मगध का उत्कर्ष
मगध का ऐतिहासिक परिचय
मगध महाजनपद प्राचीन भारत के इतिहास में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जागृति का सर्वप्रमुख केंद्र रहा है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सोलह महाजनपदों में से एक के रूप में उभरकर यह राज्य बुद्धकाल तक एक सुव्यवस्थित, शक्तिशाली और विस्तारशील साम्राज्य के रूप में परिवर्तित हो गया। मगध का भौगोलिक विस्तार उत्तर में गंगा नदी, पश्चिम में सोन नदी और दक्षिण में जंगलों से आच्छादित पठारी क्षेत्रों तक फैला हुआ था। इसकी प्रारंभिक राजधानी गिरिव्रज थी, जो आज राजगीर के नाम से जानी जाती है।
मगध का उत्थान केवल किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, अपितु यह भौगोलिक अनुकूलता, प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता, आर्थिक समृद्धि, सुदृढ़ प्रशासन, सैन्य क्षमता और महत्त्वाकांक्षी शासकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था। समय के साथ मगध का विकास निरंतर होता रहा और यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता और राजनीति का केंद्र बनकर उभरा। मगध का इतिहास इतना व्यापक और प्रभावशाली रहा कि इसे संपूर्ण भारतवर्ष के इतिहास का आधार कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। मगध ने न केवल राजनीतिक एकीकरण को बढ़ावा दिया, अपितु सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए भी एक मजबूत मंच प्रदान किया, जिसने देश की प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाई।
ऐतिहासिक स्रोत
मगध के इतिहास को समझने के लिए अनेक प्राचीन स्रोतों का आश्रय लिया जाता है। पुराण, सिंहली ग्रंथ जैसे दीपवंश और महावंश, बौद्ध ग्रंथ जैसे भगवतीसूत्र, सुत्तनिपात, चुल्लवग्ग, सुमंगलविलासिनी और विविध जातककथाएँ इसकी जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं। इनमें मगध के उदय, उसके विकास-क्रम और शासकों की नीतियों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध होती है। पुराणों में मगध के प्राचीन राजवंशों और उनकी उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है, जबकि बौद्ध और जैन ग्रंथों से धार्मिक एवं सामाजिक परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती है। सिंहली ग्रंथों से विशेष रूप से मगध के शासकों और बौद्ध धर्म के प्रसार पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। इसके अतिरिक्त कौटिल्य का अर्थशास्त्र, यूनानी लेखकों के विवरण तथा अभिलेखीय साक्ष्य भी मगध के इतिहास को समझने में सहायक हैं।
मगध के उत्कर्ष के कारण
मगध के साम्राज्यवाद का उदय और विस्तार प्राक्-मौर्य युगीन भारतीय राजनीति की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। बुद्धकाल में मगध अपने समकालीन महाजनपदों जैसे कोशल, वज्जि और अवंति को आत्मसात् करते हुए तीव्र गति से उन्नति के पथ पर अग्रसर हुआ। मगध के इस असाधारण उत्कर्ष के पीछे अनेक परस्पर पूरक कारण कार्यरत थे, जिन्हें समझे बिना प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास को समझना संभव नहीं है।

भौगोलिक स्थिति
मगध की भौगोलिक स्थिति इसके उत्थान में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाला कारक थी। यह उत्तरी भारत के विशाल गंगा-मैदान के मध्य में स्थित था, जो इसे प्राकृतिक रूप से सुरक्षित और संपन्न बनाता था। गंगा, सोन, गंडक और घाघरा जैसी नदियों ने मगध को प्राकृतिक किलेबंदी प्रदान की, जिससे शत्रुओं के लिए आक्रमण करना अत्यंत कठिन हो जाता था। साथ ही, ये नदियाँ व्यापार और यातायात के लिए महत्त्वपूर्ण मार्ग बनीं, जिसने मगध को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से सशक्त किया।
मगध की दो प्रमुख राजधानियाँ- राजगृह और पाटलिपुत्र सामरिक दृष्टिकोण से आदर्श स्थलों पर अवस्थित थीं। राजगृह, जो सात पहाड़ियों से घिरा था, लगभग अभेद्य प्राकृतिक दुर्ग था। पाटलिपुत्र, जो गंगा और सोन नदियों के संगम पर स्थित था, चारों ओर से नदियों से आवृत होने के कारण शत्रुओं के लिए दुर्गम था। इस भौगोलिक अनुकूलता ने मगध को एक सुरक्षित और समृद्ध केंद्र बनाया।
प्राकृतिक संसाधन
मगध प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से असाधारण रूप से समृद्ध था। इसके निकटवर्ती जंगलों में प्रचुर मात्रा में हाथी उपलब्ध थे, जो प्राचीन युद्धकला में सेना का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग माने जाते थे। मगध क्षेत्र में कच्चे लोहे और ताँबे जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे, जिनका उपयोग उच्च गुणवत्ता के अस्त्र-शस्त्र और कृषि-उपकरण बनाने में किया गया। लोहे की खानों ने वन-प्रदेश को साफ करने में सहायता की, जिससे कृषि-योग्य भूमि का विस्तार हुआ और नए उद्योगों का विकास संभव हो सका। मगध के शासकों ने इन संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग अपनी सैन्य शक्ति के संवर्धन हेतु किया, जो उनके प्रतिद्वंद्वियों की पहुँच से बाहर था।
आर्थिक संपन्नता
