1857 के बाद आदिवासी विद्रोह
आदिवासी विद्रोह की पृष्ठभूमि और कारण
भारत में आदिवासी विद्रोहों का इतिहास अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना के साथ ही आरंभ हो गया था। ‘आदिवासी’ शब्द को जनजातीय, मूलनिवासी, वनवासी और अनुसूचित जनजाति जैसे अनेक नामों से भी संबोधित किया जाता है। ये समुदाय भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में सदियों से अपनी स्वतंत्र जीवन-व्यवस्था, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जीते आए थे। औपनिवेशिक शासन ने इस समूची व्यवस्था को न केवल बाधित किया, बल्कि उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास किया।
आदिवासियों का अपना एक विशिष्ट सामुदायिक खेतिहर ढाँचा था, जो गैर-आदिवासी किसानों से मूलभूत रूप से भिन्न था। सामान्य किसान केवल कृषि भूमि पर निर्भर रहते थे, जबकि आदिवासी समुदाय कृषि और वन दोनों पर समान रूप से आश्रित थे। वन उनके लिए केवल लकड़ी या ईंधन का स्रोत नहीं था, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और आर्थिक जीवन का केंद्र था। यही कारण था कि जब भी इस वन-संबंध पर कोई बाहरी हमला हुआ, आदिवासी प्रतिरोध अत्यंत तीव्र और हिंसक रूप में सामने आया।
औपनिवेशिक हमले ने जंगलों से आदिवासियों के इस गहरे और आत्मीय रिश्ते को तोड़ दिया। आदिवासी परंपरागत रूप से ‘झूम’ और ‘पंडु’ विधि से स्थानांतरित खेती करते थे, जिसमें वे एक स्थान की भूमि की उर्वरता समाप्त होने पर दूसरे स्थान पर चले जाते थे। यह पद्धति पर्यावरण के साथ उनके संतुलित सह-अस्तित्व की परिचायक थी। किंतु औपनिवेशिक सरकार ने वन-अधिनियमों, विशेषतः 1865 ई. और 1878 ई. के भारतीय वन अधिनियमों के माध्यम से आरक्षित वनों में झूम खेती को प्रतिबंधित या अत्यंत सीमाबद्ध कर दिया। इन कानूनों ने आदिवासियों को उनके ही पुश्तैनी वनों में अजनबी और अपराधी बना दिया।
इतना ही नहीं, सरकार ने आदिवासियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं पर नए प्रकार के कर भी लगाए। महाजनों, साहूकारों और बाहरी व्यापारियों की घुसपैठ ने आदिवासी समाज की आर्थिक संरचना को ध्वस्त कर दिया। औपनिवेशिक घुसपैठ, महाजनों के ऋण-जाल और कर-वसूली करने वालों के तिहरे उत्पीड़न ने आदिवासी जीवन की लय और ताल पूरी तरह तोड़ दी। धीरे-धीरे आदिवासी अपनी ही जमीन पर कृषि मजदूर बन गए और खानों, बागानों तथा कारखानों में काम करने एवं कुलीगीरी करने के लिए विवश हो गए। इन परिस्थितियों में आदिवासियों के पास ब्रिटिश राज के विरुद्ध हथियारबंद विद्रोह के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था।

आदिवासी विद्रोहों का धार्मिक और सांस्कृतिक आयाम
औपनिवेशिक घुसपैठ के विरुद्ध प्रतिरोध केवल आर्थिक या राजनीतिक स्तर पर नहीं उभरा, इसने धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आंदोलनों का रूप भी लिया। 1870 के दशक में संथाल क्षेत्र में उभरे ‘खेरवाड़’ अथवा ‘सफाहार’ आंदोलन ने आरंभ में एकेश्वरवाद और सामाजिक सुधारों की शिक्षा दी। इस आंदोलन ने आदिवासियों को यह बताया कि उनके संकट का मूल कारण उनका नैतिक पतन है और एकजुट होकर अपनी पहचान को पुनर्स्थापित करने से ही मुक्ति संभव है।
