पार्थियन सभ्यता (Parthian Civilization)

पार्थियन सभ्यता (Parthian Civilization)
पार्थियन सभ्यता भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्राचीन ईरान के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित वर्तमान खुरासान […]

पार्थियन सभ्यता

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भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्राचीन ईरान के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित वर्तमान खुरासान तथा उसके समीपवर्ती उत्तरी मरुस्थलीय प्रदेश को प्राचीन काल में पार्थव या पारतक्क कहा जाता था। इस क्षेत्र का ईरानी इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके उत्तर में कैस्पियन सागर तथा उससे संबंधित प्रदेश स्थित थे, जबकि पार्थिया और कैस्पियन सागर के मध्य हाइरकेनिया नामक समृद्ध प्रांत अवस्थित था। प्राकृतिक संसाधनों, व्यापारिक मार्गों तथा सामरिक दृष्टि से यह संपूर्ण क्षेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।

हखामनी (आकेमेनिड) सम्राट दारा प्रथम (522–486 ई. पू.) के शासनकाल में पार्थिया और हाइरकेनिया दोनों ही पारसी साम्राज्य के सत्रप (प्रांत) थे। दारा प्रथम के प्रसिद्ध बेहिस्तून अभिलेख तथा अन्य शिलालेखों में पार्थिया का उल्लेख उसके अधीनस्थ प्रांतों में किया गया है। इस प्रकार पार्थिया प्रारंभ से ही ईरानी साम्राज्य का अभिन्न अंग रहा।

330 ईसा पूर्व में हखामनी साम्राज्य के पतन के बाद यह प्रदेश सिकंदर महान के विशाल हेलेनिस्टिक साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। सिकंदर की मृत्यु (323 ई. पू.) के पश्चात् उसके साम्राज्य के विभाजन के परिणामस्वरूप पार्थिया पर सिल्यूकस प्रथम निकेटर द्वारा स्थापित सेल्यूसिड वंश का अधिकार हो गया। लगभग एक शताब्दी तक यह क्षेत्र सेल्यूसिड शासन के अधीन रहा, किंतु समय के साथ उनकी शक्ति क्षीण होने लगी और इसी राजनीतिक दुर्बलता ने पार्थियन साम्राज्य के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

पार्थियन शक्ति का उदय

सेल्यूसिड साम्राज्य की दुर्बलता के समय मध्य एशिया के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में रहने वाले दाही नामक घुमंतू संघ के पर्णी कबीले ने राजनीतिक रूप से उभरना प्रारंभ किया। पर्णी घुड़सवारी, तीरंदाजी तथा युद्ध-कौशल में अत्यंत निपुण थे। उनका जीवन पूर्णतः सैन्य परंपराओं पर आधारित था। युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त करना वे सम्मान का विषय मानते थे, जबकि शय्या पर प्राकृतिक मृत्यु को अपमानजनक समझते थे।

इसी पर्णी कबीले के नेतृत्व में पार्थियन शक्ति का उदय हुआ। परंपरा के अनुसार पर्णी कबीले का प्रथम नेता अर्शक प्रथम (Arsaces I) था, जिसे पार्थियन साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है। कुछ प्राचीन स्रोतों में उसे बैक्ट्रिया के यूनानी प्रशासन से संबद्ध बताया गया है, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार उसे पर्णी जनजाति का प्रमुख मानते हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य में पार्थिया के सेल्यूसिड गवर्नर एंड्रागोरस ने सेल्यूसिड शासन के विरुद्ध विद्रोह कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

अर्शक प्रथम ने इस राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाते हुए एंड्रागोरस को पराजित किया और लगभग 247 ईसा पूर्व में पार्थिया पर अधिकार स्थापित कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। इसी घटना को पार्थियन साम्राज्य का वास्तविक प्रारंभ माना जाता है। चूँकि इस वंश के संस्थापक का नाम अर्शक था, इसलिए इस राजवंश को अर्शकानी (Arsacid) या अशकानी वंश कहा गया। पार्थिया पर शासन करने के कारण इन्हें सामान्यतः पार्थियन कहा जाता है। बाद के चीनी स्रोतों में पार्थियन राजवंश को ‘आनक्सी’ कहा गया है।

अर्शकानी या अशकानी वंश का राजनीतिक इतिहास

अर्शक प्रथम (लगभग 247–217 ई. पू.)

अर्शक प्रथम पार्थियन साम्राज्य का संस्थापक तथा असाधारण नेतृत्व क्षमता वाला शासक था। वह साहसी, महत्त्वाकांक्षी तथा उत्कृष्ट संगठनकर्ता था। सीमित संसाधनों के बावजूद उसने एक शक्तिशाली राज्य की नींव रखी। यूनानी इतिहासकार एरियन के अनुसार अर्शक तथा उसके भाई तिरिदातेस सहित सात प्रमुख सरदार पार्थियन संगठन के आधार स्तंभ थे। तिरिदातेस ने अपने बड़े भाई को सत्ता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

स्वतंत्र राज्य की स्थापना के बाद अर्शक प्रथम ने सेल्यूसिड साम्राज्य के नियंत्रण का विरोध किया और अपने राज्य का विस्तार करने का प्रयास किया। सेल्यूसिड शासक सेल्युकस द्वितीय ने पार्थिया को पुनः अपने अधीन करने का प्रयास किया, किंतु अर्शक प्रथम अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रहा और इस प्रकार पार्थिया में एक स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। अर्शक प्रथम के शासनकाल में जारी सिक्कों पर उसे धनुर्धर के रूप में चित्रित किया गया है, जो बाद के पार्थियन राजकीय प्रतीकों में भी दिखाई देती है।

पार्थियन सभ्यता (Parthian Civilization)
अर्शक प्रथम

लगभग 217 ईसा पूर्व में अर्शक प्रथम की मृत्यु हो गई, किंतु उसके द्वारा स्थापित राज्य आगे चलकर उसके उत्तराधिकारियों के शासन में क्रमशः शक्तिशाली हुआ और मिथ्रिडेट्स प्रथम के काल में एक विशाल साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ।

तिरिदातेस प्रथम

प्राचीन यूनानी इतिहासकार एरियन के पार्थिका के विवरण के अनुसार अर्शक प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका छोटा भाई तिरिदातेस प्रथम पार्थिया के सिंहासन पर बैठा। किंतु कई विद्वान एरियन के इस विवरण को ऐतिहासिक रूप से विश्वसनीय नहीं मानते हैं। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार तिरिदातेस प्रथम का चरित्र संभवतः एरियन की परंपरा में निर्मित एक काल्पनिक या ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध पात्र है।

निसा से प्राप्त अभिलेखीय साक्ष्यों तथा सिक्कों और अन्य स्रोतों के पुनर्मूल्यांकन से इस मत को बल मिला है कि अर्शक प्रथम ही पार्थिया का वास्तविक संस्थापक और प्रारंभिक शासक था तथा उसने लगभग 217 ईसा पूर्व तक शासन किया। इसके बाद उसका पुत्र अर्शक द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ। अतः वर्तमान ऐतिहासिक मत के अनुसार तिरिदातेस प्रथम को अर्शक प्रथम का वास्तविक उत्तराधिकारी मानना उचित नहीं है।

अर्शक द्वितीय (217 ई. पू.–191 ई. पू.)

तिरिदातेस प्रथम के पश्चात् उसका उत्तराधिकारी अर्शक द्वितीय लगभग 217 ईसा पूर्व में सिंहासन पर बैठा। उसका उद्देश्य भी अपने पूर्ववर्तियों की भाँति सेल्यूसिड शक्ति को समाप्त कर पार्थियन साम्राज्य का विस्तार करना था।

किंतु उसके शासनकाल में परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। इसी समय सेल्यूसिड साम्राज्य का शक्तिशाली शासक एंटिओकस तृतीय (223–187 ई. पू.) अपनी साम्राज्यवादी नीति के कारण पूर्वी प्रांतों को पुनः अपने अधिकार में लाने में सफल हो गया। उसने क्रमशः मीडिया, आर्मेनिया तथा बैक्ट्रिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया और तत्पश्चात् पार्थिया की ओर अग्रसर हुआ।

पार्थियनों ने उसका डटकर सामना किया, किंतु दीर्घकालीन संघर्ष के बाद उन्हें पराजित होना पड़ा। अंततः अर्शक द्वितीय ने एंटिओकस तृतीय की अधीनता स्वीकार कर उससे संधि कर ली। यद्यपि इससे पार्थियन राज्य अस्थायी रूप से सेल्यूसिड प्रभाव में आ गया, फिर भी उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्णतः समाप्त नहीं हुई।

फ्रियपेटियस (191-176 ई. पू.)

अर्शक द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र फ्रियपेटियस, जिसे कभी-कभी अर्शक तृतीय भी कहा जाता है,  लगभग 191 ईसा पूर्व में पार्थिया का शासक बना। उसके शासनकाल में पश्चिमी एशिया की राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। 190 ईसा पूर्व में मैग्नेसिया के युद्ध में रोमन गणराज्य ने एंटिओकस तृतीय को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया, जिससे सेल्यूसिड साम्राज्य की शक्ति को गंभीर आघात पहुँचा।

रोम की इस विजय का सबसे अधिक लाभ पूर्वी राज्यों, विशेषकर पार्थिया और बैक्ट्रिया को प्राप्त हुआ। सेल्यूसिड साम्राज्य की दुर्बलता का लाभ उठाकर पार्थिया ने पुनः अपनी स्वतंत्र स्थिति सुदृढ़ कर ली तथा विस्तारवादी नीति अपनाई।

फ्रियपेटियस ने कैस्पियन सागर के दक्षिणी तटवर्ती प्रदेशों पर अधिकार कर लिया और अपनी मुद्राओं पर ‘फिलहेल्लेन’ (यूनानियों का मित्र) की उपाधि धारण की। इस उपाधि का उद्देश्य अपने राज्य में निवास करने वाले यूनानी समुदाय का समर्थन प्राप्त करना तथा हेलेनिस्टिक परंपराओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना था। इस प्रकार फ्रियपेटियस के शासनकाल में पार्थियन राज्य के पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी हो गई और वह एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरने लगा।

फ्रियपेटियस के तीन पुत्र थे : फ्राएतेस प्रथम, मिथ्रिदातेस प्रथम और अर्तबानस प्रथम। एक चौथे पुत्र बागासिस का भी उल्लेख मिलता है, किंतु वह शासक नहीं बना।

फ्रियपेटियस के बाद उसका पुत्र फ्राएतेस प्रथम उत्तराधिकारी हुआ, जिसने लगभग 176 से 171 ई.पू. तक शासन किया और अपने भाई मिथ्रिदातेस प्रथम की योग्यता देखकर उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

पार्थियन साम्राज्य-विस्तार का स्वर्णकाल

मिथ्रिदातेस प्रथम (लगभग 171–132 ई. पू.)

फ्राएतेस प्रथम के पश्चात् उसका भाई मिथ्रिदातेस प्रथम लगभग 171 ईसा पूर्व में पार्थिया के सिंहासन पर आसीन हुआ। यद्यपि अर्शक प्रथम ने पार्थियन राज्य की स्थापना की थी, परंतु एक छोटे प्रादेशिक राज्य को विशाल साम्राज्य में परिवर्तित करने का श्रेय मिथ्रिदातेस प्रथम को ही प्राप्त है। इसी कारण अधिकांश इतिहासकार उसे पार्थियन साम्राज्य का वास्तविक निर्माता या द्वितीय संस्थापक मानते हैं।

मिथ्रिदातेस प्रथम के राज्यारोहण की तिथि विवादास्पद है, किंतु इतना निश्चित है कि वह बैक्ट्रिया के यूनानी शासक यूक्रेटिडीज़ प्रथम तथा सेल्यूसिड शासकों- एंटिओकस चतुर्थ और बाद में डेमेट्रियस द्वितीय निकेटर का समकालीन था। वह असाधारण सैन्य प्रतिभा, दूरदर्शिता तथा राजनीतिक कुशलता से संपन्न शासक था। लगभग दो दशकों तक उसने युद्ध करते हुए पार्थियन राज्य का अभूतपूर्व विस्तार किया।

पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में विजय अभियान

मिथ्रिदातेस प्रथम ने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में पूर्व की ओर अभियान चलाकर एरिया (हेरात), ड्रंगियाना (सीस्तान) तथा उससे संबद्ध प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। इन क्षेत्रों पर अधिकार से पार्थिया की पूर्वी सीमा सुरक्षित हो गई और मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों पर उसका प्रभाव बढ़ गया।

इसके बाद उसने पश्चिम की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। उस समय सेल्यूसिड साम्राज्य आंतरिक संघर्षों तथा बाहरी आक्रमणों के कारण दुर्बल हो चुका था। मिथ्रिदातेस प्रथम ने इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए क्रमशः मीडिया, इलीमाइस (एलिमाइस), पर्सिस (फारस), कैरेसीन, बेबीलोन तथा असीरिया पर अधिकार कर लिया। इन विजयों के परिणामस्वरूप पार्थिया एक सीमित प्रादेशिक राज्य से बढ़कर पश्चिमी एशिया की प्रमुख साम्राज्यवादी शक्ति बन गया।

बेबीलोन और मेसोपोटामिया पर अधिकार

पार्थियन विस्तार का सबसे महत्त्वपूर्ण चरण 141 ईसा पूर्व में आया, जब मिथ्रिदातेस प्रथम ने दजला (टिगरिस) नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध नगर सेल्यूसिया पर अधिकार किया। यह नगर सेल्यूसिड साम्राज्य का प्रमुख प्रशासनिक एवं व्यापारिक केंद्र था। इसकी विजय ने मेसोपोटामिया में सेल्यूसिड प्रभुत्व को निर्णायक आघात पहुँचाया।

सेल्यूसिया पर अधिकार स्थापित करने के बाद मिथ्रिदातेस प्रथम ने दजला नदी के पूर्वी तट पर एक सैन्य शिविर के रूप में क्टेसिफ़ोन नगर की स्थापना की, जो बाद में पार्थियन साम्राज्य की राजधानी के रूप में विकसित हुआ । आगे चलकर यही नगर पार्थियन तथा बाद में सासानी साम्राज्य की भी राजधानी बना।

डेमेट्रियस द्वितीय के साथ संघर्ष

मिथ्रिदातेस प्रथम के शासनकाल का सबसे महत्त्वपूर्ण संघर्ष सेल्यूसिड शासक डेमेट्रियस द्वितीय निकेटर के साथ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार डब्ल्यू. डब्ल्यू. टार्न के अनुसार डेमेट्रियस द्वितीय ने बैक्ट्रिया के यूनानी शासक यूक्रेटिडीज़ प्रथम के साथ मिलकर पार्थियन शक्ति को समाप्त करने का प्रयास किया।

