भारत में शक (सीथियन) शासन : उत्पत्ति, विस्तार और पतन
मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात भारत के उत्तर-पश्चिमी भूभाग पर विदेशी आक्रांताओं की एक लंबी श्रृंखला ने अपनी सत्ता स्थापित की, जिसमें शक (सीथियन) शासकों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मध्य एशिया की विशाल स्टेपी भूमि से निकलकर ईरान, अफगानिस्तान होते हुए भारत पहुँचे शकों ने लगभग पाँच शताब्दियों तक उत्तर-पश्चिमी तथा पश्चिमी भारत के विस्तृत भूभाग पर शासन किया। उन्होंने भारतीय राजनीति, मुद्राशास्त्र, कला, स्थापत्य तथा धर्म पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
पृष्ठभूमि: मौर्योत्तर भारत और विदेशी आक्रमण
मगध के विशाल मौर्य साम्राज्य की शक्ति क्षीण होने पर भारत पर पश्चिमोत्तर दिशा से पुनः विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण प्रारंभ हो गए। सर्वप्रथम डेमेट्रियस तथा मिनांडर (मिलिंद) जैसे बैक्ट्रियन यवन (हिंद-यूनानी) विजेताओं ने भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों में अपने अनेक राज्य स्थापित किए, जहाँ उनके वंशधरों ने पीढ़ियों तक शासन किया। किंतु द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व और उसके पश्चात यवनों (बैक्ट्रियन ग्रीकों) के अतिरिक्त पार्थियन तथा सीथियन (शक) लोगों ने भी इस देश पर अनेक आक्रमण किए। वस्तुतः पश्चिमोत्तर भारत से यवन सत्ता का उन्मूलन करने वाले विदेशी आक्रांता मुख्यतः शक अथवा पार्थियन ही थे। शकों ने भारत में हिंद-यवनों की अपेक्षा कहीं अधिक बड़े भूभाग पर तथा कहीं अधिक दीर्घकाल तक शासन किया, जिसके कारण भारतीय इतिहास में उनका अध्ययन विशेष महत्त्व रखता है।
शकों के इतिहास के अध्ययन के स्रोत
चीनी साहित्यिक स्रोत
शकों के आरंभिक इतिहास की जानकारी मुख्यतः चीनी स्रोतों से मिलती है, जिनमें पान-कू की ‘सिएन-हान-शू’ (प्रथम अथवा पूर्व हान वंश का इतिहास) और फान-ए की ‘हाऊ-हान-शू’ (परवर्ती हान वंश का इतिहास) सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों से यू-ची, हूण तथा पार्थियनों के साथ शकों के संघर्ष और उनके भौगोलिक प्रसार का विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है। चीनी साहित्य में शकों को ‘सई’ अथवा ‘सईवांग’ कहा गया है।
भारतीय साहित्यिक स्रोत
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सीथियनों को ‘शक’ कहा गया है। पुराण, रामायण तथा महाभारत जैसे भारतीय ग्रंथों से शकों के विषय में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं। पुराणों में शक, यवन, मुरुंड आदि विदेशी जातियों का उल्लेख मिलता है, जबकि रामायण तथा महाभारत में यवन, पह्लव आदि विदेशी जातियों के साथ शकों का भी वर्णन प्राप्त होता है। वैयाकरण कात्यायन तथा महाभाष्यकार पतंजलि भी शकों से भलीभाँति परिचित थे, जिससे प्रमाणित होता है कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के आसपास ही शकों की उपस्थिति भारतीय जनमानस में सुपरिचित हो चुकी थी।
जैन ग्रंथ ‘कालकाचार्य कथानक’ में उज्जयिनी पर शकों के आक्रमण तथा राजा विक्रमादित्य द्वारा उन्हें पराजित करने का विस्तृत विवरण मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘मनुस्मृति’, ‘गार्गी संहिता’ (युग पुराण खंड सहित), कालिदास कृत ‘मालविकाग्निमित्र’, विशाखदत्त रचित ‘देवीचंद्रगुप्त’, बाणभट्ट कृत ‘हर्षचरित’ तथा राजशेखर रचित ‘काव्यमीमांसा’ जैसे ग्रंथों में भी शकों का उल्लेख प्राप्त होता है, जो यह दर्शाता है कि शकों की स्मृति भारतीय साहित्यिक परंपरा में शताब्दियों तक जीवित रही।
अभिलेखीय एवं मुद्राशास्त्रीय स्रोत
शक तथा पह्लव शासकों के इतिहास-निर्माण में उनके स्वयं के अभिलेख एवं सिक्के भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। शकों के विषय में सबसे प्राचीन जानकारी हखामनी सम्राट दारा प्रथम के नक़्श-ए-रुस्तम प्रस्तर लेख से मिलती है, जिसमें साका (शक) जनजातियों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अनेक अभिलेख भारतीय शक इतिहास के पुनर्निर्माण में विशेष महत्त्व रखते हैं। राजवुल का मथुरा सिंह-ध्वज स्तंभ लेख मथुरा में शक सत्ता के प्रारंभिक स्वरूप तथा राजवुल की धार्मिक गतिविधियों का परिचय देता है, जबकि शोडास का मथुरा दानपत्र लेख उसके उत्तराधिकारी की प्रशासनिक एवं धार्मिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है। नहपान-कालीन नासिक तथा जुन्नार के गुहालेख क्षहरात वंश के भौगोलिक विस्तार, प्रशासनिक संगठन तथा आर्थिक जीवन की महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं, और इसी क्रम में उषावदात के नासिक गुहालेख नहपान के दामाद द्वारा किए गए दान-पुण्य तथा प्रांतीय प्रशासन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। रुद्रदामन का अंधौ अभिलेख तथा जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख कार्दमक वंश के इतिहास, विशेषकर चष्टन-रुद्रदामन के संयुक्त शासन, रुद्रदामन की सैन्य विजयों, उसकी प्रशासनिक नीतियों तथा सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार के संबंध में अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं, जबकि गोंडोफर्नीज़ का तख्त-ए-बाही अभिलेख तक्षशिला क्षेत्र में शक सत्ता के पार्थियन शासन में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को उजागर करता है। इनके साथ-साथ सातवाहन एवं कुषाण शासकों के अभिलेख तथा पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त शक शासकों के हज़ारों सिक्के भी शक इतिहास के कालक्रम तथा भौगोलिक विस्तार को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं।