आदिवासी समाज में धर्म ने एकता के सूत्र का काम किया। आदिवासी नेता प्रायः धर्मगुरु के रूप में उभरे, जो अपने अनुयायियों को पराप्राकृतिक साधनों के बल पर एक नए स्वर्णयुग में ले जाने का वादा करते थे। यह विशेषता आदिवासी विद्रोहों को अन्य किसान विद्रोहों से अलग करती है। 1868 ई. में गुजरात की नायकड़ा वन्य जाति ने ‘धर्मराज्य’ स्थापित करने के प्रयास में पुलिस थाने पर आक्रमण किया। 1882 ई. में ‘सांबुदान’ नामक एक कथित जादूगर के नेतृत्व में कुछ नागाओं ने अंग्रेजों पर आक्रमण किया। सांबुदान का दावा था कि उसने अपने जादू के बल पर अनुयायियों को इस प्रकार सुरक्षित कर दिया है कि गोलियाँ उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं। यह विश्वास, चाहे वास्तविकता में असत्य ही क्यों न हो, आदिवासी योद्धाओं में अपार साहस और निर्भयता भर देता था।
आरंभिक आदिवासी आंदोलनों का स्वरूप प्रायः खोए हुए स्वर्णकाल को पुनर्स्थापित करने का था। ये आंदोलन पूर्णतः रक्षात्मक थे, बाहरी शत्रुओं को भगाकर अपनी पुरानी व्यवस्था लौटाने का प्रयास। किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया और राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ, आदिवासी आंदोलनों का स्वरूप भी बदलता गया।
आदिवासी विद्रोहों के चरण
आदिवासी विद्रोहों के इतिहास को मोटे तौर पर तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम चरण में विद्रोह मुख्यतः स्थानीय और पुनर्स्थापनवादी थे, जिनका उद्देश्य पूर्व की व्यवस्था को वापस लाना था। द्वितीय चरण 1860 से 1920 ई. तक चला, जिसमें आदिवासियों ने राष्ट्रवादी और किसान आंदोलनों में भी भागीदारी की और उनके संघर्ष का दायरा विस्तृत हुआ। तृतीय चरण 1920 ई. के बाद प्रारंभ हुआ, जिसमें आदिवासी आंदोलनों के नेताओं में अल्लूरी सीताराम राजू जैसे गैर-आदिवासी नेता भी सामने आए और गांधीवादी असहयोग की विचारधारा का प्रभाव आदिवासी संघर्षों पर भी पड़ा।
मुंडा (उलगुलान) विद्रोह
मुंडा समाज और उनकी समस्याएँ
मुंडा आदिवासी मुख्यतः छोतानागपुर पठार के क्षेत्र- वर्तमान झारखंड में निवास करते थे। उनकी खेती की पद्धति ‘खूँटकट्टी’ कहलाती थी, जो एक सामूहिक भूमि-व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत जिस कुल ने वन काटकर भूमि साफ की हो, उसे उस भूमि पर वंशानुगत अधिकार प्राप्त होता था और पूरा कुल मिलकर उस भूमि पर खेती करता था। यह व्यवस्था मुंडा समाज की आर्थिक समता और सामूहिकता का आधार थी।
ईसाई मिशनरियों के आगमन ने इस पारंपरिक समुदाय में बिखराव पैदा करना शुरू किया। धर्मांतरण ने कुछ मुंडाओं को उनके परंपरागत सामाजिक ताने-बाने से काट दिया। इसके साथ-साथ बाहरी जमींदारों, जिन्हें ‘ठीकादार’ कहा जाता था, सूदखोर साहूकारों और व्यापारियों ने मुंडा क्षेत्र में घुसपैठ की। धीरे-धीरे खूँटकट्टी की सामूहिक भूमि का हस्तांतरण होने लगा और मुंडा किसान अपनी ही जमीन पर बँटाईदार बन गए। इस बदलती परिस्थिति में मुंडा सरदारों ने 1880 के दशक में ‘सरदारी लड़ाई’ के नाम से एक कानूनी आंदोलन चलाया। उन्होंने न्यायालयों में याचिकाएँ दाखिल कीं और ब्रिटिश सरकार से न्याय की अपील की, परंतु उन्हें न्याय नहीं मिला।

बिरसा मुंडा (1875–1900 ई.): धरती आबा का उदय