मिथ्रिदातेस प्रथम ने पहले पूर्वी मोर्चे पर सफलता प्राप्त की और उसके बाद संपूर्ण शक्ति के साथ मेसोपोटामिया लौटकर डेमेट्रियस द्वितीय का सामना किया। निर्णायक युद्ध में सेल्यूसिड सेना पराजित हुई तथा डेमेट्रियस द्वितीय बंदी बना लिया गया।

किंतु मिथ्रिदातेस प्रथम ने अपने बंदी शत्रु के साथ उदार व्यवहार किया। उसने न तो उसका अपमान किया और न ही उसे मृत्युदंड दिया। इसके विपरीत उसने अपनी पुत्री का विवाह डेमेट्रियस द्वितीय से कर दिया तथा उसे सम्मानपूर्वक हाइरकेनिया में रहने की अनुमति दे दी।

यूनानी प्रजा के प्रति उदार नीति

मिथ्रिदातेस प्रथम ने अपने साम्राज्य में रहने वाली यूनानी प्रजा के साथ भी उदार नीति अपनाई। उसने यूनानी नगरों के प्रशासन, व्यापार तथा सांस्कृतिक परंपराओं को पर्याप्त संरक्षण दिया। उसकी अनेक मुद्राओं पर अंकित ‘फिलहेल्लेन’ (यूनानियों का मित्र) की उपाधि उसकी इस नीति का स्पष्ट प्रमाण है।

भारतीय सीमा तक साम्राज्य का विस्तार

रोमन इतिहासकार ओरोसियस के अनुसार मिथ्रिदातेस प्रथम का प्रभाव हाइडेस्पीस से लेकर सिंधु नदी तक विस्तृत था। हाइडेस्पीस की पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार इसे झेलम नदी मानते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे ईरान के किसी अन्य प्रदेश से संबद्ध मानते हैं।

भारतीय इतिहासकार के. सी. ओझा सहित अनेक विद्वानों का मत है कि मिथ्रिदातेस प्रथम का प्रभाव कम-से-कम सिंधु नदी के पश्चिमी क्षेत्रों तक अवश्य पहुँच गया था। यद्यपि इस विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, फिर भी यह निर्विवाद है कि उसके शासनकाल में पार्थियन साम्राज्य की पूर्वी सीमा अत्यंत विस्तृत हो चुकी थी।

महान साम्राज्य निर्माता के रूप में मूल्यांकन

कुछ इतिहासकारों का मत है कि मिथ्रिदातेस प्रथम स्वयं को हखामनी सम्राटों तथा सिकंदर महान दोनों की साम्राज्यवादी परंपरा का उत्तराधिकारी मानता था। पश्चिमी ईरान, मेसोपोटामिया तथा मध्य एशिया के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर उसने वास्तव में एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना की, जिसने आगे चलकर रोम जैसी विश्वशक्ति को भी चुनौती दी।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी इतिहासकार घिर्शमान ने मिथ्रिदातेस प्रथम को अत्यंत योग्य, साहसी तथा दूरदर्शी शासक बताया है। उनके अनुसार ईरानी शक्ति के पुनरुत्थान में उसका योगदान उसी प्रकार महत्त्वपूर्ण था, जैसा हखामनी साम्राज्य की स्थापना में साइरस महान का था।

लगभग 132 ईसा पूर्व में मिथ्रिदातेस प्रथम की मृत्यु हो गई। उसके शासनकाल में पार्थिया पश्चिमी एशिया की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन चुका था और सेल्यूसिड साम्राज्य का पतन लगभग सुनिश्चित हो गया था।

फ्राएतेस द्वितीय (लगभग 132–127 ई. पू.)

मिथ्रिदातेस प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र फ्राएतेस द्वितीय (लगभग 132–127 ई. पू.) पार्थिया के सिंहासन पर बैठा। सिंहासनारूढ़ होने के समय वह अल्पवयस्क था, इसलिए उसकी माता रिन्नू ने संरक्षक के रूप में कुछ समय तक शासन संभाला। फ्राएतेस द्वितीय को अपने पिता से एक विशाल तथा शक्तिशाली साम्राज्य मिला था, किंतु उसके शासनकाल में पार्थिया को पश्चिम और पूर्व, दोनों दिशाओं से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

एंटिओकस सप्तम का आक्रमण

सेल्यूसिड शासक एंटिओकस सप्तम सिडेटीस अपने भाई डेमेट्रियस द्वितीय की पराजय और अपमान का प्रतिशोध लेना चाहता था। उसने एक विशाल सेना संगठित कर पार्थिया पर आक्रमण किया। प्रारंभिक अभियानों में उसे सफलता मिली और वह क्रमशः आगे बढ़ते हुए एकबतना तक पहुँच गया।

लगातार पराजयों से निराश फ्राएतेस द्वितीय ने संधि का प्रस्ताव भेजा, किंतु एंटिओकस सप्तम ने अत्यंत कठोर शर्तें रखीं। उसने पार्थिया से अपने सभी विजित प्रदेश लौटाने की माँग की। इन अपमानजनक शर्तों को स्वीकार करना पार्थियन सम्मान के प्रतिकूल था, इसलिए संधि नहीं हो सकी।

एंटिओकस सप्तम की पराजय

फ्राएतेस द्वितीय ने धैर्यपूर्वक अपनी सेना का पुनर्गठन किया और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। अंततः उसने अचानक और तीव्र आक्रमण कर एंटिओकस सप्तम की सेना को चारों ओर से घेर लिया। इस निर्णायक युद्ध में 129 ईसा पूर्व में एंटिओकस सप्तम पराजित होकर मारा गया।

इस विजय के परिणाम अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुए। पार्थियनों ने पुनः मेसोपोटामिया पर अपना पूर्ण अधिकार कर लिया। बड़ी संख्या में यूनानी सैनिक बंदी बनाए गए, जिनमें से अनेक को बाद में पार्थियन सेना में सम्मिलित कर लिया गया, जिससे सेना की संख्या और युद्ध क्षमता दोनों में वृद्धि हुई। एंटिओकस सप्तम की मृत्यु के साथ ही सेल्यूसिड साम्राज्य की पुनरुत्थान की अंतिम आशा भी समाप्त हो गई। इसके बाद पश्चिमी एशिया में पार्थियन शक्ति निर्विवाद रूप से सर्वोच्च बन गई।

पूर्वी सीमा पर संकट

पश्चिमी मोर्चे पर विजय प्राप्त करने के तुरंत बाद पार्थिया को पूर्व से नई चुनौती का सामना करना पड़ा। मध्य एशिया की घुमंतू जातियाँ, विशेषकर शक पश्चिम की ओर बढ़ रही थीं। इन जनजातियों ने मर्व, हेरात, सीस्तान तथा पूर्वी ईरान के अनेक क्षेत्रों में उपद्रव प्रारंभ कर दिया। फ्राएतेस द्वितीय ने स्वयं सेना का नेतृत्व करते हुए इन आक्रमणकारियों का सामना किया। प्रारंभिक संघर्षों में उसने उनका प्रतिरोध किया, किंतु परिस्थितियाँ शीघ्र ही उसके प्रतिकूल हो गईं।

एंटिओकस सप्तम के विरुद्ध युद्ध के बाद जिन यूनानी सैनिकों को बंदी बनाकर पार्थियन सेना में भर्ती किया गया था, उनमें से अनेक इस संकट के समय सेना छोड़कर भाग निकले अथवा युद्ध से विमुख हो गए। इस विश्वासघात का पार्थियन सेना के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप फ्राएतेस द्वितीय को भीषण पराजय का सामना करना पड़ा और लगभग 127 ईसा पूर्व में युद्धभूमि में मार डाला गया।

अर्तबानस प्रथम (लगभग 127–124/123 ई. पू.)

फ्राएतेस द्वितीय की युवावस्था में मृत्यु के समय उसका कोई उत्तराधिकारी शासन करने की स्थिति में नहीं था। इसलिए उसके चाचा अर्तबानस प्रथम (लगभग 127–124/123 ई. पू.) ने सिंहासन संभाला। अर्तबानस प्रथम के शासनकाल में भी पूर्वी सीमा की स्थिति गंभीर बनी रही और मध्य एशिया से आने वाली युएझ़ी तथा शक जातियों के आक्रमणों ने पार्थियन साम्राज्य को अस्थिर कर दिया था। अर्तबानस ने इन आक्रमणों का साहसपूर्वक सामना किया, किंतु अंततः वह भी युद्धभूमि में मारा गया।

अर्तबानस प्रथम की मृत्यु से पार्थियन साम्राज्य को गहरा आघात पहुँचा। पूर्वी सीमा पर स्थापित अनेक प्रदेश साम्राज्य के नियंत्रण से बाहर हो गए। मिथ्रिदातेस प्रथम द्वारा विजित विशाल पूर्वी क्षेत्र का एक बड़ा भाग पार्थियन अधिकार से निकल गया। इसी अवसर का लाभ उठाकर कैरेसीन के शासक हिस्पासिनीस ने पार्थियन गवर्नरों को पराजित कर मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया। परिणामस्वरूप पार्थियन साम्राज्य अस्थायी रूप से विघटन और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर गया।

पार्थियन साम्राज्य का पुनरुत्थान

मिथ्रिदातेस द्वितीय महान (लगभग 124–88 ई. पू.)

अर्तबानस प्रथम की मृत्यु के बाद पार्थियन साम्राज्य राजनीतिक अस्थिरता, बाहरी आक्रमणों तथा प्रादेशिक विघटन के दौर से गुजर रहा था। पूर्वी सीमा पर शक और यूएझ़ी जातियों के आक्रमणों ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया था, जबकि पश्चिम में अनेक प्रदेश पार्थियन नियंत्रण से बाहर हो चुके थे। ऐसे संकटपूर्ण समय में लगभग 124 ईसा पूर्व (कुछ विद्वानों के अनुसार 123 ई. पू.) में अर्तबानस प्रथम का पुत्र मिथ्रिदातेस द्वितीय पार्थिया के सिंहासन पर बैठा। पार्थियन इतिहास में उसे सर्वाधिक योग्य, दूरदर्शी तथा प्रभावशाली शासक बताया गया है। अपनी सैन्य क्षमता, कूटनीतिक दक्षता तथा प्रशासनिक योग्यता के कारण उसने पार्थियन साम्राज्य को पुनः एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया। इसी कारण अनेक इतिहासकार उसे ‘मिथ्रिदातेस महान’  कहते हैं।

साम्राज्य का पुनर्गठन और पूर्वी क्षेत्रों पर पुनः अधिकार

राज्यारोहण के पश्चात् मिथ्रिदातेस द्वितीय ने सर्वप्रथम पश्चिमी प्रांतों में शांति एवं प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। इसके बाद उसने पूर्वी सीमाओं की ओर ध्यान दिया, जहाँ पार्थियन प्रभुत्व लगभग समाप्त हो चुका था। उसने अपने सफल सैन्य अभियानों द्वारा मर्व, हेरात, सीस्तान तथा कंधार सहित अनेक प्रदेशों पर पुनः पार्थियन सत्ता स्थापित की। इन विजयों से न केवल साम्राज्य की पूर्वी सीमाएँ सुरक्षित हुईं, बल्कि मध्य एशिया के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर भी पार्थिया का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया। परिणामस्वरूप पार्थियन साम्राज्य एक बार फिर पश्चिमी और मध्य एशिया की प्रमुख शक्ति के रूप में उभरने लगा।

चीन के साथ संबंध

मिथ्रिदातेस द्वितीय केवल महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ भी था। उसके शासनकाल में पार्थिया ने पूर्वी एशिया के साथ अपने राजनयिक एवं व्यापारिक संबंधों का विस्तार किया। लगभग 115 ई. पू. (कुछ स्रोतों के अनुसार 121 ई. पू.) में हान वंश के सम्राट हान वू-ती द्वारा भेजे गए दूतमंडल का उसने स्वागत किया। इस राजनयिक संपर्क के परिणामस्वरूप पार्थिया और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों को नई गति मिली।

इसी काल में प्रसिद्ध रेशम मार्ग के माध्यम से चीन, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापार का विस्तार हुआ। पार्थिया का इस व्यापारिक मार्ग पर नियंत्रण था, जिससे उसे आर्थिक समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दोनों प्राप्त हुईं। रेशम, मसाले, घोड़े, बहुमूल्य धातुएँ तथा विलासिता की वस्तुओं का विशाल व्यापार पार्थिया के माध्यम से होने लगा।

आर्मेनिया की राजनीति में हस्तक्षेप

मिथ्रिदातेस द्वितीय ने पश्चिमी एशिया की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। विशेष रूप से आर्मेनिया उसके लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि यह पार्थिया और रोम के बीच एक मध्यस्थ राज्य था। उसे आशंका थी कि यदि रोम ने आर्मेनिया पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया, तो पार्थिया की पश्चिमी सीमा असुरक्षित हो जाएगी। इसी उद्देश्य से मिथ्रिदातेस द्वितीय ने आर्मेनिया के तत्कालीन शासक अर्तवस्डीज़ प्रथम को पराजित कर अपने अधीन कर लिया और उसके भतीजे तिग्रानेस को बंधक के रूप में अपने दरबार में रख लिया। बाद में, लगभग 95 ई.पू. में, तिग्रानेस को ‘सत्तर घाटियाँ’ पार्थियनों को सौंपने की शर्त पर मुक्त किया गया, जिसके बाद वह आर्मेनिया के सिंहासन पर बैठा और आगे चलकर तिग्रानेस द्वितीय (तिग्रानेस महान) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार आर्मेनिया के पार्थियन प्रभाव क्षेत्र में आने से रोम की पूर्व की ओर बढ़ने की योजना अस्थायी रूप से विफल हो गई।

रोम के साथ संबंध और कूटनीति

मिथ्रिदातेस द्वितीय के शासनकाल में रोम भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अपनी शक्ति का विस्तार कर रहा था। उत्तर अफ्रीका में जुगुर्था के विरुद्ध युद्ध (112–105 ई. पू.) में व्यस्त होने के कारण रोम पश्चिमी एशिया की राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप नहीं कर सका। किंतु जैसे ही यह युद्ध समाप्त हुआ, रोम ने पूर्वी क्षेत्रों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया और रोमन सेनापति लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला पश्चिमी एशिया के यूनानियों को पराजित करने के बाद फरात (यूफ्रेटीस) नदी तक पहुँच गया। मिथ्रिदातेस द्वितीय ने युद्ध करने के बजाय कूटनीति को प्राथमिकता दी और सुल्ला के पास संधि का प्रस्ताव भेजा। उस समय रोम को पार्थियन साम्राज्य की वास्तविक शक्ति का ज्ञान नहीं था। फलतः सुल्ला ने इस प्रस्ताव को विशेष महत्त्व नहीं दिया और वार्ता को आगे नहीं बढ़ाया।