शकों (सीथियनों) का मूल स्थान और मध्य एशियाई प्रवास
शक प्राचीन मध्य एशिया में निवास करने वाली सीथियन (स्किथियन) जनजातियों के एक समूह का नाम था, जो मूलतः सीर दरिया (जक्सर्तीज़) नदी के उत्तर में निवास करने वाली एक खानाबदोश तथा योद्धा जाति थी। चूँकि प्राचीन भारतीय, ईरानी, यूनानी और चीनी स्रोतों में इनका भिन्न-भिन्न विवरण मिलता है, इसलिए अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि सभी शक सीथियन तो थे, किंतु सभी सीथियन शक नहीं थे। वास्तव में ‘शक’ सीथियन समुदाय की कुछ विशिष्ट जनजातियों का ही जातिगत नाम था।
चीनी ग्रंथों से पता चलता है कि लगभग ईसा पूर्व 165 के आसपास यू-ची नामक एक अन्य शक्तिशाली मध्य एशियाई जाति ने, जो स्वयं हूणों (शियुंग-नू) के आक्रमण से विस्थापित हुई थी, शकों को पराजित कर उनके मूल निवास-क्षेत्र से खदेड़ दिया। इस दबाव में आकर शक सीर दरिया पार कर दो प्रमुख शाखाओं में विभक्त हो गए।
इसी काल में शकों की एक शाखा ने बैक्ट्रिया पर आक्रमण किया और वहाँ के यवन राजा हेलियोक्लीज़ को पराभूत कर बैक्ट्रिया पर अधिकार कर लिया। ध्यातव्य है कि शकों की जिस शाखा ने बैक्ट्रिया विजय की थी, वह हिंदूकुश पर्वत को पार कर कभी भारत में प्रविष्ट नहीं हुई, इसीलिए हेलियोक्लीज़ का शासन कुछ समय तक उत्तर-पश्चिमी भारत में यथावत बना रहा।
शकों की दूसरी शाखा दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़कर वंक्षु (आमू दरिया) नदी को पार कर पार्थियन राज्य पर आक्रमण करने की ओर बढ़ी। पार्थियन राजा फ्रात द्वितीय (लगभग ई.पू. 138-128) और उसका उत्तराधिकारी आर्तेबानस प्रथम (ई.पू. 128-123) अपने प्राण देकर भी शकों की इस बाढ़ को रोक नहीं सके और शकों ने पार्थियन राज्य में घुसकर उसे बुरी तरह से लूटा। दोनों ही पार्थियन शासक शकों के विरुद्ध युद्ध करते हुए मारे गए, जो इस बात का प्रमाण है कि शकों की सैन्य शक्ति उस काल में अत्यंत भयावह थी।
आर्तेबानस के उत्तराधिकारी मिथ्रिदात द्वितीय (ई.पू. 123-88), जो पार्थियन इतिहास के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में गिना जाता है, ने अपनी सैन्य क्षमता के बल पर न केवल शकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि उन्हें यह क्षेत्र छोड़ने पर भी विवश कर दिया। पार्थिया से निष्कासित होकर शक हेलमंड नदी की घाटी में आकर बस गए, जिसे इसी कारण ‘सीस्तान’ (शकस्थान) कहा जाने लगा। यह नाम आज भी ईरान-अफगानिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र में प्रचलित है। यहीं से शक, गंधार और बोलन दर्रे के मार्ग से होते हुए सिंधु नदी की घाटी में आए और सिंधु प्रदेश को अपना स्थायी निवास-स्थान बना लिया, जिसके कारण इस क्षेत्र को कालांतर में ‘शकद्वीप’ भी कहा गया। इसी समय से शकों ने भारत पर आक्रमण करना प्रारंभ किया।
भारत पर शकों का आक्रमण
पार्थिया को जीत पाने में असमर्थ होने के बाद शकों ने सीस्तान और सिंधु मार्ग से भारत में प्रवेश किया। उनके भारत-आक्रमण का समय लगभग ईसा पूर्व 123 के आसपास माना जा सकता है। शकों ने सिंधु नदी के तट पर स्थित मीननगर को अपनी राजधानी बनाया, जो भारत का प्रथम शक राज्य था। यहीं से उन्होंने क्रमशः भारत के अन्य प्रदेशों में अपना प्रसार किया।
एक जैन अनुश्रुति के अनुसार भारत में शकों को आमंत्रित करने का श्रेय जैन आचार्य कालक (कालकाचार्य) को दिया जाता है। परंपरा के अनुसार उन्होंने उज्जयिनी के राजा गर्दभिल्ल के अत्याचारों से तंग आकर पार्थियन राज्य (पारस कुल) में शरण ली थी। जब पार्थिया में मिथ्रिदात द्वितीय की बढ़ती शक्ति के कारण शक संकट में पड़ गए, तो कालकाचार्य ने उन्हें भारत आने के लिए प्रेरित किया। इस अनुश्रुति के अनुसार शक पहले सिंधु प्रदेश में प्रविष्ट हुए और वहाँ अपना राज्य स्थापित किया। इसके पश्चात उन्होंने सौराष्ट्र को जीतकर उज्जयिनी पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा गर्दभिल्ल को परास्त कर दिया। यद्यपि इस कथा की ऐतिहासिकता के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है, किंतु यह इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करती है कि शकों का भारत-प्रवेश सिंधु मार्ग से हुआ और उज्जयिनी उनके प्रारंभिक विस्तार का एक प्रमुख केंद्र बनी।