सरदारी लड़ाई की विफलता के बाद जब कानूनी मार्ग बंद हो गया, तब 1880 के दशक के अंत में मुंडाओं के बीच एक मसीहा का उदय हुआ — बिरसा मुंडा। बिरसा का जन्म 15 नवंबर 1875 ई. को रांची जिले के उलिहतु गाँव में एक निर्धन बँटाईदार परिवार में हुआ था। उनके पिता सुगना मुंडा और माता करमी मुंडा थीं। बिरसा ने आरंभ में ईसाई मिशनरियों के विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की, जिससे उन्हें हिंदू और ईसाई दोनों धर्मों के ग्रंथों और आख्यानों का परिचय मिला। बाद में वे वैष्णव संतों के प्रभाव में आए। बिरसा एक प्रतिभाशाली युवक थे, वे अच्छे बाँसुरीवादक थे और उन्होंने कद्दू से ‘तुइला’ नामक एक तारवाला वाद्य यंत्र भी बनाया था।
बिरसा ने 1893-94 ई. में उस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, जिसमें गाँव की ऊसर भूमि को वन विभाग द्वारा अधिग्रहीत किए जाने का विरोध किया गया था। 1 अक्टूबर 1894 को उन्होंने समस्त मुंडाओं को एकत्र कर अंग्रेजों से लगान-माफी के लिए एक बड़ा आंदोलन प्रारंभ किया। 1895 ई. में युवा बिरसा को एक दिव्य दृष्टि का अनुभव हुआ और वे पैगंबर होने का दावा करने लगे। उन्होंने कहा कि परमेश्वर ने उन्हें मुंडाओं के उद्धार के लिए भेजा है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि शीघ्र ही प्रलय होगी, ‘डिकुओं’ (गैर-आदिवासियों) से भीषण संघर्ष होगा और उनके खून से धरती ऐसे लाल होगी जैसे लाल झंडा। आदिवासियों की कल्पना में बिरसा ‘धरती आबा’ अर्थात जगत-पिता के रूप में पूजनीय हो गए।
ब्रिटिश सरकार ने षड्यंत्र की आशंका से 24 अगस्त 1895 ई. को बिरसा को गिरफ्तार करके दो वर्ष के लिए जेल भेज दिया। 1897 ई. में जेल से रिहा होने के बाद बिरसा ने अपनी गतिविधियाँ और अधिक सुनियोजित रूप से पुनः आरंभ कीं। उन्होंने धार्मिक उपदेशों की आड़ में आदिवासियों में राजनीतिक चेतना का व्यापक प्रसार किया। 1898-99 ई. में अनेक रात्रि-सभाएँ आयोजित की गईं, जिनमें बिरसा बीते हुए स्वर्णकाल अर्थात सतयुग की महिमा और वर्तमान कलयुग के कष्टों की कथाएँ सुनाते थे। वे कहते थे कि अंग्रेजों की गोलियाँ उनके अनुयायियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, क्योंकि ईश्वर उनके साथ है।
1898 ई. में डोमबारी पहाड़ी पर उपनिवेशवाद-विरोधी विद्रोह की ठोस तैयारी शुरू हुई। 1899 ई. की क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बिरसा ने विद्रोह का आधिकारिक ऐलान किया। उन्होंने अपने विद्रोह को ‘उलगुलान’ अर्थात महान हलचल या महाविद्रोह का नाम दिया। उन्होंने ठेकेदारों, जागीरदारों, सरकारी अधिकारियों और ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का आह्वान किया। किंतु साथ ही उन्होंने यह भी हिदायत दी कि गरीब और निर्दोष गैर-आदिवासियों पर हाथ नहीं उठाया जाए। बिरसा आंदोलन का उद्देश्य केवल डिकुओं को भगाना नहीं था, इसका व्यापक लक्ष्य कलयुग को समाप्त कर सतयुग की स्थापना करना, अंग्रेजी राज को उखाड़ फेंकना और उसके स्थान पर ‘बिरसा राज’ एवं ‘बिरसाई धर्म’ की स्थापना करना था। 5 जनवरी 1900 ई. तक पूरे मुंडा क्षेत्र में विद्रोह की आग फैल चुकी थी।