यद्यपि दोनों महाशक्तियों के बीच इस समय कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ, फिर भी फरात नदी को दोनों साम्राज्यों के प्रभाव क्षेत्रों की सीमा के रूप में स्वीकार करने की प्रक्रिया इसी काल में प्रारंभ हुई। इसके साथ ही रोम और पार्थिया के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया अध्याय आरंभ हुआ, जो आने वाली कई शताब्दियों तक चलता रहा।

पार्थिया का उत्कर्ष

मिथ्रिदातेस द्वितीय के शासनकाल में पार्थिया पश्चिम में रोम और पूर्व में चीन जैसी महान शक्तियों के साथ समान स्तर पर संबंध स्थापित करने में सफल रहा। उसकी सफल विदेश नीति, प्रभावी सैन्य अभियानों तथा सुव्यवस्थित प्रशासन ने पार्थियन साम्राज्य को समकालीन विश्व की प्रमुख शक्तियों में सम्मिलित कर दिया। उसके शासनकाल में व्यापार, कूटनीति तथा साम्राज्य विस्तार तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। अनेक इतिहासकार उसकी तुलना हखामनी सम्राट दारा प्रथम से करते हैं, क्योंकि दोनों शासकों ने अपने-अपने समय में ईरानी साम्राज्य को राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक संगठन तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रदान की।

उत्तराधिकार-संघर्ष और अस्थिरता का दौर

लगभग 88 ईसा पूर्व में मिथ्रिदातेस द्वितीय की मृत्यु के बाद पार्थियन साम्राज्य पुनः उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में पहुँच गया। अगले लगभग तीन दशकों तक साम्राज्य में लगातार शासकों का परिवर्तन होता रहा, जिससे केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ गई।

मिथ्रिदातेस द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र गोतर्जीज़ प्रथम (लगभग 91–87/80 ई. पू.) सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में सिनात्रुसीज़ नामक एक संबंधी ने एलाम में विद्रोह कर दिया, जिसे दबाने में उसे काफी समय लग गया। कुछ स्रोतों के अनुसार इस दौरान मिथ्रिदातेस तृतीय नामक एक प्रतिद्वंद्वी शासक ने भी लगभग 87–80 ई.पू. के बीच अस्थायी रूप से सत्ता हथिया ली थी, किंतु उसका अस्तित्व विवादित है।

गोतर्जीज़ प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी ओरोडेस प्रथम (लगभग 80–75 ई. पू.) हुआ और उसके पश्चात् वृद्ध शासक सिनात्रुसीज़ (लगभग 75–69 ई. पू.) सिंहासन पर बैठा, जिसने शक जनजातियों की सहायता से सत्ता प्राप्त की थी अस्सी वर्ष का वृद्ध होने के कारण वह शासन-कार्य में सक्रिय रुचि नहीं ले सका। उसके शासनकाल में पश्चिमी एशिया की राजनीति अत्यंत जटिल हो गई थी- पोंटस के शक्तिशाली शासक मिथ्रिदातेस षष्ठ यूपेटर और रोम के मध्य भीषण संघर्ष चल रहा था। दोनों पक्ष पार्थिया का समर्थन पाना चाहते थे, किंतु सिनात्रुसीज़ ने तटस्थ नीति अपनाई और किसी भी पक्ष की सहायता नहीं की।

इसी काल में आर्मेनिया का शासक तिग्रानेस द्वितीय अत्यंत शक्तिशाली हो गया। यद्यपि उसका राज्याभिषेक कभी पार्थियन समर्थन से हुआ था, फिर भी उसने अवसर का लाभ उठाकर पार्थियन साम्राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों पर अधिकार करना प्रारंभ कर दिया। उसके सैन्य अभियानों के परिणामस्वरूप पार्थियन प्रभाव सिकुड़ने लगा और वह एकबताना तक पहुँच गया। इससे ऐसा प्रतीत होने लगा कि यदि शीघ्र ही कोई शक्तिशाली नेतृत्व न मिला, तो पार्थियन साम्राज्य का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। लगभग 69 ईसा पूर्व में सिनात्रुसीज़ की मृत्यु के बाद उसके पुत्र फ्राएतेस तृतीय ने उत्तराधिकार संभाला।

फ्राएतेस तृतीय (लगभग 69–57 ई. पू.)

सिनात्रुसीज़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र फ्राएतेस तृतीय लगभग 69 ई.पू. में पार्थिया के सिंहासन पर बैठा। वह एक बुद्धिमान, सक्षम तथा व्यावहारिक शासक था, जिसने राज्यारोहण के साथ ही पार्थिया की खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने का प्रयास प्रारंभ किया। सर्वप्रथम उसने उन सीमावर्ती प्रदेशों पर पुनः अधिकार स्थापित किया, जो उसके पूर्ववर्ती शासकों के समय पार्थियन नियंत्रण से बाहर हो गए थे। इसके अतिरिक्त उसने आर्मेनिया के शक्तिशाली शासक तिग्रानेस द्वितीय के विरुद्ध सफल अभियान चलाया और उसे संधि करने के लिए विवश किया, जिससे पश्चिमी एशिया में पार्थियन प्रभाव पुनः सुदृढ़ हो गया।

इसी समय पोंटस के शासक मिथ्रिदातेस षष्ठ यूपेटर तथा उसके सहयोगी और दामाद आर्मेनिया के तिग्रानेस द्वितीय का रोम के साथ संघर्ष चल रहा था। रोम ने पार्थियन सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से फ्राएतेस तृतीय के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया और फ्राएतेस तृतीय ने रोम के साथ कूटनीतिक समझौता स्वीकार करते हुए पार्थियन हितों की रक्षा की।

रोमन सेनापति लुकुल्लुस ने तृतीय मिथ्रिदातिक युद्ध (73–63 ई. पू.) के दौरान पार्थिया से संपर्क किया, ताकि पार्थिया पोंटस के मिथ्रिदातेस षष्ठ और आर्मेनिया के तिग्रानेस द्वितीय के विरुद्ध रोम का साथ दे। बाद में लुकुल्लुस के उत्तराधिकारी पॉम्पी महान के साथ फ्राएतेस तृतीय ने समझौता किया, जिसके तहत वह इस संघर्ष में तटस्थ रहा। इसी दौरान रोम ने लगभग 65 ई. पू. में आर्मेनिया पर आक्रमण कर तिग्रानेस द्वितीय की शक्ति को गंभीर आघात पहुँचाया और पार्थिया ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर से प्राप्त कर ली।

इस प्रकार फ्राएतेस तृतीय के शासनकाल में पार्थियन साम्राज्य में पुनः राजनीतिक स्थिरता आई और उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। किंतु लगभग 57 ई.पू. में उसके अपने ही दोनों पुत्रों- ओरोडेस द्वितीय और मिथ्रिदातेस चतुर्थ ने सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से षड्यंत्र रचकर उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार एक सक्षम शासक अपने ही उत्तराधिकारियों की महत्त्वाकांक्षा का शिकार हो गया। पिता की हत्या के पश्चात् दोनों भाइयों के बीच सत्ता के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया।

रोम के साथ महासंघर्ष का युग

ओरोडेस द्वितीय (57–37 ई. पू.)

फ्राएतेस तृतीय की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में पहले उसके पुत्र मिथ्रिदातेस चतुर्थ ने सत्ता प्राप्त की, किंतु शीघ्र ही जनता तथा सामंतों के विरोध के कारण उसे अपदस्थ कर दिया गया और उसके भाई ओरोडेस द्वितीय को 57 ईसा पूर्व में पार्थिया का शासक बनाया गया। उसका शासनकाल (57–37 ई. पू.) पार्थियन इतिहास का गौरवशाली काल माना जाता है।

प्रारंभ में रोम और पार्थिया के संबंध मैत्रीपूर्ण थे और पार्थियनों ने पोंटस तथा आर्मेनिया के संघर्षों में रोम का विरोध नहीं किया था, किंतु रोमन सेनानायकों लुकुल्लुस तथा पॉम्पी ने पार्थिया के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया। उन्होंने पार्थिया की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप किया तथा उसके कुछ सीमावर्ती प्रदेशों पर अधिकार करने का प्रयास किया, जिससे दोनों शक्तियों के संबंध बिगड़ गए।

इसी समय रोमन त्रिमूर्तियों में से एक मार्कस लिसिनियस क्रैसस ने अपनी महत्त्वाकांक्षा और धनलोलुपता के कारण पार्थिया पर आक्रमण करने का निश्चय किया। उसका उद्देश्य पार्थिया के राजकोष पर अधिकार करना तथा आगे बढ़कर बैक्ट्रिया और उत्तर-पश्चिमी भारत तक अपना प्रभुत्व स्थापित करना था। ओरोडेस द्वितीय ने युद्ध टालने के लिए पहले राजदूतों के माध्यम से संधि का प्रस्ताव भेजा, किंतु क्रैसस ने उसे अस्वीकार कर दिया। उसने घमंड में यह संदेश भेजा कि वह युद्धभूमि में ही पार्थियन सम्राट का अभिवादन करेगा। इसके उत्तर में पार्थियन दूत ने कहा कि पार्थिया को पराजित करना उतना ही असंभव है, जितना हथेली पर बाल उगना।

कर्रहे का युद्ध (53 ई. पू.)

आर्मेनिया के शासक ने क्रैसस की सहायता के लिए सैनिक भेजे, परंतु पार्थियन सेनापति सुरेन ने कर्रहे के युद्ध में अद्भुत सैन्य कौशल का प्रदर्शन किया। पार्थियन अश्वारोही धनुर्धरों और घुड़सवार सेना ने रोमन सेना को चारों ओर से घेरकर भारी क्षति पहुँचाई। रोमन सेना के तीन चौथाई सैनिक काल के गाल में समा गए तथा स्वयं क्रैसस अपने पुत्र सहित युद्ध में मारा गया। यह रोम के इतिहास की बड़ी सैन्य पराजयों में से एक थी।

इस विजय के बाद पार्थियनों ने बंदी बनाए गए अनेक रोमन सैनिकों के साथ अपेक्षाकृत उदार व्यवहार किया। उनमें से कई सैनिकों ने पार्थिया में बसकर स्थानीय महिलाओं से विवाह किए और वहीं के निवासी बन गए। कर्रहे की विजय से पार्थिया की सैन्य प्रतिष्ठा बढ़ गई तथा रोम को यह स्वीकार करना पड़ा कि पूर्व में उसे एक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ रहा है।

पश्चिमी एशिया में विस्तार और सेनापति सुरेन का पतन

कर्रहे की विजय के बाद ओरोडेस द्वितीय ने भूमध्यसागर की दिशा में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। किंतु इसी समय उसने एक गंभीर राजनीतिक भूल कर दी। कर्रहे की विजय का वास्तविक श्रेय सेनापति सुरेन को प्राप्त था। उसकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत होकर ओरोडेस द्वितीय ने उसे मृत्युदंड दिलवा दिया। इस निर्णय से पार्थियन साम्राज्य ने अपना सर्वाधिक प्रतिभाशाली सेनानायक खो दिया।

इसके बाद ओरोडेस द्वितीय ने 51 ई. पू. में अपने पुत्र पाकोरस प्रथम के नेतृत्व में सीरिया पर अधिकार करने के लिए विशाल सेना भेजी। प्रारंभिक चरण में अभियान सफल रहा और पार्थियन सेना एंटिओक तक पहुँच गई। किंतु राजधानी में पाकोरस के विरुद्ध षड्यंत्र की अफवाह फैल जाने के कारण उसे अपना अभियान बीच में छोड़कर वापस लौटना पड़ा।

कुछ समय बाद, 40 ई.पू. में रोम के कठोर शासन से असंतुष्ट सीरिया के अनेक लोगों ने पार्थियनों को आमंत्रित किया। इस अवसर का लाभ उठाकर ओरोडेस द्वितीय ने रोमन विद्रोही क्विंटस लेबिएनस तथा अपने पुत्र पाकोरस प्रथम के नेतृत्व में दो सैन्य दल भेजे। लेबिएनस ने आयोनिया तक एशिया माइनर के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया, जबकि पाकोरस ने सीरिया और फिलिस्तीन पर विजय प्राप्त की। कुछ समय के लिए पूर्वी रोमन साम्राज्य का बड़ा भाग पार्थियन प्रभाव में आ गया।

किंतु रोमन सेनापतियों, विशेषकर पब्लियस वेंटिडियस बासुस ने पुनर्गठन कर प्रतिआक्रमण किया। युद्धों में छल और रणनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने 39 ई. पू. में लेबिएनस को तथा 38 ई. पू. में माउंट गिंडारस के युद्ध में पाकोरस को पराजित कर मृत्यु के घाट उतार दिया। इन पराजयों से पार्थियन विस्तार रुक गया और सेना को यूफ्रेटस नदी के पार वापस लौटना पड़ा।

अपने प्रिय पुत्र पाकोरस की मृत्यु तथा इन सैन्य असफलताओं से ओरोडेस द्वितीय अत्यंत दुःखी रहने लगा। अंततः उसने राज्यकार्य से स्वयं को अलग कर लिया और  अपने पुत्र फ्राएतेस चतुर्थ को राजगद्दी सौंप दी। प्राचीन स्रोतों में इस बात पर मतभेद है कि ओरोडेस द्वितीय की मृत्यु कैसे हुई थी। कैसियस डायो के अनुसार उसकी मृत्यु पुत्र शोक या वृद्धावस्था से स्वाभाविक रूप से हुई थी, जबकि प्लूटार्क के अनुसार फ्राएतेस चतुर्थ ने ही अपने पिता की हत्या करवाई थी।

फ्राएतेस चतुर्थ

फ्राएतेस चतुर्थ का शासनकाल पार्थियन इतिहास का सबसे क्रूर और रक्तरंजित काल था। सिंहासन पर बैठते ही उसने संभावित प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त करने के उद्देश्य से अपने अनेक भाइयों की हत्या करवा दी। वृद्ध ओरोडेस द्वितीय ने इन हत्याओं का विरोध किया, किंतु शीघ्र ही उसकी भी हत्या करवा दी गई। इसके बाद फ्राएतेस ने अपने शेष भाइयों, अनेक प्रमुख सामंतों तथा यहाँ तक कि अपने ज्येष्ठ पुत्र तक को षड्यंत्र की आशंका में मरवा दिया। इन घटनाओं से साम्राज्य में व्यापक असंतोष फैल गया।