मीननगर को राजधानी बनाकर शक आक्रांताओं ने सिंधु प्रदेश में जो राज्य स्थापित किया, वह भारत के समस्त शक राज्यों में सर्वाधिक प्रमुख था। शकों ने पश्चिमोत्तर प्रदेशों में यवन सत्ता को समाप्त कर उत्तरापथ एवं पश्चिमी भारत के एक विशाल भूभाग पर अधिकार कर लिया। तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र तथा उज्जयिनी जैसे स्थानों में शकों की भिन्न-भिन्न शाखाएँ स्थापित हुईं। इन विभिन्न शाखाओं के शासक सामान्यतः ‘क्षत्रप’ अथवा ‘महाक्षत्रप’ कहलाते थे, जिससे प्रतीत होता है कि वे स्वयं स्वतंत्र राजा न होकर किसी शक्तिशाली प्रधान शासक की सैद्धांतिक अधीनता स्वीकार करते थे। इस प्रकार शकों की मुख्य राजधानी मीननगर थी, किंतु भारत के विविध प्रदेशों में स्थापित उनके अर्ध-स्वतंत्र राज्य संभवतः मीननगर के शक महाराज की औपचारिक अधीनता स्वीकार करते रहे।
भारत-अफगानिस्तान में शक शाखाएँ : उत्तरी और पश्चिमी क्षत्रप
भारत और अफगानिस्तान में शक शासकों की कुल मिलाकर पाँच प्रमुख शाखाएँ अस्तित्व में आईं, जिनकी राजधानियाँ इन दोनों देशों के अलग-अलग भागों में स्थित थीं। तत्कालीन अफगानिस्तान का शक राज्य आज भी ‘शकस्तान’ अथवा ‘सीस्तान’ के नाम से जाना जाता है। भारत में शकों की चार क्षेत्रीय शाखाओं को सुविधा की दृष्टि से दो प्रमुख वर्गों में संगठित किया जाता है, जिन्हें उत्तरी क्षत्रप तथा पश्चिमी क्षत्रप कहा जाता है। उत्तरी क्षत्रप शाखा के केंद्र तक्षशिला और मथुरा थे, जबकि पश्चिमी क्षत्रप शाखा के केंद्र नासिक तथा उज्जैन थे।
भारत में शक शासक स्वयं को ‘क्षत्रप’ कहते थे। यह शब्द मूलतः पुराने ईरानी (हखामनी-कालीन) शब्द ‘क्षत्रपावन’ (अर्थात प्रांतीय गवर्नर) से व्युत्पन्न हुआ, जो दर्शाता है कि शक शासकों ने ईरानी हखामनी प्रशासनिक परंपरा से अपनी उपाधि तथा शासन-प्रणाली का स्वरूप ग्रहण किया था। शक शासकों की भारत में स्पष्टतः दो शाखाएँ बन गई थीं- एक उत्तरी क्षत्रप, जो तक्षशिला एवं मथुरा में शासन करते थे, तथा दूसरी पश्चिमी क्षत्रप, जो कालांतर में यू-ची (कुषाण) लोगों के बढ़ते दबाव से भयभीत होकर दक्षिण की ओर बढ़ गए और नासिक तथा उज्जैन में जाकर शासन करने लगे।
तक्षशिला के शक शासक
मोग/मोअ : प्रथम क्षत्रप
तक्षशिला के प्रथम क्षत्रप शासक के रूप में मोग अथवा मोअ (लगभग ई.पू. 80) का उल्लेख मिलता है। पंजाब के मैरा नामक स्थान से प्राप्त एक शिलालेख से ‘मोअ’ नामक शक राजा का परिचय प्राप्त होता है, जबकि तक्षशिला से प्राप्त ताम्र-पात्र पर ‘मोग’ नामक शक राजा का उल्लेख मिलता है, जिसके नाम के साथ ‘महाराज’ तथा ‘महान’ जैसे प्रतिष्ठासूचक विशेषण प्रयुक्त हुए हैं। इतिहासकारों का मानना है कि मोअ और मोग संभवतः एक ही व्यक्ति के दो भिन्न नामरूप हैं।
मोग के अनेक सिक्के पश्चिमी पंजाब से प्राप्त हुए हैं, जो यवन सिक्कों के नमूने पर ही ढाले गए प्रतीत होते हैं। इन सिक्कों पर ‘राजाधिराजस महतस मोअस’ का लेख अंकित मिलता है, जिससे स्पष्ट है कि शक राजा मोअ अथवा मोग की स्थिति सामान्य क्षत्रप या महाक्षत्रप से भी कहीं अधिक ऊँची थी। वह स्वयं को ‘राजाधिराज’ तथा ‘महान’ कहलाता था, और संभवतः शकों के अन्य राजकुल उसकी अधीनता स्वीकार करते थे। सिक्कों के प्रसार-क्षेत्र के आधार पर उसके साम्राज्य का विस्तार पुष्कलावती, कपिशा तथा पूर्वी मथुरा तक सिद्ध होता है।
एजेज और एजिलिसेज़
मोग के पश्चात एजेज तक्षशिला का शक शासक हुआ। उसने पंजाब में यूथीडेमस-कुल के यवनों को पराजित कर वहाँ अपनी सत्ता सुदृढ़ की, तथा यवन नरेश अपोलोडोटस द्वितीय एवं हिप्पोस्ट्रेटस की मुद्राओं को अपने नाम से पुनर्टंकित करवाया, जो प्राचीन काल में विजित प्रदेशों पर आधिपत्य दर्शाने की एक सामान्य मुद्राशास्त्रीय प्रथा थी।
एजेज के पश्चात उसके पुत्र एजिलिसेज़ का उल्लेख मिलता है। एजिलिसेज़ की दो प्रकार की मुद्राएँ प्राप्त होती हैं- पहले प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर यूनानी लिपि में एजेज का नाम तथा पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी लिपि में एजिलिसेज़ का नाम उत्कीर्ण है, जबकि दूसरे प्रकार की मुद्राओं पर यूनानी में एजिलिसेज़ का तथा खरोष्ठी में एजेज का नाम मिलता है। इस विसंगति के आधार पर कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि एजेज नाम के दो पृथक शक राजा हुए- एजेज प्रथम, जिसने एजिलिसेज़ से पूर्व शासन किया, तथा एजेज द्वितीय, जिसने एजिलिसेज़ के पश्चात शासन किया।
तक्षशिला के शक शासकों ने संभवतः ईसा पूर्व 20 से लेकर 43-44 ईस्वी तक शासन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि एजेज द्वितीय के शासनकाल से ही पश्चिमोत्तर भारत में शक शक्ति का ह्रास प्रारंभ हो गया था। पहले पार्थियन शासक फ्रायोटीज़ और बाद में प्रसिद्ध पार्थियन नरेश गोंडोफर्नीज़ ने तक्षशिला से शकों के शासन को पूर्णतः समाप्त कर दिया।
मथुरा के शक क्षत्रप
पृष्ठभूमि और कालक्रम