9 जनवरी 1900 ई. को डोमबारी पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना ने विद्रोहियों पर गोलियाँ बरसाईं। हजारों निहत्थे और अर्धशस्त्रसज्जित मुंडाओं ने इस संघर्ष में अपना बलिदान दिया। बिरसा स्वयं बच निकले, किंतु स्थानीय विश्वासघातियों की सूचना पर 3 फरवरी 1900 ई. को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिए गए। 9 जून 1900 ई. को रांची जेल में बिरसा मुंडा की संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे हैजे से होने वाली मृत्यु बताया, परंतु इतिहासकारों ने इस पर प्रश्नचिह्न लगाया है। इस विद्रोह में 350 मुंडाओं पर मुकदमा चला, जिनमें से तीन को फाँसी दी गई और 44 को आजीवन कारावास का दंड मिला।
बिरसा मुंडा के बलिदान का दीर्घकालिक प्रभाव यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार को 1908 ई. में ‘छोतानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ के माध्यम से खूँटकट्टी के अधिकारों को मान्यता देनी पड़ी और जबरी बेगार पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। यह उस महान संघर्ष की आंशिक, किंतु महत्वपूर्ण जीत थी। आज भी बिरसा मुंडा केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि आदिवासी जनमानस में एक जीवंत देवता और लोकनायक के रूप में पूजे जाते हैं। झारखंड राज्य की स्थापना उनकी जयंती 15 नवंबर 2000 ई. को हुई, जो उन्हें सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
रंपा विद्रोह
भौगोलिक पृष्ठभूमि और कारण
आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तटवर्ती पहाड़ी क्षेत्र ‘चोडवरम’ का ‘रंपा प्रदेश’ अनेक आदिवासी विद्रोहों का साक्षी रहा है। यह पूर्वी घाट का वह क्षेत्र है जहाँ कोया, कोंडा रेड्डी और अन्य गोंड जनजातियाँ पीढ़ियों से निवास करती आई थीं। 1839 और 1862 ई. के बीच रंपा प्रदेश में स्थानीय मुट्ठेदारों (वंशानुगत प्रशासकों) ने अनेक छोटे-बड़े विद्रोह, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘फितूरियाँ’ कहा जाता था, किए।
उन्नीसवीं सदी के अंत में इस पर्वतीय क्षेत्र में व्यावसायिक घुसपैठ का सिलसिला तेज हुआ। मैदानी व्यापारी और साहूकार पहाड़ों में पहुँचे और धीरे-धीरे कर्जदार किसानों और मुट्ठेदारों की संपत्तियाँ जब्त कराकर आदिवासियों की जमीनों पर अवैध कब्जा करने लगे। स्थानीय आदिवासी पुलिस उत्पीड़न, लकड़ी तथा चराई कर में अत्यधिक वृद्धि, घरों में ताड़ी बनाने पर लगाई गई रोक, पोडू (झूम) खेती पर प्रतिबंध और मैदानी क्षेत्रों के महाजनों तथा साहूकारों के बढ़ते आर्थिक शोषण से त्रस्त थे।
टोम्पा सोरा का विद्रोह (1879-80 ई.)
कोया आदिवासियों और कोंडा सोरा नामक पहाड़ी सरदारों ने 1879-80 ई. में टोम्पा सोरा के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘फितूरी’ का आरंभ किया। इस विद्रोह के प्रमुख लक्ष्य मनसबदार, अंग्रेज अधिकारी, उनके पुलिस थाने और मैदानी व्यापारी-ठेकेदार थे। 1879-80 ई. की इस फितूरी का मूल उद्देश्य पहाड़ों को सभी बाहरी तत्वों से मुक्त करना था। ब्रिटिश सरकार ने मद्रास इन्फैंट्री की छह रेजिमेंटों की सहायता से हजारों आदिवासियों का कत्ल करके इस विद्रोह का बर्बरतापूर्वक दमन किया। जब पुलिस ने टोम्पा सोरा को मार दिया, तो यह विद्रोह भी समाप्त हो गया।
राजन अनंतय्या का विद्रोह (1886 ई.)