मगध की आर्थिक समृद्धि इसके उत्थान का एक अन्य प्रमुख कारक थी। इसका भू-क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ था और प्रचुर वर्षा के कारण कम परिश्रम में अधिक कृषि-उत्पादन प्राप्त होता था। इस अतिरिक्त उत्पादन ने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा दिया, जिससे मगध आर्थिक दृष्टि से संपन्न हुआ। आहत मुद्राओं का प्रचलन, नए उद्योगों की स्थापना और नगरों का विकास इसकी आर्थिक समृद्धि के महत्त्वपूर्ण संकेतक थे। गंगा और सोन नदियों की निकटता ने जलमार्गों के माध्यम से व्यापार को सुगम बनाया, जिससे मगध समस्त व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। इस आर्थिक समृद्धि ने मगध को सैन्य और प्रशासनिक गतिविधियों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए।
स्वतंत्र सामाजिक वातावरण
मगध का सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण अन्य महाजनपदों से भिन्न और अधिक स्वतंत्र था। यह विभिन्न जातीय और सांस्कृतिक धाराओं का संगम-स्थल था। मगध जरासंध, बिंबिसार और अजातशत्रु जैसे शक्तिशाली शासकों की जन्मभूमि थी। साथ ही, यह जैन और बौद्ध धर्मों के उदय का ऐतिहासिक केंद्र भी था, जो वैदिक धर्म के कठोर सामाजिक बंधनों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में उभरे थे। मगध को परंपरागत रूप से ‘अनार्यों का देश’ माना जाता था, जहाँ ब्राह्मण संस्कृति के सामाजिक नियमों में अपेक्षाकृत शिथिलता थी। जैन और बौद्ध धर्मों के सार्वभौमिक दृष्टिकोण ने मगध के सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण को विस्तृत और उदार बनाया, जिससे यह एक शक्तिशाली साम्राज्य के निर्माण का केंद्र बन सका।
योग्य और कुशल शासक
किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए कुशल, पराक्रमी और नीति-निपुण शासकों का होना परम आवश्यक है। मगध इस दृष्टि से अत्यंत सौभाग्यशाली रहा, क्योंकि उसे बिंबिसार, अजातशत्रु, शिशुनाग और महापद्मनंद जैसे असाधारण प्रतिभाशाली शासक मिले। इन शासकों ने अपनी महत्त्वाकांक्षी विजय-नीतियों और दूरदर्शी प्रशासन के माध्यम से मगध को उत्तरोत्तर शक्तिशाली बनाया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग किया और कूटनीति, सैन्य शक्ति तथा प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से मगध को प्राचीन भारत के प्रथम विशाल साम्राज्य के रूप में स्थापित किया।
मगध का आरंभिक इतिहास
मगध का प्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है, जो इसके अत्यंत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण अस्तित्व को प्रमाणित करता है। मगध का विस्तृत इतिहास बौद्ध ग्रंथों, महाभारत और पुराणों में वर्णित है। पुराणों के अनुसार मगध का प्राचीनतम राजवंश बृहद्रथ वंश था, जिसकी स्थापना चेदिराज वसु के पुत्र बृहद्रथ ने की थी। महाभारत और पुराणों के अनुसार बृहद्रथ और उसके पुत्र जरासंध इस वंश के सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक थे। जरासंध ने अपनी सैन्य शक्ति और कूटनीतिक कुशलता से काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, बंग, कलिंग, कश्मीर और गांधार जैसे अनेक शक्तिशाली राज्यों को पराजित कर अपना प्रभाव-क्षेत्र विस्तृत किया। महाभारत में वर्णित जरासंध की शक्ति और उसके विरुद्ध पांडवों के अभियान का वृत्तांत मगध की प्राचीन शक्ति का प्रमाण है।
बृहद्रथ वंश के पश्चात् प्रद्योत वंश का शासन स्थापित हुआ, जिसे समाप्त कर शिशुनाग ने अपने वंश की नींव रखी। शिशुनाग वंश के पश्चात् नंद वंश ने मगध की सत्ता सँभाली। बौद्ध ग्रंथ प्रद्योत को अवंति से संबद्ध करते हैं और शिशुनाग वंश का पृथक् उल्लेख नहीं करते। उनके अनुसार बिंबिसार हर्यंक वंश के प्रथम शासक थे, जिसके पश्चात् शिशुनाग और तदनंतर नंद वंश का शासन रहा। बौद्ध ग्रंथों का यह क्रम ऐतिहासिक घटनाओं को अधिक सुसंगत ढंग से प्रस्तुत करता है।
हर्यंक वंश (लगभग 544 ई.पू.–412 ई.पू.)
मगध साम्राज्य की सुदृढ़ नींव रखने का श्रेय हर्यंक वंश के संस्थापक बिंबिसार को जाता है। यद्यपि बिंबिसार के कुल के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। विभिन्न विद्वानों ने उसे शिशुनाग, हर्यंक अथवा नागकुल से संबंधित बताया है। पुराणों के आधार पर कुछ इतिहासकार बिंबिसार को शिशुनाग वंश से जोड़ते हैं, किंतु बौद्ध ग्रंथों के प्रमाणों से यह स्थापना असंगत प्रतीत होती है। अश्वघोष के बुद्धचरित में बिंबिसार को हर्यंक कुल का बताया गया है, जबकि भंडारकर उसे नागकुल से संबद्ध करते हैं। भंडारकर के मतानुसार उस समय उत्तरी भारत में दो नागवंश विद्यमान थे और बिंबिसार बड़े नागकुल से संबंधित था, जिसका अंतिम शासक नागदास था। प्रो. जसवंत सिंह नेगी का सुझाव है कि बिंबिसार की मुद्राओं पर हरि (नाग) का चिह्न उत्कीर्ण था, जिसके कारण उसे हर्यंक कुल का कहा जाता है। संभवतः हर्यंक वंश नागकुल की ही एक उपशाखा थी। इस विद्वत्-विवाद के बावजूद मगध के उत्थान में बिंबिसार का योगदान निर्विवाद है।
बिंबिसार (लगभग 544–492 ई.पू.)