सिंधु प्रदेश से शकों की शक्ति का क्रमिक विस्तार काठियावाड़, गुजरात, कोंकण, महाराष्ट्र और मालवा की दिशा में हुआ और वहाँ से पुनः उत्तर की ओर मथुरा तक पहुँचा। संभावना यह है कि उज्जयिनी की विजय के पश्चात ही शकों ने मथुरा पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। टार्न तथा स्टेन कोनो जैसे विद्वानों ने कालकाचार्य कथानक के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि मालवा में विक्रमादित्य (लगभग 57 ई.पू.) द्वारा पराजित होकर शक मथुरा की ओर आकर बस गए। इसी विक्रमादित्य को परंपरागत रूप से मालव अथवा विक्रम संवत् का संस्थापक माना जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार इसके लगभग 135 वर्ष पश्चात शक संवत् (78 ईस्वी में) प्रारंभ हुआ, जो आज भी भारत के राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्य है।
राजवुल : प्रथम शक क्षत्रप
मथुरा के सिंह-ध्वज अभिलेख से राजवुल (रजुल) के मथुरा के प्रथम शक क्षत्रप होने का उल्लेख प्राप्त होता है। यह सिंह-ध्वज अभिलेख महाक्षत्रप राजवुल के शासनकाल में उसकी प्रधान महिषी (पटरानी) द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था। शिलालेख में महाक्षत्रप राजवुल की पटरानी कमुइअ (कंबोजिका) द्वारा भगवान बुद्ध के अवशेषों पर एक स्तूप तथा एक गुहा-विहार बनवाने का उल्लेख मिलता है। रजुल का समीकरण महाक्षत्रप राजवुल से किया जाता है, जिसका उल्लेख मोरा (मथुरा) से प्राप्त ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण लेख में भी हुआ है।
राजवुल प्रारंभ में शाकल (सियालकोट) का शासक था और उसके सिक्कों पर ‘महाक्षत्रप’ उपाधि अंकित मिलती है। उसने पूर्वी पंजाब को जीतकर वहाँ अवशिष्ट यवन शासन का पूर्ण अंत किया। उसके सिक्के सिंधु नदी की घाटी से लेकर गंगा के दोआब तक व्यापक क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं, जिससे प्रतीत होता है कि राजवुल का अधिकार-क्षेत्र पूर्वी पंजाब से लेकर मथुरा तक विस्तृत था। मथुरा के सिंह-ध्वज अभिलेख में इस क्षेत्र के हगामश तथा हगान जैसे अनेक अन्य शक सरदारों के नाम भी मिलते हैं, किंतु राजवुल के साथ उनके पारस्परिक संबंधों का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता।
शोडास : राजवुल का उत्तराधिकारी
राजवुल के पश्चात उसका पुत्र शोडास क्षत्रप अथवा महाक्षत्रप पद पर आसीन हुआ। शोडास ने मथुरा पर दीर्घकाल तक शासन किया। मथुरा सिंह-ध्वज शिलालेख पर शोडास की उपाधि केवल ‘क्षत्रप’ अंकित है, किंतु मथुरा में ही प्राप्त अन्य शिलालेखों तथा अनेक सिक्कों पर उसे ‘महाक्षत्रप’ संबोधित किया गया है। कंकाली टीला (मथुरा) से प्राप्त एक शिला पट्ट पर उत्कीर्ण ब्राह्मी लेख के अनुसार, स्वामी महाक्षत्रप शोडास के शासनकाल में एक जैन भिक्षु की शिष्या अमोहिनी ने एक जैन विहार की स्थापना करवाई थी।
शोडास के सिक्के मुख्यतः दो प्रकार के मिलते हैं। पहले प्रकार के सिक्कों के मुख भाग पर खड़ी हुई लक्ष्मी तथा पृष्ठ भाग पर लक्ष्मी के अभिषेक का चित्रण मिलता है, और इन पर ‘राजवुल पुतस खतपस शोडासस’ अंकित है। दूसरे प्रकार के सिक्कों पर केवल ‘महाक्षत्रप शोडासस’ लिखा मिलता है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि पहले प्रकार के सिक्के उस काल के हैं जब उसका पिता राजवुल जीवित था, जबकि दूसरे प्रकार के सिक्के राजवुल की मृत्यु के पश्चात के हैं, जब शोडास को शासन के पूर्ण अधिकार प्राप्त हो चुके थे। मथुरा के सिंह-शीर्ष लेख में भी शोडास के नाम के साथ केवल ‘क्षत्रप’ पद ही मिलता है, जिससे प्रतीत होता है कि यह लेख उस काल का है जब राजवुल जीवित था और शोडास उस समय युवराज मात्र था।
गार्गी संहिता के अंतर्गत आने वाले युग पुराण खंड में शकों द्वारा कुणिंद गणराज्य के विनाश का उल्लेख मिलता है, और संभावना व्यक्त की जाती है कि शोडास ने ही इन गणों को विजित कर महाक्षत्रप पद ग्रहण किया था। पूर्वी पंजाब से शोडास का कोई सिक्का प्राप्त नहीं हुआ है, जिससे अनुमान होता है कि उसका प्रत्यक्ष अधिकार-क्षेत्र मथुरा तक ही सीमित रह गया था। शोडास के अभिलेखों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेख मथुरा छावनी के एक कुएँ से प्राप्त एक सिरदल (धरनी) पर उत्कीर्ण मिलता है, जो भारतीय इतिहास में सर्वप्रथम ऐसा अभिलेख है जिसमें मथुरा में कृष्ण-मंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है, जो वैष्णव भक्ति-परंपरा के प्रारंभिक अभिलेखीय प्रमाणों में से एक है।
एक सिक्के पर ‘महाक्षत्रपस पुतस तोरणदासस’ का लेख मिलता है, जो शोडास के सिक्कों से साम्य रखता है; तोरणदास संभवतः राजवुल का द्वितीय पुत्र था, जिसका उल्लेख मोरा के लेख में भी हुआ है। शोडास का समकालीन तक्षशिला का शासक पतिक था। मथुरा लेख में पतिक के साथ मेवकि का नाम भी आता है, तथा गणेशरा गाँव (मथुरा) से प्राप्त एक लेख में क्षत्रप घटाक का भी उल्लेख मिलता है, किंतु शोडास के साथ इन क्षत्रपों के पारस्परिक संबंधों की स्पष्ट जानकारी अनुपलब्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के पूर्वार्ध में तक्षशिला से लेकर उत्तरी महाराष्ट्र तक शकों का ही एकछत्र प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।
मथुरा के शकों की धार्मिक नीति