1886 ई. में गुडेम में कोया विद्रोहियों ने राजन अनंतय्या के नेतृत्व में पुनः विद्रोह किया। राजन अनंतय्या के अनुयायी अपने आप को ‘रामसंडु’ अर्थात राम की सेना मानते थे। राजन स्वयं कहता था कि यदि उसे अवसर मिले तो वह अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए राम की भूमिका निभाने को तैयार है। उसने जयपुर के तत्कालीन शासक से भी अंग्रेजी राज्य को उखाड़ फेंकने में सहायता माँगी थी। यह प्रयास इस बात का प्रमाण था कि रंपा के आदिवासी नेता अब स्थानीय सीमाओं से परे जाकर व्यापक रणनीतिक गठबंधनों की कल्पना कर रहे थे।
कोरा मल्लया और पौराणिक प्रतीकों का उपयोग (लगभग 1900 ई.)
1900 ई. के आसपास कोरा मल्लया ने यह दावा किया कि वह पांडवों में से किसी एक का अवतार है और उसका बालक पुत्र कृष्ण का अवतार है। उसने घोषणा की कि वह अंग्रेजों को देश से निष्कासित करेगा और स्वयं शासन करेगा। कोरा मल्लया ने अपने अनुयायियों को विश्वास दिलाया कि युद्ध के समय वह अपने जादू से उनके बाँस के डंडों को बंदूकों में और शत्रु अधिकारियों के शस्त्रों को पानी में बदल देगा। यह विश्वास, चाहे वैज्ञानिक दृष्टि से असंभव हो, निर्धन और निःशस्त्र आदिवासियों में असाधारण साहस का संचार करता था।
1922 ई. का रंपा विद्रोह: अल्लूरी सीताराम राजू का नेतृत्व
1922 ई. का रंपा विद्रोह, जिसे ‘मान्यम विद्रोह’ भी कहा जाता है, रंपा क्षेत्र के आदिवासी संघर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इस विद्रोह का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया। राजू गैर-आदिवासी थे, किंतु उन्होंने आदिवासी जनता से इतना गहरा संबंध स्थापित कर लिया था कि वे उनके मसीहा बन गए।
अल्लूरी सीताराम राजू 1915 ई. के आसपास इस क्षेत्र में आए और आदिवासियों के बीच बस गए। वे एक करिश्माई और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे- ज्योतिषी, चिकित्सक, संन्यासी और कुशल सैन्य रणनीतिकार। उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रेरणा लेकर आदिवासी क्षेत्र में ग्राम पंचायतों की स्थापना की और शराब-विरोधी अभियान चलाया। राजू का दावा था कि गोलियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं होता, जो आदिवासियों में उनके प्रति अपार श्रद्धा का कारण बना।

विद्रोह का तात्कालिक कारण था- गुडेम के तहसीलदार बस्टियन द्वारा आदिवासियों से बिना कोई मजदूरी दिए जंगल में सड़क-निर्माण का जबरी काम करवाने का प्रयास। इसके साथ ही मुट्ठेदारों में भी गहरा असंतोष था, जो अंग्रेजों के आने से पहले पहाड़ी क्षेत्रों के वंशानुगत प्रशासक और वास्तविक शासक थे, किंतु औपनिवेशिक व्यवस्था में हाशिए पर धकेल दिए गए थे।
24 सितंबर 1922 ई. को डमरापल्ली पर आदिवासी विद्रोहियों ने छापा मारा और दो ब्रिटिश अधिकारियों को गोली मार दी। राजू ने लगभग 100 लड़ाकों का एक प्रशिक्षित गोरिल्ला दस्ता बनाया और अंग्रेजों तथा उनके सहयोगियों के विरुद्ध छापामार युद्ध छेड़ दिया। इस विद्रोही दल को लगभग 2,500 वर्गमील के पर्वतीय क्षेत्र में स्थानीय आदिवासी जनता की व्यापक सहानुभूति और सहयोग प्राप्त था। 6 मई 1924 ई. को अंग्रेजों ने राजू को धोखे से पकड़कर उनकी हत्या कर दी और सितंबर 1924 में यह विद्रोह पूरी तरह समाप्त हो गया। राजू आज भी आंध्र प्रदेश के लोकमानस में ‘मान्यम वीरुडु’ अर्थात जंगल के नायक के रूप में अमर हैं।