बिंबिसार ने ईसा पूर्व 544 में हर्यंक वंश की स्थापना की और मगध को एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में विकसित किया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उसे मात्र 15 वर्ष की अल्पायु में उसके पिता ने मगध का राजा घोषित किया। उसके पिता का नाम विभिन्न स्रोतों में भट्टिय, महापद्य, हेमजित, क्षेमजित अथवा क्षेत्रौजा के रूप में मिलता है। दीपवंश में उसे बोधिस नामक राजगृह के शासक के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। जैन साहित्य में उसे ‘श्रेणिक’ कहा गया, जो उसका परिचित उपनाम था। बिंबिसार ने अपनी कूटनीतिक प्रतिभा, सैन्य शक्ति और प्रशासनिक कुशलता से मगध को एक महाशक्ति बनाया।

वैवाहिक संबंध और कूटनीतिक विस्तार
बिंबिसार ने कूटनीति के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपकरण- वैवाहिक संबंध का अत्यंत दक्षता से उपयोग किया। उसने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना से विवाह किया, जिससे उत्तरी सीमा सुरक्षित हुई और वैशाली के समृद्ध व्यापारिक क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित हुआ। विनयपिटक के अनुसार इस विवाह ने लिच्छवियों के रात्रिकालीन आक्रमणों पर अंकुश लगाया और राजधानी में शांति स्थापित की। उसकी प्रिय महारानी कोसलादेवी कोशलाधिपति महाकोशल की पुत्री थीं। इस विवाह से कोशल के साथ मैत्री स्थापित हुई और दहेज में काशी का एक समृद्ध ग्राम प्राप्त हुआ, जिसकी वार्षिक आय एक लाख थी। उसने मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा से विवाह कर पश्चिमोत्तर की शक्तियों का समर्थन भी प्राप्त किया। वैदेही वासवी नामक रानी ने बंदी अवस्था में भी उसकी सेवा की। महावग्ग के अनुसार बिंबिसार की 500 रानियाँ थीं, जो अन्य राज्यों से उसके व्यापक वैवाहिक और कूटनीतिक संबंधों के सूचक हैं।
बिंबिसार ने अवंति के शासक चंडप्रद्योत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया और उसके पांडुरोग की चिकित्सा के लिए अपने राजवैद्य जीवक को भेजा, जो उस काल के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक माने जाते थे। उसका सिंधु के शासक रुद्रायण और गांधार के पुष्करसारिन से भी मैत्री-संबंध था। इन राजनयिक संबंधों ने उसकी विस्तारवादी नीति को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
अंग राज्य की विजय
वैवाहिक और मैत्रीपूर्ण संबंधों से अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् बिंबिसार ने सैन्य शक्ति का प्रयोग किया। उसने पड़ोसी अंग राज्य पर आक्रमण किया, जो मगध का पुराना और प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। अंग नरेश ब्रह्मदत्त ने एक बार बिंबिसार के पिता को पराजित किया था और विधुरपंडित जातक के अनुसार अंग ने राजगृह पर भी अधिकार कर लिया था। बिंबिसार ने ब्रह्मदत्त को पराजित कर उसका वध किया और अंग को मगध में सम्मिलित कर लिया। उसने अपने पुत्र अजातशत्रु को अंग प्रदेश का उपराजा नियुक्त किया। इस विजय से मगध के विस्तार का जो अभियान प्रारंभ हुआ, वह कालांतर में सम्राट अशोक की कलिंग विजय तक अनवरत चलता रहा। बुद्धघोष के अनुसार बिंबिसार के राज्य में 80,000 ग्राम थे और इसका विस्तार लगभग 900 योजन था।
बिंबिसार का प्रशासन
बिंबिसार केवल विजेता ही नहीं, एक दूरदर्शी और कुशल प्रशासक भी था। उसने सुव्यवस्थित शासन के लिए उपराजा, मांडलिक, सेनापति, महामात्र, व्यावहारिक महामात्र, सर्वत्थक महामात्र और ग्रामभोजक जैसे अधिकारियों की नियुक्ति की। सर्वत्थक महामात्र सामान्य प्रशासन का प्रमुख था, जबकि व्यावहारिक महामात्र सेना का अधिपति था। उसे भारतीय इतिहास में स्थायी और नियमित सेना रखने वाले प्रथम शासक का श्रेय प्राप्त है। प्रांतों में राजकुमारों को उपराजा नियुक्त किया जाता था और अधिकारियों को उनके गुण-दोष के आधार पर पुरस्कृत अथवा दंडित किया जाता था। परंपरा के अनुसार उसने राजगृह नगर को एक समृद्ध और भव्य केंद्र के रूप में विकसित किया।
बिंबिसार का धर्म और धार्मिक सहिष्णुता
