की। जयापीड के शासनकाल में ही उसकी रखैल जयादेवी के पाँच भाइयों ने जयेश्वर नामक शिव मंदिर का निर्माण करवाया था। कार्कोट वास्तुकला से संबंधित वांगथ मंदिर परिसर भी महत्त्वपूर्ण मंदिर समूह था, जो कश्मीरी प्रस्तर वास्तुकला की विशिष्ट नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
मूर्तिकला
कर्कोट काल में मूर्तिकला का उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल में विष्णु, शिव, सूर्य और बुद्ध को चित्रित करने वाली सुंदर मूर्तियोँ का निर्माण हुआ। राजतरंगिणी में अनेक काँस्य प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। ललितादित्य ने विभिन्न धर्मों के मंदिरों और मठों के लिए सोने और चाँदी की प्रतिमाओं का निर्माण कराया। उसके शासनकाल को कश्मीरी मूर्तिकला का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल के टेराकोटा शिल्प, विशेषकर मानव मुखाकृतियाँ भी प्राप्त हुई हैं। उत्खननों में दुर्लभक से संबद्ध पत्थर की मूर्तियाँ भी मिली हैं।

समाज
कार्कोट कालीन समाज में पर्याप्त असमानता विद्यमान थी। समाज पदानुक्रम आधारित था, जिसमें विभिन्न सामाजिक वर्गों और व्यवसायिक समूहों की अपनी-अपनी भूमिकाएँ थीं। व्यापारिक समुदायों का आर्थिक और सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान था।
समृद्ध वर्ग में भौतिकवादी प्रवृत्तियाँ प्रचलित थीं तथा वेश्यावृत्ति को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। इस काल में सती और देवदासी प्रथाएँ भी समाज में व्यापक रूप से प्रचलित थीं, जो प्रारंभिक मध्यकालीन भारतीय समाज की सामाजिक परंपराओं और रीति-रिवाजों को प्रतिबिंबित करती हैं।
इस काल में सांस्कृतिक जीवन अत्यंत सक्रिय था। समकालीन साहित्य में नाट्यशालाओं, सांस्कृतिक आयोजनों और उत्सवों का उल्लेख मिलता है। कुलीन वर्गों में शिकार, नाट्य प्रदर्शन और अन्य मनोरंजनात्मक कलाएँ लोकप्रिय थीं। सांस्कृतिक समारोहों और नाट्य-प्रदर्शनों के नियमित आयोजन के लिए विशेष सभागार बने थे। रत्नावली उस समय के लोकप्रिय नाटकों में से थी।
शिक्षा और साहित्य
कार्कोट काल में कश्मीर संस्कृत शिक्षा और विद्वत्ता का प्रमुख केंद्र था, जहाँ दर्शन, व्याकरण, काव्यशास्त्र और धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन-अध्यापन किया जाता था। ललितादित्य और जयापीड शिक्षा और साहित्य के उदार संरक्षक थे, जिन्होंने विदेशों से विद्वानों को आमंत्रित किए। भारत के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर-पश्चिम और दक्षिण भारत से अनेक विद्वान् और ब्राह्मण कश्मीर आए, जिससे कश्मीर का बौद्धिक वातावरण समृद्ध हुआ। इन विद्वानों ने स्थानीय बौद्धिक परंपराओं को समृद्ध बनाया और ज्ञान-विज्ञान के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कश्मीर के विद्वानों ने मध्य एशिया और पूर्वी एशिया में बौद्ध शिक्षाओं को प्रसारित किया, जिससे अंतर-क्षेत्रीय बौद्धिक आदान-प्रदान सुदृढ़ हुआ।
कहा जाता है कि नीलमत पुराण का संकलन दुर्लभवर्धन के शासनकाल में हुआ था। विष्णुधर्मोत्तर पुराण की रचना भी लगभग इसी काल की मानी जाती है। कला और विद्या के महान् संरक्षक ललितादित्य मुक्तापीड तथा जयापीड ने विदेशी विद्वानों को आमंत्रित किया और विभिन्न धर्मों तथा शास्त्रों के अध्ययन को प्रोत्साहित किया।
जयापीड ने वामन, उद्भट, क्षीर, मनोरथ, शंखदत्त, चातक और संधिमत जैसे विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया, जिन्होंने काव्यशास्त्र, साहित्यिक आलोचना और दार्शनिक चिंतन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वामन ने संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकारसूत्र की रचना की। पाणिनि की अष्टाध्यायी पर लिखी गई प्रसिद्ध टीका काशिकावृत्ति के दो रचनाकारों में से एक वामन माने जाते हैं। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्य उद्भट की रचनाओं में काव्यालंकारसंग्रह विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कुमारसंभव पर टीका तथा भामह के काव्यालंकार पर विस्तृत व्याख्या भी लिखी थी। वामन और उद्भट दोनों ने काव्यशास्त्र की ऐसी व्यापक परंपरा विकसित करने का प्रयास किया, जिसमें सौंदर्यशास्त्र के विभिन्न तत्वों, उनकी सीमाओं और पारस्परिक संबंधों का व्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत किया गया।
इसी प्रकार दामोदरगुप्त की कुट्टनीमतम् तथा कवि रत्नाकर की हरविजय जैसी रचनाएँ कार्कोट शासकों के संरक्षण में संस्कृत साहित्य के विकास का प्रमाण हैं। जयापीड का दरबार कश्मीरी काव्य परंपरा के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। संभवतःजयापीड के दरबार में ही ‘कश्मीर के साहित्यिक आलोचना-विद्यालय’ का विकास हुआ।
इस प्रकार कार्कोट वंश कश्मीर के इतिहास का एक गौरवशाली अद्ध्याय था। यद्यपि नौवीं शताब्दी तक इस वंश का पतन हो गया, फिर भी राजनीतिक वैभव, सांस्कृतिक समृद्धि और बौद्धिक उत्कर्ष के कारण कार्कोट काल को कश्मीर के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।