मथुरा के शक क्षत्रप बौद्ध धर्म के प्रति अत्यंत श्रद्धालु थे। मथुरा के सिंह-ध्वज की सिंह-मूर्तियों के आगे-पीछे तथा नीचे खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण लेख में महाक्षत्रप राजवुल (रजुल) की अग्रमहिषी द्वारा शाक्यमुनि बुद्ध के शरीर-धातु को प्रतिष्ठापित करने तथा बौद्ध विहार को एक जागीर दान देने का उल्लेख मिलता है। मथुरा से प्राप्त एक अन्य लेख में महाक्षत्रप शोडास के शासनकाल में हारिती के पुत्र पाल की पत्नी मोहिनी द्वारा अर्हत् की पूजा हेतु एक मूर्ति की प्रतिष्ठा का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र के क्षहरात शकों की भाँति ही मथुरा के शक कुल भी बौद्ध सद्धर्म के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे, जो शकों की सर्वधर्म-सहिष्णु प्रवृत्ति का परिचायक है।
गंधार का शक वंश
शकों के अनेक सिक्के तथा उत्कीर्ण लेख गंधार तथा पश्चिमी पंजाब क्षेत्र से भी उपलब्ध हुए हैं। तक्षशिला से प्राप्त एक महत्त्वपूर्ण ताम्र-पत्र पर उत्कीर्ण लेख के अनुसार, महाराज महान् मोग के राज्यकाल में क्षहरात चुक्ष प्रांत के क्षत्रप लिअक कुसुलक के पुत्र पतिक ने तक्षशिला में भगवान शाक्यमुनि की अप्रतिष्ठापित शरीर-धातु को विधिपूर्वक प्रतिष्ठापित करवाया था। यह पतिक शोडास का समकालीन तक्षशिला का शासक था। मथुरा के सिंह-शीर्ष पर उत्कीर्ण एक अन्य लेख में पतिक की उपाधि ‘महाक्षत्रप’ दी हुई मिलती है तथा तक्षशिला से प्राप्त एक दूसरे शिलालेख में ‘महादान पति पतिक’ का नाम भी आता है। इतिहासकारों का मत है कि संभवतः ये दोनों उल्लेख एक ही व्यक्ति के हैं, और जिस काल में शोडास मथुरा का क्षत्रप था, उसी काल में पतिक तक्षशिला में महाक्षत्रप के पद पर आसीन था। यह इस बात का प्रमाण है कि गंधार, तक्षशिला और मथुरा के शक क्षत्रप एक-दूसरे के समकालीन रहते हुए परस्पर सहयोगात्मक संबंध बनाए रखते थे।
पश्चिमी भारत के शक क्षत्रप: क्षहरात वंश
यू-ची (कुषाण) आक्रमणों के भय से अनेक शक क्षत्रप ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर ईस्वी प्रथम शताब्दी के मध्यकाल में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण की ओर बढ़कर पश्चिमी भारत में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने लगे थे। पश्चिमी भारत में दो प्रमुख शक वंशों के अस्तित्व के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं- महाराष्ट्र का क्षहरात वंश, जिसका केंद्र नासिक में था और सौराष्ट्र-मालवा का कार्दमक वंश, जिसका केंद्र उज्जैन में था।
क्षहरात वंश का उदय : भूमक
मीननगर के शक महाराज की अधीनता में जो सर्वाधिक शक्तिशाली शक क्षत्रप शासन करते थे, उनका राज्य काठियावाड़, गुजरात, कोंकण, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा मालवा तक के विशाल प्रदेशों में विस्तृत था। इस राज्य पर शासन करने वाले शक कुल को ‘क्षहरात’ कहा जाता है। इसकी राजधानी संभवतः भरुकच्छ (भड़ौच, सौराष्ट्र) में थी, यद्यपि इनके अधिकांश उत्कीर्ण लेख महाराष्ट्र से प्राप्त हुए हैं। क्षहरात कुल का प्रथम ज्ञात क्षत्रप भूमक था। अपने तांबे के सिक्कों पर भूमक ने स्वयं के लिए केवल ‘क्षत्रप’ पद का प्रयोग किया है। उसके अनेक सिक्के महाराष्ट्र तथा काठियावाड़ दोनों क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि ये दोनों प्रदेश उसके शासन के अंतर्गत थे।
नहपान (नहवाण)
नहपान क्षहरात वंश का सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त तथा योग्य शासक था, जो भूमक के पश्चात इस वंश का वास्तविक उत्तराधिकारी नियुक्त हुआ, यद्यपि भूमक के साथ उसके वंशानुगत संबंध का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। नहपान ने अपनी मुद्राओं पर ‘राजा’ की उपाधि धारण की थी। वह अपने प्रारंभिक अभिलेखों में स्वयं को केवल ‘क्षत्रप’ कहता है। उषावदात के नासिक गुहालेख में भी उसे केवल क्षत्रप ही कहा गया है, किंतु शक संवत् 46 के पूना गुहालेख में उसके नाम के साथ ‘महाक्षत्रप’ विशेषण प्रयुक्त मिलता है। इससे प्रतीत होता है कि नहपान को अपनी शक्ति का विस्तार करने हेतु अनेक युद्ध लड़ने पड़े थे, जिसके फलस्वरूप उसकी स्थिति क्षत्रप से बढ़कर महाक्षत्रप के पद तक पहुँच गई।
नहपान का साम्राज्य उत्तर में अजमेर तथा राजपूताना तक विस्तृत था। इसके अंतर्गत काठियावाड़, दक्षिणी गुजरात, पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, नासिक तथा पूना जैसे क्षेत्र सम्मिलित थे। उसके सात उत्कीर्ण लेख तथा हज़ारों चाँदी एवं तांबे के सिक्के अजमेर से लेकर नासिक तक के विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं। नहपान के दामाद उषावदात के नासिक गुहा-लेख से ज्ञात होता है कि उस समय दक्षिणी प्रांत गोवर्धन (नासिक) तथा मामल्ल (पूना) का वायसराय (सूबेदार) स्वयं उषावदात था। नासिक गुहा के एक अन्य लेख से पता चलता है कि उषावदात ने पुष्कर (अजमेर) जाकर वहाँ अभिषेक (पवित्र स्नान) कर तीन हज़ार गायें तथा अनेक गाँव ब्राह्मणों को दान में दिए थे।