बिंबिसार का व्यक्तिगत धर्म-विषयक प्रश्न ऐतिहासिक दृष्टि से विवादास्पद है। बौद्ध ग्रंथ उसे बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं, जबकि जैन ग्रंथ उसे जैन मतावलंबी घोषित करते हैं। उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार वह अपनी पत्नी चेलना के प्रभाव में आकर जैन धर्म के अनुयायी बन गया था। तत्पश्चात् विनयपिटक के अनुसार बुद्ध के संपर्क में आने के बाद वह बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हुआ और वेलुवन उद्यान बौद्ध संघ को दान में दे दिया। उसने बौद्ध भिक्षुओं को निःशुल्क जल-यात्रा की अनुमति प्रदान की और राजवैद्य जीवक को बुद्ध की सेवा में नियुक्त किया। वह जैन और ब्राह्मण धर्मों के प्रति भी उदार और सहिष्णु था। दीर्घनिकाय के अनुसार उसने चंपा के ब्राह्मण सोनदंड को वहाँ की संपूर्ण राजस्व-आय दान में दे दी थी। इस धार्मिक सहिष्णुता की नीति ने मगध को विभिन्न संप्रदायों के लिए समान रूप से आकर्षक और स्वीकार्य बनाया।
बिंबिसार का दुखद अंत
बिंबिसार ने दीर्घकाल लगभग 52 वर्षों तक शासन किया, किंतु उसका अंत अत्यंत करुण और दुखद था। बौद्ध तथा जैन दोनों ग्रंथों के अनुसार उसके महत्त्वाकांक्षी पुत्र अजातशत्रु ने बुद्ध के विरोधी देवदत्त के उकसावे पर उसे बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया और भोजन बंद कर दिया। उसकी पत्नी कोसलादेवी गुप्त रूप से उसे भोजन पहुँचाती रही, किंतु अजातशत्रु ने इसे भी बंद करवा दिया और उसके पैरों में घाव करवाए। अंततः ईसा पूर्व 492 के आसपास क्षुधा और पीड़ा से उसकी मृत्यु हो गई। जैन ग्रंथों का कहना है कि एक बार अजातशत्रु चेलना की बात सुनकर उनकी बेड़ियाँ तोड़ने गया, किंतु बिंबिसार ने मृत्यु के भय से विषपान कर लिया। सत्यता जो भी हो, यह निश्चित है कि बिंबिसार के अंतिम दिन कष्टदायक और पीड़ापूर्ण थे तथा उसेअपने पुत्र के पक्ष में सिंहासन और जीवन दोनों का बलिदान करना पड़ा।
अजातशत्रु (लगभग 492–460 ई.पू.)
बिंबिसार के पश्चात् उसका महत्त्वाकांक्षी पुत्र ‘कुणिक’ अजातशत्रु मगध के सिंहासन पर आसीन हुआ। वह अपने पिता की भाँति अदम्य साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का स्वामी था। सिंहासन प्राप्त करने पर उसेअनेक समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा, किंतु उसने अपनी बुद्धिमत्ता, सैन्य शक्ति और दूरदर्शी कूटनीति से सबका समाधान कर मगध के साम्राज्य को उत्कर्ष के चरमबिंदु तक पहुँचा दिया।
कोशल से संघर्ष और समझौता
बिंबिसार की मृत्यु के पश्चात् उसकी कोशल-पत्नी कोसलादेवी की भी शोक में मृत्यु हो गई। इससे क्रुद्ध होकर कोशल नरेश प्रसेनजित ने अजातशत्रु के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया और काशी पर अधिकार कर लिया। संयुक्तनिकाय के अनुसार प्रथम युद्ध में प्रसेनजित पराजित हुआ और उसे श्रावस्ती में शरण लेनी पड़ी। द्वितीय युद्ध में अजातशत्रु परास्त हुआऔर बंदी बना लिया गया। अंततः दोनों में संधि हुई, जिसके अनुसार काशी अजातशत्रु को वापस लौटा दी गई और प्रसेनजित ने अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से कर दिया। इस संधि ने मगध-कोशल संबंधों को सुदृढ़ आधार प्रदान किया और मगध के विस्तार को नई गति दी।

मगध-वज्जि संघर्ष
अजातशत्रु गणराज्यों की स्वतंत्रता को मगध के यथार्थ विस्तार में प्रमुख बाधा मानता था। कोशल से निपटने के पश्चात् उसने वज्जिसंघ पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जिसकी प्रमुख शक्ति वैशाली के लिच्छवि थे। सुमंगलविलासिनी के अनुसार संघर्ष का एक कारण गंगा के तट पर स्थित रत्नों की खान थी, जिस पर वज्जियों ने अधिकार कर लिया था। जैन ग्रंथों के अनुसार संघर्ष का तात्कालिक कारण बिंबिसार द्वारा अपनी पत्नी चेलना से उत्पन्न पुत्रों हल्ल और बेहल्ल को दिए गए सेयनाग हाथी और रत्नहार को वापस माँगना था। जब इन्होंने लौटाने से इनकार कर अपने नाना चेटक के यहाँ शरण ली, तो अजातशत्रु ने युद्ध प्रारंभ कर दिया। वस्तुतः वास्तविक कारण गंगा के व्यापार-मार्ग पर नियंत्रण स्थापित करना था, शेष सब कारण बहाने मात्र थे।
अजातशत्रु लिच्छवियों की संगठित शक्ति से भलीभाँति परिचित था। निरयावलिसूत्र के अनुसार लिच्छवि शासक चेटक ने नौ लिच्छवि गणों, नौ मल्ल गणों और काशी-कोशल के अठारह गणराज्यों को एकजुट कर एक शक्तिशाली मोर्चा बनाया था। अजातशत्रु ने पाटलिग्राम में एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया, जो यही आगे चलकर पाटलिपुत्र नगर बना। उसने भगवान बुद्ध से भी परामर्श लिया, जिन्होंने बताया कि वज्जिसंघ की एकता बनी रहने तक उन्हें जीत पाना असंभव है। तब अजातशत्रु ने अपने चतुर मंत्री वस्सकार को वज्जिसरदारों में फूट डलवाने हेतु भेजा। वस्सकार ने तीन वर्षों तक वैशाली में रहकर लिच्छवियों में आपसी अविश्वास और द्वेष उत्पन्न किया। इसके पश्चात् अजातशत्रु ने विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। निरयावलिसूत्र के अनुसार उसने इस युद्ध में रथमूसल, जो टैंक जैसे रथ का आदिम रूप था और महाशिलाकंटक (पत्थर फेंकने वाला प्रक्षेपास्त्र) जैसे अत्याधुनिक युद्धास्त्रों का प्रयोग किया। सोलह वर्षों के भीषण संघर्ष के पश्चात् उसने वज्जिसंघ और मल्लसंघ दोनों को पराजित कर मगध में सम्मिलित कर लिया, जिससे मगध की सीमाएँ पूर्वी उत्तर प्रदेश तक विस्तृत हो गईं।