पार्थिया की आंतरिक दुर्बलता का लाभ उठाने के उद्देश्य से रोमन सेनानायक मार्क एंटनी ने विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। उसने पहले आर्मेनिया पर अधिकार किया और फिर मीडिया के मार्ग से पार्थिया में प्रवेश किया। फ्राएतेस चतुर्थ ने मीडिया के शासक के सहयोग से रोमन सेना का सामना किया। एंटनी ने मीडिया की सुदृढ़ राजधानी पर अधिकार करने का प्रयास किया, किंतु स्थानीय जनता ने रोमनों का सहयोग नहीं किया। पार्थियनों ने उनकी रसद व्यवस्था को बाधित कर दिया तथा दुर्ग-भेदी यंत्रों को नष्ट कर दिया। परिणामस्वरूप रोमन सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी और उसे पीछे हटना पड़ा। लगभग दस हजार रोमन सैनिक बंदी बनाए गए तथा एंटनी को पराजित होकर लौटना पड़ा। इस विजय से पार्थियन साम्राज्य की प्रतिष्ठा पुनः सुदृढ़ हो गई।

इसके बाद एंटनी रोम लौटते ही ऑक्टेवियन (आगस्टस) के साथ संघर्ष में उलझ गया। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए फ्राएतेस चतुर्थ ने अपने प्रभाव का विस्तार करने का प्रयास किया। उसने अपने सहयोगी मीडिया के शासक को पराजित कर बंदी बना लिया। किंतु इसी समय पार्थिया में उसके विरुद्ध विद्रोह भड़क उठा और तिरिदातेस नामक एक कुलीन व्यक्ति को शासक घोषित कर दिया गया। फ्राएतेस चतुर्थ भागकर सीथिया गया और वहाँ से सेना संगठित कर उसने तिरिदातेस को हटाकर राजगद्दी पर पुनः अधिकार कर लिया।

तिरिदातेस फ्राएतेस के पुत्र वोनोनेस प्रथम  को साथ लेकर सीरिया भाग गया और बाद में फ्राएतेस के पुत्र को रोमन सम्राट आगस्टस को सौंप दिया। अपने पुत्र की वापसी के लिए फ्राएतेस चतुर्थ को रोम के साथ संधि करनी पड़ी। इस संधि के अंतर्गत उसे पूर्व में बंदी बनाए गए रोमन सैनिकों तथा युद्ध में प्राप्त ध्वजों और लूटी गई सामग्री को वापस करना पड़ा। इसके बाद कुछ समय तक पार्थिया और रोम के बीच अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तथा मैत्रीपूर्ण संबंध बने रहे।

प्रथम शताब्दी ईस्वी : अर्तबानस शाखा का उदय

अर्तबानस तृतीय (12–40 ई.)

फ्राएतेस चतुर्थ के पश्चात् पार्थिया का राजनीतिक इतिहास उत्तराधिकार के संघर्षों, षड्यंत्रों तथा रक्तरंजित घटनाओं से भरा हुआ है। फ्राएतेस चतुर्थ की हत्या उसकी पत्नी रानी मूसा के षड्यंत्र के परिणामस्वरूप हुई। इसके बाद उसका पुत्र फ्राएतेस पंचम (फ्राटाकेस) अपनी माता मूसा के साथ सह-शासक बना। किंतु पितृहत्याकारी होने के कारण पार्थियन सामंतों ने उसे शीघ्र ही पदच्युत कर दिया। इसके बाद उन्होंने फ्राएतेस चतुर्थ के ज्येष्ठ पुत्र वोनोनेस प्रथम (8–12 ई.) को रोम से बुलाकर पार्थिया का शासक बनाया।

वोनोनेस प्रथम लंबे समय तक रोम में रहने के कारण रोमन रीति-रिवाजों और जीवन-शैली से अत्यधिक प्रभावित था। परिणामस्वरूप वह पार्थियन अभिजात वर्ग तथा ईरानी परंपराओं के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं सका। अंततः पार्थियन सामंतों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर उसे गद्दी से हटा दिया। बाद में वह सीरिया चला गया, जहाँ उसकी हत्या कर दी गई। इसके पश्चात् अर्तबानस तृतीय (12–40 ई.) को पार्थिया का शासक बनाया गया। उसके शासन के साथ ही पार्थिया में अर्शकानी राजवंश की एक नई शाखा, जिसे सामान्यतः अर्तबानस शाखा कहा जाता है, की स्थापना हुई।

अर्तबानस तृतीय का शासनकाल राजनीतिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अशांत रहा। साम्राज्य के भीतर सामंतों के विद्रोह, उत्तराधिकार के विवाद तथा पारिवारिक संघर्ष लगातार चलते रहे। उसकी 40 ईस्वी में मृत्यु से लेकर 51 ईस्वी के मध्य कई शासक सिंहासन पर बैठे, किंतु कोई भी पार्थियन साम्राज्य को स्थिरता और सुदृढ़ नेतृत्व नहीं प्रदान कर सका।

वोलोगेसीज़ प्रथम (लगभग 51–78 ई.)

51 ई. में वोलोगेसीज़ प्रथम के राज्यारोहण के साथ पार्थियन साम्राज्य को पुनः एक योग्य और प्रभावशाली शासक प्राप्त हुआ। वह वोनोनेस द्वितीय का पुत्र था और उसकी माता एक यूनानी उपपत्नी थी। वोलोगेसीज़ प्रथम यूनानी सांस्कृतिक प्रभाव का विरोधी तथा ईरानी परंपराओं का समर्थक था और उसके शासनकाल में पार्थियन राज्य के ईरानीकरण की प्रक्रिया को विशेष प्रोत्साहन मिला। पहली बार पार्थियन मुद्राओं पर यूनानी लिपि की जगह अरामाइक लिपि का प्रयोग आरंभ हुआ। उसने यूनानी प्रभाव को कम करने और सेल्यूकिया के व्यापार को आकर्षित करने के उद्देश्य से वोलोगेसिया नामक नगर बसाया, जो बेबीलोन के दक्षिण में यूफ्रेटस नदी की एक नहर पर स्थित था। कुछ ज़रथुस्त्री ग्रंथों के अनुसार उसने प्राचीन अवेस्ता ग्रंथों के संकलन का आदेश भी दिया था।

वोलोगेसीज़ प्रथम ने अपने भाई पाकोरस को मीडिया अत्रोपातेने का शासक बनाया और एक अन्य भाई तिरिदातेस को आर्मेनिया का शासक नियुक्त किया। उसके इस कदम से रोम के साथ एक लंबा युद्ध (54–63 ई.) छिड़ गया, जिसका नेतृत्व रोमन सेनापति कॉर्बुलो ने किया। दोनों पक्षों के बीच कई वर्षों तक संघर्ष चलता रहा, किंतु कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला। अंततः समझौता हुआ, जिसमें रोम ने आर्मेनिया के शासक तिरिदातेस प्रथम को औपचारिक रूप से राजमुकुट प्रदान कर उसे रोम के अधीन “क्लाइंट-किंग” (अधीनस्थ शासक) के रूप में मान्यता दी। इसके अतिरिक्त, उसके शासनकाल में डाहे और शक जैसी घुमंतू जनजातियों के आक्रमण तथा हिरकानिया में विद्रोह जैसी चुनौतियाँ भी आईं और उसके अपने ही पुत्र वर्दानेस द्वितीय ने सत्ता हड़पने का प्रयास किया।

75 ई. में अलान जनजाति ने आर्मेनिया पर आक्रमण किया। वोलोगेसीज़ प्रथम ने रोम से सैन्य सहायता का अनुरोध किया, किंतु सम्राट वेस्पेसियन ने सहायता देने से इनकार कर दिया। प्रारंभिक संघर्ष में पार्थियन सेना पराजित हुई तथा वोलोगेसीज़ के भाई पाकोरस की रानी बंदी बना ली गई, जिसकी मुक्ति के लिए भारी फिरौती देकर छुड़ाया गया। इसके बाद वोलोगेसीज़ ने अपनी सैन्य शक्ति का पुनर्गठन किया और अंततः आक्रमणकारियों को पराजित कर राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित की।

वोलोगेसीज़ प्रथम ने लगभग 78 ई. तक शासन किया। उसके पश्चात् लगभग 148 ई. तक कई शासक हुए, किंतु उनका शासन विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं रहा। इसी अवधि में 114 ई. में रोमन सम्राट ट्राजन ने पार्थियन साम्राज्य पर आक्रमण कर आर्मेनिया तथा मेसोपोटामिया के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया। उसने सिकंदर महान की भाँति पूर्व की ओर अभियान करने और भारत तक पहुँचने की योजना बनाई, किंतु पश्चिमी एशिया और मिस्र में विद्रोह भड़क उठने के कारण उसकी योजना अधूरी रह गई।

पतन की ओर अग्रसर पार्थिया

वोलोगेसीज़ द्वितीय (148–191 ई.)

लगभग 148 ई. में वोलोगेसीज़ द्वितीय पार्थिया के सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना रोम और पार्थिया के बीच पुनः प्रारंभ हुआ दीर्घकालीन संघर्ष था। इस संघर्ष का मुख्य कारण आर्मेनिया पर प्रभुत्व स्थापित करना था, क्योंकि यह क्षेत्र दोनों साम्राज्यों के बीच एक महत्त्वपूर्ण मध्यस्थ-राज्य था।

उस समय आर्मेनिया में रोमन सम्राट मार्कस ऑरेलियस एंटोनियस के समर्थन से एक शासक (सोहेमस) शासन कर रहा था। वोलोगेसीज़ द्वितीय ने उसे पदच्युत कर अपने पुत्र पाकोरस को आर्मेनिया के सिंहासन पर बैठा दिया। इसके बाद उसके सेनानायक खुसरो (चोस्रोएस) ने एक सुदृढ़ सेना लेकर फरात (यूफ्रेटीस) नदी पार कर रोमन प्रदेशों पर आक्रमण कर दिया। रोमन सेना का नेतृत्व कॉर्नेलियस कर रहा था। प्रारंभिक युद्धों में पार्थियनों को सफलता मिली, खुसरो सीरिया को पार करता हुआ फिलिस्तीन तक पहुँच गया और उसने अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

रोमन प्रत्याक्रमण

प्रारंभिक पराजय के बावजूद रोम ने शीघ्र ही अपनी सैन्य शक्ति का पुनर्गठन किया। इस बार रोमन अभियान का नेतृत्व सम्राट लुसियस ऑरेलियस वेरस को सौंपा गया तथा उसके सहयोग के लिए स्टेटियस प्रिस्कस और एविडियस कैसियस जैसे अनुभवी सेनानायकों को नियुक्त किया गया। दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुए, जिनमें अंततः रोम को सफलता प्राप्त हुई।

रोमन सेना ने पहले आर्मेनिया पर पुनः अधिकार स्थापित किया और वहाँ अपने समर्थक शासक को सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद उसने सीरिया में पार्थियन सेना को पराजित किया तथा आगे बढ़कर सेल्यूसिया नगर पर अधिकार कर उसे आग के हवाले कर दिया। इस विजय के बाद लुसियस वेरस रोम लौटा, जहाँ उसका भव्य स्वागत किया गया और उसे अनेक सम्मान प्रदान किए गए।

मेसोपोटामिया में रोमन अभियान

रोमन सेनापति एविडियस कैसियस ने सेल्यूसिया पर अधिकार करने के बाद पार्थिया की राजधानी क्टेसिफ़ोन की ओर अभियान चलाया। वहाँ पहुँचकर रोमन सैनिकों ने राजमहल, मंदिरों तथा नागरिक बस्तियों में व्यापक लूटपाट और विनाश किया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार इस अभियान में तीन लाख से अधिक नागरिक मौत के घाट उतार दिए गए। इसके बाद रोमन सेना ने मेसोपोटामिया के अनेक क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया।

लगातार पराजयों और साम्राज्य की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए वोलोगेसीज़ द्वितीय ने अंततः रोम के साथ संधि कर ली। संधि की शर्तों के अनुसार उसे मेसोपोटामिया के उत्तर-पश्चिमी भाग पर अपना दावा छोड़ना पड़ा तथा दजला (टिगरिस) नदी दोनों साम्राज्यों की सीमा मान ली गई। वोलोगेसीज़ द्वितीय ने लगभग 191 ई. तक शासन किया।

अर्तबानस चतुर्थ

वोलोगेसीज़ द्वितीय के बाद अनेक शासकों के उपरांत वोलोगेसीज़ पंचम की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों- वोलोगेसीज़ षष्ठ और अर्तबानस चतुर्थ के बीच सत्ता के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया। इस संघर्ष में अर्तबानस चतुर्थ ने लगभग 216 ई. तक साम्राज्य के अधिकांश भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और रोम ने भी उसको सर्वोच्च पार्थियन शासक के रूप में मान्यता दी।

अर्तबानस चतुर्थ के शासनकाल में रोमन सम्राट कैराकल्ला ने आर्मेनिया पर आक्रमण किया और मार्ग में आने वाले अनेक नगरों तथा ग्रामों को नष्ट कर दिया। अनेक सैनिकों और नागरिकों को बंदी बना लिया गया। इसके बाद पार्थिया पर भी आक्रमण किया, किंतु जब अर्तबानस चतुर्थ स्वयं एक बड़ी सेना लेकर आगे बढ़ा, तो कैराकल्ला पीछे हटकर कर्रहे चला गया और वहीं 8 अप्रैल  217 ई. को उसके ही अधिकारियों ने उसकी हत्या कर दी क्योंकि उसके सैनिक दीर्घकालीन युद्ध की अपेक्षा लूटपाट में अधिक रुचि रखते थे।

पार्थियन साम्राज्य का अंत

कैराकल्ला के उत्तराधिकारी मैक्रिनस ने अर्तबानस चतुर्थ के विरुद्ध अभियान जारी रखा, किंतु निसिबिस के युद्ध (217 ई.) में पार्थियन सेना ने रोमनों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस पराजय के बाद मैक्रिनस को भारी हर्जाना देकर संधि करनी पड़ी और रोम को अपनी सभी विजयें छोड़नी पड़ीं। इन सफलताओं से ऐसा लगा कि पार्थिया एक बार फिर पश्चिमी एशिया में अपनी पूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेगा।