नासिक गुहा के इन लेखों से यह स्पष्ट है कि अजमेर का समीपवर्ती प्रदेश नहपान के राज्य के अंतर्गत था। इसी प्रकार लेख में उल्लिखित प्रभास (सोमनाथ, पाटन) सौराष्ट्र (काठियावाड़) में स्थित है, भरुकच्छ की स्थिति भी इसी प्रदेश में है, गोवर्धन नासिक का ही प्राचीन नाम है, तथा शोर्पारण (सोपारा) कोंकण में स्थित है। इस प्रकार यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि काठियावाड़, महाराष्ट्र और कोंकण नहपान के शासन के अंतर्गत थे। नासिक के लेख में उल्लिखित नदियों का भी संबंध गुजरात से है, अतः वह प्रदेश भी नहपान के राज्य में सम्मिलित था।
नासिक के इसी गुहालेख के निकट उषावदात का एक अन्य लेख भी प्राप्त हुआ है, जिसमें दाहूनक नगर और कंकापुर के साथ उजेनि (उज्जयिनी) का भी उल्लेख मिलता है। इन नगरों में भी उषावदात ने ब्राह्मणों को प्रचुर दान-पुण्य किया था, जिससे प्रतीत होता है कि उज्जयिनी भी नहपान के अधीन थी। उज्जयिनी पर नहपान के आधिपत्य की पुष्टि जैन तथा पौराणिक अनुश्रुतियों से भी होती है। जैन अनुश्रुति में उज्जयिनी के राजाओं की सूची में गर्दभिल्ल के पश्चात ‘नहवाण’ नाम आता है और पुराणों में अंतिम शुंग राजाओं के समकालीन विदिशा के एक राजा को ‘नखवानजः’ (अर्थात नखवान का पुत्र) कहा गया है। ‘नहवाण’ तथा ‘नखवान’ दोनों ही क्षहरात-वंशी क्षत्रप नहपान के नामों के ही रूपांतर प्रतीत होते हैं। इस प्रकार नहपान का राज्य उत्तर में राजपूताना तक विस्तृत था तथा इसमें काठियावाड़, दक्षिणी गुजरात, पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, पूना आदि सम्मिलित थे। उसने महाराष्ट्र के एक विशाल भूभाग को सातवाहन राजाओं से छीन लिया था।
नहपान के समय व्यापार-वाणिज्य की प्रगति
नहपान के शासनकाल में व्यापार और वाणिज्य की उल्लेखनीय प्रगति हुई। उसके सिक्के निश्चित मानक (वज़न एवं शुद्धता) के अनुसार ढाले जाते थे और उसके समय में सोने तथा चाँदी के सिक्कों (कर्षापण) की विनिमय दर लगभग 1:35 निर्धारित थी। नासिक के एक लेख में 70,000 कर्षापणों का मूल्य 2,000 स्वर्ण मुद्राओं के समतुल्य बताया गया है। भड़ौच (भरुकच्छ) उस काल में व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र तथा एक प्रसिद्ध बंदरगाह था, जहाँ से उज्जैन एवं प्रतिष्ठान (पैठण) से लाई गई व्यापारिक वस्तुएँ पश्चिमी देशों, विशेषकर रोमन साम्राज्य को निर्यात की जाती थीं। यह व्यापार ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ नामक समकालीन यूनानी नौवहन-पुस्तिका में भी वर्णित है, जिससे इस काल के भारत-रोम व्यापार पर प्रकाश पड़ता है।
नहपान के अभिलेखों में 41 से 46 तक की तिथियाँ मिलती हैं, जो संभवतः 78 ईस्वी में प्रारंभ होने वाले शक संवत् के अनुसार हैं। इस आधार पर नहपान का शासनकाल लगभग 119 से 124 ईस्वी के मध्य माना जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र सातकर्णि ने नहपान को युद्ध में पराजित कर उसकी हत्या कर दी और क्षहरात-वंशी शकों द्वारा शासित प्रदेशों को अपने अधिकार में ले लिया। इस घटना की पुष्टि जोगलथंबी (नासिक) से प्राप्त मुद्रा-भांड के पुनर्टंकित सिक्कों तथा नासिक प्रशस्ति (गौतमीपुत्र सातकर्णि की माता गौतमी बलश्री द्वारा उत्कीर्ण) से होती है, जिसमें गौतमीपुत्र को ‘क्षहरातवंश-निर्वंशकर’ अर्थात क्षहरात वंश का समूल नाश करने वाला कहा गया है।
पश्चिमी भारत के शक क्षत्रप : कार्दमक वंश
सौराष्ट्र तथा मालवा में एक अन्य शक क्षत्रप-कुल भी उज्जैन को केंद्र बनाकर शासन करता था, जो ‘कार्दमक वंश’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस वंश ने लगभग 130 ईस्वी से 388 ईस्वी तक अर्थात लगभग ढाई शताब्दियों तक शासन किया और अंततः गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने इस वंश का अंत किया।
चष्टन और जयदामन
उज्जयिनी का प्रथम स्वतंत्र शक शासक यसामोतिक का पुत्र चष्टन था, जो संभवतः प्रारंभ में कुषाण साम्राज्य की अधीनता में सिंधु क्षेत्र का क्षत्रप नियुक्त हुआ था और जिसे कुषाण साम्राज्य के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत का वायसराय बनाया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में उसने स्वतंत्र होकर ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि धारण कर ली। चष्टन ने अपने पुत्र जयदामन को क्षत्रप नियुक्त किया, किंतु जयदामन की अल्पकाल में ही मृत्यु हो गई। इसके पश्चात चष्टन ने अपने पौत्र (जयदामन के पुत्र) रुद्रदामन को क्षत्रप नियुक्त किया। अंधौ अभिलेख से ज्ञात होता है कि लगभग 130 ईस्वी में चष्टन अपने पौत्र रुद्रदामन के साथ संयुक्त रूप से शासन कर रहा था। यह प्राचीन भारतीय इतिहास में संयुक्त शासन के दुर्लभ किंतु महत्त्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है।
शक-क्षत्रप रुद्रदामन
सत्ता-प्राप्ति और जूनागढ़ अभिलेख