अवंति से संबंध
अवंति उस काल में मगध का प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी था। मज्झिमनिकाय के अनुसार अवंति नरेश प्रद्योत के आक्रमण के भय से अजातशत्रु ने राजगृह का दुर्गीकरण करवाया था। दोनों के बीच कोई प्रत्यक्ष और निर्णायक युद्ध नहीं हुआ, क्योंकि दोनों एक-दूसरे की शक्ति से भलीभाँति परिचित थे। भास के स्वप्नवासवदत्ता के अनुसार अजातशत्रु की पुत्री का विवाह वत्सराज उदयन से हुआ था, जिससे वत्स मगध का मित्र बन गया और अवंति को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका। इस प्रकार कूटनीति के माध्यम से अजातशत्रु ने अवंति को कमजोर किया।
अजातशत्रु की धार्मिक नीति
अजातशत्रु एक उदार और सहिष्णु धार्मिक सम्राट था। संभवतः वह प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयायी था। उसके शासनकाल में गौतम बुद्ध और भगवान महावीर दोनों का महापरिनिर्वाण हुआ। भरहुत स्तूप की वेदिका पर उसे बुद्ध की वंदना करते हुए चित्रित किया गया है, जिससे स्पष्ट है कि कालांतर में वह बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। उसने बुद्ध के अवशेषों पर राजगृह में एक भव्य स्तूप का निर्माण करवाया। ईसा पूर्व 483 (467?) में सप्तपर्णी गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ, जिसमें सुत्तपिटक और विनयपिटक का संकलन किया गया। सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक शासन किया और ईसा पूर्व 460 में उसके पुत्र उदायिन ने उसका वध कर दिया।
उदायिन (लगभग 460–444 ई.पू.)
ईसा पूर्व 460 में उदायिन मगध के सिंहासन पर आसीन हुआ। बौद्ध ग्रंथ उसे पितृहंता के रूप में वर्णित करते हैं, जबकि जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन उसे पितृभक्त और धर्मनिष्ठ बताते हैं। उसकी माता का नाम पद्मावती था। वह अपने पिता के शासनकाल में चंपा के उपराजा पद पर था। उदायिन अपने पिता की भाँति वीर और विस्तारवादी स्वभाव का था। उसकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उसने गंगा और सोन नदियों के संगम पर पाटलिपुत्र नामक नगर की स्थापना की और राजधानी को राजगृह से वहाँ स्थानांतरित किया। पाटलिपुत्र आगे चलकर विश्व के सबसे बड़े और भव्य नगरों में से एक बना। इस काल में भी अवंति के साथ शत्रुता बनी रही, किंतु कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ। एक दिन धर्मोपदेश सुनते समय अवंति के एक गुप्तचर ने उसकी छुरा भोंककर हत्या कर दी। उदायिन जैन धर्म का अनुयायी था और उसने एक जैन चैत्यगृह का निर्माण करवाया था।
उदायिन के उत्तराधिकारी और हर्यंक वंश का पतन
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उदायिन के तीन पुत्र- अनिरुद्ध, मुंडक और नागदासक क्रमशः पितृहंता सिद्ध हुए और बारी-बारी से शासक बने। नागदासक (पुराणों में ‘दर्शक’) इस वंश का अंतिम और विलासी शासक था। उसकी निष्क्रियता और राज-व्यवस्था की शिथिलता से जनता में व्यापक असंतोष उत्पन्न हो गया। जनविद्रोह के पश्चात् शिशुनाग को राजा बनाया गया। कुछ इतिहासकारों के मतानुसार शिशुनाग नागदासक का सेनापति था, जिसने अवंति पर सफल आक्रमण किया और नागदासक को हटाकर ईसा पूर्व 412 में शिशुनाग वंश की स्थापना की।
हर्यंक वंश का ऐतिहासिक महत्त्व
हर्यंक वंश के शासनकाल का भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व है, क्योंकि इसी काल में मगध ने अंग, काशी और वज्जि जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी राज्यों पर विजय प्राप्त कर उत्तर भारत की अग्रणी शक्ति के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ की। साथ ही, यह काल गौतम बुद्ध और महावीर जैसे महान धर्म-प्रवर्तकों का समकालीन युग भी था, जिससे बौद्ध और जैन धर्मों के प्रारंभिक विकास तथा प्रसार को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। इस प्रकार हर्यंक वंश ने आगे चलकर नंद और मौर्य साम्राज्यों के उदय की राजनीतिक तथा प्रशासनिक आधारभूमि तैयार की।
शिशुनाग वंश (लगभग 412 ई.पू.–344 ई.पू.)