किंतु यह सफलता अधिक समय तक स्थायी नहीं रही क्योंकि इसी काल में पार्थियन शक्ति के क्षीण होने के साथ सासानी वंश का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर रोम को पश्चिमी एशिया से बाहर निकालने की नीति अपनाई। अंततः दक्षिण-पश्चिमी ईरान के फ़ार्स क्षेत्र के स्थानीय सासानी शासक अर्दशीर प्रथम ने 224 ई. में होर्मोज़दगान के युद्ध में अंतिम पार्थियन (अर्शकानी) सम्राट अर्तबानस चतुर्थ को पराजित करके मार डाला और सासानी साम्राज्य की स्थापना की। इसके साथ ही लगभग पाँच शताब्दियों तक शासन करने वाले अर्शकानी राजवंश का अंत हो गया।

पार्थियन सभ्यता के प्रमुख तत्त्व

पार्थियन सभ्यता के प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक तत्त्वों का मूल आधार हखामनीषी (आकेमेनिड) परंपराएँ थीं, किंतु उन पर हेलेनिस्टिक यूनानी संस्कृति का भी गहरा प्रभाव था। पार्थियनों ने ईरान से यूनानी राजनीतिक प्रभुत्व को समाप्त अवश्य कर दिया, परंतु यूनानी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव समाप्त नहीं कर सके। वस्तुतः पार्थियन स्वयं मध्य एशिया से आए यायावर समुदाय थे, जिनकी अपनी विकसित नगरीय संस्कृति नहीं थी। इसलिए उन्होंने ईरान में विद्यमान पारसीक तथा हेलेनिस्टिक सांस्कृतिक परंपराओं को अपनाकर उनका समन्वित विकास किया।

मिथ्रिदातेस प्रथम के समय से पार्थियन शासकों ने अपनी मुद्राओं पर ‘फिलहेलेन’ (यूनानी-प्रिय) की उपाधि अंकित करवाने लगे थे, जिसका उद्देश्य यूनानी संस्कृति का गुणगान करना नहीं, बल्कि ईरान में रहने वाली यूनानी एवं हेलेनिस्टिक आबादी का विश्वास बनाए रखना था। प्रशासनिक अभिलेखों, राजकीय आदेशों तथा सिक्कों पर यूनानी भाषा और लिपि का व्यापक प्रयोग किया जाता रहा। पार्थियन अधिकारियों, सचिवों तथा अनेक शासकों को भी यूनानी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उनकी मुद्राएँ, मूर्तिकला तथा अन्य कलात्मक अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उन्होंने यूनानी कलाकारों और विद्वानों को संरक्षण दिया था।

राजनीतिक संगठन

पार्थियन राजनीतिक व्यवस्था मुख्यतः हखामनीषी (पारसीक) प्रशासनिक परंपराओं पर आधारित थी। इस क्षेत्र में उन्होंने कोई मौलिक परिवर्तन नहीं किया, बल्कि सामंतवादी व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया। स्थानीय सरदार और छोटे सामंत पूर्ववत् अपने क्षेत्रों का शासन करते रहे। यदि कोई पराजित शासक पार्थियन सम्राट की अधीनता स्वीकार कर लेता था, तो उसे सामंत के रूप में अपने राज्य का शासन करने की अनुमति मिल जाती थी।

यूनानी एवं रोमन लेखकों के अनुसार पार्थियन साम्राज्य में लगभग अठारह प्रमुख सामंतीय राज्य थे, जिनमें ग्यारह बड़े और सात छोटे राज्य सम्मिलित थे। मीडिया, आर्मेनिया, एलीमाइस (एलिमाइस), पर्सिस तथा कैरेसीन जैसे बड़े सामंत राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त थी। इनमें से कुछ राज्यों ने अपने नाम से मुद्राएँ भी जारी की। इनके अतिरिक्त साम्राज्य का शेष भाग अनेक प्रांतों (क्षत्रपियों) में विभाजित था, जिनका शासन प्रायः प्रभावशाली पार्थियन कुलों के सदस्यों को सौंपा जाता था। यह पद अधिकांशतः वंशानुगत होता था।

साम्राज्य के कुछ सीमावर्ती बर्बर अथवा अर्ध-बर्बर समुदाय, जैसे दक्षिण-पश्चिम के कोसैओई और उक्सियन तथा पश्चिमी सीमा पर स्थित अरब जनजातियाँ व्यवहारतः अर्ध-स्वतंत्र थीं। यद्यपि वे पार्थियन अधिसत्ता को स्वीकार करती थीं, फिर भी उनके आंतरिक मामलों में सम्राट का हस्तक्षेप सीमित होता था।

यूनानी नगरों की स्वायत्तता

पार्थियन साम्राज्य में स्थित अनेक यूनानी नगरों को प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त थी। दजला (टिगरिस) नदी के तट पर स्थित सेल्यूसिया तथा सूसा क्षेत्र के यूनानी नगर अपने आंतरिक प्रशासन का संचालन स्वयं करते थे। यद्यपि उन्हें पार्थियन सत्रपों की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार करनी पड़ती थी, फिर भी उनकी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था में कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया। वे प्रतिवर्ष निश्चित कर तथा उपहार सम्राट को अर्पित करते थे, जबकि बदले में उन्हें पर्याप्त स्थानीय स्वशासन का अधिकार प्राप्त था। इस प्रकार ये नगर व्यावहारिक रूप से स्वायत्त नगर-राज्यों के समान कार्य करते थे।

सामंतीय व्यवस्था की विशेषताएँ

फ्रांसीसी इतिहासकार रोमन घिर्शमान ने पार्थियन सामंतीय व्यवस्था की तुलना मध्यकालीन यूरोप की सामंत-प्रथा से की है। प्रत्येक प्रमुख सामंत पर सम्राट के प्रति दो प्रमुख दायित्व थे- पहला, प्रतिवर्ष कर एवं उपहार देना और दूसरा, आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता उपलब्ध कराना। इन महासामंतों के अधीन अनेक छोटे सामंत और स्थानीय सरदार रहते थे, जो अपने क्षेत्रों के कृषकों, आश्रितों तथा दासों पर शासन करते थे।

इस प्रकार संपूर्ण पार्थियन शासन-व्यवस्था एक बहुस्तरीय सामंतीय ढाँचे पर आधारित थी। घिर्शमान ने इसकी तुलना एक पिरामिड से की है, जिसके आधार पर कृषक एवं आश्रित वर्ग और शीर्ष पर महासामंत स्थित थे। कई बार स्थानीय सामंतों और उनके अधीनस्थों के बीच संबंध सम्राट और सामंत के संबंधों से भी अधिक सुदृढ़ होते थे।

राजपद और उत्तराधिकार

पार्थियन साम्राज्य में राजपद पूर्णतः वंशानुगत नहीं था। सामान्यतः राजा का चयन अर्शक (अर्शकानी) वंश के सदस्यों में से किया जाता था, किंतु यह आवश्यक नहीं था कि ज्येष्ठ पुत्र ही उत्तराधिकारी बने, बल्कि राजपरिवार का कोई भी योग्य सदस्य परिस्थितियों के अनुसार राजा चुना जा सकता था। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जब निम्न कुल से आई किसी राजमहिषी ने भी सत्ता प्राप्त की थी।

राजा के निर्वाचन को सीनेट तथा मागी (पुरोहितों) की परिषद् की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक होता था। इन संस्थाओं का सम्राट पर पर्याप्त प्रभाव और व्यावहारिक नियंत्रण था। राज्याभिषेक का अनुष्ठान सामान्यतः प्रमुख सेनापति द्वारा संपन्न कराया जाता था। हखामनीषी परंपरा के अनुरूप पार्थियन सम्राट को देवतुल्य माना जाता था तथा उसके विरुद्ध विद्रोह या उसकी हत्या को धार्मिक अपराध समझा जाता था।

सामंतवाद और राजनीतिक दुर्बलता

प्रारंभिक काल में सामंतीय व्यवस्था ने पार्थियन साम्राज्य को स्थायित्व और शक्ति प्रदान की, किंतु कालांतर में यही व्यवस्था उसके पतन का प्रमुख कारण सिद्ध हुई। यह सामंतीय ढाँचा पार्थियनों की मौलिक देन न होकर हखामनीषी परंपरा का विकसित रूप था। जब अर्सासिड शासक दुर्बल होने लगे, तब सामंत अत्यधिक शक्तिशाली हो गए और उन्होंने राजसत्ता को चुनौती देना आरंभ कर दिया।

संपूर्ण पार्थियन इतिहास में सामंतों ने राजा बनाने और हटाने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे आवश्यकता पड़ने पर विदेशी शक्तियों, विशेषकर रोम की सहायता लेने से भी नहीं हिचकिचाते थे। उत्तराधिकार के प्रश्न पर अकसर अनेक राजकुमार अपना दावा प्रस्तुत करते थे, जिससे गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती थी। जो दावेदार सिंहासन प्राप्त करने में असफल रहते थे, वे कभी मध्य एशिया की घुमंतू जातियों और कभी रोम में शरण लेकर अपने दावे के समर्थन का प्रयास करते थे। यही प्रवृत्ति आगे चलकर पार्थियन साम्राज्य की राजनीतिक दुर्बलता और विघटन का प्रमुख कारण बनी।

राजदरबार और राजधानियाँ

पार्थियन सम्राटों का राजदरबार अत्यंत वैभवशाली तथा शान-शौकत से परिपूर्ण था। इसकी व्यवस्था बहुत कुछ हखामनीषी (आकेमेनिड) राजदरबारों के अनुरूप थी। पार्थियन साम्राज्य की तीन प्रमुख राजधानियाँ थीं- दजला (टिगरिस) नदी के तट पर स्थित क्टेसिफ़ोन (टेसिफन), मीडिया का एकबतना (हमदान) तथा पार्थिया का हेकातोंपाइलोस। इनमें क्टेसिफ़ोन शीतकालीन राजधानी थी, जबकि अन्य नगरों का उपयोग विभिन्न ऋतुओं तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता था। इन सभी राजधानियों में भव्य राजप्रासाद निर्मित थे। इसके अतिरिक्त बेबिलोन में भी पार्थियन शासकों का एक महत्त्वपूर्ण राजमहल था।

पार्थियन शासक केवल वैभवशाली दरबार के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे व्यक्तिगत रूप से भी विलासप्रिय एवं आमोद-प्रमोद के प्रेमी थे। यूनानी लेखक प्लूटार्क ने प्रसिद्ध पार्थियन सेनानायक सुरेन के ऐश्वर्य का विशेष उल्लेख किया है। उसके अनुसार जब सुरेन कर्रहे के युद्ध में भाग लेने निकला, तब उसके साथ लगभग दो सौ उपपत्नियाँ (रखैलें) तथा सामान ढोने के लिए एक हजार ऊँट थे। यह विवरण पार्थियन कुलीन वर्ग की समृद्धि और वैभव का परिचायक है।

सैन्य संगठन

पार्थियन साम्राज्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी शक्तिशाली अश्वारोही सेना थी। उनके पास कोई स्थायी केंद्रीय सेना नहीं थी। सैन्य संगठन सामंतवादी व्यवस्था पर आधारित था। प्रत्येक प्रमुख सामंत के पास अपनी निजी सेना होती थी। युद्ध के समय सम्राट के आह्वान पर सामंत, उनके अधीनस्थ छोटे सरदार, स्वतंत्र योद्धा तथा दास-सैनिक निर्धारित स्थान पर एकत्र होकर संयुक्त सेना का गठन करते थे।

कर्रहे के प्रसिद्ध युद्ध में सेनानायक सुरेन की अधिकांश अश्वारोही सेना उसके निजी सामंतीय सैनिकों से बनी थी। पार्थियन अश्वारोही सेना अत्यंत अनुशासित और युद्धकुशल थी। माना जाता है कि मिथ्रिदातेस द्वितीय ने इस सेना का व्यापक पुनर्गठन किया और उसे पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ बनाया। पार्थियन घुड़सवार सेना को सामान्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- साधारण अश्वारोही, धनुर्धर अश्वारोही तथा भारी कवचधारी अश्वारोही, जो भाले और शक्तिशाली धनुष से सुसज्जित रहते थे।

सेना में ऊँटों का भी महत्त्वपूर्ण उपयोग होता था, विशेषकर रसद एवं अतिरिक्त शस्त्र ले जाने के लिए। कर्रहे के युद्ध में लगभग एक हजार ऊँट अतिरिक्त बाणों की आपूर्ति के लिए लगाए गए थे। इसके विपरीत पार्थियनों ने युद्ध में हाथियों का उपयोग नहीं किया।

पार्थियन सेना की सबसे बड़ी शक्ति उसकी तीव्र गति और धनुर्विद्या थी। उनके घुड़सवार पहले दूर से तीरों की वर्षा कर शत्रु की पंक्तियों को अस्त-व्यस्त करते थे और तत्पश्चात तीव्र गति से आक्रमण कर उसे पराजित कर देते थे। इसके विपरीत पदाति सेना का महत्त्व अपेक्षाकृत कम था। इसमें मुख्यतः पर्वतीय जनजातियों के लोग तथा दास सम्मिलित होते थे, जिनका उपयोग युद्ध की अपेक्षा सुरक्षा और सहायक कार्यों में अधिक किया जाता था। पार्थियन घेराबंदी की कला में विशेष दक्ष नहीं थे, इसलिए सुदृढ़ प्राचीरों से सुरक्षित नगरों पर अधिकार करने में उन्हें प्रायः कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

राजस्व व्यवस्था

पार्थियन साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भूमिकर था, यद्यपि इसके स्वरूप के विषय में जानकारी बहुत सीमित है। संभवतः विभिन्न प्रांतों में कर की व्यवस्था स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न थी। यह कर तलमूद में ‘तस्क’ के नाम से उल्लिखित है और इसे व्यक्तिकर या भूमिकर के रूप में भी जाना जाता था। किसी ग्राम अथवा नगर का निवासी एक बार कर अदा करने के बाद करदाताओं की सूची में दर्ज कर लिया जाता था।

यदि कोई व्यक्ति कर देने में असफल रहता था, तो उसकी संपत्ति राजसत्ता द्वारा जब्त की जा सकती थी, क्योंकि भूमि का अंतिम स्वामी सम्राट माना जाता था। कई बार कर न चुका पाने की स्थिति में व्यक्ति अपनी संपत्ति अथवा स्वयं को भी बेच देता था। ऐसी दशा में कर चुकाने का दायित्व नए स्वामी पर आ जाता था। कुलीन वर्ग, सैनिकों, पुरोहितों तथा उच्च अधिकारियों को सामान्यतः व्यक्तिकर से छूट प्राप्त थी। भूमिकर के अतिरिक्त नदी-मार्गों के उपयोग, नमक के व्यापार तथा दासों के आयात-निर्यात पर भी कर लगाए जाते थे, जो राज्य की आय के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे।