युआन-जुआंग विद्रोह
युआन-जुआंग आदिवासी उड़ीसा के क्योझर (वर्तमान में ओड़िशा का केओनझर जिला) के आसपास निवास करते थे। क्योझर एक देशी रियासत थी और उसके प्रशासन में युआन आदिवासियों की महत्वपूर्ण भागीदारी परंपरागत रूप से थी। राज्याभिषेक और अन्य राजकीय अवसरों पर युआन सरदारों को विशेष सम्मान दिया जाता था और उन्हें आमंत्रित किया जाता था।
जब अंग्रेजों ने क्योझर रियासत पर अपना प्रभाव जमाया और युआन आदिवासियों के पारंपरिक विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया, तो युआन सरदारों को गहरा अपमान महसूस हुआ। 1867 ई. में क्योझर के राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उत्तराधिकार के मामले में मनमाना हस्तक्षेप करते हुए एक से अधिक दावेदारों को सिंहासन पर बैठाने का खेल खेला। राजा के सामंतों की मनमानी और उनके उत्पीड़न के विरुद्ध रन्न नायक के नेतृत्व में युआन आदिवासियों ने 1868 ई. में विद्रोह किया, जिसे ब्रिटिश सेना ने उसी वर्ष दबा दिया।
क्योझर में दूसरा विद्रोह 1891 ई. में धारणी नायक के नेतृत्व में हुआ। धारणी नायक ने इस बार इतनी व्यापक जनशक्ति जुटाई कि स्थानीय जनता के सहयोग से राज्य की समूची शासन-व्यवस्था ध्वस्त हो गई। क्योझर के राजा को अपनी जान बचाने के लिए भागकर कटक में शरण लेनी पड़ी। यह एक असाधारण उपलब्धि थी, जो आदिवासी नेतृत्व और संगठन की शक्ति का प्रमाण थी। अंग्रेजों ने 1893 ई. में सैन्य बल से इस विद्रोह को कुचल दिया। इसी काल में पश्चिमी सीमांत पर 1917 ई. में मयूरभंज में संथालों ने और मणिपुर में थेडोई कुकियों ने भी विद्रोह किया, जो इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी असंतोष की आग समूचे भारत में सुलग रही थी।
ताना भगत आंदोलन (1914 ई.)
ताना भगत आंदोलन का आरंभ झारखंड के गुमला अनुमंडल के चपरी नवाटोली गाँव में उरांव जनजाति के जतरा उरांव, जिन्हें ‘जतरा भगत’ के नाम से जाना जाता है, ने 1914 ई. में किया। यह आंदोलन सामाजिक-धार्मिक सुधार और औपनिवेशिक-विरोधी प्रतिरोध का एक अनूठा संयोजन था। इसे एक प्रकार का ‘संस्कृतिकरण आंदोलन’ भी कहा जाता है।
जतरा उरांव ने ओझागिरी और जादू-टोने का विरोध किया तथा भीखमंगापन, पशु-बलिदान, माँस-मदिरा और पारंपरिक आदिवासी नृत्यों से दूर रहने की अपील की। उनका यह सांस्कृतिक सुधार कार्यक्रम देखने में भले ही रूढ़िवादी लगे, परंतु इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चेतना थी- आदिवासी समाज को औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध आंतरिक रूप से एकजुट और अनुशासित करना। जतरा ने झूम खेती की ओर लौट जाने, जमींदारों को चौकीदारी कर न देने और भूमि पर जबरी जोताई बंद करने का आह्वान किया।