शिशुनाग वंश मगध पर शासन करने वाला वह राजवंश था, जिसने हर्यंक वंश के पतन के पश्चात सत्ता संभाली। इस वंश की स्थापना शिशुनाग ने की, जो पूर्ववर्ती हर्यंक वंश के अंतिम शासक नागदशक (दर्शक) का अमात्य (मंत्री) था और जनता के विद्रोह के परिणामस्वरूप उसे ही मगध का नया शासक बनाया गया था।
शिशुनाग (लगभग 412–394 ई.पू.)
शिशुनाग ने ईसा पूर्व 412 में मगध की राजसत्ता ग्रहण की। उसके मूल के विषय में स्रोतों में मतभेद है- महावंशटीका के अनुसार वह एक लिच्छवि राजा और उसकी वेश्या-पत्नी का पुत्र था, जबकि पुराण उसे वाराणसी (काशी) के एक क्षत्रिय परिवार से संबंधित बताते हैं। शिशुनाग की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मगध के प्रबल और दीर्घकालीन प्रतिद्वंद्वी अवंति महाजनपद (राजधानी उज्जयिनी) को पराजित कर उसे मगध साम्राज्य में सम्मिलित करना था, जो उस समय प्रद्योत वंश के अधीन एक शक्तिशाली राज्य था। इस विजय के परिणामस्वरूप वत्स महाजनपद (राजधानी कौशांबी), जो पहले से ही अवंति के प्रभाव-क्षेत्र में था, भी स्वाभाविक रूप से मगध के अधीन आ गया। इन विजयों ने मगध के साम्राज्य का विस्तार बंगाल की खाड़ी से लेकर मालवा तक कर दिया। शिशुनाग ने वैशाली को अपनी द्वितीय राजधानी बनाया, जो कालांतर में मगध की प्रमुख राजधानी बन गई। ईसा पूर्व 394 में उसकी मृत्यु हो गई।।
कालाशोक/काकवर्ण (लगभग 394–366 ई.पू.)
शिशुनाग के पश्चात उसका पुत्र कालाशोक (जिसे पुराणों में काकवर्ण भी कहा गया है) ईसा पूर्व 394 में मगध का शासक बना। कालाशोक ने अपनी राजधानी पुनः पाटलिपुत्र स्थानांतरित कर दी। उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन थी, जो वैशाली में लगभग 383 ई.पू. (बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग सौ वर्ष पश्चात) संपन्न हुई। इस संगीति में विनय-नियमों की व्याख्या को लेकर उत्पन्न मतभेदों पर विचार हुआ, जिसके फलस्वरूप बौद्ध संघ स्थविरवादीऔर महासांघिक दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित हो गया। यह विभाजन बौद्ध धर्म के इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। हर्षचरित के अनुसार पाटलिपुत्र में महापद्मनंद नामक नापित ने उसकी हत्या चाकू से कर दी। उसकी मृत्यु ईसा पूर्व 366 में हुई।
उत्तरवर्ती शासक और वंश का पतन
कालाशोक के पश्चात पुराणों के अनुसार उसके दस पुत्रों ने संयुक्त या क्रमिक रूप से लगभग 22 वर्षों तक शासन किया, यद्यपि इनके व्यक्तिगत नामों और शासनकाल के विषय में ऐतिहासिक स्रोतों में स्पष्टता का अभाव है। इस काल में केंद्रीय सत्ता क्रमशः दुर्बल होती गई। अंततः शिशुनाग वंश के अंतिम शासकों को अपदस्थ कर महापद्म नंद ने मगध की सत्ता पर अधिकार कर लिया, जिसके साथ ही शिशुनाग वंश का अंत हुआ और लगभग 344 ई.पू. शक्तिशाली नंद वंश की स्थापना हुई।
शिशुनाग वंश का महत्त्व
शिशुनाग वंश का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान अवंति जैसे प्रतिद्वंद्वी महाजनपद पर विजय प्राप्त करके मगध के प्रभुत्व को और सुदृढ़ करना था, जिससे मगध उत्तर भारत की निर्विवाद प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित हो गया। साथ ही, इसी वंश के काल में हुई द्वितीय बौद्ध संगीति बौद्ध धर्म के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस प्रकार शिशुनाग वंश ने हर्यंक वंश द्वारा स्थापित मगध-साम्राज्य की नींव को और विस्तृत करते हुए आगे आने वाले नंद और मौर्य साम्राज्यों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।
नंद वंश (लगभग 344 ई.पू.–322 ई.पू.)
शिशुनाग वंश के पतन के पश्चात नंद वंश ने मगध की सत्ता पर अधिकार किया और भारतीय इतिहास में पहली बार एक अत्यंत विशाल तथा सुसंगठित साम्राज्य की स्थापना की। इस वंश की स्थापना महापद्म नंद ने की थी और इसने लगभग पाँचवीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तरी भारत पर शासन किया, जिसकी जानकारी पुराणों, जैन तथा बौद्ध ग्रंथों और यूनानी लेखकों के विवरणों से प्राप्त होती है।
पुराणों में नंद वंश को अत्यंत शक्तिशाली बताया गया है और महापद्म नंद को ‘एकराट्’ अर्थात् समस्त क्षत्रिय शक्तियों का उन्मूलन कर संपूर्ण पृथ्वी का एकछत्र शासक कहा गया है। महापद्म नंद के मूल के विषय में विभिन्न स्रोतों में भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं- पुराणों में उसे शिशुनाग वंश के अंतिम शासक महानंदिन की शूद्रा पत्नी का पुत्र बताया गया है, जैन ग्रंथों के अनुसार वह एक नाई (नापित) पिता और वेश्या माता की संतान था, जबकि यूनानी लेखकों के अनुसार भी उसके पिता नाई थे। कहा जाता है कि उसने राजमाता का प्रेम प्राप्त कर अंतिम शासक की हत्या कर दीऔर इस प्रकार मगध की राजसत्ता पर अधिकार कर लिया।
महापद्मनंद (लगभग 344–329/324 ई.पू.)