रुद्रदामन कार्दमक वंश का सर्वाधिक योग्य और शक्तिशाली शासक था, जो चष्टन की मृत्यु के पश्चात पश्चिमी भारत के शकों का अधिपति बना। रुद्रदामन के संबंध में सर्वाधिक विस्तृत जानकारी शक संवत् 72 (लगभग 150 ई.) के जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख से प्राप्त होती है, जो प्राचीन भारतीय अभिलेखीय परंपरा में एक अद्वितीय स्थान रखता है। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार ‘सभी जाति के लोगों ने रुद्रदामन को अपना रक्षक चुना था’ तथा उसने स्वयं ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि ग्रहण की थी (सर्ववर्णेभ्यो गम्य रक्षार्थ पतित्वे वृत्तेन। स्वयमधिगत-महाक्षत्रपनाम्ना)। इससे प्रतीत होता है कि रुद्रदामन के शासनारंभ से पूर्व शक शक्ति निर्बल पड़ गई थी, और रुद्रदामन ने अपनी व्यक्तिगत शक्ति तथा दूरदर्शिता के बल पर शक सत्ता को पुनः प्रतिष्ठापित किया।
साम्राज्य-विस्तार और सैन्य विजयें
जूनागढ़ लेख के अनुसार रुद्रदामन के साम्राज्य में आकर-अवंति (पूर्वी व पश्चिमी मालवा), द्वारका के आसपास के प्रदेश, सौराष्ट्र, कच्छ, सिंधु-सौवीर (सिंधु नदी का मुहाना), अपरांत (उत्तरी कोंकण) तथा मरु (मारवाड़) जैसे विस्तृत प्रदेश सम्मिलित थे। इसी अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि रुद्रदामन ने दक्षिणापथ के स्वामी सातकर्णि को दो बार युद्ध में पराजित किया, किंतु वैवाहिक-संबंध की निकटता के कारण उसका वध नहीं किया। यह सातकर्णि संभवतः सातवाहन नरेश वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावी था।
नासिक अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि असिक, अश्मक, मूलक, सुराष्ट्र, कुकुर, अपरांत, अनूप, विदर्भ, आकर तथा अवंति जैसे प्रदेशों पर पूर्व में गौतमीपुत्र सातकर्णि का अधिकार था। इससे अनुमान लगाया जाता है कि रुद्रदामन ने मालवा, सौराष्ट्र तथा कोंकण जैसे प्रदेशों को गौतमीपुत्र के उत्तराधिकारी वाशिष्ठीपुत्र से जीता था, किंतु निकट पारिवारिक संबंध होने के कारण उसे पूर्णतः नष्ट नहीं किया। संभावना यह भी है कि सिंधु नदी की घाटी रुद्रदामन ने कुषाणों से विजित की थी, क्योंकि सुई विहार अभिलेख से पता चलता है कि इस क्षेत्र पर पूर्व में कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम का अधिकार था। जूनागढ़ अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि रुद्रदामन ने पूर्वी पंजाब के स्वाभिमानी यौधेय गणराज्य को पराजित किया, जिसने संभवतः उत्तर दिशा से उसके राज्य पर आक्रमण किया था। यौधेयों को पराजित कर उसने इस आयुधजीवी (शस्त्रजीवी) संघ पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण
रुद्रदामन एक महान विजेता होने के साथ-साथ एक अत्यंत प्रजावत्सल सम्राट भी था। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री वैश्य पुष्यगुप्त द्वारा निर्मित सुदर्शन झील के बाँध में भारी वर्षा के कारण चौबीस हाथ लंबी-चौड़ी तथा पचहत्तर हाथ गहरी एक विशाल दरार पड़ गई थी। झील का समस्त जल बह जाने के कारण स्थानीय प्रजा को भीषण जल-संकट का सामना करना पड़ रहा था। रुद्रदामन ने प्रजा को इस संकट से बचाने हेतु अपनी मंत्रिपरिषद् से धन-व्यय की स्वीकृति माँगी, किंतु जब मंत्रिपरिषद् ने राजकोष से धन व्यय करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, तब प्रजापालक रुद्रदामन ने स्वयं अपने व्यक्तिगत कोष से धन देकर अपने राज्यपाल सुविशाख के निर्देशन में बाँध को पूर्व की अपेक्षा तिगुना अधिक मज़बूत बनवा दिया (स्वास्मात् कोशान् महताधनौघेन अनतिमहता च कालेन त्रिगुण-दृढ़तर-विस्तारयामं सेतुं विधाय)।
प्रजावत्सल रुद्रदामन ने इस लोक-कल्याणकारी निर्माण-कार्य के लिए प्रजा से न तो कोई अतिरिक्त कर लिया और न ही बेगार (विष्टि) अथवा प्रणय (आपातकालीन उपहार-कर) ही वसूल किया (अपीडयित्वा कर विष्टि प्रणय क्रिया भी पोर जन पदं जन), जो प्राचीन भारतीय शासकों में प्रजाहित की एक असाधारण मिसाल है। इस अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि उसका राजकोष स्वर्ण, रजत, हीरे आदि बहुमूल्य रत्नों से परिपूर्ण था (कनक रजत वज्र वैदूर्य रत्नोपचय विष्यन्दमान कोशेन), जो उसके साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि का द्योतक है। सुदर्शन झील का यह अभिलेख भारतीय इतिहास में जल-प्रबंधन तथा सिंचाई-अभियांत्रिकी की प्राचीनतम विस्तृत गाथाओं में से एक है, जो मौर्य काल से लेकर शक काल तक लगभग पाँच शताब्दियों तक इस झील के निरंतर रख-रखाव की परंपरा का प्रमाण है।
प्रशासनिक व्यवस्था
रुद्रदामन एक कुशल प्रशासक भी था। उसने अपने साम्राज्य को विभिन्न प्रांतों में विभक्त कर रखा था, जिनके प्रशासन हेतु योग्य तथा विश्वासपात्र अमात्य (राज्यपाल) नियुक्त किए जाते थे, जैसे आनर्त-सुराष्ट्र प्रांत का शासक सुविशाख था। अत्यंत शक्तिसंपन्न होने पर भी रुद्रदामन निरंकुश शासक नहीं था। शासन-संचालन हेतु एक मंत्रिपरिषद् कार्य करती थी, जिसमें दो प्रकार के मंत्री होते थे- एक ‘मतिसचिव’, जो सम्राट के व्यक्तिगत सलाहकार होते थे तथा दूसरे ‘कर्मसचिव’, जो कार्यकारी मंत्री एवं कार्यपालिका के अधिकारी होते थे। इन्हीं कर्मसचिवों में से राज्यपाल, कोषाध्यक्ष, अधीक्षक आदि पदों पर नियुक्तियाँ की जाती थीं। सम्राट समस्त प्रशासनिक कार्य मंत्रिपरिषद् के परामर्श से ही संपन्न करता था। जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदामन को ‘भ्रष्ट-राज-प्रतिष्ठापक’ अर्थात ‘पदच्युत राजाओं को पुनः प्रतिष्ठापित करने वाला’ कहा गया है, जिससे प्रतीत होता है कि उसने एक कुशल राजनीतिज्ञ की भाँति दूरदर्शिता का परिचय देते हुए विजित राजाओं का राज्य उन्हें ही वापस लौटाकर उन्हें पुनः प्रतिष्ठापित कर दिया था। रुद्रदामन की यह नीति कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक है।