सामाजिक संगठन

पार्थियन काल का ईरानी समाज हखामनीषी युग की अपेक्षा अधिक मिश्रित एवं बहुआयामी था। इसका प्रमुख कारण यूनानी तथा रोमन समुदायों के साथ दीर्घकालीन संपर्क था। इस सांस्कृतिक समन्वय के परिणामस्वरूप पार्थियन समाज में ईरानी और हेलेनिस्टिक परंपराओं का संमिश्रण हुआ। यूनानी लेखक प्लूटार्क तथा जस्टिन के अनुसार पार्थियन समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित था- पहला, स्वतंत्र नागरिकों का अल्पसंख्यक वर्ग और दूसरा, आश्रित अथवा दास वर्ग, जो संख्या में अधिक था।

सामाजिक वर्ग-विभाजन

अल्पसंख्यक स्वतंत्र नागरिकों के वर्ग में राजपरिवार, कुलीन (अभिजात), सामंत, पुरोहित, लेखक, राजकीय अधिकारी तथा विभिन्न व्यवसायों से जुड़े स्वतंत्र श्रमिक सम्मिलित थे। मध्यकालीन पारसी ग्रंथों में इस उच्च वर्ग को ‘बुज़ुर्गान’ कहा गया है। राजपरिवार और उच्च अधिकारी समाज में सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी थे। उन्हें प्रशासन तथा सेना में विशेष अधिकार प्राप्त थे और वे राज्य की नीतियों के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

राजपरिवार के बाद सामंतों का स्थान था। वे अत्यंत समृद्ध एवं प्रभावशाली थे तथा अपनी निजी सेनाएँ रखते थे। आवश्यकता पड़ने पर सम्राट इन्हीं सामंतीय सेनाओं की सहायता से युद्ध करता था। पुरोहित, लेखक तथा अन्य राजकीय अधिकारी सामंतों से नीचे होते हुए भी समाज में अत्यंत सम्मानित थे। स्वतंत्र श्रमिक वर्ग में व्यापारी, कृषक, कारीगर तथा मजदूर सम्मिलित थे, जो आर्थिक जीवन की आधारशिला थे।

दास-प्रथा

पार्थियन काल में दासों की स्थिति के विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, किंतु परवर्ती ससैनियन काल के स्रोतों से कुछ जानकारी मिलती है। इनके आधार पर दास मुख्यतः दो प्रकार के थे- पहले, युद्धबंदी विदेशी और दूसरे, ऋणग्रस्त होकर अथवा स्वयं को बेचकर दास बने व्यक्ति।

यूनानी एवं रोमन प्रभाव के कारण पार्थियनों का दासों के प्रति दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार था। कुशल दासों को शिल्प एवं कलाओं में कार्य करने का अवसर मिलता था तथा शिक्षित दासों को प्रशासन में उच्च पद भी दिए जाते थे। कुछ अवसरों पर दास वर्ग से आए व्यक्तियों ने राजपरिवार तक में स्थान प्राप्त किया, जैसे फ्राएतेस चतुर्थ के समय रोमन सम्राट ऑगस्टस द्वारा उपहारस्वरूप भेजी गई इटली की एक दासी मूसा आगे चलकर पार्थियन राजदरबार की प्रमुख रानी बनी और फ्राएतेस चतुर्थ के शासन-कार्य में भी सहभागी हुई। इस प्रकार सामाजिक गतिशीलता के कुछ अवसर पार्थियन समाज में उपलब्ध थे।

स्त्रियों की स्थिति

पार्थियन समाज पितृसत्तात्मक था और स्त्रियाँ सामान्यतः पुरुषों के अधीन मानी जाती थीं। संपन्न परिवारों तथा राजपरिवार में बहुविवाह प्रचलित था। हखामनीषी परंपरा के अनुरूप पार्थियन शासकों के हरम में अनेक रानियों के अतिरिक्त उपपत्नियाँ (रखैलें) तथा दासियाँ भी रहती थीं। प्लूटार्क के अनुसार प्रसिद्ध सेनानायक सुरेन के हरम को ले जाने के लिए लगभग एक सौ ऊँटों की आवश्यकता पड़ती थी।

उच्च वर्ग की स्त्रियाँ प्रायः पर्दे में रहती थीं तथा उनके सामाजिक संपर्क सीमित होते थे। व्यभिचार को गंभीर अपराध माना जाता था और उसके लिए कठोर दंड का प्रावधान था। यद्यपि समाज पुरुषप्रधान था, फिर भी पति और पत्नी दोनों को तलाक लेने का अधिकार प्राप्त था, जो उस समय की अनेक सभ्यताओं की तुलना में एक विशिष्ट व्यवस्था थी।

जीवन-शैली एवं रहन-सहन

पार्थियन स्वभावतः युद्धप्रिय तथा साहसी थे। शिकार उनका प्रमुख मनोरंजन था। वे मांस तथा मदिरा का सेवन करते थे और संगीत एवं वाद्ययंत्रों में भी विशेष रुचि रखते थे। बांसुरी और ढोल जैसे वाद्ययंत्र लोकप्रिय थे तथा उत्सवों एवं समारोहों में उनका व्यापक उपयोग होता था।

स्त्री और पुरुष दोनों लंबे तथा घुँघराले बाल रखते थे। पुरुष प्रायः लंबी दाढ़ी और मूँछ रखते तथा ढीला लंबा जामा और तंग पायजामा पहनते थे। स्त्रियाँ कढ़ाईदार वस्त्र धारण करतीं और बालों में पुष्पों का श्रृंगार करती थीं। उनकी वेशभूषा और आभूषणों की जानकारी मुख्यतः पार्थियन सिक्कों तथा मूर्तिकला से प्राप्त होती है। अर्शकानी शासकों की मुद्राओं में उन्हें कभी यूनानी शैली का मुकुट, लंबा कोट और जूते पहने, तो कभी सैनिक वेश, शिरस्त्राण और कवच सहित अंकित किया गया है।

पारिवारिक व्यवस्था

पार्थियन समाज पूर्णतः पितृसत्तात्मक था। परिवार का मुखिया पिता होता था और उसके पश्चात सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र संपत्ति का उत्तराधिकारी बनता था। ज्येष्ठ पुत्र के अयोग्य होने की स्थिति में अन्य योग्य पुत्र को उत्तराधिकार दिया जा सकता था। यही सिद्धांत राजसिंहासन के उत्तराधिकार में भी लागू होता था। पार्थियन व्यक्तिगत जीवन में उदार, वचन के पक्के तथा युद्धबंदियों के प्रति अपेक्षाकृत सहिष्णु थे। वे संधियों और युद्ध-शर्तों का सामान्यतः पालन करते थे तथा योग्य विदेशियों को भी प्रशासन और सेना में उच्च पद प्रदान करने से नहीं हिचकते थे।

आर्थिक संगठन

कृषि एवं भूमि-व्यवस्था

पार्थियन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि तथा व्यापार था। कृषि पर्याप्त विकसित अवस्था में थी, किंतु भूमि-स्वामित्व की संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। समय के साथ छोटे-छोटे कृषिभूमि-खंड समाप्त होते गए और अधिकांश भूमि सामंतों, कुलीनों तथा संपन्न भूस्वामियों के अधिकार में केंद्रित हो गई। फलस्वरूप छोटे कृषक धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खोते गए और बड़े भू-स्वामियों पर निर्भर होते चले गए। यद्यपि वे विधिक रूप से स्वतंत्र थे, तथापि उनकी वास्तविक स्वतंत्रता सीमित थी।

विशाल भू-संपत्तियों के कारण बड़े भूस्वामी कृषि में अपेक्षाकृत उन्नत तकनीकों तथा वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर सकते थे, जबकि साधारण कृषकों के लिए ऐसा करना संभव नहीं था। कृषि योग्य भूमि का मूल्य निरंतर बढ़ने से छोटे किसानों के लिए भूमि खरीदना कठिन हो गया। परिणामस्वरूप कृषि से प्राप्त होने वाला अधिकतर लाभ बड़े भू-स्वामियों को ही प्राप्त होता था।

कृषि का विविधीकरण एवं पशुपालन

विदेशी देशों के साथ बढ़ते संपर्क का प्रभाव कृषि पर भी पड़ा। पार्थियन काल में अनेक विदेशी फल, सब्जियाँ तथा सुगंधित पौधों की खेती प्रारंभ हुई और अंगूर, खीरा, ककड़ी, लहसुन, प्याज, केसर तथा चमेली जैसी फसलों का उत्पादन किया जाने लगा। कुछ स्रोतों के अनुसार चीन से गन्ने की खेती संबंधी जानकारी भी इस काल में ईरान पहुँची और सीमित स्तर पर उसका उत्पादन आरंभ हुआ।

कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी आर्थिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग था। विशेष रूप से मुर्गीपालन अत्यंत विकसित था और इसके उत्पादों की विदेशी बाजारों में पर्याप्त माँग रहती थी। घोड़े, ऊँट तथा अन्य पालतू पशु न केवल कृषि बल्कि परिवहन और व्यापार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

उद्योग एवं शिल्प

पार्थियन काल में अनेक उद्योग-धंधे भी प्रचलित थे। वस्त्र उद्योग, मृद्भांड उद्योग, चर्म उद्योग, लौह उद्योग तथा काँच (शीशा) उद्योग विशेष रूप से विकसित थे। इन उद्योगों के उत्पाद घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ व्यापारिक विनिमय में भी उपयोगी थे।

समकालीन रोमन विश्व में भी इन उद्योगों का उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी विकास समानांतर रूप से आगे बढ़ रहा था। शिल्पकारों द्वारा निर्मित वस्तुओं ने पार्थियन व्यापार को नई गति प्रदान की।

व्यापार एवं अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य

पार्थियन अर्थव्यवस्था का सबसे सशक्त पक्ष उसका व्यापार था। सिकंदर के पूर्वी अभियानों के बाद पूर्व और पश्चिम के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्ग विकसित हुए, जिनमें से अधिकांश ईरान से होकर गुजरते थे। भौगोलिक स्थिति के कारण पार्थियन साम्राज्य पूर्व और पश्चिम के बीच एक महत्त्वपूर्ण मध्यस्थ बन गया।

पार्थियन व्यापारी विदेशी व्यापारियों के माल के परिवहन, नदियों को पार कराने तथा कारवाँ की सुरक्षा में सहयोग देते थे। धीरे-धीरे एक संगठित व्यापारी वर्ग विकसित हुआ, जिसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हखामनीषी काल से ही ईरान, बेबिलोन, सीरिया तथा फिलिस्तीन के बीच व्यापारिक संबंध स्थापित थे, जिन्हें पार्थियन शासकों ने और अधिक सुदृढ़ बनाया।

रोमन साम्राज्य ईरान के माध्यम से ताँबे तथा शीशे के पात्र, मदिरा और जैतून का तेल पूर्वी देशों को भेजता था। इसके विपरीत पूर्व से रेशम, सुगंधित द्रव्य, बहुमूल्य रत्न तथा विलासिता की अनेक वस्तुएँ रोम तक पहुँचती थीं। भारत और चीन से आयातित इस्पात भी ईरान के माध्यम से पश्चिमी देशों में निर्यात किया जाता था। संभवतः दमिश्क की प्रसिद्ध इस्पाती तलवारों के निर्माण में भारतीय अथवा चीनी इस्पात का उपयोग किया जाता था। प्लूटार्क के अनुसार पार्थियन सैनिकों के कुछ अस्त्र भारतीय इस्पात से निर्मित थे।

आयात-निर्यात एवं आंतरिक व्यापार

पार्थियन साम्राज्य विभिन्न देशों से पशुओं की खालें, ऊन, सूती वस्त्र, लकड़ी के बने उपकरण, पशु-पक्षी, चावल, मादक पदार्थ, केसर, बहुमूल्य पत्थर, डामर, खनिज तेल, कागज, ताँबे की वस्तुएँ, काँच के पात्र, मृद्भांड तथा बैंगनी रंग जैसी वस्तुओं का आयात करता था। इसके अतिरिक्त इन वस्तुओं का पुनः निर्यात भी किया जाता था।

आंतरिक व्यापार भी अत्यंत सक्रिय था। नगरों में विकसित बाजार आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। बैंकिंग व्यवस्था का प्रारंभिक स्वरूप विद्यमान था, यद्यपि वह पूर्ण विकसित नहीं थी। विनिमय के लिए रजत एवं ताम्र मुद्राओं का व्यापक उपयोग होता था। इन मुद्राओं पर प्रायः शासकों तथा यूनानी देवता अपोलो की आकृतियाँ अंकित रहती थीं।

परिवहन, संचार एवं डाक-व्यवस्था

पार्थियन शासकों ने सड़कों तथा परिवहन व्यवस्था के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उनके शासनकाल में निर्मित राजमार्ग पूर्ववर्ती काल की अपेक्षा अधिक सुव्यवस्थित थे। मरुस्थलीय मार्गों पर यात्रियों और व्यापारिक कारवाँ की सुविधा के लिए कुएँ तथा विश्रामस्थल बनाए गए थे। डूरा से प्राप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि रेगिस्तानी मार्गों पर कारवाँ की सुरक्षा के लिए विशेष प्रहरी नियुक्त रहते थे। पार्थियन समाज में यह विश्वास भी प्रचलित था कि यात्रियों की रक्षा देवता करते हैं। घोड़ों और ऊँटों के माध्यम से लंबी यात्राएँ की जाती थीं।

संचार व्यवस्था भी अत्यंत प्रभावी थी। डाक-प्रणाली में निश्चित दूरी पर विश्रामस्थल स्थापित किए गए थे, जहाँ थके हुए घोड़ों के स्थान पर नए घोड़े लेकर संदेशवाहक आगे बढ़ जाते थे। इस व्यवस्था के कारण लंबी दूरी की यात्राएँ अपेक्षाकृत कम समय में पूरी हो जाती थीं। उदाहरण के लिए वर्दनीज ने अपने भाई गोतर्जीज को अपदस्थ करने के उद्देश्य से लगभग 520 किलोमीटर की दूरी केवल दो दिनों में तय की थी। घोड़ों के खुरों में नाल लगाने की कला भी इस काल में प्रचलित थी, यद्यपि इसकी उत्पत्ति पूर्व या पश्चिम में हुई थी, यह निश्चित नहीं है।