महापद्मनंद नंद वंश का संस्थापक और सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। यद्यपि पुराण उसे शिशुनाग वंश का बताते हैं, जो संभवतः उसकी वैधता स्थापित करने का राजनीतिक प्रयास था, किंतु बौद्ध और जैन ग्रंथ उसे नंद वंश का संस्थापक स्वीकार करते हैं। उसकी ‘एकराट’ (एकमात्र सर्वोच्च शासक), ‘सर्वक्षत्रांतक’ (समस्त क्षत्रियों का विनाशक) और ‘द्वितीय परशुराम’ (परशुराम के समकक्ष क्षत्रिय-संहारकर्ता) जैसी उपाधियाँ उसके सैन्य पराक्रम और विजयों की व्यापकता का प्रमाण हैं।

महापद्मनंद की विजयों ने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक मानचित्र को आमूल परिवर्तित कर दिया। उसने इक्ष्वाकु (अयोध्या और श्रावस्ती के आसपास का कोशल क्षेत्र), पांचाल (उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली और रामपुर क्षेत्र), कौरव्य (दिल्ली, कुरुक्षेत्र और थानेश्वर), काशी (वाराणसी क्षेत्र), हैहय (नर्मदा तट के दक्षिणी प्रदेश), अश्मक (गोदावरी घाटी), वीतिहोत्र (दक्षिणापथ में अश्मक और हैहय के निकटवर्ती क्षेत्र), कलिंग (उड़ीसा का वैतरणी और वराह नदियों के मध्यवर्ती भाग), शूरसेन (मथुरा क्षेत्र) और मिथिला (बिहार का मुजफ्फरपुर-दरभंगा क्षेत्र और नेपाल की तराई का कुछ भाग) जैसे विविध और शक्तिशाली राज्यों को अपने अधीन किया। उसका साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक और पश्चिम में सिंधु से पूर्व में मगध तक विस्तृत था।
खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से महापद्मनंद की कलिंग-विजय की पुष्टि होती है। इस अभिलेख से पता चलता है कि वह कलिंग से एक जिन-प्रतिमा को मगध ले आया और कलिंग में एक नहर का निर्माण करवाया, जो उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक दूरदृष्टि का परिचायक है। मैसूर से प्राप्त बारहवीं शताब्दी के अभिलेखों में कुंतल (संभवतः कर्नाटक क्षेत्र) पर उनकी विजय का उल्लेख मिलता है। कर्टियस और डियोडोरस जैसे यूनानी लेखकों के अनुसार उसका साम्राज्य पश्चिम में व्यास नदी तक फैला था, जो सिकंदर के आक्रमण के समय नंदों की अपराजेय शक्ति का प्रमाण है।
महापद्मनंद की सैन्य शक्ति का मुख्य आधार उसकी विशाल और सुसंगठित सेना तथा प्रचुर संसाधन थे। पुराणों के अनुसार उसकी सेना इतनी विशाल थी जो हिमालय और विंध्याचल के बीच किसी भी विरोध को दबाने में पूर्णतः सक्षम थी। कथासरित्सागर जैसे साहित्यिक स्रोतों में नंदों की संपत्ति को ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राओं तक आँका गया है, जो उनकी असाधारण आर्थिक समृद्धि का प्रमाण है। उसने विजित राज्यों से भारी राजस्व एकत्र किया, व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित किया और लोहे तथा अन्य खनिजों का उपयोग उन्नत हथियारों के निर्माण में किया।
महापद्मनंद की शूद्र उत्पत्ति के कारण उसे उच्च वर्णों, विशेषकर क्षत्रियों के कठोर विरोध का सामना करना पड़ा। इसीलिए उसे ‘सर्वक्षत्रांतक’ की उपाधि दी गई, जो उसके द्वारा क्षत्रिय राजवंशों के व्यापक विनाश का सूचक है। फिर भी वह जैन धर्म का अनुयायी था और उसने अपने शासन में जैन मंत्री कल्पक को उच्च पद पर नियुक्त किया था। यह नीति धार्मिक सहिष्णुता के साथ-साथ निम्न वर्णों को सत्ता में भागीदारी देने की उसकी रणनीतिक सोच को भी प्रतिबिंबित करती है।
नंद वंश के उत्तरवर्ती शासक
महापद्म नंद के पश्चात पुराणों के अनुसार उसके आठ पुत्रों ने क्रमशः शासन किया, यद्यपि इनके व्यक्तिगत नामों तथा प्रत्येक के शासनकाल के विषय में स्रोतों में पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। इन आठों पुत्रों जिनमें धनानंद सर्वाधिक प्रसिद्ध और अंतिम शासक था। नंद वंश ने कुल मिलाकर लगभग 100 वर्षों (पुराणों के अनुसार 88 वर्ष और कुछ के अनुसार 22 वर्ष) तक शासन किया। यूनानी स्रोत इस वंश के अंतिम एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक का उल्लेख ‘अग्रमीज़’ या ‘ज़ैंड्रामीज़’ के नाम से करते हैं, जिसकी पहचान सामान्यतः वंश के अंतिम शासक धनानंद से की जाती है।
धनानंद (लगभग 329/324–322 ई.पू.)