ताना भगत आंदोलन ने शीघ्र ही एक सहस्राब्दवादी स्वरूप धारण कर लिया, क्योंकि यह अफवाह फैल गई कि एक मसीहा आने वाला है जो आदिवासियों को उनका राज वापस दिलाएगा। इस मसीहा को कहीं बिरसा का पुनर्जन्म कहा गया, कहीं ‘जर्मन बाबा’ तो कहीं ‘कैसर बाबा’, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी से अंग्रेजों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में ये अफवाहें और भी अधिक विश्वसनीय लगती थीं। 1920 के दशक में उरांव आंदोलनकारी कांग्रेस के नेतृत्व में सत्याग्रह और प्रदर्शनों में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लेने लगे, जो आदिवासी और राष्ट्रीय आंदोलनों के बीच बढ़ते जुड़ाव का प्रतीक था।
देशी रियासतों में आदिवासी विद्रोह
टिहरी गढ़वाल और कुमायूँ के वन-विद्रोह
उत्तर प्रदेश के टिहरी गढ़वाल के हिमालयी वन क्षेत्र, जो उस समय एक देशी रियासत का हिस्सा था, और ब्रिटिश प्रशासन वाले कुमायूँ क्षेत्र में वन-कानूनों के विरुद्ध तीव्र असंतोष उभरा। टिहरी गढ़वाल में पहले परंपरागत ‘ठंढ़क’ की रीति का पालन करते हुए राजा से न्याय की गुहार की गई। परंतु जब स्थानीय राजा ने कठोर वन-संरक्षण कानून लागू करने का प्रयास किया, तो 1886 और 1904 ई. में विद्रोह हुए। दिसंबर 1906 ई. में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि विद्रोह के हिंसक रूप धारण करने पर राजा को भी अंग्रेजों से सैन्य सहायता माँगनी पड़ी। कुमायूँ में स्थानीय किसानों ने ‘उतार’ अर्थात बेगार की व्यवस्था तथा निरंकुश वन-प्रबंधन नीतियों के विरोध में सीधी कार्रवाई अपनाई। उन्होंने कानूनों का उल्लंघन किया, इमारती लकड़ी की चोरी की और आरक्षित वनों में जानबूझकर आगजनी करके अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।
बस्तर का मुड़िया विद्रोह (1910 ई.)
बस्तर रियासत में मुड़िया आदिवासियों ने 1910 ई. में जगदलपुर में राजा के विरुद्ध विद्रोह किया। इस विद्रोह का प्रारंभिक कारण उत्तराधिकार का विवाद था, परंतु मुख्य कारण वन विभाग के हालिया कानून थे, जो झूम खेती पर और वन-उत्पादों के स्वतंत्र उपयोग पर प्रतिबंध लगाते थे। विद्रोही मुड़ियाओं ने संचार-व्यवस्था ठप्प कर दी, पुलिस थानों और वन विभाग की चौकियों पर आक्रमण किए, विद्यालयों में आग लगा दी और जगदलपुर नगर को घेरने का प्रयास किया। यह विद्रोह अपने संगठन और तीव्रता में उल्लेखनीय था।
उड़ीसा, बंगाल और पश्चिमी भारत के विद्रोह
उड़ीसा की दसपल्ला रियासत में अक्टूबर 1914 ई. में खोंड विद्रोह भी उत्तराधिकार विवाद से आरंभ हुआ। खोंड विद्रोह के दौरान यह अफवाह व्यापक रूप से फैल गई कि युद्ध आरंभ हो गया है और शीघ्र ही देश में कोई अंग्रेज अधिकारी नहीं बचेगा तथा खोंडों का ‘अपना राज’ स्थापित होगा। बंगाल के मेदिनीपुर जिले के जंगल महाल में संथाल किसानों ने ग्रामीण हाटों को और तालाबों में पाली गई मछलियों को लूटकर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया। पश्चिमी भारत के डांग जिले के आदिवासी परंपरागत रूप से खानदेश के मैदानी गाँवों से ‘गीरास’ अर्थात खिराज वसूल करते थे। जब ब्रिटिश सरकार ने इस परंपरागत अधिकार को छीनने का प्रयास किया, तो उन्होंने भी विद्रोह का रास्ता अपनाया।
राजस्थान के भीलों का विद्रोह और गोविंद गुरु का आंदोलन