पार्थियन धर्म

पार्थियनों के धार्मिक जीवन एवं विश्वासों के संबंध में जानकारी अपेक्षाकृत सीमित है। वे मूलतः मध्य एशिया के यायावर (खानाबदोश) समुदाय से संबंधित थे, इसलिए संभवतः प्रारंभिक अवस्था में उनके बीच प्रकृति-पूजा तथा आदिम धार्मिक विश्वासों का प्रचलन था। वे प्राकृतिक शक्तियों के प्रति श्रद्धा रखते थे, किंतु ईरान में प्रवेश के बाद उनके धार्मिक जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। यह निश्चित नहीं है कि उन्होंने प्राचीन ईरानी धर्म को किस सीमा तक अपनाया, परंतु अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि प्रारंभिक पार्थियन पूर्णतः जरथुस्त्र धर्म के अनुयायी नहीं थे।

कुछ विद्वान इस मत से असहमत हैं। उनका तर्क है कि पार्थियन भी हखामनीषी ईरानियों की भाँति जल को पवित्र मानते थे। वे रोमन इतिहासकार टेसिटस के उस वर्णन का उल्लेख करते हैं, जिसके अनुसार वोलोगेसीज़ प्रथम के भाई तथा आर्मेनिया के राजा तिरिदातेस प्रथम ने सम्राट नीरो से राजमुकुट ग्रहण करने के लिए रोम जाते समय जलमार्ग का उपयोग केवल इस कारण नहीं किया कि उससे जल की पवित्रता भंग हो सकती थी। किंतु टेसिटस के ही अन्य विवरण से ज्ञात होता है कि राज्याभिषेक से पूर्व तिरिदातेस ने अपना मुकुट नीरो की प्रतिमा के चरणों में रखकर परंपरागत बलि-संस्कार की पूर्ति का संकेत दिया था। इससे स्पष्ट होता है कि प्रथम शताब्दी ई. तक पार्थियन शासक वर्ग में रक्तयुक्त बलिप्रथा प्रचलित थी, जो जरथुस्त्र धर्म के मूल सिद्धांतों से भिन्न थी।

पितृपूजा एवं प्रारंभिक धार्मिक परंपराएँ

ईरान में स्थापित होने के पश्चात पार्थियनों ने अपने राजवंश के संस्थापक अर्शक/ अर्सकस की पूजा प्रारंभ कर दी, जिसकी पुष्टि पुरातात्त्विक साक्ष्यों तथा यूनानी-रोमन लेखकों के विवरणों से होती है। इससे स्पष्ट है कि राजवंशीय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा पार्थियन धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग थी।

स्ट्रैबो, प्लिनी तथा अन्य शास्त्रीय लेखकों के विवरणों से ज्ञात होता है कि पार्थियनों में मद्य-निषेध से संबंधित कुछ धार्मिक नियम, वर्जित कर्मों की धारणाएँ तथा तंत्र-मंत्र एवं अभिचार संबंधी विश्वास भी प्रचलित थे। इन मान्यताओं पर बेबिलोनियाई धार्मिक परंपराओं का प्रभाव माना जाता है।

ईरानी त्रिदेव-परंपरा: अहुरमज़्दा, मिथ्र और अनाहिता

हखामनीषी काल में ईरान में अहुरमज़्दा, मिथ्र (मित्र) तथा अनाहिता की संयुक्त उपासना प्रचलित थी। पुरातात्त्विक प्रमाणों से संकेत मिलता है कि पार्थियनों ने भी इस देवत्रयी की पूजा जारी रखी। यद्यपि साहित्यिक स्रोतों में इसका उल्लेख कम मिलता है, फिर भी आर्मेनिया में प्राप्त तीन वेदियों पर इन तीनों देवताओं की प्रतिमाएँ तथा उनके नाम अंकित मिले हैं। इसी प्रकार नक्श-ए-रुस्तम, पासारगादे तथा अन्य धार्मिक स्थलों से प्राप्त वेदियाँ भी इस त्रिदेव-परंपरा की पुष्टि करती हैं। अनेक पार्थियन सामंतों की मुद्राओं पर मंदिर की छत पर स्थित तीन अग्निवेदियों का चित्रांकन मिलता है, जिसे अधिकांश विद्वान अहुरमज़्दा, मिथ्र और अनाहिता के प्रतीक के रूप में स्वीकार करते हैं।

अहुरमज़्दा प्राचीन ईरान के सर्वोच्च देवता थे और पार्थियनों ने भी उनकी उपासना को अपनाया। सूर्यदेव की पूजा मिथ्र (मित्र) के रूप में की जाती थी। विभिन्न अभिलेखों एवं परंपराओं में उन्हें मिह्र, मिह्रबोजन, मिह्रदातक तथा अन्य नामों से संबोधित किया गया है। मिथ्र को सैनिकों का संरक्षक, सत्य का रक्षक, दानवों का विनाशक तथा समृद्धि का दाता माना जाता था।

इन दोनों देवताओं की अपेक्षा अनाहिता देवी का महत्त्व और भी अधिक था। अनाहिता जल, उर्वरता तथा समृद्धि की देवी मानी जाती थीं। हखामनीषी सम्राट अर्तक्षत्र (अर्तजरक्सीज) द्वितीय के काल से उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई और पार्थियन युग में वह अपने चरम पर पहुँच गई। लगभग सभी प्रमुख ईरानी धार्मिक केंद्रों के अभिलेखों में अनाहिता का उल्लेख मिलता है।

परंपरा के अनुसार तिरिदातेस का राज्याभिषेक अर्सक स्थित अनाहिता के मंदिर में हुआ था। एकबतना में स्थित अनाहिता के प्रसिद्ध मंदिर को सिल्यूसिड शासक एंटिओकस चतुर्थ ने लूटा था। इसी प्रकार मिथ्रिदातेस प्रथम ने इलीमाइस में एथेना तथा अनाहिता से संबंधित मंदिरों पर अधिकार किया। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि पार्थियन काल में अनाहिता की उपासना अत्यंत व्यापक थी और उनके अनेक भव्य मंदिर स्थापित थे।

सूसा में अनाहिता को ‘ननैया’ नाम से पूजा जाता था, जो उनका सेमिटिक रूप था। कुछ विद्वानों ने अग्नि-पूजा को भी अनाहिता की उपासना से संबद्ध माना है। घिर्शमान के अनुसार ईरानी देवियों में अनाहिता ही ऐसी देवी थीं, जिनकी पूजा ईरान के बाहर पश्चिमी एशिया तक फैली हुई थी। लीडिया में उन्हें ‘लेडी ऑफ बैक्ट्रिया’ कहा जाता था। पार्थियन युद्धबंदियों तथा प्रवासियों के माध्यम से अनाहिता की उपासना रोम तथा राइन और डैन्यूब क्षेत्रों तक भी पहुँची। आधुनिक तख़्त-ए-सुलेमान (मीडिया एट्रोपैटीन) स्थित शिज का प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र भी अनाहिता का प्रमुख तीर्थ माना जाता था।

अभिचार एवं मृतक संस्कार

त्रिदेव-पूजा के साथ-साथ पार्थियन समाज में जादू-टोना, अभिचार तथा तांत्रिक मान्यताओं का भी प्रचलन था। विद्वानों के अनुसार संभवतः इस प्रवृत्ति पर बेबिलोनियाई धार्मिक परंपराओं का पर्याप्त प्रभाव था।

पार्थियन मृतक संस्कार के मामले में भी जरथुस्त्र धर्मावलंबियों से भिन्न थे। जहाँ जरथुस्त्र धर्म में शवों को खुले स्थानों पर पक्षियों एवं पशुओं के लिए छोड़ देने की परंपरा थी, वहीं पार्थियन सामान्यतः शवों को मिट्टी या पत्थर की मंजूषाओं (सार्कोफेगस) में आवश्यक सामग्री सहित दफनाते थे। इन शव-मंजूषाओं के भीतर और बाहर अनाहिता देवी के चित्र अंकित किए जाते थे। सूसा से प्राप्त पार्थियन समाधियाँ इस प्रथा की पुष्टि करती हैं।

प्रथम शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध तथा द्वितीय शताब्दी के प्रारंभ में शवाधान की पद्धति में परिवर्तन हुआ। व्यक्तिगत समाधियों के स्थान पर सामूहिक समाधियों का निर्माण होने लगा। इन समाधियों में सीढ़ियाँ, विशेष अंत्येष्टि-कक्ष तथा मेहराबदार छतें पकी ईंटों से निर्मित होती थीं। शवों को पहले एक तख्ते पर रखा जाता था और शरीर के विघटन के पश्चात केवल अस्थियों को व्यवस्थित रूप से एकत्र कर सुरक्षित रखा जाता था। यह परंपरा आंशिक रूप से मागी पुरोहितों की शव-संस्कार पद्धति से मिलती-जुलती थी।

धार्मिक सहिष्णुता

पार्थियन शासकों की एक प्रमुख विशेषता विदेशी धर्मों के प्रति उनकी थी। उन्होंने मेसोपोटामिया तथा अन्य विजित प्रदेशों के अनेक स्थानीय देवी-देवताओं को थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ अपना लिया और स्थानीय धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया। साथ ही उन्होंने यूनानियों, यहूदियों तथा प्रारंभिक ईसाइयों को भी अपने-अपने धर्म का स्वतंत्र रूप से पालन करने की अनुमति दे रखी थी।

पार्थियन स्वयं सूर्य, चंद्र, मिथ्र तथा अहुरमज़्दा की पूजा करते थे, जबकि उनके साम्राज्य में यूनानी मंदिर, यहूदी उपासना-स्थल तथा प्रारंभिक ईसाई प्रार्थना-गृह भी विद्यमान थे। डूरा-यूरोपोस जैसे नगरों में विभिन्न यूनानी देवताओं के साथ-साथ सुमेरियन-अक्कादी देवता नर्गल और यूनानी देवता हर्मीस के मंदिरों के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

यहूदियों के प्रति नीति

पार्थियन शासकों का दृष्टिकोण यहूदियों के प्रति विशेष रूप से उदार था। आर. एन. फ्राइ के अनुसार पार्थियन शासनकाल में यहूदियों की स्थिति ससैनियनों तथा उनसे पूर्व के सिल्यूसिड और रोमन शासन की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक थी। पूर्ववर्ती विदेशी शासकों द्वारा उत्पीड़ित यहूदी समुदाय पार्थियनों को अपना संरक्षक मानने लगा था।

इसी काल में बेबिलोन यहूदी धर्म का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया। लगभग 20 ईसा पूर्व फरात नदी के तट पर एक यहूदी सामंती राज्य की स्थापना भी हुई, जो लगभग दो दशकों तक अस्तित्व में रहा। दूसरी शताब्दी ईस्वी में रोम के विरुद्ध हुए यहूदी विद्रोहों के समय पार्थियनों ने विद्रोहियों की सहायता की, जिससे दोनों के बीच राजनीतिक एवं धार्मिक सहयोग और अधिक सुदृढ़हो गया।

कला एवं स्थापत्य

पार्थियन काल की कला और स्थापत्य के संबंध में प्रारंभिक इतिहासकारों, विशेषकर जेम्स फर्ग्यूसन का मत था कि सिकंदर के आक्रमण से लेकर ससैनियन साम्राज्य के उदय तक ईरान में कला का विशेष विकास नहीं हुआ। किंतु आधुनिक पुरातात्त्विक उत्खननों और अनुसंधानों ने इस धारणा का खंडन कर दिया है। उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि पार्थियन युग में नगर-योजना, स्थापत्य, मूर्तिकला, उद्धृत (रिलीफ) कला, चित्रकला तथा गौण कलाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ था। इस काल की कला में ईरानी परंपराओं के साथ-साथ हेलेनिस्टिक प्रभाव का भी समन्वय दिखाई देता है।

नगर-योजना

पार्थियन काल के प्रमुख नगरों में मेसोपोटामिया का क्टेसिफ़ोन (क्टेसिफ़ोन) और हत्रा तथा ईरान के दराबगिर्द और गोर (फिरोज़ाबाद) विशेष उल्लेखनीय हैं। यद्यपि गोर का वर्तमान स्वरूप ससैनियन शासक अर्दशीर प्रथम के समय विकसित हुआ, फिर भी इसकी योजना का आधार पार्थियन परंपरा से जुड़ा था। इन नगरों की योजना मुख्यतः सुरक्षा की दृष्टि से बनाई गई थी। अधिकांश नगर गोलाकार अथवा वृत्ताकार रूप में बसाए गए तथा उनके चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर निर्मित की गई थीं। प्राचीरों पर निश्चित दूरी पर बुर्ज बनाए जाते थे, जिनसे शत्रु की गतिविधियों पर दृष्टि रखी जा सके। नगरों के बाहर चौड़ी और गहरी परिखाएँ भी बनाई जाती थीं। हत्रा इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ दुर्ग, प्राचीर और परिखा तीनों की सुदृढ़ व्यवस्था थी। घिर्शमान के अनुसार यह पश्चिमी एशिया की प्राचीन नगर-योजना परंपरा का विकसित रूप था।

भवन निर्माण एवं स्थापत्य

पार्थियन स्थापत्य का सर्वाधिक विकास राजप्रासादों और मंदिरों के निर्माण में दिखाई देता है। राजप्रासाद सामान्यतः नगर के मध्य भाग में बनाए जाते थे। इनके विशाल कक्ष, ऊँची छतें तथा विस्तृत प्रांगण उनकी भव्यता के परिचायक थे। हत्रा के राजप्रासाद में आठ विशाल कक्ष थे, जिनकी औसत लंबाई लगभग 27 मीटर तथा चौड़ाई 12 मीटर थी। छतें प्रायः मेहराबदार अथवा बैरल-वॉल्ट शैली की होती थीं, जो आगे चलकर ससैनियन स्थापत्य की विशेषता बनी।

मंदिरों का निर्माण भी योजनाबद्ध ढंग से किया जाता था। उनके मध्य भाग में गर्भगृह स्थापित होता था, जहाँ देवप्रतिमा रखी जाती थी। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ बनाया जाता था तथा ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था रहती थी। धार्मिक अनुष्ठान प्रायः मंदिर के बाहर खुले प्रांगण में संपन्न होते थे, जबकि मंदिर की छत पर अग्निवेदियाँ निर्मित रहती थीं। अधिकांश मंदिर ऊँचे चबूतरों पर बनाए जाते थे, जिन तक पहुँचने के लिए चारों ओर सीढ़ियाँ होती थीं।