नंद वंश का अंतिम शासक धनानंद सिकंदर का समकालीन था। यूनानी लेखक कर्टियस के अनुसार उसकी सेना में दो लाख पैदल सैनिक, 20,000 घुड़सवार, 2,000 रथ और 3,000 हाथी थे। यह विशाल सेना ही वह कारण थी जिसने सिकंदर के सैनिकों को व्यास नदी के आगे बढ़ने से रोक दिया। उसका साम्राज्य हिमालय से गोदावरी और सिंधु से मगध तक विस्तृत था। महावंशटीका के अनुसार वह लालची और कंजूस प्रवृत्ति का था, जिसके कारण उसे ‘धनानंद’ कहा गया है। कथासरित्सागर के अनुसार उसके पास 11 करोड़ स्वर्णमुद्राओं का कोष था। उसकी व्यापक अलोकप्रियता, कठोर कराधान-नीति और एक बार चाणक्य के साथ दुर्व्यवहार के कारण ही चंद्रगुप्त मौर्य ने उसे पराजित करने का संकल्प लिया। मुद्राराक्षस के अनुसार चाणक्य की अपराजेय कूटनीति और चंद्रगुप्त की सैन्य शक्ति ने संयुक्त रूप से ईसा पूर्व 322 में नंद वंश का अंत कर दिया और मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।

नंद वंश की उपलब्धियाँ
सामाजिक-राजनीतिक क्रांति
नंद वंश का उदय भारतीय इतिहास में एक प्रकार की सामाजिक और राजनीतिक क्रांति का प्रतीक माना जाता है। परंपरागत रूप से निम्न वर्ण (कुछ स्रोतों के अनुसार शूद्र-कुल) से संबद्ध होने के बावजूद नंद शासकों ने भारत के राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया को अभूतपूर्व गति प्रदान की और उत्तर भारत में एकछत्र शासन-व्यवस्था स्थापित की। महापद्म नंद ने गंगा घाटी की परंपरागत सीमाओं को लाँघकर साम्राज्य का विस्तार विंध्याचल पर्वत-श्रृंखला तक किया, जो प्राचीन भारतीय राजनीतिक इतिहास में उस समय तक की एक सर्वथा अभूतपूर्व उपलब्धि थी। नंद शासकों की सुशिक्षित, विशाल और सुसंगठित सेना ने न केवल आंतरिक विद्रोहों को दबाने में, बल्कि संभावित बाह्य आक्रमणों को रोकने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इस प्रकार परवर्ती मौर्य शासकों के लिए एक अत्यंत सुदृढ़ प्रशासनिक तथा सैन्य आधार तैयार हुआ।
आर्थिक समृद्धि, शिक्षा और साहित्य का केंद्र
मगध की अपार आर्थिक समृद्धि ने राजधानी पाटलिपुत्र को उस काल में शिक्षा और साहित्य के एक प्रमुख केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। कहा जाता है कि पाणिनि, वर्ष, उपवर्ष, वररुचि (कात्यायन) जैसे तत्कालीन विद्वानों की सक्रियता इसी काल-खंड के आसपास मानी जाती है, यद्यपि इनमें से कुछ की सटीक कालावधि को लेकर विद्वानों में मतभेद भी पाया जाता है। नंद शासक जैन धर्म के प्रति विशेष झुकाव तथा संरक्षण के लिए भी जाने जाते हैं — परंपरा के अनुसार उन्होंने कल्पक, शकटाल (शकडाल) और स्थूलभद्र जैसे जैन-मतावलंबी विद्वानों को अपने राज्य में मंत्री-पद प्रदान किए थे। विशाखदत्त-रचित नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में भी नंद-वंश के जैन-संबद्धता के संकेत मिलते हैं। पाँचवीं शताब्दी ई. में भारत आए चीनी यात्री फाह्यान ने भी पाटलिपुत्र में नंदों की अतुल धन-संपदा से संबंधित परंपरा का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार वहाँ नंदों के पाँच कोषागारों के प्रतीक स्वरूप पाँच स्तूप विद्यमान थे।
नंद वंश का महत्त्व
नंद वंश का भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व इस बात में निहित है कि इसी वंश के अंतर्गत मगध पहली बार एक सीमित क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़कर उत्तर भारत के अधिकांश भू-भाग पर नियंत्रण रखने वाले एक विशाल साम्राज्य के रूप में स्थापित हुआ। नंद शासकों की सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था, विशाल सैन्य-शक्ति तथा सुसंगठित कर-प्रणाली ने आगे चलकर मौर्य साम्राज्य के निर्माण हेतु एक सुदृढ़ आधारभूमि प्रदान की। वास्तव में नंद वंश को उत्तर भारत में साम्राज्यवादी एकीकरण की प्रक्रिया की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कड़ी माना जाता है, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य के नेतृत्व में स्थापित होने वाले मौर्य साम्राज्य का मार्ग प्रशस्त किया।
इस प्रकार बुद्धकालीन राजतंत्रों में मगध सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरकर सामने आया। हर्यंक वंश के बिंबिसार और अजातशत्रु से लेकर शिशुनाग वंश और अंततः नंद वंश के शासकों ने अपने-अपने काल में मगध को उत्तरोत्तर प्रगति के नए शिखरों तक पहुँचाया। नंद शासकों द्वारा राजनीतिक और सांस्कृतिक, दोनों ही दृष्टियों से तैयार की गई इसी सुदृढ़ पृष्ठभूमि पर आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने भारतीय इतिहास के सर्वाधिक भव्य और विस्तृत मौर्य साम्राज्य का निर्माण किया।