राजस्थान के बांसवाड़ा, सूंठ और डूंगरपुर क्षेत्रों के भीलों ने गोविंद गुरु की प्रेरणा से बँधुआ मजदूरी और शोषण के विरुद्ध विद्रोह किए। गोविंद गुरु एक बंजारा जाति के संत-समाज सुधारक थे, जिन्हें आदिवासी समाज में ‘आदिवासियों के दयानंद सरस्वती’ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1883 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की, जो भीलों और अन्य आदिवासियों को संगठित करने वाला एक सामाजिक-धार्मिक मंच था। 1910 ई. में उन्होंने ‘लसाड़िया पंथ’ की भी स्थापना की। गोविंद गुरु ने शराब, बँधुआ मजदूरी और अन्य सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया और भीलों को अपनी गरिमा और अधिकारों के प्रति सचेत किया।
17 नवंबर 1913 ई. को ब्रिटिश सेना ने बांसवाड़ा के मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र हुए आदिवासियों की सभा पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं और लगभग 1,500 निर्दोष आदिवासियों की हत्या कर दी। यह नरसंहार भारतीय इतिहास के सबसे क्रूर और भुला दिए गए अत्याचारों में से एक है। इसे कभी-कभी ‘आदिवासियों का जलियाँवाला बाग’ भी कहा जाता है।
इसी क्रम में मोतीलाल तेजावत (1896–1963 ई.), जिन्हें ‘आदिवासियों का मसीहा’ कहा जाता है, ने ‘वनवासी संघ’ की स्थापना करके 1921-22 ई. में चित्तौड़गढ़ के मातृकुंडिया क्षेत्र में ‘एकी आंदोलन’ (एकता आंदोलन) प्रारंभ किया। इस आंदोलन ने राजस्थान के आदिवासियों को बँधुआ मजदूरी, अनुचित कर और जमींदारी शोषण के विरुद्ध एकजुट किया। मोतीलाल तेजावत ने गांधीजी की सलाह पर 1929 ई. में आत्मसमर्पण किया, जो दर्शाता है कि आदिवासी आंदोलन और मुख्यधारा का राष्ट्रीय आंदोलन इस काल में एक-दूसरे के निकट आ रहे थे।
आदिवासी विद्रोहों का ऐतिहासिक महत्व और मूल्यांकन
1857 ई. के बाद के आदिवासी विद्रोह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का एक ऐसा अध्याय हैं, जिसे मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में प्रायः उचित स्थान नहीं मिला। ये विद्रोह औपनिवेशिक भूमि, वन और राजस्व नीतियों के विरुद्ध आदिवासी समाज के सुनियोजित और साहसी प्रतिरोध के प्रमाण थे। यद्यपि अधिकांश विद्रोह स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर तक सीमित रहे और अंततः ब्रिटिश सैन्य शक्ति के सामने परास्त हुए, तथापि उन्होंने कई महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न किए। बिरसा मुंडा के उलगुलान के बाद 1908 ई. का छोतानागपुर काश्तकारी अधिनियम पारित हुआ। रंपा विद्रोहों ने सरकार को स्थानीय शासन-व्यवस्था में सुधार लाने पर विवश किया।
इन विद्रोहों ने यह भी सिद्ध किया कि भारतीय प्रतिरोध का इतिहास केवल शहरी शिक्षित वर्ग का इतिहास नहीं है। वन की गहराइयों में, पर्वत की चोटियों पर और दूरदराज के आदिवासी गाँवों में- सर्वत्र साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध की ज्वाला धधक रही थी। स्वराजवादी नेताओं ने विधान परिषदों में संघर्ष किया तो बिरसा मुंडा ने जंगलों में, किंतु दोनों का लक्ष्य एक ही था: अपनी जनता की मुक्ति। यही इन महान आदिवासी विद्रोहों की अमर विरासत है।