निर्माण सामग्री एवं अलंकरण

पार्थियन स्थापत्य में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न निर्माण सामग्रियों का उपयोग किया जाता था। हत्रा में तराशे हुए पत्थरों का प्रयोग अधिक किया गया, जबकि आमतौर पर कच्ची अथवा पकी ईंटों तथा गुटिका-पत्थरों (पेबुल) का ही उपयोग किया जाता था। भवनों की बाहरी दीवारों को प्लास्टर, मूर्तियों तथा भित्तिचित्रों से सजाया जाता था। घिर्शमान के अनुसार भवनों को मूर्तियों से अलंकृत करने की परंपरा पार्थियनों ने हखामनीषी स्थापत्य से ग्रहण की और बाद में यही परंपरा ससैनियन स्थापत्य में विकसित रूप में दिखाई देती है। अनगढ़ी तथा ईंटों की दीवालों को साँचे में ढाली गई आकृतियों तथा फ्रेस्को विधि की चित्रकारी से सजाया जाता था।

मूर्तिकला

पार्थियन मूर्तिकला में ईरानी तथा हेलेनिस्टिक दोनों कलात्मक परंपराओं का समन्वय था। अधिकांश मूर्तियाँ कांस्य तथा संगमरमर से निर्मित हैं और इनमें राजाओं, रानियों, राजकुमारों तथा देवी-देवताओं का चित्रण किया गया है। प्राचीन इलीमाइस (एलिमाइस) क्षेत्र के शमी से प्राप्त विशाल कांस्य प्रतिमा पार्थियन मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी स्थल से एक शिरविहीन कांस्य प्रतिमा, एक संगमरमर की राजकुमार प्रतिमा तथा हेलेनिस्टिक शैली के दो कांस्य मस्तक भी प्राप्त हुए हैं।

सूसा से प्राप्त संगमरमर की एक स्त्री-मूर्ति का मस्तक विशेष प्रसिद्ध है। अधिकांश विद्वानों के अनुसार यह पार्थियन शासक फ्राएतेस चतुर्थ की रानी मूसा का चित्रण है। इसके मुकुट पर यूनानी भाषा में कलाकार एंटिओकस का नाम अंकित है, जिससे संकेत मिलता है कि उस समय यूनानी कलाकार भी पार्थियन दरबार से जुड़े हुए थे। हमदान (प्राचीन एकबतना) तथा शमी से प्राप्त पुरुष प्रतिमाओं में दाढ़ी और मूँछ का विशेष चित्रण मिलता है। इससे लगता है कि दाढ़ी रखना उस समय प्रतिष्ठा और राजकीय गरिमा का प्रतीक था।

पार्थियन मूर्तिकला में एक पशु-आकृति विशेष उल्लेखनीय है, जो एक कांस्य-निर्मित धूपदान पर बनी है। इस आकृति में एक हत्था लगा है, पशु का शारीरिक गठन अत्यंत सुदृढ़ है और उसके अगले दो पैर धूपदान पर टिके हैं। यह कलाकारों की यथार्थवादी दृष्टि और तकनीकी दक्षता का परिचायक है।

उद्धृत (रिलीफ) कला

पार्थियन कलाकारों ने शैलोत्कीर्ण अथवा रिलीफ कला में भी विशेष प्रगति की थी। इस कला का उपयोग राजप्रासादों, मंदिरों और स्मारकों की सजावट के लिए किया जाता था। इस कला का प्राचीनतम उदाहरण लगभग 80 ईसा पूर्व का बिसुतुन अभिलेखीय उत्कीर्णन माना जाता है, जो मिथ्रिडेट्स द्वितीय से संबंधित है। यद्यपि इसमें आकृतियों में कठोरता और स्थिरता दिखाई देती है, फिर भी यह प्रारंभिक पार्थियन शिल्पकला का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

शमी के निकट तंग-ए-सरवाक से प्राप्त शैलोत्कीर्ण दृश्य में शासक अपने अनुयायियों के साथ यज्ञ करते हुए प्रदर्शित है। इसके पीछे राजपरिवार, उच्च अधिकारी तथा शस्त्रधारी अश्वारोही सैनिक अंकित हैं, जो तत्कालीन राजकीय वैभव और सामाजिक संरचना का परिचय देते हैं। बिसुतुन के एक अन्य उत्कीर्णन में राजकुमार को वेदी के समक्ष धार्मिक अनुष्ठान करते हुए दिखाया गया है। सूसा से प्राप्त अंतिम प्रमुख रिलीफ में अर्तबानुस पंचम एक सामंत को राजचिह्न अथवा अंगूठी प्रदान करता हुआ दिखाई देता है, जिसे पार्थियन रिलीफ कला की अंतिम महत्त्वपूर्ण कृति माना जाता है।

वोलोगेसीज़ तृतीय की लगभग 3 सेंटीमीटर आकार की हरे रत्न (जेम) पर उत्कीर्ण आवक्ष प्रतिमा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। इसमें शासक पार्थियन मुकुट, लंबे केश तथा दाढ़ी के साथ चित्रित है। साथ ही पहलवी-अर्सासिड लिपि में उसका नाम और उपाधि अंकित है। घिर्शमान ने इसे पार्थियन रत्न-शिल्प का सर्वोत्तम उदाहरण बताया है।

चित्रकला

पार्थियन काल में भित्तिचित्रों का भी पर्याप्त विकास हुआ। भवनों की ईंटों की दीवारों पर मोटा प्लास्टर चढ़ाकर उन पर चित्र अंकित किए जाते थे। इस शैली के उदाहरण बेबिलोनिया, असीरिया तथा विशेष रूप से कुह-ए-ख्वाजा से प्राप्त हुए हैं।

कुह-ए-ख्वाजा के प्रथम शताब्दी ई. के भित्तिचित्र रंगों की विविधता और कलात्मक परिपक्वता के कारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें ज्यामितीय आकृतियाँ, पुष्प-अलंकरण, संगीतकार, देवी-देवता तथा राजपरिवार के दृश्य अंकित हैं। इन चित्रों में हेलेनिस्टिक कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, किंतु उनकी प्रस्तुति पूर्णतः स्थानीय ईरानी शैली के अनुरूप है।

गौण कलाएँ

पार्थियन काल में मृद्भांड निर्माण, आभूषण, वस्त्र, खिलौने तथा अन्य हस्तशिल्प कलाओं का भी विकास हुआ। सूसा, एकबतना तथा क्टेसिफ़ोन की खुदाइयों से प्राप्त मृद्भांड इस काल की विकसित कुम्हार कला के उत्कृष्ट प्रमाण हैं।

कुम्हारों की कार्यशालाएँ प्रायः नगरों के बाहर स्थित होती थीं। वे शव-मंजूषा, बच्चों के लिए शवकलश तथा घरेलू उपयोग की तश्तरियाँ, प्याले, सुराहियाँ, कलश और पतली गर्दन वाली बोतलें बनाते थे। इन पर हरे अथवा नीले रंग का चमकदार लेप चढ़ाया जाता था। इनका उपयोग दैनिक जीवन के साथ-साथ मृतकों के साथ समाधियों में भी किया जाता था।

मिट्टी की देवी-प्रतिमाएँ तथा अश्वारोही सैनिकों की आकृतियाँ भी बड़ी संख्या में निर्मित की जाती थीं। सूसा से प्राप्त एक नग्न देवी की मृण्मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है। घिर्शमान के अनुसार यूनानी देवी के रूप में प्रस्तुत इस प्रतिमा में वास्तव में ईरानी देवी अनाहिता का चित्रण किया गया है।

पार्थियन स्वर्णकारों और आभूषण निर्माताओं ने मध्य एशियाई घुमंतू परंपराओं से प्रेरणा लेकर बहुरंगी तथा आकर्षक आभूषणों का निर्माण किया। इनके आभूषण गोथ तथा जर्मनिक जातियों में भी अत्यधिक लोकप्रिय थे।

साहित्य

पार्थियन काल के साहित्यिक अवशेष अपेक्षाकृत कम मिले हैं। वोलोगेसीज़ प्रथम के कुछ अभिलेख पहलवी-अर्सासिड लिपि में उपलब्ध हैं। एक परंपरा के अनुसार सिकंदर के आक्रमण के समय अवेस्ता का मूल संकलन नष्ट हो गया था और वोलोगेसीज़ प्रथम ने उसके पुनर्संकलन का प्रयास कराया। किंतु आधुनिक विद्वान, विशेषतः घिर्शमान इस परंपरा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं मानते हैं। उनके अनुसार अवेस्ता का अंतिम संकलन ससैनियन काल में संपन्न हुआ।

मेसोपोटामिया से इस काल के कुछ समझौता-पत्र, ज्योतिष एवं खगोलशास्त्र संबंधी ग्रंथ तथा वंशावलियाँ प्राप्त हुई हैं, जो कीलाक्षर तथा बाद में आरामी लिपि में लिखी गई थीं। यद्यपि पार्थिया के मूल क्षेत्र से ऐसे साहित्यिक ग्रंथ बहुत कम प्राप्त हुए हैं, फिर भी उपलब्ध अभिलेखों से पता चलता है कि प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्तर पर लेखन परंपरा विद्यमान थी।

पार्थियन सभ्यता का महत्त्व

पार्थियन सभ्यता प्राचीन ईरान तथा पश्चिमी एशिया के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जिसने लगभग पाँच शताब्दियों तक राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। अर्शक प्रथम द्वारा स्थापित इस साम्राज्य ने अपने जैसे शक्तिशाली शासकों के नेतृत्व में एक छोटे जनजातीय राज्य से विकसित होकर रोम, चीन तथा मध्य एशिया की शक्तियों के समकक्ष स्थान प्राप्त किया। पार्थियनों ने न केवल सेल्यूसिड साम्राज्य का अंत किया, बल्कि पश्चिमी एशिया में ईरानी राजनीतिक परंपरा का भी पुनरुत्थान किया।

पार्थियन साम्राज्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यावहारिक शासन व्यवस्था, धार्मिक सहिष्णुता तथा सुदृढ़ कूटनीति थी। उन्होंने विजित प्रदेशों की स्थानीय परंपराओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सम्मान किया तथा विविध जातीय और सांस्कृतिक समूहों को एक व्यापक साम्राज्य के अंतर्गत संगठित रखा। उनकी सामरिक शक्ति विशेष रूप से घुड़सवार सेना और अश्वारोही धनुर्धरों पर आधारित थी, जिसने अनेक अवसरों पर रोमन सेनाओं को भी पराजित किया। 53 ईसा पूर्व के कर्रहे के युद्ध में रोमन सेनापति क्रैसस की पराजय पार्थियन सैन्य कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।

आर्थिक दृष्टि से पार्थिया पूर्व और पश्चिम के मध्य स्थित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था। प्रसिद्ध रेशम मार्ग पर नियंत्रण ने उसे चीन, भारत, मध्य एशिया तथा भूमध्यसागरीय विश्व के मध्य व्यापारिक सेतु बना दिया। इस व्यापार से प्राप्त समृद्धि ने नगरों, शिल्प, मुद्रा-प्रणाली तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई गति प्रदान की।

कला और संस्कृति के क्षेत्र में पार्थियन सभ्यता ने ईरानी, यूनानी और मेसोपोटामियाई परंपराओं का सफल समन्वय किया। स्थापत्य, मूर्तिकला, सिक्काशास्त्र तथा राजकीय कला में इसकी विशिष्ट शैली विकसित हुई, जिसने आगे चलकर सासानी कला और संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित किया।

यद्यपि उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों, सामंतवादी प्रवृत्तियों तथा केंद्रीय सत्ता की दुर्बलता के कारण पार्थियन साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया और अंततः 224 ई. में सासानी शासक अर्दशीर प्रथम ने अंतिम पार्थियन सम्राट को पराजित कर सासानी साम्राज्य की स्थापना की, फिर भी पार्थियन सभ्यता ने ईरान की राजनीतिक निरंतरता, अंतरमहाद्वीपीय व्यापार, सैन्य संगठन तथा सांस्कृतिक समन्वय की जिस सुदृढ़ परंपरा को स्थापित किया, उसकी गणना प्राचीन विश्व की महान उपलब्धियों में की जाती है।

पार्थियन सभ्यता से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. पार्थियन सभ्यता क्या थी?

पार्थियन सभ्यता प्राचीन ईरान और आसपास के क्षेत्रों में विकसित एक प्रमुख ईरानी सभ्यता थी। इसका राजनीतिक आधार पार्थियन साम्राज्य (लगभग 247 ई.पू.–224 ई.) था, जिसकी स्थापना अर्सासिड वंश ने की थी। पार्थियनों ने पश्चिमी एशिया में रोमन साम्राज्य के विस्तार को लंबे समय तक चुनौती दी।

2. पार्थियन साम्राज्य की स्थापना किसने की?

पार्थियन साम्राज्य की स्थापना अर्शकानी वंश के संस्थापक अर्शक प्रथम ने लगभग 247 ई.पू. में की थी। आरंभ में सत्ता का केंद्र पूर्वोत्तर ईरान के पार्थिया क्षेत्र में था, बाद में साम्राज्य ईरान, मेसोपोटामिया और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों तक फैल गया।

3. पार्थियन सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?

पार्थियन सभ्यता में ईरानी परंपराओं, यूनानी प्रभाव और स्थानीय संस्कृतियों का समन्वय था। शासकों ने यूनानी भाषा-कला को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे ईरानी परंपराओं के साथ अपनाया। इस सभ्यता की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन और लंबी दूरी के व्यापार पर आधारित थी।

4. पार्थियन साम्राज्य का रोम से संघर्ष क्यों हुआ?

मेसोपोटामिया, आर्मेनिया और सीरिया जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों पर प्रभुत्व को लेकर दोनों साम्राज्यों में टकराव होता था। 53 ई. पू. में कैरहे के युद्ध में पार्थियन घुड़सवार तीरंदाजों ने रोमन सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया।

5. पार्थियन साम्राज्य का व्यापार में क्या योगदान था?

पार्थियन साम्राज्य पूर्व-पश्चिम व्यापार का प्रमुख माध्यम था। इसके क्षेत्र से होकर चीन, भारत, मध्य एशिया और रोम के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था, विशेषकर रेशम मार्ग के जरिए।

6. पार्थियन साम्राज्य का पतन कैसे हुआ?

224 ई. में आंतरिक कलह, कुलीनों की बढ़ती स्वायत्तता और रोम से लंबे संघर्ष ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया। अंततः फ़ार्स के शासक अर्दशीर प्रथम ने अंतिम पार्थियन शासक अर्तबानस चतुर्थ को हराकर सासानी साम्राज्य की स्थापना की।
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