विद्वत्ता, कला-प्रेम और सांस्कृतिक योगदान
रुद्रदामन महान विजेता और कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ व्याकरण तथा तर्कशास्त्र का प्रकांड विद्वान् एवं कला-संगीत का प्रेमी भी था। वह आकर्षक व्यक्तित्व का धनी था, और गिरनार अभिलेख के अनुसार उसने अनेक स्वयंवरों में सम्मिलित होकर अनेक राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया था (नरेन्द्र कन्या स्वयंवरानेक माल्य प्राप्त दाम्ना)। वह स्वयं संस्कृत भाषा का ज्ञाता तथा गद्य-पद्य दोनों प्रकार की रचना में निपुण था (स्फुट लघु मधुर चित्र कांत शब्द समयोदार अलंकृत गद्य पद्य काव्य विधान प्रवीणेन)।
विशुद्ध संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण उसका जूनागढ़ अभिलेख भारतीय इतिहास का प्राचीनतम विस्तृत संस्कृत अभिलेख माना जाता है। इससे पूर्व के अधिकांश राजकीय अभिलेख प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण होते थे, जैसे अशोक के अभिलेख। इस प्रकार रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारतीय भाषा-इतिहास में संस्कृत के राजभाषा-रूप में पुनरुत्थान का एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य है, जिससे आगे चलकर गुप्तकाल में संस्कृत के स्वर्णिम युग की पृष्ठभूमि तैयार हुई। उसके शासनकाल में उज्जयिनी शिक्षा एवं विद्या का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र थी, जिसकी ख्याति कालांतर में गुप्तकाल में और भी अधिक बढ़ गई।

इस प्रकार रुद्रदामन एक महान विजेता, साम्राज्य-निर्माता, कुशल प्रशासक तथा उदार व लोकोपकारी शासक था। संस्कृत भाषा के विकास की दृष्टि से उसका काल एक महत्त्वपूर्ण सीमा-चिह्न (मील का पत्थर) माना जाता है। उसका शासनकाल सामान्यतः लगभग 130 ईस्वी से 150 ईस्वी के मध्य निर्धारित किया जाता है।
शक शासन का पतन
रुद्रदामन के पश्चात ही शक साम्राज्य की शक्ति का क्रमिक ह्रास प्रारंभ हो गया, यद्यपि उसके वंशज कुछ काल तक सौराष्ट्र-मालवा क्षेत्र में शासन करते रहे। पश्चिमी भारत में शक साम्राज्य चौथी शताब्दी ईस्वी तक बना रहा, अर्थात कार्दमक वंश ने रुद्रदामन के बाद भी लगभग दो शताब्दियों तक अपना अस्तित्व बनाए रखा, यद्यपि इस दीर्घकाल में उनकी शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती गई।
अंततः गुप्त राजवंश के प्रतापी सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य, जिन्हें उनकी इसी विजय के कारण ‘शकारि’ (शकों का शत्रु/विजेता) की उपाधि से विभूषित किया जाता है, ने पश्चिमी भारत के अंतिम शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकों के समस्त क्षेत्रों को गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। यह घटना लगभग 388-395 ईस्वी के आसपास घटित हुई मानी जाती है और इसके साथ ही भारत में लगभग पाँच शताब्दियों तक चले शक शासन का अंतिम अध्याय भी समाप्त हो गया। इस विजय के परिणामस्वरूप गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिमी भारत के समृद्ध समुद्री-व्यापारिक क्षेत्रों, विशेषकर सौराष्ट्र तथा गुजरात के बंदरगाहों तक हो गया, जिसने गुप्तकालीन आर्थिक समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
शक शासन का ऐतिहासिक महत्त्व
शक शासन ने भारतीय इतिहास तथा संस्कृति पर अनेक स्थायी प्रभाव छोड़े। राजनीतिक दृष्टि से शकों ने ‘क्षत्रप’ प्रणाली के माध्यम से एक विकेंद्रीकृत किंतु संगठित प्रशासनिक मॉडल भारत में प्रचलित किया, जो आगे चलकर गुप्त तथा उत्तरकालीन भारतीय राजतंत्रों में भी किसी न किसी रूप में परिलक्षित होता है। मुद्राशास्त्रीय दृष्टि से शक शासकों के सिक्कों ने यूनानी, ईरानी तथा भारतीय मुद्रा-परंपराओं के समन्वय को प्रोत्साहित किया। उनके सिक्कों पर प्रायः शासक का शीर्ष-चित्र तथा तिथि-अंकन की परंपरा मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से शकों ने बौद्ध, जैन तथा वैष्णव तीनों ही परंपराओं को संरक्षण प्रदान किया, जो उनकी उदार तथा सर्वधर्म-सम्भाव नीति का प्रमाण है। भाषा एवं साहित्य की दृष्टि से रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा के राजकीय अभिलेखों में पुनरुत्थान का प्रथम बड़ा प्रमाण होने के कारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आर्थिक दृष्टि से शकों के अधीन भरुकच्छ, सोपारा तथा अन्य पश्चिमी तटीय बंदरगाहों के माध्यम से भारत का रोमन साम्राज्य तथा पश्चिम एशिया के साथ समुद्री व्यापार अत्यंत समृद्ध हुआ। इस प्रकार शक शासन, यद्यपि एक विदेशी आक्रांता शक्ति के रूप में प्रारंभ हुआ, किंतु कालांतर में भारतीय संस्कृति में पूर्णतः आत्मसात होकर उसने भारतीय इतिहास के मध्यवर्ती काल को राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।


